THIRTEEN 

कल्पना ने चौंक कर अपनी आखें खोली, आस-पास कुछ भी नहीं बदला था| 

रात जैसे कोलतार सी स्याह और गाढ़ी हो चली थी जो रौशनी के हर वजूद के साथ कल्पना की तेज़ी से चलती साँसों को भी कतरा-कतरा कर अपने अंदर सोख लेने पर उतारू हो| कल्पना का दाहिना हाथ अनायास ही अपने सीने पर चला गया, ठीक जहां दिल होता है| जैसे निश्चित करना चाहती हो कि क्या वो वाकई जिंदा है या फिर ये मृत्यु के बाद का कोई अनंत है जहां समय भी अपने अस्तित्व को इस रातनुमा गाढ़े कोलतार में दफन कर चुका है| 

दिल धड़क रहा था, सामान्य से कहीं अधिक तेज़ी से| उसके कान के पर्दे अपनी उखड़ी साँसों और भागती हुई धड़कन के शोर से जैसे बोझिल हो चुके थे| अगस्त की किसी उमस भरी रात की भाँती, जब कमरे में चल रहा कूलर ठंडक देने के बजाए एक असहनीय घुटन का एहसास कराता है, जब माथे पर भीग कर चिपक आए बालों से टपकता पसीना आपकी आखों में अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर आसुओं की शक्ल ओढ़े बह निकलता है, ठीक वैसे ही…हाँ, ठीक वैसे ही धुंधली आखों से उसने अपने आस-पास फैले अँधेरे को जैसे खंगालने की कोशिश की| 

 कल्पना एक अँधेरे चौराहे पर खड़ी हुई थी, कुछ दूरी पर एक पुराने समय का लैंपपोस्ट साइड वॉक से लगा नज़र आया जिसमे लगा बहुत ही कम पॉवर का पीला बल्ब रह-रह कर जल बुझ रहा था| वहां कोई खड़ा था, ठीक लैंपपोस्ट के नीचे| कल्पना को कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे वो हैंगओवर में हो| लडखडाते क़दमों से वो उस हल्की सी रौशनी की ओर बढ़ी, वहां जो भी खड़ा था वो बहुत ही जाना-पहचाना लग रहा था| पास आते-आते वो शख्स साफ़ नज़र आने लगा| बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे हुए कंधों तक आए बाल, आखों के नीचे गहरे काले घेरे जैसे कितनी ही रातों से सोया ना हो…वो यथार्थ था|     

यथार्थ को जैसे कल्पना के वहां होने का एहसास पहले ही था, उसने कल्पना की ओर नजर ना उठाई…ना ही उसके लडखडाते कदमों को सहारा देने की कोशिश की| वो अपनी जगह खड़ा रहा|  

कल्पना अब उसके पास पहुँच चुकी थी| उसने एक हाथ कल्पना की ओर बढ़ाया, हाथ में मिनरल वॉटर की बोतल थी| 

‘पी लो! बेहतर महसूस करोगी’| 

कल्पना ने बिना कुछ कहे बोतल उससे ले ली| पानी हलक से नीचे जाने पर उसे एहसास हुआ कि वो किस कदर प्यासी थी| उसने एक नज़र यथार्थ पर डाली, यथार्थ अब भी उसकी ओर नहीं देख रहा था| यथार्थ के हाथ में एक छोटा सा चमड़े का बटुआ था जिसमे से लकड़ी के छिले बुरादे और सूखी घास जैसा कुछ मिश्रण वो एक कागज़ के टुकड़े पर रख रहा था| 

कल्पना ने पानी के दो घूँट और भरे| यथार्थ ने इत्मीनान से कागज़ के टुकड़े को एक पतले सिगरेटनुमा रोल की शक्ल में तैयार किया| 

‘छोड़ते क्यों नहीं ये बेहूदा लत’!! कल्पना तिरस्कृत भाव से बोली| 

यथार्थ ने अपनी जैकेट की जेब से एक पुराना ऑइल लाइटर निकाला| कल्पना जब से यथार्थ को जानती थी तबसे उसे वही पुराने ज़माने का ऑइल लाइटर इस्तेमाल करते देख रही थी जिसमे प्रयोग होने वाला ज्वलनशील तेल भी अब आसानी से नहीं मिलता| यथार्थ ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में लाइटर की लिड खोली, स्प्लिन्टर व्हील घुमाते ही विक्क पर लौ नाचने लगी, जैसे सुनहरी काय वाली कोई नग्न नर्तकी मंत्रमुग्ध सी किसी अरेबिक धुन पर नाच रही हो| होठों के बीच दबी सिगरेट धधक उठी| 

यथार्थ ने चेहरा ऊपर को उठा लिया, उसकी आखें आधी बंद थीं…कल्पना ने चरमोत्कर्ष के पलों में यथार्थ के चेहरे पर वो भाव अक्सर देखे थे| यथार्थ की नासिकाओं से धुंए की हल्की लकीर रात के काले अँधेरे में यूं धूमिल हो रही थी जैसे किसी पेंटर का ब्रश रंग घुले पानी के जार में हल्की लकीर छोड़ता है| 

‘बहुत देर हो गई है यथार्थ’|  

यथार्थ कुछ पल खामोश रहा, जैसे निश्चय ना कर पा रहा हो कि क्या बोलना चाहता है| 

‘हाँ कल्पना…बहुत देर हो गई है’| यथार्थ की भारी आवाज़ के पीछे हल्की सी भर्राहट कल्पना से छुपी नहीं थी| 

अगले ही पल यथार्थ का चेहरा पत्थर से ज्यादा सख्त नज़र आने लगा| 

वातावरण और भी बोझिल हो चला था, उमस बढ़ रही थी| सुनसान अँधेरे चौराहे पर वो दो जाने-पहचाने अजनबी निशब्दता की घुटन बर्दाश्त कर पाने की असमर्थता के बावजूद साथ खड़े थे| 

‘म…मुझे घर छोड़ दोगे प्लीज़’| कल्पना ने झिझकते हुए कहा| 

यथार्थ ने कोई जवाब ना दिया, सिर्फ नथुनों से ढेर सारा धुंआ उगल कर एक और कश भीतर खींच लिया और एक तरफ बढ़ गया| कल्पना ने देखा कि वो अपनी किडिलैक की ओर बढ़ गया| अँधेरे में खड़ी गाड़ी पहले कल्पना को नज़र नहीं आई थी| अभी भी वो यथार्थ की चाल देख रही थी, किसी शेर के मानिंद स्वच्छंद और दृण, लेकिन अब यथार्थ के कंधे झुक रहे थे| ये झुकाव उम्र की वजह से नहीं था, अपनी शर्तों पर जीवन जीने का बोझ उठाकर चलने वालों के कंधे अक्सर जल्दी झुकते हैं| 

यथार्थ गाड़ी बैक करके कल्पना के पास ले आया, कल्पना निशब्द गाड़ी में सवार हो गई| गाड़ी में कल्पना की जानी-पहचानी महक बसी हुई थी…यथार्थ की महक, जिसपर तेज़ी से मारिजुआना और हैश का मिला-जुला तीखा धुंआ हावी हो रहा था| कल्पना का दम घुटने लगा, उसने पैसेंजर्स सीट की खिड़की खोल रखी थी| अपना चेहरा खुली खिड़की से बाहर निकाल कर कल्पना सांस लेने की कोशिश करने लगी| किडिलैक की डिपर लाइट्स दूर जहां तक पड़ रही थीं सिर्फ धूल भरी कच्ची सड़क ही नज़र आ रही थी| किडिलैक की रफ़्तार से कच्चे रास्ते पर पसरी धूल गुबार की तरह उठती, फिर डिपर की रौशनी हटते ही जैसे अँधेरा वापस उसे थपका कर ज़मीन पर सुला देता| वो धूल कल्पना को अपनी जिंदगी जैसी लग रही थी और वातावरण का गहन अँधेरा…यकीनन वो भविष्य था जो उसे थपका कर सुला रहा था| 

यथार्थ ने एक नजर कल्पना पर डाली और एक गहरा कश खींचा, उसका सिगरेट अब भी आधा बचा हुआ था| एक पल को उसने बहुत ही खेदपूर्ण दृष्टि से सिगरेट को देखा, जैसे जो करने वाला था उसका उसे दिली अफ़सोस हो| उसके बाद उसने सिगरेट बाहर फेंक दिया| 

‘चेहरा अन्दर करके शीशे चढ़ा लो, धूल आखों में चली जाएगी’| 

कल्पना ने यथार्थ की ओर देखा| 

‘मुझे गाड़ी का ए.सी. ऑन करना था, सिर्फ इसलिए जॉइंट फेंक दिया’| यथार्थ बिना सड़क से नज़रें हटाए भावहीन स्वर में बोला| उसने गाड़ी का ए.सी. ऑन कर दिया| 

गाड़ी अब भी कच्चे रास्ते पर दौड़ रही थी| 

कल्पना ने बोतल से थोडा और पानी पिया, ए.सी. चलने के बाद उसे थोड़ी राहत महसूस हो रही थी| उसकी सांस धीरे-धीरे नॉर्मल हो रही थी, उसकी आखें…उसकी आखें बोझिल क्यों हो रही थीं? 

कल्पना के दिमाग को एक झटका लगा| 

डिपर लाइट में उसने सामने देखा, कच्ची सड़क पर धूल अब भी उड़ रही थी लेकिन उस धूल के आवरण में जो रास्ता छुपा था वो अनजाना था| 

‘य…ये कौन सा रास्ता है यथार्थ’? कल्पना ने बहुत मुश्किल से पूछा, उसे एहसास हुआ कि उसकी जुबान लडखडा रही है| 

‘यथार्थ स्टॉप! स्टॉप द कार’! 

यथार्थ के पत्थर जैसे चेहरे पर सर्द हो चले भावों में कोई परिवर्तन ना आया| 

‘रास्ता बहुत लम्बा है कल्पना, और हमारी मंजिल बहुत दूर…एक गेम खेलें’? 

‘ग…गेम’? 

‘हाँ… “ट्रूथ ऑर डेयर” खेलते हैं’| 

‘मुझे नहीं खेलना’!! कल्पना को अपना सर घूमता लग रहा था| 

यथार्थ ने पॉवर स्टेयरिंग को आवश्यकता से अधिक घुमाया, गाड़ी ने झटके से तीखा दाहिना मोड़ काटा| अगर कल्पना ने सीटबेल्ट नहीं लगाया होता तो निश्चित ही उसका सर डैशबोर्ड से टकराता| 

‘यू डोंट हैव ए चॉइस’|  

‘तुमने पानी में क…क्या मिलाया था यथार्थ’? 

‘ज़हर नहीं मिलाया है, डोंट वरी’| 

‘गेम के रूल्स बता देता हूँ…मैं तुमसे तेरह सवाल पूछूँगा| तुम्हे उनका जवाब सच…सिर्फ और सिर्फ सच देना होगा, अगर तुमने झूठ कहा तो तुम्हे उसके बदले एक डेयर करना होगा| हर एक झूठ के बदले एक डेयर’| 

‘ये कैसा ट्रूथ ऑर डेयर हुआ’? 

‘माई गेम…माई रूल्स’| 

‘अ…अगर मैं खेलने से मना कर दूं तो’? 

यथार्थ कुछ ना बोला, उसने अपने जैकेट की जेब से मोबाइल फोन निकाला और आई-क्लाउड ओपन किया| वहां कल्पना और यथार्थ की बहुत ही इंटिमेट फोटोग्राफ्स थीं| उसने एक फोटोग्राफ ओपन कर उसके फॉरवार्डिंग ऑप्शन को क्लिक किया| 

‘यथार्थ नो’!! कल्पना चीखी, उसने यथार्थ के हाथ से फोन लेने की कोशिश की लेकिन कामयाब ना हो सकी| 

‘मैंने पहले ही कहा था कल्पना… यू डोंट हैव ए चॉइस| तुम्हे ये गेम खेलना ही पड़ेगा, वर्ना इनमे से एक-एक फोटोग्राफ सोशल मीडिया पर होगी’| यथार्थ ने मोबाइल वापस अपनी जेब में रख लिया| 

‘यू बास्टर्ड! यू सिक फकिंग बास्टर्ड…ब्लैकमेल कर रहे हो तुम मुझे’? 

‘तेरह सवाल…सिर्फ और सिर्फ सच’| 

‘क्यों कर रहे हो तुम ऐसा’!! 

‘पहला सवाल’ !! यथार्थ पर जैसे कल्पना की किसी भी बात का कोई असर नहीं हो रहा था| 

‘कॉलेज का पहला दिन याद है तुम्हे’? 

ना चाहते हुए भी ‘इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिजिटल आर्ट्स एंड गेमिंग’ मुंबई, के दृश्य कल्पना की आखों के सामने उभरने लगे| पहला दिन, यहाँ आने वाला हर एक स्टूडेंट अपनी कल्पनाशक्ति और स्किल में एक्स्ट्राऑर्डिनरिली टैलेंटेड था| गेमिंग क्रैक कर पाना टॉप आई.आई.टीयन्स के भी बस की बात नहीं होती क्योंकि इसके लिए नॉलेज और स्किल से भी ज्यादा अगर कुछ ज़रूरी है तो वो है कल्पनाशक्ति| 

कल्पना ने जब पहली बार यथार्थ को देखा था तो वो उसे सबसे अलग नज़र आया था, बाकी लड़के-लडकियां जहां एक-दूसरे से इंटरैक्ट करने में व्यस्त थे, यथार्थ चुप-चाप एक कोने में बैठा हुआ अपनी स्केचबुक में उनके एक्सप्रेशन और पॉस्चर्स उकेर रहा था| कल्पना कौतूहलवश यथार्थ के पास चली गई| उसकी मौजूदगी से अनभिज्ञ यथार्थ पहले की तरह स्केच बनाता रहा| कल्पना की नज़र उसकी स्केचबुक पर पड़ी| 

‘यू आर सो गुड एट दिस’| कल्पना हैरान थी, उसने इतनी तेज़ी से किसी को मोमेंट्री एक्सप्रेशन कैच करते नहीं देखा था|  

यथार्थ ने चेहरा उठा कर पहली बार कल्पना को देखा| कितनी खूबसूरत थी वो…हैरान होने पर उसकी आखें बड़ी-बड़ी हो गई थीं और जो थोडा सा मुंह खुला था, वो बिलकुल उस बच्चे की तरह लग रही थी जिसने जादूगर को पहली बार टोप में से खरगोश निकालते देखा हो| यथार्थ मुस्कुराया, अगले ही पल उसने कल्पना के एक्सप्रेशन को अपनी स्केचबुक पर उकेर दिया| 

‘याद आ गया’? यथार्थ की सर्द आवाज़ कल्पना को वापस यथार्थ में ले आई| 

‘ह..हाँ’| कल्पना ने आखें बंद करके अपना सर सीट के हेडरेस्ट से टिका लिया| 

‘पहला सवाल, मेरी स्केचबुक कहाँ है’?  

कल्पना चुप थी| वो जानती थी यथार्थ के लिए उसकी स्केचबुक कितनी इम्पॉर्टेंट थी| 

‘वो आज भी मेरे पास है यथार्थ’| कल्पना की आखें अब भी बंद थीं, बंद आखों के पोरों से छलक गई आंसू की बूँद अपने आप को कल्पना की ओर देखते यथार्थ की नज़रों से छुपा ना सकी| 

‘मैं जानता हूँ’|  

‘मुझसे सीधे भी पूछ लेते तो मैं बता देती, ये सब करने की ज़रूरत नहीं थी तुम्हे’| 

यथार्थ के अधरों पर एक तीखी मुस्कान उभरी| 

‘ये तो सिर्फ वार्म-अप था बेब्स! गेम के पहले तीन लेवल सबसे आसान होते हैं, अगर शुरूआती लेवल ही मुश्किल होंगे तो लोग गेम खेलेंगे ही नहीं’| यथार्थ जैसे खुद में बडबडाते हुए बोला| 

‘तुम्हे चरस-गांजा वाकई छोड़ देना चाहिए यथार्थ’| 

‘दूसरा सवाल, सेकंड सेमेस्टर की पहली डेट याद है’? 

पूरा एक सेमेस्टर निकल गया था यथार्थ को कल्पना को डेट पर चलने के लिए पूछने की हिम्मत जुटाने में| यथार्थ बहुत ही साधारण घर से था, उसकी पढ़ाई का खर्च उठाना ही उसके परिवार के लिए मुश्किल था| पढ़ाई और खुद का गेम डेवेलप करने के लिए यथार्थ फ्रीलान्स कोडिंग एंड डिजाइनिंग का काम करता था, उससे आने वाला सारा पैसा वो अपना गेम डेवेलोप करने के लिए ज़रूरी उपकरणों में लगाता था| कल्पना के बहुत जिद करने पर यथार्थ पहली बार उसे डेट पर लेकर गया| वो दोनों घंटों मरीन ड्राइव पर हाथों में हाथ डाले समुंद्र को बुझता हुआ सूरज अपने आगोश में लेते देखते रहे| उस शाम कल्पना को देने के लिए यथार्थ के पास पचास रूपए की भेल, एक कोला और अपने समय के अलावा कुछ भी ना था| 

कल्पना का रोमैंटिक डेट का कॉन्सेप्ट काफी अलग था, यथार्थ के मुकाबले कल्पना आर्थिक रूप से बहुत ही संपन्न परिवार से आई थी| यथार्थ से पहले भी वो रिलेशनशिप्स में रह चुकी थी जिनके बारे में उसने यथार्थ से कभी नहीं छुपाया|  

उस रात यथार्थ कल्पना का चेहरा देख कर जान गया था कि कल्पना फर्स्ट डेट पर उससे काफी कुछ एक्स्पेक्ट कर रही थी| कल्पना ने यथार्थ को हिंट भी किया था कि वो किसी अच्छे फाइव स्टार रेस्टोरेंट चल सकते हैं, बिल कल्पना पे करेगी लेकिन यथार्थ ने उसके लिए साफ़ मना कर दिया था| 

‘तुम्हे आज भी हमारी फर्स्ट डेट का अफ़सोस है ना कल्पना’? नज़रें बिना रास्ते से हटाए यथार्थ ने अपना दूसरा सवाल किया| 

‘कुछ चीज़ें हमारी जिंदगी में सिर्फ एक बार आती हैं यथार्थ, कुछ ऐसे पल होते हैं जिन्हें हम ख़ास…बहुत ही ख़ास बनाना चाहते हैं| उन पलों, उन इमोशन्स के बीच अपनी ईगो नहीं लानी चाहिए| अगर हमारी पहली डेट पर तुम मुझे बिल पे करने देते तो क्या ही पहाड़ टूट जाता? कौन सी आफत आ जाती? क्यों ज़रूरी था तुम्हारे लिए अपने ईगो को इतना बड़ा बनाना’? कल्पना ने अपनी आखें खोलीं, वो यथार्थ को घूरते हुए बोल रही थी|  

‘तुमने जवाब अभी भी नहीं दिया| क्या तुम्हे हमारी फर्स्ट डेट का अफ़सोस है’? यथार्थ मशीनी अंदाज़ में बोला| 

‘हाँ-हाँ, मुझे अफ़सोस है! मुझे अफ़सोस है कि तुम अपनी मेल ईगो से ऊपर नहीं उठ पाए यथार्थ’!! 

‘जानती हो कल्पना, उस दिन ही मैंने तुम्हारी नज़रों में अपने लिए ये शिकायत पढ़ ली थी| मैं चाहता तो तुम्हारा प्रपोजल एक्सेप्ट कर लेता, तुम्हे हमारी डेट का खर्च उठाने देता| मुझे पता था कि तुम ओपन माइंडेड हो, उन बाकी लड़कियों की तरह नहीं हो जिनके लिए डेट का मतलब बॉयफ्रेंड को कंगाल करना होता है| तुम्हारा बॉयफ्रेंड तो पहले से ही कंगाल था यार’!! यथार्थ जैसे अपनी ही बेबसी पर हँसा| कल्पना उसे देख रही थी| 

‘तुम उस डेट का खर्च क्या हमारी हर डेट का खर्च उठा सकती थी कल्पना लेकिन मैं तुम्हे ये बताना चाहता था कि मैं तुम्हे क्या दे सकता हूँ| मेरे पास तुम्हे देने के लिए अपने वक्त, अपने प्यार, अपने साथ के अलावा कुछ नहीं था…मैं बस ये देखना चाहता था कि क्या इतना तुम्हारे लिए काफी है या कम पड़ गया’| 

यथार्थ ने चेहरा कल्पना की ओर घुमाया, यथार्थ की आखें लाल और भरी हुई थीं| ‘कम पड़ गया न यार’!! 

कुछ देर तक दोनों के बीच उस घुटन भरी रात जितना ही गहरा सन्नाटा छाया रहा| 

‘तीसरा सवाल’!! 

कल्पना ने एक गहरी सांस खींची| 

‘तुम्हे याद है वो रात जब तुम प्रोजेक्ट कम्पलीट करने के लिए मेरे रूम पर रुकी थी’| 

कल्पना को पहले ही अंदेशा था कि यथार्थ अगला सवाल क्या पूछने वाला है| 

उसके ज़हन में वो रात घूम गई| FLUID USER EXPERIENCE (UX) AND DESIGNING USER INTERFACE (UI) के ऊपर प्रोजेक्ट तैयार करने के लिए कल्पना यथार्थ के रूम पर गई थी| 

यथार्थ रेंट पर रूम लेकर अकेले ही रहता था, बाकी लड़कों की तरह वो कॉलेज हॉस्टल या पी.जी. में नहीं रहता था, उसका मानना था कि अपना काम करने के लिए उसे पूरी प्राइवेसी चाहिए| 

‘वाओ! दिस इज़ सो कूल’!! कल्पना हैरानी से यथार्थ का रूम देख रही थी| उसने एक बहुत बड़े हिस्से में गेमिंग पी.सी., कॉन्सोल्स, वी.आर सेट-अप किया हुआ था| दीवारों पर कॉण्ट्रा, सुपर मारियो और डूम के ओरिजिनल विंटेज पोस्टर्स लगे थे| 

यथार्थ मुस्कुरा कर कल्पना को देख रहा था| 

उसके पी.सी. सेटअप के पास ही यथार्थ के मॉडल शीट्स वॉल बोर्ड पर पिन-अप किए हुए थे| कल्पना उन्हें देखने लगी| 

‘क्या है ये यथार्थ’? 

‘मेरा सपना, मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट| नेक्स्ट लेवल ऑफ़ इंटरैक्टिव गेमिंग’| 

‘मिस्टर जीनियस, दिन-रात इसमें ही लगे रहते हैं’| कल्पना ने यथार्थ को चिढ़ाया, जिसपर सिर्फ हल्के से मुस्कुरा दिया वो| उसके बाद ना जाने कितनी ही देर तक दोनों प्रोजेक्ट निपटाते रहे, जब कल्पना की नज़र घड़ी पर गई तब रात के ग्यारह बज रहे थे| 

‘ग्रेट| अब हॉस्टल में एंट्री तो मिलने से रही’| 

‘आज रात यहीं रुक जाओ’| 

‘एंड…’? कल्पना ने सशंकित नज़रों से यथार्थ को देखा| 

‘एंड व्हॉट? मैं कोई रंजित या शक्ति कपूर थोड़े ही हूँ जो मौका मिलते ही तुझपर झपट पडूंगा’| यथार्थ ने बेड पर रखा कुशन कल्पना को फेंक कर मारते हुए कहा| 

‘लिसेन मिस्टर यथार्थ, मैं भी कोई हीरो की अबला बहन नहीं हूँ जो भगवान के लिए मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो वाले डायलॉग बोलूंगी| जरा सी भी गड़बड़ की न तो…’ कल्पना यथार्थ को चिढ़ाते हुए बोली और कुशन वापस उसपर फेंक दिया| 

‘अबे जा! बड़ी आई झांसी की रानी’!! यथार्थ ने वापस कुशन कल्पना को फेंक मारा| 

‘अब तू देख बेटा’!! कल्पना जंगली बिल्ली की तरह यथार्थ पर टूट पड़ी| वो यथार्थ के बाल खींच रही थी, अपने नाख़ून से उसे खसोट रही थी, उसे गुदगुदा रही थी| कुछ देर बाद कल्पना को ध्यान आया कि उसकी सासें कितनी तेज़ चल रही थीं, उसके हाथ यथार्थ के कंधों पर थे और यथार्थ का चेहरा कल्पना के चेहरे के बिलकुल पास था| यथार्थ की सासें भी तेज़ चल रही थीं| दोनों की हंसी-चिल्लाहट बंद हो गई थी, उनके दरमियान कुछ था तो वो था उनकी उखड़ी हुई साँसों का शोर| कल्पना ने यथार्थ की ओर देखा, उसे एहसास हुआ कि यथार्थ ने उसे हाथ भी नहीं लगाया है| अगर यथार्थ की जगह कोई दूसरा लड़का होता तो अबतक क्या कुछ ना कर गुज़रा होता| कल्पना ने अपने होंठ यथार्थ के होठों की ओर बढाए| 

‘कल्पना नो! लेट्स नॉट डू दिस नाउ’| यथार्थ ने खुद को पीछे खींच लिया| 

‘इट्स ऑलराईट यथार्थ| यू हैव माय कंसेंट’| कल्पना यथार्थ की आखों में झांकते हुए बोली| 

यथार्थ आगे बढ़ा और उसने कल्पना को बाहों में लेकर उसके माथे को चूम लिया| उसके बाद रूम में मौजूद सिंगल बेड पर उसने कल्पना को सुला दिया और उसके सिरहाने के पास फर्श पर दरी बिछा कर जाने कितनी ही देर तक कल्पना को बच्चों की तरह सोते हुए देखते रहा| 

उस रात यथार्थ के साथ कल्पना ने खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस किया था, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसकी जिंदगी में एक रात ऐसी भी आएगी जब उसे यथार्थ से ही इतना ज्यादा डर लगेगा| 

‘तुम्हे अफ़सोस है कि उस रात मैं तुम्हारे साथ इंटिमेट क्यों नहीं हुआ| तुम्हे लगता था कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता’? 

‘ये कैसा सवाल हुआ यथार्थ’? 

‘जवाब दो’! 

‘क्या फर्क पड़ता है इससे’? 

‘मुझे पड़ता है’!! 

‘यथार्थ स्टॉप इट’| कल्पना ने एकबार फिर झुंझलाते हुए कहा| 

‘यू नो, आय वोंट| आय वॉंट योर रिप्लाई’| 

‘मैं नहीं जानती कि तुम उस रात क्यों रुक गए यथार्थ’| 

‘ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है’|  

‘हाँ मुझे अफ़सोस है कि मेरे पहला कदम बढाने पर भी तुम मेरे साथ इंटिमेट नहीं हुए| एक लड़की होते हुए भी मैंने पहल की थी यथार्थ क्योंकि मैं तुमसे प्यार करती थी, लेकिन तुमने मेरी भावना की कद्र नहीं की| क्या करना चाहते हो? मुझे जज करना चाहते हो दैट आय एम ए सल्ट? दैट्स व्हॉट यू वॉंट? यू वॉंट टू सल्टशेम मी’? कल्पना फूट-फूट कर रो पड़ी| 

‘नो कल्पना| आय डोंट वॉंट टू जज यू फॉर एनीथिंग’| 

‘अगर जज नहीं कर रहे हो तो फिर ये सब क्या है’? 

‘हम दोनों अलग-अलग मंजिल के मुसाफिर हैं कल्पना जो गलती से एकसाथ एक ही गाड़ी में सवार हो गए, हमसफर तो हैं लेकिन हमकदम नहीं हैं| मैं आज जो कुछ भी कर रहा हूँ वो तुम्हे जज करने के लिए नहीं कर रहा| इन तेरह सवालों में मेरी जिंदगी के उन लम्हों का फलसफा है जिन्होंने मुझे आज वो बना दिया जो मैं नहीं था| तुम्हारे इन जवाबों में मैं अपने उस वजूद को तलाशने की कोशिश कर रहा हूँ कल्पना जो इन फलसफों के दरम्यान ही कहीं दफ़न है| कभी लगता है कि दम तोड़ चुका है वो तो उसकी सिसकियाँ पिघले सीसे की तरह मेरे कानों में उतरती हैं| बस उन सिसकियों का शोर मेरी आत्मा अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती’| 

‘इन सवालों से गुज़रा हुआ समय बदल नहीं जाएगा यथार्थ| जो गुजर गया उसे भूल जाओ’| 

‘मैं वाकई तुम्हारे साथ उस रात इसी वजह से इंटिमेट नहीं हुआ था कल्पना क्योंकि मैं श्योर नहीं था कि हम साथ में रह सकते हैं’| यथार्थ निर्विकार भाव से बोला| 

कल्पना उसका मुंह देख रही थी| 

‘अच्छे गेमर की ये पहचान होती है, गेमिंग रूल प्लेयर के लिए फेयर होने चाहिए| अगर इस गेम में तुम्हे झूठ बोलने की इजाज़त नहीं है तो मैं भी तुमसे कोई झूठ नहीं बोलूँगा’| 

‘तुम्हे इलाज की ज़रूरत है यथार्थ, तुम पूरे पागल हो चुके हो’| 

‘नहीं, पूरा नहीं| पूरा होने में अभी दस सवालों की देरी है’| 

‘मेरे लिए फिजिकली इंटिमेट होना तबतक संभव नहीं है कल्पना जबतक सामने वाले इंसान के लिए मेरी फीलिंग्स इमोशनली स्ट्रॉन्ग ना हों| आय हैव नेवर बीन अ कैजुअल हुक-अप काइंड’| 

‘मैं हुक-अप नहीं कर रही थी तुम्हारे साथ यथार्थ’!! अपमान के दंश से कराहते हुए कल्पना ने कहा| 

‘जानता हूँ| इसीलिए और भी ज़रूरी था कि उस रात हम फिजिकली इंटिमेट ना हों| मैं हमारे रिश्ते को थोडा और समय देना चाहता था बस’| 

कल्पना ने उसकी ओर से मुंह फेर लिया| 

‘अब! हमारे तीसरे सवाल से ही निकलता है हमारा चौथा सवाल| वो रात याद करो कल्पना जब हम वाकई पहली बार इंटिमेट हुए थे’| 

यथार्थ और कल्पना उस समय अलग-अलग गेमिंग कम्पनीज में इंटर्नशिप कर रहे थे| दोनों को डेट करते हुए दो साल हो चुके थे और दोनों स्टेडी रिलेशनशिप में थे| यथार्थ फाईनेनशियली स्टेबल हुआ था और दोनों लगभग हर वीकेंड साथ ही बिताते थे| उनका ज़्यादातर समय अपनी इंटर्नशिप, जिन प्रोजेक्ट्स पर वो काम कर रहे थे और फ्यूचर प्लैन्स के बारे में बात करते गुजरता था| उस सैटरडे नाईट यथार्थ कल्पना को मूवी दिखाने ले गया था| लेट नाईट शो से लौटते समय दोनों को बारिश ने घेर लिया| यथार्थ के रूम पर पहुँचने तक दोनों पूरी तरह भीग चुके थे| 

यथार्थ ने रूम पर पहुँचते ही कल्पना को बाहों में भर लिया| 

‘ये आज तुझे क्या हो गया है…’ कल्पना अपनी बात पूरी कर पाती उससे पहले ही यथार्थ के होंठ कल्पना के होठों से उलझ गए| आज यथार्थ के हाथों पर कोई बंदिश नहीं थी, उसके हाथों की मनमाना हरकत से सकुचाती कल्पना ने अपने जिस्म को यथार्थ की बाहों में ढीला छोड़ दिया| कुछ ही देर में उसके गीले कपड़े जिस्म से अलग कमरे के कोने में पड़े थे और वो खुद को यथार्थ की बाहों में छुपाने की कोशिश कर रही थी| 

‘यथार्थ लाइट ऑफ़ कर दे’| कल्पना ने जैसे उससे याचना की| 

यथार्थ उठकर स्विच बोर्ड तक गया, उसने शरारती अंदाज़ में कल्पना को देखा| शर्माती हुई कल्पना अपने आप को छुपाने की कोशिश करने लगी| यथार्थ ने अपना फ़ोन निकाला और उसकी फोटोग्राफ खींच ली| 

‘यथार्थ नो’!! कल्पना खुद को छुपाते हुए बोली| 

यथार्थ शरारती भाव से मुस्कुराया, उसने फोटो लेना बंद नहीं किया| 

‘यथार्थ मत कर ना यार, प्लीज़’! कल्पना ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन उस रात यथार्थ नहीं रुका| अगले दिन कल्पना ने उससे बहुत मिन्नतें की कि वो पिछली रात की फोटोग्राफ्स डिलीट कर दे| यथार्थ ने उसके सामने फोटोग्राफ्स डिलीट कर दीं| 

‘तुमने वो फोटोग्राफ्स आई-क्लाउड पर सेव कर लीं थीं| मेरे सामने सिर्फ तुमने फोन मेमोरी से फोटोग्राफ्स डिलीट कीं जबकि उनका बैक-अप अब भी तुम्हारे पास है’| कल्पना रुंधे हुए गले से बोली| 

‘दैट्स राईट, बेब्स’| यथार्थ के चेहरे पर एक तीखी मुस्कान उभरी| 

‘आय ट्रस्टेड यू यथार्थ’!! कल्पना रोते हुए बोली| 

‘व्हिच ब्रिंग्स अस टू आवर फोर्थ क्वेश्चन…’ यथार्थ जैसे ड्रामाई अंदाज़ में बोला| 

‘उस रात मेरे साथ फिजिकली इंटिमेट होने से पहले तुम किसी और के साथ फिजिकली इंटिमेट हो चुकी थी’| 

कल्पना के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं| 

‘मैं तुम्हारे प्रीवियस रिलेशनशिपस की बात नहीं कर रहा, हमारे दो साल के रिलेशन के बाद इंटर्नशिप के दौरान तुम किसी और से इंटिमेट हुई थी| हाँ या नहीं’? 

कल्पना के होंठ थर्राने लगे, मुंह से बोल ना फूटा| 

‘फ़ास्ट बेबी…आय वांट आंसर’| 

‘नहीं’! कल्पना ने हिम्मत बटोरते हुए कहा| 

गाड़ी को ज़बरदस्त ब्रेक का झटका लगा और तीखी आवाज़ के साथ गाड़ी धूल उड़ाते हुए अपनी जगह पर रुक गई| 

‘और ये तुम्हारा पहला गलता जवाब’| यथार्थ ने जलती हुई आखों से कल्पना को देखा| 

कल्पना उससे नज़रें नहीं मिला पाई|   

‘इट वॉज़ ए कैजुअल, वन टाइम थिंग’| कल्पना नज़रें झुकाए हुए बोली| 

‘डोंट वरी कल्पना, मैं आज भी तुम्हे जज नहीं कर रहा हूँ| हम बस सच का सामना खेल रहे हैं’| यथार्थ सर्कास्टिक टोन में बोला| 

‘तुम सिर्फ और सिर्फ अपने काम में थे एंड आय वॉज़ अंडर लॉट ऑफ़ स्ट्रेस’| 

‘स्ट्रेस मेरे लिए नहीं था’? 

‘आय हैड माय ओन नीड्स, अगर तुम मेरे साथ फिजिकल रिलेशनशिप में होते तो मुझे ये करने की ज़रूरत नहीं पड़ती! दो साल से भी ऊपर समय लग गया तुम्हे ये समझने में कि तुम मेरे साथ फिजिकल हो सकते हो| मैं कभी तुम्हारी प्रायॅारिटी नहीं थी’!! 

‘दो साल लग गया मुझे ये समझने में कि मैं हम दोनों को एक सिक्योर्ड फ्यूचर दे सकता हूँ| वैसा लाइफ स्टाइल दे सकता हूँ जैसा तुम जीने की आदि हो| तुम हमेशा मेरी प्रायॅारिटी थी, सेक्स मेरी प्रायॅारिटी नहीं था, अफ़सोस तुम दोनों में फर्क नहीं कर पाई’| 

कुछ पल दोनों एक-दूसरे की आखों में घूरते रहे| कल्पना उस यथार्थ को तलाश रही थी जो कभी उसे फूलों की तरह सहेज कर रखता था, लेकिन यथार्थ? यथार्थ क्या तलाश रहा था कल्पना की आखों में? …डर! हाँ, वो कल्पना की आखों में वो डर तलाश रहा था जो उसे वो सुकून दे दे जो प्यार ना दे पाया| 

‘डेयर टाइम, बेब्स’! यथार्थ के चेहरे पर फिर वही तीखी मुस्कान काबिज़ हो गई| 

‘सामने देखो’!  

कल्पना ने सामने देखा, गाड़ी की हेडलाइट में उसे कुछ ऊंचे पेड़ों का समूह फैला हुआ नजर आया| वो किसी जंगली इलाके में थे| यथार्थ ने अपने जैकेट से मोबाइल निकाला| 

‘अभी भी अरैक्नोफोबिक हो’? 

कल्पना ने जवाब ना दिया| 

‘सामने जो घना अँधेरा जंगल नज़र आ रहा है वहां कहीं पर मैंने एक मोबाइल फोन रखा है| मैं अब उस मोबाइल पर कॉल करूँगा, डेयर बस इतना सा है कि तुम्हे वो मोबाइल ढूंढना है| मेरे कॉल की रिंग 55 सैकेंड तक जाएगी उसके बाद कॉल डिसकनेक्ट हो जाएगा| अगर रिंग बजते समय में तुमने मोबाइल ढूंढ कर कॉल रिसीव कर ली तो तुम ये डेयर जीत जाओगी लेकिन अगर तुम कॉल डिसकनेक्ट होने से पहले उसे रिसीव नहीं कर पाई तो तुम ये डेयर हार जाओगी| डेयर हारने का मतलब है कि मेरे आई-क्लाउड का एक्स्प्लिसिट कंटेंट जो अब तक प्राइवेट है…वो वायरल हो जाएगा’| 

‘यथार्थ डोंट डू दिस, दिस इज़ नॉट यू…’| कल्पना अपनी बात पूरी नहीं कर पाई| 

‘योर टाइम स्टार्टस नाओ’!! यथार्थ ने मोबाइल स्पीकर फोन पर कॉल लगा दी| दूसरी तरफ रिंग जाने की आवाज़ उभरी| अब कल्पना के पास गवाने के लिए समय नहीं था| पैसेंजर सीट का दरवाज़ा और सीट बेल्ट खोला और लडखडाते क़दमों से बाहर निकली| हेडलाइट की रौशनी में दूर तक फैले घने ऊंचे पेड़ उसे अँधेरे की दोशाला ओढ़े राक्षसों के समान प्रतीत हो रहे थे जो उसे खसोटने के लिए अपनी शाखाएं पैने नाखुनो की तरह फैलाएं अट्टहास कर रहे थे| कल्पना ने अपना माथा थाम लिया, उसका सर बुरी तरह घूम रहा था| 

‘दस सैकेंड बीत चुके हैं’| गाड़ी से यथार्थ चिल्लाया| 

कल्पना के दिमाग को झटका सा लगा| अनिश्चित सी वो बेसुधी में गिरती-पड़ती आगे बढ़ रही थी, गाड़ी और हेडलाइट की रौशनी पीछे छूट रहे थे और उमस भरा गहन अन्धकार जैसे उसे भी अपने आगोश में समेट रहा था| 

कहीं पास से उसे मोबाइल फोन बजने की आवाज़ सुनाई दी| अपने होश पर काबू रखने की भरसक कोशिश करते हुए कल्पना उस दिशा में बढ़ी| अँधेरे में खड़े उन बेजान राक्षसनुमा पेड़ों से टकराती, गिरती, फिर उनका ही सहारा लेकर बढती कल्पना उस ध्वनि के नज़दीक जा रही थी| सामने उसे अँधेरे में जुगनू की तरह टिमटिमाता हल्का सा प्रकाश नज़र आया| वो मोबाइल फोन था!! अपनी पूरी ताकत लगा कर भागती हुई कल्पना उस तक पहुंची| वहां पहुँचते ही उस उमस भरी गर्मी में भी उसे अपना खून सर्द होकर जमता महसूस हुआ| 

सामने एक कटा हुआ पेड़ था जिसकी कोटर में मोबाइल फोन रखा हुआ था| वो पूरी कोटर मकड़ियों से भरी हुई थी, जोकि मोबाइल की जलती रौशनी से आकर्षित होकर गुच्छों की तरह उसपर रेंग रही थीं| चपटी, बड़ी, छोटी, रोयें वाली, तन्तुओं वाली हर तरह की मकड़ियां जैसे उस मोबाइल पर अपना हक जमाए बैठी थीं| उसके पैर कांपने लगे, खड़े रहने की शक्ति जवाब दे गई| कोटर के सामने ही वो घुटनों के बल बैठ गई| कल्पना की समझ में आ गया कि यथार्थ ने उससे उसके अरैक्नोफोबिया के बारे में क्यों पूछा था| 

अरैक्नोफोबिया एक बहुत ही कॉमन भय है जिसमे इंसान को मकड़ियों या मकड़ियों की प्रजाति से बुरी तरह डर लगता है| बच्चों और महिलाओं में ये डर विशेष रूप से पाया जाता है| यथार्थ जानता था कि कल्पना अरैक्नोफोबिक है| एक बार कल्पना ने यथार्थ के रूप पर एक बड़ा मकड़ा देख लिया था, डर के मारे वो पूरी शाम यथार्थ से लग कर बैठी रही थी| यथार्थ उसे बाहों में भरे हुए यूं ही सारी शाम बैठा रहा और उसे समझाता रहा कि मकड़ा उसे कोई नुक्सान नहीं पहुंचाएगा| कल्पना के कहने पर भी यथार्थ ने उस मकड़े को मारने या भगाने से मना कर दिया, उसके मुताबिक़ वो उसका रूम पार्टनर था और उसका भी उस कमरे पर अपनी प्राइवेसी पर उतना ही हक था जितना यथार्थ का था| 

कल्पना जानती थी कि उसके पास अब कुछ ही सैकेंड बचे हैं| अपना काँपता हुआ हाथ उसने मोबाइल की ओर बढ़ाया| उसने अपनी आखें बंद कर लीं और कोटर में हाथ डाल दिया| अपने हाथ पर सैकड़ों तन्तु रेंगते हुए उसे अपने ऊपर चढ़ते महसूस हुए| कल्पना की चीख निकल गई, वो पागलों की तरह चिल्ला रही थी, खुद पर से मोबाइल से मकड़ियों को झाड-झाड कर साफ़ कर रही थी| 

यथार्थ की नज़रें अपनी मोबाइल स्क्रीन पर थीं, अगले दो सैकेंड बाद कॉल डिसकनेक्ट हो जाने वाली थी| यथार्थ का चेहरा सख्त हो गया|  तभी, कॉल रिसीव हुई और स्पीकर फोन पर कल्पना की चीखती हुई आवाज़ गूंजी| डर और पीड़ा से फटती हुई आवाज़| 

‘यू सन ऑफ़ ए बिच!! क्यों कर रहे हो ऐसा…क्यों…क्यों’!! 

‘फोन लेकर वापस मेरे पास आओ’| यथार्थ की आवाज़ बिलकुल भावहीन और सर्द थी| 

कल्पना कुछ पल यूं ही सकते में खड़ी रही| सोचती हुई| कभी अपने सर, बालों को इस डर में झटकती हुई कि अभी भी उनमे कोई मकड़ी घुसी हुई है| रह-रह कर उसे अब भी अपने जिस्म पर मकड़ियों के रेंगने का एहसास हो रहा था, उसके रौंगटे खड़े हुए थे| फोन हाथ में लिए लडखडाते कदमों से वो वापस जाने को मुड़ी| पर उसे वापस क्यों जाना है? वो भाग भी तो सकती है! नहीं, अगर वो भागेगी तो यथार्थ उसके फोटोग्राफ्स वायरल कर देगा| वो भाग नहीं सकती…फिर वो खुद को कैसे बचा सकती है? मोबाइल फोन! उसके हाथ में मोबाइल फोन था! वो पुलिस को कॉल कर सकती थी| कल्पना ने मोबाइल ऑन किया| उसकी आखें जैसे पथरा सी गईं, उसे खुद के देखे पर यकीन नहीं हो रहा था| वो मोबाइल फोन उसका ही था| यथार्थ ने उसका मोबाइल फोन पेड़ की कोटर में रखा था| पहले डर और बेख्याली में उसका ध्यान इस बात की ओर गया ही नहीं| 

अब कल्पना को सबकुछ समझ आ रहा था, यथार्थ ने कल्पना का मोबाइल फोन किसी तरह हांसिल कर लिया था| मोबाइल सिक्योरिटी बाई-पास करना यथार्थ जैसे जीनियस के लिए चुटकी बजाने जैसा आसान काम था, यानी कल्पना के मोबाइल का सारा डेटा यथार्थ पहले ही एक्सेस कर चुका था| उसे अब बस एक ही चीज़ सूझ रही थी, उसे मदद चाहिए थी| कल्पना ने अद्वैत को कॉल लगाया| यथार्थ के साथ ब्रेक-अप होने के बाद से कल्पना और अद्वैत एक-दूसरे को डेट कर रहे थे| 

कुछ देर तक रिंग जाती रही| फिर कॉल रिसीव हुई| 

‘तुम अपने फोन से कॉल किसी को भी लगा लो कल्पना, कॉल डाइवर्ट होकर मेरे पास ही आएगी’| मोबाइल पर दूसरी ओर से यथार्थ की सर्द आवाज़ गूंजी| कल्पना के मुंह से भय के मारे सिसकारी निकल गई| 

‘पांचवां सवाल| तुमने मेरे और अद्वैत के साथ डबल टाइमिंग की है…अं..अं ..जवाब फोन पर नहीं यहाँ वापस गाड़ी में आकर देना’| यथार्थ ने कॉल डिसकनेक्ट कर दी| 

बोझिल कदमों से चलती कल्पना वापस गाड़ी की दिशा में बढ़ रही थी, तभी उसका पैर एक पत्थर से टकराया और वो मुंह के बल नीचे गिरी| कराहते हुए उसने खुद को उठाया, उसके घुटने छिल गए थे| नीचे गिरे किसी टूटे पेड़ की डाल से टकराई थी वो| उसका हाथ पेड़ की नुकीली डाल पर पड़ा| कल्पना ने उस नुकीली डाल का लगभग पांच-छे इंच लम्बा नुकीला टुकड़ा तोड़ा और उसे अपनी जींस की पिछली पॉकेट में डाल लिया| 

जब वो गाड़ी तक पहुंची तब यथार्थ एक जॉइंट रोल करके पी रहा था और काफी हाई दिखाई दे रहा था| उस उस घड़ी गाड़ी के बाहर उसके बोनट से टिक कर खड़ा था|उस पल के लिए कल्पना की तर्क शक्ति ने उसका साथ जैसे छोड़ दिया| गुस्से में बिफरती, कदमों से धरती को रौंदती हुई वो यथार्थ के पास पहुंची| 

‘यू सिक परवर्टेड फ्रीक…तूने ये सब कुछ पहले से प्लान कर के रखा था ना! मुझे चौराहे से पिक करना, पानी पिला कर मुझे ड्रग करना…फिर…फिर ये तुम्हारा सिक…साइको गेम| मुझसे कब कौन सा सवाल पूछना है और मैं उसका क्या जवाब दूंगी तुम्हे सब पता था…इसीलिए तुमने मेरा मोबाइल चुरा कर यहाँ मकड़ियों के साथ प्लांट किया’|  

‘प्रिसिज़न…इसे प्रिसिज़न कहते हैं| एक अच्छे गेम-प्ले सेटअप में एक्यूरेसी और प्रिसिज़न बहुत ज़रूरी हैं| FLUID USER EXPERIENCE के लिए मॉडल प्लानिंग परफेक्ट होनी चाहिए, है ना’? 

कल्पना आवाक खड़ी यथार्थ का मुंह देख रही थी| 

‘यू आर सिक यथार्थ…सिक’!! एकाएक कल्पना को जैसे कोई दौरा पड़ा, उसने अपनी जीन्स की बैकपॉकेट से लकड़ी का नुकीला टुकड़ा निकाला और अपने जिस्म की ताकत का हर कतरा झोंक कर यथार्थ पर वार किया| यथार्थ अगर अपना हाथ बीच में नहीं लाता तो यकीनन वो नुकीला टुकड़ा उसके चेहरे को बुरी तरह घायल कर देता| लकड़ी का टुकड़ा यथार्थ की हथेली को आर-पार चीरता चला गया| 

यथार्थ का चेहरा दर्द से विकृत हो उठा, उसके दांत भिंच गए| लेकिन अपने दर्द को जैसे पी गया वो, उसके मुंह से कराह का एक कतरा ना निकला| यथार्थ ने कल्पना का हाथ दूसरे हाथ से पकड़ कर उसे पीछे ढकेल दिया, कल्पना अपना संतुलन बनाए ना रख पाई और उसका सर गाड़ी के कोने से जा टकराया| कल्पना की चीख निकल गई, उसके माथे से खून बह रहा था| 

यथार्थ ने अपने हाथ में धंसा लकड़ी का टुकड़ा खींच निकाला, खून भल-भल कर के सोते की तरह फूट रहा था| यथार्थ दर्द से बुरी तरह हांफ रहा था| कल्पना की आखों के आगे अँधेरा छा चुका था, वो पूरी तरह बेहोश नहीं थी लेकिन होश में भी नहीं थी| अपनी उस अवस्था में ही उसे एहसास हुआ कि कोई उसे बाहों में उठा कर चल रहा है, फिर उसे आहिस्ता से बिठा दिया गया| जब उसे होश आया तब वो गाड़ी में थी, उसके माथे पर पट्टी बंधी हुई थी और सर बुरी तरह दर्द कर रहा था|   

‘पांचवे सवाल का जवाब चाहिए मुझे’| यथार्थ की आवाज़ थर्रा रही थी| 

कल्पना की नज़र यथार्थ के हाथ पर गई, खून अब भी बह रहा था| 

‘स्टॉप द कार’! कल्पना बोली| यथार्थ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा| 

कल्पना ने अपनी सीटबेल्ट खोली और अपना सर पूरे जोर से आगे डैशबोर्ड पर दे मारा| उसके माथे पर बंधी पट्टी खून से लाल हो गई| 

यथार्थ उसे देख रहा था, कल्पना ने एकबार फिर अपना सर डैशबोर्ड पर पटका| 

‘पागल हो गई हो क्या’! यथार्थ चिल्लाया| 

‘इंटरैक्टिव गेम-प्ले में एक सबसे बड़ा प्रॉब्लम Glitch का होता है यथार्थ, सपोस प्लेयर गेम-रूल्स फॉलो हा ना करे तो? तो गेम में ग्लिच आ जाएगा’! कल्पना ने फिर से अपना सर आगे डैशबोर्ड की ओर झोंका, यथार्थ ने अपने हाथ का बाँध लगा कर उसे बीच में ही रोक दिया| 

यथार्थ के हाथ ने कल्पना को पीछे सीट पर धंसा दिया| यथार्थ ने पैसेंजर सीट का सीट लैच पुल किया, सीट का पिछला हिस्सा पीछे को सरक गया| कल्पना ने कुछ समझ पाने से पहले ही यथार्थ कल्पना के ऊपर था|  

‘मुझे गेम टर्मिनेट करने में एक मिनट भी नहीं लगेगा कल्पना’| यथार्थ हिंसक भाव से बोला| कल्पना ने अपना हाथ पिछली सीट पर बढ़ा कर सीट पर रखा हैण्ड टॉवल उठाया और यथार्थ के खून सने हाथ पर लपेटने लगी| यथार्थ ने अपना हाथ पीछे खींचने की कोशिश की लेकिन खींच ना पाया| 

‘ये सब क्यों कर रहे हो यथार्थ’? कल्पना एकबार फिर याचना करते हुए बोली| 

‘जानती हो कल्पना, दुनिया का सबसे गरीब इंसान कौन होता है? वो नहीं जिसके पास पैसा ना हो, बल्कि वो इंसान जिससे उसके मूल्यों, उसके आदर्शों को छीन लिया जाए| समय ने तुम्हे मोहरा बना कर मुझसे मेरा विश्वास छीन लिया, अब मैं तुम्हे अपने खेल का मोहरा बना कर समय को जवाब दे रहा हूँ’| 

‘इससे क्या बदलेगा यथार्थ’? कल्पना यथार्थ की आखों में देखते हुए बोली| 

‘कुछ तो ज़रूर बदलेगा कल्पना’| यथार्थ ने कल्पना की आखोँ में देखते हुए कहा और अपने होठ कल्पना के होठों की ओर बढ़ा दिए| 

‘यथार्थ नो’!! कल्पना ने अपना चेहरा पीछे हटा लिया| यथार्थ का बायाँ हाथ कल्पना की जींस अनज़िप कर रहा था| कल्पना बुरी तरह कसमसाई और यथार्थ को अपने ऊपर से परे धकेलने की कोशिश करने लगी| 

यथार्थ की गर्म साँसों की तपिश अपनी गर्दन पर महसूस कर रही थी कल्पना| लाख कोशिश के बाद भी वो यथार्थ को खुद पर से परे नहीं धकेल पाई| यथार्थ उसकी जींस का बटन खोल चुका था| 

‘प्लीज़ स्टॉप यथार्थ…’| कल्पना फूट-फूट कर रो पड़ी|   

‘देखा मैंने क्या खोया है कल्पना, जो लड़का तुम्हे पूरी रात बिना हाथ लगाए अपने पास सुला सकता था उसे आज तुम्हारे ये आंसू, तुम्हारी ये बेबसी कितना सुकून दे रहे हैं’| 

‘तुम खुद को कॉण्ट्राडिक्ट कर रहे हो यथार्थ, तुमने खुद ही कहा था कि जबतक तुम लड़की के साथ इमोशनली अटेच्ड ना हो तुम फिजिकल नहीं हो सकते’| कल्पना ने हाँफते हुए कहा| 

‘मैंने ठीक कहा था कल्पना, इमोशनली अटेच्ड तो अब भी हूँ मैं तुम्हारे साथ, बस इमोशन बदल गए हैं| पहले बेइन्तेहाँ प्यार था, अब बेइन्तेहाँ नफरत है’| किसी घायल भेड़िये की तरह यथार्थ के गले से घरघराती आवाज़ निकली| 

‘पांचवे सवाल का जवाब चाहिए मुझे, तुम मेरे और अद्वैत के साथ डबल टाइमिंग कर रही थी या नहीं’| यथार्थ अपने होठ कल्पना के कानो के पास लाकर फुसफुसाया| 

कल्पना ने अपनी आखें बंद कर लीं, उसके होठ यूं भिंच गए कि उसके दिल की बात गलती से भी ज़बान पर आने ना पाए| उसका शरीर अब भी काँप रहा था लेकिन अब वो यथार्थ का प्रतिवाद नहीं कर रही थी| यथार्थ ने कल्पना को देखा, एक पल…सिर्फ एक पल के लिए ही सही उसे फिर से लगे कि वो कल्पना को अपने आगोश में छुपा ले, कल्पना ने जो किया वो सबकुछ भूल जाए| यथार्थ घबराकर कल्पना के ऊपर से उठ गया| 

किडिलैक अँधेरे धूल भरे कच्चे रास्ते पर थमी हुई थी, बिलकुल कल्पना की जिंदगी की तरह जो भविष्य के अन्धकार में यूं थम कर खड़ी हुई थी जैसे निश्चित ना कर पा रही हो कि आगे बढ़ने के लिए कोई राह बाकी भी थी या फिर वातावरण में उमड़ती धूल उसके आने वाले कल के स्याह अँधेरे आकाश में यूं परत बनकर चढ़ चुकी थी कि उसका सांस लेना दूभर हो जाए|

कल्पना ने अपनी आसुओं से डबडबा गई आखें खोलीं, आखों में भरा पानी गालों पर होते हुए ढलक गया| उसने चेहरा ऊपर उठाया, उसकी जीन्स सरक कर जाँघों पर उतरी हुई थी| क्रॉप टॉप अस्त-व्यस्त सा कंधों के ऊपर चढ़ा हुआ था| आसुओं से धुंधलाई आखों से उसने यथार्थ की ओर देखा, ड्राइविंग सीट पर बैठा यथार्थ सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था| कल्पना ने खुद को उठाने का प्रयास किया, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके जिस्म में एक कतरा भी जान भी नहीं बची है| कल्पना को अपनी अवस्था किसी दुस्वप्न की भाँती लग रही थी जिसमे किसी विषम परिस्थित से खुद को बचाने के लिए लगातार भागने का प्रयास कर रहे होते हैं फिर भी अपनी जगह से आगे नहीं बढ़ पाते| 

कल्पना पैसेंजर सीट पर सीधी होकर बैठी, उसने अपने कपड़े व्यवस्थित किए| यथार्थ अब तक काँप रहा था| उसने अपने साइड की खिड़की आधी खोल रखी थी और जॉइंट के लम्बे कश खींच रहा था| यथार्थ ने चेहरा कल्पना की ओर घुमाया| कल्पना को यथार्थ की आखों में भरे पानी पर तैरते लाल डोरे नजर आए| उसका चेहरा बेहद सख्त था, दाहिना हाथ जिसमे उसने जॉइंट पकड़ा हुआ था उसपर कल्पना की बाँधी हुई पट्टी अब भी मौजूद थी जो खून से भीग कर लाल हो चुकी थी|

‘अब बस करो यथार्थ| जो तुम नहीं हो वो बनने की कोशिश क्यों कर रहे हो’!

यथार्थ ने कल्पना के बाल गर्दन समेत पकड़ कर उसका चेहरा अपने चेहरे के बिलकुल पास खींचा| 

‘तुझे अंदाजा भी नहीं है लड़की कि मैं क्या हूँ और क्या बन गया हूँ’| 

यथार्थ के मुंह से आती मारिजुआना और हशीश की तीखी गंध कल्पना के नथुनों से टकराई|

‘मेरे पांचवें सवाल का जवाब दे मुझे! तू मेरे और अद्वैत के साथ डबल टाइमिंग कर रही थी या नहीं’|

‘कुछ सवालों का जवाब सिर्फ हाँ या ना नहीं होता है यथार्थ’!! 

‘फिर क्या होता है’!!

‘सुन तो लोगे, पर क्या समझ पाओगे? अगर समझ पाते तो आज हम एक-दूसरे के जिस्म और रूह पर लगे ज़ख्मों के सबब ना बनते यथार्थ’|

‘सुनना ज़रूर चाहूंगा, अपने एक-एक सवाल का जवाब तुमसे सुनना चाहूँगा कल्पना’| 

‘जिंदगी में एक समय ऐसा था यथार्थ जब मैं तुम्हे और अद्वैत को लेकर एक भावनात्मक द्वंद्व से गुज़र रही थी| तुम अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के पीछे दुनिया के साथ-साथ मुझे भी भुलाए हुए थे, जिस वक्त की बात तुम अपने पहले सवाल के जवाब के समय कर रहे थे वो अब तुम्हारे पास मेरे लिए नहीं था यथार्थ| मैं जिंदगी के हर मोड़ पर तुम्हारे लिए हमेशा खड़ी रही, करियर और सपने तुम्हारे थे तो क्या मेरे नहीं थे’? कल्पना की दर्द और अपमान से भरी हुई आवाज़ वहां पसरे निशब्द सन्नाटे के साथ-साथ यथार्थ के मन-मस्तिष्क पर भी घन की भाँती चोट कर रहे थे| 

यथार्थ ने जॉइंट का एक गहरा कश खींचा|

‘तुम्हारे लिए ये एक कैजुअल डबल टाइमिंग हो सकता है यथार्थ, लेकिन मेरे लिए ये सिर्फ मेरी फिजिकल नीड नहीं थी, जिंदगी के उस पड़ाव पर मुझे भी अपने भविष्य को लेकर निर्णय लेने थे’|

‘तुमने निर्णय सिर्फ अपने लिए नहीं लिए कल्पना’|

‘क्या तुमने निर्णय सिर्फ अपने लिए लिए थे यथार्थ’?

यथार्थ कुछ देर चुप रहा|

‘तुमने ही गुनाह मुकर्रर किया है तुम ही सज़ा सुना दो, मेरे कहे का मतलब क्या बनता है’? भरे हुए गले से कल्पना बोली|

‘मैं ना तुम्हारे गुनाह गिना रहा हूँ ना ही उनके लिए तुम्हे सज़ा दे रहा हूँ’| यथार्थ भावहीन स्वर में बोला|

‘तो फिर ये क्या है यथार्थ’!! कल्पना अपनी अवस्था की ओर इशारा करते हुए बोली|

‘तुमने मेरा मोबाइल मकड़ियों के बीच रखा ये जानते हुए भी कि मैं अरैक्नोफ़ोबिक हूँ! यू आर कॉन्स्टेंटली सल्ट शेमिंग मी एंड यू असॉल्टेड मी सेक्शुअली’!! 

‘मैंने तुम्हे असॉल्ट किया है!! उस लड़की को जो खुद मेरे बिस्तर पर बिछने को तैयार थी’!! यथार्थ व्यंगात्मक लहज़े में बोला|

‘तैयार थी यथार्थ, तैयार हूँ नहीं| वो गुज़रा हुआ कल था जब मैं तुम्हारे साथ सीरियस रिलेशनशिप में थी…ये हमारा आज है जब हम ब्रेक-अप कर चुके हैं और मैं अद्वैत के साथ मूव-ऑन कर चुकी हूँ| आज मैं अद्वैत के साथ सीरियस रिलेशनशिप में हूँ, तुम मेरे साथ ये नहीं कर सकते| अगर मैं अद्वैत के साथ रिलेशनशिप में नहीं होती तब भी तुम्हे कोई हक़ नहीं बनता था मेरी मर्ज़ी के बिना मुझे हाथ लगाने का! मैं तुम्हारी प्रॉपर्टी नहीं हूँ यथार्थ’!! एक ही सांस में कल्पना यथार्थ के ऊपर अपने अंदर भरी हुई सारी भड़ास निकालती चली गई| गुस्से और आवेग से उसका पूरा शरीर काँप रहा था| यथार्थ की नज़रें कल्पना की निगाहों से मिलीं|

‘सच कहा तुमने कल्पना, आज तुम अद्वैत के साथ सीरियस रिलेशनशिप में हों, मेरा कोई हक नहीं बनता कि मैं तुम्हारे साथ वो सब करूँ जो एक कपल के बीच म्यूच्यूअल कंसेंट से होता है…’ यथार्थ के मुंह से जैसे एक-एक शब्द ज़हर में लिसड़ा हुआ निकल रहा था|

‘…लेकिन जिस समय तुम मेरे साथ वैसे ही सीरियस रिलेशनशिप में थी जैसे कि अभी अद्वैत के साथ हो तब तुम अद्वैत के बिस्तर में क्या कर रही थी’!! यथार्थ कल्पना की आखों में देखते हुए बोला, कल्पना की आखें फिर से डबडबा गईं, उसके मुंह से कोई बोल ना निकला|

‘मुझे मेरे पांचवे सवाल का जवाब मिल गया है कल्पना’| यथार्थ उससे परे देखते हुए बोला|

उसने इग्निशन में लगी चाभी घुमाई, किडिलैक का इंजन घर्राहट के साथ स्टार्ट हुआ| गाड़ी स्पीड से आगे बढ़ गई| अब भी गाड़ी किसी कच्चे रास्ते पर ही बढ़ रही थी जिससे कल्पना पूर्णतः अनजान थी| अँधेरा भी कमबख्त जाने आज इतना अधिक स्याह क्यों लग रहा था| कहाँ ले जा रहा था यथार्थ उसे? कहीं यथार्थ उसे अकेले में ले जा के…कल्पना के शरीर ने सोच कर ही जोर से झुरझुरी ली| नहीं, यथार्थ ये नहीं कर सकता| अगर उसे यही करना होता तो इतनी देर तक क्यों रुकता? जंगल में भी अगर वो चाहता तो खुद को नहीं रोकता, आखिर कल्पना लाख कोशिश कर के भी यथार्थ को नहीं रोक सकती थी| कहीं ऐसा तो नहीं कि यथार्थ अपने तेरह सवालों के जवाबों के लिए रुका हुआ है, जवाब मिलते ही वो कल्पना का वही हश्र करेगा जो करते हुए वो पीछे रुका है| कल्पना को एक नए डर ने घेर लिया|

‘म…मुझे कहाँ ले जा रहे हो यथार्थ’?

यथार्थ ने कोई जवाब नहीं दिया|

‘यथार्थ मुझे घर जाना है’| कल्पना लगभग गिडगिडाते हुए बोली|

‘छठा सवाल’| यथार्थ गियर चेंज करते हुए बोला|

कल्पना के चेहरे के भाव बदले, यथार्थ उसकी कोई गुहार नहीं सुनने वाला था ये अब निश्चित था|

‘तुम्हारे मुझसे ब्रेकअप करने की वजह सिर्फ अद्वैत नहीं था’| 

कल्पना ने एकबार फिर से हेडरेस्ट से अपना सर टिका कर आखें बंद कर लीं| उसका सर अब पहले से ज्यादा तेज़ी से घूम रहा था, वो बुरी तरह नौसिएटिक फील कर रही थी| चलती हुई गाड़ी की घरघराहट उसे ज़बरदस्त मोशन सिकनेस का एहसास दे रही थी| 

उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी ‘देजा-वू’ लूप में फंसी हुई है जोकि बार-बार खुद को रिपीट कर रहा है, एक ऐसा चक्रव्यूह जिसे वो चाह कर भी तोड़ नहीं पा रही…जिसे वो तोड़ ही नहीं सकती| उसकी बंद आखों के सामने ये अँधेरा इतना गाढ़ा क्यों था? ठीक वैसा ही जैसा गाड़ी के बाहर वातावरण में चारों ओर पसरा हुआ था| क्या इसे कभी चीर कर वो बाहर निकल पाएगी? क्या इस रात की कभी सुबह होगी? कल्पना ने आखें खोल कर अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डाली| उसकी घड़ी बंद पड़ी थी| उसने अपने फोन पर नज़र डाली, उसके फोन का क्लॉक टाइमर हैंग क्यों था? यथार्थ! ये यकीनन यथार्थ का ही काम था, उसने फोन का क्लॉक टाइमर भी हैंग कर दिया था ताकि कल्पना को समय का अंदाजा ना मिले| कल्पना ने स्टेयरिंग संभालते यथार्थ के बाएँ हाथ पर नज़र डाली, उसने घड़ी नहीं पहनी हुई थी| यथार्थ का चेहरा उसे पीला पड़ता नज़र आ रहा था, शायद वो हाथ से अत्यधिक खून बहने और हशीश और मारिजुआना के असर के कारण था|

‘सवाल का जवाब दो’| यथार्थ की आवाज़ थर्रा रही थी|

‘हमारे ब्रेक-अप की वजह अद्वैत था ही नहीं यथार्थ’| कल्पना भावहीन स्वर में बोली|

‘तुम एक जीनियस हो यथार्थ, इसमें कोई शक नहीं| तुम्हारी सोच, तुम्हारे काम के लिए तुम्हारा पैशन, तुम्हारा डैडिकेशन अनमैचेबल है| तुम्हारी इसी खूबी ने मुझे तुम्हारी ओर सबसे ज्यादा आकर्षित किया था यथार्थ’| कल्पना ने बोलते हुए एक नज़र यथार्थ पर डाली| यथार्थ सामने रास्ते की ओर देख रहा था, लेकिन वो जानती थी कि यथार्थ उसे सुन रहा है|

‘मैं तुमसे आकर्षित होती चली गई यथार्थ, तुमको जानने के बाद एहसास हुआ कि तुम इंसान भी उतने ही अच्छे हो जितना कि अपने काम में अच्छे हो| मुझे लगा यही प्यार है…इसके अलावा और क्या चाहिए’? एक बार फिर कल्पना ने यथार्थ की ओर देखा,  उसे कोई भाव उसके चेहरे पर नज़र ना आए|

‘तुमने फिजिकल रिलेशनशिप के लिए मुझे मना कर दिया जबकि अद्वैत के साथ मेरा रिश्ता एक कैज़ुअल हुक-अप के तौर पर ही शुरू हुआ| तुम अपने काम में डूबते चले गए और मुझे और मेरे अस्तित्व को नज़रंदाज़ करते चले गए| अद्वैत तुम्हारी तरह कोई टैलेंटेड जीनियस नहीं है, लेकिन उसके साथ रहकर मुझे एहसास हुआ कि मैं जब तुम्हारे साथ थी तो मैं तुम्हारे काम से प्यार करती थी, मुझे ऐसा लगता रहा कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ लेकिन मैं इंसान से नहीं काम से प्यार कर रही थी जबकि अद्वैत के साथ समय बिताने पर मुझे उससे इंसान की तौर पर प्यार हुआ यथार्थ’|

यथार्थ ने जॉइंट का एक गहरा कश अपने फेफड़ों में खींचा|

‘हमारे ब्रेकअप की सबसे बड़ी वजह अद्वैत नहीं, तुम्हारे काम के प्रति तुम्हारा जूनून है यथार्थ’| कल्पना सख्त भाव से बोली|

यथार्थ के नथुनों से धुंए की लकीर निकली|

‘सातवाँ सवाल…मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट, मेरा इंटरैक्टिव गेम| क्या तुम्हें मेरा गेम डेवलपमेंट याद है’?

कल्पना के दिमाग में गुज़रे समय के दृश्य जैसे रिवाइंड-प्ले होने लगे| पहली बार यथार्थ के साथ जिस रात कल्पना इंटिमेट हुई थी उसके दो दिन बाद के दृश्य कल्पना के मस्तिष्क पटल पर उभरे| दो दिन तक यथार्थ ने ना ही कल्पना को कॉल किया था और ना ही उसके अनगिनत कॉल्स और मैसेजेस का कोई जवाब दिया था| जब मैसेजेस सीन भी नहीं हुए तो किसी अनिष्ट की आशंका से घबराई कल्पना यथार्थ के अपार्टमेंट पहुंची| लगभग पांच मिनट तक लगातार कॉलबेल बजाने के बाद यथार्थ के अपार्टमेंट का दरवाज़ा खुला| सामने यथार्थ था, उसकी आखों में लाल डोरे तैर रहे थे, आई-बैग्स सूजे हुए थे और आखों के चारों तरफ काले घेरे थे जैसे कि कई दिन तक लगातार ना सोने से होते हैं| पूरे अपार्टमेंट में एक अजीब सा तीखा धुंआ भरा हुआ था|

‘यथार्थ….ये सब क्या है’? कल्पना असमंजस के भाव से बोली|

‘अन्दर आओ, बताता हूँ’| यथार्थ की आवाज़ भारी और भर्राई हुई थी|

‘मारिजुआना! ये तो मारिजुआना की स्मेल है ना’? कल्पना आंदोलित स्वर में बोली|

‘मारिजुआना विद हैश ऑइल…बहुत ही तेज़ हिट करता है और बहुत ज्यादा हाई देता है’| यथार्थ बोला, उसकी आवाज़ से कल्पना की समझ में आ गया कि वो हाई है|

‘ये नया शौक कब से पाल लिया’? कल्पना अपने गुस्से को मुश्किल से काबू करते हुए बोली|

‘अरे बाबा कहा ना, अन्दर आओ’| यथार्थ ने कल्पना को अपार्टमेंट के अन्दर खींचा और दरवाज़ा बंद कर लिया|

उस जगह की स्थिति देखकर कल्पना को समझ आ गया कि पिछले दो दिन-दो रात से यथार्थ सिर्फ और सिर्फ अपने प्रोजेक्ट पर काम कर रहा था|  

‘इस जगह को धूप और फ्रेश ऑक्सीजन की सख्त ज़रूरत है वर्ना यहाँ फेफड़े फट जाएंगे’| कल्पना अपार्टमेंट की खिड़कियाँ खोलने के लिए आगे बढ़ी|

‘नहीं खिड़कियाँ मत खोलना’!! यथार्थ जैसे आतंकित स्वर में चिल्लाया और कल्पना का हाथ थाम लिया|

‘क्यों भंड हुआ बैठा है यथार्थ!! अब यही बाकी बचा है लाइफ में…चरस-गांजा करेगा अब करियर छोड़ कर’!! खुद पर और काबू रख पाने में असमर्थ कल्पना चिल्लाई|

यथार्थ मुस्कुराया|

‘तुझे पता है कल्पना कि हम मारिजुआना लेने के बाद स्लो क्यों हो जाते हैं’?

‘नहीं, और मुझे पता भी नहीं करना है’| 

‘अरे सुन तो मेरी बात’!!

‘मुझे कुछ नहीं सुनना’!!

यथार्थ ने अपने गेमिंग सिस्टम से कनेक्टेड एक वी.आर. बॉक्स( वर्चुअल रियलिटी बॉक्स) जैसा दिखने वाला हेडगियर उठाया और बिना कुछ बोले कल्पना को पहना दिया| 

दो पल के लिए कल्पना बिलकुल जड़वत रह गई|

वर्चुअल रियलिटी बॉक्स में जो दृश्य उभर रहे थे वो उस रात के थे जब यथार्थ और कल्पना इंटिमेट हुए थे|

‘एक-मिनट! तुम उस रात फोटोग्राफ्स और हमारे इंटिमेट होने के विडियो इसलिए शूट कर रहे थे’!! कल्पना फिर से चिल्लाते हुए बोली| उसने अपने सर से हेड-गेयर उतार कर टेबल पर पटक दिया|

‘ध्यान से मेरी माँ, बहुत मुश्किल से बनाया है, टूट जाएगा’| यथार्थ यूं हेडगियर को उठाते हुए बोला जैसे उसके पालतू पेट को कल्पना ने पटक दिया हो|

‘इसे वायरल करने वाले हो क्या’? कल्पना यथार्थ को घूरते हुए बोली|

‘थोड़ी देर जजमेंटल होना बंद करके मेरी बात पर ध्यान देगी तब तो पता चलेगा तुझे कि मैं क्या बताने की कोशिश कर रहा हूँ’| इस बार यथार्थ झुंझलाते हुए बोला|

‘ठीक है बोलो, क्या बात है’| कल्पना भुनभुनाई|

यथार्थ ने भाग कर एक दूसरा हेड गेयर उठाया जोकि दिखने में ठीक वैसा ही था जैसा कि उसने कल्पना को दिया था| हेड गेयर सिस्टम से कनेक्ट करते हुए उसने एक हेड गेयर कल्पना की ओर बढ़ा दिया और दूसरा खुद पहन लिया|

‘पहनो इसे’|

असमंजस के भाव से कल्पना ने एक बार फिर वर्चुअल रियलिटी हेड गियर दोबारा पहना| उस रात के कमरे के दृश्य कल्पना की आखों के सामने दोबारा उभरे| यथार्थ कल्पना को बाहों में भरते हुए नज़र आया|

‘एक मिनट! विडियो तो तुम शूट कर रहे थे, लेकिन इसमें तुम मेरे साथ हो तो फिर ये विडियो किसने शूट की’!! कल्पना आतंकित भाव से बोली|

‘दो मिनट शांत रह, खुद सब समझ आ जाएगा’|

वर्चुअल रियलिटी बॉक्स में नजर आते यथार्थ ने पीछे से कल्पना को अपनी बाहों में भर लिया| कल्पना को यथार्थ की बाहों की गिरफ्त अपने जिस्म पर कसती महसूस हुई| 

‘यथार्थ क्या कर रहे…’ बोलते हुए कल्पना ने अपना हेडगियर ऊपर उठाया| कल्पना चिहुंक उठी| यथार्थ उससे दूर खड़ा मुस्कुरा रहा था|

‘यथार्थ…तुम…तुम वहां खड़े हो तो फिर…मुझे हग कैसे किया’?

‘हेडगियर पहनो, सब समझ आ जाएगा’| यथार्थ अपना हेडगियर लगाए हुए बोला|

कल्पना ने अपना हेडगियर वापस पहन लिया| वर्चुअल रियलिटी बॉक्स में नज़र आ रहे विजुअल में यथार्थ कल्पना के कपड़े उसके जिस्म से उतारते हुए उसे चूमता नज़र आया|

कल्पना को अपने जिस्म पर यथार्थ के नर्म होठों और उसकी गर्म साँसों की अनुभूति हुई| उसकी सासें तेज़ चलने लगीं|

‘तुम्हें गुदगुदी बहुत ज्यादा लगती है ना कल्पना’? यथार्थ की आवाज़ हेडगियर लगाए कल्पना के कानो में पड़ी| वी.आर. पर यथार्थ शरारती भाव से उसे अपनी तरफ बढ़ता नज़र आया|

‘नो…नो..नो..’ कल्पना खुद को छुपाते हुए पीछे हटने की कोशिश कर रही थी| वी. आर. पर यथार्थ ने कल्पना को पकड़ लिया, यथार्थ की उंगलियाँ उसे अपने जिस्म पर फिसलती हुई महसूस हुई| वो खिलखिला रही थी और यथार्थ को रुकने के लिए कह रही थी| अचानक यथार्थ ने उसके सर से हेडगियर खींच लिया| वो वापस यथार्थ के धुंए भरे कमरे में खड़ी थी|

‘यथार्थ…ये क्या था’? कल्पना आवाक थी|

‘इंटरैक्टिव गेमिंग का फ्यूचर है ये’| यथार्थ जैसे खुद में ही गर्वान्वित होते हुए बोला|

‘मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है यथार्थ’| 

‘समझाता हूँ, धान से सुनो’| यथार्थ कल्पना को पकड़ कर उसे कमरे में रखे बेड पर बिठाते हुए बोला|        

‘उस रात तुम्हारे साथ बिठाये हुए पल जो मैंने फोटोग्राफ्स और विडिओ के रूप में कैप्चर किए थे उन्हें मैंने गेमिंग इंटरफ़ेस के रूप में डेवेलप कर दिया, यानी वर्चुअल रियलिटी हेडगियर पर नज़र आ रहा मेरा ये अपार्टमेंट दरअसल गेम का इंटरफेस बन गया| फिर डिजिटल मैपिंग के ज़रिए मैंने हम दोनों के वर्चुअल अवतार क्रिएट कर दिए’|

‘लेकिन हमारे वर्चुअल अवतार जो कुछ भी कर रहे हैं वो मुझे वास्तविक क्यों लग रहा है? मैंने तुम्हारी बाहों, तुम्हारे चुम्बन तुम्हारी गुदगुदाहट को वास्तव में महसूस कैसे किया’?

‘क्योंकि तुम इस वर्चुअल रियलिटी हेडगियर के ज़रिए अपने वर्चुअल अवतार से कनेक्टेड हो| ये वर्चुअल रियलिटी कंसोल तुम्हारे ब्रेन के टेम्पोरल लोब और हाइपोथालामस को इफ़ेक्ट कर रहा था| टेम्पोरल लोब हमारे अन्दर प्यार और डर की भावनाओं को कण्ट्रोल करता है और हाइपोथालामस सेक्शुअल डिजायर, आवेग, आवेश और चरमोत्कर्ष का एहसास कराता है’| यथार्थ एक ही सांस में बोला|

‘ये मारिजुआना का क्या चक्कर है’? 

‘कॉमन बिलीव है कि हशीश और मारिजुआना जैसे मादक पदार्थ हमें बेसुध करते हैं, लेकिन सही मात्रा में लिए जाने पर ये ब्रेन फंक्शन को कई गुना अधिक एकाग्र करते हैं| हमारा शरीर शिथिल होता है पर दिमाग सामान्य अवस्था से अधिक एकाग्र होता है’| यथार्थ यूं बोला जैसे किसी सेमीनार में स्पीच दे रहा हो|

कल्पना कुछ क्षण उसे देखती रही|

‘मतलब तुम्हारे हिसाब से लोगों को वीड जॉइंट मार कर ये…ये एरोटिक वर्चुअल गेम्स खेलने चाहिए| क्या बात है यथार्थ…क्या खूब ड्रीम प्रोजेक्ट बनाया है तुमने’| कल्पना व्यंगात्मक अंदाज़ में स्लो-क्लैप करते हुए यथार्थ से बोली|

‘नहीं कल्पना, तुम समझ नहीं रही हो| ये प्रोजेक्ट अभी डेवलपिंग स्टेज में हैं, इसे डेवेलोप करने के लिए मुझे हाई होने की ज़रूरत है लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि इसे खेलने वाले हर प्लेयर को पहले हाई होना होगा’| यथार्थ कल्पना को समझाते हुए बोला|

‘मैंने गेम-प्ले के लिए ये इंटरफेस चुना क्योंकि ये हमदोनों से ही जुड़ा हुआ बहुत स्ट्रोंग इमोशनल एक्सपीरियंस था| जरा सोचो कल्पना, हर प्लेयर अपने गेम के लिए अपना खुद का पर्सनलाइज़ड गेम इंटरफेस तैयार कर पाएगा, जीवन के जिन ख़ास क्षणों को वो बार-बार जीना चाहेगा उन्हें हर गेम-प्ले में अनगिनत बार अलग-अलग ढंग से जी पाएगा’| 

‘तुम जो बोल रहे हो वो वास्तविक रूप में संभव नहीं है यथार्थ’| कल्पना सशंकित भाव से  बोली|

‘1986 में लोग जब अपने ब्लैक एंड वाइट डब्बानुमा टीवी पर रामायण देख रहे थे तब अगर तुम उन्हें बोलती कि मात्र तीन दशक बाद लोग अपनी जेब में एक हथेली जितना बड़ा यंत्र लेकर घूमेंगे जिसपर वो लाइव स्ट्रीमिंग से फ़िल्में और शोज देखेंगे तो लोग तुम्हे पागल कहते’| यथार्थ आहत भाव से बोला|

‘वो अलग बात है यथार्थ, तुम जो कह रहे वो वो हाइपोथेटिकल है’| कल्पना ने जिरह की|

‘नेटफ्लिक्स पर “बैंडरस्नैच” जैसी इंटरैक्टिव फिल्म्स आ रही हैं जहां व्यूअर लाइव स्ट्रीमिंग में मुख्य किरदार के लिए फैसले लेकर अपनी खुद कि स्टोरीलाइन चुनता है’| 

‘बैंडरस्नैच एक स्मार्ट मूव है यथार्थ, जहां वास्तविक रूप में आप किरदार के लिए कोई फैसला या चुनाव नहीं कर रहे, आप सिर्फ उन दिए गए ऑप्शन्स में से एक को चुन रहे हैं जोकि आपके सामने आ रहा है| आपको ये आभास हो रहा है कि आप किरदार के लिए चुनाव कर रहे हैं पर हकीकत में स्टोरीलाइन की हर संभावित चॉइस फिल्म में पहले से ही शूट कर ली गई थी| आप सिर्फ वही देखते हैं जोकि आप देखना चाहते हैं, लेकिन आपको लगता है कि आप किरदार का भविष्य अपने एक्शन द्वारा तय कर रहे हैं’| कल्पना यथार्थ को समझाते हुए बोली|

यथार्थ खुश नहीं था, कल्पना ने उसकी मेहनत को सिरे से नकार दिया था| दोनों के बीच बहस शुरू हुई जोकि धीरे-धीरे झगड़े में बदल गई| उनके ब्रेकअप का पहला कदम उस दिन उठ चुका था|

कल्पना ने अपनी आखें खोली| यथार्थ उसकी ओर ही देख रहा था|

‘मुझे याद है यथार्थ’|

‘सातवाँ सवाल….तुम्हे मेरे इंटरैक्टिव गेम-प्ले पर वाकई विश्वास नहीं था’? यथार्थ ने सवाल किया|

‘नहीं’| कल्पना ने बेझिझक जवाब दिया|

यथार्थ ने एक्सीलिरेटर पर अपने पैर का दबाव बढ़ा दिया| किडिलैक जैसे हवा से बातें कर रही थी|

‘आठवाँ सवाल…तुम कहाँ से आ रही थी’? यथार्थ सख्त भाव से बोला|

‘क..क्या मतलब’? कल्पना उलझन भरे भाव से बोली|

‘तुम मुझसे चौराहे पर मिली थी…याद करने की कोशिश करो कि तुम कहाँ से आ रही थी’|

कल्पना ने दिमाग पर जोर डालने की कोशिश की, उसका सर पहले से भी अधिक घूमने लगा| कहाँ से आ रही थी वो? उसे कुछ याद नहीं आया, सिर्फ और सिर्फ गहन अन्धकार जो गाड़ी से बाहर था वही जैसे उसके मस्तिष्क पटल पर छाया हुआ था| कल्पना वाकई याद नहीं कर पाई कि वो उस चौराहे पर कहाँ से पहुंची थी| बल्कि उसे उस अँधेरे                                                              चौराहे से पहले की कोई बात याद नहीं थी|

‘म..मुझे कुछ याद क्यों नहीं आ रहा’? कल्पना अपना सर पकड़ते हुए बोली|

यथार्थ ने कोई जवाब ना दिया|

‘म..मुझे सिर्फ वहीँ बातें क्यों याद आ रही हैं जिनसे जुड़े सवाल तुमने मुझसे किए हैं’? कल्पना की आवाज़ काँप रही थी|    

 ‘नौवां सवाल…तुम्हे याद है तुम घर जाना थी’?

‘ह..हाँ’!

‘मैं तुम्हे घर ले चलता हूँ, क्या तुम्हे अपने घर का पता याद है’?

कल्पना पर जैसे आसमान टूट कर गिरा| उसे अपने घर का पता क्यों नहीं याद आ रहा था|

गाड़ी की स्पीड बढती जा रही थी, उस थर्राहट को कल्पना महसूस कर रही थी| 

‘दसवां सवाल…’|

कल्पना ने ध्यान दिया कि यथार्थ अब उससे जवाब नहीं मांग रहा| अब वो सिर्फ सवाल पूछ रहा है, ऐसे सवाल जो घन बन कर कल्पना के पूरे वजूद पर आघात कर रहे थे|

गाड़ी की गडगड़ाहट बढ़ रही थी|        

कल्पना ने गाड़ी से बाहर झाँका| अँधेरे में उसे एक पुल नज़र आया, उफनती हुई नदी जिसकी चांदी की तरह चमकदार लहरें हिलौरे मारते हुए जैसे अँधेरे को चुनौती दे रही थीं| गाड़ी पुल पर अँधेरे और लहरों के द्वंद्व के बीच किसी घायल और क्रोधित नागिन की भाँती लहराती हुई आगे बढ़ रही थी|

‘…क्या मुझसे वाकई कभी, एक पल के लिए भी प्यार किया था’? यथार्थ कल्पना की नज़रों में देखते हुए बोला|

कल्पना विस्फारित नेत्रों से यथार्थ को देख रही थी|

‘हाँ’ | कल्पना ने अपना हाथ स्टेयरिंग पर यथार्थ के हाथ के ऊपर रख दिया| यथार्थ के चेहरे के भाव बदले| उसका चेहरा अब पहले जितना कठोर नज़र नहीं आ रहा था| कल्पना आहिस्ता से अपना चेहरा यथार्थ के चेहरे के करीब ले आई| 

‘क्या अब भी मुझसे प्यार करती हो…’? यथार्थ का ध्यान पूरी तरह कल्पना पर था|

कल्पना ने हौले से अपने होठ यथार्थ के होठों पर रख दिए| दोनों की आखें बंद थीं, बंद पलकें भीगी हुई थीं, आंसुओं की बूँदें दोनों के चेहरों के बीच कहीं मिलकर खो रही थीं|

कल्पना के होंठ यथार्थ के होठों से अलग हुए|

‘नहीं’| कल्पना के होठों से बर्फ जैसी सर्द आवाज़ निकली|

स्टेयरिंग पकडे यथार्थ के हाथ पर कल्पना की पकड़ मज़बूत हो गई| उसने अपनी पूरी जान झोंक कर स्टेयरिंग पूरी तरह घुमा दिया| 

‘कल्पना नहीं’!!! यथार्थ बुरी तरह चिल्लाया लेकिन उसकी आवाज़ किडिलैक के इंजन और उफनती नदी के शोर के बीच कहीं डूब गई| 

चारों तरफ एकबार फिर घोर नितांत अन्धकार था| समय जैसे अपना अस्तित्व कहीं खो चुका था|

यथार्थ ने चौंक कर आखें खोलीं, वो बुरी तरह हांफ रहा था| उसने अपने सर से वर्चुअल रियलिटी हेडगियर उतारा|

‘दिस वोंट वर्क! हम सिर्फ टाइम वेस्ट कर रहे हैं’!!  डॉक्टर ने झुंझलाते हुए कहा| उसकी नज़र कोमा में पड़ी कल्पना के जिस्म से जुड़े लाइफ सपोर्ट सिस्टम के डिस्प्ले पर थी| कल्पना के सर के ऊपर भी यथार्थ जैसा ही वर्चुअल रियलिटी हेडगियर था| 

‘नहीं डॉक्टर, ये काम करेगा| ये डेफिनेटली काम करेगा| एक चांस, सिर्फ एक चांस और चाहिए मुझे’| यथार्थ लगभग गिडगिडाते हुए बोला|

‘तुम बारह बार कोशिश कर चुके हो यथार्थ| तुम्हारा दिमाग इस मानसिक दबाव को और बर्दाश्त नहीं कर पाएगा| तुम्हारा दिमाग भी कल्पना की तरह ही डीप कोमा में चला जाएगा’| डॉक्टर यथार्थ को समझाते हुए बोला|

‘कल्पना मेरी वजह से इस हालत में है डॉक्टर| उस रात मुझपर जूनून सवार था| मैंने कल्पना के लिए उस रात तेरह सवालों का गेम प्लान किया था| उसके हर सवाल के जवाब के लिए मैंने पहले से ही तैयारी की थी, लेकिन कल्पना ने गेम ख़त्म ही नहीं किया| बारहवें सवाल पर ही कल्पना ने गाड़ी का एक्सीडेंट कर दिया| मैं तो बच गया लेकिन कल्पना का दिमाग शॉक से कोमा में चला गया| उसे वापस लाने का मेरे पास सिर्फ यही एक तरीका है डॉक्टर, उसके सुपर कॉनशियस को मैं अपने इस इंटरैक्टिव गेम के ज़रिए जगा सकता हूँ| जिस सवाल पर कल्पना ने एक्सीडेंट किया था वो गेम का ग्लिच है, अगर मैं उसे किसी तरह पार कर पाया तो कल्पना कोमा से बाहर आ सकती है’|

‘टेक्निकली यस, लेकिन तुम्हारा मेथड अनकनवेंश्नल है यथार्थ| तुम्हारा गेम-प्ले सिर्फ उन्ही घटनाओं को बार-बार दोहरा रहा है जो पहले घटित हो चुकी हैं, तुम खुद भी चाह कर एक बार गेम में जाने के बाद उन घटनाओं को बदल नहीं पा रहे| तुम्हारा दिमाग थक रहा है’|

‘घटनाएं बदल नहीं रहीं क्योंकि गेम-प्ले में मेरे एक्टिव ब्रेन के साथ कल्पना का सब कॉनशियस उन घटनाओं को दोहरा रहा है| लेकिन मैं इस ग्लिच को पार कर लूँगा’| यथार्थ के चेहरे पर दृण भाव थे| उसने तेरहवीं बार फिर वर्चुअल रियलिटी हेडगियर सर पर पहन लिया|

कल्पना ने चौंक कर अपनी आखें खोली, आस-पास कुछ भी नहीं बदला था|

रात जैसे कोलतार सी स्याह और गाढ़ी हो चली थी जो रौशनी के हर वजूद के साथ कल्पना की तेज़ी से चलती साँसों को भी कतरा-कतरा कर अपने अंदर सोख लेने पर उतारू हो| कल्पना का दाहिना हाथ अनायास ही अपने सीने पर चला गया, ठीक जहां दिल होता है| जैसे निश्चित करना चाहती हो कि क्या वो वाकई जिंदा है या फिर ये मृत्यु के बाद का कोई अनंत है जहां समय भी अपने अस्तित्व को इस रातनुमा गाढ़े कोलतार में दफन कर चुका है|

दिल धड़क रहा था, सामान्य से कहीं अधिक तेज़ी से| उसके कान के पर्दे अपनी उखड़ी साँसों और भागती हुई धड़कन के शोर से जैसे बोझिल हो चुके थे| अगस्त की किसी उमस भरी रात की भाँती, जब कमरे में चल रहा कूलर ठंडक देने के बजाए एक असहनीय घुटन का एहसास कराता है, जब माथे पर भीग कर चिपक आए बालों से टपकता पसीना आपकी आखों में अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर आसुओं की शक्ल ओढ़े बह निकलता है, ठीक वैसे ही…हाँ, ठीक वैसे ही धुंधली आखों से उसने अपने आस-पास फैले अँधेरे को जैसे खंगालने की कोशिश की|

 कल्पना एक अँधेरे चौराहे पर खड़ी हुई थी, कुछ दूरी पर एक पुराने समय का लैंपपोस्ट साइड वॉक से लगा नज़र आया जिसमे लगा बहुत ही कम पॉवर का पीला बल्ब रह-रह कर जल बुझ रहा था| वहां कोई खड़ा था, ठीक लैंपपोस्ट के नीचे| कल्पना को कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे वो हैंगओवर में हो| लडखडाते क़दमों से वो उस हल्की सी रौशनी की ओर बढ़ी, वहां जो भी खड़ा था वो बहुत ही जाना-पहचाना लग रहा था| पास आते-आते वो शख्स साफ़ नज़र आने लगा| बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे हुए कंधों तक आए बाल, आखों के नीचे गहरे काले घेरे जैसे कितनी ही रातों से सोया ना हो…वो यथार्थ था|    

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