THE MUSE

I put my heart and soul into my work, and I have lost my mind in the process- Vincent Van Gogh
Prologue
दर्द से कराहते हुए उसने आखें खोलीं, उसपर अबतक बेहोशी की दवा का असर था. सर दर्द से बुरी तरह फट रहा था और आखों के आगे सबकुछ घूमता दिखाई दे रहा था. वो भूसे के बड़े से ढेर पर लेटी हुई थी. कपडे तार-तार होकर फटे हुए और उसकी लॉन्ग ड्रेस कमर के ऊपर उठी हुई थी., हाथ पैर जगह-जगह से छिले हुए. सामने उसे वो वहशी खड़ा दिखाई दिया. गनीमत थी कि उस बूढ़े की पीठ उसकी तरफ थी इसलिए उसके होश में आने का उसे पता ना चला. उसकी पैंट उसके घुटनों पर आकर टिकी हुई थी और अपनी जाँघों के बीच वो किसी प्रकार का कोई लोशन लगा रहा था और खुद को उत्तेजित करने की कोशिश कर रहा था.
लड़की को शायद समय से काफी पहले होश आ गया था, बूढ़े की अपेक्षा से काफी पहले. वो खुद को ही उत्तेजित करने में इतना व्यस्त था कि उसे पीछे से आती आवाज़ सुनाई ना दी. उस अवस्था में ही अपने हाथ से खुद को उत्तेजित करता हुआ बूढ़ा जैसे ही पीछे पलटा एक मज़बूत लकड़ी का लट्ठा उसके चेहरे से पूरे वेग से टकराया, नतीजतन नाक और मुंह ने फ़ौरन फट कर खून फौवारे की तरह फेंक दिया और बूढ़ा किसी जंगली भैसे की तरह रंभाता हुआ नीचे फर्श पर गिर पड़ा. लड़की के पास ये ही आखरी मौका था खुद को बचाने का. वो अपनी जान झोंक कर भागी.
फ़ार्म हाउस से बाहर निकलते हुए उसे समय का कोई अंदाजा नहीं था कि रात के कितने बज रहे हैं. बहुत ज़ोर का तूफ़ान आया हुआ था, तेज़ बारिश हो रही थी. चारों तरफ मिटटी कीचड़ में बदल गई थी जिसमे तेज़ी से आगे बढ़ पाना बहुत मुश्किल था. फिर भी वो अपनी पूरी ताकत लगा कर वहाँ से निकलने की कोशिश कर रही थी. उसके जिस्म से लटक रहे कपड़ों के चीथड़े तेज़ पानी की बौछार से उसके जिस्म से ही चिपक गए थे. पानी की बौछार नश्तरों की तरह उसकी आखों में घुस रहा था, बेहोशी की दवा के असर से उसके लिए आखें खुली रख पाना वैसे भी मुश्किल हो रहा था. पहाड़ी ढ़लान पर बारिश की वजह से पत्थर बेहद चिकने और फिसलन भरे हो गए थे. वो जानती थी कि उसका एक गलत कदम उसे हज़ारों फीट गहरी खाई में ले जाएगा. अपने होशोहवास बनाए रखने की भरसक चेष्ठा करते हुए वो एक-एक कदम नीचे की ओर बढ़ा रही थी. तभी तूफ़ान और बारिश के शोर के साथ पीछे दूर कहीं से शिकारी कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आई. घबराहट में उसका पैर एक पत्थर पर फिसल गया. वो अपना संतुलन बनाए ना रख पाई, कीचड़ में गिरकर लुढ़कती हुई वो नीचे गिरती चली गई.
अब उसके जिस्म पर सिर्फ कीचड़ का आवरण था. अपने खून और कीचड़ से सनी हुई वो मिटटी के दलदली ढेर में पड़ी हुई थी और ऊपर से बारिश उसके जिस्म को धुलती जा रही थी. दूर से आती शिकारी कुत्तों की आवाज़ अब करीब आ रही थी. वो आ रहा था, उसका शिकार करने के लिए वो आ रहा था…और वो अकेला नहीं था.
लड़की एक बार फिर से उठी और उसने भागना शुरू किया, आसमान में ज़ोर की बिजली कौंधी जोकि उस पहाड़ी के सबसे ऊपर बनी cottage पर गिरी. इस भीषण गर्जना के शोर में गोली चलने की आवाज़ और लडकी की चीख दब कर रह गई.
Chapter 01
वेदान्त ने रोल किए हुए जॉइंट का एक गहरा कश खींचा.
ए फ्लॉक ऑफ़ बर्ड्स
होवेरिंग एबव
जस्ट ए फ्लॉक ऑफ़ बर्ड्स
दैट्स हाउ यू थिंक ऑफ़ लव…
कोल्डप्ले के गाने की मधुर स्वर ध्वनियाँ जैसे ब्लूटूथ स्पीकर से नहीं निकल रही थीं बल्कि वेदान्त के मस्तिष्क में बज रही थी. उसने बगल की सीट पर रखी माउंटेन ड्यू की बोतल उठाई जो आधी भरी नजर आ रही थी. एक हाथ से स्टेयरिंग संभालते हुए दूसरे हाथ के अंगूठे से वेदान्त ने बोतल का ढक्कन खोला. ढक्कन लट्टू जैसे घूमते हुए सीट के नीचे कहीं गायब हो गया. अंगूठे और तर्जनी में बोतल पकड़े हुए उसे वो हल्के-हल्के हिलाने लगा. इसके बाद बोतल मुंह से लगा कर वेदान्त ने उसमें बचा हुआ वोदका और ड्यू का मिश्रण हलक के नीचे उढ़ेल लिया. दिमाग में गूंजते गाने का बेस अब बढ़ चुका था. वेदान्त ने अपने तरफ की खिड़की का कांच नीचे किया और खाली बोतल चलती गाड़ी से बाहर फेंक दी. जॉइंट और वोदका उसके दिमाग में सनसनाहट मचा रहा था, तेज़ रफ्तार भागती गाड़ी से चेहरे और बालों से टकराते हवा के थपेड़े उसे भले मालूम दे रहे थे.
हवा में बारिश की नमी थी. मिटटी की सोंधी खुशबू के साथ पिछली रात आए तेज़ तूफ़ान की वजह से गिरे पेड़ों की गीली, कुचली हुई पत्तियों और जंगली फूलों की गंध मिली हुई थी. हाइवे रोड पर इन गिरी हुई पत्तियों और जंगली फूलों की जैसी पतली सी चादर बिछी हुई थी जिसपर वहां से गुजरती हुई इक्का-दुक्का गाड़ियां सिलवटें डाल रही थीं. उस समय सुबह के लगभग 5 बज रहे थे और फिलहाल बारिश के बाद खुले हुए बरसाती सुबह की खिली धूप निकली रही थी. साफ़ नीले आसमान में कहीं-कहीं बादलों की छोटी-मोटी टुकड़ी तेज़ गति से यूं तैर रही थी जैसे किसी ने तेज़ हवा में रुई के फाहे उड़ाए हों. सड़क के किनारे के पेड़ों पर किसी ने फ्लायर्स चिपकाए हुए थे जोकि निकल कर हवा में उड़ रहे थे.
ए फ्लॉक ऑफ़ बर्ड्स
होवेरिंग एबव
इनटू स्मोक आई एम टर्न्ड
एंड राइज़ फॉलोइंग देम अप…
एक उड़ता हुआ फ्लायर वेदान्त के विंडस्क्रीन वाइपर में आ फंसा और यूं फडफडाने लगा जैसे किसी उड़ते हुए पक्षी की टांग बहेलिये के जाल में आ फंसी हो. वेदान्त ने एक हाथ बाहर निकाला और फंसे हुए फ्लायर को आज़ाद कर दिया. वेदान्त ने चेहरा आसमान की ओर उठाया. बारिश से धुले नीले आसमान में एक सफ़ेद बादल से छन कर उसके चेहरे पर पड़ती, ताज़े निकलते सूरज की रश्मियाँ आखों को चुंधियाने लगीं. धुंधली आखों से उसे आसमान में प्रवासी पक्षियों का झुण्ड गुजरता दिखाई दिया. वेदान्त को यूं लगा जैसे वो भी उस झुण्ड के साथ खुले आसमान में परवाज़ कर रहा है. गाड़ी पर जैसे उसका कोई नियंत्रण ना रह गया हो, धीरे-धीरे अब कोई गाड़ी ही नहीं बची थी. सिर्फ उसके मस्तिष्क में गूंजता संगीत और पक्षियों के साथ खुले आसमान में उड़ता वो. उस उड़ान में वेदान्त अपना सर्वस्व भूल जाना चाहता था. अपनी गुजरी जिंदगी, बीता हुआ कल सबकुछ वो पीछे छोड़ आया था. उन प्रवासी पक्षियों की तरह वो भी अपने अतीत के घरौंदे को छोड़ कर उस धुली सुबह के नीले आकाश जैसे आने वाले कल के अनंत आसमान में उड़ना चाहता था. उसका शरीर जैसे महसूस ही नहीं हो रहा था, वो खुद को इतना हल्का महसूस कर रहा था जैसे वो शरीर नहीं सिर्फ आत्मा हो. हल्का और स्वतंत्र होने का वो भाव वेदान्त को बेहद सुखद प्रतीत हो रहा था.
स्टिल आई ऑलवेज
लुक अप टू द स्काई
प्रे बिफोर द डौन
‘कॉज़ दे फ्लाई अवे
वन मिनट दे अराइव
नेक्स्ट यू नो दे आर गॉन
दे फ्लाई ऑन
फ्लाई ऑन…
गाने के बोल, दिमाग पर हावी वीड और वोदका का नशा और आसमान में उड़ते पक्षियों का झुण्ड वेदान्त को जैसे यथार्थ से परे कल्पना के खुले आसमान में ले जा चुके थे. जिस एस.यू.वी. को वो चला रहा था उसके अस्तित्व से अब वो पूरी तरह बेखबर हो चुका था. उसके लिए तो वो खुले आसमान में स्वच्छन्द उड़ता एक पक्षी था. रास्ता आगे जा कर संकरा हो रहा था. रोड के दोनों ओर ऊँचे देवदार, सागवान और शीशम का जंगल था. सड़क के किनारे, जैसे रास्ते के ही साथ चलती हुई जंगली फूलों की झाड़ियाँ थीं जिनपर सफ़ेद, हल्के नीले, बैंगनी, पीले और लाल फूलों के गुच्छे थे. दोनों ओर से पेड़ों की झुकी हुई शाखाएं आपस में गुंथ कर एक प्राकृतिक आवरण तैयार कर रही थीं जिनसे छन कर सड़क पर पड़ती सुबह की धूप मनोरम और अलौकिक प्रतीत होती थी. पक्षियों की चिचियाहट से जैसे वो पूरा रास्ता गुंजायमान था. उस शोर में एक और शोर सम्मिलित हुआ. एक तेज़-तीख़ी चीख, जिसने वेदान्त को जैसे स्वप्न से यथार्थ में घसीट लिया. यह चीख किसी पशु या पक्षी की नहीं इंसान की थी. पतली, महीन आवाज़…किसी बच्चे जैसी? नहीं…किसी किशोरावस्था लड़की की जैसी. क्या उसे मतिभ्रम हो रहा था?
आसमान और प्रवासी पक्षियों से निकल कर वेदान्त का दिमाग अपने सामने रास्ते और उसपर किसी अनियंत्रित अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के समान भागती एस.यू.वी. पर केन्द्रित हुआ. उस एक पल में तीन घटनाएं एक साथ घटित हुईं. पहली, वेदान्त को सामने से एक तेज़ रफ़्तार मालवाहक ट्रक आता दिखाई दिया जोकि एस.यू.वी. से मुश्किल से 500 मीटर के फासले पर था, दूसरी, वेदान्त ने वापस स्टेयरिंग संभाला और उसे पूरी तरह बाएं मरोड़ दिया, टायरों की बेहद कर्कश ध्वनि और इंजन की हुंकार के साथ एस.यू.वी. किसी अंकुश विहीन गज की तरह लहराते हुए बायीं ओर भागी, तीसरी, उस पल के आखरी हिस्से में बायीं ओर सड़क के किनारे जंगली फूलों की झाड़ियों और ऊँचे देवदार के पेड़ों के बीच उसे एक लड़की खड़ी दिखाई दी. उम्र मुश्किल से चौदह साल होगी. उसने स्कर्ट पहनी थी जो कभी सफ़ेद रही होगी लेकिन अब धूल-मिटटी में सनी हुई थी और मटमैली हो चुकी थी. उसकी स्कर्ट जगह-जगह से फटी हुई थी. खत्म होते पल में वेदान्त का ध्यान देवदार की ओट से झांकती उस लड़की की जाँघों पर गया. खून की लकीर उसके स्कर्ट के नीचे से बहती हुई पैरों की ओर जा रही थी. खून की धार सूख कर जम चुकी थी. एस.यू.वी. जंगली फूलों की झाड़ियों को रौंदते हुए एक पेड़ से जा टकराई. वेदान्त अपनी पूरी शक्ति लगा कर ब्रेक दबा चुका था जिस कारण पेड़ से टकराव होने तक एस.यू.वी. की गति न्यूनतम हो गई थी, नतीजतन गाड़ी को बहुत अधिक क्षति नहीं हुई सिर्फ बाएं ओर की अगली हेडलाइट चकनाचूर हो गई और कुछ डेंट पड़ गए. हालांकि इस टकराव का असर काफी तगड़ा था, यदि वेदान्त ने सीटबेल्ट नहीं लगाई होती तो वो गंभीर रूप से घायल हो सकता था.
एक मिनट तक वो अपना सर पीछे हेडरेस्ट से टिकाए हुए अपनी उखड़ी हुई साँसों को काबू करने की कोशिश करता रहा. उसका दिल किसी हथौड़े की तरह पसलियों पर बेतहाशा चोट कर रहा था. टक्कर के आघात से उसकी गर्दन में हल्की मोच आई थी और उसका सर बुरी तरह दर्द कर रहा था. आखें खोलते ही सामने सारा दृश्य सरियलिस्ट पेंटर सेल्वाडोर डाली की कलाकृति के सामान बहता और पिघलता नज़र आ रहा था. कांपते हाथों से उसने सीटबेल्ट निकाली और अपने तरफ का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला. ट्रक वाला बिना उस एक्सीडेंट की परवाह किए हुए तेज़ रफ़्तार में वहाँ से निकल चुका था. दूर-दूर तक वातावरण में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था जिसे सिर्फ चिड़ियों की चिचियाहट का शोर भंग कर रहा था. वेदान्त लडखडाते हुए एस.यू.वी. से नीचे उतरा.
- ‘कौन है वहाँ पर’?
वेदान्त का सर बुरी तरह चकरा रहा था, उसे यूं लग रहा था जैसे वो हवा पर चल रहा है. वो उस पेड़ के पास पहुंचा जहां उसने उस लड़की को खड़ा देखा था.
- ‘हैलो!!!!…क्या तुम्हे कोई मदद चाहिए’.
वेदान्त खुद को संभालने का भरसक प्रयास करते हुए चिल्लाया. उसका दम फूल रहा था. उसे अपने फेफड़ों पर दबाव महसूस हो रहा था. कुछ क्षण पहले वेदान्त ने जिस लड़की को वहां देखा था ऐसा लग रहा था कि वो हवा में ओझल हो गई हो.
वेदान्त पेड़ के पास ठीक उसी जगह खड़ा था जहां उसने उस लड़की को खड़ा देखा था. वहां कोई भी नहीं था. उसका सर अब भी बुरी तरह चकरा रहा था. पैर काँप रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे उसके पैर उसके शरीर का बोझ उठा पाने में असमर्थ हों और किसी भी पल जवाब दे जाएंगे. वेदान्त उसी पेड़ के नीचे बैठ गया. कांपते हाथों से उसने अपने लेदर जैकेट की जेब से अपना सिगरेट केस निकाला. डबल साइडेड सिगरेट केस में एक तरफ रोल किए हुए जॉइंट्स कतार से लगे हुए थे और दूसरी तरफ कैमल ब्रांड की सिगरेट्स. वेदान्त ने एक सिगरेट निकाला और होठों से लगा लिया. सिगरेट केस के दाहिने कोने में ही इन-बिल्ट लाइटर था. उसने सिगरेट सुलगाकर एक गहरा कश खींचा.
- ‘क्या मैंने सच में उस बच्ची को यहाँ खड़े देखा था’?
अपनी नाक से धुंए की दोनाली छोड़ते हुए वेदान्त खुद में ही बडबडाया.
- ‘या फिर ये वीड-वोदका मिश्रण का असर था? शायद यही बात है. वर्ना वो बच्ची सुबह-सुबह इस हालत में यहाँ जंगल में क्या कर रही थी?…और फिर वो मुझे देखकर ऐसे गायब क्यों हो जाती’?
पहली सिगरेट फ़िल्टर तक जल चुकी थी, उसने केस से दूसरी सिगरेट निकाल कर सुलगा ली और धुंए की दोनाली छोड़ता सोचता रहा.
- ‘नशे से मतिभ्रम हो रहे हैं मुझे. पर ऐसे भयंकर वाले तो पहले कभी नहीं हुए. कुछ ज्यादा तगड़ा माल फूंक लिया क्या इस बार’?
पेड़ के नीचे बैठे-बैठे उसने एक के बाद एक तीन सिगरेट ख़ाक किए. उसका घूमता हुआ दिमाग अब उसके काबू में आ रहा था. एस.यू.वी. के पास आकर उसने डेंट का निरिक्षण किया.
- ‘मेरी जान इस डेंट से ज्यादा सस्ती है, खुद पर काबू रखकर ड्राइव करना होगा अबसे’.
वो गाडी में सवार हुआ और चाभी इग्निशन में लगा कर घुमाई. दो-तीन बार मिसफायर करने के बाद इंजन स्टार्ट हो गया.
- ‘शुक्र है ऊपर वाले का’!!
वेदान्त ने गाडी आगे बढ़ा दी, इस बार वो पहले से अधिक सजग था. जी.पी.एस. नेविगेटर पर उसने महागुना हिल्स का रूट मैप देखा. अब भी लगभग 20 किलोमीटर का रास्ता शेष था जिसमे 10 किलोमीटर पहाड़ी चढ़ाई थी. हालांकि महागुना हिल्स के आस-पास का तराई क्षेत्र आरम्भ हो चुका था, छोटी पहाड़ियां जो घनी हरियाली और उनके बीच-बीच में बने सुन्दर रंग-बिरंगे खिलौनों जैसे दिखने वाले घरों के समूह से सजी हुई थीं और उनके पीछे विशाल महागुना पर्वत. हरियाली से लदा हुआ, अपने आप में वो पर्वत समूह अद्भुत भी दिखाई दे रहा था और डरावना भी. तराई क्षेत्र में महागुना हिल्स के नीचे अब एक छोटा सा क़स्बा था, जहां कभी घने जंगल हुआ करते थे. यहाँ अब चाय और कॉफ़ी के बागान थे, इसके अलावा काली मिर्ची और अन्य मसालों के बागान दिखाई दे रहे थे. कसबे के घर खूबसूरत रंग-बिरंगे हट हाउसेस थे, जैसे बच्चे अपनी नेचरस्केप ड्राइंग में बनाते है वैसे ही, जिनकी छत अब भी खपरैल की बनी हुई थी. इन खुबसूरत खिलौने जैसे दिखने वाले घरौंदों की बाहरी दीवारों पर बेहद खूबसूरत भित्तिचित्र बने हुए थे. ज़्यादातर घर पुराने थे और काफी हद तक उनकी बनावट में पुर्तगाली आर्किटेक्चर का प्रभाव झलकता था, जैसे कोंकण और गोवा में अधिकतर देखने को मिलते हैं. आस-पास में कई छोटे-बड़े चर्च भी दिखाई दे रहे थे. छोटी पहाड़ियों के समूहों पर और कस्बे में कुछ मंदिर थे जिनका आर्किटेक्चर दक्षिण भारतीय मंदिरों से काफी मिलता-जुलता था. इस क्षेत्र में ताड़ और नारियल के पेड़ों की संख्या बहुताधिक थी. इन पेड़ों पर कतार से चादरों को बाँध कर झूले बनाए हुए थे जिनपर माएं अपने छोटे बच्चों को सुला रही थीं. अपने बच्चों को इन झूलों पर लिटा कर ये औरतें सड़क के किनारे बड़े मैदानी छेत्र में कपड़े बिछा कर उनपर मसाले सुखा रही थीं. थोड़े बड़े बच्चों का समूह पास ही खेलता नज़र आ रहा था जबकि पुरुष खेतों और बागानों में काम कर रहे थे. वेदान्त ने अपनी गाडी कुछ देर वहीं रोक दी और एक नारियल के पेड़ के नीचे अपनी स्केचबुक लेकर चारकोल पेंसिल से उन सभी मनोरम दृश्यों को कार्ट्रिज शीट्स पर उकेरता रहा. उसे स्केच करता हुआ देख खेल रहा बच्चों का समूह कौतुहल वश पास आ गया. वेदान्त उन्हें देखकर मुस्कुराया. बड़ों के मुकाबले बच्चे अधिक सहज और मिलनसार होते हैं, वेदान्त के लिए किसी व्यस्क इंसान से बात करने के बजाए बच्चों के समूह से खुद को जोड़ पाना अधिक सरल था. इसकी एक वजह उसका कष्टप्रद और एकाकी बचपन भी था. जीवन की विषमताओं ने उसके अंदर के बच्चे को एक दमित कलाकार के रूप में उभार तो दिया था परन्तु उसका वो बचपन अब भी उसकी अंतरात्मा में कहीं कैद था जो सांस लेने और बाहर आने को कसमसाता रहता था.
- ‘तुम तो बहुत अच्छी ड्राइंग बनाते हो बाबू. बिलकुल सच्ची लगती है’.
एक लगभग 5 साल की बच्ची ने वेदान्त की स्केच बुक में झांकते हुए कहा. सेब जैसे लाल भरे गालों वाली उस बच्ची की बड़ी आखें वेदान्त का बनाया स्केच देखकर और बड़ी व गोल हो गईं. बाकी बच्चों ने भी वेदान्त को घेर लिया और अचरज से उसके बनाए रेखाचित्र देखने लगे.
- ‘बिलकुल फोटो जैसा बनाया है’.
- ‘तुम आर्टिस्ट हो’?
- ‘अरे आर्टिस्ट ही होगा, देखते नहीं इसके बाल और दाढ़ी-मूंछ कितनी लम्बी है. सब आर्टिस्ट लोग ऐसे ही होते हैं.’
- ‘हमारा भी बना दोगे’?
बच्चों को जैसे वेदान्त कोई जादूगर नज़र आ रहा था. हर किसी को उसकी बिलकुल सजीव लगने वाले स्केच बनाने की मैजिक ट्रिक देखनी थी.
- ‘अच्छा ठीक है, लेकिन तुमसब एक-साथ शान्ति से बैठो. बिना हिले-डुले, वर्ना स्केच खराब हो जाएगा’.
बच्चे फ़ौरन झुण्ड बनाकर वेदान्त के सामने बैठ गए. बचपन स्वभाव से ही चंचल होता है, उसपर से अपना स्केच जल्द से जल्द देख लेने की आतुरता. उन बच्चों के लिए 5 मिनट भी एक अवस्था में बिना हिले-डुले बैठना किसी सज़ा से कम नहीं था. वेदान्त से उनकी ये बेसब्री और कौतुहल छुपा नहीं था. स्केच तो उसने मात्र 3 मिनट में ही पूरा कर लिया था फिर भी उन बच्चों की बालसुलभ अधीरता का रसास्वादन करने के लिए जानबूझ कर अधिक समय लगा रहा था. मसाले सुखाती कुछ औरतें भी अब अपना काम रोककर बच्चों के इस शगल को देख रही थीं.
- ‘दिखाओ ना! कितना टाइम लगाओगे’!! छोटी बच्ची से अब और सब्र ना रखा गया.
वेदान्त ने मुस्कुराते हुए स्केच बुक उनकी ओर घुमा दी.
- ‘अरे बाप रे!! ये तो बिलकुल सच्ची जैसा बनाया है’.
बच्चों ने उसके हाथ से स्केच बुक छीन ली.
- ‘अररे! चारकोल पेंसिल से बना है, आराम से…हाथ लगाओगे वरना खराब हो जाएगा’.
बच्चों ने अपनी तरफ से पूरी एहतियात बरतते हुए स्केचबुक के पन्ने पलटे. वेदान्त ने उनके हाथ से स्केचबुक वापस खींच ली.
- ‘ये तुम बच्चों के देखने के लिए नहीं है’.
उसने स्केचबुक से उन बच्चों के स्केच वाला पेज फाड़ कर निकाला और उनकी तरह बढ़ा दिया. बच्चों की ख़ुशी का ठिकाना ना रहा.
- ‘क्या मैं तुम सबके साथ सेल्फी ले सकता हूँ’?
- ‘हाँ-हाँ!! सेल्फी येsss’!!
बच्चों के लिए एक दिन में मिलने वाले सुखद आश्चर्य के लिहाज़ से भी ये ज्यादा था. सभी ने अलग-अलग स्टाइल और पोज़ में ढेरों फोटोग्राफ्स क्लिक करवाईं. इसके अलावा वेदान्त ने नारियल के पेड़ों पर बंधे झूले में सोते बच्चों, मसाले सुखाती औरतों, बागान में काम करते लोगों और आस-पास की जगहों की भी काफी तस्वीरें खींची. ये वेदान्त का ख़ास शौक था, उसे सब्जेक्ट के हिसाब से जो भी जगह या कम्पोजीशन दिलचस्प लगता था वो उसकी फोटो खींच लेता था ताकि बाद में उसे आयल, या वाटर कलर माध्यम से पेंटिंग के रूप में अपने कैनवास पर उतार सके. उस जगह की पर्याप्त फोटोग्राफ्स कर के वेदान्त वापस अपनी गाड़ी में सवार हुआ. बच्चों का समूह बहुत दूर तक उसकी गाड़ी के पीछे हाथ हिलाता, उसे बाय करता हुआ दौड़ता रहा फिर धीरे-धीरे आखों से ओझल हो गया.
कुछ पल के लिए ही सही, वेदान्त को जैसे सुकून का एहसास हुआ था. तभी उसका मोबाइल बजा, कॉल उसके मैनेजर और मित्र दिलीप का था. वेदान्त ने हैण्ड फ्री मोड पर कॉल पर डाला.
- ‘अरे वाह! कॉल एक बार में पिक हो गया! मतलब जिंदा हो…और होश में भी हो’!
- ‘बदकिस्मती से हाँ! जबकि दोनों में से कुछ भी होने की ना मेरी इच्छा है और ना ही मेरे पास वजह’.
- ‘तो साले मरने का कोई आसान तरीका निकाल लेता! यूं खुद को बेमौत मारने की और साथ में मुझे भी ले डूबने की नायाब तरकीब क्यों लगा रहा है’.
- ‘तेरा रंडी रोना हो गया हो तो भौंकेगा क्या हुआ’!!
- ‘हुआ यही कि तू बर्बाद हो गया है और मुझे भी बर्बाद करने पर तुला हुआ है. तेरे पिछले दोनो सोलो आर्ट शो बुरी तरह फ्लॉप हुए हैं, एक भी पेंटिंग नहीं बिकी तेरी. अपने डाइवोर्स सेटलमेंट में तूने अपना सबकुछ संमृद्धि के नाम कर दिया. प्रॉपर्टी, बैंक बैलेंस सबकुछ उसे दे दिया दानवीर कर्ण बन के और जो थोड़े बहुत पैसे बचे थे उनसे उस गुमनाम काली पहाड़ी पर सुनसान कॉटेज खरीद ली जहां गर्त होने जा रहा है….और सिर्फ इतना ही नहीं मेरे भाई…मेरी अंतरात्मा को तेरे हरामीपन पर पूरा एतबार है कि उस भूत बंगले को खरीदने के बाद भी तेरे पास जो चिल्लर पैसे बचे होंगे उनसे तूने बूज़ और वीड का लाइफटाइम कोटा जुगाड़ लिया होगा’.
- ‘कितनी अच्छी तरह जानता है ना तू मुझे’.
वेदान्त ड्राइव करते हुए मुस्कुराया. उसकी नज़रें रियर व्यू मिरर से एस.यू.वी. की बैकसीट पर पड़ी जहां उसने जैक डेनियल्स, ओल्ड मोंक, बकार्डी, शेवास रीगल के क्रेट लोड किए हुए थे. गोवा से निकलते हुए उसने लिकर और वीड का पूरा बंदोबस्त किया था हालांकि गोवा की ही तर्ज पर यहाँ भी उसे हर आधे किलोमीटर पर बार और लिकर शॉप्स दिखाई दे रही थीं. इनती कम आबादी होने के बावजूद इतनी ज्यादा दारु की दुकाने वहाँ अधिक मात्रा में आने वाले विदेशी सैलानियों के कारण थी.
- ‘चलो अच्छा है, यहाँ भी सप्लाई की टेंशन नहीं है’.
वेदान्त खुद में बडबडाया.
- ‘क्या बका’?
- ‘कुछ नहीं, तू बोल क्या बोल रहा था’.
- ‘यही बोल रहा था मेरे बाप की ऐसे कैसे चलेगा! उस काली पहाड़ी पर साधू बन कर ओल्ड मोंक टिकाने से तेरे गम नहीं धुल जाने वाले. तू क्या कर रहा है भाई. कल को एक-एक पाई का मोहताज हो जाएगा फिर क्या करेगा’?
- ‘मैं नहीं जानता दिलीप. मुझे बस अपनी पुरानी ज़िन्दगी से निकलना था, रिश्ते जब बेजान हो जाएं तो उन्हें दफना कर आगे बढ़ने में ही समझदारी होती है. मैं कोई भी गिल्ट, कैसा भी अपराधबोध लेकर जीवन में आगे नहीं बढ़ना चाहता इसलिए मैंने अपना सबकुछ संमृद्धि को दे दिया. अब मैं उस रिश्ते से भी मुक्त हूँ और उस दायित्व से भी. नाउ आई नीड दिस ब्रेक, रादर..आई डिजर्व दिस ब्रेक. मेरी गुजरी जिंदगी और असफलताओं ने मुझे बहुत थका दिया है यार. आई नीड टू प्रूव माइसेल्फ अगेन. किसी और को नहीं दिलीप, मुझे खुद अपने आप को ये साबित करना है कि एक कलाकार के तौर पर और एक इंसान के तौर पर मैं कोई मायने रखता हूँ. दोनों ही मुद्दों में मैं उतना खोखला नहीं जितना दुनिया और शायद मैं खुद भी अपने आप को समझने लगा हूँ. परन्तु यह आसान नहीं है मेरे दोस्त. व्यक्ति और कलाकार दोनों के तौर पर मैं अपने जीवन का उद्देश्य खो चुका हूँ. मुझे वो उद्देश्य तलाशना है’.
- ‘और वो उद्देश्य तुझे उस काली पहाड़ी के ऊपर मिलेगा? क्यों’?
दिलीप व्यंगात्मक लहजे में बोला.
- ‘साले हरामखोर, क्या तबसे काली पहाड़ी-काली पहाड़ी लगाए हुए है, वो काली पहाड़ी नहीं महागुना हिल्स है. भारत के सबसे एक्सोटिक लोकेशन्स में से एक है महागुना हिल्स. ये गोवा या ऊटी जितना मशहूर नहीं है और यकीन मानो यह अच्छा ही है. यहाँ बेवजह लोगों की भीड़ नहीं होती. यहाँ की आबादी भी काफी कम है और लोगों की आमदनी का प्रमुख स्रोत खेती और विदेशों से यहाँ आने वाले सैलानी हैं.’
- ‘अबे…ओ..ओ..ओ…मैंने तुझसे महागुना हिल्स पर निबन्ध सुनाने को नहीं कहा था. मुझे अच्छी तरह याद है कि कुछ एक महीने पहले तूने किसी आर्ट ऑक्शन में महागुना हिल्स के ढेरों पोस्टकार्ड्स और पिक्चर प्रिंट्स मिल गए थे और तभी से तू वहां जाने को पागल हुआ बैठा था’.
- ‘भाई तू तो अन्तर्यामी है, तुझे सब पता है, फिर मुझसे क्या चाहता है’?
- ‘मैं सिर्फ ये जानना चाहता हूँ कि तूने आगे क्या सोचा है’?
- ‘ह्म्म्म…थोड़ी देर पहले वोदका और जॉइंट लगाया था अब कॉटेज पहुँच कर रम लगाऊंगा’.
- ‘अबे हरामखोर!! ज़िन्दगी!!….मैं ज़िन्दगी के बारे में बात कर रहा हूँ….ज़िन्दगी में आगे क्या करने का सोच रहा है’.
- ‘कहा न मुझे उद्देश्य की तलाश है दिलीप. एक कलाकार के लिए उसका सब्जेक्ट ही उसका उद्देश्य होता है जो उसे जीने और सृजन करने के लिए प्रतिपल प्रेरित करता है. फिलहाल ना मेरे पास कोई सब्जेक्ट है और ना ही कोई उद्देश्य. जबतक प्रेरणास्रोत नहीं होगा मैं सृजन नहीं कर सकता और मेरी मौजूदा ज़िन्दगी में ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जो मुझे सृजन करने के लिए प्रेरित करे. मेरे लिए ज़िन्दगी जीने की वजह कला है…और अपनी कला जो पुनर्जीवन देने की वजह अब मैं तलाश रहा हूँ. अपनी गुजरी ज़िन्दगी और उसकी नाकामियों से दूर इस एकांत में शायद मुझे वो वजह मिल जाए, मेरा यह लालच ही मुझे यहाँ खींच लाया है’.
डाउनटाउन का हिस्सा अब बीत चुका था, तराई के जंगल अब घने हो रहे थे और सामने विशाल महागुना हिल्स की घुमावदार चढ़ाई शुरू हो रही थी. सड़क के दोनों तरफ जंगली सफ़ेद फूलों की झाड़ियाँ, नारियल और ताड़ के ऊँचे पेड़ और जहाँ तक नज़र जाए वहां तक फैली हरियाली नज़र आ रही थी. चढ़ाई के ठीक मोड़ पर जंगल के किनारे एक बड़ा सा ग्रीन पैच था. यह घास का हर मैदान विशाल महागुना हिल्स के ठीक नीचे उसकी ओट में था. वेदान्त की नज़र उसपर पड़ी और उसने गाड़ी रोक दी.
- ‘चल दिलीप, तुझे पहुँच कर कॉल करता हूँ मैं’.
विदांत ने कहा और बिना दिलीप के उत्तर की प्रतीक्षा किए कॉल डिसकनेक्ट कर दिया. उसका ध्यान अब उस नारियल के पेड़ों से घिरे हुए उस हरे मैदान पर था. मैदान का जो कोना महागुना हिल्स से जुड़ता था वहाँ पत्थरों के पीछे एक साफ़ पानी की छोटी सी झील थी. ये झील महागुना पहाड़ी के नीचे से निकल रही थी और इसका पानी इतना साफ़ और पारदर्शी था कि पानी के नीचे की सतह दिखाई दे रही थी. इस झील के आस-पास लाल मोटी बालू फैली हुई थी और झील की सतह में भी पत्थर और ये लाल मोटी बालू नज़र आ रही थी. जिस चीज़ ने वेदान्त का ध्यान सबसे ज्यादा आकर्षित किया था वो झील के किनारे पत्थरों के समूह पर बैठी एक आकृति थी.
झील के किनारे पत्थर के ऊपर एक लड़की बैठी हुई थी. अपने घुटने मोड़ कर वो आगे को झुकर बैठी थी और अपनी हाथ की कोहनी पैर से टिकाए हुए थी और हथेली से अपनी गर्दन को सहारा दिए झील के पानी में एकटक अपनी परछाई देख रही थी.उसके बाल खुले हुए और बेहद लम्बे थे, उसकी पीठ से लहराते हुए नीचे पत्थर पर ठहरे हुए थे. उस लड़की ने गहरे नीले रंग का एक लॉन्ग गाउन पहना हुआ था, उसकी उम्र मुश्किल से 20 या बड़ी हद 21 होगी. उस पूरे दृश्य को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो सजीव न होकर किसी कलाकार की कल्पना की उपज हो. हाँ…एक पल को वेदान्त को लगा जैसे ये उसकी खुद की कल्पना की उपज है. उसने आँखें फाड़-फाड़ कर उस खूबसूरत लड़की की ओर देखा, वो उसकी उपस्थिति से बिलकुल अनजान, कतई बेखबर अपनी ही परछाई में डूबी हुई थी. इस खूबसूरत पल को वेदान्त यूं गुज़र जाने नहीं दे सकता था. उसके मन-मस्तिष्क, उसके स्मृति पटल पर तो वो दृश्य कैद हो ही गया था उसने अपने डीएसएलआर कैमरे में भी उसके अनगिनत स्नैप लिए ताकि बाद में इत्मीनान से एक-एक बारीकी के साथ उसे अपने कैनवास पर उकेर सके.
वेदान्त के अन्दर अब एक अंतर्द्वंद्व जन्म ले चुका था, उसका दिमाग उसे वापस गाड़ी में बैठकर आगे बढ़ जाने को कह रहा था जबकि दिल उस झील की ओर बढ़ जाने को. वेदान्त ने दिमाग की सुनना ही बेहतर समझा और वापस एसयूवी की ओर बढ़ गया. अंदर बैठने से पहले एक आखरी नज़र उसने झील की ओर देखा. वो लड़की उसकी ओर देख रही थी. वेदांत से नज़रें मिलते ही वो हल्के से मुस्कुराई और अपना हाथ हिलाया. वेदान्त का हाथ जैसे स्वतः ही उठ गया. लड़की अपनी जगह से उठी और वेदान्त की ओर बढ़ने लगी. वेदान्त का दिल जाने क्यों ज़ोरों से धड़क रहा था.
- ‘गोइंग अप’?
लड़की ने पहाड़ी रास्ते की ओर इशारा करते हुए पूछा. उसकी आखें वेदान्त की आखों में झाँक रही थीं, उसकी आखों में एक चमक, एक चंचलता थी लेकिन इसके बावजूद भी उसकी आखें उदास थीं और उन आखों की उदासी के बिलकुल विपरीत उसके चेहरे पर बिलकुल बच्चों जैसी मुस्कान थी. उसके चेहरे के ये दो मुक्तलिफ़ भाव उसे उसकी उम्र की किसी भी दूसरी लड़की से बिलकुल अलग बना रहे थे. इतनी चंचल आखें भला इतनी उदास कैसे हो सकती हैं? और इस उदासी पर भला बच्चों जैसी निश्छल मुस्कान कैसे आ सकती है.
- ‘एक्सक्यूज़ मी! आई एम टॉकिंग टू यू सर’.
लड़की ने वेदान्त के चेहरे के सामने हाथ हिलाते हुए अपना सवाल दोहराया.
- ‘आई…आई एम सो सॉरी. यू वर सेइंग..’?
वेदान्त ने हडबडा कर कहा, जैसे सोते से जगा हो.
- ‘कैन यू गिव मी लिफ्ट, इफ यू आर गोइंग अप हिल’.
- ‘श्योर. हॉप इन’.
वेदान्त ने थोड़ा संकुचित भाव से कहा.
- ‘डोंट वरी, आई वोंट रॉब यू ऑन द वे’.
वेदान्त को सशंकित और सकुचाते देख कर लडकी ने कहा. उसकी उदास आखों में अभी शरारत की चमक थी. कितनी अलग थीं वो कत्थई आखें. उसकी शरारती मुस्कान जैसे वेदान्त के मन की बात पढ़कर ही खिली थी.
- ‘वैसे कायदे से देखा जाए तो डरने की ज़रूरत मुझे नहीं तुम्हे है. इस तरह राह चलते किसी अनजान राहगीर से लिफ्ट लेना तुम्हें मुश्किल में डाल सकता है’.
- ‘ओह्ह…प्लीज़!! स्टॉप पैट्रनाइज़िन्ग. आई कैन टेक केयर ऑफ़ माइसेल्फ…बिसाइड दैट, यू डोंट लुक डेंजरस’
वेदान्त उस अल्ल्हड़ लड़की को एकटक देख रहा था. लड़की भी बिना अपनी नज़रें वेदान्र्ट से हटाए पैसेंजर सीट पर सवार हो गई. वेदांत ने गाड़ी स्टार्ट कर के घुमावदार पहाड़ी चढ़ाई पर बढ़ा दी. पहाड़ को स्पाइरल वे के काट कर बनाई गई सड़क बेहद संकरी थी जिसपर एक बार में सिर्फ दो ही चार पहिया वाहन गुज़र सकते थे. सड़क के एक तरफ पहाड़ और दूसरी तरफ खुली खाई थी जो ऊपर चढ़ते जाने के साथ ही गहरी होती जा रही थी. यहाँ कोई भी साइड रेलिंग्स नहीं लगी हुई थीं और जरा सी चूक का मतलब था सीधे उस खाई की गहराई नापना.
- ‘बाबा रे! क्या रस्ता है ये’!
वेदान्त काफी संभाल के गाड़ी आगे बढ़ा रहा था.
- ‘बिलकुल ज़िन्दगी की तरह. है न? एकदम अनप्रेडिक्टेबल. पता ही नहीं कि आगे क्या आने वाला है. वैसे तुमने अपनी ज़िन्दगी में पहले कभी कुछ अनप्रेडिक्टेबल नहीं किया क्या’?
लड़की ने जैसे ये बात ख़ास वेदान्त को चिढ़ाने के लिए कही थी.
- ‘करियर और पर्सनल लाइफ से खिलवाड़ करने के अलावा नहीं…और हाँ…अभी पीछे कुछ ही देर पहले मैं एक ट्रक से एक्सीडेंट करते-करते बचा हूँ…मेरे हिसाब से मेरी ज़िन्दगी कुछ ज्यादा ही अनप्रेडिक्टेबल है’!! वेदान्त ने बिना ऑफेंड हुए, अपनी नज़रें सामने सड़क पर ही रखते हुए कहा.
- ‘हाहाहा…यू आर ओल्डी…पर तुम बोरिंग नहीं हो…बल्कि तुम काफी दिलचस्प हो’.
- ‘मुझे जानने वाले मेरे बारे में ऐसा बिलकुल नहीं सोचते, बट आई विल टेक इट एज़ ए कॉम्प्लीमेंट’.
- ‘किसी को जानना और समझना दो अलग-अलग बातें होती हैं ओल्डी. हो सकता है तुम्हे जानने वाले आजतक तुम्हे समझ ही ना पाए हों’.
वेदान्त ने आखों के कोनों से लड़की की ओर देखा, वो उसे ही देखकर मुस्कुरा रही थी. वेदान्त भी हल्के से मुस्कुरा दिया. लड़की ने पैसेंजर सीट के बैकरेस्ट और दरवाज़े से अपनी पीठ और सर टिका लिए. वैसे ही टिक कर अधलेटी सी बैठी वो खिड़की से बाहर देखने लगी. उसके खुले बाल माथे और चेहरे पर हवा के साथ आ-जा रहे थे जिन्हें हटाने की उसने कोई कोशिश नहीं की. अपने पैर उसने ग्लोव कम्पार्टमेंट के ऊपर इत्मीनान से टिका दिए. वाकई कितनी बेफिक्र, बेपरवाह और अल्लहड़ थी वो. जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं कि सामने वाला उसके बारे में क्या धारणा बना रहा.
हवा के हल्के थपेड़ों से मुस्कुरा कर बातें करती वो लड़की वेदान्त की उपस्थिति से यूं सहज हो गई थी जैसे उसे बहुत अरसे से जानती हो. अपनी चोर निगाहों को उस अल्लहड़ लड़की पर फिसलने से वेदान्त रोक नहीं पा रहा था. कितनी खूबसूरत थी वो. उसकी नाक पर बाईं तरफ एक तिल था. यह तिल जैसे उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा था.
आखों में अगर स्मृतियों के साथ समय को समा लेने की क्षमता होती तो वेदान्त की आखें समय को अपने बगल की पैसेंजर सीट पर थाम लेती. उसकी नज़रें लड़की के चेहरे पर फडफडाते बालों से होकर उसकी सुराहीदार गर्दन से फिसलते हुए जैसे उसके ब्लू मैक्सी ड्रेस के हर एक बेल-बूटे से गुज़र रही थी. वेदान्त ने ध्यान दिया कि उसने मैक्सी ड्रेस के नीचे सफ़ेद स्नीकर्स पहने हुए थे.
बेबाक, स्वतंत्र और अल्लहड़ बिलकुल उसकी कल्पना की तरह. वेदान्त का जी चाहा कि अपनी स्केच बुक उठा कर उसकी अल्ल्हड़ता अपनी पेंसिल से खिंची लकीरों से बाँध ले लेकिन यह होना मुमकिन नहीं था. पेंसिल की लकीरों में ना सही लेकिन अपनी नज़रों में उस बेबाक अल्ल्हड़ता को बेशक बाँध सकता था वो. लड़की के सर से पैर तक फिसलती वेदान्त की चोर निगाहों ने जैसे उस लड़की, उसके बैठने के अंदाज़, उसके बच्चों जैसे स्वच्छंद हाव-भाव को वेदान्त के मस्तिष्कपटल के पन्नों पर रेखांकित कर लिया. पहाड़ी सड़क के मोड़ बहुत ही तीखे थे, लडकी के ब्लू मैक्सी ड्रेस में उलझी वेदान्त की नज़रें अगर वापस सड़क पर नहीं आती बाद में उसकी खूबसूरती को मस्तिष्कपटल से कार्ट्रिज शीट पर उतारने का ख्याल अधूरा ही रह जाता. वेदान्त ने तीखे मोड़ पर गाड़ी संभाली. बाहर देखती लड़की की नज़रें वापस वेदान्त पर केन्द्रित हुई.
- ‘बस अब थोड़ी दूर तक ही मुश्किल है, फिर सब आसान हो जाएगा’.
लड़की जैसे अर्थपूर्ण ढंग से बोली. वेदान्त को उसकी बात समझ ना आई.
- ‘क्या मतलब?’
- आगे जा कर ये रास्ता बेहतर हो जाएगा. इस पहाड़ी मोड़ से कुछ ही आगे बढ़ने पर लॉज, होम स्टे और कॉटेज हाउसेस की कतारें शुरू होंगी. लगभग 5 किलोमीटर की चढ़ाई है. वैसे तुम कहाँ रुके हुए हो’?
बोलते-बोलते लड़की अचानक वेदान्त से पूछ बैठी.
- ‘कैलेंडुला कॉटेज’.
वेदान्त ने बिना अपनी नज़रें सड़क से हटाए कहा.
- ‘कैलेंडुला कॉटेज? वो महागुना हिलटॉप पर सबसे ऊपर जो खँडहर कॉटेज है? आंटी जूलिया की कॉटेज? वो पोल्ट्री फ़ार्म वाली बुढ़िया?’
लडकी चौंक कर सीधी बैठ गई. उसके चेहरे पर कई भाव जैसे एक-साथ ही आए और गुज़र गए. वेदान्त ने एक नज़र उसकी ओर देखा फिर जैसे उसकी सशंकित निगाहों में तैरते अनकहे सवालों का जवाब देने की मंशा से बोला.
- ‘मैंने वो कॉटेज आंटी जूलिया से खरीद ली है. हालांकि मेरे स्टेट एजेंट ने ऐसा करने से मना किया था’.
- ‘तुम्हारे स्टेट एजेंट के पास तुमसे ज्यादा दिमाग है, तुम्हे उसकी बात माननी चाहिए थी. क्या तुमने वो कॉटेज खुद देखी है’?
वेदान्त को उससे ऐसे ब्लंट स्टेटमेंट की अपेक्षा नहीं थी, वो हडबडा गया फिर खुद को संभालते हुए बोला.
- ‘फोटोग्राफ्स और विडियो कॉल पर स्टेट एजेंट ने दिखाया था’.
- ‘हम्म…उस कॉटेज को तो कोई रेसॉर्ट वाले भी नहीं खरीदते. कई साल पहले उसपर बिजली गिरी थी जिससे ऊपरी मंजिल का काफी हिस्सा बर्बाद हो गया. यहाँ महागुना के लोग उस कॉटेज को अभिशप्त मानते हैं. इस पहाड़ी पर ज़्यादातर पुराने घरों में लोकल लोगों ने होम स्टे खोल लिए या फिर कम्पनीज को रेसॉर्ट बनाने के लिए बेच दिए, बस वो मनहूस कॉटेज नहीं बिकती.’
- ‘अबतक नहीं बिकी थी, अब बिक गयी.’
वेदान्त उस लडकी की बात बीचे में ही काटते हुए बोला. लडकी दो पल तक उसे चुपचाप देखती रही जैसे फैसला करने की कोशिश कर रही हो कि उसे आगे कुछ बोलना चाहिए या नहीं, फिर एकाएक बोली.
- वो कॉटेज लेना घाटे का सौदा है…पर क्या पता तुमको रास आ जाए. सो, बेस्ट ऑफ़ लक ओल्डी’.
- ‘थैंक यू’.
वेदान्त ने महसूस किया कि लड़की का अंतिम वक्तव्य बिलकुल भावरहित था. उसे ऐसा लगा जैसे वो कुछ बोलते-बोलते रुक गई. शायद वो उस जगह की और वेदान्त के घाटे के सौदे की और अधिक बुराई नहीं करना चाहती थी.
वेदान्त की एसयूवी अब पहाड़ी पर काफी ऊपर तक आ गई थी. सड़क थोड़ी अधिक चौड़ी हो गई थी, दोनों तरफ ऊँचे पेड़ों के जंगल थे जिनपर घनी लतर और बेलें चढ़ी हुई थीं और रंग-बिरंगे जंगली फूलों की झाड़ियाँ थी. सड़क पर दूर तक बोगनवेलिया के गुलाबी और सफ़ेद फूल टूट कर बिखरे हुए थे. यहाँ अब दोबारा से आबादी नज़र आ रही थी.
जैसे कि उस लड़की ने कहा था लॉजेज़, होम स्टे और कॉटेजेज़ कतार में बने हुए थे. आस-पास विदेशी सैलानी जोड़े घूमते-फिरते नजर आ रहे थे. पास ही एक छोटा बाज़ार था जहां कई लिकर शॉप्स, बार, बेकरी, डाईनर्स रेस्तरां तथा छोटे डिपार्टमेंटल स्टोर्स भी थे. पास ही पटरियों पर कुछ गाँव की औरतें कपड़ों की रंग बिरंगी दुकाने लगाए बैठी थीं, इनके पास मौजूद सभी परिधान विदेशी सैलानियों की पसंद के अनुरूप थे. इसके अलावा वेदान्त को वहां एक काफी पुरानी नज़र आने वाली लाइब्रेरी और उससे लगे हुए एक छोटी सी एंटीक शॉप भी दिखाई दी. बाज़ार में स्ट्रीट फ़ूड वेंडर्स नज़र आ रहे थे जो ज़्यादातर हॉटडॉग्स, बर्गर आदि से लेकर मैगी तक बेच रहे थे.
- ‘मुझे यहीं उतार दो, मैं यहाँ से पैदल चली जाउंगी’.
लड़की खिड़की से बाहर बाज़ार की ओर देखते हुए बोली, वेदान्त ने गाड़ी रोक दी.
- ‘क्या तुम इनमे से किसी होम स्टे में ठहरी हो या फिर तुम यहाँ की लोकल हो’?
वेदान्त ने लड़की से पूछा, वो उसे ऐसे जाने नहीं देना चाहता था पर उसे रोकने का कोई कारण फिलहाल उसके दिमाग में नहीं आ रहा था. लड़की गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतर चुकी थी. उसने दरवाज़ा बंद किया और खुली खिड़की के रिम पर अपनी कुहनियाँ टिका कर अंदर वेदान्त की तरफ देखा. वेदान्त के प्रश्न का उत्तर देने के बजाए उसने मुस्कुराते हुए अपना ही प्रश्न दाग दिया.
- ‘तुम्हारा नाम क्या है ओल्डी….?’
- ‘वेदान्त’.
- ‘लिफ्ट के लिए धन्यवाद वेदान्त, उम्मीद है महागुना हिल्स और कैलेंडुला कॉटेज तुम्हे रास आएँगे’.
लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा. उसकी आखें अब भी सीधे वेदान्त की आखों में झाँक रही थीं. चेहरे पर वही बच्चों जैसी मुस्कान. वेदान्त का जी चाहा कि उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक ले और उससे कहे कि, ‘सुनो..थोड़ी देर और ठहर जाओ. कुछ भी बात करो पर बात करो मुझसे. पता नहीं कितना अरसा गुज़र गया किसी का ध्यान ही नहीं गया मुझपर कि मैं जिंदा भी हूँ. जाने पिछले कितने समय से लोगों ने मुझे बोला बहुत कुछ है पर मुझसे बात नहीं की है.’
लेकिन वेदान्त जानता था कि इनमे से कुछ भी कहना सही ना होगा, ऐसा कर के वो लड़की के उस विश्वास को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता था जिसपर उसने बेझिझक वेदान्त से लिफ्ट ले ली थी. लड़की सीधी हुई और बाज़ार की ओर बढ़ गई. वेदान्त की नज़रें उसके कमर के नीचे पिंडलियों तक लहराते लम्बे बालों में उलझ कर फंसी हुई थीं.
वेदान्त दूर तक उस लड़की को जाते हुए देखता रहा. धीरे-धीरे वो बाज़ार में विचरते सैलानियों और रंग-बिरंगी दुकानों की सघनता में ओझल हो गई. वेदान्त का दिल ज़ोर-ज़ोर से उससे चीख कर कह रहा था कि उसे उतर कर लड़की के पीछे जाना चाहिए. इससे पहले कि उसकी तर्कशक्ति उसके दिल के आगे हार कर हथियार डाल देती उसने गाड़ी स्टार्ट कर के आगे पहाड़ी के ऊपर बढ़ा दी. जैसे-जैसे गाड़ी ऊपर की ओर बढती जा रही थी रास्ता फिर से खाली और सुनसान होता चला गया. होम स्टे, लॉज आदि अब कम हो रहे थे.
धीरे-धीरे आबादी पीछे छूट गई, पहाड़ी खड़ी चढ़ाई, उबड़-खाबड़ सड़क और उसके चारों तरफ़ जंगल सघन हो गए. लगभग 5 km ऊपर आने पर उसे एक लाल बड़े पत्थरों से बनी हुई कॉटेज दिखाई दी. वेदान्त को ऐसा लग रहा था जैसे वो सचमुच दुनिया से दूर एक अलग दुनिया में आ गया हो. महागुना हिल्स की चोटी पर हवा काफी साफ़ थी. ऐसा लग रहा था जैसे शुद्ध ऑक्सीजन भर-भर के फेफड़ों में आ रही हो. पहाड़ी के ऊपर आते-आते आसमान इतना करीब लग रहा था जैसे कमरे की सीलिंग हो और वेदान्त का दिल चाह रहा था कि वो उछल कर अपने सर के ऊपर आए आसमान के घने-गहरे बादलों को अपने हाथों से यूं बिखेर दे जैसे साफ़ पानी की सतह पर परत जैसी जम गई काई हाथ मारने से तितर-बितर हो जाती है. जैसे नर्म बिस्तर पर खड़ा कोई बच्चा उछल कर कमरे की छत छू लेने की कोशिश करता है वैसे ही वेदान्त का दिल एक छलांग मार कर आसमान छू लेने को मचल रहा था.
हिलटॉप पर कॉटेज के चारों तरफ कैलेंडुला फूलों की क्यारियाँ थी जिसमे पीले, सुनहरे और नारंगी फूलों के ढेरों गुछे खिले हुए थे. कॉटेज के चारों तरफ़ गोल घेराव में लगभग 3ft. ऊंची फेंसिंग थी जिसपर कैलेंडुला की झाड़ियाँ लदी हुई थीं. देख कर लगता नहीं था कि वहां कभी भी कोई बाहरी चारदीवारी रही होगी. कॉटेज वाकई काफी पुराना दिखाई दे रहा था, उसके लाल पत्थर अब काफी हद तक काले पड़ चुके थे जिसका एक कारण शायद उसपर सालों पहले बिजली गिरना था. इन पत्थरों पर चढ़ी लतरों और बेलों ने कॉटेज के बाहरी हिस्से को जैसे एक प्राकृतिक आवरण में छुपा लिया था. दरवाज़ों और खिडकियों से ये लतरें बेतरतीबी से लटक रहे थे. वेदान्त ने देखा कि कॉटेज की ऊपरी मंजिल बिजली गिरने से काफी हद तक ध्वस्त हो चुकी है. ग्राउंड फ्लोर सही सलामत नज़र आ रहा था फिर भी असली स्थिति तो अंदर जाने पर ही पता चलनी थी, हालांकि अब वेदान्त को एहसास हो रहा था कि उस लड़की ने बात सही कहीं थी कि ये कॉटेज लेना उसके लिए शायद घाटे का सौदा है.
बाहरी फेंसिंग के आगे ही अपनी गाड़ी पार्क कर के वेदान्त नीचे उतरा. कभी आलिशान रहे लेकिन आज खँडहर हो चुके उस कॉटेज की अपूर्णता वेदान्त को अपनेपन का एहसास करा रही थी. वक्त की मार से मिले कभी ना भर सकने वाले ज़ख्मों को समय के साथ उग आई बेलों के आवरण में छुपा कर अपने अस्तित्व के मायने तलाशती वो कॉटेज वेदान्त को बिलकुल अपने जैसी ही लग रही थी.
आसमान काले बादलों से घिरा हुआ था जिनमे कहीं किसी दरार से धूप छन कर कैलेंडुला कॉटेज पर पड़कर एक अप्राकृतिक रंगमंच सरीखे दृश्य का सृजन कर रही थी. वेदान्त के लिए उसके आने वाले जीवन के नए अध्याय का रंगमंच था यह महागुना हिलटॉप. एक अनिश्चित भविष्य के काले बादलों में कहीं एक दरार बना कर आती उम्मीद की किरणे स्पॉटलाइट सी उस कैलेंडुला कॉटेज पर पड़ती हुई जैसे आने वाले उस कल को और नाटकीय बना रही थीं जो अपने आप में उलझे अमरबेलों के गुच्छों की तरह ध्वस्त हुए उस खँडहर को आवृत किए हुए थे और कुछ देर पहले मिली उस अनजान लड़की की वेदान्त के ज़हन में उपस्थिति कॉटेज के चारों तरफ खिले कैलेंडुला के फूलों की वातावरण में फैली सुगंध के जैसा एक एहसास था. हाँ, वो लड़की वेदान्त के ज़हन में कुछ यूं ही तो बस गई थी जैसे किसी खूबसूरत फूल की पंखुड़ियों को उँगलियों से सहलाने पर हथेलियों में उसकी सुगंध बैठ जाती है.
- ‘वेलकम मिस्टर वेदान्त…हम आपका ही वेट करता था. माइसेल्फ जूलिया रोड्रिग्स…प्रीवियस ओनर ऑफ़ कैलेंडुला कॉटेज’.
वेदान्त को वहाँ आया देखकर कॉटेज के अंदर से एक लगभग 60 साल की बुढ़िया बाहर निकली. उसका कद बामुश्किल पांच फुट रहा होगा, शरीर की चौड़ाई भी ऐसी थी कि उसे देखकर ये समझ पाना मुश्किल था कि वो चल कर आ रही है या लुड़क कर. उसके बाल कंधे तक कटे हुए और पूरी तरह सफ़ेद थे. आखों पर मोटे फ्रेम वाला भारी पॉवर का चश्मा था. उसने हाथ में थमा हुआ एक चाभियों का गुच्छा और कागजों का एक पुलिन्दा वेदान्त की ओर बढ़ा दिया.
- ‘ये कॉटेज की चाभियाँ और पेपर्स हैं. आपके स्टेट एजेंट ने बोला था आपको ही दे दूँ. मैंने साइन कर दिया है’.
- ‘धन्यवाद मिसेस रोड्रिग्स.’
वेदान्त ने पेपर्स और चाभियाँ लेते हुए बुढ़िया का अभिवादन किया. बुढ़िया लपक कर बोली.
- ‘मिस…मिस रोड्रिग्स’.
- ‘आई एम सॉरी…मिस जूलिया रोड्रिग्स’.
वेदान्त को वो बुढ़िया बहुत अजीब लग रही थी, वो काफी विचलित व अस्थिर नज़र आ रही थी. किसी गोल-मटोल चूहे के सामान उसकी छोटी गोल आखें इधर-उधर फिर रही थीं.
- ‘मैंने कॉटेज की साफ़-सफाई करवा दी है. अन्दर कुछ पुराना फर्नीचर भी हैं और ज़रूरत का कुछ सामान किचेन में भी मौजूद है. आप अपना सामान लेकर नहीं आया’?
बुढ़िया जैसे बात को आगे खींचने की गरज से बोली. वेदान्त ने एक बार फिर उसका धन्यवाद ज्ञापन किया.
- ‘बहुत बहुत शुक्रिया मिस रोड्रिग्स. उम्मीद है कि मेरा सामान आज शाम तक आ जायेगा’.
- ‘तुम्हारा एजेंट ने कुकिंग और साफ़-सफ़ाई करने के वास्ते किसी को रखने के लिए भी बोला था’.
- ‘हाँ, इसके लिए किसी कि ज़रूरत होगी मुझे’.
- ‘इधर केयरटेकिंग के लिए कोई मिलता नहीं है. मैंने अपना ग्रैंडडॉटर को बोला है वो कल से मॉर्निंग में आ जाएगा और सब काम निपटा कर के इवनिंग अँधेरा होने से पहले निकल जाएगा. ये पेड सर्विस है, हर दिन का हज़ार रुपया लगेगा’.
- “30 हज़ार रुपया महीने का, सिर्फ तीन टाइम खाना बनाने और कॉटेज की देखभाल का! ये तो बहुत ज्यादा है”.
वेदान्त चौंके हुए बोला. बुढ़िया का स्वर अब शुष्क हो रहा तजा.
- ‘बोला ना, इधर कोई केयरटेकिंग या हाउसकीपिंग सर्विस नहीं मिलता. वो तो तुम्हारा एजेंट इतना मिन्नत किया और तुम बिना तोल-मोल किए हमारा कॉटेज खरीद लिया इसलिए हम आउट ऑफ़ ग्रेटिट्युड तुमको ये सर्विस ऑफर कर रहा’.
बुढ़िया बिना बात का एहसान लादते हुए बोली. वेदान्त का एक मन हुआ कि उसे साफ़ मना कर के भगा दे. वेदान्त ना सिर्फ अच्छा खाना बनाना जानता था वो एक बेहतरीन कुक था, लेकिन सिर्फ दूसरों को खिलाने के लिए. खुद अपने लिए खाना बनाना उसे दुनिया का सबसे बदमज़ा काम जान पड़ता था और साफ़-सफ़ाई व रख-रखाव के मामले में वो ख़ासा उदासीन था जैसा कि ज़्यादातर कलाकार होते हैं. वैसे भी रोज़मर्रा के इन फ़ालतू कामों में अपना समय ज़ाया करने का उसका कोई इरादा नहीं था इसलिए उसने अनमनी मन से फिलहाल के लिए बुढ़िया का प्रस्ताव स्वीकार लिया.
- ‘अच्छा ठीक है, कल से भेज देना आप अपनी ग्रैंडडॉटर को…लेकिन एक बात बताओ. आपने कहा कि आप मिसेस नहीं मिस हैं फिर ये ग्रैंडडॉटर कहाँ से आई’?
- ‘ये हमारे सिस्टर की बेटी की बेटी है. इसका पूरा परिवार एक मिसहैपनिंग में ऑलमाइटी लॉर्ड को प्यारा हो गया, तबसे हम इसको पाला है. एक और बात, हमारा ग्रैंडडॉटर बहुत यंग एंड इनोसेंट है…डोंट एवर डेयर टू फूल अराउंड विद हर. तुम समझ गया न हमारा मतलब’?
बुढ़िया चेतावनी देने के लहज़े में बोली.
- ‘आप भरोसा रखें, इस मामले में आपको मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं मिलेगी’.
वेदान्त ने गंभीर आवाज़ में कहा. उसे अब बुढ़िया की बातों से खीज मच रही थी.
- ‘मेरा बाल मर्द का जात को अपना बात से पलटते देखकर सफ़ेद हुआ है मैन…बाकि तुम्हारे खुद का भलाई इसी में है कि इस मामले में कभी तुम्हारा कोई शिकायत ना मिले’.
बुढ़िया ने कहा और बिना वेदान्त की किसी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए फुटबॉल की तरह लुढ़कती हुई नीचे को जाती पहाड़ी ढ़लान की ओर बढ़ गई. वेदान्त ने महसूस किया कि इस बार बुढ़िया उसे सिर्फ कोरी धमकी नहीं दे रही थी, उसकी आवाज़, उसके लहजे के पीछे इस बार गंभीर चेतावनी थी. वेदान्त ने अपना सर झटका और कॉटेज की ओर बढ़ गया.
चाभियों के गुच्छे की सबसे बड़ी चाभी कॉटेज के मुख्य द्वार की थी. मुख्य दरवाज़ा काफी भारी भरकम, शीशम की लकड़ी का बना हुआ था. उसके ठीक ऊपर एक ताम्बे की बड़ी सी घंटी लटक रही थी जिससे बंधी रस्सी का सिरा एक हुक में लगा था जोकि दरवाज़े की चौखट के बगल में जड़ा हुआ था. हुक खींचते ही ताम्बे की घंटी बज उठी. घंटी की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि यकीनन वो पूरी कॉटेज में साफ़ सुनाई देती होगी.
बाहर से छोटा दिखने वाला कॉटेज अंदर से ठीक-ठाक बड़ा था. कॉटेज की फर्श पर वुडेन फ्लोरिंग थी और दीवारों के बड़े लाल पत्थर जो बाहर से काले व बदरंग दिख रहे थे अंदर से साफ़ और सुर्ख दिखाई दे रहे थे. ग्राउंड फ्लोर पर एक बड़ा सा हॉल था जिसके एक ओर किचेन और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ थी और दूसरी तरफ एक बड़ा मास्टर बेडरूम, उसके बगल में एक सिंगल बेडरूम और उनके बाद एक वाशरूम था. क्योंकि कॉटेज पुराने ज़माने की थी इसलिए कमरों में अटैच्ड वाशरूम नहीं थे.
कॉटेज में पुराने ज़माने का फर्नीचर ठीक-ठाक अवस्था में मौजूद था. हॉल में एक बड़ा आयतकार डाइनिंग टेबल था जिसके चारों ओर 6 कुर्सियां लगी हुई थीं. सागवान के उस मेज़ के पाये मज़बूत सपाट खम्भों जैसे थे. कुर्सियां भी वैसी ही सपाट पायों वाली थी जोकि पीले रंग के बेंत से बुनी हुई थीं और उनपर कुशन लगे हुए थे.
इसके अलावा हॉल में एक फायरप्लेस था जिसके पास बेंत के बुने और नक्काशीदार फ्रेम वाले दो बड़े और दो छोटे सोफे रखे थे जिनके बीच में एक गोल सेंटर टेबल थी. टेबल भी वहां के बाकी फर्नीचर जितनी ही पुरानी जिसकी ऊपरी सतह ग्लास टॉप के बजाए पॉलिश की हुई लकड़ी की थी.
दोनों बेडरूम्स में एक-एक पलंग और एक लकड़ी की अलमारी रखे हुए थे. वेदान्त ने देखा कि डाइनिंग टेबल पर एक चार डब्बे वाला टिफ़िन रैक रखा हुआ था जिसमे आंटी जूलिया वेदान्त के लिए खाना रख गई थी. वो बर्तन की तलाश में किचेन में पहुंचा. किचेन काफी बड़ा और हवादार था. वहां दो बड़ी खिड़कियाँ थी जिनका मुंह कॉटेज के बाहरी लॉन की तरफ़ था जहां से कैलेंडुला की क्यारियाँ नजर आ रही थीं.
किचेन स्लैब पर एक पुराने तरीके का पीतल का केरोसिन बर्नर स्टोव रखा हुआ था. उसके पास एक पुराना लैंप और कुछ मोमबत्तियां भी रखी हुई थीं. स्लैब के पीछे वाली दिवार पर एक लोहे का मज़बूत शेल्फ जड़ा हुआ था जिसपर गिनती के कुछ बर्तन रखे थे. इनमे एल्युमीनियम और स्टील के पुराने बर्तन ही थे ज्यादातर. वहां लाइन से लगी चार प्लेट्स में से एक प्लेट वेदान्त ने उठाई और वापस लिविंग हॉल में पहुंचा. वेदान्त ने टिफ़िन का डब्बा खोला. उसमे चिकन करी, सलाद, चावल और रोटियां थी.
वेदांत ने रात भर गाड़ी चलाई थी, थकान और भूख से उसका बुरा हाल हो रहा था. उसने बाहर जाकर एसयूवी से पानी निकाला और हाथ-मुंह धो कर खाने बैठ गया. भर पेट खा कर उसने एक सिगरेट सुलगा ली औए ओल्ड मोंक की बोतल खोल कर सोफे पर जा बैठा. कुछ देर पीने और सिगरेट खत्म करने के बाद वेदांत ने कॉटेज के ऊपरी तल का मुआयना करने का फैसला किया.
पहली मंजिल के काफी बड़े हिस्से की छत बिजली गिरने से टूट गई थी. टूटी छत से लताएं और बेलें अंदर आकर चारों तरफ फैली हुई थी. यहाँ की दीवारों, दरवाज़ों और खिडकियों की हालत काफी ज्यादा ख़राब थी. ग्राउंड फ्लोर के मुकाबले पहली मंजिल एक खँडहर दिखाई दे रही थी. पहली मंजिल से ऊपर छत को जाती सीढियां और मुंडेर अमर बेलों से ढकी हुई थी. पहली मंजिल पर दो कमरे थे जिनकी छत सलामत थी. दोनों कमरों के दरवाज़ों पर ताले जड़े हुए थे. वेदांत को चाभियों का ख्याल आया जो जूलिया रोड्रिग्स ने उसे सौंपी थी, उसने अपनी जेब से चाभियों का गुच्छा निकाला और एक-एक कर के चाभियों से ताले खोलने की कोशिश करने लगा. एक कमरे का ताला खुल गया.
वेदान्त ने अंदर प्रवेश किया, कमरे में एक ख़ास गंध थी जो वर्षों तक बंद रहने से उत्पन्न सीलन और धूल से होती है. अँधेरे, सीलन और घुटन भरे उस कमरे में सांस लेना दूभर था. वेदांत ने कमरे की खिड़कियाँ खोलने की कोशिश की जिनके कब्ज़े लम्बे समय तक बंद रहने से जाम हो गए थे. थोड़ा ज़ोर लगाने से खिडकियों के पल्ले खुल गए. ताज़ी हवा के साथ हल्का प्रकाश अब उस कमरे की खिड़की से अंदर आ रहा था. सामने कॉटेज के आगे का लॉन, कैलेंडुला फूलों की क्यारी और उसके पार दूर धुंध से घिरे पहाड़ों की चोटी नज़र आ रहे थे. वेदान्त ने वापस पलट कर कमरे में नज़रें घुमाई. उस कमरे को देख कर लगता था कि वो किसी लड़की का कमरा रहा होगा.
वहां एक पुराने जमाने का पलंग लगा हुआ था जिसके चारों कोनो पर लगे मेटल फ्रेम से अबतक मच्छरदानी लटक रही थी. पलंग के ठीक सामने एक आदमकद सिंगारदान रखा हुआ था जिसपर रखे हर सामान पर धूल की मोटी परत चढ़ी थी. वेदांत ने जो खिड़की खोली थी उसके आगे एक स्टडी टेबल रखा था. मेज़ पर कई फोटो एलबम्स, पुराने हिंदी और इंग्लिश जर्नल्स, पोस्टकार्ड और इनलैंड लेटर्स और कई डायरी रखी हुई थी. सामान की वस्तुस्थिति देखकर ऐसा लगता था जैसे इनका उपयोग करते-करते किसी ने उन्हें उसी अवस्था में छोड़ दिया जैसे कि वापस आ कर दोबारा इनका उपयोग करने वाला हो लेकिन फिर वो नौबत ही ना आई और चीज़ें वैसे ही पड़ी रह गयीं. इन सभी पर धूल की मोटी परत चढ़ी हुई थी. मेज़ पर एक डायरी खुली रखी थी, उसके ऊपर पुराना फाउंटेन पेन भी खुला रखा हुआ था जिसकी और पास ही मेज़ पर रखी खुली दवात की स्याही सूख चुकी थी.
वेदांत ने डायरी उठा कर उसके पन्नो पर जमी धूल साफ़ की. धूल की परत के पीछे पीले पड़े पन्नो पर धुंधली पड़ गई स्याही से लिखी इबारत अब भी पढ़ी जा सकती थी. Journals में उस लड़की जिसका नाम Candice था, उसकी हर एक दिन की दिनचर्या, उसके दिल की छोटी-बड़ी बातें सब कुछ दर्ज था. उन diaries और journals में वेदान्त काफी देर तक डूबा रहा.
इस दौरान Rum की दो bottle उसने खाली कर दी थी. उसे याद नहीं कि वो कितनी देर तक ऊपर कमरे में सामान खंगालता रहा और वो कब वापस नीचे आया. उसके नीचे आने तक वातावरण में धुंधलका छाने लगा था. दिन ढल रहा था और आसमान में घिरे काले बादल तेज़ी से घुमड़ रहे थे. कुछ ही देर में light चली गई. वेदांत को kitchen में कुछ candles मिल गए जिन्हें जला कर वो hall में बैठ गया और अपना sketchbook और charcoal pencils निकाल लिए. जिस लड़की को उसने आते वक्त lift दी थी उसे वेदांत अपने ज़हन से नहीं निकाल पा रहा था, सो उसे कागज़ पर निकालना ही बेहतर समझा. SUV में बगल की seat पर अधलेटी सी वो लड़की, अल्लहड़, बेबाक और उसके साथ ही शोखियों से भरी हुई. वेदांत के दिलोदिमाग में जैसे वो तस्वीर छपी हुई थी, हवा में उड़कर चेहरे पर आते उसके बाल, dashboard पर टिके उसके पैर, उसकी बिलकुल कसी और तनी हुई छातियाँ. वेदांत ने अपनी pencil रोक ली, उसकी सासें गर्म और तेज़ चल रही थीं. उसका पूरा जिस्म बुखार से तप रहा था. उसे लग रहा था वो किसी भी पल गिर पड़ेगा. अँधेरा पूरी तरह घिर चुका था और बाहर बादलों की घन गर्जना के साथ बारिश शुरू हो गई थी. वेदान्त किसी तरह खुद को संभालता हुआ bedroom में पहुंचा और bed पर ढेर हो गया. उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके जिस्म के अन्दर से आग निकल रही है. उसने अपनी jacket और t-shirt उतार कर फर्श पर फेंक दिए. वेदांत रेगिस्तान की तपती रेत पर तड़पती मछली की तरह छटपटा रहा था. उसने अपनी jeans और underwear भी उतार दिए. उसकी रगों में जैसे खून के साथ ज्वालामुखी का लावा बह रहा था. उसके दिलोदिमाग में विचारों और भावनाओं का आवेग दमित इच्छाओं की लहरों में उफ़ान ला रहा था. वो लड़की उसके दिलो दिमाग पर इस कदर हावी हो गई थी कि उसकी दमित इच्छाएं सुमंदरी तूफ़ान में उफनती लहरों की तरह आक्रामक होकर उसके तर्क, यथार्थ और संयम के कमज़ोर पड़ते बाँध को तहस-नहस करती चली गई. वेदांत का गला बुरी तरह सूख रहा था. उसका हाथ सूखे गले पर फिरते हुए नीचे सीने तक जा पहुंचा. सीने के अंदर भीषण जलन का अनुभव कर रहा था वो, अपने सीने को सहलाता हुआ उसका हाथ नीचे फिसलता चला गया जबतक वो अपने तनाव पर कस नहीं गया. उस पल उसके लिए ये समझ पाना मुश्किल था कि उसकी नज़रों के सामने जो घटित हो रहा है वो हकीकत है या फिर उसकी दमित इच्छाएं मूर्त रूप लेकर उसके सामने खड़ी है. उदास आखों में शरारती चमक लिए वो लड़की उसके bed के पास खड़ी उसे देखकर मुस्कुरा रही थी. उसकी आखें वेदान्त की नज़रों से जैसे उसके दिल में उतर रही थी. होठों पर हल्की मुस्कान. उस अर्थपूर्ण मुस्कान की पहेली को वेदांत सुलझा नहीं पा रहा था. वो एकटक उसकी आखों में देख रहा था, उसका हाथ अपने तनाव पर तेज़ी से ऊपर-नीचे फिसल रहा था. लड़की अब उसे वो करते हुए देख रही थी, वेदान्त के हाथों की गति और तेज़ हो गई. वो ठीक वेदांत के सामने खड़ी थी, उसने अपना long gown दोनों हाथों से पकड़कर कमर के ऊपर उठाया. उसने gown के नीचे कुछ भी नहीं पहना हुआ था. लड़की की नज़रें एक पल के लिए भी वेदान्त की आखों से हट नहीं रही थीं, ना ही वो अपनी पलकें झपक रही थी. यूं ही उसकी आखों में देखते-देखते वो bed पर चढ़ी और अपने दोनों पैर वेदांत के अगल-बगल रखकर धीरे-धीरे वेदांत के तनाव पर बैठती चली गई. उसके दोनों हाथ वेदांत के सीने पर थे और वो उसके ऊपर झुकी हुई थी, उसके खुले लम्बे बाल वेदान्त के चेहरे पर छाए हुए थे. अपनी कमर को वो लयात्मक ढंग से आगे-पीछे कर रही थी. वेदांत नहीं समझ पा रहा था कि वो लड़की वाकई उसपर सवार थी या फिर उसका थका, नशे में धुत्त, बुखार से तपता और कामेच्छा से कुंठित दिमाग उसके साथ खेल खेल रहा था लेकिन वो खेल कई घंटों तक चलता रहा, जबतक वेदांत के अंदर दबी हुई इच्छाएं लावे की तरह फूट कर उसके जिस्म से बाहर नहीं निकल गईं. वेदान्त का दिमाग अब शून्य के अन्धकार में डूब गया था. सिर्फ नितांत शून्य और अन्धकार.
नीचे town में भी तूफानी बारिश की वजह से power cut हो गया था, ये आम बात थी. तेज़ हवा और तूफ़ान के कारण वहां अक्सर पेड़ टूट कर बिजली के तारों पर गिरते रहते थे. जिस वजह से बारिश की स्थिति में power supply काट दी जाती थी. 60 वर्षीय मलम्मा तेज़ कड़कती बिजलियों को नज़रंदाज़ कर के सोने की कोशिश कर रही थी. मलम्मा का घर town के बाहर homestays और cottages के पास ही था. घर से ही लगे हुए वो एक grocery and general store चलाती थी. मलम्मा लगभग 40 साल से store चला रही थी. उसका husband करनून town के ही government school में head clerk था और इसी साल retire हुआ था. दोनों की जिंदगी यहीं गुजरी थी, एक शांत सुकून भरी जिंदगी. जिसमे उस रात से पहले शायद कभी कोई तूफ़ान नहीं आया था. तेज़ हवा के थपेड़े से उनके घर के पिछले कमरे की कोई खिड़की तेज़ आवाज़ के साथ बज रही थी. उस आवाज़ को नज़रंदाज़ कर के मलम्मा कुछ देर तक सोने की कोशिश करती रही फिर अंत में उसने झुंझला कर अपने बगल में सोए हुए करनून को झंकझोरा.
- ‘सुनाई नहीं देता खिड़की कितनी ज़ोरों की आवाज़ कर रही है, उठो और चिटकनी लगा कर आओ वर्ना कांच फूट जाएगा’!!
बूढ़ा करनून काफी देर रात Michael के अड्डे से fried pomfret खा कर और ताड़ी पी कर लौटा था जोकि उसे आज उसके पुराने दोस्त रोशन लाल से जुएँ में जीतने पर परिणामस्वरूप प्राप्त हुए थे और फिलहाल तूफ़ान और अपनी गरजती हुई बीवी से बेज़ार करनून बेसुध सोया पड़ा था. बाहर तेज़ हवा का झोंका बारिश के थपेड़े पर सवार हुआ खिड़की पर जैसे अपनी खिज निकालता हुआ गुजरा. मलम्मा भी अब उस शराबी बूढ़े को उठाती खिज चुकी थी.
- ‘अरे अब उठो भी! ऐसा क्या घोड़े बेच कर सोए पड़े हो. कल को कोई चोर मेरा गला रेत जाएगा तो भी तुम ऐसे ही मुर्दे बने पड़े रहोगे’!!
करनून की नींद पर इस बार असर हुआ. वो नींद में ही झुंझलाए हुए बोला.
- ‘चोर खुद तेरी मनहूस शक्ल देखकर heartattack से मर जाएगा. सोने दे नामुराद बुढ़िया’!
पर मलम्मा को चैन नहीं था. वो पड़े-पड़े तबतक बडबडाती रही जबतक करनून उठ कर खिड़की बंद करने चला ना गया. नींद में झुंझलाता और मलम्मा को कोसता करनून पिछले कमरे में पहुंचा. नशे और नींद से बोझिल अधखुली आखों से उसने हवा से बजते खिड़की के पल्ले देखे. उन्हें बंद कर के करनून चिटकनी लगाने ही वाला था कि window stain glass के बाहर एक साया तेज़ी से गुजरा. वो कोई बिल्ली या छोटे जानवर का साया नहीं था बल्कि आदमकद था. करनून ने खिड़की दोबारा से खोली और grill से जितनी गर्दन बाहर निकाल सकता था उतना निकाल के चिल्लाया.
- “अरे! कौन है बाहर”?
प्रत्युत्तर बाहर से तेज़ हवा और बारिश के थपेड़ों के शोर ने दिया. करनून वापस खिड़की बंद करने को हुआ लेकिन तभी उसके कानो में बाहर पानी भरे lawn पर किसी के चलने के पदचापों की आवाज़ आई. करनून खुद में ही बडबडाया.
- “यह ज़रूर वो शराबी Philip होगा, कमबख्त बारिश से बचने के लिए घर में घुस रहा. ज़रूर यह मलम्मा बाहर के gate पर रात में ताला लगाना भूल गई होगी”.
करनून आज रात जम के सोना चाहता था पर अब उसकी नींद में खलल पड़ गया था. मलम्मा और Philip को गालियाँ बकते हुए करनून ने एक पुराना काले रंग का छाता लिया और दरवाज़ा खोल कर बाहर निकला. मलम्मा ने करवट बदली और तकिया अपने चेहरे के ऊपर रखकर सोने की कोशिश करने लगी. करनून घर से बाहर निकला. घर के चारों तरफ कुछ ज़मीन थी उसके बाद boundary wall. उसने main gate check किया, उसपर ताला अंदर से लगा हुआ था. करनून फिर खुद में ही बुदबुदाया.
- “ताला तो लगा हुआ है. यो शराबी Philip दिवार फांद कर अंदर नहीं आ सकता. इसका मतलब सच में कोई चोर घुस आया है”?
बारिश और तेज़ हवा से करनून का छाता पलट गया. बहुत मुश्किल से खुद को और छाते को संभालता हुआ वो वापस अंदर की ओर लपका. अगर कोई चोर घुस आया था तो करनून उसका मुकाबला नहीं करना चाहता था. उसके लिए बेहतर था कि वो घर का दरवाज़ा बंद कर के मलम्मा के साथ अंदर ही दुबका रहे. मकान का दरवाज़ा मज़बूत था, चोर किसी भी तरह उसे तोड़ कर अंदर नहीं आ पाता. करनून अंदर पहुँच कर पड़ोसियों और police को phone भी कर सकता था. यह सब सोचते हुए बूढ़ा तेज़ी से घर के खुले दरवाज़े की ओर भागा. उसे अपने पीछे एक अजीब सी सरसराहट और पानी भरे lawn पर तेज़ी से उसकी ओर बढ़ते क़दमों की आवाज़ सुनाई दी. कोई उसके ठीक पीछे से उसपर झपटने आ रहा था. करनून की हिम्मत नहीं हुई कि वो पीछे पलट कर भी देखे. उसे सिर्फ अपने घर का खुला दरवाज़ा दिखाई दे रहा था जिसके वो बेहद करीब था. सिर्फ चार कदम और वो अंदर होता. करनून ने निश्चय किया कि वो अंदर पहुँच कर दरवाज़ा बंद करते ही उस चोर को सबसे पहले गंदी गालियाँ देगा. तेज़ी से भागता करनून अगले ही पल दरवाज़े की चौखट तक पहुँच गया. वो अंदर घुस ही गया था लेकिन उसका खुला हुआ छाता चौखट में जा अटका. करनून छाते को चौखट से निकालने की कोशिश करने लगा कि तभी एक हाथ तेज़ी से उसकी गर्दन पर कसा और उसे वापस बाहर खींच लिया. बूढ़े करनून ने मदद के लिए मलम्मा को आवाज़ लगाईं, इसके बाद उसकी आवाज़ चीख में बदल गई जो तेज़ हवा और बारिश के shot में दब कर रह गई. lawn में भरे पानी और कीचड़ के साथ करनून का खून भी फैलने लगा. अंदर तकिये से कान और चेहरा ढकने के बाद मलम्मा को अंततः चैन की नींद आ गई थी.
•••
वेदान्त बेख़बर सोया हुआ था. उसे अजीब से सपने आ रहे थे. सपने में वो खुद को उस cottage में उठ कर घूमते हुए देख रहा था. बाहर बारिश और हवा हल्की हो चुकी थी हालांकि वातावरण में ठंड काफी ज्यादा बढ़ गई थी. सुबह होने को थी. सपने में ही उसने cottage की doorbell बजती सुनी और खुद को cottage का मुख्य दरवाज़ा खोलते देखा. सामने एक लडकी खड़ी थी. वेदान्त ने उस चेहरे को पहले कभी नहीं देखा था. वो लडकी उसके लिए नितांत अनजान और अजनबी थी. लड़की खूबसूरत और गोरी थी लेकिन उस लड़की की आखों के चारों तरफ गहरे dark circle थे जो उसकी fair skin की वजह से और गहरे दिखाई दे रहे थे. सपने में वेदान्त खुद को उस लड़की से बात करते देख रहा था लेकिन दोनों के बीच क्या बात हो रही थी ये वो सुन नहीं पाया. लड़की भाव-भंगिमा से nervous और घबराई हुई दिखाई दे रही थी. वेदान्त ने देखा कि बात करने के बाद वो उस लड़की को cottage के अंदर आने दे रहा है और उसके पीछे से दरवाज़ा बंद कर रहा है. इसके बाद सपना धूमिल पड़ता गया और वेदान्त का दिमाग एक बार फिर से गहरी नींद में डूब गया.
जब वेदान्त की नींद खुली तब बाहर उजाला हो चुका था. उसने bed पर हाथ फिराया, वो अकेला ही सोया हुआ था. वो अपने आप को बुरी तरह थका हुआ महसूस कर रहा था. सारी रात सोने के बावजूद उसका शरीर बुरी तरह दर्द कर रहा था और दिमाग बोझिल और थका हुआ था. उसे भोर का अपना अजीब सा सपना याद आया. उसने आखें बंद कर लीं. उसकी आखों के सामने पिछली रात के दृश्य उभरे जहाँ उसने खुद को उस लड़की के साथ intimate होते देखा था जिसे उसने lift दी थी. क्या वो लड़की सच में कल रात उसके पास आई थी? लेकिन ऐसा कैसे हो सकता था, वो cottage में अकेला था. यानी रात जो कुछ भी घटित हुआ वो सिर्फ उसकी sexual fantasy थी. वेदान्त को उस लड़की का स्पर्श, उसके साथ intercourse करने की अनुभूति बिलकुल वास्तविक प्रतीत हुई थी. वो चरमोत्कर्ष उसकी कल्पना की उपज कैसे हो सकता था. वो bed पर उठ बैठा और room में चारों तरफ देखने लगा, वहां कोई नहीं था. वेदान्त उठा और bedroom से निकल कर पूरी cottage छान मारी. उसे जो हल्की सी उम्मीद थी कि शायद वो लड़की cottage में ही कहीं हो वो भी टूट गई, cottage अंदर से बंद थी. यकीनन थकान, बुखार और over stress की वजह से उसने वो सबकुछ इतना सजीव घटित होता महसूस किया था. इसमें बड़ा हाथ calendula cottage के रहस्यमई वातावरण का भी था. वेदान्त का बुखार उतर चुका था, बल्कि उसकी नींद ही इस वजह से खुली थी क्योंकि उसे अपना शरीर ठंडा पड़ता महसूस हो रहा था. उसने ध्यान दिया कि उसने नीचे jeans पहनी हुई है जबकि उसे अच्छी तरह याद था कि वो रात बिना कपड़ों के सोया था. वेदान्त का ध्यान अपनी jeans के bottom और अपने पैरों पर गया जिनपर कीचड़ लगा हुआ था. उसने अपने पीछे मुड़ कर देखा वो room से चलते हुए और अपने पीछे फर्श पर कीचड़ से बने foot prints का trail छोड़ते आ रहा था. अब जाकर वेदान्त का ध्यान इस बात पर गया कि उसके शरीर, बालों और jeans में नमी थी. इसका मतलब क्या कल रात वो नींद में cottage से बाहर गया था? वेदान्त ने दिमाग पर ज़ोर डालने की कोशिश की, उसे कुछ याद ना आया. अंततः उसने give-up कर दिया और washroom में जाकर खुद को साफ़ किया. साफ़ सूखे कपड़े पहन कर वो kitchen में पहुंचा. अपने साथ लाए सामान में वो coffee powder भी लेता आया था यह गनीमत थी. उसने अपने लिए एक black coffee बनाई, अपने दारु के stock में से उसने brandy की bottle बरामद की और अपनी black coffee में brandy मिला कर living room में आ बैठा. उसने एक cigarette सुलगा लिया और उसके कश लगाता हुआ coffee की चुस्कियां लेने लगा. बाहर अब ठीक-ठाक उजाला हो चुका था. Living hall के दोनों ओर बड़ी आदमकद खिडकियों के शीशों पर पानी की बूँदें फिसल रही थीं जिनके धुंधले आवरण के पार calendula के फूल और बारिश से धुली हरियाली और उसके पार पहाड़ी से मिलते हुए घने बादलों की सुबह जिसका रंग वैसा ही था जैसा किसी painter के paint brush धुलने के बाद पानी का होता है. वेदान्त ने centre table पर रखी अपनी sketchbook उठाई और पिछली रात का अपना अधूरा sketch देखने लगा. उसने महसूस किया कि sketch अच्छा बन रहा था लेकिन फिर भी उस लड़की की ख़ूबसूरती वो हूबहू paper पर नहीं उतार पाया था. Sketch उस लड़की से काफी अलग लग रहा था. वेदान्त ने अपनी charcoal pencil उठाई और उस अधूरे sketch को पूरा करने लगा. काफी देर तक वो sketch में ही डूबा रहा, उसका ध्यान लगातार बजती doorbell से भंग हुआ. बाहर कोई घंटी की rope खींच रहा था. वेदान्त ने अपनी wrist watch देखी, सुबह के आठ बज रहे थे. उसने living hall का दरवाज़ा खोला. दो पल के लिए तो वेदान्त को अपनी नज़रों पर यकीन नहीं हुआ. सामने वो ही लड़की खड़ी थी जिसका वो अभी sketch बना कर हटा था, जिसे वो पिछली रात भर fantasize करता रहा था.
Chapter 2
महागुना थाना incharge Senior Police Inspector आद्रिका अष्टपुत्रे paracetamol और zinc hydrochloride tablets खाई. ये मौसम उसे ख़ासा परेशान कर रहा था, उसकी सर्दी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी. उसपर से यह बारिश. ऐसे में दुनिया की आखरी मुसीबत जिसकी वो कल्पना कर सकती थी वो उसकी नज़रों के सामने थी, एक ऐसी लाश जिसे देख कर यह पता कर पाना मुश्किल था कि उसकी ह्त्या करने वाला कोई इंसान था या जानवर. सुबह छे बजे उठने पर मलम्मा को करनून की लाश उसके घर के सामने lawn में खून और कीचड़ में सनी हुई पड़ी मिली थी. उसकी छाती जैसे पंजों से चीर कर फाड़ी गई थी और गर्दन अप्राकृतिक कोण पर मुड़ी हुई थी जैसे एक ही झटके में मरोड़ दी गई हो. कुछ ही मिनटों में मलम्मा ने चीख-चीख कर आस-पास के लोगों को जुटा लिया था. Police call करने के लगभग आधे घंटे में वहां पहुंची थी. Police team को inspector Thomas Luis ले कर आया था. उसी ने आद्रिका को call कर के murder की report दी थी और आद्रिका आधे घंटे में अपने officer’s quarter से crime scene पर अपनी bullet से पहुंची थी.
Thomas की उम्र मुश्किल से 24 साल होगी. Young, enthusiastic और dedicated police officer के criteria पर thomas बिलकुल fit बैठता था. वो महागुना का ही local लड़का था, उन पहाड़ों में ही पला बड़ा हुआ था. वहां कोई ऐसा व्यक्ति या परिवार नहीं था जो thomas को ना जानता हो या जिसे thomas ना जानता हो. वहां के लोगों के लिए thomas police officer से ज्यादा उनके घर का लड़का था और खुद thomas भी यही मानता था. महागुना में crime rate बहुत ही कम था. वहां चोरियां नहीं होती थी, ना ही खून या दूसरे बड़े अपराध. वहां के थाने में missing person complaint आना ही बड़ी बात थी. ऐसे में करनून की ह्त्या महागुना hills में घटी काफी बड़ी वारदात थी.
मलम्मा पछाड़ खा-खा के रो रही थी. आस-पड़ोस की औरतें उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं. पर उसे संभाल पाना मुश्किल था. Thomas खुद जा कर मलम्मा को चुप कराने की कोशिश कर रहा था. बूढ़ी मलम्मा उससे किसी बच्चे की तरह लिपट कर फूट-फूट के रोने लगी. Thomas उसे लगातार संभालने और चुप कराने की कोशिश कर रहा था.
- “अम्मा! नहीं अम्मा! ऐसे नहीं रोते”.
- “Thomas. देख मेरे बुड्ढे को कोई कितना बेरहमी से मार दिया”.
- “हम है ना अम्मा! आप चुप हो जाओ, हम पता लगाएंगे किसने किया. देखो बड़ी officer madam आई हैं ना, इनसे कोई भी criminal नहीं बचता”.
आद्रिका ने एक नज़र thomas पर डाली. उसका दिल उसे झाड़ लगाने को कर रहा था लेकिन फिलहाल उसके कोप का भाजन वो police photographer बना जो lawn के कीचड़ में कूद-कूद कर लाश का photograph कर रहा था.
- “इतनी जल्दी है click करने की तो wedding photographer बनना था ना? बारात में आया है? दूल्हे के दोस्तों का नागिन dance cover कर के शाही पनीर और कचौरी खाने जाना है तेरे को”?
Photographer हडबडा गया, फिर संभलता हुआ बोला.
- “I…I’m sorry Ma’am”.
- “एक तो बारिश और कीचड़ की वजह से वैसे ही crime scene की ऐसी-तैसी हुई पड़ी है, उसपर से तू और गरबा खेल ले यहाँ”.
- “Really sorry madam…म..मैं ठीक से करता हूँ”.
- “Neck wound और chest के close-ups लो… बिना crime scene contaminate किए हुए”.
Photographer अब हर कदम यूं रख के काम कर रहा था जैसे उसके नीचे landmines बिछी हुई हों.Thomas मौके की नजाकत को भांपते हुए मलम्मा को पड़ोस की औरतों के हवाले कर अपनी senior के पास पहुंचा. Thomas के लिए आद्रिका role model थी. आद्रिका thomas से मुश्किल से चार-पांच साल बड़ी थी लेकिन आद्रिका की respect करने की वजह thomas के लिए सिर्फ आद्रिका का बड़ा या senior होना नहीं था.
आद्रिका को पिछले साल 10 Most influential Indian Women Under 30 में तीसरा स्थान मिला था. अपनी मुंबई और गोवा postings के दौरान उसने वहां के drug cartels और underworld nexus को almost जड़ से खत्म कर दिया था जिसकी वजह से काफी high profile and white collar criminals खतरे में आ गए थे. यही कारण था कि आद्रिका का transfer महागुना जैसी जगह पर कर दिया गया था जहाँ का crime graph zero था. Thomas आद्रिका के dedication और उसकी कर्तव्यनिष्ठा से ख़ासा प्रभावित था और उसके जैसा ही जुझारू और ईमानदार police officer बनने की कोशिश करता था. Thomas को पास आता देख आद्रिका बोली.
- “इसकी wife का statement ले लिया”?
- “जी ma’am”.
- “हम्म…आस-पड़ोस के लोगों का भी ले लो. शायद किसी ने कुछ देखा हो, शायद कोई clue मिल जाए”.
- “कल रात तूफ़ान के साथ बारिश आई थी ma’am. सभी लोग अपने घरों में थे. किसी ने कुछ नहीं देखा या सुना”.
- “हम्म्म….”
आद्रिका लाश के करीब बैठ कर उसकी गर्दन पर निशानों और उसकी फटी हुई छाती ध्यान से देख रही थी. thomas उसके पास बैठते हुए बोला.
- “आपको क्या लगता है आद्रि ma’am, ये किसका काम होगा”?
- “कहना मुश्किल है thomas. गर्दन पर इन निशानों को देखो. इसके गर्दन से पकड़ कर इसकी गर्दन एक झटके में मरोड़ दी गई है”.
- “इसके लिए inhuman strength चाहिए. या फिर कोई बहुत ही ज्यादा ताकतवर इंसान. bodybuilder, wrestler, weightlifter जैसे …या फिर ये किसी इंसान का काम है ही नहीं? ये किसी जानवर का काम हो सकता है ma’am. देखिए जिस तरह इसका सीना फाड़ा गया है ”.
Thomas अपना चेहरा लाश के फटे सीने के करीब ले जाते हुए बोला. आद्रिका सोच में पड़ी हुई थी.
- “यही तो परेशान करने वाली बात है thomas. गर्दन पर जो निशान हैं वो blunt हैं, जैसे इंसान की उँगलियों के होते हैं लेकिन इन उँगलियों से सीना इस तरह नहीं फाड़ा जा सकता. हाँ ये हो सकता है कि जिसने भी ये खून किया है वो अपने साथ कोई खूंखार जानवर लेकर यहाँ आया हो”.
- “पता नहीं ma’am. एक बूढ़े retired school clerk को मारने के लिए कोई इतनी ज़हमत क्यों उठाएगा”?
- “कोई तो वजह होगी thomas. रात की बारिश और तूफ़ान ने crime scene बर्बाद कर दिया है. Dead body से भी कुछ ख़ास पता चलने की उम्मीद नहीं है फिर भी इसे postmortem के लिए forensic lab भेजने की व्यवस्था करो”.
- “Yes ma’am”.
- “मैं तबतक breakfast का कोई इंतजाम देखती हूँ. सुबह उठकर मौका ही नहीं मिला इसके बारे में सोचने का”.
•••
वेदान्त लड़की को देखकर बुरी तरह चौंका था जबकि लड़की उसे देखकर बिलकुल सहज थी. हकीकत में उस घड़ी लड़की का चेहरा बिलकुल भावहीन था.
- “Granny ने भेजा है मुझे काम करने के लिए”.
वेदान्त को यकीन नहीं हो रहा था, उसने लड़की से पुष्टि करने के लिए पूछा.
- “तुम्हे Julia Rodrigues ने भेजा है?
- “नहीं! Julia Roberts ने भेजा है. वो चाहती है कि तुम Pretty Woman का sequel बनाओ और बतौर lead मुझे cast करो”.
वेदान्त confused सा बोला.
- “तुम मज़ाक कर रही हो, right”?
लड़की के facial expression अब भी बिलकुल blank थे.
- “क्यों तुम्हे मज़ा आ रहा है”?
वेदान्त awkward सा उसे देखता रह गया. लड़की ने उसे देख कर पलकें झपकाई और फिर सर हिलाते हुए बोली.
- “Look Mr. Vedant, granny ने मुझे cooking and caretaking का बोला था, if you are looking for stand-up comic sessions as well, it’s gonna cost you extra bucks”.
वेदान्त इस बार उसका sarcasm समझ गया और हडबडाते हुए बोला.
- “I’m extremly sorry. मैं समझ नहीं पाया था कि तुम ही aunt Julia की granddaughter हो. Please come inside”.
वेदान्त दरवाज़े से एक तरफ हट गया,लड़की मुस्कुराते हुए अन्दर आई.
- “कल तुमने अपना नाम नहीं बताया था”.
- “What’s in a name? that which we call a rose. By any other name would smell as sweet”.
लड़की ने यूं expression देते हुए कहा जैसे वो कोई stage play enact कर रही है. वेदान्त उसे पहले की तरह ही blank expressions से देख रहा था. लड़की ने यूं सर झटका जैसे वो वेदान्त से अपने इस performance पर बेहतर reaction की उम्मीद कर रही थी.
- “Romeo and Juliet…William Shakespeare ने कहा था”.
लड़की मुंह बनाते हुए बोली. वेदान्त मुस्कुराया.
- “ठीक है रामू काका, सबसे पहले breakfast बना दो”.
- “रामू काका!! मैं तुम्हे किस angle से रामू काका दिखती हूँ”?
- “अरे! तुमने ही तो कहा, ‘If we call a rose by any other name would smell as sweet’. तो क्या फर्क पड़ता है कि मैं तुम्हे रामू काका बुलाऊं या….”
वेदान्त ने जान बूझकर वाक्य अधूरा छोड़ दिया और मुस्कुराया. लड़की मुंह बिचकाते हुए बोली.
- “एनी …एनी नाम है मेरा…एनी with ‘Y’”.
- Okay! Please to meet you एनी with ‘Y’. I hope your culinary skills ain’t as blunt as your sarcasm”.
एनी मुस्कुराई और इस बार बिना कुछ बोले kitchen की ओर बढ़ गई. लगभग फ़ौरन ही वो उलटे पैर वापस आई और बहुत ही मासूमियत से बोली.
- “खाने में तुम्हारे cigarettes fry कर के vodka के sauce के साथ दे दूं? क्योंकि कुछ और तो है नहीं पकाने को kitchen में और जैसा कि मैं देख रही हूँ तुम अपने साथ cigarette और शराब के अलावा कुछ लाए भी नहीं हो”.
इस बार वेदान्त को वाकई उसके इतना blunt होने पर गुस्सा आ गया. वो कड़े और रूखे स्वर में बोला.
- “Cooking और caretaking के लिए तुम्हे रखा गया है, जिसके लिए तुम्हारी Aunty गैरवाजिब हज़ार रूपए प्रतिदिन वसूल रही है और खाने का सामान मैं ले कर आऊ”?
एनी का चेहरा उतर गया. वो धीरे से बोली.
- “I’m sorry. मुझे ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. मैं नीचे town से सामान लेकर आती हूँ”.
वेदान्त को लगा कि वो कुछ ज्यादा ही सख्त हो गया. उसने अपना लहज़ा थोड़ा नर्म करते हुए कहा.
- “It’s alright. तुम फिर से 5 kilometer पैदल चल के जाओगी और वापस आओगी? इससे बेहतर है कि मुझे grocery list बना कर दे दो मैं गाड़ी से ले आता हूँ”.
लड़की ने pen paper उठाया और फटाफट एक list बनाकर वेदान्त को थमाते हुए बोली.
- “इसमें से ज़्यादातर चीज़ें नीचे मलम्मा के grocery store में मिल जाएंगी. पास ही bakery भी है”.
वेदान्त ने सहमति में सर हिलाया और गाड़ी की चाभियाँ लेकर cottage से बाहर निकला. एनी की नज़रें लगातार वेदान्त को ही follow कर रही थीं. वेदान्त ने एक-बार भी उससे eye contact नहीं किया. वो बाहर निकल कर SUV में सवार हुआ. एनी cottage के दरवाज़े पर खड़े-खड़े ही चिल्लाई.
- “मैं तबतक तुम्हारा सामान ठीक से रख दूं”?
वेदान्त ने सहमती में सर हिलाया और गाड़ी start कर के वहां से निकल गया. नीचे homestays की कतार के पास पहुँच कर वेदान्त ने अपनी गाड़ी एक खाली जगह देखकर park की और पैदल ही आगे बढ़ गया. थोड़ा ही आगे बढ़ने पर उसे मलम्मा का grocery store दिखाई दिया जोकि बंद था और बगल में ही उसके घर पर लोगों की भीड़ लगी हुई थी. एक ambulance और कुछ police vehicles खड़े थे और आस-पास कई police वाले नजर आ रहे थे. वेदान्त कुछ देर वहां खड़ा ये समझने की कोशिश करता रहा कि माजरा क्या है. दूसरों के मामले में ना पड़ना उसकी आदत थी. वो वहां से आगे बढ़ गया. कुछ ही दूरी पर एक bakery shop दिखाई दी जिसके glass door पर open का sign था. अन्दर display counter के पीछे एक बूढी औरत खड़ी थी. जिसकी उम्र लगभग Mrs. Rodrigues जितनी होगी, लेकिन शारीरिक संरचना उससे बिलकुल विपरीत थी. महिला की hight 5’5 होगी, चेहरा पतला और लम्बा था और नाक गिद्ध के जैसी लम्बी, नोकीली और मुड़ी हुई थी जिसपर पतले golden rim का round frame glass टिका हुआ था जो देखने से काफी महंगा लग रहा था. उसके लहरदार बाल कंधों तक लम्बे थे और उसने बंद collar neck का एक knee length तक का gown पहना हुआ था. उसका चेहरा सख्त और रूखा था जिसपर वेदान्त को देखते ही एक भावहीन plastic smile उभरी.
- “Good morning Sir. What would you like to have”?
वेदान्त ने देखा कि वहाँ counter के आगे थोड़ी space थी जहाँ चार tables लगी हुई थीं. एक table पर दो police वाले बैठे हुए थे. दोनों ही काफी कम उम्र के, उनमे से लड़की senior थी और आम महिला police officers से काफी अलग दिखती थी. अगर वो वर्दी में ना होती तो उसे देखकर कोई कह नहीं सकता था कि वो police वाली है. कोई भी उसे college student समझ के धोखा खा सकता था. लड़के की उम्र लड़की से भी कम थी और वो नया-नया police officer बना दिखाई दे रहा था. दोनों के सामने table पर sandwich, apple pie और coffee रखी हुई थी. वेदान्त ने देखा कि उनकी नज़रें उसपर ही टिकी हुई थीं. वो उन दोनों को नज़रंदाज़ करते हुए counter की तरफ बढ़ गया. Counter पर कड़ी महिला की नकली मुस्कान थोड़ी और खिंची.
- “Apple pie is just out of the owen, Sir. Would you like to try some”?
वेदान्त ने अपनी pocket से list निकाल के उसकी ओर बढ़ाई. उस महिला ने list लेकर कुछ देर तक देखी. उसने अपनी नाक पर चश्मा adjust किया. फिर उसने एक नज़र वेदान्त पर डाली और दोबारा अपने चश्मे को adjust कर के list पढ़ने की कोशिश की, उसके बाद खेदपूर्वक list वेदान्त को पकड़ाते हुए बोली.
- “I’m sorry Sir. मैं यह पढ़ नहीं पा रही”.
वेदान्त को यह बात बहुत अजीब लगी. एनी ने list काफी साफ़ और स्पष्ट लिखी थी. वेदान्त ने मन ही मन सोचा कि बुढ़िया को महंगे glass frame की जगह glass number जांच कराने की ज़रूरत थी. उसने list में लिखी सामग्री उस महिला को बताई. बुढ़िया पूरी तत्परता से उसका सामान pack करने में लग गई. वेदान्त ने झिझकते हुए उससे पूछा.
- “ये मलम्मा के store पर कुछ हुआ है क्या”?
बुढ़िया ने चौंक कर उसे ऐसा reaction दिया जैसे यह बात ना जानकार वेदान्त ने कोई बड़ी गलती की है.
- “Don’t you know? Last night someone killed that poor woman’s oldman”.
- “Ohh! मुझे पता नहीं था”.
- “बहुत brutally मारा है man!Looks more like a devil’s play”.
Egg crate pack करते हुए बुढ़िया यूं फुसफुसा कर बोली जैसे कोई बहुत ही राज़ की बात बता रही हो जिसे अगर किसी और ने सुन लिया तो खुद उसकी जान को खतरा हो सकता था. उसी समय police वाला उठ कर counter पर आया, बुढ़िया हडबडा गई. वो जानती थी कि उस police वाले ने उसकी बात सुन ली है. प्रत्यक्षतः उसने police वाले को सुनाते हुए कहा.
- “हमारा thomas investigate कर रहा है case, we are proud of him. Thomas बहुत smart है, ये जल्दी ही killer को पकड़ लेगा”.
Police वाले ने एक सहज अनौपचारिक मुस्कान उस महिला और वेदान्त को दी. वेदान्त भी उसे देख कर हल्के से सर हिला कर मुस्कुराया. Police वाले ने अपना हाथ वेदान्त की ओर बढाया.
- “Inspector Thomas Luis”.
- “वेदान्त गर्ग. Nice meeting you inspector”.
- “Same here. आप यहाँ पास ही रुके हुए हैं”?
वेदान्त ने महसूस किया कि thomas ने वो सवाल काफी casually पूछने की कोशिश की थी लेकिन अपने पुलिसिया लहज़े को छुपा नहीं पाया था. वेदान्त ने बुढ़िया की ओर देखा, वो उसका सामान एक-एक कर बड़े brown paperbags में रख रही थी लेकिन उसके कान वेदान्त और thomas के conversation पर ही लगे हुए थे. वेदान्त संभलते हुए बोला.
- “Calendula Cottage”.
उसने देखा कि बुढ़िया और thomas दोनों ही उसकी बात पर चौंके थे. हालांकि बुढ़िया ने अपने भाव फ़ौरन ही संभाल लिए और ऐसे दिखाने लगी जैसे वो काम में तल्लीन है जबकि अब उसका ध्यान उनकी बातों पर पहले से भी ज्यादा था.
- “Calendula Cottage? Mrs. Rodrigues वाली”?
- “हाँ. मैंने वो cottage खरीद ली है. कल ही shift हुआ हूँ. उम्मीद कर रहा कि मेरा सामान भी आज-कल में आ जाए”.
वेदान्त ने ध्यान दिया कि thomas उससे आगे भी सवाल करना चाहता था लेकिन रुक गया. उसने बुढ़िया से कहा.
- “Maple, can we have two apple pies on the table”?
- “Sure thomas. Coming in two minutes”.
Maple ने brown bags वेदान्त के हवाले किए और उनका payment लेकर thomas की apple pie लाने bakery counter के पीछे बने दरवाज़े से अंदर कहीं चली गई. वेदान्त ने bags उठाए और बिना thomas से नज़रें मिलाए दरवाज़े की ओर बढ़ा. वो मन ही मन मना रहा था कि thomas उसे ना टोके और वो धीरे से वहां से बाहर खिसक जाए.
- “फिर मुलाकात होगी mister वेदान्त. अब तो आप neighbourhood में ही रहेंगे”.
- “Police से मुलाक़ात की नौबत से हर इंसान बचना चाहता है…है न thomas? Have a nice day”.
- “Same to you mister Vedant”.
वेदान्त ने हल्के से सर हिला कर उसका अभिवादन स्वीकार किया और तेज़ कदमों से चलता हुआ वहाँ से बाहर निकल गया. Thomas वापस table पर आकर आद्रिका के सामने बैठ गया. आद्रिका ने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा. Thomas ने वेदान्त से हुई संक्षिप्त वार्ता आद्रिका को सुनाते हुए कहा.
- “काफी अजीब सा आदमी है. ऐसा लग रहा था जैसे हमें देखकर हडबडा गया हो”.
- “Police को देखकर अक्सर लोगों का यही reaction होता है thomas. इसमें कोई बड़ी बात नहीं”.
- “हाँ बड़ी बात उसका Calendula cottage खरीदना है. उस टूटे हुए खँडहर के कोई पास भी नहीं जाता. I wonder mrs. Rodrigues ने इसे कैसे फांसा होगा”.
आद्रिका ने अपनी coffee sip करते हुए पूछा.
- “ये Calendula cottage की क्या कहानी है thomas”?
- “महागुना बहुत छोटा सा town है ma’am. देश और बाकी दुनिया से कटा हुआ. यहाँ के लोग अच्छे हैं, सीधे-साधे, खुशमिजाज़ और मिलनसार और सबसे बढ़कर अपनी जड़ों से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं, यहाँ आज भी पुरानी मान्यताओं और दंत कथाओं को लोग सच मानते हैं. ऐसी ही कुछ दंत कथाएँ Calendula cottage के साथ भी जुड़ी हुई हैं”.
- “हम्म…फिलहाल किसी खँडहर से जुड़ी दंत कथा में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं नहीं चाहती कि करनून की हत्या भी महागुना की दंत कथाओं में शुमार हो जाए. अभी कुछ दिनों पहले आई missing child complaint का कुछ हुआ नहीं और अब ये नई मुसीबत”.
आद्रिका अपनी coffee ख़त्म करते हुए बोली. Maple एक tray में apple pie ले आई. आद्रिका और thomas दोनों खामोश हो गए. Maple ने tray table पर रखी, उसके mannerism और expression से लग रहा था जैसे वो कुछ कहना चाहती है पर झिझक रही है. आद्रिका और thomas से कोई प्रतिक्रिया या प्रोत्साहन ना मिलने पर Maple वापस जाने को मुड़ी लेकिन फिर कुछ निश्चय कर के पलट कर उनसे बोली.
- “वो Calendula cottage दोबारा नहीं खुलनी चाहिए थी. I must tell you thomas, ये किसी इंसान का काम नहीं है….it’s that evil spirit. अगर उस cottage को फिर से बंद नहीं किया तो अभी और भी जानें जाएंगी”.
अपनी बात ख़त्म कर के Maple यूं तेज़ क़दमों से चलते हुए वहाँ से गायब हो गई जैसे उसे डर था कि उसकी बात दोनों police वालों में से कोई उसे पलट कर कुछ सुना देगा. आद्रिका ने एकबार फिर प्रश्नवाचक नज़रों से thomas को देखा. Thomas के चेहरे से पता चल रहा था कि वो बुरी तरह झेप गया था. उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला पर आद्रिका ने उसे पहले ही चुप करा दिया.
- “दंत कथाएँ, I get that….apple pie खत्म करते हैं और काम पर चलते हैं”.
दोनों चुपचाप खाने में लग गए.
•••
वेदान्त सामान लेकर वापस cottage पहुंचा. एनी उसे kitchen की सफाई करती हुई मिली. उसका bedroom, living room और बाकी area वो साफ़ सुथरा और well arranged कर चुकी थी. वेदान्त ने आने के बाद अपने कपड़े और लाया हुआ बाकी सामान बेतरतीबी से इधर-उधर बिखराया हुआ था. एनी सबकुछ व्यवस्थित कर चुकी थी. कपड़े bedroom में cupboard में ढंग से fold कर के रख दिए गए थे. Dining area में एक शीशम का आदमकद cabinet था जो वेदान्त के वहां आने पर उसे धूल से भरा हुआ और खाली दिखाई दिया था. अब वो rack बिलकुल नए सा चमक रहा था. वेदान्त की liquor bottles, glasses, jiggers and shakers, cigarette packs बहुत ही ढंग से उसपर arrange किए हुए थे. देखने में अब वो cabinet किसी elite bar का display लग रहा था. वेदान्त मन ही मन एनी की तारीफ किए बिना ना रह पाया. Kitchen भी पहले से कहीं ज्यादा साफ़-सुथरा और well organized लग रहा था. वेदान्त ने ध्यान दिया कि एनी ने kitchen, living area, bed room, liquor cabinet हर जगह cottage के बाहर से तोड़े हुए calendula flowers लगाए हैं. वेदान्त मुस्कुराए बिना ना रह सका. उसकी यह मुस्कराहट सिर्फ होठों की हरकत नहीं थी, जाने कितने दिनों बाद उसके मन ने उसके थके होठों को मुस्कुराने की वजह और इजाज़त दोनों दी थी. Bakery से लाया सारा सामान वेदान्त ने kitchen में slab पर रख दिया. एनी सामान देखते हुए बोली.
- “ये तो सिर्फ bakery का सामान है. Grocery store नहीं गए थे क्या”?
वेदान्त ने उसे सारा किस्सा सुनाया.
- “O my God! करनून और मलम्मा को यहाँ हर कोई जानता है. अच्छे लोग हैं. मैं जब school में पढ़ती थी तब करनून वहां head clerk था. He was a good man. किसी ने क्यों मारा होगा उसे”?
- “पता नहीं, police पता लगा रही है. तुम तो सुबह नीचे से ही आई थी ना एनी . तुम्हे इस हंगामे का पता कैसे नहीं चला”?
- “मैं सुबह काफी जल्दी घर से निकल गई थी, भोर होते ही. यहाँ पहाड़ी पर आ कर सुबह को रात की भीगी हुई चादर उतार कर अलसाए हुए उठते देखती रही. आपकी नींद खराब नहीं करना चाहती थी इसलिए बाहर garden में ही बैठी रही”.
- “ओस में भीगते हुए! पागल हो क्या? तबियत खराब हो जाती तो”?
एनी जवाब में सिर्फ वेदान्त को देखकर मुस्कुराई. उसकी बच्चों सी शरारती लेकिन उदास आखों की हंसी जैसे वेदान्त से कुछ कहने को हुई लेकिन फिर किसी बात ने जैसे उसका मन बदल दिया.
- “मैं breakfast ready करती हूँ”.
वेदान्त बाहर living area में आ गया. उसका ध्यान table पर रखी अपनी sketchbook पर गया. sketchbook के आस-पास उसकी charcoal pencils, eraser, scrapping knife, butter sheets वगैरह बहुत ही करीने से arrange कर के रखे गए थे लेकिन उसकी sketchbook खुली हुई थी. उसपर एनी का वो portrait खुला हुआ था जिसे वेदान्त सुबह पूरा कर रहा था.
- “You are such a gifted artist. I’m sorry मैंने आपकी sketchbook आपकी permission के बिना देख ली, I hope you won’t mind. It was so good that I couldn’t help digging into it”.
एनी एक tray में breakfast सजाए हुए kitchen से बाहर निकली. उसकी गहरी भूरी आखें वेदान्त पर ही टिकी हुई थीं जैसे उसके मनोभाव पढ़ने की कोशिश कर रही हो. वेदान्त समझ गया कि एनी ने उसकी पूरी sketchbook देखने ने बाद अपने sketch वाला page जान बूझ कर खोल के ऊपर रखा है ताकि वेदान्त को पता चल जाए कि वो उसका बनाया हुआ अपना portrait देख चुकी है. एनी ने garlic toasts, scrambled eggs, muffins और coffee dining table पर serve कर दिए.
- “सिर्फ एक plate क्यों है यहाँ? तुम नहीं खा रही”?
वेदान्त ने dining table पर सिर्फ अपने लिए लगीplate देखकर पूछा.
- “I don’t feel like eating. आप खाइए मैं बाद में खा लूंगी”.
वेदान्त बिना कुछ बोले kitchen में गया और एक plate लाकर एनी के लिए उसमे खाना निकाल कर table पर रखते हुए बोला.
- “Sit and eat”.
एनी झिझकी हुई सी अपनी ही जगह पर खड़ी हुई थी. वेदान्त के एक bite लिया और coffee sip करते हुए बोला.
- “मुझे उम्मीद बिलकुल नहीं थी लेकिन खाना बहुत ही उम्दा बना हुआ है. Scrambled eggs बहुत ही हैं soft हैं, बिलकुल जैसे मुझे पसंद हैं. वरना लोग scrambled eggs के नाम पर जो अंडे की roadsides पर मिलने वाली भुर्जी बनाते हैं…I just hate that”.
अपनी तारीफ़ सुनकर एनी की आखें किसी बच्चे की तरह चमक उठी. वेदान्त ने garlic toast की एक bite लेते हुए आगे कहा.
- “Mmmm…tell me something एनी . Are you psychic? How do you know to do things exactly the way I like them? Garlic toast का crunch, उसपर butter की layer, coffee में amount of sugar and milk…everything is just…perfect ”!!
- “I guess that’s just the way I prefer things”.
एनी blush करते हुए बोली. उस समय वो वेदान्त को किसी छोटी बच्ची जैसी लग रही थी जो अपने class teacher द्वारा अपनी बढ़ाई किए जाने पर मन ही मन फूली ना समा रही हो लेकिन फिर भी ऊपर से खुद को शांत दिखाने की कोशिश करती हो.
- “Now c’mon…sit and eat. इतना अच्छा खाना मैं अकेले बैठ के न्बहीं खाने वाला. Besides, I need to be sure कि तुमने खाने में ज़हर नहीं मिलाया है”.
उसकी बात से एनी बुरी तरह हडबडा गई. वेदान्त मुस्कुराया.
- “Relax, it was a joke. Now, sit and eat”.
- “हमारे food preferences ही नहीं हमारा sense of humor भी बिलकुल एक जैसा है…totally crap”.
कहते हुए एनी वेदान्त के बगल वाली chair पर बैठ गई. उसकी नज़रें…बच्चों जैसी कौतूहल भरी नज़रें वेदान्त के चेहरे पर जैसे उसकी बात की प्रतिक्रिया तलाश रही थीं. वेदान्त सिर्फ उसे देखकर मुस्कुराया और खाने में तल्लीन हो गया. उसने ध्यान दिया कि एनी खाना बिलकुल छोटे बच्चों की तरह खा रही थी. खाते समय वो chair पर आगे-पीछे हिल रही थी जैसे बच्चे करते हैं. वेदान्त मुस्कुराए बिना नहीं रह पाया.
- “बचपन में मैंने माँ से इस बात के लिए बहुत डांट खाई है. मान कहती थीं कि ऐसे हिलते हुए खाना बुरी बात है, खाना शरीर को नहीं लगता”.
- “फिर तो ये अच्छी बात है, मैं कभी मोटी नहीं होउंगी”.
एनी बच्चों की तरह खिलखिलाती रही और वैसे ही आगे-पीछे हिलते हुए अपना खाना खाते रही, उसकी चमकी हुई शरारती आखें वेदान्त पर टिकी हुई थीं.
- “Now I can understand why you are this skinny”.
वेदान्त एनी को tease करते हुए बोला. एनी फिर से बच्चों जैसे खिलखिलाई और सांस खींच कर अपना पेट फुलाते हुए बोली.
- “See, I’m not skinny. I’ve this much of baby fat”.
वेदान्त भी उसके साथ खिलखिला कर हस दिया. Breakfast ख़त्म करने के बाद एनी अपनी और वेदान्त की plate उठाने लगी. वेदान्त ने उसे रोक दिया.
- “Don’t do this. मुझे पसंद नहीं कि कोई मेरी खाई हुई plate उठाए. I prefer doing it myself”.
एनी ने प्रतिवाद करने को मुंह खोला ही था कि तबतक वेदान्त उठा और अपनी plate लेकर kitchen की तरफ बढ़ गया. वेदान्त ने अपनी plate kitchen sink में रखी. उसकी नज़र sink के नीचे रखे हुए dustbin पर गई. Dustbin में खाना फेंका हुआ था. पराठे, सब्ज़ी, दाल और rice. खाना बिलकुल fresh दिखाई दे रहा था. वेदान्त को यह बात बहुत अजीब लगी. Cottage में तो खाना बनाने का सामान ही नहीं था फिर खाना कहाँ से आया. क्या एनी अपने साथ खाना लेकर आई थी? वेदान्त को अच्छी तरह से याद था कि सुबह एनी खाली हाथ आई थी. उसके पास कोई tiffin नहीं था. फिर cottage में खाना कहाँ से आया? और fresh खाना dustbin में क्या कर रहा था? वेदान्त से सोचा वो इसके बारे में एनी से पूछेगा. उसी समय उसे kitchen window से बाहर एक बड़ा cargo truck cottage के compound gate के सामने आकर रुकता दिखाई दिया.
- “Packers and Movers वाले finally मेरा सामान ले आए. मैं बाहर ज़रा unloading कराता हूँ. I hope मेरे सभी canvas और paintings सही सलामत हों”.
वेदान्त kitchen से बाहर निकलते हुए एनी से बोला और तेज़ी से बाहर की ओर बढ़ गया. वेदान्त अपने सामान के लिए बहुत ज्यादा fanatic था. उसके सामान में लगभग आठ हज़ार किताबें थीं जो बड़े-बड़े और भारी cartons में pack होकर आई थीं. उसके अलावा छोटे-बड़े हर size के मिला के लगभग 500 canvas थे. अलग-अलग painting eisle, studio lights, writing desks और art studio का बाकी बड़ा सामान था जिसे एक truck driver और दो labours के साथ ठीक तरह से unload कराने और cottage में रखवाने में दोपहर बीत गई. इस दौरान वेदान्त को एनी कहीं दिखाई ना दी. उसने ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया और dustbin में खाने वाली बात तो बिलकुल ही उसके ध्यान से उतर गई. Truck driver Stanley नाम का एक लगभग 50 साल का लम्बा और तगड़ा गोवानी था. उसने horse shoe style में घनी मोटी मूछें रखी हुई थीं. उसका रंग उसके शरीर पर भरे हुए गहरे काले tattoo की ink से बस कुछ ही tone कम था. Stanley शुरू से ही वेदान्त को big brother बोल कर संबोधित कर रहा था. उसकी यह आदत वेदान्त को बुरी तरह irritate कर रही थी लेकिन फिर भी वेदान्त ने उसे कुछ नहीं कहा, आखिरकार उसकी जान से प्यारी किताबें और paintings वो सही-सलामत ले आया था. वेदान्त ने उसका हिसाब किया और अपनी तरफ से उसे सामान सही-सलामत लाने के लिए एक दो हज़ार का note ऊपर से पकड़ाया. दो हज़ार की बक्शीश पाकर दिन भर भारी cartons ढ़ोने की थकान से उतरा stanley का चेहरा खिल गया. हालांकि दोनों labours के चेहरे देखकर वेदान्त साफ़ समझ सकता था कि उनके हिस्से में कुछ नहीं आने वाला. उसने पांच सौ के दो-दो note उन दोनों को भी पकडाए, जिसपर दोनों ने stanley से भी चौड़ी और कृतज्ञ मुस्कान बिखेर कर उसे दिखाई. truck में सवार होते हुए भारी-भरकम stanley बोला.
- “Tell me something, big brother. ये इतना spooky cottage में तुमको अकेले रहने को डर नहीं लगेगा man”?
- “डर अब लोगों के साथ रहने में लगता है, यहाँ के अकेलेपन में जितना सुकून है वो किसी के साथ में नहीं”.
- “अपन का contact तेरे पास है big brother, कभी ज़रूरत पड़े तो बेझिझक याद करने का”.
- “Sure”!
Truck start हुई और वापस ढ़लान पर बढ़ गई. एक लेबर stanley से बोला.
- “इसका कोई nut ढीला है क्या? ऐसी जगह पर कौन रहने को आता है…वो भी अकेले”.
- “Writer और artist लोग पागल ही होते हैं…वैसे भी कोई पागल ही labours को हज़ार-हज़ार की बक्शीश दे सकता है”.
Stanley की बात पर कोई प्रतिक्रिया ना आई, दोनों labours ने अपने पैसे अच्छी तरह से अंटी में दबा लिए. वेदान्त cottage के अंदर पहुंचा. एनी उसके paint किए हुए कुछ canvas खोल के देख रही थी.
- “तुम कहाँ गायब हो गई थी”?
- “यहीं थी. आप सामान unload करा रहे थे तो मैं ऊपर चली गई थी. मुझे अनजान लोगों के सामने पड़ना असहज करता है”.
- “फिर भी तुमने कल एक अनजान इंसान से lift ले ली थी”?
- “कहा ना, आप खतरनाक नहीं लगे…सच कहूं तो अनजान भी नहीं लगे”.
वेदान्त ने एनी को देखा. वो उसकी आखों में देखकर मुस्कुरा रही थी. वेदान्त उसके कथन के पीछे छुपे मंतव्य को समझने की कोशिश पर रहा था. एनी ने बात बदलते हुए कहा.
- “ये सभी पेंटिंग्स आपकी बनाई हुई हैं”.
- “हाँ”.
- “बहुत ही ज्यादा खूबसूरत हैं, यू आर रियली टैलेंटेड एंड गॉड गिफ्टेड”.
तारीफ़ वेदान्त को हमेशा ही असहज करती थी. वो बस मुस्कुरा कर रह गया. उस समय एनी की आखों, उसके चेहरे उसके मैनरिज्म में बच्चों जैसा कौतुहल और उतावलापन था. वो एक-एक कर के वेदान्त की पेंटिंग्स खोलती जा रही थी और उन्हें यूं देख रही थी जैसे दुनिया में उससे ज्यादा खूबसूरत चीज़ उसने देखी ही ना हो. वेदान्त ने Indian miniature style, wash paintings, traditional style से लेकर western and european art styles, impressionist, surrealist, cubist और mordern pop art तक हर style में काम किया था. उसके ज़्यादातर paintings का subject nature और female nudes था.
- “Wow! This is so damn nice!!
एनी लगातार chanting की तरह यह बोले जा रही थी और एक-एक painting बहुत ही ध्यान से देख रही थी. वो painting पर अपनी उँगलियाँ फिराती, अपना चेहरा painting के बिलकुल करीब ले जाकर जैसे वो वेदान्त के एक-एक brush stroke को समझने की कोशिश कर रही थी. इस प्रक्रिया में उसकी आखें गोल और बड़ी-बड़ी होकर पलकें तेज़ी से झपक रही थीं, उसके होठ अधखुले थे. एनी में बच्चों जैसी मासूमियत और चंचलता के साथ उसकी उम्र से कहीं अधिक ठहराव दोनों एक-साथ नज़र आ रहे थे. वेदान्त एकटक एनी को ही देख रहा था. उसने महसूस किया कि वो उत्तेजित हो रहा है. हालांकि उस समय उसके मन में शारीरिक कामोत्तेजना उत्पन्न करने वाले कोई भी विचार नहीं थे. यह शायद एनी की मासूमियत से आकर्षित उसके चित्त की स्वतः उत्पन्न शारीरिक प्रतिक्रिया थी. एनी वेदान्त से मुश्किल से आधे हाथ दूर फर्श पर घुटनों के बल बैठी उसकी एक female nude painting का अवलोकन कर रही थी. एनी की उँगलियाँ subject के वक्ष, उसके तने nipple, कमर के कटाव और नाभि से गुज़रते हुए योनी तक पहुँच गई और फिर उसकी टांगों पर फिसलने लगी. अब वेदान्त से अपनी शारीरिक उत्तेजना का आवेग संभाला नहीं जा रहा था. उसका मन कसमसा उठा कि वो एनी को फ़ौरन बाहों में भर ले. वेदान्त का दिमाग जैसे एक ही समय में दो अलग-अलग हिस्सों में बंट कर कार्य कर रहा था. उसे एनी के कपड़े उतार कर उसके जिस्म पर वैसे ही उंगलियाँ फिराने की अतितीव्र इच्छा हो रही थी जैसे वो painting के subject पर अपनी उंगलियाँ फिरा रही थी और ठीक उसी समय उसका मन उसे अपनी इस काम कुंठा के लिए धिक्कार भी रहा था.
- “आप अपनी paintings के लिए live models use करते हैं”?
- “Mostly yes”.
- “इसके लिए भी”?
एनी ने एक दूसरी painting देखते हुए पूछा जिसमे salvador dali के surrealist background जैसी एक पृष्ठभूमि पर जो किसी पिघलते हुए स्वप्न सी प्रतीत हो रही थी, एक नग्न लड़की सामने से बनाई गई थी. लड़की के मुड़े हुए पैर फैले हुए थे और उसकी खुली हुई योनी स्वप्न द्वार के रूप में दर्शायी गई थी. उसके खड़े तने वक्ष पहाड़ की दो तनी चोटियों के समान प्रतीत हो रहे थे जिनपर दो नग्न पुरुष अपने उत्तेजित शिश्न हाथ में पकड़े चढ़ने का प्रयास कर रहे थे. वेदान्त ने मुस्कुराते हुए सहमती में सर हिलाया. वो पास ही रही एक chair खींच कर उसपर बैठ गया ताकि एनी ये देख ना पाए कि वो उत्तेजित हो रहा है.
- “How did you manage to get them a hard-on”?
- “I didn’t. This fine lady did”.
वेदान्त painting में लेटी लड़की की तरफ इशारा करते हुए बोला. एनी मुंह दबा कर हंसी जैसे उसने कोई बहुत गन्दा joke सुना हो.
- “you sleep with them”?
- – “Nope! Never”!!
- – “Why? All your models are so irresistable. I hope you ain’t into men”!
वेदान्त मुस्कुराया.
- “It’s not that. I’m straight like an electric pole. It’s just that I don’t prefer getting intimate with someone unless n until I share a strong emotional connect with the person”.
कहते हुए वेदान्त का चेहरा बुझ गया. एनी ने देखा शून्य में निहारती वेदान्त की आखों में दर्द और कसक आंसू बन के छलक आए थे. कुछ देर पहले तक वेदान्त जिस शारीरिक उत्तेजना का अनुभव कर रहा था वो अब उसके ह्रदय की उत्कंठा बन कर उसपर हावी हो रही थी. वेदान्त खुद को संभालते हुए उठा और liquor cabinet तक पहुँचा. उसने एक rum bottle खोली और neat ही गटक गया.
- “I…I’m sorry Sir. मैं कुछ ज्यादा ही बकवास कर गई”.
एनी सर झुकाए हुए उससे बोल रही थी, जैसे कोई बच्चा गलती करते पकड़ा गया हो. वेदान्त ने एक cigarette जलाते हुए कहा.
- “It’s alright एनी . तुम्हारी किसी बात का मुझे बुरा नहीं लगा…मुझे कभी-कभी ऐसे ही पागलपन के दौरे पड़ते हैं”.
वेदान्त और एनी दोनों एक-दूसरे को देख कर मुस्कुराए. इस बार दोनों की ही मुस्कान फीकी और ठंडी थी.
- “मैं चलती हूँ Sir. जल्दी ही अँधेरा होने वाला है. आप जब unloading करा रहे थे तभी मैंने खाना बना के रख दिया था. आप गर्म कर के खा लेना. Good bye Sir”.
- “मुझे Sir मत कहो. अजीब सा लगता है”.
- “hmmm…then what should I call you”?
एनी की आखों की बच्चों जैसी चमक फ़ौरन वापस लौट आई. वेदान्त भी मुस्कुराया.
- “Anything you like”.
एनी वेदान्त की आखों में देख रही थी. वेदान्त को ऐसा महसूस हुआ जैसे एनी की नज़रें उसकी आत्मा को टटोल रही हों.
- “Vincent”!
- “Vincent”?
- “Yes…I’ll call you Vincent”.
- “Van Gogh’s first name”?
- “Yes! Vincent Van Gogh is my favourite artist”.
- “हमारे बीच एक और similarity एनी . Van Gogh मेरा भी favourite artist है”.
एनी वेदान्त के करीब आई. वो अपलक उसकी आखों में देख रही थी.उसकी नज़रें वेदान्त की अंतरात्मा का आलिंगन करती हुई सी उसके सर्वस्व को खंगाल रही थी जैसे.
- “I can see so much similarity between you and Vincent. Same sad old soul. Wary of the world eyes…दो बेहतरीन कलाकार जो अपने समय से बहुत आगे थे…जिन्हें समझने और उनका उचित सम्मान और स्थान देने में समय और समाज दोनों ने ही बहुत देर कर दी. I just don’t want you to end like Vincent”.
वेदान्त को एकटक अपलक देखती एनी का हाथ जैसे स्वतः ही वेदान्त के चेहरे को खुद में भर लेने के लिए उठ गया था. वेदान्त स्तब्ध था. वो एक क्षण जाने कितने क्षणों तक दोनों की स्तब्धता का यूं ही निर्बाध्य साक्षी बना रहा. एनी का हाथ वेदान्त के चेहरे से स्पर्श ना हुआ हालांकि उसकी हथेली की तपिश अपने गालों पर वेदान्त बखूबी महसूस कर रहा था. एनी ने अपना हाथ वापस खींच लिया और उस पल की स्तब्धता टूट गई.
- “मैं चलती हूँ Vincent”.
एनी वेदान्त की तरफ से मुड़ी और तेज़ क़दमों से दरवाज़े की ओर बढ़ गई. वेदान्त का जी चाहा कि उसे पीछे से आवाज़ देकर रोक ले पर उसने अपना cigarette जलाया और अपनी इस तीव्र इच्छा को गाढ़े धुंए से साथ अपने जिस्म से बाहर उगल दिया. एनी जा चुकी थी. अँधेरा बहुत तेज़ी से घिर रहा था और calendula cottage के साथ-साथ जैसे वो अँधेरा वेदान्त के अस्तित्व पर भी छा रहा था. वेदान्त ने एक Bagpiper की bottle खोल ली और cigarette के साथ उसकी चुस्कियां लेता घंटों तक वहीं dining table पर बैठा रहा. नशे से अब वेदान्त की आखें बोझिल हो रही थीं. आखें बंद करते ही उसके ज़हन में एनी का अक्स उभरा. वेदान्त की काम कुंठा उसपर फिर हावी होने लगी. उसकी नज़रें और उंगलियाँ एनी के चेहरे, उसके नर्म होठों पर फिसलते हुए एनी की नर्म, लम्बी और पतली गर्दन को सहलाने लगी. वेदान्त का दिल एनी के छोटे-छोटे उभारों को मुट्ठी में भर कर मसलने को मचल उठा. वेदान्त ने अपनी आखें खोल दीं. वो फिर से अपने जिस्म में उत्तेजना और तनाव महसूस कर रहा था. उसकी धड़कन और सासें तेज़ चल रही थीं. वेदान्त ने इस विचार को अपने ज़हन से निकालने के लिए तेज़ी से सर झटका. उसका सर बुरी तरह घूम रहा था. खाने किसी उसे कोई सुध ना रही थी और ना ही समय का कोई आभास था. उस रात को वह कैसे भी कर के बिता देना चाहता था. वेदान्त ने एक और bagpiper खोल ली. पीने में भी अब उसका खोई ख़ास दिल नहीं लग रहा था. वो उठा और लडखडाते हुए bedroom में पहुंचा और पिछली रात की तरह ही bed पर ढेर हो गया. आज bedsheet पर एनी की खुशबू थी. वैसी ही खुशबु जैसी उसे तब आई थी जब एनी उसके करीब आ कर खड़ी हुई थी. तो क्या आज किसी समय एनी उसके bed पर आकर लेटी थी? हो सकता है कि दोपहर में जब वो सामान उतरवाने में व्यस्त था तब आराम करने के लिए वो bed पर लेटी हो. वेदान्त bedsheet पर अपनी नाक और मुंह यूं रगड़ने लगा जैसे वो एनी का नग्न जिस्म हो. उसके दिमाग में अपनी बनाई surrealist painting की model के पोज़ में एनी वैसे ही नग्न लेटी उभरी, दोनों टाँगे फैलाए हुए और बीच में स्वप्नद्वार सी उसकी योनी. नशे, नींद और कामोत्तेजना में वेदान्त रातभर bedsheet की जगह एनी के नग्न जिस्म की कल्पना कर उसे रौंदता रहा जबतक उसकी दमित कामेछाएं विशाल ज्वालामुखी के मुख से फूटते लावे के समान स्खलित ना हो गईं.
भोर में वेदान्त ने फिर वही सपना देखा जिसमे उसके खुद को cottage का दरवाज़ा खोलते और सामने उस दूसरी dark circles वाली अनजान लड़की से बात करते और फिर उस लड़की को cottage के अन्दर आते देखा, ठीक पिछली रात की तरह ही. इस सपने के बाद वेदान्त का दिमाग पुनः गहरी नींद में डूब गया जबतक कि उसे लगातार बजती doorbell सुनाई ना दी. नींद और hangover से बोझिल वेदान्त किसी तरह उठा और जा कर दरवाज़ा खोला. सामने एनी खड़ी दिखाई दी. उस सुबह की खिली धूप जैसी ही मुस्कान उसकर चेहरे पर थी.
- “Good morning Vincent”!!!
वेदान्त ने मुस्कुरा कर सर हिलाया. एनी चहकती हुई अन्दर आई और फिर कुछ देखकर ठिठक गई. वेदान्त ने देखा की एनी की नज़रें उसके groin पर टिकी हुई हैं. वेदान्त की आखों ने एनी की नज़रों का अनुसरण किया. उसके lower पर groin area पर काफी बढ़ा सा white stain आया हुआ था. वेदान्त यूं झेंपा कि उसे लगा कि अगर उसका बस चलता तो वो अभी वहाँ से हवा में घुल कर गायब हो जाता. वो आनन-फानन washroom में भागा. Washroom बंद करते हुए उसे बाहर से एनी की बच्चों जैसी खिलखिलाहट सुनाई दे रही थी. वेदान्त शर्म से पानी हो गया. उसे वास्तव में खुद पर और अपने रात के कृत्य पर बेहद शर्मिंदगी महसूस हो रही थी. उसके कानो में एकाएक aunt julia की आवाज़ गूंजी.
- ‘मेरा बाल मर्द का जात को अपना बात से पलटते देखकर सफ़ेद हुआ है man…बाकि तुम्हारे खुद का भलाई इसी में है कि इस मामले में कभी तुम्हारा कोई शिकायत ना मिले’.
वेदान्त ने वाशरूम में लगे बड़े आयतकार आईने में खुद को देखा. वो एनी से लगभग दोगुनी उम्र का था. उसके बढ़े हुए बाल और दाढ़ी में अब सफेदी आने लगी थी. क्या वो भी मिड लाइफ क्राइसिस से गुज़रते अपनी उम्र के बाकी मर्दों के जैसे ही खुद से आधी उम्र की लड़की के लिए दमित कामकुंठा रखने वाना एक सेक्सुअल प्रिडेटर…एक परवर्ट था? वेदान्त ने अपनी आखों में झांके हुए जैसे खुद की अंतरात्मा से यह प्रश्न किया. उसकी आखों के चारों ओर गोल काले घेरे गहरे हो चले थे.
अपने कपडे उतार कर वेदान्त shower के नीचे खड़ा हो गया. उसने खुद ही अपने आप को जवाब दिया. नहीं, बिलकुल भी नहीं! उसने अपनी wife श्रेया के अलावा कभी किसी और का ख्याल तक नहीं किया. Sex उसे easily available था…निर्वस्त्र models उसके सामने बिस्तर पर घंटों बिछी रहती थीं, उसने उन्हें सिर्फ अपने canvas पर कला के रूप में उकेरा था. अगर उसमे कामपिपासा होती तो हर एक model के साथ सम्भोग करना उसके लिए क्या बड़ी बात थी. उनमे से कई models ने खुद सामने से उसे प्रस्ताव दिया, उकसाने और उत्तेजित करने की कोशिश भी की. भला अप्सरा जैसी कोई खूबसूरत युवती पूर्ण नग्न अवस्था में खुद को भोगने के लिए पुरुष को आमंत्रित करे तो क्या कोई काम पिपासु, कुंठाग्रस्त पुरुष खुद को रोक पाएगा? पर वेदान्त ने कभी उनमे से किसी एक को भी कामेच्छा के वशीभूत होकर स्पर्श तक नहीं किया था. फिर एनी के लिए उसके अन्दर इतनी तीव्र कामेच्छा क्यों थी? कल उसने खुद ही तो एनी से कहा था कि वो किसी भी लड़की के साथ तबतक intimate नहीं हो सकता जबतक वो उसके साथ emotionally जुड़ा हुआ ना हो. Casual sex और hook-ups में विश्वास रखने वाला इंसान वेदान्त कभी भी नहीं था. तो क्या वेदान्त एनी से भावनात्मक रूप से इतना गहरा जुड़ाव महसूस कर रहा था कि उसके प्रति इतनी तीव्र कामेच्छा उत्पन्न हो? एनी से मिले उसे मुश्किल से दो दिन हुए थे. वेदान्त ने खुद को समझाया कि एनी के लिए उसके मन में उठती इच्छाएं सरासर गलत हैं. उसने निश्चय किया कि अपनी इन इच्छाओं को वो किसी हाल में भी खुद पर हावी नहीं होने देगा. नहाने के बाद वेदान्त को ध्यान आया कि वो भाग कर washroom आने की जल्दी में अपने साथ कपड़े या towel लाना ही भूल गया है. अब उसके लिए स्थिति बेहद विकट थी. वो washroom से बाहर कैसे निकलेगा. बिना कपड़ों और towel के तो निकला नहीं जा सकता, घर में एनी मौजूद थी. उसने washroom से ही एनी को आवाज़ लगाईं.
- “एनी !! Can you get me my towel please”!!!
उसे कोई जवाब नहीं मिला. वेदान्त ने washroom के दरवाज़े में झिर्री खोल कर अपनी गर्दन बाहर निकालते हुए एनी को कई बार आवाज़ लगाईं लेकिन उसे जवाब फिर भी नहीं मिला. कुछ देर तक वेदान्त वैसे ही अनिश्चित सा washroom के दरवाज़े पर खड़ा रहा. Kitchen से काम करने की आवाजें आ रही थीं. एनी breakfast prepare कर रही थी.
- “एनी !! बहरी हो गई है क्या”!!
किचेन से एनी के गुनगुनाने की आवाज़ आ रही थी. एनी गुनगुनाने में इतनी खोई हुई थी कि उसे वेदान्त की आवाज़ सुनाई नहीं दी. वेदान्त ने वाशरूम के दरवाज़े की ओर देखा. वो भाग कर bedroom तक पहुँच सकता था. एनी खुद में ही इतनी खोई हुई थी कि उसे वेदान्त की इस हरकत का पता भी नहीं चलता. वेदान्त नंगा ही वाशरूम से बाहर निकला और दबे पाँव चलते हुए बेडरूम की ओर भागा. उसकी जान मुंह को आई हुई थी कि कहीं एनी ऍन उसी समय किचेन से बाहर ना आ जाए. उसके गीले शरीर से पानी तेज़ी से गिर रहा था. वाशरूम से बेडरूम तक फर्श पर पानी फैल गया. बेडरूम में पहुँच कर वेदान्त ने चैन की सांस ली. उसने बिना कोई समय गंवाए अलमारी से अपने लिए कुछ कपड़े निकाले. अभी वो कपड़े पहनना शुरू भी नहीं कर पाया था कि उसे किचेन से आती एनी की आवाज़ सुनाई दी जोकि पास आती जा रही थी.
- “ एई विन्सेंट…..ब्रेकफास्ट इज़ रेडी”!!
वेदान्त चौंक कर पीछे पलटा, वो हडबडाहट में बेडरूम का दरवाज़ा बंद करना भूल गया था. इससे पहले कि वो चिल्ला कर एनी को वहां आने से रोक पाता उसे एनी बेडरूम के दरवाज़े पर आवाक खड़ी दिखाई दी. उसका मुंह खुला हुआ था और वो बिना पलकें झपकाए वेदान्त को ही देख रही थी. इस समय एक अप्रत्याशित घटना यह हुई कि ना चाहते हुए भी वेदान्त खुद को उत्तेजित महसूस करने लगा. कुछ पलों तक वेदान्त वैसे ही खड़ा रहा और एनी अपलक उसके तनाव को देखती रही. फिर अचानक हडबडा कर एनी वहां से जाने के लिए पीछे मुड़ी. फर्श पर बिखरे पानी पर उसका पैर तेज़ी से फिसला. अपना संतुलन बनाने की नाकाम कोशिश करती एनी के मुंह से चीख निकल गई.
- ‘ईईईsss’
अगर वेदांत ने फ़ौरन उसे पीछे से लपक कर थाम न लिया होता तो यकीनन उसका सर फर्श से जा टकराता. अपनी उखड़ी साँसों को संभालने की कोशिश करती एनी वेदांत के नग्न गीले जिस्म और उसके तनाव को खुद से चिपका महसूस कर रही थी. उसके जिस्म ने झुरझुरी ली और वो फ़ौरन खुद को संभालते हुए वहां से भाग गई. वेदान्त की हालत ऐसी थी कि एक ओर उसे इतनी शर्मिंदगी हो रही थी कि उसका जी चाह रहा था कि वहीँ अपने लिए एक गड्ढा खोद कर उसमे कूद जाए और खुद पर मिट्टी डाल ले, साथ ही साथ एनी ने उसे उसके तनाव के साथ पूर्णतः नग्न देखा यह बात उसे अलग तरह की कामोत्तेजना का अनुभव प्रदान कर रही थी. वेदान्त ने फिर से अपना सर झटका ताकि खुद पर हावी होते काम वेग को नियंत्रित कर सके. उसने फटाफट कपड़े पहने और bedroom से बाहर निकला. एनी table पर breakfast serve कर चुकी थी. दोनों में से किसी ने भी एक-दूसरे से नज़रें मिलाने की कोशिश नहीं की. दोनों dining table पर बैठ कर चुपचाप breakfast कर रहे थे. वेदान्त ने नज़रों के कोने से एनी को देखा. एनी भी नज़रों के कोने से उसे ही देख रही थी. वेदान्त को देखते हुए उसने plate में रखा एक sausage उठाया और उसे दिखाते हुए suggestively bite किया. वेदान्त बुरी तरह झेंप गया. उसे झेंपता देखकर एनी अपनी हंसी रोक नहीं पाई और खिलखिला कर हंसी. वेदान्त भी झेंपते हुए हंस दिया. दोनों के बीच माहौल दोबारा हल्का हो गया था.
अगले कई दिन वेदान्त और एनी को घर में आठ हज़ार किताबें और पांच सौ painting unpack और adjust करने में लग गए. इस दौरान वेदान्त को समझ में आया कि वो और एनी वाकई ने काफी हद तक एक जैसे हैं. Art, literature, philosophy, culture, psychology हर विषय पर ना सिर्फ उन दोनों के विचार और पसंद हूबहू एक-दूसरे से मेल खाते थे बल्कि वेदान्त को यह जान कर काफी आश्चर्य हुआ कि उम्र में उससे आधी और इतनी चंचल और बेबाक लगने वाली एनी के व्यक्तित्व की गहराई कितनी अधिक है. वेदान्त की किताबें देखकर एनी यूं खुश हुई थी जैसे उसे कोई अकूत खज़ाना मिल गया हो.
Claude Monet, Vincent Van Gogh, Salvador Dali, Paul Gauguin, Leonardo Di Vincie से लेकर राजा रवि वर्मा, अमृता शेरगिल, अवनेंद्र नाथ और गगनेंद्र नाथ टैगोर जैसे artists के काम और जीवनियाँ हों या फिर प्रेमचंद, रविन्द्रनाथ टैगोर, धर्मवीर भारती, रामधारी सिंह दिनकर से लेकर Leo Tolstoy, Ernest Hemingway, Franz Kafka, Vladimir Nabokov और Charles Bukowski जैसे लेखकों का साहित्य, या फिर Aurthur Schopenhauer, Sigmund Freud, Voltaire, Plato, Immanuel Kant के सिद्धांत और दर्शन शास्त्र, वेदान्त के पास हर विषय वस्तु पर किताबें थी. एनी दिन भर इन किताबों और वेदान्त की paintings की दुनिया में डूबी रहती थी. ठण्ड की कुहासे और बादलों से घिरी सुस्त और बोझिल दोपहरें रोजाना ही गर्म coffee की चुस्कियों के साथ कलाकारों, विचारकों, लेखकों और आदर्शों पर बात करते हुए गुनगुनी होती थी. वेदान्त अपने कुछ बदरंग हो गए अधूरे canvases पर नए शोख रंग लगाता और एनी उसे अपनी पसंदीदा किताब की पंक्तियाँ यूं पढ़ कर सुनाती जैसे वो उन्हें आत्मिक रूप से जी रही हो. वेदान्त की परिकल्पना और सृजन शक्ति के लिए एनी एक ईंधन थी जो उसे गति और दिशा दोनों प्रदान कर रही थी.
इस चर्चा-परिचर्चा, साहित्य व कला मंथन के बीच दोनों का एक-दूसरे के लिए परस्पर आकर्षण उन पहाड़ों को आवृत किए कोहरे जैसा ही सघन होता जा रहा था. वेदान्त ने महसूस किया था कि एनी के मन में भी उसके लिए वैसी ही भावनाएं जन्म ले रही थीं जैसी उसके मन में एनी के लिए थीं. कभी-कभी एनी अपनी उम्र के अनुरूप व्यवहार करती. वो सजेस्टिव और फ्लिर्टी होती और वेदान्त को रिझाने की कोशिश करती और फिर अचानक ही बिलकुल संजीदा हो उठती.
सर्दियों की सुबह जब वेदान्त कॉटेज के बाहर लॉन में अपनी स्केच बुक लिए कभी कैलेंडुला की क्यारियों को उसपर उकेरता, कभी बादलों से छन कर आती गुलाबी धूप जो सामने कोहरे की सफ़ेद रज़ाई ओढ़े अलसाए पड़े पहाड़ों की छोटी पर चमचमाती थी उसे वाटर कलर और ब्रश से कार्ट्रिज पर भर देता. किचेन से नाश्ता बनाती एनी जिन निगाहों से वेदान्त को अपना काम करते देखती थी उनसे वेदान्त बेखबर नहीं था.
खुद पर लगाम लगाने की लाख कोशिशों के बावजूद भी वेदान्त अपने मन पर काबू करने में विफल हो रहा था. उसे एहसास था कि उम्र की वर्जनाओं को तोड़ कर उन दोनों के बीच एक सेक्सुअल टेंशन जन्म ले चुकी है और वो प्रतिदिन और सघन होती जा रही है. उसके पास बैठी एनी जब किताबों की दुनिया में डूबी होती थी तब वेदान्त की नज़रें उसके मासूम चेहरे और मसरूफ़ आखों से होते हुए उसके जिस्म और अंगों पर फिर रही होती थीं. किताब के किसी दिलचस्प प्रसंग में लीन-तल्लीन डूबी एनी की गहरी चली साँसों के साथ ऊपर-नीचे होते उसके छोटे कसे हुए स्तनों से वेदान्त की नज़रें ना हटतीं. उस घड़ी उसकी शर्ट खोल कर उन नन्हे उभारों को अंजुली में भर लेने की तीव्र लालसा वेदान्त बहुत मुश्किल से दबा पाता था.
वेदान्त के चित्रकार चंचल मन ने एनी के पूर्ण नग्न जिस्म और उसके अंगों की कल्पना अनगिनत बार की थी. उसके स्तनों की घुन्डियाँ कैसी होंगी, रंग कितना गहरा होगा एनी से बात करते हुए वेदान्त के मस्तिष्क में यही विचार कौंधते थे. हर शाम एनी के जाने के बाद से लेकर अगली सुबह उसके आने तक का समय काटना वेदान्त के लिए बहुत मुश्किल होता था. उसके दिन तो एनी के साथ के नशे में कब बीत जाते यह पता भी ना चलता पर उसके जाने के बाद अपनी शाम और रातें वेदान्त जानबूझ कर शराब में डुबो देता था ताकि एनी के ना होने का एहसास उसका दम ना घोंट दे. नशे और बेसुधी के आलम में डूबा वेदान्त हर रात एनी के नंगे जिस्म की कल्पना अपने बिस्तर पर करता. उसकी सुबह एनी की doorbell और आत्मग्लानि से होती जिसे जल्द ही एनी की बच्चों सी मुस्कराहट और साथ धूमिल कर देते. वेदान्त प्रतिदिन जैसे एक ही दिन को जी रहा था और इससे ज्यादा सुकून उसके लिए कुछ नहीं था. बस इस पूरे routine के साथ वेदान्त को भोर में आने वाला वो सपना भी जुड़ा हुआ था जिसमे वो किसी अनजान लड़की से बात करते और उसे cottage के अंदर बुलाते देखता था. हालांकि इस सपने का ना वेदान्त के लिए कोई मतलब था और ना ही महत्त्व. दिन भर एनी के साथ और रात भर एनी की याद में उसे इस सपने का अगली भोर तक ध्यान भी नहीं रहता.
- “Tell me something…why do you live alone Vincent”?
एनी ने हाथ में पकड़ी हुई Franz kafka diaries के पीछे से गर्दन उचकाते हुए पूछा. वेदान्त अपनी sketchbook में उसका ही rapid sketch बना रहा था. उसने बिना अपना सर sketchbook से ऊपर उठाए कहा.
- “Being alone has a power over me that never fails. My interior dissolves and is ready to release what lies deeper. When I am willfully alone, a slight ordering of my interior begins to take place and I need nothing more”.
एनी आखों में अचरज लिए हुए वेदान्त को अपलक देख रही थी.
- “How did you know what exact lines I’m reading”?
वेदान्त बिना अपना सर उठाए मुस्कुराया. एनी अब भी उसे ही देख रही थी.
- “You never talk about your family Vincent”.
- “Because I don’t have a family”!!
वेदान्त वापस sketch में लग गया. एनी की नज़रें वेदान्त के माथे पर झूलते उसके लहरदार काले-सफ़ेद बालों की लट पर उलझी हुई थी जो वेदान्त के माथे पर एनी के सवाल से ताज़ा पड़ी शिकन जो सहला रही थी. एनी ने शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गर्दन वापस किताब के पीछे छुपा ली.
- “I’m a runaway एनी . I ran off from my people and responsibilities”.
एनी ने एकबार फिर अपनी गर्दन किताब के ऊपर उचका कर वेदान्त को देखा. उसका हाथ skechbook पर charcoal pencil के तेज़ strokes चला रहा था. एनी जानती थी कि वेदान्त के मनोभाव उसकी कार्यशैली में प्रतिबिंबित होते हैं. वेदान्त जब खुश होता है तो उसके हाथ canvas पर यूं फिसलते हैं जैसे ballroom में कोई आत्ममुग्ध ballerina एकल प्रणय नृत्य कर रही हो और जब वेदान्त अपने अन्दर आवेश और आक्रोश छुपा रहा होता था तब यही नृत्य तांडव में बदल जाता था, फर्क सिर्फ इतना था कि उसकी सृजनात्मकता पर इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता.
- “मैं अपने परिवार के लिए कभी वो बन नहीं पाया एनी जो वो मुझसे चाहते थे और मैं जो हूँ उसे वो लोग स्वीकार नहीं कर पाए”.
- “रिश्ते बहुत अजीब होते हैं vincent. हमारी स्वीकृति लोगों के लिए नहीं, उनकी उस मानसिक छवि और स्वरुप के प्रति होती है जैसा हम उन्हें देखना चाहते हैं ना कि उसके प्रति जैसे वो वास्तव में हैं. इस लिए बेहतर यही है कि जीवन में रिश्ते वही बनाए जाएं जो हमें वैसे स्वीकार करें जैसे हम हैं ना कि वो जो हमें वैसा बनाने की कोशिश करें जैसे हम उनकी मानसिक छवि में हैं.”
वेदान्त ने अपना हाथ रोक कर एनी को देखा.
- “अपने सवाल का जवाब तुमने खुद ही दे दिया एनी .”
- “मतलब तुम्हें अब भी ऐसा कोई नहीं मिला जो तुम्हारे वास्तविक व्यक्तित्व और विचारधारा के साथ तुम्हे स्वीकार करे? ”
एनी के सवाल में छुपी शरारत उसकी आखों से झलक रही थी जिसके जवाब में उसे सिर्फ वेदान्त की खामोश अर्थपूर्ण मुस्कान मिली और उस अर्थपूर्ण मुस्कान को एनी की निगाहों का मूक आश्वासन मिला कि वेदान्त जबतक खुद अपने आप को उसके सामने ना खोलना चाहे तबतक उसपर इस बात का ना ही कोई दबाव होगा और ना ही अपेक्षा. दो पल तक यह निशब्द परिपक्व संवाद दोनों की नज़रों के बीच होता रहा फिर इसकी जगह उस अल्हड़पन ने ले ली जिसकी राहतें उस सर्द दोपहर में coffee की चुस्कियों के समान थी. किताब एक ओर रखते हुए एनी ने वेदान्त के हाथ से sketchbook ले ली.
- “Let me see क्या बनाया है तुमने”.
अपनी आखें सिकोड़ कर, ठोड़ी हल्की सी ऊंची कर के किसी पारखी कला समीक्षक की तरह अपना sketch देखती रही.
- “तुम मेरा face अच्छा नहीं बनाते, मैं मैं नहीं लगती तुम्हारे sketch में”.
- “मैं सिर्फ rapid sketch कर रहा था, live portrait नहीं बना रहा था”.
वेदान्त dismissive tone में बोला.
- “हाँ तो बनाओ न! किसने मना किया है”!!
एनी chair पर adjust होकर अधलेटी सी बैठ गई. अपने पैर उसने सामने वाली chair के ऊपर एक पर एक चढ़ा लिए और अपनी knee length maxi frock करीने से सामने adjust कर ली. अपने दायें हाथ पर उसने सर टिका लिया और उसका बायाँ हाथ उसकी जाँघों पर rest कर रहा था. वेदान्त ने अपनी sketchbook खोली और उसे draw करने लगा. वेदान्त की नज़रें एनी के पूरे जिस्म पर यूं फिर रहीं थीं जैसे एनी के जिस्म पर एक भी कपड़ा ना हो. वेदान्त की नज़रों की कपड़ों को पारदर्शी कर उसके नग्न जिस्म को सहलाने की तपिश एनी भी महसूस कर रही थी. एनी की पलकें झुकने लगी, उसके नाक, गाल और कान शर्म और उत्तेजना से यूं गुलाबी हो गए जैसे दूध में केसर घोल दिया गया हो. उसके होंठ अधखुले थे और सांस तेज़ चल रही थी. वेदान्त की नज़रें एनी की छातियों को यूं सहला रही थीं जैसे वो बेहद कोमल और नाज़ुक पक्षियों के दो बच्चों का जोड़ा हो. वेदान्त की नज़रों की तपिश से एनी की छातियाँ भर के तन गईं. एनी के nipple के उभार उसकी dress के ऊपर से अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रहे थे. वेदान्त की नज़रें एनी के तने हुए nipple पर अटक गई थी, एनी को उसके पैर बेजान होकर कांपते से लगे, उसने अपनी जांघ पर हाथ का कसाव बढ़ा दिया. वेदान्त की नज़रों की तपिश से एनी ने खुद को पिघल कर बहते महसूस किया. उसके लिए खुद को उस pose में संभाले रखना मुश्किल हो रहा था. वेदान्त ने sketch complete कर के एनी के आगे कर दिया. sketch वाकई शानदार बना हुआ था, हालांकि एनी का चेहरा अब भी उससे पूरी तरह मेल नहीं खा रहा था फिर भी sketch अपने आप में बेहतरीन था. एनी की नज़रें sketch की छातियों पर थी जिनके तने हुए nipple dress के ऊपर झाँक रहे थे. एनी का गुलाबी पड़ा चेहरा अब शर्म से सुर्ख लाल हो गया था. वेदान्त चाह कर भी अपनी आखें एनी की तेज़ साँसों के साथ उठती गिरती छातियों से हटा नहीं पा रहा था. अपनी उत्तेजना पर काबू पाना वेदान्त के लिए असंभव हो रहा था. उसे लगा किसी भी पल वो शालीनता की सीमा तोड़ कर अपनी मर्यादाएं लांघ जाएगा. उसने खुद पर संयम पाने और उसके बीच build up हो रहे extreme sexual tension को release करने की नियत से एनी से सवाल किया.
- “तुम्हारा कोई boyfriend नहीं है एनी ”?
एनी मुंह से कुछ ना बोली बस अपना सर हौले से इनकार में हिला दिया.
- “सच में? ऐसे कैसे? तुम्हारे जैसी बेहद खूबसूरत और इतनी learned and intelligent लड़की को आजतक कोई लड़का पसंद नहीं आया ये तो हो ही नहीं सकता”.
- “मुझे लड़के और आदमी पसंद नहीं आते अब. मुझे उनके प्रति कोई आकर्षण महसूस नहीं होता…बल्कि उनसे घिन्न आती है”.
वेदान्त ने एनी का चेहरा देखा, जैसे किसी तेज़ हवा के झोंके ने टिमटिमाते दिए की लौ को एक झटके में बुझे दिया हो कुछ वैसे ही उसका चेहरा बुझा नज़र आया. एनी की नज़रें कहीं शून्य में निहार रहीं थीं. वेदान्त ने आगे कुछ ना कहा. एनी की नज़रें शून्य से सफ़र करती हुई वेदान्त के चेहरे पर ठहर गईं. कुछ ही पलों पहले एनी के चेहरे पर शर्म और उत्तेजना की लालिमा अब जैसे शमशान की ठंडी राख सी निस्तेज नज़र आ रही थी.
- “I’m not a virgin”.
वेदान्त ने एनी की आखों में देखा. वो एक टक उसे ही देख रही थी अब. वेदान्त कुछ कहने के लिए शब्द चुन ही रहा था तबतक वो फिर बोली.
- “I was sexually abused…raped!!”
- “I…I’m so sorry एनी ”.
एनी की आखें डबडबा गईं थी. वेदान्त स्वतः ही जैसे भावावेगवश आगे बढ़ा और एनी के चेहरा अपनी अंजुलियों में भर लिया. एनी ने देखा कि वेदान्त की आखें भी उसके जैसे ही भरी हुई थीं.
- “I’m so sorry एनी . You are still just a kid”.
वेदान्त के होठों की नरमी एनी ने अपने माथे पर महसूस की. यह चुम्बन किसी काम भावना के वशीभूत नहीं था, इस चुम्बन में वेदान्त की मूक भावनाएं अंकित थी. एनी धीरे से मुस्कुराई. वेदान्त ने उसकी आखों से बहते आसुओं को अपनी उँगलियों में सहेज लिया.
- “I’m really sorry”.
- “अब मुझे चलना चाहिए Vincient. कल मिलते हैं”.
- “कुछ देर और नहीं रुक सकती एनी ? बस थोड़ी देर”?
- “Granny को यह पसंद नहीं आएगा. मेरा रुकना ठीक नहीं. मैं हर दिन तुमसे मिलना चाहती हूँ Vincent. तुम बाकी लोगों के जैसे नहीं…तुम अलग हो…बहुत ज्यादा अलग. मुझे तुम पसंद हो”.
वेदान्त एनी का मंतव्य समझ नहीं पाया.
- “Goodbye Vincent. See you tomorrow”.
एनी ने कहा और वहां से चली गई. वेदान्त आवाक सा यूं ही खड़ा रह गया. एनी के जाने के बाद cottage की खामोशी जैसे उसे काट खाने को दौड़ रही थी. उसके ज़हन में एनी की आवाज़ लगातार loop में गूँज रही थी.
- “I was sexually abused…raped!!”
वेदान्त को अपने अन्दर एक आग सी लगी महसूस हो रही थी जिसे बुझाने के लिए वो जितनी भी शराब पीता उतनी ही वो आग और ज्यादा भड़कती जाती थी. आज वेदान्त के अंदर कोई कामेच्छा नहीं थी, आज उसके अंदर एनी के लिए भावनाओं का एक उमड़ता हुआ सागर था जिसे कोई नाम या रुख देना वेदान्त के वश में नहीं था.
•••
आद्रिका ने एक और बार case file ध्यान से पढ़ी. उसका सर दर्द से फट रहा था और उसे अपना ध्यान केन्द्रित करना मुश्किल लग रहा था. करनून की postmortem report अबतक आई नहीं थी. Missing child case में भी कोई lead हाथ नहीं लग रही थी. आद्रिका ने दो disprin अपनी strong black coffee के साथ हलक से नीचे उढ़ेल लिया. कुछ देर तक वो आखें मूंदे अपने chair के headrest से सर टिकाए कुछ सोचती रही. फिर अचानक उसने आँख खोली और अपने laptop को Police headquarter database से connect किया. काफी देर तक वो database में पुरानी case files खंगालती रही. उसके बाद उसने google पर missing person cases in mahaguna search किया और internet पर इससे जुड़ी जो भी news और article available थे उनके printouts लिए. Highlight marker से वो उन printouts को mark करती गई. सब काम खत्म करने तक उसका सर दर्द इतना बढ़ चुका था कि उसकी आखों से पानी आ रहा था. आद्रिका ने thomas को call करने के लिए अपना mobile उठाया, उसकी नज़रें desk पर रखी digital table clock की ओर गईं. रात के तीन बज रहे थे. उसने ठिठक के कुछ सोचते हुए mobile वापस रख दिया. फिर दोबारा उठा कर thomas को call लगाई. काफी देर तक ring जाने के बाद दूसरी ओर से thomas की नींद से बोझिल आवाज़ सुनाई दी.
- “Yes आद्रि ma’am”?
- “महागुना में जितने भी missing person cases file हुए हैं मुझे उन सबकी case file सुबह दस बजे अपने desk पर चाहिए”.
- “लेकिन ma’am ऐसे गिने-चुने ही cases हैं पिछले कम से कम दस सालों के record में और सबकी case files आपका पास है”.
नींद में बहुत मुश्किल से अपनी उबासी पर काबू करते हुए thomas ने कहा. वो bedside table पर रखी alarm clock में time देखने की कोशिश कर रहा था लेकिन उसकी आखों में इतनी नींद भरी हुई थी कि उसे साफ़-साफ़ कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.
- “मैं दस साल की बात नहीं कर रही thomas…”
- “जी ma’am मैं समझ रहा हूँ. हम भला इतने पीछे जाकर…”
thomas आद्रिका की बात काटते हुए बोला लेकिन उसकी खुद की बात पूरी ना हो पाई.
- “मैं बीस साल पहले की बात कर रही हूँ”!!
- “जी?”
Thomas चौंक कर bed पर सीधे बैठ गया. अब उसे घड़ी साफ़ दिख रही थी.
- “बीस साल पहले महागुना से कई लडकियां गायब हुई थीं. इस बात ने काफी तूल भी पकड़ी थी लेकिन इसका कभी कुछ पता नहीं चला और ये सभी cases ठंडे बस्ते में डाल कर भुला दिए गए. मुझे उन सभी cases की files और उनसे जुड़ी छोटी से छोटी information चाहिए thomas.”.
- “लेकिन ma’am इतने पुराने cases अभी क्यों…मेरा मतलब…”
- “क्योंकि मैं पागल हूँ! मेरा favourite pass time है गड़े मुर्दे उखाड़ना…और कुछ पूछना है”?
- “N….No ma’am”.
- “Good! कल सुबह मिलते हैं”!!
Thomas वापस लेट गया, लेकिन उसकी आखों से नींद कोसों दूर थी. उसके दिमाग में कई सवाल एकसाथ उमड़ रहे थे. आद्रिका बीस साल पुराने केस क्यों खंगालना चाहती थी? क्या बीस साल पहले गायब हुई लड़कियों का अभी के case से कोई connection हो सकता था? Thomas के दिमाग का घूमता पहिया जैसे बीस साल पीछे चला गया. जब वो मात्र छः साल का था. उस दिन thomas अपने बाकी दोस्तों के साथ downtown के बाहर highway के करीब खेल रहा था. उसकी आई ने उसे आवाज़ लगाईं.
- “Don’t go too far, tommy”!!
thomas और बाकी बच्चे sarah के साथ hide and seek खेल रहे थे. Sarah की उम्र thomas से कुछ ही ज्यादा होगी. ऊँचे coconut tree पर अपना चेहरा टिकाए sarah counting कर रही थी.
- “95..96..97..98..99…100…here I come”!!
Sarah की counting ख़त्म हो गई थी. Thomas अबतक अपने छुपने के लिए कोई अच्छी जगह नहीं ढूंढ पाया था. ज़्यादातर बच्चे highway के दोनों ओर उगी ऊंची झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छुपे हुए थे. उस खुले area में जहां दूर-दूर तक highway उसके दोनों तरफ झाड़ियाँ, पेड़ और खाली मैदान थे जिनकी परिधि सिर्फ क्षितिज पर नजर आते महागुना के पहाड़ और जंगल निर्धारित कर रहे थे वहां भला छुपने के लिए कोई और जगह कहाँ से मिलती. आसमान में कुछ समय पहले तक जो सूरज ऐंठ कर चढ़ा हुआ था अब धीरे-धीरे महागुना के पहाड़ों के पीछे अपना सर छुपा रहा था. छः साल का thomas Sarah को एक-एक कर के उसके सभी साथियों को झाड़ियों और पेड़ों के पीछे से ढूंढ कर उन्हें ‘धप्पा’ करते देख रहा था. sarah अभी thomas से दूर थी. Thomas अपने छुपने के लिए अबतक कोई ख़ास जगह ना ढूंढ पाया था. हर उस झाडी या पेड़ के पीछे जहाँ वो छुपने पहुंचा था वहां पहले से ही उसका कोई न कोई साथी छुपा हुआ था और अच्छा ही हुआ कि thomas ने उनसे से किसी की भी जगह पर छुपना स्वीकार ना किया वर्ना वो भी अपने बाकी साथियों के जैसे ही अबतक पकड़ा जा चुका होता. Thomas उन सबसे ज्यादा smart था. वो नहीं पकड़ा जाएगा.
- “O little tommy…where are you? I’m coming to get you”!!
Thomas को sarah की आवाज़ करीब आती सुनाई दी. उसके बाकी सभी साथी पकड़े जा चुके थे और sarah उसे ही आवाज़ लगाते हुए ढूंढ रही थी. Thomas झाड़ियों और पेड़ों की कतार से पीछे हटते हुए जंगल की ओर बढ़ने लगा. अगर वो थोड़ा और घनी झाड़ियों और पेड़ों वाली जगह पर छुप जाता तो sarah उसे ढूंढ नहीं पाती. नन्हा thomas पेड़ों और झाड़ियों को छुपने के लिहाज़ से reject करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था जहां इंसानी आबादी दूर और पेड़ों की आबादी सघन होती जा रही थी और इन दोनों आबादियों के बीच सिर्फ एक डोर जुड़ी हुई थी, दूर से आती sarah की आवाज़ जो अब भी thomas को ढूंढती उसके पीछे आ रही थी. Thomas को एक पुराना, खोखला बरगद का पेड़ दिखाई दिया जिसके चारों तरफ बरसाती mushrooms और ऊंची जंगली घास उगी हुई थी. Thomas ने खुद को उस बरगद के खोखले कोटर में छुपा लिया और उसके मुंह पर झाड़ियाँ खींच कर खुद को ऐसे ढंक लिया कि उसके वहां होने का किसी को पता ना चले.
- “O little tommy…where are you? I’m coming to get you”!!
दूर से आती sarah की आवाज़ thomas के करीब आती जा रही थी. Thomas अपनी सांस रोके अपने आगे की हुई झाड़ियों के झरोखे से देख रहा था. दूर पेड़ों के पीछे से sarah का अक्स उभरता और गायब होता दिखाई दे रहा था. पास आती sarah झाड़ियों के एक ऊँचे और सघन समूह के पीछे thomas की दृष्टि से लोप हुई. Thomas की नज़रें उन झाड़ियों पर ही टिकी हुई थीं. झाड़ियों के समूह में तेज़ी से हरकत हुई जैसे किसी शांत झील की काई भरी सतह पर अचानक पानी में तीव्र हलचल मचती है जो काई को तितर-बितर कर दे और सतह पर मचती इस हलचल से जैसे कोई छोटी मछली अपना मुंह बाहर निकालती है ठीक वैसे ही वो छोटी बच्ची sarah झाड़ियों से एक पल के लिए आधी बाहर निकली और फिर जैसे झील में घात लगाया मगरमच्छ अपना विशाल जबड़ा उस छोटी मछली के पीछे फाड़े झील से अपना क्रूर और वीभत्स मुंह बाहर निकालता है और छोटी मछली को को मुंह में भर के पानी की सतह के नीचे गोता लगा जाता है वैसे ही एक वीभत्स विशालकाय चेहरा और हाथ sarah के पीछे झाड़ियों से बाहर झांके और उसे अपनी जकड़ में दबोचते हुए वापस झाड़ियों में समा गए. झाड़ियाँ फिर से झील की सतह के समान पुनः शांत हो गईं…जैसे शांत झील की सतह पर बिखरी हुई काई फिर से जम जाती है वैसे ही thomas की नज़रों के सामने का दृश्य स्थिर हो चुका था. कुछ पल तो उसे समझ में ही नहीं आया कि वो सब वास्तव में हुआ था या फिर उसकी कल्पना थी. thomas के दिल की धडकनें बढ़ी हुई थीं. वो धीरे से उस खोखले पेड़ की कोटर से बाहर निकला और उससे भी ज्यादा धीरे से निकली उसके मुंह से वो आवाज़.
- “S…Sarah”!!!
घिरती रात के पसरते अँधेरे के साथ जंगल में घनी होती खामोशी सिर्फ वहां के कीड़े-मकोड़ों और झींगुरों के पल-पल तेज़ होते शोर से टूट रही थी. नन्हा thomas अपनी जान झोंक कर भागा, यूं भागा कि उसने पीछे मुड़ कर देखने की हिम्मत ना की. उसे डर था कि जंगल का जो wild demon sarah को पकड़ कर ले गया है वो उसे भी पकड़ ले जाएगा. कुछ ही देर में sarah के घरवालों और town के ढेरों लोग police search team के साथ sarah की तलाश में जंगल की ख़ाक छान रहे थे. सारी रात sarah की तलाश चलती रही लेकिन thomas का wild demon sarah को और वो जंगल wild demon को निगल चुका था. अगले दिन उस समय case को handle कर रहे senior police inspector गजानन आत्रे ने thomas का बयान खुद लिया जिसमे thomas ने आत्रे को wild demon के बारे में बताया. आत्रे के साथ police sketch artist बैठा था जो thomas के description पर sketch तैयार कर रहा था. Sketch बनने के बाद जब गजानन आत्रे ने देखा तो उसे निराशा ही हाथ लगी. वो sketch किसी इंसान का नहीं था, वाकई किसी नर्क से आए हैवान का sketch था वो जोकि उस बच्चे की परिकल्पना से बाहर निकला था. इसके बाद से thomas की बात का किसी ने विश्वास नहीं किया. वो बोलता रहा कि वो झूठ नहीं बोल रहा, उसने वाकई demon को देखा था जो sarah को निगल गया लेकिन उसके इस विश्वास के लिए उसे लोगों से या तो उपहास मिला या फिर डांट-फटकार. समय के साथ जैसे-जैसे thomas बड़ा होता गया उसके मस्तिष्कपटल पर अंकित उस wild demon की छवि धूमिल पड़ती चली गई. कुछ साल बीतने के बाद उसे खुद पर भी शक होने लगा कि क्या उस शाम उसने वाकई वो सब घटित होते देखा था या उसके बाल मन में छुपे भय ने उस wild demon का अक्स धारण कर लिया था जो sarah को निगल गया. Police acadamy join करने के बाद thomas sarah और उस wild demon के बारे में बिलकुल ही भूल चुका था.
Bed पर लेटे thomas ने आखें बंद कर के उस wild demon के अक्स को याद करने की कोशिश की. अब वो अक्स इतना ही धूमिल हो चुका था जैसे ठहरे पानी पर कंकड़ फेंकने से पानी पर बनता प्रतिबिम्ब. Thomas ने bedside table clock देखी. रात के साढ़े तीन बज चुके थे. उसने आखें बंद कर लीं और सुबह होने से पहले एक नींद लेने की कोशिश करने लगा. वो जानता था कि उसका आने वाला दिन काफी व्यस्त होने वाला है.
•••
करीम की नींद बाहर हुए खटके से खुली. 60 साल के कादिर का घर करनून के घर से मुश्किल से आठ-दस घर आगे था. एक समय था जब कादिर और करनून अच्छे दोस्त हुआ करते थे. साथ उठाना-बैठना, खाना-शराब, जुआ और औरतें. हाँ…करीम की तरह ही करनून भी औरतों का रसिया था, बस करनून ने मलम्मा और महागुना के लोगों को अपनी इस लत के बारे में कभी भनक ना लगने दी. पिछले कई सालों से करीम और करनून ने एक-दूसरे की शक्ल भी ना देखी थी. करनून की हत्या की खबर मिलने पर भी करीम उसके घर ना गया. हालांकि उडती खबर करीम के कानो तक भी पहुँच गई थी कि करनून की हत्या किसी इंसान का नहीं किसी शैतान दरिन्दे का काम था. करीम इस खबर के बाद से अपना बकरे काटने वाला गड़ासा सिरहाने रख के सोने लगा था. करीम ने समय देखा, रात ने साढ़े तीन बज रहे थे. उसके बगल में उन्नति नंगी सोई हुई थी. उन्नति local call girl थी जिसे करीम अक्सर रात गुज़ारने के लिए घर लाता था. करीम एक रात के उसे पांच सौ रूपए देता था और रात भर अपने पैसे की पाई-पाई वसूलता था. करीम को याद आया कि आज रात उसने सिर्फ एक बार ही वसूली की है. करीम ने bed के बगल में फर्श पर रखी देसी शराब की बोतल खाली की और सोई हुई उन्नति को पलट कर पेट के बल लिटा दिया. नींद और नशे में उन्नति हल्की सी कसमसाई और फिर सो गई. करीम ने उसकी टाँगे फैलाई और पीछे से उसके ऊपर चढ़ गया. करीम ने ज़ोरदार धक्का लगाया, उन्नति की चीख निकल गई. उसकी नींद और नशा दोनों हिरन हो गए. वो दर्द से कराहती रही और करीम किसी piston की तरह उसे रौंदता रहा. उन्नति कराहती रही और उसकी कराह करीम को और ज्यादा उत्तेजित कर रही थी. करीम की उम्र के बावजूद उसकी कद-काठी काफी मज़बूत थी. उसका जिस्म दोहरा था और लम्बाई लगभग 6 feet. करीम अपने आप में इंसान कम हब्शी ज्यादा लगता था.
- “हरामज़ादी! तुझे सोने के पांच सौ रूपए नहीं देता मैं. वो तेरा दल्ला है ना मुन्ना नायक, उस कुतरी के मादरी का धंधा मेरी वजह से चलता है”!!
करीम इस कदर उन्नति पर चढ़ कर उसे रौंद रहा था कि उन्नति को लगा उसकी जान ही निकल जाएगी. वो कराहते हुए बोली.
- “मैं मुन्ना को बोलेगी कि अगली बार मुझे तेरे साथ नहीं जाना, मेरी जगह किसी और को भेजे”!!
- “मुन्ना नायक जैसे गंदी नाली के कीड़े मेरे टुकड़ों पर पलते हैं, समझी!! तुझे पता नहीं मैं क्या चीज़ हूँ. तेरी बोटियाँ चबा जाऊँगा. उस दल्ले की हिम्मत नहीं कि मेरे आगे चूं भी कर जाए”!!
उसने उन्नति को पलट कर पीठ के बल पलट दिया और उसकी छाती इतनी बेरहमी से मसली की उसकी आखों से आंसू और मुंह से सिसकारी निकल गई. करीम उसे जाने कितनी देर तक ऐसे ही कुचलता और रौंदता रहता अगर बाहर से फिर एकबार खटके की आवाज़ ना आती. करीम ने अपने तकिये के नीचे से गड़ासा निकाला और कमर पर लुंगी लपेटते हुए बोला.
- “तू रुक अभी, पहले मैं देखूं बाहर किसकी माँ मर रही, उसके बाद तुझे देखता हूँ.”
करीम गड़ासा लेकर बाहर निकल गया. उन्नति ने फेफड़ों में सांस भरी. उठ के कपडे पहनने का कोई फायदा नहीं था क्योंकि वापस आकर करीम फिर से अपने पांच सौ रुपयों की कीमत वसूलने वाला था. वो नंगी ही बिस्तर पर पड़ी रही. उसके bed के ठीक सामने दरवाज़ा था, उन्नति की नज़रें दरवाज़े पर ही टिकी हुई थीं और वो मन ही मन मना रही थी कि करीम वापस ना आए.
करीम दरवाज़े के बाहर खड़ा चिल्लाया.
- “किसकी मौत आई है”!!
वो दरवाज़े के करीब ही था. फिलहाल उसने बहादुरी और कायरता को अनिश्चितता के तराजू पर बराबर रखा हुआ था. घुसपैठिये की आक्रामकता ही निर्धारित करती कि तराज़ू का पलड़ा किस तरफ झुकना है. अगर घुसपैठिया करीम से उन्नीस निकला तो वो अपना गड़ासा लेकर ऊपर टूट पड़ेगा और अगर घुसपैठिया कहीं उससे बीस निकल गया तो पलड़ा कायरता की ओर झुकेगा और वो फ़ौरन अपने पीछे दरवाज़ा खोल कर अंदर दुबक जाएगा.
- “बोलता क्यों नहीं!! कौन अपनी मरी माँ का मातम मना रहा है”!!
ज्यों-ज्यों करीम को अपनी ललकार के प्रत्युत्तर में सपाट सन्नाटा मिल रहा था त्यों-त्यों बहादुरी का पलड़ा भारी हो रहा था और उसकी ललकार पहले से ज्यादा गरज़दार हो रही थी. अब उसने दरवाज़े से चार कदम आगे बढ़ाए और जैसे वातावरण की निस्तब्धता को धमकाते हुए बोला.
- “बोटी-बोटी काट के रख दूंगा”!!
करीम वापस पीछे मुड़ा और दरवाज़ा खोला, सामने बिस्तर पर उन्नति नंगी लेटी हुई उसे ही देख रही थी. करीम ने कमर पर कसी लुंगी की गाँठ खोल दी, लुंगी उसके पैरों में फर्श पर जा गिरी. अपने पुरुष अंग को हिलाता हुआ वो बोला.
- “टांगें फैला कुतिया”!!
उन्नति ने टाँगे फैला दीं, करीम के पुरुष अंग को देख कर उन्नति की आखों में जो भय था वो अगले ही पल आतंक में बदल गया. उन्नति गला फाड़ कर चीख उठी. एक पल के लिए उन्नति के भय को अपनी कुंठाग्रस्त परपीड़ासक्ति की जीत मान कर कामोत्तेजना का अनुभव करते करीम की नज़रें जब उन्नति के चेहरे पर पड़ी तो वो ठिठक गया. उन्नति उसे नहीं बल्कि उसके पीछे किसी चीज़ को देखकर चीख रही थी. करीम झटके से पीछे पलटा और उसका गड़ासे वाला हाथ हवा में लहराया लेकिन नीचे ना आ पाया. सामने से दो लोहे जैसी मज़बूत पकड़ वाले पंजो की गिरफ्त उसके गड़ासे वाले हाथ और गर्दन पर हुई. करीम का शरीर एक झटके में बाहर खिचता चला गया. उन्नति ने अँधेरे में एक पल के लिए हमलावर की झलक देखी. ऐसा भयावह और वीभत्स रूप उसने ज़िन्दगी में कभी नहीं देखा था. यह कोई इंसान नहीं हो सकता था, यह यकीनन कोई हैवान था. नरक से छूट कर निकला कोई दरिंदा. उन्नति ने भाग कर दरवाज़ा अन्दर से बंद किया. बाहर करीम की हृदयविदारक चीख वातावरण में गूंजती रही. उन्नति ने भाग कर फर्श पर पड़े अपने कपड़ों के ढेर से mobile बरामद किया और police control room का number dial किया.
Thomas की नींद बहुत मुश्किल से दोबारा गहराना शुरू ही हुई थी कि phone की घनघनाहट ने एकबार फिर उसके दिमाग को भन्ना कर रख दिया.
- “Hello!…Yes…What?? ठीक है तुमलोग force लेकर पहुँचो मैं आता हूँ.”
Thomas किसी jack in the box जैसे spring लगे गुड्डे की तरह bed से उछल कर खड़ा हुआ और almirah में टंगी अपनी वर्दी निकाल कर पहनने लगा. उसने mobile पर आद्रिका का number dial कर के call hands free पर डाल दिया और फटाफट ready होने लगा.
रात भर काम करने के बाद अपने सरदर्द से हार मानकर आद्रिका कुछ ही देर पहले सोने लेटी थी. Mobile screen पर thomas का नाम flash होता देख जो सबसे पहली बात उसके होठों से निकली वो थी.
- “Karma is a fucking bitch”!!
आद्रिका ने call receive की. दूसरी तरफ से thomas की हडबडाहट भरी आवाज़ सुनाई दी.
- “आद्रि ma’am! एक और murder हो गया है, exactly last murder जैसा ही. करनून के घर से 8-10 घर आगे”.
आद्रिका अपना सरदर्द भूल चुकी थी.
- “मैं पहुँचती हूँ”!!!
सुबह साढ़े पांच बजे आद्रिका जब crime scene पर पहुंची तब police team और thomas वहां पहले से ही मौजूद थे. करनून के घर जैसे ही दिखने वाले single story घर के बाहर लोगों की भीड़ जुट चुकी थी जिसे police constables हटाने की कोशिश कर रहे थे. आद्रिका को देखते ही constables ने salute ठोंका. आद्रिका हौले से सर हिलाते हुए main gate से अंदर दाखिल हुई. घर के आँगन में एक लगभग साथ साल के व्यक्ति की लाश पड़ी हुई थी. लाश बिलकुल नंगी थी. आद्रिका ने देखा कि उसकी छाती भी बिलकुल वैसे ही फटी हुई थी जैसे करनून की मिली थी और इस लाश की गर्दन और हाथ पर भी मरोड़े जाने के same निशान थे. पास ही खड़ा हुआ thomas एक लड़की से बयान ले रहा था. आद्रिका को देखते ही वो उसके पास आया.
- “Local hooker है ma’am. कल रात ये करीम के साथ ही थी. इसने ही police को call किया.”
- “इसने killer को देखा है”?
- “कहती है देखा तो है, but कुछ भी clearly बता नहीं रही. डरी हुई है”.
- “हम्म…चलो मैं बात करती हूँ”.
Thomas के साथ आद्रिका उन्नति के पास पहुंची.
- “क्या नाम है तुम्हारा”?
- “उन्नति”.
- “देखो उन्नति, डरो मत. तुमने killer को देखा है”?
उन्नति में हामी में सर हिलाया. आद्रिका ने देखा कि लड़की का चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया है.
- “कौन था killer? कैसा दिखता था? उसका हुलिया बता सकती हो”?
आद्रिका के सवाल पर लड़की के होंठ थर्राने लगे लेकिन गले से आवाज़ नहीं निकली. thomas आद्रिका के कान में फुसफुसाते हुए बोला.
- “Killer के बारे में पूछने पर हर बार इसका यही reaction आ रहा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि इसने खुद ही बुड्ढे को off कर दिया और अब कहानियां बना रही है, क्योंकि करनून के murder की details तो यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है. इसने बुड्ढे का murder same way किया और अब conveniently उसे killer के सर मढ़ रही है”.
आद्रिका ने बुड्ढे की नंगी लाश को एक बार फिर से करीब से देखा. उसने thomas को भी इशारे से अपने पास बुलाया. Hooker अपनी जगह पर ही खड़ी रही.
- “इसका सीना exactly same तरीके से फाड़ा गया है thomas जैसा कि करनून का था. गर्दन पर बने निशाँन देखो. नहीं thomas, इतना minute और perfect immitation नहीं किया जा सकता. यह काम तो उस killer का ही है जिसने करनून की जान ली थी”.
- “फिर तो इस लड़की का बोलना ज़रूरी है”.
- “बुलवाना पड़ेगा. प्यार से नहीं तो मार से…लेकिन बुलवाना पड़ेगा”.
आद्रिका वापस hooker के पास पहुंची. इस बार उसका attitude, उसके हाव-भाव बिलकुल एक घुटे हुए पुलिसिए के माफिक थे. आद्रिका ने आखें तरेरी, लड़की सहम गई.
- “सुन रंडी! तेरे साथ waste करने के लिए फ़ालतू time नहीं है मेरे पास. या तो सीधी तरह मेरे सवालों के जवाब दे वरना धंधा करने और suspicion of murder charge में तुझे remand पर अन्दर करेंगे. फिर हवालात में police वाले तुझे पूरा नंगा कर के छत से उल्टा लटका देंगे…उसके बाद तेरे साथ क्या-क्या होगा तू खुद समझ सकती है. अब बोल क्या बोलना है”.
लड़की के चेहरे पर खौफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था लेकिन इस बार वो खौफ़ हत्यारे का नहीं बल्कि उस रौद्र रूप का था जो अभी-अभी आद्रिका ने उसे दिखाया था. हालांकि पास खड़ा thomas जानता था कि यह आद्रिका के mind games के अलावा कुछ भी नहीं था जोकि वो लड़की को psychologically pressurize करने के लिए कर रही थी और जिसका मनमाफिक परिणाम तुरंत सामने आया. लड़की आद्रिका के पास अपना चेहरा लाते हुए यूं फुसफुसाई जैसे उसे डर हो कि उसकी बात उस हत्यारे तक पहुँच जाएगी और वो आ के उसकी भी करीम जैसी दुर्गति करेगा.
- “वो इंसान नहीं था madam…दरिंदा था वो…जैसे नरक से आया हुआ हो”.
लड़की पागलों की तरह खुद में ही बडबडा रही थी, आद्रिका उसकी बात का मतलब नहीं समझ पाई.
- “काम तो वाकई उनसे दरिंदों वाला किया है और उस दरिन्दे तक पहुँचने में तुम ही हमारी मदद कर सकती हो क्योंकि तुमने ही उसे देखा है और सिर्फ तुम ही उसकी शिनाख्त कर सकती हो. इसलिए साफ़-साफ़ बताओ. क्या तुमने पहले कभी उसे देखा है? क्या वो यहाँ का ही कोई रहने वाला है या फिर बाहर से आया कोई सैलानी”?
- “आप अब भी नहीं समझ रही हैं madam!! वो कोई इंसान था ही नहीं…वो..वो सच में नरक से आया कोई हैवान…कोई खून का प्यासा दरिंदा था. उसकी आखें सुर्ख लाल थीं जैसे अँधेरे में दो जलते हुए अंगारे हों. सर के बाल जंगली साही के नुकीले काँटों के समान खड़े हुए. मुंह से झांकते नुकीले दांत और पागल भेड़िये की तरह दाँतों से टपकती झागदार लार…उसका एक हाथ आदमी जैसा और दूसरा किसी जंगली जानवर के भयानक पंजे जैसा था जिसमे पैने नुकीले आरियों जैसे नाख़ून थे”.
उन्नति के शरीर ने विवरण देते हुए ज़ोरदार झुरझुरी ली. वैसी ही झुरझुरी आद्रिका के साथ खड़े thomas के शरीर में भी दौड़ रही थी. उन्नति का बताया हुआ हत्यारे का हुलिया हूबहू thomas के बचपन के उस wild demon से मिलता था जिसे thomas अब अपनी कल्पना की उपज मान चुका था. क्या यह एक इत्तेफाक था? आज रात कुछ ही घंटों पहले वो जिस शैतान के बारे में सोच रहा था अभी उसका हुलिया उसके सामने ही बयान किया जा रहा था. Thomas के मुंह से स्वतः ही निकल गया.
- “Holy Lord”!!
आद्रिका ने उसे एक dismissive look दिया.
- “C’mon thomas! Don’t tell me that you believe this bullshit. ये लड़की ज़रूर कुछ जानती है और हम सबका साफ़-साफ़ चूतिया काट रही है. Remand पर लो इसे, इससे पूछताछ थाने चल कर ही होगी”.
हुक्म दनदनाते हुए आद्रिका आगे बढ़ गई. उन्नति के हाथ-पैर फूलने लगे. थाणे में उसके साथ क्या-क्या होगा ये सोच कर ही रूह काँप गई उसकी.
- “न…नहीं सायबा…मेरा यकीन करो! मैं सच बोल रही…मेरे को torcher कर के क्या मिलेगा”!!
रुआंसी हो गई लड़की को thomas ने आश्वासन दिया.
- “चिंता मत करो, तुम्हारे साथ थाने में कुछ भी बुरा या गलत नहीं होगा. देश का हर police वाला उतना गलत बिलकुल नहीं होता जितना हमारी फिल्मों और कहानियों में दिखाया जाता है”.
Thomas के आश्वासन में एक सच्चाई थी जो उन्नति ने महसूस की और बिना आगे बहस किए वो उसके साथ हो ली, हालांकि उसके पास इसके अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. अगर वो नहीं मानती और हिल-हुज्जत करती तो police उसे ज़बरदस्ती उठा के ले जाती.
Chapter 3
वेदान्त की आँख doorbell से खुली. वो बहुत मुश्किल से उठकर दरवाज़े की ओर बढ़ा. उसका पूरा जिस्म बुरी तरह दर्द कर रहा था, उसे लग रहा था जैसे उसका एक-एक कदम मन भर भारी हो गया हो. उसके सर पर जैसे कोई हथौड़ा मार रहा था. रात वो कब और कैसे सोया उसे कुछ भी याद नहीं था. एक बार फिर से doorbell बजी, इसबार पहले से अधिक तीव्रता से. वेदान्त ने दरवाज़ा खोला सामने एनी खड़ी हुई थी. उसके चेहरे पर व्यग्र भाव नज़र आ रहे थे.
- “Good Morning Vincent…”
- “Morning”!!
वेदान्त ने बहुत मुश्किल से कहा, उसके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी.
- “Vincent, are you alright”?
- “I dunno! Come inside…fix me a coffee please”.
एनी सीधे अंदर kitchen की ओर बढ़ गई उसने coffee mug उठाया, उसमे coffee powder, sugar crystal डाले, कुछ बूँद पानी की add की और spoon whip करने लगी. Coffee whip करते हुए एनी kitchen से बाहर आई. वेदान्त dining table की एक chair खींच कर बैठ गया और एक cigarette सुलगाने लगा.
- “You know something Vincent, आज फिर एक murder हुआ है downtown”.
- “एक और”?
- “हाँ…बिलकुल same to same मलम्मा के husband के जैसे ही…छाती फाड़ के”.
एनी के बताने का अंदाज़ बिलकुल वैसा ही था जैसे कोई छोटी बच्ची बहुत excited होकर कुछ ऐसा बता रही हो जो सिर्फ उसे ही पता है और उसकी नज़र में वो काफी important है. एनी उसे बता रही थी कि किस तरह करीम की लाश उसके घर के सामने बिना कपड़ों के पड़ी हुई थी.
- “वैसे एक बात बताऊँ vincent”?
वेदान्त ने cigarette मुंह में दबाए-दबाए नाक से धुंआ छोड़ते हुए सहमती में सर हिलाया.
- “बहुत अच्छा हुआ कि करीम मारा गया…वो भी ऐसे कुत्ते की मौत! और…और..वो करनून भी. गंदे लोग थे ये…बहुत ही बुरे लोग…ऐसी ही मौत deserve करते थे. इन्हें मारने वाले के लिए लोग बोल रहे कि वो कोई शैतान है लेकिन मेरे लिए तो वो भगवान का कोई फ़रिश्ता है जोकि न्याय कर रहा है”.
एनी के अन्दर चल रहे भावनात्मक विरोधाभास के तूफ़ान का वेग उसके शब्दों से झलक रहा था. वेदान्त ने उसकी तरफ देखा, उसके चेहरे पर घृणा और शान्ति दोनों के ही बहुत अजीब से मिश्रित भाव थे. वो coffee फेंटते हुए वापस kitchen में चली गई, वेदान्त ने अपना सर chair से टिका लिया और cigarette के हलके कश लगाते हुए महागुना में हो रही हत्याओं के बारे में सोचता रहा. फिर उसने यह सोचकर अपने कंधे झटक दिए कि इन हत्याओं से भला उसका क्या सोरोकार! वो ना मरने वाले को जानता था ना मारने वाले को. एनी तबतक दो coffee mugs में coffee ले आई, दोनों coffee पीते हुए इधर-उधर की बातें करने लगे. कुछ ही देर में दोनों के बीच पहले जैसी ही सहजता व्याप्त हो गई, पिछले दिन जो भावनात्मक आवेग उठा था और उनके बीच एक अनकहा तनाव उत्पन्न कर गया था वो हंसी-ठिठोली और गपबाजी में ढीला पड़कर गायब हो गया. उनकी चर्चा-परिचर्चा indian miniature paintings और eroticism से होते हुए वात्स्यायन के कामसूत्र और एलोरा, खजुराहो और सूर्य मंदिर के कामक्रीड़ा करते हुए दर्शाए गए मूर्तियों और स्तंभों तक जा पहुंची. वेदान्त उठकर अपने bookshelf से एक किताब उठा लाया. किताब काफी मोटी और भारी-भरकम थी. उसमे खजुराहो, एलोरा और अजंता व सूर्य मंदिर के कामक्रीड़ा करते स्तंभों के photographs के साथ उनका विस्तृत वर्णन था. एक photograph में दो नग्न यक्ष-यक्षिणी दर्शाए गए थे. यक्ष यक्षिणी के दोनों स्तन मुट्ठी में भर के उन्हें चूस रहा था और यक्षिणी ने अपनी एक टांग उठा कर यक्ष की कमर से बेल की तरह लपेटी हुई थी और एक हाथ से उसका पुरुषांग पकड़ कर अपनी योनी में डाल रही थी.
- “What do you think Vincent? खड़े होकर इस pose में ऐसा कर पाना possible है”?
एनी ने उस photograph को ध्यान से देखते हुए वेदान्त से सवाल किया. यह प्रश्न करते समय एनी की आखों में जो शरारती चमक उभरी थी वो वेदान्त से छुपी ना थी. वेदान्त मुस्कुराया और अपनी coffee ख़त्म करते हुए बोला.
- “Depends. जिस समय यह sculptures बनाए गए थे उस समय के लोगों की स्वछंदता और उन्मुक्तता के साथ-साथ उनकी physical flexibility भी हमसे कहीं अधिक थी…क्योंकि उस समय योग जिसे हमने modern time में yoga बना दिया है वो लोगों की जीवनशैली का हिस्सा था ना कि some fancy excercises to burn belly fat and look young. लोग बचपन से ही योग अभ्यास करते थे, शरीर, दिमाग, man विचार सब खुला रहता था उससे”.
- “हम्म….सो तो है….लेकिन ये कुछ ज्यादा ही explicit है….don’t you think so”?
- “हाँ, बंद कमरे में अपने परिवार की नज़रों से छुप कर vpn proxy पर पोर्न देखते हुए जर्क-ऑफ़ करने वाले लोगों के लिए कामसूत्र और एरोटिसिज्म वाकई काफी explicit है. इसके आने वाली पीढ़ी पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव पर ये लम्बे facebook posts लिख सकते हैं, ट्वीट कर सकते हैं यहाँ तक कि social cause बोलकर petition भी file कर सकते हैं”.
- “तुम्हारे विचार इतने समाज विरोधी क्यों होते हैं विन्सेंट”?
- “क्योंकि तुम जिसे समाज कह रही हो एनी वो खुद मानवता विरोधी है”.
- “तो फिर क्या सबको बीच सड़क पर नंगे होकर सेक्स करना चाहिए तुम्हारे हिसाब से”?
- “बिलकुल भी नहीं! लेकिन सेक्स जैसी कोई चीज़ है और वो हमारे जीवन का उतना ही बड़ा और अभिन्न अंग है जितना कि हर दिन में तीन समय लगने वाली भूख. उसपर बात और अवेयरनेस होनी चाहिए नाकि उसे सोशल टैबू बना कर राईट-ऑफ कर दिया जाना चाहिए. जो लोग आधुनिक परिधान पहन कर हाथ में स्मार्ट फ़ोन ले के उस पर इन्सटाल्ड एक अमरीकी द्वारा बनाए सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एरोटिसिज्म को पाश्चात्य संस्कृति का पड़ता दुष्प्रभाव बताते हुए गज भर लम्बे लेख लिख रहे हैं जिसमे उनकी इंग्लिश तो छोड़ दो, खुद की मात्रभाषा के व्याकरण की ऐसी-तैसी मची हुई है वो मेरी नज़रों में विशुद्ध दोगले हैं”.
एनी चुपचाप मुस्कुराते हुए वेदान्त को एक-टक देख रही थी. वेदान्त ने आगे कहा.
- “खुद सोचो एनी , आज भी एक आम माध्यम वर्गीय परिवार में माँ-बाप अपने बच्चों से सेक्सुअल अवेयरनेस और सेक्स इश्यूज पर बात नहीं करते बल्कि उनकी अपने बच्चों से अपेक्षा व खुद का भरसक प्रयास यही रहता है कि सेक्स के अस्तित्व से उनकी औलाद तबतक पूर्णतः अनभिज्ञ रहे जबतक वो अपने सामजिक ओहदे के अनुरूप अपने बच्चों के लिए उनका होनेवाला जीवनसाथी नहीं पसंद कर लेते और फिर अपेक्षा करते हैं कि वही बच्चे जिन्हें आदर्श संतान का प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर अबतक सेक्स जैसे हौवे के बारे में पता भी नहीं होना चाहिए था अब अपने माँ-बाप द्वारे पसंद किए गए बड़की बुआ जी की लगायत से लाए गए रिश्ते वाले सोशली वेरीफाईड एंड एप्रूव्ड पार्टनर की सेक्सुअल फंतासी फुलफिल करें”.
- “बाप रे विन्सेंट…अच्छा हुआ तुम आर्टिस्ट हो राइटर नहीं. वर्ना जैसे तुम्हारे विचार हैं तुम्हे मार-मार कर समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता”.
वेदान्त मुस्कुराया.
- “उसकी ज़रूरत नहीं, मैंने खुद को ही समाज से बहिष्कृत कर लिया है एनी ”.
- “ऐसा नहीं होता है विन्सेंट, हम चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें खुद को अलग करने की लेकिन हम इस समाज का हिस्सा तबतक होते हैं जबतक यह समाज हमें खुद बाहर निकाल कर ना फेंक दे. हाँ मैंने देखे हैं सेक्सुअली फ्रस्ट्रेटेड और परवर्ट बुड्ढे जो समाज में बहुत सम्मानित हैं, बहुत ऊंचा ओहदा रखते हैं. स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वाले टीचर्स और प्रोफेसर्स जिनकी नज़रें बच्चियों के विकसित हो रहे उभारों को गिद्धों की तरह घूरती रहती हैं और पहला मौका मिलते ही वो उन्हें मसलने-भभोड़ने से नहीं चूकते. देखे हैं मैंने वो बाल-बच्चेदार मिडिल क्लास फॅमिली मैन जो लड़कियों से बहुत शालीनता से बात करते हैं और उनकी बातों, उनके अल्फाजों के आवरण में धीरे-धीरे उनकी दबी हुई दमित कामकुंठा और संकीर्ण मानसिकता झलकती है…शब्द द्विअर्थीय हो जाते हैं और मकसद सिर्फ लड़की को एक बार ही सही अपने बिस्तर पर घसीटना होता है. इस हमाम में सब नंगे हैं विन्सेंट लेकिन समाज इन नंगों से ही मिलकर बनता है और कोई इन्हें नंगा नहीं बोल सकता क्योंकि समाज का गुनाहगार हमेशा वही होता है जो नंगे को नंगा बोलता है”.
- “बिलकुल एनी , और ऐसे लोग समाज के हर ओहदे, हर वर्ग में व्याप्त हैं. तुम्हे पता है जब मैं फाइन आर्ट्स कॉलेज में था तब हमारे एक प्रोफ़ेसर थे जिन्हें आखों से कम दिखाई देता था. दिन भर शराब के नशे में धुत्त रहते थे. लड़कियां उनके केबिन में जाने से घबराती थीं क्योंकि फिगरेटिव प्रपोर्शन समझाते हुए लड़कियों के जिस्म के उतार-चढ़ाव पर हाथ फिराना उनका पसंदीदा शगल था. उनके खिलाफ कभी कोई शिकायत दर्ज न हुई क्योंकि अपना करियर सबको प्यारा था और ऐसे मामले में बदनामी हमेशा लड़की की होती है. अगर एक टीचर के खिलाफ मुंह खोला तो उसका बदला बाकी टीचर भी तुमसे निकालेंगे सिर्फ इतना ही नहीं उस टीचर के चमचे स्टूडेंट्स भी तुम्हारे साथ वही या उससे भी ज्यादा ज़लील हरकत करेंगे.”
एनी के चेहरे पर आक्रोश और घृणा के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे.
- “ऐसे लोगों को तो चुन-चुन कर नंगा कर के मारना चाहिए”.
- “हाँ, शायद ऊपर वाले ने कुछ हद तक तुम्हारी बात सुन ली है”.
दो पल के लिए उनके बीच खामोशी व्याप्त हो गई. एनी ने अचानक घड़ी देखी और उसे जैसे कोई करेंट लगा.
- “बाबा रे!! 11 बज गए, बातों में समय का ध्यान ही नहीं रहा. मैंने अभी तक ब्रेकफ़ास्ट भी नहीं बनाया.”
वो उठकर किचेन में भागी. वेदान्त लिविंग रूम में ही अपनी स्केचबुक लेकर बैठ गया. उसी समय उसका मोबाइल बजा, कॉल दिलीप का था.
- “वाह! कमाल है. फ़ोन उठ गया! मतलब अबतक जिंदा हो’!
दूसरी तरह से दिलीप की आवाज़ गूंजी. वेदान्त के अधरों पर हल्की मुस्कान उभरी.
- “तेरी अर्थी को कंधा दिए बिना नहीं मरूँगा साले’!
- “ओहो! जनाब ना सिर्फ जिंदा हैं बल्कि सुबह सवेरे होश में भी लग रहे हैं. ये क्रांतिकारी परिवर्तन कैसे हुआ’?
- “समझ लो उसी काली पहाड़ी का कमाल है जिसे तुम पिछली वार्तालाप में कोस चुके हो”.
