TANTRAPURAM

tantrapuram

PROLOGUE

1847 A.D.

East India Company Ruled India

Kabini Forest Area, Karnataka.

‘पगला गए हो क्या! दिमाग़ दुरुस्त नहीं है? देर रात गए, घनघोर वर्षा में कहाँ आसरा मिलेगा?’

‘कदम बढ़ाते रह मीनाक्षी, इस वन से परे, पश्चिम दिशा में कारापुरा के समीप तांत्रिकों का एक छोटा सा ग्राम है. हमें वहाँ अवश्य शरण मिलेगी.’

‘तुम्हारे लिए कहना आसान है पुरुराज, तुम्हारे गर्भ का अंतिम माह नहीं चल रहा ना…ह्मफ़…ह्मफ़!  मुझसे और चला ना जाएगा. इस घने वन और वज्रपात सरीखी वर्षा में भला कौन हमारे पीछे आने वाला है? यहीं किसी वृक्ष की ओट में शरण लेते हैं.’

‘तेरी मति मरी हुई है मीनाक्षी! इस वन में कोई दिन के समय कदम ना धरे, रात्रि में तो स्वयं राक्षस वास करता है यहाँ. यदि वो निगोड़े अंग्रेज अपने शिकारी कुत्तों के साथ हमारे पीछे ना पड़े होते तो मैं कदापि तुझे इस ओर ना लाता.’

‘उन अंग्रेजों से अधिक निर्दयी, पतित और अत्याचारी तुम्हारा वो राक्षस ना होगा….ह्मफ़…य…यहीं रुकते हैं पुरुराज…मुझे पीड़ा उठ रही है.’

मीनाक्षी के कदम थम गए, उसका एक हाथ अपने नगाड़े जैसे उभरे पेट पर था, दूसरे हाथ से उसने बरगद के पेड़ की लताएँ ना थामी होती तो शर्तिया वो मुँह के बल औधी गिरती. उसके आगे तेज़ी से चलता पुरुराज ठिठक कर रुका. उसे एहसास हुआ कि मीनाक्षी उसके पीछे नहीं आ रही है. वो मीनाक्षी और उसके बच्चे के लिए फ़िक्रमंद था लेकिन उससे ज़्यादा फ़िक्र उसे पीछे आते अंग्रेजों और इस वन के भयानक ब्रह्मराक्षस की थी जिसके क़िस्से वो बचपन से सुनता आया था.

पुरुराज ने बाहों का सहारा देकर मीनाक्षी को बरगद के नीचे बिठाया. बरगद की ओट ने नश्तर सी चुभती बारिश की बूँदों पर ढाल लगा दी. पुरुराज के हाथ में थमी मशाल बहुत पहले ही बुझ चुकी थी फिर भी बारिश से राहत पाकर देखने में अभ्यस्त हुई उसकी नज़रें जब मीनाक्षी के दर्द से पीले पड़ते चेहरे पर पड़ी तो उसे एहसास हुआ कि मीनाक्षी अतिशयोक्ति ना कह रही थी. पुरुराज ने अपनी पगड़ी खोल कर मीनाक्षी को ओढ़ा दी और अपने आधे गंजे हो चुके सर पर हाथ फेरते हुए मीनाक्षी से ज़्यादा जैसे खुद से बोला.

‘इस वन में बच्चे को जन्म देना ठीक नहीं. रात्रि काल यम मुहूर्त लग चुका है. बालक के आने के सभी संकेत घोर अशुभ हैं…उस पर से ब्रह्मराक्षस का ख़तरा!’

आसमान में ज़ोरदार बिजली कड़की. उसकी चमक से एक पल को ऐसा लगा जैसे सूर्य सीधे वन के ऊँचे पेड़ों की ऊपरी टहनियों पर आ टंगा हो. बादलों के फटने जैसी भीषण और कर्कश आवाज़ हुई जिससे पुरुराज और मीनाक्षी के कान सुन्न पड़ गए. बिजली कौंधने से चौंधियाईं उनकी आँखों के आगे घुप्प अंधेरा छा गया था. उनके कानों में तेज सीटियाँ बज रही थीं. दोनों ने अपनी आँखें भींच लीं और कानों पर हाथ रख लिए.

जब कानों में सीटियाँ बजनी बंद हुईं तो दूर से आती, शिकारी कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनाई दी, साथ में घोड़ों की टापें भी, जो तेज़ी से क़रीब आती प्रतीत हो रही थीं. मीनाक्षी का चेहरा दर्द से, और पुरुराज का चेहरा डर से पीला पड़ गया.

जंगल में काफ़ी उजाला हो गया था. आसमान से बिजली उनसे चार गज दूर एक पीपल वृक्ष पर गिरी थी. पीपल किसी दैत्याकार मशाल की भाँति धूँ-धूँकर के ऐसे निरंकुश जल रहा था कि मूसलाधार वर्षा भी उसपर क़ाबू पाने में असमर्थ सिद्ध हो रही थी.

जलते पीपल की रौशनी में बरगद के नीचे शरण लिए मीनाक्षी और पुरुराज उन शिकारी कुत्तों और उनके मालिकों के लिए खुला शिकार थे.

मीनाक्षी- ‘आह्ह…sss!’

मीनाक्षी प्रसव पीड़ा से दोहरी हो रही थी. बारिश से लथपथ पुरुराज के माथे पर पसीना पानी के साथ मिल कर बहने लगा.

‘कुछ देर सब्र रख मीनाक्षी. यम मुहूर्त ख़त्म होते ही अग्नि मुहूर्त लगेगा. बच्चे का जन्म शुभ मुहूर्त में होना चाहिए.’

‘इट सीम्स वी हैव अराइव्ड जस्ट इन टाइम.’

पुरुराज उस आवाज़ और अंग्रेज़ी भाषा को पहचानता था, उसे गोरों की यह भाषा समझ नहीं आती थी लेकिन फिर भी उसे पता था कि कहने वाले का मंतव्य क्या है. वैसे भी घोड़ों पर सवारी गाँठने वाले अंग्रेज अफ़सर अपने साथ शिकारी कुत्ते और हिंदुस्तानी मुलाजिम लेकर चलते थे. भारत वर्ष में अलग-अलग प्रांतों में बोली जाने वाली स्थानीय भाषाएँ समझ पाना अंग्रेजों के लिए नामुमकिन था,

बोलना ना उन्हें आता था ना इन काले ग़ुलामों की भाषा में उनकी कोई दिलचस्पी थी फिर भी उनका मानना था हुकूमत का डर और दबदबा तभी मज़बूत होता है जब धमकी और गालियाँ दोनों उस भाषा में दी जाएँ जो दमित को समझ आती हो, तभी पीड़ित को अपने पीड़ित होने का एहसास और उसके मन में हुकूमत करने वाले का ख़ौफ़ क़ाबिज़ होता है.

घोड़े पर सवार ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज ऑफ़िसर ऑर्लैंडो के साथ उसका मुलाजिम तुलाराम भी था जो एक खच्चर पर सवार था. इनके पीछे चार सिपाही थे, दो अंग्रेज सिपाही घोड़ों पर थे लेकिन इनके घोड़ों की नस्ल ऑर्लैंडो के घोड़े से कमतर थी और दो हिंदुस्तानी सिपाही थे जो पैदल थे और दो-दो शिकारी कुत्तों की ज़ंजीरें पकड़े हुए थे.

‘लगता है बच्चा होने वाला है.’ खच्चर पर बैठे तुलाराम ने उचक कर प्रसव पीड़ा में तड़पती मीनाक्षी को भरपूर निगाहों से देखते हुए धूर्त भाव से कहा.

‘स्ट्रिप हर नेकेड सो वी कैन एंजॉय द शो. द डॉग्स आर हंग्री, वी कैन फीड देम विद वॉट्स कमिंग आउट…हाहाहा.’

अपने मालिक के कथन का अनुवाद करने से पहले दो पल को तुलाराम भी ठिठक गया. ठिंगने और मोटे बदन वाले काले और कुरूप तुलाराम के अंदर मानवीय संवेदनाएँ न्यूनतम स्तर पर थीं. उसके खुरपी जैसे मुँह से बाहर निकले सामने के दांत और भिंचक कर चलने का लोग बचपन से ही मज़ाक़ बनातेआए थे, यही वजह थी जिसने तुलाराम को अंग्रेजों के लिए उनके कुत्तों जितना वफ़ादार बना दिया था. जब हिंदुस्तानियों के घर जलाए जाते, उन्हें बांध कर उनके सामने अंग्रेज और ईस्ट इंडिया कम्पनी के हिंदुस्तानी सिपाही उनकी बहू-बेटियों का बलात्कार कर उन्हें ज़िंदा जला देते तो इससे तुलाराम को दिली सुकू न मिलता था लेकिन आज उसके अंदर का घिनौना, कुंठाग्रस्त राक्षस भी आने वालेमंजर की कल्पना कर सिहर गया था. तुलाराम को अनुवाद करने की ज़रूरत भी ना पड़ी, पुरुराज मीनाक्षी और उनके बीच आ खड़ा हुआ था.

‘हरामज़ादों! मेरी बहन तक मेरे जीते-जी नहीं पहुँचोगे तुम लोग.’

पुरुराज कोई योद्धा ना था, ना ही उसके जानने वाले उसे साहसी वीर की उपाधि से नवाज़ते. म्यान से तलवार निकालने में उसे दोनों हाथ लगाने पड़ते थे और कमान कभी उससे सीधा पकड़ा नहीं जाता था, फिर आज तो उसके पास शस्त्र के नाम पर बस एक बुझी मशाल थी. पुरुराज जानता था कि आने वाले पल उसके लिए यमराज के आगम का संदेश लाएँगे लेकिन मीनाक्षी की दुर्गत वो अपने जीवित रहते नहीं होने देगा, ऐसा दृढ़ निश्चय था उसका.

‘यह तो अंग्रेज हैं, इनके लिए यह विलायती नस्ल के शिकारी कुत्ते हमसे अधिक दया और इंसानियत के पात्र हैं लेकिन तुम तो हम में से एक हो. हमारा भगवान एक है. ऐसे जघन्य कृत्य कर के मरने के बाद पितरों को क्या जवाब दोगे? क्या अपने इष्ट देव से नज़रें मिला पाओगे?’ पुरुराज ने तुलाराम और शिकारी कुत्तों को पकड़े हिंदुस्तानी सिपाहियों से दया की गुहार लगाई. उनकी आँखों में इंसानियत और शर्म झलकी, जो अगले ही पल ऑर्लैंडो की घुड़की से ग़ायब हो गयी.

‘रिलीज़ द डॉग्स, रिप हिम टू पीसेज़.’

कुत्तों की ज़ंजीर खोल दी गयी. शिकारी कुत्ते वाक़ई भूखे थे. ऑर्लैंडो के ठहाकों, बारिश, जलते पीपल की टूट कर गिरती शाखाओ और कुत्तों की गुर्राहट के बावजूद उनके जबड़ों में टूटती पुरुराज की हड्डियों की आवाज़ मीनाक्षी को साफ़ सुनाई दे रही थी. मीनाक्षी दर्द और वेदना से चीख उठी.  पुरुराज सही था. यम मुहूर्त में पैदा हो रहा बच्चा अपने साथ मृत्यु लाया था.

लेकिन पुरुराज सिर्फ़ यम मुहूर्त के बारे में सही नहीं था. उस भयानक मंजर का साक्षी बनने वाली,  उस बरगद के नीचे मीनाक्षी इकलौती नहीं थी. मीनाक्षी के ऊपर पत्तों के बीच एक आकृति छुपी बैठी थी जो बिजली कड़कने से पूर्व वहाँ नहीं थी. उस आकृति का ध्यान पूरे घटनाक्रम पर था. उसकी निगाहें निर्विकार भाव से पुरुराज को शिकारी कुत्तों का शिकार बनते देख रही थीं.

पुरुराज की सहायता करने या उसे बचाने में उस आकृति की कोई रुचि नहीं थी. मरने से पहले पुरुराज ने मशाल से एक शिकारी कुत्ते का सर फोड़ दिया. कुत्ते की खुली हुई खोपड़ी से भेजा बाहर झांक रहा था फिर भी उसकी हालत पुरुराज जितनी दयनीय नहीं थी. पुरुराज की अंतड़ियाँ उसके उधड़े पेट से बाहर लटक रही थीं जिन्हें कुत्ते पकड़ कर खींच रहे थे. मुँह से खून उगलते हुए पुरुराज ने आख़री हिचकी ली.

वातावरण में मीनाक्षी की कराह के साथ एक शिशु के प्रथम रुदन की आवाज़ गूंजी. मीनाक्षी को समय का कोई अंदाज़ा नहीं था. वो नहीं जानती थी कि बच्चा यम मुहूर्त में जन्म है या अग्नि मुहूर्त में, बस वो इतना जानती थी कि यह बच्चा अपने साथ मृत्यु और यम को लाया है. कुत्ते मीनाक्षी की तरफ़ बढ़े. मीनाक्षी की आँखों के आगे अंधेरा छा रहा था. बेहोश होने से पहले मीनाक्षी ने बरगद के पेड़ से एक आकृति को शिकारी कुत्तों पर कूदतेदेखा. वो दो कुत्तों की पीठ पर कूदा था जिससे उनकी रीढ़ टूट गयी. तीसरे कुत्ते ने उस आकृति पर छलांग लगाई. उसने कुत्ते के दोनों जबड़े पकड़ कर उसे बीच से चीर कर दो-फाड़ कर दिया. ऐसी भयावह आकृति की उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी. उसका स्वरूप और क़द-काठी तो इंसानों जैसी थी लेकिन रूप अत्यंत भयावह था. वो सर से पैर तक बिल्कुल नंगा था और उसके पूरे शरीर पर राख पुती हुई थी. कंधे तक लम्बे, जटाओ जैसे बाल चेहरे के सामने आए हुए थे, छाती तक लम्बी मूँछ-दाढ़ी से उसका चेहरा छुपा हुआ था. सिर्फ़ अंगारों जैसी दो सुलगती आँखें जटाओ के बीच नज़र आ रही थीं.

मीनाक्षी का दिमाग़ अंधेरे में डूब गया.

‘ब..ब..ब्रह्मराक्षस! तो इस वन में ब्रह्मराक्षस होने की किंवदंती सत्य है!’ तुलाराम ने हकलाते हुए कहा.

अंग्रेजों के घोड़े और तुलाराम का खच्चर ब्रह्मराक्षस को देख कर बिदक गए और उन्हें अपनी पीठ से गिरा कर भागे. एक अंग्रेज सिपाही का पैर घोड़े की रकाब में उलझ गया था, उसे उल्टा लटका हुआ लेकर ही घोड़ा सरपट भागा जब तक ज़मीन पर रगड़ाए जाते सिपाही की गर्दन एक उभरी हुई चट्टान से टकरा कर टूट ना गयी.

जो पीछे बचे थे वो पेड़ों से गिरे सड़े हुए पत्तों और बारिश से दलदली हुई मिट्टी में सने हुए रेंग रहे थे. ऑर्लैंडो को ग़ुलामों और उनके अंधविश्वास की उपज ब्रह्मराक्षस के बारे में कुछ नहीं पता था, उसके लिए वो भयावह आकृति ल्यूसिफ़र का भेजा डीमन था जो उसे हेल ले जाने आया था. कीचड़ में फिसलता ऑर्लैंडो जितना ही भागने की कोशिश करता उतना ज़्यादा कीचड़ में धँसता चला जाता.

बारिश अब भी ज़ोरों से हो रही थी जिसने अंततः पीपल के पेड़ में लगी आग पर क़ाबू पा लिया था. धूमिल होती रौशनी में गाढ़े कीचड़ में घुलते ख़ून का लाल रंग चटक होने लगा. वातावरण में बढ़ते अंधकार के साथ ऑर्लैंडो, तुलाराम और सिपाहियों की हृदयविदारक चीखें उठीं और फिर घुप्प सन्नाटा छा गया जिसमें नवजात शिशु का रुदन और ब्रह्मराक्षस का क्रंदन रह-रह कर गूंज रहा था.

* *

CHAPTER 01

1935 A.D.

Mysore, British India

‘अंग्रेजों भारत छोड़ो! वन्देमातरम! भारत माता की जय!’

बाहर से गुजरते क्रांतिकारियों के जुलूस के शोर से चंद्र्भाल की आँख खुली. रौशनदान से छन कर आती धूप सीधे उसके चेहरे पर पड़ रही थी मतलब दिन के ग्यारह बज चुके थे. चंद्र्भाल ने उठने का उपक्रम किया तो उसे अग़ल-बग़ल अपने दोनों बाजुओ के सुन्न होने के एहसास हुआ, जैसे वे लम्बे समय से भार से दबे हुए हों. उसने गर्दन उचका कर, आँखों में घुसी आती धूप से बचने के लिए आँखें सिकोड़ते हुए अपने पहलू में देखा. उसके दोनों बग़ल दो लड़कियाँ गहरी नींद में सोयी हुई थीं. दोनों ही लड़कियों के शरीर पर कपड़े का एक कतरन तक ना थी, खुद चंद्र्भाल भी उसी अवस्था में था.

चंद्र्भाल ने बड़ी मुश्किल से दोनों के नीचे दबी अपनी बाहें निकाली और पलंग पर सीधा बैठ गया. नीचे फ़र्श पर दोनों लड़कियों की साड़ी और अंगिया के साथ चंद्र्भाल के धोती, कुर्ता, अचकन और लंगोट गुत्थम-गुत्था हुए पड़े थे. उसने एक नज़र दोनों लड़कियों पर डाली, दोनों की उम्र पच्चीस, बड़ी हद छब्बीस होगी. यानी पिछली रात वह अपने पल्ले की सारी मोहरें वो ऐयाशी में उड़ा चुका था. उसने पलंग से उतर कर अपने कुर्ते और अचकन की जेबें टटोली. फूटी कौड़ी भी ना निकली, सिवाय अफ़ीम और तम्बाकू की डिबिया के. उसने दोनों घिस कर अपने निचले होंठ में दबाए और फुर्ती से अपने कपड़े पहने.

पिछली रात वो अपने साथ तीन मश्कें भर कर ताड़ी लाया था. तीनों ख़ाली मश्कें कमरे के अलग-अलग कोनों में पड़ी हुई थीं. उसने सो रही दोनों लड़कियों के नितम्ब पर चिकोटी काटी. एक ने कोई हरकत ना की, दूसरी लड़की अपना नितम्ब सहलाते हुए नींद में कसमसाई और फिर करवट बदल कर सो गयी. चंद्र्भाल दोनों लड़कियों की साड़ी के पल्लू और उनकी अंगिया टटोलने लगा. मुश्किल से चार मोहरें बरामद हुईं, उसने वो अपने जेब के हवाले की और जूते पहन कर कमरे से बाहर निकल गया. बाहर किसी का ध्यान उसपर नहीं था.

चकलाघर की अधिकतर लड़कियाँ अपनी दैनिक दिनचर्या में लगी हुई थीं. विशाल प्रांगण में कुछ लड़कियाँ नृत्य और संगीत का रियाज़ कर रही थीं, एक-दो नहाने के बाद बरामदे में आती धूप में बैठी बाल सुखाते हुए आपस में कोई क़िस्सा-ठिठोली करने में मशगूल थीं. कम उम्र की लड़कियों में आँख पर पट्टी बांध कर एक-दूसरे को पकड़ने का खेल चल रहा था. पिछली रात आए अधिकतर ग्राहक जा चुके थे और आज के ग्राहक शाम से पहले नहीं आने वाले थे. चंद्र्भाल तेज कदमों से चलते हुए लकड़ी के बड़े और भारी मुख्य फाटक से बाहर निकल गया तो उसने चैन की साँस ली. शुक्र है कि चिकअम्मा या फ़ौजदार सेउसका सामना नहीं हुआ. चिकअम्मा वेश्यालय की संचालिका थी और फ़ौजदार चिकअम्मा और बाक़ी लड़कियों का चौकीदार. इन दोनों के रहते बड़े से बड़े रसूख़ वाले ग्राहक की भी हिम्मत ना थी कि लड़कियों से बेअदबी सेपेश आएँ या पैसे को लेकर हुज्जत करें. अपने क़द्रदानों को चिकअम्मा और उसकी लड़कियाँ जहां सर आँखों पर बिठा कर किसी राजा या नवाब की तरह इज्जत देती थीं, वहीं कई बदमिज़ाज नवाब वेश्यालय के सामने सरेराह नंगे दौड़ा कर पीटे गए थे.

शेखू की ताड़ी की दुकान खुल चुकी थी. शेखू खुद गल्ले पर बैठा हुआ था. एक गाल में गिलौरी दबाए, अपने तुम्बे जैसे विशाल पेट पर हाथ फिराता, और बीच-बीच में वो हाथ पेट से लुंगी में सर का कर खुजाता हुआ शेखू अपनी बेसुरी आवाज़ में कोई अश्लील गाना गाते हुए खुद में मुस्कुरा रहा था जब उसकी नज़र दूर से आते चंद्र्भाल पर पड़ी. अपने दोनों हाथ पीठ के पीछे बांधे हुए, चंद्र्भाल इत्मिनान से चलता हुआ उसके ताड़ी खाने की ओर ही आ रहा था. शेखू का गाना फ़ौरन बंद हुआ. बेंत की कुर्सी से गिरते-पड़ते उठ कर शेखू बाहर आया. उसने दोनों तरफ़ सड़क पर नज़रें फिराई कि कहीं कोई सिपाही गश्त पर तो नहीं था. इतने में चंद्र्भाल पास आ गया.

‘पागल हुआ है चंद्र्भाल? यूँ खुले आम घूम रहा है, सरी राह कुत्ते की मौत मरना है तो मर लेकिन मेरे ताड़ी खाने के सामने मत मर! चल दफ़ा हो यहाँ से.’ शेखू आँखें तरेर कर चंद्र्भाल को घुड़कते हुए बोला.

‘सुबह-सुबह अपनी ही चढ़ा लिए हो क्या मियाँ? क्या अनाप-शनाप बक रहे हो. ये एक मोहर पकड़ो और चार मश्कें बांध दो.’ चंद्र्भाल जेब से एक मोहर निकाल कर शेखू की ओर बढ़ाते हुए बोला.

‘लानत भेजो मोहर पर! भर रात रंडियों संग कलाबाज़ी-करतब करते गुज़ारी लगती है, कुछ होश भी है तुम्हारे पीछे नगर में क्या क़हर बरपा?’

‘क्या?’

‘कल शाम ब्रिटिश क्लब के बाहर जिसे तुमने अदना अंग्रेज सिपाही समझ कर पीटा, और लूट कर जाते हुए गोरे के सारे कपड़े-लत्ते भी उतार कर लेते गए, वो एक बड़े अंग्रेज अफ़सर का लौंडा था जो अपनी गोरी माशूक़ा का इंतज़ार कर रहा था. माशूक़ा आयी तो उसे उस गोरे के छोटे गोरेका भी दीदार हो गया. फिर बड़ा बवाल मचा. रात भर पूरे नगर में गश्त लगवाई गयी. तुम तो चकलाघर में जा घुसे मियाँ, फ़ज़ीहत दूसरों की हुई.’

‘बहुत अंधेरा था वहाँ, मैंने पीछे से पकड़ कर गोरे को रगड़ दिया. मेरा चेहरा तक ठीक से ना देख पाया होगा वो, फिर भला मुझे पकड़ेंगे कैसे?’ जवाब देने के बजाय शेखू नेदिवार पर चिपके पर्चे की तरफ़ इशारा किया. इश्तहार पर चंद्र्भाल की सूरत बनी हुई थी.

‘यह तो बिल्कुल मेरे जैसा दिख रहा है.’ चंद्र्भाल को ब्रिटिश सरकार ने कुख्यात डकैत और बाग़ी घोषित कर उसपर ज़िंदा या मुर्दा सौ मोहरों का इनाम घोषित कर दिया था.

‘सौ मोहरें! उस चिकने गोरे के पल्ले से बामुश्किल चौदह मोहरें निकली, जिनमें से अब मेरी जेब में बस चार बची हैं! यह तो बड़ा महँगा सौदा पड़ गया!’

‘गोरे की आबरू पर हाथ डालने से पहले सोचना था. लूटा तो लूटा, नंगा क्यों करने लग पड़े?’

‘अंग्रेज़ी में गाली देता था..माँ-बहन की, वरना तुम जानते हो शेखू कि मेरा इस बग़ावत और क्रांति से कोई लेना-देना नहीं. इन अंग्रेजों से पहले मुग़लों ने लूटा, इनके बाद कोई और लूटेगा. कोई बाहर से ना आया तो अंदर वाले ही कफ़न खसोटी करेंगे.’

‘मैसूर का सबसे बड़ा ठग, नशेड़ी, पियक्कड़, जुआख़ोर, लौंडीबाज और अब इश्तहारी लुटेरा, ऐसी बातेंकरता जँचता नहीं. चल मुँह काला कर यहाँ से चंद्र्भाल, इससे पहले कि कोई..’ बोलते-बोलते शेखू बीच में रुक गया, उसकी नज़र अंग्रेज सिपाहियों के क़ाफ़िले पर पड़ी जो गश्त लगाता हुआ उधर का रुख़ कर रहा था.

शेखू ने आव देखा ना ताव और लपक कर पीछे से चंद्र्भाल की दोनों बाज़ुएँ गिरफ़्त में लेते हुए चिल्लाया.

‘साहब…बाग़ी भाग रहा था, मैंने पकड़ लिया!’

‘छोड़ मुझे शेखू, यह क्या हरकत है?’ शेखूकी इस अप्रत्याशित हरकत से चंद्र्भाल हड़बड़ाया फिर उसकी की गिरफ़्त से छूटने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगाते हुए बोला.

‘दूसरा कोई रास्ता नहीं मियाँ, गोरों ने मुझे तुमसे बतियाते देख लिया था. तुम्हारे साथ हम बिना बात के बीच चौराहे फाँसी चढ़ाए जाते. तुम्हारे आगे-पीछे तो ना कोई रोने वाला ना मातम करने वाला, हमारी दो बीवियाँ और आठ बच्चे हैं.’ सिपाहियों का ध्यान उस तरफ़ गया. उन्होंने फ़ौरन गोलीबारी शुरू कर दी.

‘अरेयह क्या कर रहे हो नाशुक्रों, गोली मुझे लग जाएगी.’

शेखू कलपते हुए चिल्लाया और गोलियों की बौछार से बचने के लिए अपने विशालकाय शरीर को चंद्र्भाल की ओट में छुपाने की नाकाम कोशिश करने लगा. गोलियाँ चलाते हुए क़ाफ़िला तेज़ी से उस तरफ़ बढ़ा.

चंद्र्भाल ने फुर्ती से अपना शरीर कमान की तरह कमर से मोड़ते हुए सर पीछे दे मारा. उसका सर छुपने की कोशिश करते शेखू के नाक और मुँह से टकराया जिससे फ़ौरन ही शेखू के कस-बल ढीले पड़ गए. पान की पीक के साथ मुँह और नाक से खून उगलता शेखू ‘हाय’ मारकर अपना चेहरा पकड़ते हुए घुटनों पर आ गया. चंद्र्भाल ने झुके हुए शेखू की पीठ पर से कलाबाज़ी खाई और उसके पीछे ओट ले ली.

‘धायँ-धायँ-धायँ!!’

अगले ही पल गोलियों की बौछार ने शेखू का जिस्म छलनी कर दिया.

‘मिल गयी सौ मोहरें?’ आलू के बोरे से गिरते शेखू के बेजान शरीर को देख कर चंद्र्भाल बुदबुदाया और फिर किसी फुर्तीले साँप के जैसे ज़मीन पर रेंगता हुआ शेखू के ताड़ीखाने के अंदर घुस गया.

दुकान के नाम पर शेखू ने चार कोनों पर खपच्चियाँ गाड़ कर तिरपाल खड़ा कर दिया था जो बीचों बीच गड़े बाँस पर तना हुआ था. चार-पाँच मेज़ें और बेंच बिछी हुई थी जहां अब भी छे-आठ पियक्कड़ जमे हुए थे और बाहर हुए हंगामे से चौकन्ना हो गए थे.

सीधे खड़े होते चंद्र्भाल की नज़रें इन पियक्कड़ों पर थी, जिनके हाव-भाव बता रहे थे कि शेखू की तरह इन्हें भी इश्तहार और इनाम की जानकारी थी. चंद्र्भाल कमर के पीछे दोनों हाथ बांध कर सीधा खड़ा हो गया. पियक्कड़ों की टोली उसकी ओर लपकी. पीछे बंधे हाथों की उँगलियों पर चंद्र्भाल तेज़ी से कुछ गणना कर रहा था, उतनी ही तेज़ी से उसकी आँखों की पुतलियाँ दोनों तरफ़ हिल रही थीं और एक ताड़ीखाने के अंदर पियक्कड़ों, तथा बाहर शेखू की लाश लांघ कर अंदर आते सिपाहियों की गति का आँकलन कर रही थीं.

अगले एक पल में तीन घटनाएँ एक साथ घटित हुईं. भीतर आते सिपाहियों ने चंद्र्भाल पर गोलियाँ दागी, गल्ले के पास खड़े चंद्र्भाल ने फुर्ती से नीचे झुकते हुए वहाँ रखा ताड़ी का पीपा लुढ़काया जिससे ताड़ी फ़र्श पर चारों ओर फैल गयी, चंद्र्भाल के झुकने से उसपर चलाई गयी गोलियाँ सामने से उसकी तरफ़ आते पियक्कड़ों के समूह को निशाना बना गयीं. गोली लगने से भहरा कर गिरते पियक्कड़ों का हाथ लगने से वो बाँस उखड़ गया जो तिरपाल को ताने हुए था, नतीजतन, सिपाहियों का दल और पियक्कड़ों की टोली पर तिरपाल चारों खपच्चियाँ लिए-दिए आ गिरा.

तिरपाल के अंदर से गोलियों और मार-पिटाई का शोर आ रहा था जब गिरे तिरपाल से लुढ़कता ताड़ी का पीपा बाहर निकला. सिपाहियों का जो दल बाहर था वो तिरपाल उठा कर अपने साथियों को निकालने में व्यस्त था. उनका ध्यान ताड़ीखाने के पिछली तरफ़ कच्ची ढलान पर लुढ़के जाते पीपे की ओर ना गया जो नीचे झाड़ियों में जा कर अटक गया.

अपने घुटनेपेट से चिपका कर पीपे में घुसा हुआ चंद्र्भाल बाहर निकला. ऊपर लोगों और सिपाहियों की भीड़ बढ़ रही थी. झाड़ियों में छुपता-छुपाता चंद्र्भाल वहाँ से भागा. उसके कपड़े धूल से सने हुए थे और जगह-जगह से फट गए थे. ऐसे हुलिये में वो सचमुच कोई इनामी डकैत मालूम पड़ता था. कच्चे-पक्के घरों, गालियों, दीवारों, हर जगह उसके नाम और चेहरे के इनामी पर्चे लगे हुए थे. मकानों के बाहर गुड़ पकाती औरतें और खेलते हुए बच्चों का समूह उसे देख रहा था.

‘देखो-देखो, यह तो वही पर्चेवाला बाग़ी है जिसपर इनाम है.’

किसी बच्चे ने दिवार पर चिपके पर्चे से भागते हुए चंद्र्भाल की सूरत का मिलान करते हुए कहा.  इससे पहले कि बच्चों की टोली चंद्र्भाल पर धावा बोलती, वो एक पेड़ पर चढ़ गया जिसकी टहनी पेड़ से लगे घर की छत तक जाती थी. बंदर की तरह कुलाँचे भरता चंद्र्भाल टहनी से छत पर पहुँचा और फिर एक छत से दूसरी छत लांघता हुआ भागने लगा. लगभग हर दूसरे घर की छत पर औरतें या तो मसाले कूटने और दाल धो कर सुखाने में लगी थीं, या फिर अनर्गल गप्पबाज़ी में.

चंद्र्भाल जैसे-जैसे छत लांघता जाता, वैसे-वैसे औरतों के चीखने-चिल्लाने और उसे भद्दी गालियाँ देने का शोर भी उसके साथ-साथ आगे बढ़ता जाता. यह सिलसिला टूटा जब पापड़ सुखा रही एक औरत ने चीखनेऔर गालियाँ देने के बजाए भागते चंद्र्भाल पर एक ईंट देमारी.

ईंट सीधा छत की मुँडेर से छज्जे पर छलांग लगाते चंद्र्भाल की कनपट्टी से टकराई. उसकी आँखों के आगे सितारे नाच गए. छज्जे से टकरा कर चंद्र्भाल नीचे पुआल के ढ़ेर पर गिरा. अपनी साँसों पर क़ाबू पाने की गुरेज़ से वो कुछ देर पुआल के ढ़ेर पर ही पड़ा रहता अगर उसे किसी के अपने सर पर आ खड़े होने का एहसास ना होता. चंद्र्भाल के उठते-उठते किसी ने उसके गाल पर झन्नाटेदार चाँटा मारा, खून के खारे स्वाद से उसका मुँह भर गया. चंद्र्भाल के संभल पाने से पहले एक फ़ौलादी मुक्का उसके पेट से टकराया. दर्द से बिलखता हुआ चंद्र्भाल वापस पुआल के ढ़ेर पर जा गिरा.

‘बेग़ैरत! ग़लीज़! हरामी!! धंधा करने वाली लौंडियों के पल्ले से पैसे चुराता है.’

चंद्र्भाल के कानों में फ़ौजदार की गरजती हुई आवाज़ पड़ी. दर्द से कराहता चंद्र्भाल खिलखिला कर हंसा.

‘हाहाहाहा..आह्ह..ह्ह..हाहाहा!’ चकलाघर की लौंडियों का रखवाला, चिकअम्मा का वफ़ादार, फ़ौजदार अपनी कमर पर एक हाथ बांधे, पहाड़ जैसा उसके सामने खड़ा था और दूसरे हाथ से अपनी लम्बी, घनी मूँछों पर ताव दे रहा था, जिनकी खेती वो प्रतिदिन देसी घी से सिंचाई कर के पूरता था.

‘पगला गया है क्या? हंस क्यों रहा है हरामी?’

फ़ौजदार ने सशंकित भाव से पूछा. उसे डर था कि उसके प्रचंड थप्पड़ से चंद्र्भाल के दिमाग़ी तारों में नुक़्स आ गया है. चंद्र्भाल ने पान की पीक की तरह मुँह में भर आया खून थूका फिर जेब से चार मोहरें निकाल कर फ़ौजदार की तरफ़ बढ़ाता हुआ बोला.

‘ये साले गोरे हिंदुस्तान का सारा सोना लूट कर डकार गए, हमें इनकी चंद मोहरें बदहज़मी की खट्टी डकारें दिए हुई हैं. यह पकड़ो अपनी लौंडियों की मोहरें और रस्ता नापो.’

फ़ौजदार ने लपक कर चंद्र्भाल के हाथ से चार मोहरें झपट लीं, फिर धूर्त भाव से मुस्कुराते हुए बोला.

‘रस्ता तो नापेंगे पट्ठे, यहाँ से कोतवाली तक का! यह चार मोहरें तो लौंडियों की हुई, हमारी सौ बनती हैं जो तुम्हारी एवज़ में गोरों से वसूलेंगे. चल खड़ा हो अपने पैरों पर!’

तो फ़ौजदार को भी इनाम की खबर लग गयी! लौंडियों ने आँख खुलने पर अपने पल्ले से मोहरें ग़ायब पा कर हड़कम्प मचाया होगा, जिसकी रू में चिकअम्मा के हुक्म पर जब फ़ौजदार चंद्र्भाल की तलाश में निकला होगा तब उसकी नज़र नगर भर में लहरा रहे पर्चों पर पड़ी होगी, चंद्र्भाल ने मन में सोचा.

‘उठता है कि दो-तीन और रसीद करूँ?’

फ़ौजदार ने गरजते हुए कहा. चंद्र्भाल उठ कर सीधा खड़ा हुआ. उसके दोनों हाथ कमर के पीछे बंधे हुए थे, उँगलियाँ तेज़ी से कुछ गणना कर रही थीं.

‘अब यह क्या करतब कर रहा है? क्या छुपाए हुए है पीछे?’

‘आ कर खुद देख ले.’

‘अकड़ दिखाता है! रुक तेरी तो…’

फ़ौजदार बिफरे सांड सा चिंघाड़ता हुआ चंद्र्भाल की ओर बढ़ा. उसके पास आते ही कमर के पीछे से निकल कर चंद्र्भाल का हाथ फुर्ती से घूमा और फ़ौजदार सांड के जैसे ही रंभाते हुए पुआल के ऊपर ढ़ेर हो गया.

चंद्र्भाल के हाथ में वो ईंट थी जो छत पर औरत ने उसे दे मारी थी और जो उसके साथ ही नीचे पुआल के ढ़ेर पर गिरी थी. चंद्र्भाल ने ईंट फेंक कर हाथ झाड़े फिर फ़ौजदार के पल्ले से अपनी चार मुद्राएँ बरामद की. फ़ौजदार की जेबों से एक रुपए का नोट, दो आने, तम्बाकू की डिबिया, नसवार और एक खटके से बंद-खोल होने वाली छुरी भी बरामद हुई. यह सारा सामान चंद्र्भाल ने अपनी जेब के हवाले किया फिर फ़ौजदार के सर से पगड़ी खोल कर अपने सर पर लपेटी और उससे अपना मुँह इस तरह ढँक लिया कि सिर्फ़ आँखें खुली दिखायी दें.

छुपते-छुपाते किसी तरह चंद्र्भाल नगर से बाहर निकला तब तक शाम हो चली थी. मैसूर से निकल कर चंद्र्भाल अब धूल भरे कच्चे रास्ते पर चल रहा था. रास्ता दोनों तरफ़ घनी झाड़ियों और ऊँचे पेड़ों से घिरा हुआ था. वैसे तो दिन ढलने के बाद मवेशियों को लेकर वापस लौटते गडरियों और इक्का-दुक्का अंग्रेजों की मोटर कार के सिवाय उस रास्ते पर कोई ख़ास आवागमन नहीं होता था लेकिन उस शाम सरगर्मी बढ़ी हुई थी. रह-रह कर पीछे से घोड़ों की टापें सुनाई देती तो चंद्र्भाल फ़ौरन रास्ता छोड़ कर झाड़ियों की ओट में जा छुपता. राइफ़ल और मशालें लिए, घोड़ों पर सवार ब्रिटिश सिपाहियों का क़ाफ़िला हर थोड़ी देर में गुजरता.

झाड़ियों में छुपे रहने का कोई फ़ायदा नहीं था, गश्त करते सिपाहियों की नज़र उस पर पड़ ही जाती. झाड़ियों से होते हुए आगे बढ़ना भी मुमकिन नहीं था क्योंकि रात के अंधेरे में सूखी टहनियों और पत्तों पर भागते कदमों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती. रही-सही कसर पूरी करने के लिए आसमान में पूरा चाँद निकला हुआ था.

भूख, प्यास और थकान से चंद्र्भाल का हाल बुरा हो रहा था. गश्त लगाते सिपाहियों का एक क़ाफ़िला अभी-अभी गुजरा था, मतलब कुछ देर के लिए रास्ता साफ़ था. चंद्र्भाल झाड़ियों से बाहर निकला, वो मुश्किल से कुछ ही कदम आगे बढ़ा होगा कि पीछे से मोटर की आवाज़ के साथ हल्की रौशनी आयी. चंद्र्भाल यह आवाज़ पहचानता था, यह मोटर कार की नहीं बल्कि मोटर सायकल की आवाज़ थी. 101 इंडियन मोटर सायकल का प्रयोग अंग्रेजों के हरकारे उनके गुप्त और ज़रूरी संदेश एक नगर से दूसरे नगर पहुँचाने के लिए करते थे. यकीनन आस-पास के सभी नगरों और पुलिस चौकियों में चंद्र्भाल की गिरफ़्तारी का आदेश करने के लिए हरकारे भेजे जा रहे थे. इसका मतलब मैसूर से निकल कर भी जान बक्शी नहीं होने वाली थी.

भगौड़े चंद्र्भाल की गिरफ़्तारी के लिए ‘बड़े गोरे साहब’ का लिखित आदेश और चस्पा करने के लिए इनाम के सौ पर्चे लेकर मैसूर से कड़कोला जाता हरकारा अपनी क़िस्मत को कोस रहा था. उसकी शादी हुए सिर्फ़ दो दिन बीते थे. इस वक्त उसे अपनी खूबसूरत बीवी और गर्म बिस्तर की ज़रूरत थी,  जब कि वो ठंड में जंगली रास्ते पर मोटर सायकल दौड़ा रहा था. उसकी बीवी ने कैसी मादक अदाओ से उसे रोकने की कोशिश की थी, लेकिन बड़े गोरे साहब का हुकुम टाला नहीं जा सकता था. उसने अपनी बीवी से वादा किया था कि आधी रात तक काम ख़त्म कर के उसके पहलू में आ जाएगा, इसलिए फटफटिया पूरी रफ़्तार से भगाए हुए था.

तेज ठंडी हवा के थपेड़ों से जब-जब उसके शरीर में सिहरन उठती उसे अपनी बीवी का आग़ोश याद आ जाता. उसकी बीवी ने विदा करते समय हिदायत दी थी कि रास्ते मेंगाड़ी कहीं ना रोके. रात घिरते ही उजाड़-जंगली रास्तों पर चुड़ैलें मंडराने लगती हैं जिनसे अविवाहित पुरुषों से अधिक ख़तरा नवविवाहित पुरुषों को होता है. नवविवाहित पुरुषों को अपने मोहजाल में फँसा कर उनसे संसर्ग करने में चुड़ैलें अलग उन्माद अनुभव करती हैं, जो पुरुष को उसकी पत्नी से छीननेसे मिलता है. हरकारा खुद में मुस्कुराया, कितनी भोली है उसकी बीवी. भला उसके पीछे कौन सी चुड़ैल पड़ने वाली थी.

हरकारे को सामने रास्ते पर जुगनुओ का एक समूह नज़र आया. नहीं, यह जुगनू नहीं थे! यह तो जैसे हवा में चिंगारियाँउठ रही थीं. अंधेरे में नृत्य करती चिंगारियों का समूह हरकारे की राह रोके हवा में विचित्र आकृतियाँ बना रहा था. ना चाहते हुए भी हरकारे को ब्रेक दबाना पड़ा.

‘क..क…कौन है वहाँ?’ जवाब में उसे झाड़ियों में एक छनछनाहट सुनाई दी, किसी औरत के पायल की छनछनाहट! हरकारे का दिल चीख-चीख कर कह रहा था कि उसे मोटर सायकल घुमा कर वापस भाग जाना चाहिए लेकिन चुड़ैल के पायल की छनछनाहट पर गोरे साहब के चाबुक की फटकार भारी थी. अपने इष्ट देव को याद करते हुए हरकारे नेमोटर सायकल खड़ी की और हाथ में पिस्तौल लेकर नीचे उतरा.

‘मैं कहता हूँ कौन है सामने आओ…वरना गोली चला दूँगा!’

हरकारा झाड़ियों की ओर पिस्तौल तानते हुए चेतावनी भरे स्वर में बोला. हवा में तैरती चिंगारियाँ अब ग़ायब हो चुकी थीं. हरकारा सधे कदमों से घनी झाड़ियों की तरफ़ बढ़ा. झाड़ियों के बीच कुछ था जो साफ़ नज़र नहीं आ रहा था. अगले दो कदम लेते ही हरकारा सकते में आ गया. झाड़ियों के बीच दो आग जैसी जलती हुई गोल आँखें चमक रही थीं.

‘धायँ-धायँ-धायँ!’

हरकारे ने झाड़ियों पर गोलियाँ दागी. अचानक उसे अपनी गर्दन के पीछे हल्का दबाव महसूस हुआ. नस दबते ही उसके हाथ से पिस्तौल छूट गयी और शरीर जैसे लकवाग्रस्त होकर धड़ाम से नीचे गिरा और उसकी चेतना लोप हो गयी. हरकारे के ठीक पीछे खड़े चंद्र्भाल ने एक अंगड़ाई ली और फिर बेहोश हरकारे की टांगें पकड़ कर उसे घसीटते हुए झाड़ी में ले गया. झाड़ियों से उसने फ़ौजदार से हथियाया खटके से खुले वाला चाकू बरामद किया जिसके फल पर उसने अफ़ीम से दो मोहरें यूँ चिपकाई थीं कि उन पर रौशनी पड़ने पर वो दो जलती हुई गोल आँखों जैसी दिखाई दें. चाकू के आधे खुले नक्काशीदार मूठ वाले हिस्से में उसने माचिस की जलती तीली फँसाई थी जो अब बुझ चुकी थी. इस तीली की रौशनी चाकू के फल पर अफ़ीम से चिपकी मोहरों में चमक पैदा कर रही थी.

फ़ौजदार सेलूटा सामान चंद्र्भाल के बड़े काम आया था. फ़ौजदार की डिबिया का तम्बाकू सूखे पत्तों में लपेट कर, उनमें आग लगा कर उसने रास्ते पर उछाल था. अंधेरे में दूर से देखने पर जल कर नीचे गिरते सूखे पत्तेऔर तम्बाकू हवा में नृत्य कर आकृतियाँ बनाती चिंगारियों सरीखे प्रतीत हुए थे, जिनसे प्रभावित होकर जब हरकारा मोटर सायकल खड़ी कर के पिस्तौल निकाल रहा था उस दौरान मोहरों वाला चाकू झाड़ियों में अटका कर, झाड़ियों और पेड़ों की आड़ लेता हुआ चंद्र्भा ल हरकारे के पीछे आ गया.

चंद्र्भाल ने अपने मैले व फटे कपड़े उतार कर बेहोश हरकारे के साफ़ कुर्ता, अचकन व धोती पहने. पैरों में मुलायम चमड़े के जूते डाले और उसकी पिस्तौल पीछे अपनी कमर में खोंस ली. पगड़ी से मुँह ढँकने के बाद कोई भी उसको देख कर उसके सरकारी हरकारा होने का धोखा खा जाता. चंद्र्भाल ने हरकारे की मोटर सायकल चालू की और पूरी रफ़्तार से भगा दी. हरकारे के कपड़े और मोटर सायकल हथियाने के लिए चंद्र्भाल ने इतना प्रपंच इसलिए किया ताकि होश में आने पर भी हरकारे का सच यही हो कि उसे किसी प्रेतात्मा या चुड़ैल ने अपना शिकार बना लिया, हालाँकि वो जानता था कि हरकारा यह बात किसी को समझा नहीं पाएगा कि चुड़ैल उसकी मोटर सायकल क्यों ले भागी.

चंद्र्भाल फ़िलहाल बिना मंज़िल का मुसाफ़िर था. रास्ते में उसे घुड़सवार सिपाहियों के दो क़ाफ़िले दिखाई दिए. सिपाहियों ने उसे सरकारी हरकारा समझ कर कोई तवज्जो ना दी और चंद्र्भाल उन्हें पार कर बेधड़क कड़कोला की ओर बढ़ गया. दिन भर की भाग-दौड़ और थकान के बाद शरीर पर लगती शीतल हवा उसे अत्यंत सुकून दायक प्रतीत हो रही थी.

मोटर सायकल चलाते हुए उसे झपकी आयी जो कि गाड़ी अनियंत्रित हो कर डगमगाने से खुली. चंद्र्भाल हैंडल सम्भालने का भरसक प्रयत्न कर रहा था, तभी हेडलाइट की रौशनी में सामने, रास्ते के बीचों-बीच दो आँखें कंचों के समान चमकी. यह कोई चाकू पर अफ़ीम से चिपकाई मोहरें ना थीं, बल्कि पहाड़ी भेड़िए की क़द-काठी का एक काला कुत्ता था जो देखने में काजल की कोठरी में लोट कर निकला मालूम देता था और ऐसा लग रहा था जैसे रास्ते के बीचों बीच जादू के ज़ोर से हवा में प्रकट हुआ हो.

कुत्ते को बचाने के जतन में चंद्र्भाल मोटर सायकल को अनियंत्रित हो कर गिरने से ना बचा पाया. ग़नीमत इतनी थी कि रास्ता पथरीला नहीं था और मोटर सायकल से छटक कर चंद्र्भाल जहां गिरा था वहाँ ऊँची घास थी जिस कारण उसे चोट ना के बराबर आयी. खुद को झाड़ कर सीधे हुए चंद्र्भाल ने देखा तो मोटर सायकल बीच रास्ते में गिरी पड़ी थी, लेकिन काले कुत्ते का कहीं कोई नामो निशान ना था.

‘इस लोहे के घोड़े पर सवारी गाँठना नहीं आता या इतनी पी ली है कि होश और मोटर दोनों क़ाबू से बाहर हो गए?’

पीछे से आयी उस जनाना आवाज़ में खुद जैसे सोमरस की मादकता घुली हुई थी. चंद्र्भाल चौंक कर पलटा, क्या वाक़ई उसका सामना किसी चुड़ैल से हो रहा था? सामने अपने सौंदर्य सेअप्सराओ को भी लज्जित करने की क़ाबिलियत रखने वाली जो लड़की खड़ी हुई थी उसके चुड़ैल होने की कल्पना करना भी चंद्र्भाल के लिए असम्भव था. दो पल के लिए स्तब्ध चंद्र्भाल उस रूपमती कन्या को सर से पैर तक घूरता रहा.

बंजारन के लिबास में खड़ी उस लड़की की रंगत उस ढलती शाम सरीखी साँवली थी जिसमें अब भी सूर्य की कांति शेष हो, नयन-नक़्श ऐसे तीखे जैसे पत्थर तराश कर उसपर मख़मल मढ़ दिया हो, ऊँचा क़द और उन्नत, कसी छातियाँ. अब तक चंद्र्भाल ने अनगिनत रूपमती स्त्रियाँ भोगी थीं लेकिन उनमें से कोई इस बंजारन की आधी भी ना थी.

‘वो कुत्ता अचानक से बीच रास्ते में आ गया.’

चंद्र्भाल ने लड़की के निचली होंठ के पास जो तिल था उसे निहारतेहुए कहा. 

‘कौन सा कुत्ता?’

‘ऊँचे क़द का काला कुत्ता, कुछ देर पहले रास्ते के बीचों बीच खड़ा था. मुझे गिरा कर जाने कहाँ ग़ायब हो गया.’

चंद्र्भाल लड़की से नज़रें हटा कर, उस कुत्ते को ढूँढने की आस में चारों ओर देखता हुआ बोला.

‘कोई कुत्ता ना था, मैं यहाँ काफ़ी देर से खड़ी हुई हूँ. तुम्हें इस लोहे के घोड़े पर सवार, इधर आते देख रही थी. तुम खुद में ही लड़खड़ाए और इसेलिए-दिए धूल चाट गए.’ लड़की गिरी हुई मोटर सायकल की तरफ़ इशारा करते हुए बोली.

‘तुम कौन हो? दिन ढलने के बाद इस बियाबान रास्ते पर अकेली क्या कर रही हो? चुड़ैल हो क्या?’

‘मैं तुम्हें चुड़ैल दिखाई देती हूँ?’

‘दिखती तो नहीं, पर एक अजीब बात है.’

‘क्या?’

‘इतनी ख़ूबसूरत होने के बावजूद तुम्हारी सूरत और आँखें ऐसी दिखती हैं जैसे मुस्कुराना ना जानती हों. तुम्हारे चित्त में एक विचित्र क्रोध दफन है.’

‘हो सकता है मैं चुड़ैल ही हूँ.’

‘काली रात सा काला लिबास पहने, यज्ञ से उठते धूम्र सरीखे नयनों वाली श्यामल कन्या! हाँ, पूरी सम्भावना है तुम्हारे चुड़ैल होने की.’

‘भयभीत हो? छुरा, पिस्तौल रखते हो और एक अकेली कन्या से भयभीत हो?’

‘यदि तुम वास्तव में चुड़ैल हुई तो भला छुरा और पिस्तौल तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगे. एक क्षण…तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ कि मेरे पास छुरा और पिस्तौल है?’

‘जब तुम कपड़े झाड़ते हुए उठ रहे थे तब पीछे कमर में खोंसी पिस्तौल दिखाई दी थी. छुरे का मूठ अब भी तुम्हारे कुर्ते की बायीं जेब से बाहर झांक रहा है.’

‘तो यह नैना सिर्फ़ सामने वाले को मंत्रमुग्ध नहीं करते, उसके कपड़ों, उसके तन का बारीक अध्ययन भी करते हैं?’ चंद्र्भाल दो कदम लड़की के पास आता हुआ बोला.

‘तुम्हें क्या पता कि अध्ययन सिर्फ़ तन तक सीमित है, या आत्मा की परतें भी खोलता है.’

‘अच्छा! ज़रा बताओ मेरी आत्मा की परतों में झांक कर क्या पता लगाया तुमने?’

‘भगोड़े हो; भाग रहे हो…खुद को बचाने के लिए, कहीं ठौर पाने के लिए.’

‘यह मेरी आत्मा की परतों में झांक कर जाना तुमने?’

‘नहीं, उन इश्तहारी पर्चों से जो उस गाड़ी पर बंधे हैं जिसे चुरा कर या लूट कर भागे हो.’

लड़की की बात पर चंद्र्भाल की नज़र मोटर सायकल पर गयी. पीछे बंधा पर्चे का बंडल, जिसे भागने की जल्दी में चंद्र्भाल फेंकना भूल गया था, रास्ते पर खुला पड़ा था और हवा से उड़ते हुए पर्चे चारों तरफ़ फैल रहे थे.

‘वाहन हरकारे का चला रहे हो लेकिन तुम खुद हरकारे नहीं हो. तुम्हारी सूरत इश्तहार पर छपी तस्वीर से मिलती है, मतलब तुम भगौड़े हो, जिसके सर पर इनाम है और जो किसी हरकारे का वाहन और लिबास लूट कर, किसी ठौर की तलाश में भाग रहा है.’

लड़की की बात सुन कर चंद्र्भाल का हाथ अपने चेहरे पर गया. गिरते वक्त उसके चेहरे पर लिपटा कपड़ा खुल गया था जिसका उसे ख़्याल ना रहा. लड़की ने उसकी सूरत देख ली थी.

‘मानना पड़ेगा, बला सी बुद्धि चलती है तुम्हारी. अब क्या करोगी? मुझे गोरों के हवाले कर के इनाम कमाओगी?’

‘गोरों और उनके इनाम में कोई दिलचस्पी नहीं मुझे. तुम मेरे काम आओ, मैं तुम्हारे काम आऊँगी.’

‘तात्पर्य?’

‘तुम्हारे पास यह लौह अश्व है, जो द्रुतगति से कहीं भी लेजा सकता है.’

‘तुम्हें कहाँ जाना है?’

‘कबिनी.’

‘कबिनी? वहाँ क्या है?’

‘वन के पार मेरा ग्राम है, कारापुरम.’

‘तुम चाहती हो मैं तुम्हें कबिनी नदी व वन के पार तुम्हारे ग्राम पहुँचाऊँ?’

‘सिर्फ़ वन तक! वहाँ से आगे मैं स्वयं चली जाऊँगी.’

‘अच्छा? मैंने तो सोचा तुम मुझे अपने ग्राम, अपने घर में शरण देने का प्रस्ताव दे रही हो.’

‘कल सुबह होते ही आस-पास के सभी नगर-ग्राम व राज्यों में तुम्हारी तलाश युद्ध स्तर पर आरम्भ हो जाएगी. किसी ग्राम या घर में शरण लोगे तो पकड़े जाओगे.’

‘यह सहायता प्रस्ताव तो तुम्हारे लाभ की बात कहता है. मेरे हित के लिए भला इसमें क्या है?’

चंद्र्भाल ने मोटर सायकल उठाई और उसपर सवार होते हुए बोला. लड़की चलते हुए उसके पास आयी. बहुत अजीब थी उसकी चाल. लम्बे घाघरे में ढके उसके पाँव नज़र नहीं आते थे, ना ही उसके चलने पर कोई आवाज़ होती थी; जैसे धरा पर वायु संग धुँध तैरती हो, कुछ वैसे चलती थी वो. उसकी नज़रें ना एक पल को चंद्र्भाल से हटतीं, ना उसकी पलकें झपकतीं. जिस प्रकार जलती चंदन की लकड़ी से उठती दाह की अपनी एक विशिष्ट गंध होती है, कुछ वैसी ही अलग सुगंध उसके जिस्म की दाह के साथ मिल कर उठ रही थी.

मोटर सायकल पर सवार चंद्र्भाल से आधे हाथ की दूरी पर खड़ी थी वो, फिर भी उसके तपते बदन की दाह चंद्र्भाल यूँ महसूस कर रहा था जैसे किसी जलती चिता के निकट खड़ा हो. क्या लड़की को ज्वर था? नहीं, ज्वर में तो चेहरा मुरझा जाता है, जब कि इसके मुखमंडल की आभा तो देखते ही बनती थी. इसकी आँखें! यदि धूम्र में जल की भाँति प्रतिबिम्ब उत्पन्न करने के लक्षण होते तो यकीनन वो इसके नयना बन जाता.

‘तुम्हारा हित मेरा कहा सुनने में है. मुझे वन तक ले चलो, तुम वन में ही ठहर जाना. वन में तुम्हें तलाशने कोई ना आएगा. उधर कोई नहीं जाता.’

लड़की ने चंद्र्भाल की आँखों में यूँ आँखें डाल कर कहा कि वो प्रतिवाद ना कर पाया, हालाँकि प्रतिवाद वो वैसे भी नहीं करना चाहता था. उस लड़की के नयनों को देखने से खुद को रोकना कहीं था किंतु उसके नयनों में नयना डाल कर उसे देखते रहना उससे भी विकट था, जैसे आषाढ़ की दोपहरी में सूर्य को अपलक निहारना.

‘नाम क्या है तुम्हारा?’

चंद्र्भाल ने उसके नयनों से अपनी नज़रें हटाते हुए सवाल किया. नज़रें उसके नयनों से हट कर भी उसके मुग्ध कर देने वाले चेहरे पर ठहर गयी थीं, जिस पर कुछ ऐसे भाव आए जैसे चंद्र्भाल से उसने ऐसे प्रश्न की अपेक्षा ना की हो.

‘भैरवी.’ लड़की ने होंठों में नाम बुदबुदाया, जो चंद्र्भाल को अपने अंतर्मन में यूँ गुंजायमान होता प्रतीत हुआ जैसे उस नाम से उसका वास्ता जन्म-जन्मांतर का हो, जैसे उसे पहले से ही ज्ञात था कि उसके सामने खड़ी रहस्यमयी कन्या का नाम भैरवी के अतिरिक्त दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता था.

‘भैरवी…भैरवी.’ चंद्र्भाल के होंठ स्वतः ही उस नाम का जाप लगाए हुए थे, कितना भला मालूम देता था उसे यह नाम पुकारना. क्या रात घिरते ही स्त्री से संसर्ग करने की चाह उसकी चेतना पर इस कदर कुंडली जमा रही थी कि खुद के भले की सुध-बुध जाती रही? नहीं, यह मात्र दैहिक आकर्षण की मादकता नहीं थी, जिस्म के भीतर एक जीव(आत्मा) होता है; यह अनुभूति उसके द्रवित होने की थी. क्या ठगों और व्यभिचारियों के जिस्म में भी जीव वास करता है? चंद्र्भाल के अंतर्मन ने जैसे उसकी इस अवस्था पर कटाक्ष किया. भैरवी के जिस्म से उठती दाह उसे पौष की सर्दरात में जलते अलाव सी भली मालूम दे रही थी. भैरवी कब उसकी मोटर सायकल पर सवार हुई और उसने कब मोटर सायकल आगे बढ़ाई इस बात का ध्यान चंद्र्भाल को ना था. भैरवी के शब्दों में; उसका यह ‘लौह अश्व’ जैसे स्वतः ही वायुवेग से उड़ा जा रहा था. उस अद्भुत और रहस्यमयी कन्या के बैठने से जैसे इस निर्जीव यांत्रिक वाहन में भी प्राण आ गए थे.

चंद्र्भाल को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो मोटर सायकल नहीं चला रहा, वो तो सिर्फ़ उसपर सवार था. ठंडी हवा के थपेड़े उसके चेहरे से टकरा कर, उसके माथे पर आए बालों को पीछे बिखेरते हुए गुजर रहे थे. अब चेहरा ढकने की आवश्यकता ना थी, पथरीला और जंगली मार्ग आगे सघन हो चला था. बीच रास्ते में पड़ने वाले कुछ छोटे क़स्बे और ग्राम पीछे छूट चुके थे. इस ओर ना कोई सैन्य टुकड़ी थी ना सैनिक.

चंद्र्भाल को एहसास हुआ कि उस राह पर वे अकेले मुसाफ़िर ना थे. पथरीले मार्ग के साथ लगी ऊँची झाड़ियों और पेड़ों की तरफ़ से एक आकृति उसकी मोटर सायकल की रफ़्तार का मुक़ाबला करते हुए साथ-साथ दौड़ रही थी, जिसकी दो कंचों जैसे चमकती आँखें कभी अंधेरी व घनी झाड़ियों के सघन जाल में खो जातीं तो कभी अचानक से द्रुत वेग से उड़ते दो टिमटिमाते जुगनुओ की तरह नज़र आतीं. चंद्र्भाल को यक़ीन था कि यह वही ऊँचे क़द का काला कुत्ता है जो पीछे उसकी राह में अचानक से प्रकट हुआ था, परंतु क्या एक कुत्ता एक मोटर की गति की बराबरी कर सकता था? इस उत्सुकता का वहन करने में असमर्थ चंद्र्भाल बार-बार गर्दन उचका कर झाड़ियों के पार अंधेरे में ताकने का प्रयत्न करता.

जंगल शुरू हो चुका था, झाड़ियों के पीछे भागती वो आकृति जैसे अचानक से स्थिर और सतर्क होकर खड़ी हो गयी. चंद्र्भाल को किस अज्ञात भाव ने प्रेरित किया यह तो वो समझ ना पाया किंतु उसके पाँव और उँगलियाँ स्वतः ही ब्रेक पर कसते चले गए. धूल, पत्तों और सूखी टहनियों पर तेज़ी से रगड़ खा कर रुकते पहियों की तीखी आवाज़ गूंजी, जिसके साथ ही दूर कहीं से कुत्ते के रुदन का स्वर सुनाई दिया. चंद्र्भाल की इंद्रियों ने फ़ौरन उसे किसी आने वाले संकट का संकेत दिया. हवा में दूर कहीं एक सरसराहट उभरी जो तेज़ी से उसके निकट आ रही थी. इंद्रियों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप चंद्र्भाल ने तेज़ी से अपना चेहरा पीछे की तरफ़ हटाया. एक धधकता हुआ अग्निबाण वहाँ से गुजरा जहां आधे क्षण पूर्व चंद्र्भाल का चेहरा था. पीछे की ओर झुकते समय चंद्र्भाल को मोटर सायकल की पिछली गद्दी ख़ाली होने का एहसास हुआ. उसने चौंक कर पीछे देखा, भैरवी वहाँ नहीं थी.

‘भैरवी!!’ चंद्र्भाल ने आवाज़ लगाई जिसका कोई प्रत्युत्तर ना मिला. अभी तो यहीं थी; इतनी जल्दी कहाँ ग़ायब हो गयी? क्या हवा में कपूर जैसे घुल गयी?

चंद्र्भाल की तर्क शक्ति उससे सवाल कर रही थी परंतु खुद को उत्तर देने का समय ना था. हवा में इस बार एक साथ कई सरसराहटें उत्पन्न हुईं.  चंद्र्भाल ने नीचे जमा अपना पाँव उठाया और मोटर सायकल समेत अपने शरीर को नीचे गिर जाने दिया. उसकी दिशा में आते कई अग्निबाण और उड़न तश्तरियों की तरह गोल घूमती धारदार चकरियाँ नीचे गिरे चंद्र्भाल के सर के ऊपर से निकल गयीं. चंद्र्भाल ने अपनी साँस रोकी और ज़मीन से दायां कान लगा कर कुछ सुनने की कोशिश करने लगा.  उत्तर कोण से तेज पदचापों के कम्पन आ रहे थे, जो उससे तक़रीबन बारह गज दूर थे. पेड़ों पर कूदने की आवाज़ और पत्तों का शोर भी था; यह शोर सामान्य रूप से पत्तों से हो कर गुजरती हवा का नहीं था यानी हमलावर बड़ी संख्या में थेऔर ज़मीन के साथ-साथ पेड़ों पर होते हुए भी उसकी तरफ़ बढ़ रहे थे. जिस स्थान पर चंद्र्भाल मोटर सायकल के साथ गिरा हुआ था वहाँ उसपर चंद्रमा की सीधी रौशनी पड़ रही थी. मोटर सायकल की ओट से निकलने का मतलब था हमलावरों के सीधे निशाने पर आना.

आख़िर कौन थे यह हमलावर? क्या यह भैरवी के साथी थे जो चंद्र्भाल की ताक में घात लगाए बैठे थे? नहीं, यह तो काफ़ी अतार्किक हुआ! अवश्य ही यह लुटेरे थे जो अंधेरे में उधर से गुजरने वाले किसी भी राहगीर को अपना शिकार बनाते थे; अवश्य इसीलिए भैरवी अकेले इस ओर आने से डर रही थी. परंतु वो अचानक ग़ायब कहाँ हो गयी? चंद्र्भाल ने अपने भटकते ध्यान को एक बार फिर एकाग्र किया. लुटेरों की टोली जंगल के भीतरी हिस्से से नहीं बल्कि उत्तर की तरफ़ जंगल के बाहरी हिस्से से उसकी ओर बढ़ रही थी, यदि वो किसी प्रकार जंगल के अंदरूनी भाग में पहुँच पाता तो चाँदनी और हमलावर, दोनों से छिपने को उपयुक्त स्थान मिल सकता था. उस पल चंद्र्भाल के भाग्य के सितारे अवश्य ही अनुकूल दशा में थे; उसे बच निकलने का अवसर देने के लिए ही जैसे काले बादलों के आवरण ने चंद्रमा को अपने आग़ोश में क़ैद कर लिया. चंद्र्भाल सिंहों के समूह से प्राण बचाने के लिए कुलाँचे भरते मृग के समान उछलता हुआ जंगल की ओर भागा. वातावरण में घुप्प अंधकार पसरा हुआ था जिसे भेदते हुए अग्निबाण हवा में लहराए परंतु उन्हें अपना लक्ष्य ना मिला.

‘वो वन की ओर जा रहा है. वन में प्रवेश करने से रोको उसे!’

एक वट वृक्ष की ओट में खड़े चंद्र्भाल को पीछे से किसी हमलावर की आवाज़ सुनाई दी. तीन अग्निबाण और दो चकरियाँ उस वटवृक्ष के तने में धँसे हुए थे, जो चंद्र्भाल के शरीर में धँसे होते यदि वो सही समय पर वृक्ष की आड़ ना लेता. आक्रमणकारी उसे वन में प्रवेश क्यों नहीं करने देना चाहते? यह सोचते हुए चंद्र्भाल ने वृक्ष की ओट से एक घनी झाड़ियों के समूह की तरफ़ छलांग लगाई. हवा में उसे अपने अतिरिक्त अन्य सरसराहटें सुनाई दीं जिनकी गति उससे कम से कम दोगुनी थी. एक हवा में घूमती चकरी उसके कंधे पर से कपड़े और त्वचा को चीरते हुए गुजरी. उसका कुर्ता तेज़ी से लाल हो रहा था. चकरी के साथ आते अग्निबाण को यदि चंद्र्भाल ने बला सी फुर्ती का प्रदर्शन करते हुए लपक ना लिया होता तो वो उसकी गर्दन में धँसा होता. अग्निबाण के वेग और ताप से चंद्र्भाल की उँगलियाँ और हथेली बुरी तरह झुलस गयी.

झाड़ियों तक चंद्र्भाल व अन्य अग्निबाण एक साथ पहुँचे; आग की लपटों से झाड़ियाँ धधक उठीं. घोर पीड़ा को पीते हुए चंद्र्भाल ने अपनी हथेली व उँगलियों की खाल पर चिपके अग्निबाण को खींच कर अलग किया. उसने अपने जबड़े भींच रखे थे ताकि कराह ना निकलने पाए. चंद्र्भाल को अपने आस-पास पेड़ों पर तेज़ी से बढ़ती गतिविधि का एहसास हुआ. वो फ़ौरन जलती हुई झाड़ियों से पीछे हटा. वानरों की भाँति पेड़ों की लताएँ पकड़ कर झूलते झूलते तीन-चार आक्रमणकारी अलग-अलग पेड़ों से हवा में लहराए. इनके धारदार शस्त्र अंधेरे में बिजली की तरह कौंध रहे थे. कटार, कुल्हाड़ी, बर्छी, तलवार और गंडासा चारों ओर से बरस रहे थे. हवा में कलाबाज़ी खा कर इनसे बचतेहुए चंद्र्भाल ने एक कुल्हाड़ी और गंडासा अपने क़ब्ज़े में किया. चंद्र्भाल और उसके आक्रमणकारियों के पाँव एक साथ ज़मीन पर पड़े. आक्रमणकारियों ने चंद्र्भाल के चारों ओर गोल चक्रव्यूह बना कर उसे घेर लिया.

‘कौन हो तुम लोग? लुटेरे? मेरे प्राण लेकर कुछ ना मिलेगा. मेरे पास जो कुछ है मैं वैसे ही तुम्हारे हवाले करने को तैयार हूँ.’

चंद्र्भाल ने सतर्कतापूर्वक चारों तरफ़ नज़रें घुमाते हुए कहा. सभी आक्रमणकारी सर से पाँव तक आबनूस के समान काले लिबास में थे, सर और चेहरा भी उन्होंने काला साफ़ा बांध कर ढँका हुआ था, सिर्फ़ उनकी आँखें खुली थी जो गहरे काले सुरमे से पुती हुई थीं. चंद्र्भाल के प्रस्ताव से अन आँखों की भाव-भंगिमाओ ं में कोई परिवर्तन ना आया. चंद्र्भाल को यह समझने में क्षण भी ना लगा कि आक्रमणकारियों का उद्देश्य उसे लूटना नहीं बल्कि जान से मारना है. चक्रव्यूह बनाए हमलावर चारों तरफ़ से एक-साथ चंद्र्भाल पर झपटे. चंद्र्भाल ने हवा में गोल घूमते हुए अपने दोनों हाथ चक्रवात की भाँति घुमाए; एक हमलावर की बाँह कट कर दूर जा गिरी तो दूसरे के हाथ की सारी उँगलियाँ जाती रही. गंडासा एक हमलावर का जबड़ा दो-फाड़ चीरता हुआ उसके गले में फँस गया.  दो-फाड़ चिरे हुए मुँह से रक्त का सोता फूट निकला; चंद्र्भाल की कुल्हाड़ी ने भी कुछ वैसा ही कमाल कर दिखाया. एक हमलावर का सर कट कर पेड़ से टूट कर गिरे बेल की भाँति दूर लुढ़कता चला गया और वेग में आगे बढ़ता उसका सर विहीन धड़ रक्त के फ़ौवारे छोड़ता हुए आगे एक वृक्ष से जा टकराया. आक्रमणकारियों की इस टुकड़ी का चक्रव्यूह छिन-भिन्न हो चुका था. कुछ मारे गए, जो बचे वो अंग भंग हुए, भूमि पर अपने रक्त और मिट्टी में सने हाय-हाय कर रहे थे; परंतु लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई थी. सामने से अग्निबाण चलाते हुए आक्रमणकारियों का बड़ा समूह चंद्र्भाल के बिल्कुल निकट आ चुका था. आसमान में घिरे काले बादल बुरी तरह गरजे; जलते अग्निबाणों का समूह चंद्र्भाल की ओर लपका, जिससे बचने के लिए चंद्र्भाल ने अपने दाहिने तरफ़ छलांग लगाई. इस ओर लगभग आठ गज गहरी ढलान थी जो सूखे पत्तों और टहनियों से पटी पड़ी थी. अग्निबाणों से बचता हुआ चंद्र्भाल ढलान पर लुढ़कता चला गया, गहरे जंगल की ओर. तेज़ी से लुढ़कते चंद्र्भाल के लिए अपनी गति पर नियंत्रण कर पाना मुश्किल हो रहा था. उसके हाथ कोई उभरी हुई जड़, झाड़ या टहनी टटोलने की कोशिश कर रहे थे जिसे पकड़ कर वो अपनी गति पर नियंत्रण पा सके. ढलान के मुहाने पर आक्रमणकारियों की टोली एक सीधी क़तार में खड़ी हुई थी और ऊपर से ही अग्निबाण व चकरियाँ फेंक कर चंद्र्भाल को अपना निशाना बनाने की कोशिश कर रही थी.

चंद्र्भाल के हाथ एक वृक्ष की उभरी हुई जड़ों पर पड़े, उसने मज़बूती से जड़ पकड़ ली फिर भी गति से लुढ़कता उसका शरीर ढलान के किनारे पर उगे उस बरगद से जा टकराया, उसके पेट में बल पड़ गए. दर्द से कराहता चंद्र्भाल अपना पेट पकड़ कर बरगद के तने से पीठ टिका कर बैठ गया और मुँह को आते कलेजे व उखड़ी हुई साँसों को क़ाबू में करने का प्रयास करने लगा. उसके हाथ-पाँव, घुटने व कुहनियाँ बुरी तरह छिल गए थे, माथे पर भी चोटें आयी थीं. अपने लहू व धूल-मिट्टी में सना, थकान से चूर, भूख-प्यास से व्याकुल व अशक्त, वो आक्रमणकारियों के लिए अब एक आसान शिकार था. किंतु आक्रमणकारियों ने ढलान से नीचे उतरने की कोशिश ना की, वे मुहाने पर यूँ खड़े रहे जैसे वहाँ कोई अदृश्य लक्ष्मण रेखा खिची हो जिसे जिसे पार करने की कोशिश करते ही वो भस्म हो जाएँगे. मुहाने पर खड़े-खड़े ही उन्होंने अपनी प्रत्यंचा पर अग्निबाण चढ़ाए. उस कोण से नीचे चंद्र्भाल पर निशाना साधना बेहद सरल कार्य था, वैसे भी चंद्र्भाल में अपना बचाव करने के लिए कतरा भर ऊर्जा भी शेष ना थी.

उसका हाथ कमर पर खोंसी पिस्तौल पर गया. उसने तेज़ी से पिस्तौल निकालते हुए गोलियाँ दागी. वेब्ली टॉप ब्रेक रिवॉल्वर ने आग उगलते हुए छे .455 कैलिबर की गोलियाँ दागी. गोलियाँ चलने के समय ही आसमान में ज़ोरदार बिजली कड़की. इतनी भीषण गर्जना हुई जिसमें गोलियों का शोर घुट गया, रौशनी का ऐसा झमका उठा कि सबकी आँखें चौंधिया गयीं. मुहाने पर खड़े आक्रमणकारियों की क़तार में से पाँच आक्रमणकारी ढ़ेर हो गए थे. तीन ऊपर गिरेऔर दो के बेजान शरीर ढलान सेनीचेलुढ़क कर झाड़ियों मेंजा फँ से. चंद्र्भा ल की चलाई एक गोली शायद अपना निशाना चूक गयी थी. ऊपर आक्रमणकारियों के दल में भारी खलबली मच गयी थी. अंधेरा वापस छा चुका था और घोर घन गर्जना के साथ बारिश शुरू हो हो गयी थी. जंगल में दूर कहीं से कुत्ते का या फिर किसी भेड़िए या सियार का रुदन सुनाई दिया. आक्रमणकारी विचलित अवश्य हुए थे किंतु ना वे ढलान से नीचे आए और ना ही वहाँ से भागे.

चंद्र्भाल ने देखा कि वे फिर से अग्निबाण दागने की तैयारी कर रहे हैं. उसकी पिस्तौल ख़ाली हो चुकी थी, प्राण बचाने का यह उसका अंतिम प्रयास था जो विफल रहा. पिस्तौल थामा हुआ चंद्र्भाल का हाथ जैसे बेजान होकर नीचे गिर, पिस्तौल उसके हाथ से छूट कर कहीं लुढ़क गयी. किसी भी क्षण उसका जिस्म अग्निबाणों से बिंधने वाला था. वर्षा तेज हो चली थी, चेहरे पर पड़ती पानी की बौछार किसी भी क्षण अग्निबाणों की बौछार में बदलने की प्रतीक्षा करते चंद्र्भाल की उँगलियाँ ज़मीन पर बिखरे सूखे पत्तों के बीच किसी चीज़ से टकराईं. पत्थर जैसी ठोस, किंतु चिकनी इस वस्तु का आकार विचित्र व अप्राकृतिक था. चंद्र्भाल ने वह वस्तु उठाई. वो एक पीले रंग का, हथेली से कुछ बड़ा आयताकार बक्सा था जिसपर तीन क़तारों में, दो-दो के जोड़े खटके उभरे हुए थे. इन छोटे-छोटे खटकों पर अंग्रेज़ी के 1-9 तक के अंक व अंग्रेज़ी के अक्षर लिखे थे. खटकों की इस क़तार के ऊपर भी अलग-अलग आकार के कुछ खटके थे जिन पर विचित्र से चिन्ह अंकित थे, इनके ऊपर एक गहरे रंग का छोटा आयताकार घेरा था, इसके अंदर भी कुछ विचित्र से चिन्ह अंकित थे. ऐसी विचित्र वस्तु चंद्र्भाल ने पहले कभी ना देखी थी. क्या यह अंग्रेजों का कोई नए क़िस्म का हथियार था? कोई बम? हाँ! अवश्य ही यह कोई नयी तकनीक का बम था.

चंद्र्भाल ने निश्चय किया कि यदि मरना ही है तो वो इन हरामख़ोर हमलावरों को साथ लेकर मरेगा, किंतु यह बम फटेगा कैसे? चंद्र्भाल ने उभरे हुए खटकों को बेतरतीब ढंग से दबाना शुरू किया. अगले ही पल सभी खटके जैसे जल उठे और गहरे रंग के आयताकार घेरे से रौशनी निकल कर चंद्र्भाल की आँखों से टकराई. इसके साथ ही उस पीले बक्से से एक एक तीखी सीटी की ध्वनि जैसा विचित्र संगीत बाजना शुरू हो गया. यह धुन उसने पहले सुनी थी. सिटी हॉल में गोरे अपनी मेमों संग इस धुन पर नाचते थे. लेकिन वहाँ तो संगीतकारों और साज़कारों का पूरा जमावड़ा मिल कर यह धुन बजाता था. यह संगीत भला इस छोटे से बक्से से कैसे निकल रहा था? चंद्र्भाल ने घबराकर उस बक्से को आक्रमणकारियों की तरफ़ फेंका. एक बार फिर ज़ोरदार बिजली कौंधी. रौशनी का झमका इतना ज़ोरदार था कि चंद्र्भाल की चौंधियाई आँखों के सामने सैकड़ों सितारे नाचने लगे, जिनके बीच एक अजीब से दृश्य उभर रहा था.

एक दुबला-पतला, लम्बे क़द का युवक जिसकी उम्र अट्ठाईस, बड़ी हद तीस के क़रीब होगी; कंधे तक लम्बे, लहरदार बाल, चेहरे-मोहरे की बनावट व रंग जिसके हिंदुस्तानी होने की पुष्टि कर रहे थे; किसी अजीब से बड़े कक्ष में खड़ा था जहां विचित्र यंत्र थे, दीवारों पर विचित्र आकृतियाँव पर्चे लगे थे. वो नवयुवक जैसे चंद्र्भाल को ही घूर रहा था. फ़ोटोग्राफ़ के नेगेटिव के जैसा नज़र आता यह दृश्य एक ही पल में रौशनी के उस झमके के साथ लोप हो गया. चंद्र्भाल की आँखों के आगे अंधेरा और धुँधलका छाया हुआ था. उसने कस कर अपनी आँखें मीचीं और सर को झटका दिया. जब उसकी आँखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तब सामने का दृश्य बदल चुका था. ढलान के ऊपर आक्रमणकारियों का नामो निशान ना था. ऐसा लग रहा था जैसे वो रौशनी का झमका उन सबको निगल गया हो. वो पीले रंग का विचित्र बक्सा भी ग़ायब हो चुका था.

बारिश बंद हो रही थी और चाँद पर से बादल छट रहे थे. ढलान के ऊपर, मुहाने पर एक आकृति उभरी, जिसकी दो कंजी आँखें हीरों के मानिंद चमक रही थीं. यह वही काला कुत्ता था. चंद्र्भाल को घूरते हुए इसके मुँह से एक अजीब सी गुर्राहट निकली. चंद्र्भाल ने खड़े होने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर उसका भार ना ले सके. लड़खड़ा कर गिरते हुए चंद्र्भाल ने पेड़ का सहारा लेने का प्रयास किया लेकिन पेड़ के जिस हिस्से पर चंद्र्भाल का हाथ पड़ा वो यूँ अंदर को धँस गया जैसे सड़ कर अंदर से खोखला हो गया हो और उसके भीतर एक विशाल व गहरी कोटर बन गयी हो. चंद्र्भाल उस ख़रगोश की खोह जैसी सुरंग में यूँ गिरता चला जा रहा था जैसे वो अंतहीन सुरंग वृक्ष की जड़ों से होते हुए पाताल तक जाती हो. उस पेड़ के पास की झाड़ियों में कुछ हलचल हुई. मिट्टी व कीचड़ से सने दो नन्हे पाँव झाड़ियों से निकल कर उस वृक्ष के पास आए. वो आकृति अपने नन्हे पाँवों पर उचक कर कोटर रूपी सुरंग में चंद्र्भाल को गिरते देख रही थी. सुरंग से आती नीचे गिरते चंद्र्भाल की चीख अब दूर, और दूर होती जा रही थी. नीचे गिरते चंद्र्भाल का दिमाग़ उस सुरंग से गहरे अंधेरे में डूब गया. उस आकृति के चेहरे पर संतुष्टि के भाव आए, उसने पीछे पलट कर ढलान के ऊपर खड़े काले कुत्ते की ओर देखा. कुत्ता अपना मुँह ऊपर उठा कर रुदन करने लगा. इस घटनास्थल से कुछ ही दूरी पट एक ऊँचे पीपल वृक्ष के ऊपर, पत्तों के झुरमुट में छुपी बैठी एक विशालकाय आकृति यह सारा माजरा देख रही थी.

* * June, 1997

Bangalore, India

वह जून की सबसे गर्म दोपहर थी, ग़ैराश की ऐस्बेस्टॉस शीट लगी सीलिंग उसे किसी तंदूर सा तपा रही थी. प्रभाकरण के वॉकमैन पर डिसेम्बर में रिलीज़ हुई प्रभुदेवा की फ़िल्म ‘कधलन’ का चार्टबस्टर ‘टेक इट ईज़ी उर्वशी’ बज रहा था और हेडफ़ोन लगाए हुए प्रभाकरण अपने नए मैकिंटॉश 6500/300 पर कमांड्ज़ देने में व्यस्त था. दो महीने पहले लॉंच हुई यह तकनीक की अद्भुत कारीगरी उसे पिछले महीने बैंगलोर में मैजिक अ’कैडमि द्वारा आयोजित ‘वर्ल्डमैजिक फ़ेस्टिवल’ में विश्व भर से आए 600 से भी अधिक जादूगरों द्वारा दिखाए गए करतबों से भी कहीं ज़्यादा चमत्कारी लग रही थी. इस मशीन को वॉशिंटॉन से ख़रीद कर पुणे लाने में लगभग दो लाख रुपए खर्च हो चुके थे, ग़ैराश में मौजूद अन्य उपकरण; जिनमें कम्प्यूटर से जुड़े टीवी मॉनिटर, वीडियो इनपुट डिवाइस, और मॉडम के अतिरिक्त, एक पोर्ट के बल से कनेक्टेड मशीन भी थी जिसकी ऊँचाई लगभग पाँच फ़ीट होगी, इस आयताकार मशीन पर दो वुडन प्लैट्फ़ॉर्म थे जिनमें से निचले प्लैट्फ़ॉर्म पर तारों से जुड़े कई अलग अलग सर्किट थे और चारों कोनों पर लगेचार वुडन पिलर्स से होते हुए ऊपर के प्लैट्फ़ॉर्म तक जाते थे जहां पारदर्शी काँच का एक बहुत बड़ा जार लगा हुआ था जिसके अंदर पुराने जमाने में घंटाघरों में प्रयोग होने वाली घड़ियों जैसे दो डायल थे. ब्रास के बने यह दोनों डायल के ब्रास बॉक्स से जुड़े हुए थे. ब्रास बॉक्स एक तरह का प्रोजेक्टर था जिसमें तीन प्रोजेक्शन लेंस लगे हुए थे.

इस मशीन का एक के बल ग़ैराश के इलेक्ट्रिक बोर्ड से कनेक्टेड था. यह ‘क्रॉनोस्कोप’ प्रभाकरण की इन्वेन्शन्वे न था जिसे बनाने में उसकी लगभग सारी पुश्तैनी पूँजी फुँक चुकी थी, रही सही कसर हर महीने आते हज़ारों रुपए के बिजली के बिल पूरी कर रहे थे. पड़ोसियों ने अलग जीना हराम कर रखा था क्योंकि प्रभाकरण के रात-बेरात एक्स्पेरिमेंट करने से पूरे एरिया की पावर सप्लाई ट्रिप कर जाती थी. अभी पिछले हफ़्ते ही रात के ढाई बजे प्रभाकरण के एक्स्पेरिमेंट के चलते एरिया का ट्रैन्स्फ़ॉर्मर फुँक गया, जिसे ठीक होने में तीन दिन लगे. इन तीन दिनों में पूरे मोहल्ले ने प्रभाकरण को दाऊद इब्राहिम से भी बड़ा और ख़तरनाक आतंकी घोषित कर दिया था. हालाँकि इससे प्रभाकरण को कोई ख़ास फ़र्क़ ना पड़ा, उसे अफ़सोस इस बात का था कि उसके तीन दिन बर्बाद हो गए और बिजली विभाग ने उस पर जुर्माना ठोंक दिया सो अलग. जिन महान साइंटिस्ट्स और रीसर्चर्स की जीवनियाँ पढ़ते हुए प्रभाकरण बड़ा हुआ था; जिन्हें दुनिया ने पागल, नाकारा और असामाजिक तत्व जैसी उपाधियों से नवाज़ा, लेकिन जिनके आविष्कारों ने मानव विकास में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए और अपने आलोचकों के मुँह पर ताले जड़ दिए; इन वैज्ञानिकों की श्रेणी में अपना नाम दर्ज कराने के वो बहुत क़रीब है, ऐसा प्रभाकरण का अटूट विश्वास था.

उसका यह विश्वास बेबुनियाद ना था, कोई भी रचनाकार जब अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना का सृजन का सृजन कर रहा होता है तो वो उसकी आने वाली सफलता को महसूस कर सकता है; यह भाव मातृत्व के समान ही है, जहां माँ अपनी संतान के अंतर्मन के भावों को बिना कहे महसूस कर लेती है;  प्रभाकरण महसूस कर रहा था कि वो सफलता के बेहद क़रीब है. एक बार ‘क्रॉनोस्कोप’ काम कर जाए फिर जिनके मुँह उसका मज़ाक़ उड़ाने और उसे बुरा-भला कहने को खुलते हैं वो खुले के खुले रह जाएँगे. प्रभाकरण चाहता तो कुकरमुत्तों की तरह खुल रही आइ.टी. फ़र्म्स में से किसी का टॉप बॉस बन कर लाखों रुपए कमा सकता था. वो जानता था कि आने वाले पाँच सालों में आइ.टी.  सेक्टर में कितना वृहद्रूप लेने वाला था लेकिन प्रभाकरण को कॉर्पोरेट स्लेव नहीं बनना था, और ना ही वो चाहता था कि निकोला टेस्ला की तरह उसके आइडिया और इन्वेन्शन किसी सरकारी विभाग द्वारा चुरा लिए या फिर थॉमस एडिसन जैसे किसी प्रभावशाली ब्युरोक्रेट द्वारा बहिष्कृत व निषिद्ध कर दिए जाएँ.

नया ट्रैन्स्फ़ॉर्मर लगने के बाद से प्रभाकरण पिछले पाँच दिनों से अपने ग़ैराश में रात-दिन काम कर रहा था. यह ग़ैराश उसकी लैब से ज़्यादा उसका घर बन चुका था, जिसकी दीवारों पर ‘फ़ज़ी’ चॉकलेट बार के साथ मिलने वाले 1983 ऐनिमेटेड सिरीज़ ‘ही-मैन एंड द मैस्टर्ज़ ऑफ़ द यूनिवर्स’  के सभी कैरेक्टर्स के स्टिकर्स से लेकर ‘स्टार वॉर्स’ ट्रिलॉजी व ‘स्टार ट्रेक’ टेलिविज़न सिरीज़ के पोस्टर्स लगे हुए थे. इसके अलावा, कोने में रखा बुक शेल्फ ‘वीयर्डफ़ैंटसी’, ‘लॉस्ट वर्ल्ड्ज़ ’, ‘मिस्ट्री इन स्पेस’, और ‘वीयर्ड साइंस’ कॉमिक बुक्स से लेकर ‘स्टार लॉग’, ‘स्काई एं ड टेलिस्कोप’ ‘अस्टाउंडिंग साइंस फ़िक्शन’ और ‘असिमोव ‘स साइंस फ़िक्शन’ मैगज़ीन्स सेपटा पड़ा था. टेलिविज़न कैबिनेट और वी.सी.आर. के ऊपर ‘2001 ए स्पेस ऑडिसी’, ‘स्टार वॉर्स’ ट्रिलॉजी व ‘बैक टू द फ़्यू चर’ ट्रिलॉजी के वीडियो कसेट रखे हुए थे.

प्रभाकरण की डेस्क पर आइज़ैक असिमोव की शॉर्ट स्टोरीज़ का कलेक्टर्स एडिशन रखा था जिसमें असिमोव की साई-फ़ाई शॉर्ट स्टोरी ‘द डेड पास्ट’ बुक्मार्क की हुई थी. वास्तव में यह कहानी ही प्रभाकरण के आविष्कार की प्रेरणास्रो त थी. कहानी के दो मुख्य किरदार ऑर्नल्ड पॉटरले और जोनस फ़ॉस्टर एक ‘क्रॉनोस्कोप’ बनाने की कोशिश करते हैं जिसकी मदद से वो पुरातन कॉर्थिज सभ्यता का अवलोकन कर पाएँ परंतु वे पूरी तरह सफल नहीं हुए. 1956 में ‘टाइम व्यूइंग’ पर फ़िक्शन लिखते हुए आइज़ैक असिमोव ने आने वाले भविष्य और जिस तकनीकी व वैज्ञानिक उन्नति की कल्पना की थी, विज्ञान सन 2000 से पहले ही उससे कहीं ज़्यादा तरक़्क़ी कर चुका था. फ़ॉस्टर और पॉटरले ‘क्रॉनोस्कोप’ सही ढंग से नहीं बना पाए क्योंकि उनके पास 50 MHz, 4MB ROM, 128MB RAM, 6 GB हार्ड ड्राइव वाली कोई अड्वैन्स मशीन और उसका सही ढंग से इस्तेमाल कर पाने वाला दिमाग़ नहीं था. न्यूट्रीनिक्स की सही जानकारी और ‘न्यूट्रीनो’  स्ट्रीम को रेग्युलेट करने का फ़ॉर्म्युला, ताकि वो स्पेस-टाइम क्रॉस-सेक्शनल अवरोध को पार कर के स्पेस व टाइम दोनों मेंइस प्रकार यात्रा करे, जिससे समय धारा में किसी भी निर्धारित समय काल के लाइट वेव और एयर मॉलेक्यूलर स्ट्रक्चर को ‘क्रॉनोस्कोप’ जैसे यंत्र की सहायता से कैप्चर कर के किसी फ़िल्म की तरह प्रोजेक्टर द्वारा मोशन इमेजिंग प्रोजेक्शन किया जा सके; यह काम प्रभाकरण कर सकता था.

उसका ‘क्रॉनोस्कोप’ तैयार था, क्रॉनोस्कोप के प्रोजेक्टर लेंस ने पिछले हफ़्ते एक फ़िल्म नेगेटिव जैसी धुंधली इमेज फ़्लैश की थी लेकिन उसी समय ओवरलोड से ट्रैन्स्फ़ॉर्मर उड़ गया था. प्रभाकरण का दिल कह रहा था कि आज कमाल होने वाला है. नींद, भूख-प्यास, सब कुछ त्याग कर प्रभाकरण घंटों तक कम्प्यूटर और क्रॉनोस्कोप पर काम करता रहा. उसे समय का भी ध्यान ना रहा कि दोपहर से आधी रात कब होने को आ गयी. आसमान में चाँद के आगे काले घने बादल छा गए और कान के पर्दे फाड़ देने वाली आवाज़ के साथ बिजली चमकने लगी. यह मॉन्सून के आगमन का संकेत था.

‘जीत का मंत्र है, टेक इट ईज़ी पॉलिसी!’

‘फ़ज़ी’

बार का रैपर खोल कर एक बाइट लेते हुए प्रभाकरण ने की-बोर्ड पर फ़ाइनल कमांड प्रॉम्प्ट दिया और क्रॉनोस्कोप ऑन कर दिया. क्रॉनोस्कोप के ग्लास जार के अंदर दोनों ब्रास डायल की सुइयाँ तेज़ी से घूमने लगीं और जार के अंदर बहुत ही सूक्ष्म आकार की, जुगनुओ जैसी, जलती- बुझती चिंगारियाँ नाचने लगीं. किसी इंडस्ट्रीयल जेनरेटर की तरह ज़ोरदार शोर करते हुए क्रॉनोस्कोप बुरी तरह थर्राने लगा. ग़ैराश में जल रहा दो सौ वॉट का बल्ब फुकफुका कर पतली तार जैसा जलने लगा और फिर फ्यूज़ हो गया, पूरे मोहल्ले में जल रही सभी लाइट, यहाँ तक कि स्ट्रीट लाइट्स का भी यही हश्र हुआ, लेकिन ग़ैराश में रौशनी की कोई कमी ना थी. क्रॉनोस्कोप जार से निकल कर तीव्र रौशनी चारों तरफ़ फैल रही थी. क्रॉनोस्कोप के सामने रखी डेस्क के ऊपर एक स्क्रीन लगी हुई थी, क्रॉनोस्कोप के एक प्रोजेक्शन लेंस से रेज़ निकल कर स्क्रीन पर कुछ धुंधली सी आकृतियाँ बनाने लगीं.

‘हाहाहाहा…प्रभाकरण! यू हैव डन इट, यू जीन्यस सन ऑफ़ बिच!’

उत्तेजना से प्रभाकरण की आवाज़ और उँगलियाँ काँप रही थीं. इमेज क्लीयर करने के लिए उसने की-बोर्ड पर कमांड प्रॉम्प्ट दिए. स्क्रीन पर किसी घने जंगल के दृश्य उभरे. पहनावे से अंग्रेजों के समय का हरकारा लगने वाला एक युवक अपनी जान बचाने के लिए भाग रहा था, उसका पीछा करते हमलावर उसपर जलते तीरों और हथियारों से वार कर रहे थे. इमेज अब भी बिल्कुल साफ़ नहीं थी.

‘येक्या है? किसी के डिश एंटेना का सिग्नल तो नहीं कैच करने लग गया यह? पता चला कि मैं डी.डी. मेट्रो का ‘बेताल पच्चीसी’ देख कर खुश हो रहा हूँ कि मैंने टाइम व्यूइंग मशीन की ईजाद कर ली!’

प्रभाकरण ने खुद में बड़बड़ाते हुए अपना हेडफ़ोन उतारा और प्रोजेक्शन इमेज को और शार्प करने की कोशिश करने लगा. तभी बाहर आसमान में ज़ोरदार बिजली कड़की. पूरा ग़ैराश यूँ थर्रागया जैसे आकाशीय बिजली सीधे वहीं गिरी हो. प्रभाकरण की आँखें चौंधिया गयीं. जब उसकी आँखों के सामने नाचते सितारे छँटे तो स्क्रीन पर उसे वो युवक साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था जैसे कि प्रभाकरण उसे ठीक अपने सामने देख रहा हो. युवक बुरी तरह घायल था और एक पेड़ का सहारा लेकर बैठे हुए, यूँ सामने देख रहा था जैसे कि वो प्रभाकरण को देख सकता हो. एक पल को उस युवक के चेहरे पर आए भाव देख कर प्रभाकरण को लगा कि युवक वाक़ई उसे देख रहा है. असमंजस में खड़े प्रभाकरण ने स्क्रीन के क़रीब जाने की कोशिश की लेकिन तभी, एक बार फिर से ज़ोरदार बिजली कड़की और मोहल्ले का ट्रैन्स्फ़ॉर्मर एक बार फिर फुँक गया. क्रॉनोस्कोप बंद हो गया और साथ ही स्क्रीन पर प्रोजेक्ट होती इमेज भी, लेकिन प्रभाकरण को यक़ीन था कि उसने स्पेस-टाइम बैरीयर को ब्रेक करने का तरीक़ा ढूँढ निकाला है. वो ख़ुशी से फूले नहीं समा रहा था. उसे यह बात सबसे पहले दक्षा को बतानी थी. प्रभाकरण अपना नोकिया 1611 फ़ोन ढूँढनेलगा. जैन्यूएरी में लॉंच हुआ यह पहला सोलर पावर्ड बैटरी ऑपरेटेड सेटेलाइट फ़ोन था. मैकिंटॉश के साथ इस फ़ोन के दो आइडेंटिकल येलो कलर वेरीएंट सेट भी प्रभाकरण वॉशिंटॉन से लाया था जिसमें से एक उसके पास था और दूसरा उसने दक्षा को दिया था ताकि जब भी उसका दिल करे वो दक्षा से बात कर सके.

‘कहाँचला गया? अरे यहीं डेस्क पर तो रखा था!’

प्रभाकरण चारों तरफ़ अपना फ़ोन ढूँढते हुए बड़बड़ाया. तभी उसके फ़ोन की बैंडिनेरी रिंगटोन बजी.

‘यह यहाँ कैसे पहुँच गया?’

मेज़ के नीचे से फ़ोन बरामद करते हुए प्रभाकरण आश्चर्यचकित था. फ़ोन यूँ गीला और कीचड़ में सना हुआ था जैसे सीधे जंगल से उठा कर वहाँ फेंक दिया गया हो

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