PROLOGUE  

1847 A.D.  

East India Company Ruled India  

Kabini Forest Area, Karnataka.  

‘पगला गए हो क्या! दिमाग़ दुरुस्त नहीं है? देर रात गए, घनघोर वर्षामेंकहाँआसरा मिलेगा?’ 

‘कदम बढ़ातेरह मीनाक्षी, इस वन सेपरे, पश्चिम दिशा मेंकारापुरा के समीप तांत्रिकों का एक छोटा सा ग्राम है. हमेंवहाँअवश्य शरण मिलेगी.’ 

‘तुम्हारेलिए कहना आसान हैपुरुराज, तुम्हारेगर्भका अंतिम माह नहीं चल रहा ना…ह्मफ़…ह्मफ़!  मुझसेऔर चला ना जाएगा. इस घनेवन और वज्रपात सरीखी वर्षामेंभला कौन हमारेपीछेआने वाला है? यहीं किसी वृक्ष की ओट मेंशरण लेतेहैं.’ 

‘तेरी मति मरी हुई हैमीनाक्षी! इस वन मेंकोई दिन के समय कदम ना धरे, रात्रि मेंतो स्वयं राक्षस वास करता हैयहाँ. यदि वो निगोड़ेअंग्रेज अपनेशिकारी कुत्तों के साथ हमारेपीछेना पड़ेहोतेतो मैं कदापि तुझेइस ओर ना लाता.’ 

‘उन अंग्रेजों सेअधिक निर्दयी, पतित और अत्याचारी तुम्हारा वो राक्षस ना होगा….ह्मफ़…य…यहीं रुकतेहैंपुरुराज…मुझेपीड़ा उठ रही है.’ 

मीनाक्षी के कदम थम गए, उसका एक हाथ अपनेनगाड़ेजैसेउभरेपेट पर था, दूसरेहाथ सेउसने बरगद के पेड़ की लताएँना थामी होती तो शर्तिया वो मुँह के बल औ ंधी गिरती. उसके आगेतेज़ी से चलता पुरुराज ठिठक कर रुका. उसेएहसास हुआ कि मीनाक्षी उसके पीछे नहीं आ रही है. वो मीनाक्षी और उसके बच्चेके लिए फ़िक्रमंद था लेकिन उससेज़्यादा फ़िक्र उसेपीछेआतेअंग्रेजों और इस वन के भयानक ब्रह्मराक्षस की थी जिसके क़िस्सेवो बचपन सेसुनता आया था. 

पुरुराज नेबाहों का सहारा देकर मीनाक्षी को बरगद के नीचेबिठाया. बरगद की ओट नेनश्तर सी चुभती बारिश की बूँदों पर ढाल लगा दी. पुरुराज के हाथ मेंथमी मशाल बहुत पहलेही बुझ चुकी थी फिर भी बारिश सेराहत पाकर देखनेमेंअभ्यस्त हुई उसकी नज़रेंजब मीनाक्षी के दर्दसेपीलेपड़ते चेहरेपर पड़ी तो उसेएहसास हुआ कि मीनाक्षी अतिशयोक्ति ना कह रही थी. पुरुराज नेअपनी पगड़ी खोल कर मीनाक्षी को ओढ़ा दी और अपनेआधेगंजेहो चुके सर पर हाथ फे रतेहुए मीनाक्षी से ज़्यादा जैसेखुद सेबोला. 

TANTRAPURAM

NITIN MISHRA  

‘इस वन मेंबच्चेको जन्म देना ठीक नहीं. रात्रि काल यम मुहूर्तलग चुका है. बालक के आनेके सभी संके त घोर अशुभ हैं…उस पर सेब्रह्मराक्षस का ख़तरा!’ 

आसमान मेंज़ोरदार बिजली कड़की. उसकी चमक सेएक पल को ऐसा लगा जैसेसूर्यसीधेवन के ऊँ चेपेड़ों की ऊपरी टहनियों पर आ टंगा हो. बादलों के फटनेजैसी भीषण और कर्कश आवाज़ हुई जिससेपुरुराज और मीनाक्षी के कान सुन्न पड़ गए. बिजली कौंधनेसेचौंधियाईं उनकी आँखों के आगेघुप्प अंधेरा छा गया था. उनके कानों मेंतेज सीटियाँबज रही थीं. दोनों नेअपनी आँखेंभींच लीं और कानों पर हाथ रख लिए. 

जब कानों मेंसीटियाँबजनी बंद हुईं तो दूर सेआती, शिकारी कुत्तों के भौंकनेकी आवाज़ सुनाई दी,  साथ मेंघोड़ों की टापेंभी, जो तेज़ी सेक़रीब आती प्रतीत हो रही थीं. मीनाक्षी का चेहरा दर्दसे, और पुरुराज का चेहरा डर सेपीला पड़ गया. 

जंगल मेंकाफ़ी उजाला हो गया था. आसमान सेबिजली उनसेचार गज दूर एक पीपल वृक्ष पर गिरी थी. पीपल किसी दैत्याकार मशाल की भाँति धूँ-धूँकर के ऐसेनिरंकु श जल रहा था कि मूसलाधार वर्षाभी उसपर क़ाबूपानेमेंअसमर्थसिद्ध हो रही थी.  

जलतेपीपल की रौशनी मेंबरगद के नीचेशरण लिए मीनाक्षी और पुरुराज उन शिकारी कुत्तों और उनके मालिकों के लिए खुला शिकार थे.  

मीनाक्षी- ‘आह्ह…sss!’ 

मीनाक्षी प्रसव पीड़ा सेदोहरी हो रही थी. बारिश सेलथपथ पुरुराज के माथेपर पसीना पानी के साथ मिल कर बहनेलगा. 

‘कु छ देर सब्र रख मीनाक्षी. यम मुहूर्तख़त्म होतेही अग्नि मुहूर्तलगेगा. बच्चेका जन्म शुभ मुहूर्तमें होना चाहिए.’ 

‘इट सीम्स वी हैव अराइव्ड जस्ट इन टाइम.’  

पुरुराज उस आवाज़ और अंग्रेज़ी भाषा को पहचानता था, उसेगोरों की यह भाषा समझ नहीं आती थी लेकिन फिर भी उसेपता था कि कहनेवालेका मंतव्य क्या है. वैसेभी घोड़ों पर सवारी गाँठने वालेअंग्रेज अफ़सर अपनेसाथ शिकारी कुत्तेऔर हिंदुस्तानी मुलाजिम लेकर चलतेथे. भारत वर्षमें अलग-अलग प्रांतों मेंबोली जानेवाली स्थानीय भाषाएँसमझ पाना अंग्रेजों के लिए नामुमकिन था,  

बोलना ना उन्हेंआता था ना इन कालेग़ुलामों की भाषा मेंउनकी कोई दिलचस्पी थी फिर भी उनका मानना था हुकू मत का डर और दबदबा तभी मज़बूत होता हैजब धमकी और गालियाँदोनों उस भाषा 2

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  मेंदी जाएँजो दमित को समझ आती हो, तभी पीड़ित को अपनेपीड़ित होनेका एहसास और उसके मन मेंहुकू मत करनेवालेका ख़ौफ़ क़ाबिज़ होता है. 

घोड़ेपर सवार ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज ऑफ़िसर ऑर्लैंडो के साथ उसका मुलाजिम तुलाराम भी था जो एक खच्चर पर सवार था. इनके पीछे चार सिपाही थे, दो अंग्रेज सिपाही घोड़ों पर थे लेकिन इनके घोड़ों की नस्ल ऑर्लैंडो के घोड़ेसेकमतर थी और दो हिंदुस्तानी सिपाही थेजो पैदल थे और दो-दो शिकारी कुत्तों की ज़ंजीरेंपकड़ेहुए थे.  

‘लगता हैबच्चा होनेवाला है.’ खच्चर पर बैठे तुलाराम नेउचक कर प्रसव पीड़ा मेंतड़पती मीनाक्षी को भरपूर निगाहों सेदेखतेहुए धूर्तभाव सेकहा. 

‘स्ट्रिप हर नेके ड सो वी कै न एं जॉय द शो. द डॉग्स आर हंग्री, वी कै न फीड देम विद वॉट्स कमिंग आउट…हाहाहा.’  

अपनेमालिक के कथन का अनुवाद करनेसेपहलेदो पल को तुलाराम भी ठिठक गया. ठिंगनेऔर मोटेबदन वालेकालेऔर कुरूप तुलाराम के अंदर मानवीय संवेदनाएँन्यूनतम स्तर पर थीं. उसके खुरपी जैसेमुँह सेबाहर निकलेसामनेके दांत और भिंचक कर चलनेका लोग बचपन सेही मज़ाक़ बनातेआए थे, यही वजह थी जिसनेतुलाराम को अंग्रेजों के लिए उनके कुत्तों जितना वफ़ादार बना दिया था. जब हिंदुस्तानियों के घर जलाए जाते, उन्हेंबांध कर उनके सामनेअंग्रेज और ईस्ट इंडिया कम्पनी के हिंदुस्तानी सिपाही उनकी बहू-बेटियों का बलात्कार कर उन्हेंज़िंदा जला देतेतो इससे तुलाराम को दिली सुकू न मिलता था लेकिन आज उसके अंदर का घिनौना, कुं ठाग्रस्त राक्षस भी आने वालेमंजर की कल्पना कर सिहर गया था. तुलाराम को अनुवाद करनेकी ज़रूरत भी ना पड़ी,  पुरुराज मीनाक्षी और उनके बीच आ खड़ा हुआ था. 

‘हरामज़ादों! मेरी बहन तक मेरेजीते-जी नहीं पहुँचोगेतुम लोग.’ 

पुरुराज कोई योद्धा ना था, ना ही उसके जाननेवालेउसेसाहसी वीर की उपाधि सेनवाज़ते. म्यान से तलवार निकालनेमेंउसेदोनों हाथ लगानेपड़तेथेऔर कमान कभी उससेसीधा पकड़ा नहीं जाता था, फिर आज तो उसके पास शस्त्र के नाम पर बस एक बुझी मशाल थी. पुरुराज जानता था कि आनेवालेपल उसके लिए यमराज के आगम का संदेश लाएँ गेलेकिन मीनाक्षी की दुर्गत वो अपने जीवित रहतेनहीं होनेदेगा, ऐसा दृढ़ निश्चय था उसका.  

‘यह तो अंग्रेज हैं, इनके लिए यह विलायती नस्ल के शिकारी कुत्तेहमसेअधिक दया और इंसानियत के पात्र हैंलेकिन तुम तो हम मेंसेएक हो. हमारा भगवान एक है. ऐसेजघन्य कृत्य कर के मरनेके बाद पितरों को क्या जवाब दोगे? क्या अपनेइष्ट देव सेनज़रेंमिला पाओगे?’ 

3

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  पुरुराज नेतुलाराम और शिकारी कुत्तों को पकड़े हिंदुस्तानी सिपाहियों सेदया की गुहार लगाई.  उनकी आँखों मेंइंसानियत और शर्मझलकी, जो अगलेही पल ऑर्लैंडो की घुड़की सेग़ायब हो गयी. 

‘रिलीज़ द डॉग्स, रिप हिम टू पीसेज़.’ 

कुत्तों की ज़ंजीर खोल दी गयी. शिकारी कुत्तेवाक़ई भूखेथे. ऑर्लैंडो के ठहाकों, बारिश, जलते पीपल की टूट कर गिरती शाखाओ ंऔर कुत्तों की गुर्राहट के बावजूद उनके जबड़ों मेंटूटती पुरुराज की हड्डियों की आवाज़ मीनाक्षी को साफ़ सुनाई दे रही थी. मीनाक्षी दर्दऔर वेदना सेचीख उठी.  पुरुराज सही था. यम मुहूर्तमेंपैदा हो रहा बच्चा अपनेसाथ मृत्युलाया था.  

लेकिन पुरुराज सिर्फ़ यम मुहूर्तके बारेमेंसही नहीं था. उस भयानक मंजर का साक्षी बननेवाली,  उस बरगद के नीचेमीनाक्षी इकलौती नहीं थी. मीनाक्षी के ऊपर पत्तों के बीच एक आकृति छुपी बैठी थी जो बिजली कड़कनेसेपूर्ववहाँनहीं थी. 

उस आकृति का ध्यान पूरेघटनाक्रम पर था. उसकी निगाहेंनिर्विकार भाव सेपुरुराज को शिकारी कुत्तों का शिकार बनतेदेख रही थीं. पुरुराज की सहायता करनेया उसेबचानेमेंउस आकृति की कोई रुचि नहीं थी. मरनेसेपहलेपुरुराज नेमशाल सेएक शिकारी कुत्तेका सर फोड़ दिया. कुत्तेकी खुली हुई खोपड़ी सेभेजा बाहर झांक रहा था फिर भी उसकी हालत पुरुराज जितनी दयनीय नहीं थी. पुरुराज की अंतड़ियाँउसके उधड़ेपेट सेबाहर लटक रही थीं जिन्हेंकुत्तेपकड़ कर खींच रहेथे.  

मुँह सेखून उगलतेहुए पुरुराज नेआख़री हिचकी ली.  

वातावरण मेंमीनाक्षी की कराह के साथ एक शिशुके प्रथम रुदन की आवाज़ गूंजी. मीनाक्षी को समय का कोई अंदाज़ा नहीं था. वो नहीं जानती थी कि बच्चा यम मुहूर्तमेंजन्म हैया अग्नि मुहूर्तमें,  बस वो इतना जानती थी कि यह बच्चा अपनेसाथ मृत्युऔर यम को लाया है. कुत्तेमीनाक्षी की तरफ़ बढ़े. मीनाक्षी की आँखों के आगेअंधेरा छा रहा था. बेहोश होनेसेपहलेमीनाक्षी नेबरगद के पेड़ सेएक आकृति को शिकारी कुत्तों पर कू दतेदेखा. वो दो कुत्तों की पीठ पर कू दा था जिससे उनकी रीढ़ टूट गयी. तीसरेकुत्तेनेउस आकृति पर छलांग लगाई. उसनेकुत्तेके दोनों जबड़ेपकड़ कर उसेबीच सेचीर कर दो-फाड़ कर दिया. 

ऐसी भयावह आकृति की उसनेकभी कल्पना भी नहीं की थी. उसका स्वरूप और क़द-काठी तो इंसानों जैसी थी लेकिन रूप अत्यंत भयावह था. वो सर सेपैर तक बिल्कुल नंगा था और उसके पूरे शरीर पर राख पुती हुई थी. कं धेतक लम्बे, जटाओ ंजैसेबाल चेहरेके सामनेआए हुए थे, छाती तक लम्बी मूँछ-दाढ़ी सेउसका चेहरा छुपा हुआ था. सिर्फ़ अंगारों जैसी दो सुलगती आँखेंजटाओ ंके बीच नज़र आ रही थीं. मीनाक्षी का दिमाग़ अंधेरेमेंडूब गया. 

‘ब..ब..ब्रह्मराक्षस! तो इस वन मेंब्रह्मराक्षस होनेकी किंवदंती सत्य है!’ 

4

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  तुलाराम नेहकलातेहुए कहा.  

अंग्रेजों के घोड़ेऔर तुलाराम का खच्चर ब्रह्मराक्षस को देख कर बिदक गए और उन्हेंअपनी पीठ से गिरा कर भागे. एक अंग्रेज सिपाही का पैर घोड़ेकी रकाब मेंउलझ गया था, उसेउल्टा लटका हुआ लेकर ही घोड़ा सरपट भागा जब तक ज़मीन पर रगड़ाए जातेसिपाही की गर्दन एक उभरी हुई चट्टान सेटकरा कर टूट ना गयी. 

जो पीछेबचेथेवो पेड़ों सेगिरेसड़ेहुए पत्तों और बारिश सेदलदली हुई मिट्टी मेंसनेहुए रेंग रहेथे.  ऑर्लैंडो को ग़ुलामों और उनके अंधविश्वास की उपज ब्रह्मराक्षस के बारेमेंकु छ नहीं पता था, उसके लिए वो भयावह आकृति ल्यूसिफ़र का भेजा डीमन था जो उसेहेल लेजानेआया था. कीचड़ में फिसलता ऑर्लैंडो जितना ही भागनेकी कोशिश करता उतना ज़्यादा कीचड़ मेंधँसता चला जाता.  

बारिश अब भी ज़ोरों सेहो रही थी जिसनेअंततः पीपल के पेड़ मेंलगी आग पर क़ाबूपा लिया था.  धूमिल होती रौशनी मेंगाढ़ेकीचड़ मेंघुलतेख़ून का लाल रंग चटक होनेलगा. वातावरण मेंबढ़ते अंधकार के साथ ऑर्लैंडो, तुलाराम और सिपाहियों की हृदयविदारक चीखेंउठीं और फिर घुप्प सन्नाटा छा गया जिसमेंनवजात शिशुका रुदन और ब्रह्मराक्षस का क्रं दन रह-रह कर गूंज रहा था.  

* * * 

CHAPTER 01  

1935 A.D.  

Mysore, British India  

‘अंग्रेजों भारत छोड़ो! वन्देमातरम! भारत माता की जय!’ 

बाहर सेगुजरतेक्रांतिकारियों के जुलूस के शोर सेचंद्र्भा ल की आँ ख खुली. रौशनदान सेछन कर आती धूप सीधेउसके चेहरेपर पड़ रही थी मतलब दिन के ग्यारह बज चुके थे. चंद्र्भा ल नेउठनेका उपक्रम किया तो उसेअग़ल-बग़ल अपनेदोनों बाजुओ ं के सुन्न होनेके एहसास हुआ, जैसेवेलम्बे समय सेभार सेदबेहुए हों. उसनेगर्दन उचका कर, आँखों मेंघुसी आती धूप सेबचनेके लिए आँखें सिकोड़तेहुए अपनेपहलूमेंदेखा. उसके दोनों बग़ल दो लड़कियाँगहरी नींद मेंसोयी हुई थीं. दोनों ही लड़कियों के शरीर पर कपड़ेका एक कतरन तक ना थी, खुद चंद्र्भा ल भी उसी अवस्था मेंथा.  चंद्र्भा ल नेबड़ी मुश्किल सेदोनों के नीचेदबी अपनी बाहेंनिकाली और पलंग पर सीधा बैठ गया.  

नीचेफ़र्शपर दोनों लड़कियों की साड़ी और अंगिया के साथ चंद्र्भा ल के धोती, कुर्ता, अचकन और लंगोट गुत्थम-गुत्था हुए पड़ेथे.  

5

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  उसने एक नज़र दोनों लड़कियों पर डाली, दोनों की उम्र पच्चीस, बड़ी हद छब्बीस होगी. यानी पिछली रात वह अपनेपल्लेकी सारी मोहरेंवो ऐयाशी मेंउड़ा चुका था. उसनेपलंग सेउतर कर अपनेकुर्तेऔर अचकन की जेबेंटटोली. फू टी कौड़ी भी ना निकली, सिवाय अफ़ीम और तम्बाकूकी डिबिया के. उसनेदोनों घिस कर अपनेनिचलेहोंठ मेंदबाए और फुर्ती सेअपनेकपड़ेपहने. पिछली रात वो अपनेसाथ तीन मश्केंभर कर ताड़ी लाया था. तीनों ख़ाली मश्केंकमरेके अलग-अलग कोनों मेंपड़ी हुई थीं. उसनेसो रही दोनों लड़कियों के नितम्ब पर चिकोटी काटी. एक नेकोई हरकत ना की, दूसरी लड़की अपना नितम्ब सहलातेहुए नींद मेंकसमसाई और फिर करवट बदल कर सो गयी.  चंद्र्भा ल दोनों लड़कियों की साड़ी के पल्लूऔर उनकी अंगिया टटोलनेलगा. मुश्किल सेचार मोहरें बरामद हुईं, उसनेवो अपनेजेब के हवालेकी और जूतेपहन कर कमरेसेबाहर निकल गया. बाहर किसी का ध्यान उसपर नहीं था.  

चकलाघर की अधिकतर लड़कियाँअपनी दैनिक दिनचर्यामेंलगी हुई थीं. विशाल प्रांगण मेंकु छ लड़कियाँनृत्य और संगीत का रियाज़ कर रही थीं, एक-दो नहानेके बाद बरामदेमेंआती धूप मेंबैठी बाल सुखातेहुए आपस मेंकोई क़िस्सा-ठिठोली करनेमेंमशगूल थीं. कम उम्र की लड़कियों मेंआँ ख पर पट्टी बांध कर एक-दूसरेको पकड़नेका खेल चल रहा था. पिछली रात आए अधिकतर ग्राहक जा चुके थेऔर आज के ग्राहक शाम सेपहलेनहीं आनेवालेथे. चंद्र्भा ल तेज कदमों सेचलतेहुए लकड़ी के बड़ेऔर भारी मुख्य फाटक सेबाहर निकल गया तो उसनेचैन की साँस ली. शुक्र हैकि चिकअम्मा या फ़ौजदार सेउसका सामना नहीं हुआ. चिकअम्मा वेश्यालय की संचालिका थी और फ़ौजदार चिकअम्मा और बाक़ी लड़कियों का चौकीदार. इन दोनों के रहतेबड़ेसेबड़े रसूख़ वाले ग्राहक की भी हिम्मत ना थी कि लड़कियों सेबेअदबी सेपेश आएँया पैसेको लेकर हुज्जत करें.  अपनेक़द्रदानों को चिकअम्मा और उसकी लड़कियाँजहां सर आँखों पर बिठा कर किसी राजा या नवाब की तरह इज्जत देती थीं, वहीं कई बदमिज़ाज नवाब वेश्यालय के सामनेसरेराह नंगेदौड़ा कर पीटेगए थे. 

शेखूकी ताड़ी की दुकान खुल चुकी थी. शेखूखुद गल्लेपर बैठा हुआ था. एक गाल मेंगिलौरी दबाए, अपनेतुम्बेजैसेविशाल पेट पर हाथ फिराता, और बीच-बीच मेंवो हाथ पेट सेलुंगी मेंसरका कर खुजाता हुआ शेखूअपनी बेसुरी आवाज़ मेंकोई अश्लील गाना गातेहुए खुद मेंमुस्कुरा रहा था जब उसकी नज़र दूर सेआतेचंद्र्भा ल पर पड़ी. अपनेदोनों हाथ पीठ के पीछे बांधेहुए, चंद्र्भा ल इत्मिनान सेचलता हुआ उसके ताड़ीखानेकी ओर ही आ रहा था. शेखूका गाना फ़ौरन बंद हुआ. बेंत की कुर्सी सेगिरते-पड़तेउठ कर शेखूबाहर आया. उसनेदोनों तरफ़ सड़क पर नज़रेंफिराई कि कहीं कोई सिपाही गश्त पर तो नहीं था. इतनेमेंचंद्र्भा ल पास आ गया. 

‘पागल हुआ हैचंद्र्भा ल? यूँखुलेआम घूम रहा है, सरी राह कुत्तेकी मौत मरना हैतो मर लेकिन मेरे ताड़ीखानेके सामनेमत मर! चल दफ़ा हो यहाँसे.’ 

6

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  शेखूआँखेंतरेर कर चंद्र्भा ल को घुड़कतेहुए बोला. 

‘सुबह-सुबह अपनी ही चढ़ा लिए हो क्या मियाँ? क्या अनाप-शनाप बक रहेहो. येएक मोहर पकड़ो और चार मश्केंबांध दो.’ 

चंद्र्भा ल जेब सेएक मोहर निकाल कर शेखूकी ओर बढ़ातेहुए बोला. 

‘लानत भेजो मोहर पर! भर रात रंडियों संग कलाबाज़ी-करतब करतेगुज़ारी लगती है, कु छ होश भी है तुम्हारेपीछेनगर मेंक्या क़हर बरपा?’ 

‘क्या?’ 

‘कल शाम ब्रिटिश क्लब के बाहर जिसेतुमनेअदना अंग्रेज सिपाही समझ कर पीटा, और लूट कर जातेहुए गोरेके सारेकपड़े-लत्तेभी उतार कर लेतेगए, वो एक बड़ेअंग्रेज अफ़सर का लौंडा था जो अपनी गोरी माशूक़ा का इं तज़ार कर रहा था. माशूक़ा आयी तो उसेउस गोरेके छोटेगोरेका भी दीदार हो गया. फिर बड़ा बवाल मचा. रात भर पूरेनगर मेंगश्त लगवाई गयी. तुम तो चकलाघर में जा घुसेमियाँ, फ़ज़ीहत दूसरों की हुई.’ 

‘बहुत अंधेरा था वहाँ, मैंनेपीछेसेपकड़ कर गोरेको रगड़ दिया. मेरा चेहरा तक ठीक सेना देख पाया होगा वो, फिर भला मुझेपकड़ेंगेकै से?’ 

जवाब देनेके बजाय शेखूनेदिवार पर चिपके पर्चेकी तरफ़ इशारा किया. इश्तहार पर चंद्र्भा ल की सूरत बनी हुई थी. 

‘यह तो बिल्कुल मेरेजैसा दिख रहा है.’  

चंद्र्भा ल को ब्रिटिश सरकार नेकुख्यात डकै त और बाग़ी घोषित कर उसपर ज़िंदा या मुर्दासौ मोहरों का इनाम घोषित कर दिया था.  

‘सौ मोहरें! उस चिकनेगोरेके पल्लेसेबामुश्किल चौदह मोहरेंनिकली, जिनमेंसेअब मेरी जेब में बस चार बची हैं! यह तो बड़ा महँगा सौदा पड़ गया!’ 

‘गोरेकी आबरू पर हाथ डालनेसेपहलेसोचना था. लूटा तो लूटा, नंगा क्यों करनेलग पड़े?’ 

‘अंग्रेज़ी मेंगाली देता था..माँ-बहन की, वरना तुम जानतेहो शेखूकि मेरा इस बग़ावत और क्रांति से कोई लेना-देना नहीं. इन अंग्रेजों सेपहलेमुग़लों नेलूटा, इनके बाद कोई और लूटेगा. कोई बाहर से ना आया तो अंदर वालेही कफ़न खसोटी करेंगे.’ 

7

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  

‘मैसूर का सबसेबड़ा ठग, नशेड़ी, पियक्कड़, जुआख़ोर, लौंडीबाज और अब इश्तहारी लुटेरा, ऐसी बातेंकरता जँचता नहीं. चल मुँह काला कर यहाँसेचंद्र्भा ल, इससेपहलेकि कोई..’ 

बोलते-बोलतेशेखूबीच मेंरुक गया, उसकी नज़र अंग्रेज सिपाहियों के क़ाफ़िलेपर पड़ी जो गश्त लगाता हुआ उधर का रुख़ कर रहा था. शेखूनेआव देखा ना ताव और लपक कर पीछेसेचंद्र्भा ल की दोनों बाज़ुएँगिरफ़्त मेंलेतेहुए चिल्लाया. 

‘साहब…बाग़ी भाग रहा था, मैंनेपकड़ लिया!’ 

‘छोड़ मुझेशेखू, यह क्या हरकत है?’  

शेखूकी इस अप्रत्याशित हरकत सेचंद्र्भा ल हड़बड़ाया फिर उसकी की गिरफ़्त सेछूटनेके लिए अपना पूरा ज़ोर लगातेहुए बोला. 

‘दूसरा कोई रास्ता नहीं मियाँ, गोरों नेमुझेतुमसेबतियातेदेख लिया था. तुम्हारेसाथ हम बिना बात के बीच चौराहेफाँसी चढ़ाए जाते. तुम्हारेआगे-पीछे तो ना कोई रोनेवाला ना मातम करनेवाला,  हमारी दो बीवियाँऔर आठ बच्चेहैं.’ 

सिपाहियों का ध्यान उस तरफ़ गया. उन्होंनेफ़ौरन गोलीबारी शुरू कर दी.  

‘अरेयह क्या कर रहेहो नाशुक्रों, गोली मुझेलग जाएगी.’ 

शेखूकलपतेहुए चिल्लाया और गोलियों की बौछार सेबचनेके लिए अपनेविशालकाय शरीर को चंद्र्भा ल की ओट मेंछुपानेकी नाकाम कोशिश करनेलगा. गोलियाँचलातेहुए क़ाफ़िला तेज़ी से उस तरफ़ बढ़ा. 

चंद्र्भा ल नेफुर्ती सेअपना शरीर कमान की तरह कमर सेमोड़तेहुए सर पीछे देमारा. उसका सर छुपनेकी कोशिश करतेशेखूके नाक और मुँह सेटकराया जिससेफ़ौरन ही शेखूके कस-बल ढीले पड़ गए. पान की पीक के साथ मुँह और नाक सेखून उगलता शेखू ‘हाय’ मारकर अपना चेहरा पकड़तेहुए घुटनों पर आ गया. चंद्र्भा ल नेझुके हुए शेखूकी पीठ पर सेकलाबाज़ी खाई और उसके पीछेओट लेली.  

‘धायँ-धायँ-धायँ!!’  

अगलेही पल गोलियों की बौछार नेशेखूका जिस्म छलनी कर दिया.  

8

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  ‘मिल गयी सौ मोहरें?’ 

आलूके बोरेसेगिरतेशेखूके बेजान शरीर को देख कर चंद्र्भा ल बुदबुदाया और फिर किसी फुर्तीले साँप के जैसेज़मीन पर रेंगता हुआ शेखूके ताड़ीखानेके अंदर घुस गया.  

दुकान के नाम पर शेखूनेचार कोनों पर खपच्चियाँगाड़ कर तिरपाल खड़ा कर दिया था जो बीचोंबीच गड़ेबाँस पर तना हुआ था. चार-पाँच मेज़ेंऔर बेंच बिछी हुई थी जहां अब भी छे-आठ पियक्कड़ जमेहुए थेऔर बाहर हुए हंगामेसेचौकन्ना हो गए थे. 

सीधेखड़ेहोतेचंद्र्भा ल की नज़रेंइन पियक्कड़ों पर थी, जिनके हाव-भाव बता रहेथेकि शेखूकी तरह इन्हेंभी इश्तहार और इनाम की जानकारी थी. चंद्र्भा ल कमर के पीछेदोनों हाथ बांध कर सीधा खड़ा हो गया. पियक्कड़ों की टोली उसकी ओर लपकी. पीछे बंधेहाथों की उँगलियों पर चंद्र्भा ल तेज़ी सेकु छ गणना कर रहा था, उतनी ही तेज़ी सेउसकी आँखों की पुतलियाँदोनों तरफ़ हिल रही थीं और एक ताड़ीखाने के अंदर पियक्कड़ों, तथा बाहर शेखूकी लाश लांघ कर अंदर आते सिपाहियों की गति का आँ कलन कर रही थीं. 

अगलेएक पल मेंतीन घटनाएँएक साथ घटित हुईं. भीतर आतेसिपाहियों नेचंद्र्भा ल पर गोलियाँ दागी, गल्लेके पास खड़ेचंद्र्भा ल नेफुर्ती सेनीचेझुकतेहुए वहाँरखा ताड़ी का पीपा लुढ़काया जिससेताड़ी फ़र्शपर चारों ओर फै ल गयी, चंद्र्भा ल के झुकनेसेउसपर चलाई गयी गोलियाँसामने सेउसकी तरफ़ आतेपियक्कड़ों के समूह को निशाना बना गयीं. गोली लगनेसेभहरा कर गिरते पियक्कड़ों का हाथ लगनेसेवो बाँस उखड़ गया जो तिरपाल को तानेहुए था, नतीजतन, सिपाहियों का दल और पियक्कड़ों की टोली पर तिरपाल चारों खपच्चियाँलिए-दिए आ गिरा.  

तिरपाल के अंदर सेगोलियों और मार-पिटाई का शोर आ रहा था जब गिरेतिरपाल सेलुढ़कता ताड़ी का पीपा बाहर निकला. सिपाहियों का जो दल बाहर था वो तिरपाल उठा कर अपनेसाथियों को निकालनेमेंव्यस्त था. उनका ध्यान ताड़ीखानेके पिछली तरफ़ कच्ची ढलान पर लुढ़के जातेपीपे की ओर ना गया जो नीचेझाड़ियों मेंजा कर अटक गया.  

अपनेघुटनेपेट सेचिपका कर पीपेमेंघुसा हुआ चंद्र्भा ल बाहर निकला. ऊपर लोगों और सिपाहियों की भीड़ बढ़ रही थी. झाड़ियों मेंछुपता-छुपाता चंद्र्भा ल वहाँसेभागा. उसके कपड़ेधूल सेसनेहुए थेऔर जगह-जगह सेफट गए थे. ऐसेहुलियेमेंवो सचमुच कोई इनामी डकै त मालूम पड़ता था.  कच्चे-पक्के घरों, गालियों, दीवारों, हर जगह उसके नाम और चेहरे के इनामी पर्चेलगे हुए थे.  मकानों के बाहर गुड़ पकाती औरतेंऔर खेलतेहुए बच्चों का समूह उसेदेख रहा था.  

‘देखो-देखो, यह तो वही पर्चेवाला बाग़ी हैजिसपर इनाम है.’ 

9

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  किसी बच्चेनेदिवार पर चिपके पर्चेसेभागतेहुए चंद्र्भा ल की सूरत का मिलान करतेहुए कहा.  इससेपहलेकि बच्चों की टोली चंद्र्भा ल पर धावा बोलती, वो एक पेड़ पर चढ़ गया जिसकी टहनी पेड़ सेलगेघर की छत तक जाती थी. बंदर की तरह कु लाँचेभरता चंद्र्भा ल टहनी सेछत पर पहुँचा और फिर एक छत सेदूसरी छत लांघता हुआ भागनेलगा. लगभग हर दूसरेघर की छत पर औरतेंया तो मसालेकू टनेऔर दाल धो कर सुखानेमेंलगी थीं, या फिर अनर्गल गप्पबाज़ी में.  

चंद्र्भा ल जैसे-जैसेछत लांघता जाता, वैसे-वैसेऔरतों के चीखने-चिल्लानेऔर उसेभद्दी गालियाँदेने का शोर भी उसके साथ-साथ आगेबढ़ता जाता. यह सिलसिला टूटा जब पापड़ सुखा रही एक औरत नेचीखनेऔर गालियाँदेनेके बजाए भागतेचंद्र्भा ल पर एक ईंट देमारी.  

ईंट सीधा छत की मुँडेर सेछज्जेपर छलांग लगातेचंद्र्भा ल की कनपट्टी सेटकराई. उसकी आँखों के आगेसितारेनाच गए. छज्जेसेटकरा कर चंद्र्भा ल नीचेपुआल के ढ़ेर पर गिरा. अपनी साँसों पर क़ाबूपानेकी गुरेज़ सेवो कु छ देर पुआल के ढ़ेर पर ही पड़ा रहता अगर उसेकिसी के अपनेसर पर आ खड़ेहोनेका एहसास ना होता. चंद्र्भा ल के उठते-उठतेकिसी नेउसके गाल पर झन्नाटेदार चाँटा मारा, खून के खारेस्वाद सेउसका मुँह भर गया. चंद्र्भा ल के संभल पानेसेपहलेएक फ़ौलादी मुक्का उसके पेट सेटकराया. दर्दसेबिलखता हुआ चंद्र्भा ल वापस पुआल के ढ़ेर पर जा गिरा. 

‘बेग़ैरत! ग़लीज़! हरामी!! धंधा करनेवाली लौंडियों के पल्लेसेपैसेचुराता है.’ 

चंद्र्भा ल के कानों मेंफ़ौजदार की गरजती हुई आवाज़ पड़ी. दर्दसेकराहता चंद्र्भा ल खिलखिला कर हंसा.  

‘हाहाहाहा..आह्ह..ह्ह..हाहाहा!’  

चकलाघर की लौंडियों का रखवाला, चिकअम्मा का वफ़ादार, फ़ौजदार अपनी कमर पर एक हाथ बांधे, पहाड़ जैसा उसके सामनेखड़ा था और दूसरेहाथ सेअपनी लम्बी, घनी मूँछों पर ताव दे रहा था, जिनकी खेती वो प्रतिदिन देसी घी सेसिंचाई कर के पूरता था.  

‘पगला गया हैक्या? हंस क्यों रहा हैहरामी?’ 

फ़ौजदार नेसशंकित भाव सेपूछा. उसेडर था कि उसके प्रचंड थप्पड़ सेचंद्र्भा ल के दिमाग़ी तारों में नुक़्स आ गया है. चंद्र्भा ल नेपान की पीक की तरह मुँह मेंभर आया खून थूका फिर जेब सेचार मोहरेंनिकाल कर फ़ौजदार की तरफ़ बढ़ाता हुआ बोला. 

‘येसालेगोरेहिंदुस्तान का सारा सोना लूट कर डकार गए, हमेंइनकी चंद मोहरेंबदहज़मी की खट्टी डकारेंदिए हुई हैं. यह पकड़ो अपनी लौंडियों की मोहरेंऔर रस्ता नापो.’ 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  फ़ौजदार नेलपक कर चंद्र्भा ल के हाथ सेचार मोहरेंझपट लीं, फिर धूर्त भाव सेमुस्कुरातेहुए बोला. 

‘रस्ता तो नापेंगेपट्ठे, यहाँसेकोतवाली तक का! यह चार मोहरेंतो लौंडियों की हुई, हमारी सौ बनती हैंजो तुम्हारी एवज़ मेंगोरों सेवसूलेंगे. चल खड़ा हो अपनेपैरों पर!’ 

तो फ़ौजदार को भी इनाम की खबर लग गयी! लौंडियों नेआँ ख खुलनेपर अपनेपल्लेसेमोहरेंग़ायब पा कर हड़कम्प मचाया होगा, जिसकी रू मेंचिकअम्मा के हुक्म पर जब फ़ौजदार चंद्र्भा ल की तलाश मेंनिकला होगा तब उसकी नज़र नगर भर मेंलहरा रहेपर्चों पर पड़ी होगी, चंद्र्भा ल नेमन में सोचा.  

‘उठता हैकि दो-तीन और रसीद करूँ?’ 

फ़ौजदार नेगरजतेहुए कहा. चंद्र्भा ल उठ कर सीधा खड़ा हुआ. उसके दोनों हाथ कमर के पीछेबंधे हुए थे, उँगलियाँतेज़ी सेकु छ गणना कर रही थीं.  

‘अब यह क्या करतब कर रहा है? क्या छुपाए हुए हैपीछे?’ 

‘आ कर खुद देख ले.’ 

‘अकड़ दिखाता है! रुक तेरी तो…’ 

फ़ौजदार बिफरेसांड सा चिंघाड़ता हुआ चंद्र्भा ल की ओर बढ़ा. उसके पास आतेही कमर के पीछेसे निकल कर चंद्र्भा ल का हाथ फुर्ती सेघूमा और फ़ौजदार सांड के जैसेही रंभातेहुए पुआल के ऊपर ढ़ेर हो गया.  

चंद्र्भा ल के हाथ मेंवो ईंट थी जो छत पर औरत नेउसेदे मारी थी और जो उसके साथ ही नीचे पुआल के ढ़ेर पर गिरी थी. चंद्र्भा ल नेईंट फेंक कर हाथ झाड़ेफिर फ़ौजदार के पल्लेसेअपनी चार मुद्राएँबरामद की. फ़ौजदार की जेबों सेएक रुपए का नोट, दो आने, तम्बाकूकी डिबिया, नसवार और एक खटके सेबंद-खोल होनेवाली छुरी भी बरामद हुई. यह सारा सामान चंद्र्भा ल नेअपनी जेब के हवालेकिया फिर फ़ौजदार के सर सेपगड़ी खोल कर अपनेसर पर लपेटी और उससेअपना मुँह इस तरह ढँक लिया कि सिर्फ़ आँखेंखुली दिखायी दें.  

छुपते-छुपातेकिसी तरह चंद्र्भा ल नगर सेबाहर निकला तब तक शाम हो चली थी. मैसूर सेनिकल कर चंद्र्भा ल अब धूल भरेकच्चेरास्तेपर चल रहा था. रास्ता दोनों तरफ़ घनी झाड़ियों और ऊँ चे पेड़ों सेघिरा हुआ था. वैसेतो दिन ढलनेके बाद मवेशियों को लेकर वापस लौटतेगडरियों और इक्का-दुक्का अंग्रेजों की मोटर कार के सिवाय उस रास्तेपर कोई ख़ास आवागमन नहीं होता था 11

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  लेकिन उस शाम सरगर्मी बढ़ी हुई थी. रह-रह कर पीछे सेघोड़ों की टापेंसुनाई देती तो चंद्र्भा ल फ़ौरन रास्ता छोड़ कर झाड़ियों की ओट मेंजा छुपता. राइफ़ल और मशालेंलिए, घोड़ों पर सवार ब्रिटिश सिपाहियों का क़ाफ़िला हर थोड़ी देर मेंगुजरता.  

झाड़ियों मेंछुपेरहनेका कोई फ़ायदा नहीं था, गश्त करतेसिपाहियों की नज़र उस पर पड़ ही जाती.  झाड़ियों सेहोतेहुए आगेबढ़ना भी मुमकिन नहीं था क्योंकि रात के अंधेरेमेंसूखी टहनियों और पत्तों पर भागतेकदमों की आवाज़ दूर तक सुनाई देती. रही-सही कसर पूरी करनेके लिए आसमान मेंपूरा चाँद निकला हुआ था. 

भूख, प्यास और थकान सेचंद्र्भा ल का हाल बुरा हो रहा था. गश्त लगाते सिपाहियों का एक क़ाफ़िला अभी-अभी गुजरा था, मतलब कु छ देर के लिए रास्ता साफ़ था. चंद्र्भा ल झाड़ियों सेबाहर निकला, वो मुश्किल सेकु छ ही कदम आगेबढ़ा होगा कि पीछेसेमोटर की आवाज़ के साथ हल्की रौशनी आयी. चंद्र्भा ल यह आवाज़ पहचानता था, यह मोटर कार की नहीं बल्कि मोटर सायकल की आवाज़ थी. 101 इंडियन मोटर सायकल का प्रयोग अंग्रेजों के हरकारेउनके गुप्त और ज़रूरी संदेश एक नगर सेदूसरेनगर पहुँचानेके लिए करतेथे. यकीनन आस-पास के सभी नगरों और पुलिस चौकियों मेंचंद्र्भा ल की गिरफ़्तारी का आदेश करनेके लिए हरकारेभेजेजा रहेथे. इसका मतलब मैसूर सेनिकल कर भी जान बक्शी नहीं होनेवाली थी.  

भगौड़ेचंद्र्भा ल की गिरफ़्तारी के लिए ‘बड़ेगोरेसाहब’ का लिखित आदेश और चस्पा करनेके लिए इनाम के सौ पर्चेलेकर मैसूर सेकड़कोला जाता हरकारा अपनी क़िस्मत को कोस रहा था. उसकी शादी हुए सिर्फ़ दो दिन बीतेथे. इस वक्त उसेअपनी खूबसूरत बीवी और गर्मबिस्तर की ज़रूरत थी,  जब कि वो ठंड मेंजंगली रास्तेपर मोटर सायकल दौड़ा रहा था. उसकी बीवी नेकै सी मादक अदाओ ं सेउसेरोकनेकी कोशिश की थी, लेकिन बड़ेगोरेसाहब का हुकु म टाला नहीं जा सकता था. उसने अपनी बीवी सेवादा किया था कि आधी रात तक काम ख़त्म कर के उसके पहलूमेंआ जाएगा,  

इसलिए फटफटिया पूरी रफ़्तार सेभगाए हुए था. तेज ठंडी हवा के थपेड़ों सेजब-जब उसके शरीर में सिहरन उठती उसेअपनी बीवी का आग़ोश याद आ जाता. उसकी बीवी नेविदा करतेसमय हिदायत दी थी कि रास्तेमेंगाड़ी कहीं ना रोके. रात घिरतेही उजाड़-जंगली रास्तों पर चुड़ैलेंमंडरानेलगती हैं जिनसेअविवाहित पुरुषों सेअधिक ख़तरा नवविवाहित पुरुषों को होता है. 

नवविवाहित पुरुषों को अपनेमोहजाल मेंफँ सा कर उनसेसंसर्गकरनेमेंचुड़ैलेंअलग उन्माद अनुभव करती हैं, जो पुरुष को उसकी पत्नी सेछीननेसेमिलता है. हरकारा खुद मेंमुस्कुराया, कितनी भोली हैउसकी बीवी. भला उसके पीछेकौन सी चुड़ैल पड़नेवाली थी.  

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  हरकारेको सामनेरास्तेपर जुगनुओ ंका एक समूह नज़र आया. नहीं, यह जुगनूनहीं थे! यह तो जैसे हवा मेंचिंगारियाँउठ रही थीं. अंधेरेमेंनृत्य करती चिंगारियों का समूह हरकारेकी राह रोके हवा में विचित्र आकृतियाँबना रहा था. ना चाहतेहुए भी हरकारेको ब्रेक दबाना पड़ा. 

‘क..क…कौन हैवहाँ?’ 

जवाब मेंउसेझाड़ियों मेंएक छनछनाहट सुनाई दी, किसी औरत के पायल की छनछनाहट! हरकारे का दिल चीख-चीख कर कह रहा था कि उसेमोटर सायकल घुमा कर वापस भाग जाना चाहिए लेकिन चुड़ैल के पायल की छनछनाहट पर गोरेसाहब के चाबुक की फटकार भारी थी. अपनेइष्ट देव को याद करतेहुए हरकारेनेमोटर सायकल खड़ी की और हाथ मेंपिस्तौल लेकर नीचेउतरा. 

‘मैंकहता हूँकौन हैसामनेआओ…वरना गोली चला दूँगा!’  

हरकारा झाड़ियों की ओर पिस्तौल तानतेहुए चेतावनी भरेस्वर मेंबोला. हवा मेंतैरती चिंगारियाँअब ग़ायब हो चुकी थीं. हरकारा सधेकदमों सेघनी झाड़ियों की तरफ़ बढ़ा. झाड़ियों के बीच कु छ था जो साफ़ नज़र नहीं आ रहा था. अगलेदो कदम लेतेही हरकारा सकतेमेंआ गया. झाड़ियों के बीच दो आग जैसी जलती हुई गोल आँखेंचमक रही थीं. 

‘धायँ-धायँ-धायँ!’ 

हरकारेनेझाड़ियों पर गोलियाँदागी. अचानक उसेअपनी गर्दन के पीछेहल्का दबाव महसूस हुआ.  नस दबतेही उसके हाथ सेपिस्तौल छूट गयी और शरीर जैसेलकवाग्रस्त होकर धड़ाम सेनीचेगिरा और उसकी चेतना लोप हो गयी. हरकारेके ठीक पीछेखड़ेचंद्र्भा ल नेएक अंगड़ाई ली और फिर बेहोश हरकारेकी टांगेंपकड़ कर उसेघसीटतेहुए झाड़ी मेंलेगया.  

झाड़ियों सेउसनेफ़ौजदार सेहथियाया खटके सेखुलेवाला चाकू बरामद किया जिसके फल पर उसनेअफ़ीम सेदो मोहरेंयूँचिपकाई थीं कि उन पर रौशनी पड़नेपर वो दो जलती हुई गोल आँखों जैसी दिखाई दें. चाकूके आधेखुलेनक्काशीदार मूठ वालेहिस्सेमेंउसनेमाचिस की जलती तीली फँ साई थी जो अब बुझ चुकी थी. इस तीली की रौशनी चाकूके फल पर अफ़ीम सेचिपकी मोहरों में चमक पैदा कर रही थी. फ़ौजदार सेलूटा सामान चंद्र्भा ल के बड़े काम आया था. फ़ौजदार की डिबिया का तम्बाकूसूखेपत्तों मेंलपेट कर, उनमेंआग लगा कर उसनेरास्तेपर उछाल था. अंधेरेमें दूर से देखनेपर जल कर नीचेगिरतेसूखेपत्तेऔर तम्बाकू हवा मेंनृत्य कर आकृतियाँबनाती चिंगारियों सरीखेप्रतीत हुए थे, जिनसेप्रभावित होकर जब हरकारा मोटर सायकल खड़ी कर के पिस्तौल निकाल रहा था उस दौरान मोहरों वाला चाकूझाड़ियों मेंअटका कर, झाड़ियों और पेड़ों की आड़ लेता हुआ चंद्र्भा ल हरकारेके पीछेआ गया. 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  चंद्र्भा ल नेअपनेमैलेव फटेकपड़ेउतार कर बेहोश हरकारेके साफ़ कुर्ता, अचकन व धोती पहने.  पैरों मेंमुलायम चमड़ेके जूतेडालेऔर उसकी पिस्तौल पीछेअपनी कमर मेंखोंस ली. पगड़ी सेमुँह ढँकनेके बाद कोई भी उसको देख कर उसके सरकारी हरकारा होनेका धोखा खा जाता. चंद्र्भा ल ने हरकारेकी मोटर सायकल चालूकी और पूरी रफ़्तार सेभगा दी. हरकारेके कपड़ेऔर मोटर सायकल हथियानेके लिए चंद्र्भा ल नेइतना प्रपंच इसलिए किया ताकि होश मेंआनेपर भी हरकारे का सच यही हो कि उसेकिसी प्रेतात्मा या चुड़ैल नेअपना शिकार बना लिया, हालाँकि वो जानता था कि हरकारा यह बात किसी को समझा नहीं पाएगा कि चुड़ैल उसकी मोटर सायकल क्यों ले भागी. 

चंद्र्भा ल फ़िलहाल बिना मंज़िल का मुसाफ़िर था. रास्तेमेंउसेघुड़सवार सिपाहियों के दो क़ाफ़िले दिखाई दिए. सिपाहियों नेउसेसरकारी हरकारा समझ कर कोई तवज्जो ना दी और चंद्र्भा ल उन्हें पार कर बेधड़क कड़कोला की ओर बढ़ गया. दिन भर की भाग-दौड़ और थकान के बाद शरीर पर लगती शीतल हवा उसेअत्यंत सुकू न दायक प्रतीत हो रही थी. मोटर सायकल चलातेहुए उसे झपकी आयी जो कि गाड़ी अनियंत्रित हो कर डगमगानेसेखुली. चंद्र्भा ल हैंडल सम्भालनेका भरसक प्रयत्न कर रहा था, तभी हेडलाइट की रौशनी मेंसामने, रास्तेके बीचों-बीच दो आँखेंकंचों के समान चमकी. यह कोई चाकूपर अफ़ीम सेचिपकाई मोहरेंना थीं, बल्कि पहाड़ी भेड़िए की क़द-काठी का एक काला कुत्ता था जो देखनेमेंकाजल की कोठरी मेंलोट कर निकला मालूम देता था और ऐसा लग रहा था जैसेरास्तेके बीचोंबीच जादू के ज़ोर सेहवा मेंप्रकट हुआ हो. 

कुत्तेको बचानेके जतन मेंचंद्र्भा ल मोटर सायकल को अनियंत्रित हो कर गिरनेसेना बचा पाया.  ग़नीमत इतनी थी कि रास्ता पथरीला नहीं था और मोटर सायकल सेछटक कर चंद्र्भा ल जहां गिरा था वहाँऊँ ची घास थी जिस कारण उसेचोट ना के बराबर आयी. खुद को झाड़ कर सीधे हुए चंद्र्भा ल नेदेखा तो मोटर सायकल बीच रास्तेमेंगिरी पड़ी थी, लेकिन कालेकुत्तेका कहीं कोई नामोनिशान ना था.  

‘इस लोहेके घोड़ेपर सवारी गाँठना नहीं आता या इतनी पी ली हैकि होश और मोटर दोनों क़ाबूसे बाहर हो गए?’ 

पीछेसेआयी उस जनाना आवाज़ मेंखुद जैसेसोमरस की मादकता घुली हुई थी. चंद्र्भा ल चौंक कर पलटा, क्या वाक़ई उसका सामना किसी चुड़ैल सेहो रहा था?  

सामनेअपनेसौंदर्यसेअप्सराओ ंको भी लज्जित करनेकी क़ाबिलियत रखनेवाली जो लड़की खड़ी हुई थी उसके चुड़ैल होनेकी कल्पना करना भी चंद्र्भा ल के लिए असम्भव था. दो पल के लिए स्तब्ध चंद्र्भा ल उस रूपमती कन्या को सर सेपैर तक घूरता रहा.  

14

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  बंजारन के लिबास मेंखड़ी उस लड़की की रंगत उस ढलती शाम सरीखी साँवली थी जिसमेंअब भी सूर्यकी कांति शेष हो, नयन-नक़्श ऐसेतीखेजैसेपत्थर तराश कर उसपर मख़मल मढ़ दिया हो,  ऊँ चा क़द और उन्नत, कसी छातियाँ. अब तक चंद्र्भा ल नेअनगिनत रूपमती स्त्रियाँभोगी थीं लेकिन उनमेंसेकोई इस बंजारन की आधी भी ना थी.  

‘वो कुत्ता अचानक सेबीच रास्तेमेंआ गया.’ 

चंद्र्भा ल ने लड़की के निचली होंठ के पास जो तिल था उसेनिहारतेहुए कहा.  ‘कौन सा कुत्ता?’ 

‘ऊँ चेक़द का काला कुत्ता, कु छ देर पहलेरास्तेके बीचोंबीच खड़ा था. मुझेगिरा कर जानेकहाँ ग़ायब हो गया.’ 

चंद्र्भा ल लड़की सेनज़रेंहटा कर, उस कुत्तेको ढूँढनेकी आस मेंचारों ओर देखता हुआ बोला. 

‘कोई कुत्ता ना था, मैंयहाँकाफ़ी देर सेखड़ी हुई हूँ. तुम्हेंइस लोहेके घोड़ेपर सवार, इधर आतेदेख रही थी. तुम खुद मेंही लड़खड़ाए और इसेलिए-दिए धूल चाट गए.’ 

लड़की गिरी हुई मोटर सायकल की तरफ़ इशारा करतेहुए बोली. 

‘तुम कौन हो? दिन ढलनेके बाद इस बियाबान रास्तेपर अके ली क्या कर रही हो? चुड़ैल हो क्या?’ ‘मैंतुम्हेंचुड़ैल दिखाई देती हूँ?’ 

‘दिखती तो नहीं, पर एक अजीब बात है.’ 

‘क्या?’ 

‘इतनी ख़ूबसूरत होनेके बावजूद तुम्हारी सूरत और आँखेंऐसी दिखती हैंजैसेमुस्कुराना ना जानती हों. तुम्हारेचित्त मेंएक विचित्र क्रोध दफन है.’  

‘हो सकता हैमैंचुड़ैल ही हूँ.’ 

‘काली रात सा काला लिबास पहने, यज्ञ सेउठतेधूम्र सरीखेनयनों वाली श्यामल कन्या! हाँ, पूरी सम्भावना हैतुम्हारेचुड़ैल होनेकी.’ 

‘भयभीत हो? छुरा, पिस्तौल रखतेहो और एक अके ली कन्या सेभयभीत हो?’ 15

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  

‘यदि तुम वास्तव मेंचुड़ैल हुई तो भला छुरा और पिस्तौल तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगे. एक क्षण…तुम्हें कै सेज्ञात हुआ कि मेरेपास छुरा और पिस्तौल है?’ 

‘जब तुम कपड़ेझाड़तेहुए उठ रहेथेतब पीछेकमर मेंखोंसी पिस्तौल दिखाई दी थी. छुरेका मूठ अब भी तुम्हारेकुर्तेकी बायीं जेब सेबाहर झांक रहा है.’ 

‘तो यह नैना सिर्फ़ सामनेवालेको मंत्रमुग्ध नहीं करते, उसके कपड़ों, उसके तन का बारीक अध्ययन भी करतेहैं?’ 

चंद्र्भा ल दो कदम लड़की के पास आता हुआ बोला. 

‘तुम्हेंक्या पता कि अध्ययन सिर्फ़ तन तक सीमित है, या आत्मा की परतेंभी खोलता है.’ ‘अच्छा! ज़रा बताओ मेरी आत्मा की परतों मेंझांक कर क्या पता लगाया तुमने?’ ‘भगोड़ेहो; भाग रहेहो…खुद को बचानेके लिए, कहीं ठौर पानेके लिए.’ 

‘यह मेरी आत्मा की परतों मेंझांक कर जाना तुमने?’ 

‘नहीं, उन इश्तहारी पर्चों सेजो उस गाड़ी पर बंधेहैंजिसेचुरा कर या लूट कर भागेहो.’ 

लड़की की बात पर चंद्र्भा ल की नज़र मोटर सायकल पर गयी. पीछेबंधा पर्चेका बंडल, जिसेभागने की जल्दी मेंचंद्र्भा ल फेंकना भूल गया था, रास्तेपर खुला पड़ा था और हवा सेउड़तेहुए पर्चेचारों तरफ़ फै ल रहेथे. 

‘वाहन हरकारेका चला रहेहो लेकिन तुम खुद हरकारेनहीं हो. तुम्हारी सूरत इश्तहार पर छपी तस्वीर सेमिलती है, मतलब तुम भगौड़ेहो, जिसके सर पर इनाम हैऔर जो किसी हरकारेका वाहन और लिबास लूट कर, किसी ठौर की तलाश मेंभाग रहा है.’ 

लड़की की बात सुन कर चंद्र्भा ल का हाथ अपनेचेहरेपर गया. गिरतेवक्त उसके चेहरेपर लिपटा कपड़ा खुल गया था जिसका उसेख़्याल ना रहा. लड़की नेउसकी सूरत देख ली थी. 

‘मानना पड़ेगा, बला सी बुद्धि चलती हैतुम्हारी. अब क्या करोगी? मुझेगोरों के हवालेकर के इनाम कमाओगी?’ 

‘गोरों और उनके इनाम मेंकोई दिलचस्पी नहीं मुझे. तुम मेरेकाम आओ, मैंतुम्हारेकाम आऊँ गी.’ 16

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  ‘तात्पर्य?’ 

‘तुम्हारेपास यह लौह अश्व है, जो द्रुतगति सेकहीं भी लेजा सकता है.’ 

‘तुम्हेंकहाँजाना है?’ 

‘कबिनी.’  

‘कबिनी? वहाँक्या है?’ 

‘वन के पार मेरा ग्राम है, कारापुरम.’ 

‘तुम चाहती हो मैंतुम्हेंकबिनी नदी व वन के पार तुम्हारेग्राम पहुँचाऊँ?’ 

‘सिर्फ़ वन तक! वहाँसेआगेमैंस्वयं चली जाऊँ गी.’ 

‘अच्छा? मैंनेतो सोचा तुम मुझेअपनेग्राम, अपनेघर मेंशरण देनेका प्रस्ताव देरही हो.’ 

‘कल सुबह होतेही आस-पास के सभी नगर-ग्राम व राज्यों मेंतुम्हारी तलाश युद्ध स्तर पर आरम्भ हो जाएगी. किसी ग्राम या घर मेंशरण लोगेतो पकड़ेजाओगे.’ 

‘यह सहायता प्रस्ताव तो तुम्हारेलाभ की बात कहता है. मेरेहित के लिए भला इसमेंक्या है?’ 

चंद्र्भा ल नेमोटर सायकल उठाई और उसपर सवार होतेहुए बोला. लड़की चलतेहुए उसके पास आयी. बहुत अजीब थी उसकी चाल. लम्बेघाघरेमेंढके उसके पाँव नज़र नहीं आतेथे, ना ही उसके चलनेपर कोई आवाज़ होती थी; जैसेधरा पर वायुसंग धुँध तैरती हो, कु छ वैसेचलती थी वो.  उसकी नज़रेंना एक पल को चंद्र्भा ल सेहटतीं, ना उसकी पलकेंझपकतीं.  

जिस प्रकार जलती चंदन की लकड़ी सेउठती दाह की अपनी एक विशिष्ट गंध होती है, कु छ वैसी ही अलग सुगंध उसके जिस्म की दाह के साथ मिल कर उठ रही थी. मोटर सायकल पर सवार चंद्र्भा ल सेआधेहाथ की दूरी पर खड़ी थी वो, फिर भी उसके तपतेबदन की दाह चंद्र्भा ल यूँमहसूस कर रहा था जैसेकिसी जलती चिता के निकट खड़ा हो. क्या लड़की को ज्वर था? नहीं, ज्वर मेंतो चेहरा मुरझा जाता है, जब कि इसके मुखमंडल की आभा तो देखतेही बनती थी. इसकी आँखें! यदि धूम्र में जल की भाँति प्रतिबिम्ब उत्पन्न करनेके लक्षण होतेतो यकीनन वो इसके नयना बन जाता.  

‘तुम्हारा हित मेरा कहा सुननेमेंहै. मुझेवन तक लेचलो, तुम वन मेंही ठहर जाना. वन मेंतुम्हें तलाशनेकोई ना आएगा. उधर कोई नहीं जाता.’ 

17

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  लड़की नेचंद्र्भा ल की आँखों मेंयूँआँखेंडाल कर कहा कि वो प्रतिवाद ना कर पाया, हालाँकि प्रतिवाद वो वैसेभी नहीं करना चाहता था. उस लड़की के नयनों को देखनेसेखुद को रोकना कहीं था किंतुउसके नयनों मेंनयना डाल कर उसेदेखतेरहना उससेभी विकट था, जैसेआषाढ़ की दोपहरी में सूर्यको अपलक निहारना.  

‘नाम क्या हैतुम्हारा?’ 

चंद्र्भा ल नेउसके नयनों सेअपनी नज़रेंहटातेहुए सवाल किया. नज़रेंउसके नयनों सेहट कर भी उसके मुग्ध कर देनेवालेचेहरेपर ठहर गयी थीं, जिस पर कु छ ऐसेभाव आए जैसेचंद्र्भा ल सेउसने ऐसेप्रश्न की अपेक्षा ना की हो. 

‘भैरवी.’ 

लड़की नेहोंठों मेंनाम बुदबुदाया, जो चंद्र्भा ल को अपनेअंतर्मन मेंयूँगुंजायमान होता प्रतीत हुआ जैसेउस नाम सेउसका वास्ता जन्म-जन्मांतर का हो, जैसेउसेपहलेसेही ज्ञात था कि उसके सामने खड़ी रहस्यमयी कन्या का नाम भैरवी के अतिरिक्त दूसरा कु छ हो ही नहीं सकता था. 

‘भैरवी…भैरवी.’ 

चंद्र्भा ल के होंठ स्वतः ही उस नाम का जाप लगाए हुए थे, कितना भला मालूम देता था उसेयह नाम पुकारना. क्या रात घिरतेही स्त्री सेसंसर्गकरनेकी चाह उसकी चेतना पर इस कदर कुं डली जमा रही थी कि खुद के भलेकी सुध-बुध जाती रही? नहीं, यह मात्र दैहिक आकर्षण की मादकता नहीं थी, जिस्म के भीतर एक जीव(आत्मा) होता है; यह अनुभूति उसके द्रवित होनेकी थी. क्या ठगों और व्यभिचारियों के जिस्म मेंभी जीव वास करता है? चंद्र्भा ल के अंतर्मन नेजैसेउसकी इस अवस्था पर कटाक्ष किया. 

भैरवी के जिस्म सेउठती दाह उसेपौष की सर्दरात मेंजलतेअलाव सी भली मालूम देरही थी. भैरवी कब उसकी मोटर सायकल पर सवार हुई और उसनेकब मोटर सायकल आगेबढ़ाई इस बात का ध्यान चंद्र्भा ल को ना था. भैरवी के शब्दों में; उसका यह ‘लौह अश्व’ जैसेस्वतः ही वायुवेग सेउड़ा जा रहा था. उस अद्भुत और रहस्यमयी कन्या के बैठनेसेजैसेइस निर्जीव यांत्रिक वाहन मेंभी प्राण आ गए थे. चंद्र्भा ल को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसेवो मोटर सायकल नहीं चला रहा, वो तो सिर्फ़ उसपर सवार था. ठंडी हवा के थपेड़ेउसके चेहरेसेटकरा कर, उसके माथेपर आए बालों को पीछे बिखेरतेहुए गुजर रहेथे. अब चेहरा ढकनेकी आवश्यकता ना थी, पथरीला और जंगली मार्गआगे सघन हो चला था. बीच रास्तेमेंपड़नेवालेकु छ छोटेक़स्बेऔर ग्राम पीछेछूट चुके थे. इस ओर ना कोई सैन्य टुकड़ी थी ना सैनिक.  

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  चंद्र्भा ल को एहसास हुआ कि उस राह पर वेअके लेमुसाफ़िर ना थे. पथरीलेमार्गके साथ लगी ऊँ ची झाड़ियों और पेड़ों की तरफ़ सेएक आकृति उसकी मोटर सायकल की रफ़्तार का मुक़ाबला करते हुए साथ-साथ दौड़ रही थी, जिसकी दो कंचों जैसेचमकती आँखेंकभी अंधेरी व घनी झाड़ियों के सघन जाल मेंखो जातीं तो कभी अचानक सेद्रुत वेग सेउड़तेदो टिमटिमातेजुगनुओ ंकी तरह नज़र आतीं. चंद्र्भा ल को यक़ीन था कि यह वही ऊँ चेक़द का काला कुत्ता हैजो पीछे उसकी राह में अचानक सेप्रकट हुआ था, परंतुक्या एक कुत्ता एक मोटर की गति की बराबरी कर सकता था? 

इस उत्सुकता का वहन करनेमेंअसमर्थचंद्र्भा ल बार-बार गर्दन उचका कर झाड़ियों के पार अंधेरेमें ताकनेका प्रयत्न करता. जंगल शुरू हो चुका था, झाड़ियों के पीछेभागती वो आकृति जैसेअचानक सेस्थिर और सतर्क होकर खड़ी हो गयी. चंद्र्भा ल को किस अज्ञात भाव नेप्रेरित किया यह तो वो समझ ना पाया किंतुउसके पाँव और उँगलियाँस्वतः ही ब्रेक पर कसतेचलेगए. धूल, पत्तों और सूखी टहनियों पर तेज़ी सेरगड़ खा कर रुकतेपहियों की तीखी आवाज़ गूंजी, जिसके साथ ही दूर कहीं सेकुत्तेके रुदन का स्वर सुनाई दिया. 

चंद्र्भा ल की इंद्रियों नेफ़ौरन उसेकिसी आनेवालेसंकट का संके त दिया. हवा मेंदूर कहीं एक सरसराहट उभरी जो तेज़ी से उसके निकट आ रही थी. इंद्रियों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप चंद्र्भा ल नेतेज़ी सेअपना चेहरा पीछे की तरफ़ हटाया. एक धधकता हुआ अग्निबाण वहाँसेगुजरा जहां आधेक्षण पूर्वचंद्र्भा ल का चेहरा था. पीछेकी ओर झुकतेसमय चंद्र्भा ल को मोटर सायकल की पिछली गद्दी ख़ाली होनेका एहसास हुआ. उसनेचौंक कर पीछेदेखा, भैरवी वहाँ नहीं थी.  

‘भैरवी!!’ 

चंद्र्भा ल नेआवाज़ लगाई जिसका कोई प्रत्युत्तर ना मिला. अभी तो यहीं थी; इतनी जल्दी कहाँ ग़ायब हो गयी? क्या हवा मेंकपूर जैसेघुल गयी? चंद्र्भा ल की तर्क शक्ति उससेसवाल कर रही थी परंतुखुद को उत्तर देनेका समय ना था. हवा मेंइस बार एक साथ कई सरसराहटेंउत्पन्न हुईं.  चंद्र्भा ल नेनीचेजमा अपना पाँव उठाया और मोटर सायकल समेत अपनेशरीर को नीचेगिर जाने दिया. उसकी दिशा मेंआते कई अग्निबाण और उड़न तश्तरियों की तरह गोल घूमती धारदार चकरियाँनीचेगिरेचंद्र्भा ल के सर के ऊपर सेनिकल गयीं.  

चंद्र्भा ल नेअपनी साँस रोकी और ज़मीन सेदायां कान लगा कर कु छ सुननेकी कोशिश करनेलगा.  उत्तर कोण सेतेज पदचापों के कम्पन आ रहेथे, जो उससेतक़रीबन बारह गज दूर थे. पेड़ों पर कू दने की आवाज़ और पत्तों का शोर भी था; यह शोर सामान्य रूप सेपत्तों सेहो कर गुजरती हवा का नहीं था यानी हमलावर बड़ी संख्या मेंथेऔर ज़मीन के साथ-साथ पेड़ों पर होतेहुए भी उसकी तरफ़ बढ़ रहेथे. जिस स्थान पर चंद्र्भा ल मोटर सायकल के साथ गिरा हुआ था वहाँउसपर चंद्रमा की सीधी 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  रौशनी पड़ रही थी. मोटर सायकल की ओट सेनिकलनेका मतलब था हमलावरों के सीधेनिशाने पर आना. आख़िर कौन थेयह हमलावर? क्या यह भैरवी के साथी थेजो चंद्र्भा ल की ताक मेंघात लगाए बैठे थे? नहीं, यह तो काफ़ी अतार्कि क हुआ! अवश्य ही यह लुटेरेथेजो अंधेरेमेंउधर से गुजरनेवालेकिसी भी राहगीर को अपना शिकार बनातेथे; अवश्य इसीलिए भैरवी अके लेइस ओर आनेसेडर रही थी. परंतुवो अचानक ग़ायब कहाँहो गयी? चंद्र्भा ल नेअपनेभटकतेध्यान को एक बार फिर एकाग्र किया. लुटेरों की टोली जंगल के भीतरी हिस्सेसेनहीं बल्कि उत्तर की तरफ़ जंगल के बाहरी हिस्सेसेउसकी ओर बढ़ रही थी, यदि वो किसी प्रकार जंगल के अंदरूनी भाग मेंपहुँच पाता तो चाँदनी और हमलावर, दोनों सेछिपनेको उपयुक्त स्थान मिल सकता था.  

उस पल चंद्र्भा ल के भाग्य के सितारेअवश्य ही अनुकू ल दशा मेंथे; उसेबच निकलनेका अवसर देने के लिए ही जैसेकालेबादलों के आवरण नेचंद्रमा को अपनेआग़ोश मेंक़ैद कर लिया. चंद्र्भा ल सिंहों के समूह सेप्राण बचानेके लिए कु लाँचेभरतेमृग के समान उछलता हुआ जंगल की ओर भागा.  वातावरण मेंघुप्प अंधकार पसरा हुआ था जिसेभेदतेहुए अग्निबाण हवा मेंलहराए परंतुउन्हेंअपना लक्ष्य ना मिला.  

‘वो वन की ओर जा रहा है. वन मेंप्रवेश करनेसेरोको उसे!’ 

एक वट वृक्ष की ओट मेंखड़े चंद्र्भा ल को पीछे सेकिसी हमलावर की आवाज़ सुनाई दी. तीन अग्निबाण और दो चकरियाँउस वटवृक्ष के तनेमेंधँसेहुए थे, जो चंद्र्भा ल के शरीर मेंधँसेहोतेयदि वो सही समय पर वृक्ष की आड़ ना लेता. आक्रमणकारी उसेवन मेंप्रवेश क्यों नहीं करनेदेना चाहते?  यह सोचतेहुए चंद्र्भा ल नेवृक्ष की ओट सेएक घनी झाड़ियों के समूह की तरफ़ छलांग लगाई. हवा मेंउसेअपनेअतिरिक्त अन्य सरसराहटेंसुनाई दीं जिनकी गति उससेकम सेकम दोगुनी थी. एक हवा मेंघूमती चकरी उसके कं धेपर सेकपड़ेऔर त्वचा को चीरतेहुए गुजरी. उसका कुर्तातेज़ी से लाल हो रहा था. चकरी के साथ आतेअग्निबाण को यदि चंद्र्भा ल नेबला सी फुर्ती का प्रदर्शन करते हुए लपक ना लिया होता तो वो उसकी गर्दन मेंधँसा होता. अग्निबाण के वेग और ताप सेचंद्र्भा ल की उँगलियाँऔर हथेली बुरी तरह झुलस गयी. 

झाड़ियों तक चंद्र्भा ल व अन्य अग्निबाण एक साथ पहुँचे; आग की लपटों सेझाड़ियाँधधक उठीं.  घोर पीड़ा को पीतेहुए चंद्र्भा ल नेअपनी हथेली व उँगलियों की खाल पर चिपके अग्निबाण को खींच कर अलग किया. उसनेअपनेजबड़ेभींच रखेथेताकि कराह ना निकलनेपाए. चंद्र्भा ल को अपने आस-पास पेड़ों पर तेज़ी सेबढ़ती गतिविधि का एहसास हुआ. वो फ़ौरन जलती हुई झाड़ियों सेपीछे हटा. वानरों की भाँति पेड़ों की लताएँपकड़ कर झूलते 

झू तीन-चार आक्रमणकारी अलग-अलग पेड़ों से 

हवा मेंलहराए. इनके धारदार शस्त्र अंधेरेमेंबिजली की तरह कौंध रहेथे. कटार, कुल्हाड़ी, बर्छी,  तलवार और गंडासा चारों ओर सेबरस रहेथे. हवा मेंकलाबाज़ी खा कर इनसेबचतेहुए चंद्र्भा ल ने एक कुल्हाड़ी और गंडासा अपनेक़ब्ज़ेमेंकिया.  

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  

चंद्र्भा ल और उसके आक्रमणकारियों के पाँव एक साथ ज़मीन पर पड़े. आक्रमणकारियों नेचंद्र्भा ल के चारों ओर गोल चक्रव्यूह बना कर उसेघेर लिया.  

‘कौन हो तुम लोग? लुटेरे? मेरेप्राण लेकर कु छ ना मिलेगा. मेरेपास जो कु छ हैमैंवैसेही तुम्हारे हवालेकरनेको तैयार हूँ.’ 

चंद्र्भा ल नेसतर्कतापूर्वक चारों तरफ़ नज़रेंघुमातेहुए कहा. सभी आक्रमणकारी सर सेपाँव तक आबनूस के समान कालेलिबास मेंथे, सर और चेहरा भी उन्होंनेकाला साफ़ा बांध कर ढँका हुआ था, सिर्फ़ उनकी आँखेंखुली थी जो गहरेकालेसुरमेसेपुती हुई थीं. चंद्र्भा ल के प्रस्ताव सेअन आँखों की भाव-भंगिमाओ ं मेंकोई परिवर्तन ना आया. चंद्र्भा ल को यह समझनेमेंक्षण भी ना लगा कि आक्रमणकारियों का उद्देश्य उसेलूटना नहीं बल्कि जान सेमारना है. चक्रव्यूह बनाए हमलावर चारों तरफ़ सेएक-साथ चंद्र्भा ल पर झपटे. चंद्र्भा ल ने हवा मेंगोल घूमते हुए अपनेदोनों हाथ चक्रवात की भाँति घुमाए; एक हमलावर की बाँह कट कर दूर जा गिरी तो दूसरेके हाथ की सारी उँगलियाँजाती रही. गंडासा एक हमलावर का जबड़ा दो-फाड़ चीरता हुआ उसके गलेमेंफँ स गया.  दो-फाड़ चिरेहुए मुँह सेरक्त का सोता फू ट निकला; चंद्र्भा ल की कुल्हाड़ी नेभी कु छ वैसा ही कमा कर दिखाया. एक हमलावर का सर कट कर पेड़ सेटूट कर गिरेबेल की भाँति दूर लुढ़कता चला गया और वेग मेंआगेबढ़ता उसका सर विहीन धड़ रक्त के फ़ौवारेछोड़ता हुए आगेएक वृक्ष सेजा टकराया.  

आक्रमणकारियों की इस टुकड़ी का चक्रव्यूह छिन-भिन्न हो चुका था. कु छ मारेगए, जो बचेवो अंग भंग हुए, भूमि पर अपनेरक्त और मिट्टी मेंसनेहाय-हाय कर रहेथे; परंतुलड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई थी. सामनेसेअग्निबाण चलातेहुए आक्रमणकारियों का बड़ा समूह चंद्र्भा ल के बिल्कुल निकट आ चुका था. आसमान मेंघिरेकालेबादल बुरी तरह गरजे; जलतेअग्निबाणों का समूह चंद्र्भा ल की ओर लपका, जिससेबचनेके लिए चंद्र्भा ल नेअपनेदाहिनेतरफ़ छलांग लगाई. इस ओर लगभग आठ गज गहरी ढलान थी जो सूखेपत्तों और टहनियों सेपटी पड़ी थी. अग्निबाणों सेबचता हुआ चंद्र्भा ल ढलान पर लुढ़कता चला गया, गहरे जंगल की ओर. तेज़ी सेलुढ़कतेचंद्र्भा ल के लिए अपनी गति पर नियंत्रण कर पाना मुश्किल हो रहा था. उसके हाथ कोई उभरी हुई जड़, झाड़ या टहनी टटोलनेकी कोशिश कर रहेथेजिसेपकड़ कर वो अपनी गति पर नियंत्रण पा सके. ढलान के मुहाने पर आक्रमणकारियों की टोली एक सीधी क़तार मेंखड़ी हुई थी और ऊपर से ही अग्निबाण व चकरियाँफेंक कर चंद्र्भा ल को अपना निशाना बनानेकी कोशिश कर रही थी.  

चंद्र्भा ल के हाथ एक वृक्ष की उभरी हुई जड़ों पर पड़े, उसनेमज़बूती सेजड़ पकड़ ली फिर भी गति सेलुढ़कता उसका शरीर ढलान के किनारेपर उगेउस बरगद सेजा टकराया, उसके पेट मेंबल पड़ गए. दर्दसेकराहता चंद्र्भा ल अपना पेट पकड़ कर बरगद के तनेसेपीठ टिका कर बैठ गया और मुँह 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  को आतेकलेजेव उखड़ी हुई साँसों को क़ाबूमेंकरनेका प्रयास करनेलगा. उसके हाथ-पाँव, घुटने व कु हनियाँबुरी तरह छिल गए थे, माथेपर भी चोटेंआयी थीं. अपनेलहू व धूल-मिट्टी मेंसना,  थकान सेचूर, भूख-प्यास सेव्याकु ल व अशक्त, वो आक्रमणकारियों के लिए अब एक आसान शिकार था. किंतुआक्रमणकारियों नेढलान सेनीचेउतरनेकी कोशिश ना की, वेमुहानेपर यूँखड़े रहेजैसेवहाँकोई अदृश्य लक्ष्मण रेखा खिची हो जिसेजिसेपार करनेकी कोशिश करतेही वो भस्म हो जाएँ गे. 

मुहानेपर खड़े-खड़ेही उन्होंनेअपनी प्रत्यंचा पर अग्निबाण चढ़ाए. उस कोण सेनीचेचंद्र्भा ल पर निशाना साधना बेहद सरल कार्यथा, वैसेभी चंद्र्भा ल मेंअपना बचाव करनेके लिए कतरा भर ऊर्जा भी शेष ना थी. उसका हाथ कमर पर खोंसी पिस्तौल पर गया. उसनेतेज़ी सेपिस्तौल निकालतेहुए गोलियाँदागी. वेब्ली टॉप ब्रेक रिवॉल्वर नेआग उगलतेहुए छे .455 कैलिबर की गोलियाँदागी.  

गोलियाँचलनेके समय ही आसमान मेंज़ोरदार बिजली कड़की. इतनी भीषण गर्जना हुई जिसमें गोलियों का शोर घुट गया, रौशनी का ऐसा झमका उठा कि सबकी आँखेंचौंधिया गयीं. मुहानेपर खड़ेआक्रमणकारियों की क़तार मेंसेपाँच आक्रमणकारी ढ़ेर हो गए थे. तीन ऊपर गिरेऔर दो के बेजान शरीर ढलान सेनीचेलुढ़क कर झाड़ियों मेंजा फँ से. चंद्र्भा ल की चलाई एक गोली शायद अपना निशाना चूक गयी थी. ऊपर आक्रमणकारियों के दल मेंभारी खलबली मच गयी थी.  

अंधेरा वापस छा चुका था और घोर घन गर्जना के साथ बारिश शुरू हो हो गयी थी. जंगल मेंदूर कहीं सेकुत्तेका या फिर किसी भेड़िए या सियार का रुदन सुनाई दिया. आक्रमणकारी विचलित अवश्य हुए थेकिंतुना वेढलान सेनीचेआए और ना ही वहाँसेभागे. चंद्र्भा ल नेदेखा कि वेफिर से अग्निबाण दागनेकी तैयारी कर रहे हैं. उसकी पिस्तौल ख़ाली हो चुकी थी, प्राण बचानेका यह उसका अंतिम प्रयास था जो विफल रहा. पिस्तौल थामा हुआ चंद्र्भा ल का हाथ जैसेबेजान होकर नीचेगिर, पिस्तौल उसके हाथ सेछूट कर कहीं लुढ़क गयी. किसी भी क्षण उसका जिस्म अग्निबाणों सेबिंधनेवाला था. वर्षातेज हो चली थी, चेहरेपर पड़ती पानी की बौछार किसी भी क्षण अग्निबाणों की बौछार मेंबदलनेकी प्रतीक्षा करतेचंद्र्भा ल की उँगलियाँज़मीन पर बिखरेसूखेपत्तों के बीच किसी चीज़ सेटकराईं. पत्थर जैसी ठोस, किंतुचिकनी इस वस्तुका आकार विचित्र व अप्राकृतिक था. 

चंद्र्भा ल नेवह वस्तुउठाई. वो एक पीलेरंग का, हथेली सेकु छ बड़ा आयताकार बक्सा था जिसपर तीन क़तारों में, दो-दो के जोड़ेखटके उभरेहुए थे. इन छोटे-छोटेखटकों पर अंग्रेज़ी के 1-9 तक के अंक व अंग्रेज़ी के अक्षर लिखेथे. खटकों की इस क़तार के ऊपर भी अलग-अलग आकार के कु छ खटके थे जिन पर विचित्र सेचिन्ह अंकित थे, इनके ऊपर एक गहरेरंग का छोटा आयताकार घेरा था, इसके अंदर भी कु छ विचित्र सेचिन्ह अंकित थे. ऐसी विचित्र वस्तुचंद्र्भा ल नेपहलेकभी ना देखी थी. क्या यह अंग्रेजों का कोई नए क़िस्म का हथियार था? कोई बम? हाँ! अवश्य ही यह कोई नयी तकनीक का बम था. चंद्र्भा ल नेनिश्चय किया कि यदि मरना ही हैतो वो इन हरामख़ोर हमलावरों 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  को साथ लेकर मरेगा, किंतुयह बम फटेगा कै से? चंद्र्भा ल नेउभरेहुए खटकों को बेतरतीब ढंग से दबाना शुरू किया. अगलेही पल सभी खटके जैसेजल उठे और गहरे रंग के आयताकार घेरेसे रौशनी निकल कर चंद्र्भा ल की आँखों सेटकराई. इसके साथ ही उस पीलेबक्सेसेएक एक तीखी सीटी की ध्वनि जैसा विचित्र संगीत बाजना शुरू हो गया.  

यह धुन उसनेपहलेसुनी थी. सिटी हॉल मेंगोरेअपनी मेमों संग इस धुन पर नाचतेथे. लेकिन वहाँतो संगीतकारों और साज़कारों का पूरा जमावड़ा मिल कर यह धुन बजाता था. यह संगीत भला इस छोटे सेबक्सेसेकै सेनिकल रहा था? चंद्र्भा ल नेघबराकर उस बक्सेको आक्रमणकारियों की तरफ़ फेंका. एक बार फिर ज़ोरदार बिजली कौंधी. रौशनी का झमका इतना ज़ोरदार था कि चंद्र्भा ल की चौंधियाई आँखों के सामनेसैकड़ों सितारेनाचनेलगे, जिनके बीच एक अजीब सेदृश्य उभर रहा था.  एक दुबला-पतला, लम्बेक़द का युवक जिसकी उम्र अट्ठाईस, बड़ी हद तीस के क़रीब होगी; कं धे तक लम्बे, लहरदार बाल, चेहरे-मोहरेकी बनावट व रंग जिसके हिंदुस्तानी होनेकी पुष्टि कर रहेथे;  

किसी अजीब सेबड़ेकक्ष मेंखड़ा था जहां विचित्र यंत्र थे, दीवारों पर विचित्र आकृतियाँव पर्चेलगे थे. वो नवयुवक जैसेचंद्र्भा ल को ही घूर रहा था. फ़ोटोग्राफ़ के नेगेटिव के जैसा नज़र आता यह दृश्य एक ही पल मेंरौशनी के उस झमके के साथ लोप हो गया.  

चंद्र्भा ल की आँखों के आगेअंधेरा और धुँधलका छाया हुआ था. उसनेकस कर अपनी आँखेंमीचीं और सर को झटका दिया. जब उसकी आँखेंअंधेरेमेंदेखनेकी अभ्यस्त हुईं तब सामनेका दृश्य बदल चुका था. ढलान के ऊपर आक्रमणकारियों का नामोनिशान ना था. ऐसा लग रहा था जैसेवो रौशनी का झमका उन सबको निगल गया हो. वो पीलेरंग का विचित्र बक्सा भी ग़ायब हो चुका था.  

बारिश बंद हो रही थी और चाँद पर सेबादल छट रहेथे. ढलान के ऊपर, मुहानेपर एक आकृति उभरी, जिसकी दो कं जी आँखेंहीरों के मानिंद चमक रही थीं. यह वही काला कुत्ता था. चंद्र्भा ल को घूरतेहुए इसके मुँह सेएक अजीब सी गुर्राहट निकली.  

चंद्र्भा ल नेखड़ेहोनेकी कोशिश की, लेकिन उसके पैर उसका भार ना लेसके. लड़खड़ा कर गिरते हुए चंद्र्भा ल नेपेड़ का सहारा लेनेका प्रयास किया लेकिन पेड़ के जिस हिस्सेपर चंद्र्भा ल का हाथ पड़ा वो यूँअंदर को धँस गया जैसेसड़ कर अंदर सेखोखला हो गया हो और उसके भीतर एक विशाल व गहरी कोटर बन गयी हो. चंद्र्भा ल उस ख़रगोश की खोह जैसी सुरंग मेंयूँगिरता चला जा रहा था जैसेवो अंतहीन सुरंग वृक्ष की जड़ों सेहोतेहुए पाताल तक जाती हो.  

उस पेड़ के पास की झाड़ियों मेंकु छ हलचल हुई. मिट्टी व कीचड़ सेसनेदो नन्हेपाँव झाड़ियों से निकल कर उस वृक्ष के पास आए. वो आकृति अपनेनन्हेपाँवों पर उचक कर कोटर रूपी सुरंग में चंद्र्भा ल को गिरतेदेख रही थी. सुरंग सेआती नीचेगिरतेचंद्र्भा ल की चीख अब दूर, और दूर होती जा रही थी. नीचेगिरतेचंद्र्भा ल का दिमाग़ उस सुरंग सेगहरेअंधेरेमेंडूब गया. उस आकृति के चेहरे पर संतुष्टि के भाव आए, उसनेपीछेपलट कर ढलान के ऊपर खड़ेकालेकुत्तेकी ओर देखा. कुत्ता 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  अपना मुँह ऊपर उठा कर रुदन करनेलगा. इस घटनास्थल सेकु छ ही दूरी पट एक ऊँ चेपीपल वृक्ष के ऊपर, पत्तों के झुरमुट मेंछुपी बैठी एक विशालकाय आकृति यह सारा माजरा देख रही थी.  

* * *  

June, 1997  

Bangalore, India  

वह जून की सबसेगर्मदोपहर थी, ग़ैराश की ऐस्बेस्टॉस शीट लगी सीलिंग उसेकिसी तंदूर सा तपा रही थी. प्रभाकरण के वॉकमैन पर डिसेम्बर मेंरिलीज़ हुई प्रभुदेवा की फ़िल्म ‘कधलन’ का चार्टबस्टर ‘टेक इट ईज़ी उर्वशी’ बज रहा था और हेडफ़ोन लगाए हुए प्रभाकरण अपनेनए मैकिंटॉश 6500/300 पर कमांड्ज़ देनेमेंव्यस्त था. दो महीनेपहलेलॉंच हुई यह तकनीक की अद्भुत कारीगरी उसेपिछलेमहीनेबैंगलोर मेंमैजिक अ’कै डमि द्वारा आयोजित ‘वर्ल्डमैजिक फ़ेस्टिवल’ मेंविश्व भर सेआए 600 सेभी अधिक जादूगरों द्वारा दिखाए गए करतबों सेभी कहीं ज़्यादा चमत्कारी लग रही थी. इस मशीन को वॉशिंटॉन सेख़रीद कर पुणेलानेमेंलगभग दो लाख रुपए खर्चहो चुके थे, ग़ैराश मेंमौजूद अन्य उपकरण; जिनमेंकम्प्यूटर सेजुड़ेटीवी मॉनिटर, वीडियो इनपुट डिवाइस, और मॉडम के अतिरिक्त, एक पोर्टके बल सेकनेक्टेड मशीन भी थी जिसकी ऊँ चाई लगभग पाँच फ़ीट होगी, इस आयताकार मशीन पर दो वुडन प्लैट्फ़ॉ र्मथेजिनमेंसेनिचलेप्लैट्फ़ॉ र्मपर तारों सेजुड़ेकई अलग अलग सर्कि ट थेऔर चारों कोनों पर लगेचार वुडन पिलर्ससेहोतेहुए ऊपर के प्लैट्फ़ॉ र्मतक जाते थेजहां पारदर्शी काँच का एक बहुत बड़ा जार लगा हुआ था जिसके अंदर पुरानेजमानेमेंघंटाघरों में प्रयोग होनेवाली घड़ियों जैसेदो डायल थे. ब्रास के बनेयह दोनों डायल के ब्रास बॉक्स सेजुड़ेहुए थे. ब्रास बॉक्स एक तरह का प्रोजेक्टर था जिसमेंतीन प्रोजेक्शन लेंस लगेहुए थे. इस मशीन का एक के बल ग़ैराश के इलेक्ट्रिक बोर्डसेकनेक्टेड था.  

यह ‘क्रॉनोस्कोप’ प्रभाकरण की इन्वेन्शन्वे न था जिसेबनानेमेंउसकी लगभग सारी पुश्तैनी पूँजी फुँ क चुकी थी, रही सही कसर हर महीनेआतेहज़ारों रुपए के बिजली के बिल पूरी कर रहेथे. पड़ोसियों नेअलग जीना हराम कर रखा था क्योंकि प्रभाकरण के रात-बेरात एक्स्पेरिमेंट करनेसेपूरेएरिया की पावर सप्लाई ट्रिप कर जाती थी. अभी पिछले हफ़्ते ही रात के ढाई बजे प्रभाकरण के एक्स्पेरिमेंट के चलतेएरिया का ट्रैन्स्फ़ॉ र्मर फुँ क गया, जिसेठीक होनेमेंतीन दिन लगे. इन तीन दिनों मेंपूरेमोहल्लेनेप्रभाकरण को दाऊद इब्राहिम सेभी बड़ा और ख़तरनाक आतंकी घोषित कर दिया था. हालाँकि इससेप्रभाकरण को कोई ख़ास फ़र्क़ ना पड़ा, उसेअफ़सोस इस बात का था कि उसके तीन दिन बर्बाद हो गए और बिजली विभाग नेउस पर जुर्माना ठोंक दिया सो अलग. जिन महान साइंटिस्ट्स और रीसर्चर्सकी जीवनियाँपढ़तेहुए प्रभाकरण बड़ा हुआ था; जिन्हेंदुनिया नेपागल,  नाकारा और असामाजिक तत्व जैसी उपाधियों से नवाज़ा, लेकिन जिनके आविष्का रों ने मानव विकास मेंक्रांतिकारी परिवर्तन लाए और अपनेआलोचकों के मुँह पर तालेजड़ दिए; इन वैज्ञानिकों की श्रेणी मेंअपना नाम दर्जकरानेके वो बहुत क़रीब है, ऐसा प्रभाकरण का अटूट विश्वास था.  

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  उसका यह विश्वास बेबुनियाद ना था, कोई भी रचनाकार जब अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना का सृजन का सृजन कर रहा होता हैतो वो उसकी आनेवाली सफलता को महसूस कर सकता है; यह भाव मातृत्व के समान ही है, जहां माँअपनी संतान के अंतर्मन के भावों को बिना कहे महसूस कर लेती है;  प्रभाकरण महसूस कर रहा था कि वो सफलता के बेहद क़रीब है. एक बार ‘क्रॉनोस्कोप’ काम कर जाए फिर जिनके मुँह उसका मज़ाक़ उड़ानेऔर उसेबुरा-भला कहनेको खुलतेहैंवो खुलेके खुले रह जाएँ गे. प्रभाकरण चाहता तो कु करमुत्तों की तरह खुल रही आइ.टी. फ़र्म्समेंसेकिसी का टॉप बॉस बन कर लाखों रुपए कमा सकता था. वो जानता था कि आनेवालेपाँच सालों मेंआइ.टी.  सेक्टर मेंकितना वृहद्रूप लेनेवाला था लेकिन प्रभाकरण को कॉर्पो रेट स्लेव नहीं बनना था, और ना ही वो चाहता था कि निकोला टेस्ला की तरह उसके आइडिया और इन्वेन्शन किसी सरकारी विभाग द्वारा चुरा लिए या फिर थॉमस एडिसन जैसेकिसी प्रभावशाली ब्युरोक्रेट द्वारा बहिष्कृत व निषिद्ध कर दिए जाएँ.  

नया ट्रैन्स्फ़ॉ र्मर लगनेके बाद सेप्रभाकरण पिछलेपाँच दिनों सेअपनेग़ैराश मेंरात-दिन काम कर रहा था. यह ग़ैराश उसकी लैब सेज़्यादा उसका घर बन चुका था, जिसकी दीवारों पर ‘फ़ज़ी’  चॉकलेट बार के साथ मिलनेवाले 1983 ऐनिमेटेड सिरीज़ ‘ही-मैन एं ड द मैस्टर्ज़ऑफ़ द यूनिवर्स’  के सभी कैरेक्टर्स के स्टिकर्ससेलेकर ‘स्टार वॉर्स’ ट्रिलॉजी व ‘स्टार ट्रेक’ टेलिविज़न सिरीज़ के पोस्टर्सलगेहुए थे. इसके अलावा, कोनेमेंरखा बुक शेल्फ ‘वीयर्डफ़ैंटसी’, ‘लॉस्ट वर्ल्ड्ज़ ’, ‘मिस्ट्री इन स्पेस’, और ‘वीयर्ड साइं स’ कॉमिक बुक्स से लेकर ‘स्टार लॉग’, ‘स्काई एं ड टेलिस्कोप’ ‘अस्टाउंडिंग साइंस फ़िक्शन’ और ‘असिमोव ‘स साइंस फ़िक्शन’ मैगज़ीन्स सेपटा पड़ा था. टेलिविज़न कैबिनेट और वी.सी.आर. के ऊपर ‘2001 ए स्पेस ऑडिसी’, ‘स्टार वॉर्स’ ट्रिलॉजी व ‘बैक टू द फ़्यू चर’ ट्रिलॉजी के वीडियो कसेट रखेहुए थे. प्रभाकरण की डेस्क पर आइज़ैक असिमोव की शॉर्टस्टोरीज़ का कलेक्टर्सएडिशन रखा था जिसमेंअसिमोव की साई-फ़ाई शॉर्टस्टोरी ‘द डेड पास्ट’ बुक्मार्क की हुई थी. 

वास्तव मेंयह कहानी ही प्रभाकरण के आविष्का र की प्रेरणास्रो त थी. कहानी के दो मुख्य किरदार ऑर्नल्ड पॉटरलेऔर जोनस फ़ॉस्टर एक ‘क्रॉनोस्कोप’ बनानेकी कोशिश करतेहैंजिसकी मदद से वो पुरातन कॉर्थिज सभ्यता का अवलोकन कर पाएँपरंतुवेपूरी तरह सफल नहीं हुए. 1956 में ‘टाइम व्यूइं ग’ पर फ़िक्शन लिखतेहुए आइज़ैक असिमोव नेआनेवालेभविष्य और जिस तकनीकी व वैज्ञानिक उन्नति की कल्पना की थी, विज्ञान सन 2000 सेपहलेही उससेकहीं ज़्यादा तरक़्क़ी 

कर चुका था. फ़ॉस्टर और पॉटरले ‘क्रॉनोस्कोप’ सही ढंग सेनहीं बना पाए क्योंकि उनके पास 50  MHz, 4MB ROM, 128MB RAM, 6 GB हार्डड्रा इव वाली कोई अड्वैन्स मशीन और उसका सही ढंग सेइस्तेमाल कर पानेवाला दिमाग़ नहीं था. न्यूट्रीनिक्स की सही जानकारी और ‘न्यूट्रीनो’  स्ट्रीम को रेग्युलेट करनेका फ़ॉर्म्युला, ताकि वो स्पेस-टाइम क्रॉस-सेक्शनल अवरोध को पार कर के स्पेस व टाइम दोनों मेंइस प्रकार यात्रा करे, जिससेसमय धारा मेंकिसी भी निर्धारित समय काल के लाइट वेव और एयर मॉलेक्यूलर स्ट्रक्चर को ‘क्रॉनोस्कोप’ जैसेयंत्र की सहायता सेकैप्चर कर के 25

TANTRAPURAM NITIN MISHRA  किसी फ़िल्म की तरह प्रोजेक्टर द्वारा मोशन इमेजिंग प्रोजेक्शन किया जा सके; यह काम प्रभाकरण कर सकता था. उसका ‘क्रॉनोस्कोप’ तैयार था, क्रॉनोस्कोप के प्रोजेक्टर लेंस नेपिछलेहफ़्तेएक फ़िल्म नेगेटिव जैसी धुंधली इमेज फ़्लै श की थी लेकिन उसी समय ओवरलोड सेट्रैन्स्फ़ॉ र्मर उड़ गया था.  

प्रभाकरण का दिल कह रहा था कि आज कमाल होनेवाला है. नींद, भूख-प्यास, सब कु छ त्याग कर प्रभाकरण घंटों तक कम्प्यूटर और क्रॉनोस्कोप पर काम करता रहा. उसेसमय का भी ध्यान ना रहा कि दोपहर सेआधी रात कब होनेको आ गयी. आसमान मेंचाँद के आगेकालेघनेबादल छा गए और कान के पर्दे फाड़ देनेवाली आवाज़ के साथ बिजली चमकनेलगी. यह मॉन्सून के आगमन का संके त था.  

‘जीत का मंत्र है, टेक इट ईज़ी पॉलिसी!’  

‘फ़ज़ी’ बार का रैपर खोल कर एक बाइट लेतेहुए प्रभाकरण नेकी-बोर्डपर फ़ाइनल कमांड प्रॉम्प्ट दिया और क्रॉनोस्कोप ऑन कर दिया. क्रॉनोस्कोप के ग्ला स जार के अंदर दोनों ब्रास डायल की सुइयाँतेज़ी सेघूमनेलगीं और जार के अंदर बहुत ही सूक्ष्म आकार की, जुगनुओ ं जैसी, जलती- बुझती चिंगारियाँनाचनेलगीं. किसी इं डस्ट्रीयल जेनरेटर की तरह ज़ोरदार शोर करतेहुए क्रॉनोस्कोप बुरी तरह थर्रानेलगा. ग़ैराश मेंजल रहा दो सौ वॉट का बल्ब फु कफु का कर पतली तार जैसा जलने लगा और फिर फ्यूज़ हो गया, पूरेमोहल्लेमेंजल रही सभी लाइट, यहाँतक कि स्ट्रीटलाइट्स का भी यही हश्र हुआ, लेकिन ग़ैराश मेंरौशनी की कोई कमी ना थी. क्रॉनोस्कोप जार सेनिकल कर तीव्र रौशनी चारों तरफ़ फै ल रही थी. क्रॉनोस्कोप के सामनेरखी डेस्क के ऊपर एक स्क्री न लगी हुई थी,  क्रॉनोस्कोप के एक प्रोजेक्शन लेंस सेरेज़ निकल कर स्क्री न पर कु छ धुंधली सी आकृतियाँबनाने लगीं. 

‘हाहाहाहा…प्रभाकरण! यूहैव डन इट, यूजीन्यस सन ऑफ़ बिच!’ 

उत्तेजना सेप्रभाकरण की आवाज़ और उँगलियाँकाँप रही थीं. इमेज क्लीयर करनेके लिए उसने की-बोर्ड पर कमांड प्रॉम्प्ट दिए. स्क्री न पर किसी घनेजंगल के दृश्य उभरे. पहनावेसेअंग्रेजों के समय का हरकारा लगनेवाला एक युवक अपनी जान बचानेके लिए भाग रहा था, उसका पीछा करतेहमलावर उसपर जलतेतीरों और हथियारों सेवार कर रहेथे. इमेज अब भी बिल्कुल साफ़ नहीं थी.  

‘येक्या है? किसी के डिश एंटेना का सिग्नल तो नहीं कै च करनेलग गया यह? पता चला कि मैं डी.डी. मेट्रो का ‘बेताल पच्चीसी’ देख कर खुश हो रहा हूँकि मैंनेटाइम व्यूइं ग मशीन की ईजाद कर ली!’ 

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TANTRAPURAM NITIN MISHRA  

प्रभाकरण नेखुद मेंबड़बड़ातेहुए अपना हेडफ़ोन उतारा और प्रोजेक्शन इमेज को और शार्पकरने की कोशिश करनेलगा. तभी बाहर आसमान मेंज़ोरदार बिजली कड़की. पूरा ग़ैराश यूँथर्रागया जैसे आकाशीय बिजली सीधेवहीं गिरी हो. प्रभाकरण की आँखेंचौंधिया गयीं.  

जब उसकी आँखों के सामनेनाचतेसितारेछँटेतो स्क्री न पर उसेवो युवक साफ़-साफ़ नज़र आ रहा था जैसेकि प्रभाकरण उसेठीक अपनेसामनेदेख रहा हो. युवक बुरी तरह घायल था और एक पेड़ का सहारा लेकर बैठेहुए, यूँसामनेदेख रहा था जैसेकि वो प्रभाकरण को देख सकता हो. एक पल को उस युवक के चेहरेपर आए भाव देख कर प्रभाकरण को लगा कि युवक वाक़ई उसेदेख रहा है.  

असमंजस मेंखड़ेप्रभाकरण नेस्क्री न के क़रीब जानेकी कोशिश की लेकिन तभी, एक बार फिर से ज़ोरदार बिजली कड़की और मोहल्लेका ट्रैन्स्फ़ॉ र्मर एक बार फिर फुँ क गया. क्रॉनोस्कोप बंद हो गया और साथ ही स्क्री न पर प्रोजेक्ट होती इमेज भी, लेकिन प्रभाकरण को यक़ीन था कि उसने स्पेस-टाइम बैरीयर को ब्रेक करनेका तरीक़ा ढूँढ निकाला है.  

वो ख़ुशी सेफू लेनहीं समा रहा था. उसेयह बात सबसेपहलेदक्षा को बतानी थी. प्रभाकरण अपना नोकिया 1611 फ़ोन ढूँढनेलगा. जैन्यूएरी मेंलॉंच हुआ यह पहला सोलर पावर्ड बैटरी ऑपरेटेड सेटेलाइट फ़ोन था. मैकिंटॉश के साथ इस फ़ोन के दो आइडेंटिकल येलो कलर वेरीएं ट सेट भी प्रभाकरण वॉशिंटॉन सेलाया था जिसमेंसेएक उसके पास था और दूसरा उसनेदक्षा को दिया था ताकि जब भी उसका दिल करेवो दक्षा सेबात कर सके.  

‘कहाँचला गया? अरेयहीं डेस्क पर तो रखा था!’  

प्रभाकरण चारों तरफ़ अपना फ़ोन ढूँढतेहुए बड़बड़ाया. तभी उसके फ़ोन की बैंडिनेरी रिंगटोन बजी. ‘यह यहाँकै सेपहुँच गया?’ 

मेज़ के नीचेसेफ़ोन बरामद करतेहुए प्रभाकरण आश्चर्यचकित था. फ़ोन यूँगीला और कीचड़ में सना हुआ था जैसेसीधेजंगल सेउठा कर वहाँफेंक दिया गया हो. 

* * *  

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