VISMAYA IN WONDERLAND

CHAPTER 01
राजकुमारी रेवारति के अप्सराओं को भी लज्जित कर देने वाले लावण्य से भरपूर मुखमंडल पर व्याकुलता व्याप्त थी. रात्रि के दो प्रहार बीत चुके थे. राजभवन प्रांगण में पहरा देते प्रहरियों की पदचापें अब मंद पड़ रही थीं. रेवारति मलमल की यवनिकाएँ(drop curtains) हटा कर शयनकक्ष से लगे हुए खुले बारजे(balcony) में आ गयी. अमावस्या की स्याह रात्रि का अंधकार महल प्रांगण में जल रही मशालों को उनकी असमर्थता पर जैसे मुँह चिढ़ा रहा था. पूरे वातावरण में पारिजात के पुष्पों की सुगंध व्याप्त थी.
राजभवन प्रांगण में लगे पारिजात वृक्ष की डालियाँ ऊपर राजकुमारी रेवारति के शयनकक्ष के बारजे तक आयी हुई थीं जिससे बारजे पर श्वेत पारिजात पुष्पों की चादर बिछी हुई थी. मंद गति से बहती पुरवैया जैसे रेवारति के यौवन से आच्छादित काया के मर्दन लोभ को लगाम लगाने में असमर्थ सी, उसके जिस्म से लिपट गयी. रेवारति के जिस्म की सुगंध पारिजात के पुष्पों समेत पुरवैया में घुल गयी. उस घड़ी, उसके रूप-यौवन और लावण्य को भोगने का लोभ तो शायद देवता भी छोड़ ना पाते. रेवारति ने अपने कदमों के पास पड़े पारिजात पुष्पों को हथेली में उठा लिया और उनकी कोमल पंखुड़ियों का स्पर्श अपने कपोलों से करते हुए मुस्कुराई. मृग शावकों के समान नेत्रों में प्रकृति के स्पर्श की प्रसन्नता परिलक्षित हुई और फिर लोप हो गयी. अनिश्चितता और व्याकुलता का स्थायी भाव पुनः उन मृगनयनों में प्रतिबिम्बित हुआ. रेवारति के मुखमंडल की कांतिमान आभा पर फिर से भय ने ग्रहण लगा दिया. आँखों से अश्रुधारा बह निकली.
पारिजात के वृक्ष पर उस सर्प की उपस्थिति से रेवारति पूर्णतः अनभिज्ञ थी जो वृक्ष के मोटे तने से कुंडली मार कर लिपटा हुआ था और रेवारति के लावण्य और सुगंध से मंत्रमुग्ध हुआ जा रहा था. रेवारति की व्याकुलता सर्प से भी छुपी ना रह सकी. उस व्याकुलता का कारण जानने की जिज्ञासा, रेवारति के सौंदर्य के साथ सर्प के हृदय में उतर चुकी थी. सर्प पारिजात वृक्ष के तने से सरसराते हुए बारजे के कटहरे(railing) से लिपट कर रेवारति के सामने आ गया.
अमावस्या की उस रात से भी अधिक स्याह उस करैत सर्प को देख कर रेवारति के नेत्र विस्फारित हो गए. इससे पूर्व कि रेवारति के कंठ में उबलती चीख वातावरण में गूंजती, सर्प बोल पड़ा.
सर्प- ‘भयभीत ना हों देवी, आपके सम्मुख आने का मेरा उद्देश्य आपको हानि पहुँचाना नहीं है. मैं तो मात्र आपकी व्याकुलता का कारण जानना चाहता हूँ.’
एक सर्प को मानवों की भाँति बात करते देख राजकुमारी बुरी तरह चौंकी.
रेवारति- ‘त..तुम तो सर्प हो! भला तुम मानवों की बोली कैसे बोल-समझ सकते हो?’
सर्प- ‘मैं सदैव मानवों के बीच रहा हूँ, मानवों की भाषा, बोल-चाल, बात-व्यवहार का ज्ञान है मुझे. इसीलिए कहता हूँ देवी, मुझे अपनी व्याकुलता का कारण बताएँ, मैं अवश्य आपकी समस्या का समाधान करने में सहायता करूँगा.’
रेवारति कुछ पल तक असमंजस में खड़ी, सर्प को देखती रही फिर कुछ सोचते हुए बोली.
रेवारति- ‘परंतु, तुम मेरी सहायता भला क्यों करोगे?’
सर्प- ‘सत्य कहूँ देवी, तो आपके रूप-सौंदर्य ने मेरे हृदय को घायल कर दिया है. ऐसे सुंदर मुख मंडल पर लावण्य जँचता है, व्याकुलता नहीं. मैं प्रतिदिन इसी पारिजात की ऊँची टहनियों से लिपटे हुए आपके कक्ष में देखता हूँ और किसी एक पक्ष प्रेमी की भाँति चोरी-छुपे आपके रूप सौंदर्य का रसपान करता हूँ. आज से पूर्व कभी आपको इतना चिंतित और व्याकुल ना देखा. आज आपको इस अवस्था में देख कर मुझसे रहा ना गया और मैं आपके सम्मुख उपस्थित हो गया.’
रेवारति का पहले से ही मुरझाया हुआ चेहरा जैसे बिना तेल के दीपक के समान और बुझ गया.
रेवारति- ‘क्या करूँ मैं इस रूप-सौंदर्य…इस यौवन-शृंगार का जो मेरा ही शत्रु बना हुआ है.’ रेवारति ने आह भरते हुए कहा.
सर्प- ‘शत्रु? भला कैसे? देवताओं को भी मंत्रमुग्ध कर अपना दास बनाने का सामर्थ्य रखने वाला सौंदर्य और शृंगार तो आप जैसी रूपमती कन्या का श्रेष्ठतम गुण और सर्प के विष से भी अधिक तीक्ष्ण अस्त्र है. यह भला शत्रु कैसे हो सकता है?’
रेवारति- ‘मेरी समस्या इतनी विकट है जिसका निवारण ना मेरा सौंदर्य कर सकता है और ना ही तुम्हारा विष.’
सर्प- ‘अब तो मेरी जिज्ञासा और प्रबल हो गयी है देवी. कुछ बताइए भी, ज़रा पता तो चले कि ऐसा कौन सा यक्ष संकट है जिसका निवारण सर्प का विष और रूपमती कन्या का शृंगार नहीं कर सकता.’
रेवारति- ‘जानना ही चाहते हो तो सुनो सर्प, और यह वृतांत सुन कर स्वयं निर्णय करो कि हमारा सौंदर्य, शृंगार, लावण्य अस्त्र हैया हमारा शत्रु.’
रेवारति ने अपनी बाँह आगे फैला दी. कटहरे से लिपटा हुआ सर्प रेंगते हुए रेवारति की बाँह से लिपट गया.
रेवारति- ‘आज प्रातः सूर्योदय से पूर्व ही हम अपनी सखी और अंगरक्षिका मोहिनी समेत सैनिकों की एक टुकड़ी लेकर राज्य सीमा के पार स्थित अरण्य में आखेट क्रीड़ा हेतु गए थे. आखेट के उन्माद में, एक वन वराह का पीछा करते हुए मैं और मोहिनी अरण्य में बहुत दूर निकल गए. सैन्य दल कब हमसे छूट गया हमें आभास भी ना हुआ. जब आभास हुआ तब तक हम इतने घने वन में प्रवेश कर चुके थे जहां ऊँचे वृक्षों के आवरण रूपी अंधकार को भेद कर अंदर आने में सूर्य की प्रकाश किरणें भी असमर्थ थीं.
वो वन वराह भी किसी छलावे की भाँति कहीं अदृश्य हो गया और हम दोनों दिशाहीन होकर मार्ग भटक गए. भूख-प्यास से व्याकुल अपने अश्वों पर सवार हम दोनों जितना ही उस घने वन से बाहर निकलने की चेष्ठा करते, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हम उतना ही वन के भीतर समाते जा रहे हैं. गगनचुंबी पेड़ों की टहनियाँ ऊपर को जाकर यूँ आपस में गुँथी हुई थीं कि ना ही सूर्य की स्थिति का ज्ञान हो रहा था और ना ही दिशा का. जाने कितनी देर हम वैसे ही वन में भटकते रहे. हम और हमारे अश्व थकान से बुरी तरह थकान से चूर थे जब हमें सामने एक स्वच्छ जल सरोवर नज़र आया. अपने अश्वों को पानी पिला कर मैंने और मोहिनी ने सरोवर के निकट ही उन्हें वृक्षों से बांध दिया.
इसके पश्चात हम दोनों ने भी सरोवर के जल से प्यास बुझाई परंतु सरोवर का जल पीते ही हमारी तीव्र इच्छा उस सरोवर में स्नान करने की होने लगी. हमने अपने सारे वस्त्र उतारे और सरोवर में उतर गए, मोहिनी ने भी हमारा अनुसरण किया. उस सरोवर के स्वच्छ जल का स्पर्श और मोहिनी का सानिध्य किसी मादक तत्व की भाँति हम पर हावी हो रहा था. जल क्रीड़ा करते हुए हमने और मोहिनी ने एक-दूसरे का आलिंगन किया. ठीक उसी क्षण किसी झाड़ी के पीछे से वो जंगली वराह निकला जिसका पीछा करते हुए हम भटके थे. इससे पूर्व कि हम दोनों तैर कर किनारे रखे हुए अपने वस्त्र और शस्त्र तक पहुँचते वो जल वराह एक बहुत भी भयानक यक्ष में परिवर्तित हो गया.’
सर्प- ‘यक्ष में? क्या वो वराह वास्तव में उस वन का यक्ष था?’
रेवारति- ‘हाँ. उस अरण्य यक्ष ने वन वराह का रूप धर कर हमें जान-बूझ कर पथभ्रमित किया था. उसका उद्देश्य हमें हमारे सैन्य दल से पृथक करना और इस सरोवर तक लाना था. उस यक्ष ने अपनी मायावी शक्तियों से सरोवर के जल को अभिमंत्रित कर दिया था.’
सर्प- ‘ओह! इसी कारण आप और आपकी सखी सरोवर का जल पीते ही इस प्रकार व्यवहार करने लगीं?’
रेवारति- ‘हाँ. अरण्य रक्ष के अपनेवास्तविक रूप मेंआतेही उसका अभिमंत्रण भंग हो गया. अपने नग्न जिस्मों को छुपानेका प्रयत्न करतेहुए हम और मोहिनी सरोवर के अंदर ही एक-दूसरे से लिपट गए. हमने उस यक्ष से बहुत विनती-याचना की कि हमें हमारे वस्त्र पहन कर वहाँ से जाने दे किंतु वो नीच काम क्रोधी यक्ष वहीं खड़ा निर्लज्जतापूर्वक हमारी नग्नता पर अट्टहास करता रहा.’
सर्प क्रोध से अपनी दुधारी जिव्हा लपलपाते हुए फुफकार उठा.
सर्प- ‘हिस्स…निर्लज्ज! कामपिपासु कहीं का! फिर क्या हुआ देवी?’
रेवारति- ‘यक्ष के कहा कि हमें बारी-बारी सरोवर से बाहर आ कर उसके साथ सम्भोग करना होगा अन्यथा वो बलपूर्वक हमारे साथ दुराचार करेगा. हमारी सभी याचनाएँ उस दुराचारी के सम्मुख निरर्थक सिद्ध हुई. इससे पूर्व कि वो यक्ष सरोवर में उतर कर हमारा मान भंग करता हमें एक युक्ति सूझी. हमने चुपके से वो युक्ति हमसे लिपटी हुई मोहिनी के कान में कह दी, मोहिनी ने हमें अपने नेत्रों के इशारे से अपनी सहमति दी.
इसके बाद हमने यक्ष से कहा कि पहले मोहिनी जल से बाहर आकर उसके साथ काम क्रीड़ा करेगी, यक्ष इसके लिए सहमत हो गया. निर्वस्त्र मोहिनी सरोवर से बाहर निकली. रूप-यौवन में मोहिनी हमारे समकक्ष ना सही हमसे कम भी नहीं है. कामशास्त्र में निपुण मोहिनी ने कुछ ही क्षणों में यक्ष को मुग्ध कर दिया. यक्ष ने मोहिनी को सरोवर के किनारे लिटा दिया और उस पर सवार हो कर काम क्रिया करने लगा. हमने अवसर लाभ उठाते हुए किनारे पर रखी अपनी तलवार उठायी और उस नीच का सर धड़ से अलग कर दिया.’
सर्प- ‘वाह देवी! क्या बुद्धिमत्ता दिखायी आपने. उस दुराचारी ने स्वप्न में भी कल्पना ना कि होगी ऐसी मृत्यु की.’
रेवारति- ‘उसका तो पता नहीं लेकिन आगे जो हुआ उसकी कल्पना हमने अवश्य ना की थी.’
सर्प- ‘तात्पर्य? क्या हुआ आगे?’
रेवारति- ‘उस यक्ष का कटा हुआ सर पुनः अपने धड़ से जुड़ गया और वो जीवित हो कर अट्टहास करने लगा. उसने अट्टहास करते हुए कहा कि वो उस आरण्य का यक्ष है, जब तक वो उस आरण्य में है कोई भी उसका वध नहीं कर सकता. इसके पश्चात उसने कहा कि अब वो हमारा मान भंग करेगा.’
सर्प- ‘फिर?’
रेवारति- ‘अपनी रक्षा के लिए हमने एक और युक्ति लगाई. हमने यक्ष से कहा हम स्वेच्छा से उसके साथ काम क्रिया करना चाहते हैं, परंतु हम राजकुमारी हैं. इस प्रकार वन की कठोर भूमि पर काम क्रिया में हम सहज ना होंगे और उसे पूर्णतः संतुष्ट ना कर पाएँगे, हमें काम क्रीड़ा के लिए हमारे शयनकक्ष का आरामदायक पलंग और मखमली बिछौना चाहिए फिर हम उसे वो चरम सुख दे सकते हैं जो देवी रति काम देव को प्रदान करती हैं.’
सर्प- ‘यक्ष मान गया?’
रेवारति- ‘अरे वो कपटी यक्ष हमारी अपेक्षा से अधिक धूर्त निकला. हमारी युक्ति उसने तत्क्षण ही भाँप ली. उसनेअट्टहास करते हुए कहा कि हम मूर्ख हैं यदि हम यह सोच रहे हैं कि इस प्रकार प्रलोभन देकर उसे अरण्य से बाहर ला कर उसका वध कर सकते हैं. उसने कहा कि अरण्य से बाहर भी कोई मानव, दानव, देव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, पशुया प्राणी अपने मूल रूप में उसका वध नहीं कर सकता.’
सर्प- ‘ओह! फिर क्या हुआ?’
रेवारति- ‘उस यक्ष ने कहा कि आज तक उसने किसी भी राजकुमारी का भोग उसके मखमली पलंग के ऊपर, उसके ही शयनकक्ष में नहीं किया है. उसने हमें और मोहिनी को हमारे वस्त्र धारण कर वहाँ से जाने की आज्ञा दे दी और कहा कि आज सेहर रात वो रात्रि के दूसरे पहर के पश्चात हमारे कक्ष में आएगा. जब वो आएगा तब उसके अभिमंत्रण से हमारे और मोहिनी के अतिरिक्त राजभवन में उपस्थित सभी लोग, सभी प्रहरी चीर निद्रा में चले जाएँगे और वो यक्ष प्रातः सूर्योदय तक हम दोनों के जिस्मों को भोगेगा.’ वृतांत समाप्त करते हुए रेवारति फूट-फूट कर रोने लगी.
सर्प-‘अच्छा! तो यह है आपकी व्याकुलता का कारण.’
रेवारति- ‘मैंने कहा था ना, मेरी समस्या का समाधान ना तुम्हारे विष के वश का है ना मेरे सौंदर्य शृंगार के. वो दुराचारी अरण्य यक्ष किसी भी क्षण आता ही होगा.’
सर्प- ‘फिर हमारे पास अधिक समय शेष नहीं है, तुरंत मेरे साथ अपने शयनकक्ष के भीतर चलिए राजकुमारी.’ रेवारति की बाँह से लिपटे सर्प ने अधीरतापूर्वक कहा.
रेवारति- ‘परंतु क्यों?’
सर्प- ‘क्योंकि मेरे पास अभी भी एक युक्ति है जो यक्ष से आपकी रक्षा कर सकती है.’ राजकुमारी ने सहमति में सर हिलाया और सर्प को लेकर शयनकक्ष में चली गयी.
* * *
बारजे पर यक्ष की अट्टहास गूंजी. अट्टहास की गर्जना बता रही थी यक्ष के अभिमंत्रण से राजभवन के सभी निवासी व कर्मचारी चीर निद्रा में जा चुके थे. राजकुमारी रेवारति अपने पलंग के कोने में सिमट कर बैठ गयी. उसने भयभीत नेत्रों से बारजे की तरफ़ देखा, वो भयानक अरण्य यक्ष यवनिकाओं के पीछे खड़ा उसे यूँ घूर रहा था जैसे उसकी बोटी-बोटी नोच कर उसका भक्षण करना चाहता हो. यक्ष शयनकक्ष के भीतर आ गया.
यक्ष- ‘हाहाहा…अकेली बैठी है राजकुमारी, मैंने तो सोचा था तेरा और तेरी सखी, दोनों का भोग एक साथ करूँगा. चल कोई बात नहीं, पहले ज़ी भर कर तेरा मर्दन करता हूँ फिर अपनी उस सखी को भी बुला लेना.’ कहते हुए एक छलांग लगा कर यक्ष पलंग पर सवार हो गया. उसने रेवारति की टांग पकड़ कर खींचते हुए उसे चित्त लिटा दिया और उसपर सवार होते हुए बोला.
यक्ष- ‘सत्य कहा था तूने राजकुमारी. यह नरम पलंग तो बड़ा आरामदायक है, इस पर काम क्रीड़ा का आनंद ही अलग है. यह सुख भला कठोर वन भूमि पर सम्भोग करने में कहाँ प्राप्त होने वाला है.’
रेवारति- ‘हे वीर, आपको असली चरम सुख और चरमोत्कर्ष की अनुभूति तो मैं तब कराऊँगी जब आप आराम से इस नरम पलंग पर चित्त लेटेंगे और मुझे अपने ऊपर सवार होने देंगे.’ रेवारति यक्ष के सीने पर घने बालों में अपनी उँगलियाँ फिराते हुए मादक अन्दाज़ में बोली.
यक्ष- ‘स्त्री जब स्वेच्छा से सहर्ष काम क्रीड़ा करती है तब उस काम क्रीड़ा की चरमोत्कर्ष अनुभूति अलौकिक होती है. तुम ऐसे करना चाहती हो तो ऐसे ही सही!’ कहते हुए यक्ष रेवारति के ऊपर से उतरा और पलंग पर चित्तांग लेट गया.
अश्वारोहण के अन्दाज़ में रेवारति चित्त लेते यक्ष पर सवार हो गयी. असीम आनंद की अनुभूति लेते हुए यक्ष ने अपनी आँखें बंद कर लीं. अचानक विद्युत कौंधने की गति से कोई तीक्ष्ण धातु यक्ष को अपने हृदय में उतरती प्रतीत हुई. चीत्कार करते हुए यक्ष ने अपनी आँखें खोली. राजकुमारी के हाथ में एक कटार थी जिसका फल पूर्ण रूप सेउसकी छाती में उतरा हुआ था. यक्ष असहनीय पीड़ा से छटपटाते हुए बोला.
यक्ष- ‘मूर्ख कन्या, मैंने कहा था ना कि कोई भी मानव मेरा वध नहीं कर सकता…आह्ह.’
रेवारति- ‘मुझे स्मरण है. कोई भी मानव, दानव, देव, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, पशुया प्राणी अपने मूल रूप में तुम्हारा वध नहीं कर सकता, परंतु फिर भी तुम अपने प्राण त्याग रहे हो. ज्ञात है क्यों?’
यक्ष के मुखमंडल पर शमशान की राख सरीखी स्याह कालिख़ छा गयी. उसे अनुभूति हुई कि वास्तव में उसके प्राण शरीर त्यागने को थे.
यक्ष- ‘क…क्यों? कैसे?’
रेवारति- ‘क्योंकि मैं मानव हूँ ही नहीं और ना ही कोई साधारण प्राणी हूँ. मैं इच्छाधारी सर्प हूँ.’ कहते हुए रेवारति के अधरों पर एक विषैली मुस्कान खेल गयी. उसके अधरों के मध्य से सर्प की दुधारी जिव्हा बाहर निकल कर लपलपायी, आँखों की पुतलियाँ पलट कर सर्प की आँखों के समान हो गयीं.
रेवारति- ‘अपनी शक्ति के दम्भ में चूर होकर तुमने यह बात राजकुमारी से कही थी कि संसार का कोई भी प्राणी अपने मूल रूप में तुम्हारा वध नहीं कर सकता. तुम आश्वस्त थे कि राजकुमारी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी और तुम प्रतिदिन उसके साथ दुराचार करते रहोगे किंतु विधाता का खेल देखो. राजकुमारी ने अपनी व्यथा मुझसे कही और मेरे पास राजकुमारी की समस्या का समाधान था.
मैं अपने मूल रूप अर्थात् सर्प रूप में नहीं हूँ बल्कि मैंने राजकुमारी रेवारति का रूप धरा हुआ है, इसलिए मेरा वार तुम्हारे लिए प्राण घातक सिद्ध हुआ.’
छटपटाते हुए यक्ष ने अपनी छाती से कटार निकालने की चेष्ठा की परंतु उससे पूर्व ही उसके प्राण शरीर से निकल गए. प्राण निकलते ही यक्ष का विशालकाय शरीर वायु में विलीन हो गया, सिर्फ़ पलंग पर उसकी छाती में धंसी कटार रह गयी. शयनकक्ष का द्वार हौले से खुला और राजकुमारी रेवारति ने भीतर प्रवेश किया.
सर्प- ‘आइए राजकुमारी. उस दुराचारी यक्ष की इह लीला समाप्त हो गयी, अब वो कदापि आपको व्याकुल ना करेगा.’ राजकुमारी का रूप धरे हुए इच्छाधारी सर्प ने मुस्कुराते हुए राजकुमारी से कहा.
राजकुमारी अपने बड़े-बड़े नेत्रों से आश्चर्यचकित सी, अपनी आकृति में खड़े सर्प को अपलक देख रही थी.
रेवारति- ‘घोर आश्चर्य! ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो हम दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देख रहे हों. एक रत्ती का भी अंतर नहीं. यदि तुम इस रूप में हमारे माता-पिता के सम्मुख चले जाओ तो वो भी अंतर ना बता पाएँगे.’
रेवारति के संवाद पर इच्छाधारी सर्प मुस्कुराया और अपना रूप परिवर्तित कर एक आकर्षक नवयुवक में बदल गया.
सर्प- ‘कदाचित मेरे इस रूप में राजकुमारी मुझे अधिक स्वीकार करेंगी.’
रेवारति- ‘क…क्या तात्पर्य है तुम्हारा सर्प?’ रेवारति ने चौंक कर दो कदम पीछे लेते हुए कहा.
सर्प- ‘तात्पर्य मात्र इतना है राजकुमारी कि मैं आपसे प्रेम कर बैठा हूँ और आपका वरण अपनी अर्धांगिनी के रूप में करना चाहता हूँ.’ सर्प ने मुस्कुराते हुए कहा. उसका यह इच्छाधारी नवयुवक वाला रूप अत्यंत आकर्षक था. देवताओं जैसे तेज वाला मुखमंडल, यक्ष जैसा कसा हुआ और बलिष्ठ शरीर, गंधर्वों के समान लावण्य से परिपूर्ण वो एक सम्पूर्ण श्रेष्ठ पुरुष था.
रेवारति- ‘प…परंतुत…तुम तो सर्प हो और मैं मानव. हमारा मिलन भला कैसे सम्भव है?’
सर्प- ‘यदि आप मेरी अर्धांगिनी बनाना स्वीकार करती हैं तो मैं सदैव इसी रूप में रहूँगा, कभी अपने सर्प रूप में वापस ना आऊँगा.’
रेवारति- ‘वो कैसे?’
सर्प- ‘मैं अपना रूप परिवर्तन अपनी इच्छाधारी मणि की सहायता से करता हूँ देवी. मैं यदि रूप परिवर्तन के लिए मणि की शक्ति का प्रयोग नहीं करूँगा तो सदैव इस रूप में ही रह जाऊँगा.’
रेवारति- ‘परंतु मेरे माता-पिता और राज्य की प्रजा ने यदि इस सम्बंध को स्वीकृति ना दी तो?’ कुछ सोचते हुए रेवारति असमंजस के भाव से बोली.
सर्प- ‘शक्ति, सामर्थ्य और पराक्रम में मैं देवों सेकम नहीं. जिस कुशलता से मैंने अरण्य यक्ष का वध कर दिया, अपनी मणि की सहायता से मैं उतनी ही निपुणता से बड़े से बड़े राज्य की सेनाओं को युद्ध में अकेले ही पराजित कर सकता हूँ. आपके पिता महाराज को आपके लिए मुझसे योग्य वर ना मिलेगा. मेरी शक्तियों के रहते कोई शत्रु आपके राज्य की ओर आँख उठा कर भी देखने का साहस ना करेगा.’
रेवारति- ‘परंतु मैंने तो तुम्हारे पास कोई मणि नहीं देखी. कहाँ है तुम्हारी यह मायावी मणि?’
सर्प- ‘मणि अपने साथ लेकर चलना संकटमय सिद्ध हो सकता है, कोई मुझसे मेरी मणि छीनने का प्रयत्न कर सकता है, इसलिए मैं मणि को सुरक्षित स्थान पर छुपा कर रखता हूँ. मणि की इच्छाधारी ऊर्जाशक्ति की परिधि बहुत वृहद्है. जब तक मैं इस परिधि क्षेत्र के भीतर रहता हूँ मणि के प्रभाव से अपने इच्छाधारी रूप में रह सकता हूँ.’
रेवारति सोच में पड़ गयी. सर्प ने उसके कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा.
सर्प- ‘मैं आपकी दुविधा का कारण समझ गया देवी. आप इसी दुविधा में हैं ना कि अपने माता-पिता को हमारे बारे में कैसे बताएँगी?’
रेवारति ने उसकी आँखों में देखते हुए हौले से सहमति में सर हिलाया.
सर्प- ‘चिंतित ना हों देवी. अरण्य यक्ष की मृत्यु के पश्चात उसका अभिमंत्रण टूट चुका होगा. प्रातः सूर्योदय होते ही मैं आपके साथ चल कर आपके माता-पिता से आपका हाथ माँग लूँगा.’
रेवारति सर्प की आँखों में देखते हुए मुस्कुरायी. सर्प ने कमर पर बंधा अपना एकमात्र अंगवस्त्र खोला और उसे परे फेंक दिया. अब वो रेवारति के सम्मुख पूर्णतः निर्वस्त्र खड़ा था.
सर्प- ‘जैसा कि आप स्वयं देख सकती हैं देवी, पौरुष में भी आपको मुझसे अधिक कहीं कोई ना मिलेगा. मैं सदैव हर प्रकार से आपको सुखी व संतुष्ट रखूँगा.’
रेवारति मुस्कुराते हुए आगे बढ़ी और उसके सीने से लिपट गयी.
रेवारति- ‘ओ देवताओं को भी लज्जित कर देने वाले सौंदर्य, पौरुष और पराक्रम के स्वामी सर्पराज, आप हमें पहले क्यों ना मिले?’ रेवारति नवयुवक की चौड़ी छाती पर चुम्बन अंकित करते हुए बोली.
सर्प- ‘अब तो हम मिल गए हैं ना देवी, अब हमें कोई पृथक ना कर सकेगा. सूर्योदय में अब भी कुछ समय शेष है, यह समय हम आपके अप्रतिम सौंदर्य का रसपान करने और आपके साथ प्रेम क्रीड़ाएँ करने में व्यतीत करना चाहते हैं.’ कहते हुए नवयुवक ने अपने होंठ रेवारति के अधखुले अधरों पर रख दिए. दोनों बेतहाशा एक-दूसरे को चूमने लगे. नवयुवक के हाथ रेवारति के शरीर के हर कोने का अन्वेषण कर रहे थे.
रेवारति के होंठों और गर्दन को चूमते हुए नवयुवक उसके वक्ष तक पहुँचा. रेवारति युवक के सर को अपने दोनों वक्षों के मध्य भींचते और उसके लम्बे, लहरदार बालों में प्यार से उँगलियाँ फिराते हुए बोली.
रेवारति- ‘मुझे अभी एहसास हुआ सर्पदेव कि मैंने आपको दुग्ध अर्पण नहीं किया. मैं आपके लिए राज रसोई से गर्म दूध लेकर आती हूँ. मैंने सुना है कि काम क्रीड़ा से पूर्व गर्म दूध के सेवन से कामलिप्सा(Libido) और मामोन्माद(Orgasm) को बढ़ाता है.’ आँखों और अधरों में चंचलता लिए रेवारति शयनकक्ष से बाहर निकल गयी. नवयुवक इत्मिनान से उसके पलंग पर जा लेटा.
कुछ ही क्षण में रेवारति चाँदी के पात्र में गर्मदूध के साथ वापस लौटी. दुग्ध से उठती केसर की सुगंध ने नवयुवक को उन्मादित कर दिया. रेवारति पलंग पर उस नग्न नवयुवक के बग़ल में बैठ गयी और उसके गठीले जिस्म को अपनी कोमल हथेली से सहलाने लगी. रेवारति की हथेली युवक की जाँघों के मध्य जा कर कस गयी. युवक ने अपना सर हौले से ऊपर उठाया, रेवारति एक हाथ से युवक के पुरुषांग का मर्दन करते हुए दूसरे हाथ से उसे चाँदी के पात्र से दूध पिलाने लगी. कुछ पलों में ही युवक ने दूध का पात्र ख़ाली कर दिया और रेवारति को अपनी भुजाओं में भर कर पलंग पर चित लेटा दिया. रेवारति अपने जिस्म को ऐंठते हुए सिसकारी भरने लगी, युवक ने एक-एक कर रेवारति के सभी वस्त्र उसके शरीर से अलग कर दिए. निर्वस्त्र रेवारति अब पलंग पर उसके नीचे बिछी हुई थी,
युवक आँखें फाड़े रेवारति के अंगों को घूर रहा था. उसने नीचे झुक कर रेवारति के दाहिने वक्ष का अग्रभाग अपने अधरों के मध्य लिया और हौले से अपने अधरों से वक्ष को खींचते हुए मुँह के अंदर अपनी दुहरी जिव्हा वक्ष के अग्र भाग पर फिराने लगा. उसका दाहिना हाथ रेवारति के बाएँ वक्ष का अग्र भाग मसल रहा था और बायाँ हाथ रेवारति के जनांग का मर्दन कर रहा था. रेवारति ने भी युवक के पुरुषांग को छोड़ा नहीं था, उसकी मुट्ठी कसी हुई थी और वो लगातार उसके बृहत्काय पुरुषांग का मर्दन कर रही थी.
अपने चीर जीवन में उस इच्छाधारी सर्प को इससे पूर्व कभी भी इतने चरम रति सुख की अनुभूति नहीं हुई थी. उसकी आँखें स्वतः ही बंद हो गयीं और शरीर ढीला पड़ने लगा. रेवारति ने एक झटके में नवयुवक को नीचे चित लेटा दिया और उसके ऊपर सवार हो कर उसकी छाती पर चुम्बन अंकित करते हुए नीचेकी ओर बढ़ने लगी. असीम उत्तेजना और रति सुख अनुभूति से नवयुवक की कराहें निकल रही थीं उसकी आँखें अब भी बंद थीं. रेवारति ने अपने नरम कपोलों को जब युवक के पाषाण से सख़्त पुरुषांग पर रखा, वो क्षण उसके लिए सम्पूर्ण सृष्टि के सम्मिलित सुखों से अधिक आनंददायक थे.
आनंद के उन्माद में डूबते-उतरते नवयुवक को अचानक यह आभास हुआ कि रेवारति का बदन उससे दूर हो रहा है, उसने चौंक कर आँखें खोलीं. नग्न रेवारति पलंग से उतर कर खड़ी हुई थी और राजसी वस्त्र पहनी हुई एक उसके समान ही सौंदर्य से परिपूर्ण कन्या से आलिंगन किए हुए उस कन्या के अंग वस्त्र खोल रही थी. दोनों के होंठ एक-दूसरे से उलझे हुए, दीर्घचुम्बन में व्यस्त थे. देखते ही देखते रेवारति ने उस कन्या को पूर्णतः निर्वस्त्र कर दिया और उसके वक्षों के अग्र भाग अपने कपोलों में भर कर उनका पान करने लगी. नवयुवक पलंग पर उठ बैठा, उसकी कुछ समझ ना आया. उस कन्या के वक्षों को छोड़ रेवारति सीधी हुई और नवयुवक की तरफ़ देखते हुए मुस्कुरायी.
रेवारति- ‘चकित ना हों सर्पदेव! यह हमारी सखी व अंगरक्षिका मोहिनी है. है ना ये हमारे समान ही यौवन और सौंदर्य से परिपूर्ण?’
सर्प- ‘ह…हाँ देवी परंतु इसके साथ आप यह क्या कर रही हैं?’
रेवारति- ‘हमने तुम्हें जो वृतांत सुनाया था सर्प वो सत्य तो था परंतु पूर्णतः सत्य नहीं था.’ रेवारति अपनी हथेली से मोहिनी की जाँघों के बीच मर्दन करते हुए, धूर्तभाव से मुस्कुरा कर बोली.
रेवारति- ‘वास्तव में उस सरोवर का जल अभिमंत्रित नहीं था. मोहिनी सिर्फ़ हमारी सखी और अंगरक्षिका ही नहीं हमारी प्रेयसी भी है. हमें पुरुषों से संसर्ग में कोई रुचि नहीं, हम मोहिनी से उसी प्रकार प्रेम करते हैं जिस प्रकार एक पुरुष स्त्री से करता है….और सरोवर के शीतल जल में अपनी कामाग्नि बुझाते हुए हम इसके साथ वैसे ही प्रेम कर रहे थे जब वो अरण्य यक्ष वराह रूप से वास्तव रूप में प्रकट हुआ. दो कन्याओं को पूर्ण नग्न और काम क्रीड़ा में लिप्त देख उसकी भी कामाग्नि भड़क गयी. उसने धमकी दी कि यदि हम दोनों ने उससे सम्भोग ना किया तो वो पूरे राज्य को बता देगा कि हम व्यभिचारी हैं और हमारे हमारी सखी के साथ अनैतिक सम्बंध हैं. यदि वो ऐसा कर देता तो हमारा मान-सम्मान धूल धूसरित हो जाता, हमारे पिता हमें राज्य से निष्कासित कर देते या फिर हमारा वध ही कर देते. हमारे पास यक्ष की धमकी मानने के सिवाय कोई मार्ग नहीं था. फिर भी हमने युक्ति लगाई, हमने यक्ष को यहाँ हमारे शयन कक्ष में हमारी शैय्या पर रति सुख देने का प्रलोभन दिया जिसे यक्ष ने स्वीकार कर लिया.’
सर्प- ‘परंतु तुमने ऐसा क्यों किया?’
रेवारति- ‘हाहाहा…वो भी बताते हैं सर्प, अधीर ना हो.’ रेवारति ने अट्टहास करते हुए मोहिनी को अपने निकट खींचा. मोहिनी रेवारति के वक्षों का मर्दन करने लगी. मोहिनी के खुले केशों को सहलाते हुए रेवारति ने आगे कहा.
रेवारति- ‘पहले हमने अपनी सखी मोहिनी को यक्ष से सम्भोग करने भेजा, फिर जब वो यक्ष रति सुख में लीन था तब अवसर लाभ उठा कर उसका वध करने की चेष्ठा की…’
सर्प- ‘यह तुम पहले भी बता चुकी हो, आगे कहो.’
रेवारति- ‘जब अपने अविजयी होने के दम्भ में यक्ष यह बता रहा था कि संसार में कौन उसका वध नहीं कर सकता उसी समय हमें स्मरण हो आया कि कुछ समय पूर्व हमने अपने शयन कक्ष के बारजे से एक अद्भुत घटना घटित होते देखी थी.’
सर्प- ‘कैसी अद्भुत घटना?’
रेवारति- ‘एक रात्रि हम यूँ ही बारजे पर खड़े नीचे पहरा देते सैनिकों को देख रहे थे जब हमने देखा कि बाक़ी सैनिकों से नज़रें बचा कर एक सैनिक हमारे कक्ष के बाहर लगे पारिजात वृक्ष के निकट आया और पलक झपकते ही सर्प में परिवर्तित हो कर वृक्ष पर चढ़ गया, हम समझ गए कि पारिजात वृक्ष पर एक इच्छाधारी सर्प का वास है.’
सर्प- ‘ओह! तो तुम्हें मेरे इच्छाधारी होने के विषय में पहले से ही ज्ञात था. हाँ ये सत्य है कि मैं राज सैनिकों के इच्छाधारी वेश में नगर भ्रमण करता हूँ और फिर अपने वास्तविक सर्परूप में पारिजात वृक्ष पर आ जाता हूँ. परंतु मेरे विषय में सत्यता ज्ञात होने पर भी तुमने सैनिकों को आदेश देकर मेरा वध क्यों ना कराया?’
रेवारति- ‘क्योंकि हमारी तुमसे कोई निजी शत्रुता नहीं थी सर्प. हमने शीघ्र ही जान लिया कि तुम पारिजात वृक्ष से छुप कर हमें देखते हो. हमने कभी मोहिनी के साथ अपने शयन कक्ष में काम क्रिया नहीं की, अन्यथा तुम हमारी इस सत्यता से पहले ही अवगत हो जाते. हमने तुम पर तुम्हारी सत्यता जानने के पश्चात भी दया भाव दिखाया और कदापि इस दया भाव का फल हमें मिला जब यक्ष ने हमें धमकी दी. हमें अचानक तुम्हारा स्मरण हो आया और साथ ही यह भी कि यदि तुम सैनिक का रूप धर सकते हो तो हमारा भी धर लोगे.’
सर्प- ‘हे प्रभु! ऐसी कुटिल बुद्धि की तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी. इसका अर्थ ये हुआ कि तुमने अपनी योजना के अंतर्गत ही मेरे सम्मुख व्यथित और व्याकुल होने का प्रपंच किया और मैं नीरा- निपट मूर्ख तुम्हारे छल में फँस गया.’
रेवारति- ‘बिल्कुल सही समझे हो सर्प.’ रेवारति मोहिनी के नग्न जिस्म से अपने जिस्म का घर्षण करते हुए मादक अन्दाज़ में बोली.
सर्प- ‘किंतु तुमने अपना और मोहिनी का यह अवैध, अनैतिक सम्बंध मेरे सम्मुख क्यों प्रदर्शित किया? अब तो मैं भी तुम्हें यह धमकी दे सकता हूँ कि मैं तुम्हारा यह रहस्य राजा और पूरे राज्य के सामने उजागर कर दूँगा.’
रेवारति- ‘जब तुमने यक्ष का वध किया तब तक हम यही समझ रहे थे कि तुम हमसे इतना प्रेम करते हो और प्रेम के वशीभूत हो कर हमारे लिए यह कर रहे हो किंतु यक्ष के वध के पश्चात सिर्फ़ तुम हमारे सामने नंगे नहीं हुए बल्कि प्रेम का आवरण ओढ़े तुम्हारी काम पिपासा भी निर्वस्त्र हो गयी. हम उसी क्षण समझ गए कि यक्ष के समान ही अब तुम हमारा भयादोहन करोगे.’
सर्प- ‘मैं प्रेम कर रहा था देवी, भयादोहन नहीं.’
रेवारति- ‘अवसर लाभ उठा कर किया गया प्रेम कुछ भी हो सकता है सर्प परंतु प्रेम नहीं. यक्ष का वध करने तुमने अवसर का लाभ उठाया, परंतु तुम्हें यह ज्ञात नहीं था कि इस पूरे समय मोहिनी, जो पहले से ही हमारी युक्ति के विषय में जानती थी, हमारे शयनकक्ष द्वार के बाहर ही तैनात थी. तुम्हें वाक् जाल में उलझा कर हमने तुमसे तुम्हारी इच्छाधारी शक्ति के विषय में ज्ञात किया. तुम मणि अपने साथ नहीं रखते तो यह स्पष्ट था कि मणि पारिजात वृक्ष पर ही कहीं होनी चाहिए. तुम्हारे लिए दूध लाने का बहाना कर के हम कक्ष से बाहर निकलेऔर मोहिनी को आदेश दिया कि वो पारिजात वृक्ष पर मणि की तलाश करे. वापस आ कर हमने तुम्हें काम क्रीड़ा में उलझाए रखा तब तक मोहिनी ने पारिजात वृक्ष की कोटर में छुपाई तुम्हारी इच्छाधारी मणि प्राप्त कर ली और हमें ला कर दे दी.’
कहते हुए रेवारति ने अपनी मुट्ठी खोली, उसके हाथ में एक बहुत बड़ी और चमकदार मणि थी. रेवारति के हाथ में इच्छाधारी मणि देखते ही नवयुवक तड़प कर फुफकार उठा.
सर्प- ‘छल! धोखा! मेरी मणि मुझे लौटा दो देवी…मत भूलो मैंने तुम्हारी प्राण व मान रक्षा की है.’
रेवारति- ‘मान रक्षा की ताकि तुम हमारा मान मर्दन कर सको. यदि तुम्हारे हृदय में काम-कपट ना आया होता तो हम सदैव तुम्हारे ऋणी रहते सर्प, तुम्हें देवता मान कर तुम्हारी पूजा करते परंतु तुमने भी कामपूर्ति हेतु हमारा उपभोग करने की चेष्ठा की तो हमारे पास इसके अतिरिक्त कोई मार्ग शेष ना रहा.’ रेवारति मणि सर्प को दिखाने के बाद वापस अपनी मुट्ठी में कसते हुए बोली. नवयुवक फ़ौरन पलंग से उतर कर रेवारति के कदमों में गिर गया और उसके पैर पकड़ते हुए बोला.
सर्प- ‘क्षमा! मुझे क्षमा कर दो देवी. काम वासना ने मुझे अंधा कर दिया था. मैं आपसे याचना करता हूँ, मुझे मेरी इच्छाधारी मणि लौटा दें. मैं वचन देता हूँ कि आप दोनों के विषय में कभी किसी से ना कहूँगा, मैं अपनी मणि लेकर इस राज भवन, बल्कि इस राज्य से ही सदा के लिए चला जाऊँगा.’
रेवारति ने हाथ में थमी मणि नवयुवक की तरफ़ सीधी करते हुए उसेआदेश दिया.
रेवारति- ‘दूर हटो हमसे और पुनः अपने सर्प रूप में परिवर्तित हो जाओ, यह हमारा आदेश है!’
नवयुवक बिजली की गति से रेवारति से दूर हुआ और वापस सर्प में बदल गया. रेवारति अट्टहास करते हुए बोली.
रेवारति- ‘इच्छाधारी सर्पों के विषय में हमने यह पढ़ा था कि इच्छाधारी सर्प सदैव अपनी मणि छुपा कर रखता है और उसकी रक्षा करता है क्योंकि यदि उसकी मणि किसी के हाथ लग गयी तो वो सर्प मणि धारक का हर आदेश मानने को बाध्य हो जाएगा. अब से हम इस मणि के धारक हैं और तुम हमारे दास. तुम आज से हमारे आदेश पर चलोगे. तुमने सत्य कहा था सर्प, नारी का सौंदर्य और शृंगार संसार का सबसे अचूक अस्त्र है…सर्प के विष से भी अधिक घातक और मारक…हाहाहा!’
अट्टहास करते हुए रेवारति ने मोहिनी को पलंग पर पटक दिया, दोनों कन्याएँ आपस में यौन क्रीड़ाएँ करने लगीं. कक्ष के कोने में रेंगता सर्प विवश भाव से उन दोनों को देख रहा था.
THE END


