A Mid Summer Nightmare
“बहुत घुटन है…बर्दाश्त से ज़्यादा…”
(ह्मफ़)
“और अंधेरा…घुप्प अंधकार,”
उसने लड़खड़ाते हुए कदम आगे बढ़ाए तो हड्डियों में तीव्र दर्द की लहर दौड़ गयी।
“नो-नो-नो..अभी नहीं,” उसने झुंझलाते हुए खुद से कहा और एक बरगद के पेड़ का सहारा लिया। नाक से खून की दो बूँदें निकल कर उसकी बाईं हथेली के पृष्ट भाग पर बने नॉर्डिक रून “मन्नाज़” टैटू पर गिरी।
पिछले कुछ समय से समय-बे-समय होती नेज़ल ब्लीडिंग से वो पहले ही परेशान था उस पर ये असहनीय दर्द जैसे जिस्म की एक-एक हड्डी किसी ने हथौड़े से चूर कर दी हो।
नेज़ल ब्लीडिंग के बारे में एक बात जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते; नाक से खून आने पर व्यक्ति ब्लीडिंग रोकने के लिए इन्स्टिंक्टिवली अपने सिर और गर्दन को ऊपर की ओर उठाता है जो कि ग़लत है, इससे नाक में भरा खून स्कल कैविटी से होकर ब्रेन तक जा सकता है और ब्रेन में ब्लड क्लॉट फ़ॉर्म कर सकता है जिससे जान भी जा सकती है इसलिए नेज़ल ब्लीडिंग होने पर सिर को नीचे की ओर झुकाना चाहिए ताकि नाक में भरा खून बाहर निकल जाए।
ये ख़याल आते ही उसने अपना सिर ऊपर की ओर उठाया और ज़ोर से साँस खींची। उसके गले और मुँह में खून की तांबाई गंध और खारा स्वाद भर गया।
“किसी और तरह से नहीं तो ऐसे ही सही,” वो खुद में बुदबुदाया।
उसकी नज़र बरगद की ऊँची शाखा पर पड़ी जहां अंधेरे की ओट और पत्तों के झुरमुट के बीच यूँ लग रहा था जैसे दो पुखराज जगमगा रहे हों। वो दो चमचमाती आँखें उसे ही घूर रही थीं।
“रूssss…..रूsss” ऊपर से घुटी हुई ध्वनि उत्पन्न हुई जैसे किसी के गले से घुरघुराहट उठी हो।
“वहाँ कब से बैठे हो दोस्त? क्या बहुत समय हुआ?…हाँ शायद! कितने लम्बे अरसे से तुम्हें नहीं देखा मैंने,“ वो उन दो जगमगाती रौशनियों की ओर देखते हुए बोला। खून के खारेपन से उसके मुँह का स्वाद बुरा हो गया था।
पत्तों में पंखों की फड़फड़ाहट हुई और बरगद की शाख़ पर बैठा उल्लू उसके कंधे पर आ बैठा। उसने आहिस्ता से अपनी उँगलियाँ उल्लू के सिर पर फ़ेरी तो उसे एहसास हुआ कि उसकी उँगलियों में अकड़न शुरू हो गई है।
“तुम्हारा आना निमित्त(Omen) है,”
“रूssss…..रूsss” उल्लू की आँखों की पुतलियाँ लपलपाई और उसने अपनी गर्दन उँगलियों की दिशा में यूँ घुमा ली जैसे उसकी बात की पुष्टि कर रहा हो।
नॉर्डिक कल्चर में उल्लू का दिखना एक निश्चित पूर्व संकेत माना जाता है कि जातक को आने वाले समय में विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। जब आगे बढ़ने के लिए कोई राह नज़र ना आ रही हो ऐसे में नज़र आया उल्लू मार्ग तो प्रशस्त करता है परंतु उस मार्ग पर पड़ने वाले घोर संकटों की चेतावनी भी देता है।
“तुमने भी वो आवाज़ सुनी थी ना? मेरे मन का भ्रम तो नहीं…या फिर है?” उल्लू से बात करते हुए वो आत्म संशय में बुदबुदाया।
“आशूsss…” दूर कहीं से आती एक महीन आवाज़ जैसे वातावरण में व्याप्त ऊमस में घुल गई।
“सुना? सुना ना तुमने भी?”
“रूsss…”
“नहीं! ये मेरे मन का वहम नहीं। कोई है जो पुकारता है…” उसने बरगद से टिक कर खुद को सीधा करने का प्रयास करते हुए कहा।
“रूsss” उसके कंधे पर बैठा उल्लू अपने पंख फड़फड़ाते हुए उड़ा और जंगल के घोर अंधकार में कहीं लीन हो गया।
अपनी डेनिम के ‘टबैको पॉकेट’ से उसने पुराना ऑइल-विक लाइटर निकाला और कलाई को झटका दिया। उँगलियों में थमे लाइटर की लिड ‘खटाक’ की आवाज़ से खुली और स्प्लिंट-व्हील घूमी, लाइटर के अग्र भाग पर निकली विक पर लौ किसी नग्न नर्तकी के समान चरमोत्कर्ष की पराकाष्ठा के अभिभूत लपलपा उठी।
सामने अंधेरा, घना जंगल था जो चारों तरफ़ से एक जैसा दिखाई दे रहा था। आगे बढ़ने की कोई राह ना थी, कह पाना मुश्किल था कि किस तरफ़ जा कर कहाँ निकलेंगे।
उल्लू जिस दिशा में उड़ा था उसने उस दिशा का अंदाज़ा लगाते हुए उधर बढ़ने का फ़ैसला किया।
“टक-टक्क-टक-टक्क” एक ध्वनि ऊपर कहीं से आ रही थी।
क्या ये उसकी कलाई घड़ी की आवाज़ थी? नहीं, अब वो क्वॉर्ट्स नहीं पहनता। फिर कहाँ से?
“टक-टक्क-टक-टक्क” उसने ध्यान से सुनने की कोशिश की। ये घड़ी की आवाज़ नहीं थी। मेट्रॉनोम! ये आवाज़ मेट्रॉनोम की थी।
उसने सिर ऊपर उठा के देखने की कोशिश की। ऊपर सिर्फ़ गगनचुंबी वृक्षों की आलिंगन बद्ध शाखाओं का सघन समूह था जो अनंत आसमान के मानिंद जैसे सम्पूर्ण परिधि में पसरा हुआ था।
“आह्ह…” उसकी पसलियों में फिर दर्द की लहर उठी।
उसने अपने कंधे पर टंगा लेदर स्लिंग बैग खोला और एक हाथ में थे लाइटर की रौशनी अंदर दिखाते हुए बैग में अपनी दवाइयाँ ढूँढने लगा। बैग में एक टैरो कार्ड डेक, क्रिस्टल क्वॉर्ट्स में अंकित नॉर्डिक रून्स, एक फ़ाउंटन पेन व पुरानी डायरी के अलावा अलग-अलग आकार के पत्थर व क्रिस्टल भरे हुए थे। उसे बचपन से ही पत्थर इकट्ठे करने का शौक़ था, जब वो तीन साल का था तब से; जब नाना ने उसे ‘डेविड और गॉलइयथ’ की कहानी सुनाई थी तब से। वो भी डेविड की तरह चिकने-चमकदार पत्थर इकट्ठे करना चाहता था जिनसे गॉलइयथ को मार सके। इन चीजों में यादें हैं, उसके अस्तित्व की ऊर्जा है। इनके साथ वो दवाइयाँ कभी नहीं रखता।
“आह्ह…” दर्द की लहर फिर उठी। वो जानता था कुछ ही देर में उसका पूरा जिस्म अकड़ने लगेगा।
लाइटर की लौ में उसने अपने हाथों की तरफ़ देखा, उसकी खाल फिर से छूटने लगी थी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…” कोई उसे पुकारता है, पर आवाज़ कहाँ से आ रही कुछ पता नहीं चल रहा।
दर्द बहुत है, बर्दाश्त से बाहर। क्या वाक़ई कोई पुकारता है? या फिर दिमाग़ खेल रहा है उसके साथ?
उसके पीछे कहीं सरसराहट हुई, वो चौंक कर पीछे पलटता है।
“क…कौन है वहाँ?”
पेड़ों के पीछे से एक आकृति निकली, जैसे अंधेरे की बनी हुई थी पर उसके लम्बे लहरदार बाल सन की तरह सफ़ेद थे।
“कौन हो तुम? क्या तुम पुकार रही थी?” आकृति ने उसके सवाल का जवाब नहीं दिया। वो खामोशी से उसकी ओर बढ़ी।
लाइटर की लौ की परिधि में आने पर आकृति का चेहरा जाना-पहचाना नज़र आया।
“तुम मधु का सन है ना? आशू….निमित्त?” लगभग अस्सी साल की उसे वृद्धा की बिल्ली जैसी ग्रे, बटन सी गोल आँखें निमित्त को घूर रही थीं।
उसके लम्बे, सफ़ेद, घुंघराले बाल खुले हुए थे, उसकी रंगत किसी यूरोपियन महिला के समान गोरी थी और चेहरा-मोहरा भी वैसा ही था, सफ़ेद साड़ी में वो निमित्त को बिल्कुल वैसी ही भूतनी नज़र आ रही थी जैसी बचपन में दिखती थी। “सफ़ेद बालों वाली चुड़ैल” बचपन में निमित्त ने यही नाम दिया था उस वृद्धा को, उसका असली नाम उसे अब याद नहीं, पर इतना याद है कि सब उसे ‘नोइल हर्मिट’ की माँ, या ‘मिसेज़ हर्मिट’ के नाम से बुलाते थे।
“बोलता क्यों नहीं? तुम निमित्त ही है ना?” वृद्धा ने अपनी कंजी आँखें तरेरते हुए पूछा।
उसकी ये आँखें देख कर निमित्त बचपन में माँ के पीछे छुप जाता था। अब छुपने के लिए माँ नहीं थीं। उसने सहमति में सिर हिलाया।
“तुम सबसे नॉटी छोकरा है! इधर क्या करता है…यू बग्गर! तुम्हारा मदर फ़िकर करता होगा,”
निमित्त ने कोई जवाब ना दिया। वो बस उस वृद्धा को देखता रहा, बचपन में वो कितनी ऊँची और विशाल नज़र आती थी, किसी डरावने बरगद के पेड़ जैसी, जिसकी शाखाएँ और लताएँ उसे पकड़-दबोचने के अन्दाज़ में फैली हुई हों लेकिन अब वो बड़ी नज़र नहीं आ रही थी। एक कृशकाय वृद्धा जिसकी कंजी आँखों में अब चुड़ैल सी चमक नहीं बल्कि सूनापन था।
“सोचता क्या है छोकरा? तुम खो गया है क्या?” वृद्धा उसके पास आते हुए बोली। उसके सफ़ेद झुर्रीदार हाथों पर ढीली होकर लटकी खाल के खोल में जैसे सिर्फ़ हड्डी और उस पर लिपटी नसों का जाल था, ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर में खून और मांस बचे ही ना हों।
निमित्त ने अपना सिर सहमति में हिलाया।
“यू लिटल बाबा…यू बग्गर…वाई ड़ू यू ट्रबल योर मदर सो मच? मेरा साथ आओ छोकरा, हम तुमको ले के जाएगा तुम्हारा मम्मा के पास,” वृद्धा ने निमित्त को डाँटने के अन्दाज़ में उँगली उठाई, उसके बढ़े, टूटे, आड़े-तिरछे नाखून निमित्त को उसके बचपन के डर की याद दिला रहे थे।
वृद्धा ने निमित्त की कलाई पकड़ी और एक ओर घसीट कर ले जाने लगी। निमित्त ने प्रतिवाद ना किया। वो चुपचाप उसके पीछे चल दिया।
निमित्त का दिमाग़ बचपन की यादों में डूब रहा था; तब, जब वो तीन-चार साल का था। दो साल की उम्र से उसके जीवन की प्रत्येक घटना व इंसान उसकी ईडिटिक मेमरी में साफ़-साफ़ दर्ज थे। निमित्त का बचपन उसके नाना के फार्म हाउस में बीत था। उसके फार्म हाउस के पीछे पड़ने वाले क्रिस्चन कॉम्पाउंड में सबसे बड़ा बंगला मिसेज़ हर्मिट का था जहां मिसेज़ हर्मिट अकेले रहती थीं। वो बंगला देखने में बिल्कुल उन डरावनी फ़िल्मों में दिखाए गए बंगले व हवेलियों सा लगता था, जो निमित्त की माँ उसे देखने नहीं देती थीं, और मिसेज़ हर्मिट उस बंगले की चुड़ैल। इसीलिए निमित्त ने उनका नाम “सफ़ेद बालों वाली चुड़ैल” रखा था।
निमित्त ने नाना और माँ को अक्सर बात करते सुना था कि मिसेज़ हर्मिट का इकलौता बेटा ‘नोइल’ जर्मनी में काम करता है और मिसेज़ हर्मिट अपने बेटे के वापस आने का वेट कर रही हैं लेकिन निमित्त का ऐसा मानना था कि वो इंसान नहीं बल्कि इंसान के वेश में चुड़ैल हैं जो बच्चों को पकड़ कर खा जाती है। मिसेज़ हर्मिट जब भी निमित्त को अपने पास बुलातीं वो भाग कर माँ या नाना के पीछे छुप जाता।
शाम के समय, अंधेरा घिरने पर जब सब अपने-अपने काम में व्यस्त होते; माँ किचेन में खाना बनाने में और नाना अपने दोस्त ‘विल्यम गार्ड नाना’ के साथ अपनी रिटायरमेंट से पहले, आर्मी और आज़ाद हिंद फ़ौज के दिनों के क़िस्से-कहानियों में, तब निमित्त सबकी नज़रें बचा कर फार्महाउस के पिछले गेट से चुपके से निकल जाता और मिसेज़ हर्मिट के बंगले पर पहुँचता। उस बंगले के कॉम्पाउंड में एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था जिससे गिरे सूखे पत्ते चारों ओर बिखरे रहते और इनपर चलने पर सरसराहट की आवाज़ होती थी। निमित्त भरसक कोशिश करता कि उसके कदमों की आवाज़ कम से कम हो।
बंगले की यूरोपियन स्टाइल खिड़कियों पर ग्रिल के साथ-साथ मस्कीटो नेट लगी हुई थी जो जगह-जगह से टूट गयी थी। निमित्त अपना नन्हा हाथ इससे अंदर डाल कर लकड़ी के पल्ले को धक्का देता ताकि अंदर झांक सके। उसे यक़ीन था कि ‘सफ़ेद बालों वाली चुड़ैल’ को वो एक ना एक दिन ‘विचक्राफ़्ट’ करते रंगे हाथों पकड़ लेगा और उस दिन माँ और नाना को निमित्त की बात पर यक़ीन आएगा। शाम के समय अक्सर बंगले के अंदर से मिसेज़ हर्मिट के रोने की आवाज़ आती। कभी सिसकारियाँ, कभी सुबकने की हल्की ध्वनि तो कभी फूट-फूट कर, जार-जार हो कर करुणामय रुदन की आवाज़ें।
“चुड़ैल है स्कैली! पक्का चुड़ैल है!” निमित्त अपने पॉकेट में रखे खिलौने से कहता। स्कैली निमित्त का ‘पार्ट्नर-इन-क्राइम’ था। निमित्त के हिसाब से उसकी जितनी हरकतों को उसकी माँ “ऐक्ट ऑफ़ सेटन” का नाम देकर निमित्त का ‘भूत” अपनी धुलाई से झाड़ती थीं वो सभी इनोवेटिव आइडिया स्कैली के होते थे।
उस शाम भी निमित्त सबकी नज़रें बचा कर फार्म हाउस के पिछले गेट से निकला और मिसेज़ हर्मिट के बंगले जा पहुँचा। मार्च का महीना था और आए दिन आँधी आती रहती थी। अंधेरा होने पर भी आसमान में धूल चढ़ी हुई थी जिससे आसमान लाल नज़र आ रहा था जो संकेत था कि आँधी जल्द ही आने वाली है। उस रोज़ अंदर से रुदन की आवाज़ प्रतिदिन की अपेक्षा अधिक तीव्र थी। हवा तेज़ हो रही थी, धूल के ग़ुबार के साथ बरगद के सूखे पत्तों का रेला उठता और आगे बढ़ते निमित्त से टकराता। इस हवा के शोर में एक तीखी ध्वनि ‘सफ़ेद बालों वाली चुड़ैल’ के रुदन की भी थी।
“आज पकड़ लेंगे स्कैली, आज तो पक्का पकड़ लेंगे,” निमित्त ने अपनी हाफ़ पैंट की पॉकेट से आधा बाहर झांकते स्कैली से कहा और फिर उसे वापस पॉकेट में ठूँस कर आँख और मुँह में घुसती धूल से बचने के लिए दोनों हाथ चेहरे के सामने कर लिए और उँगलियों की दरारों के बीच से देखते हुए आगे बढ़ा।
टूटे हुए नेट से हाथ डाल कर निमित्त ने खिड़की के पल्ले को धक्का दिया। पल्ला खुलने की आवाज़ हवा में उड़ते पत्तों और बंगले के अंदर से आ रहे रुदन के शोर में दब गई। निमित्त ने अपना चेहरा दरार से लगाया और अंदर झांक कर देखने की कोशिश करने लगा। सफ़ेद बालों वाली चुड़ैल फ़र्श पर बैठी थी, उसके हाथ में एक फ़ोटो फ़्रेम था जिसे पकड़ कर वो जार-जार हो कर रो रही थी।
“ये रो क्यों रही है स्कैली?” खिड़की की ऊँचाई निमित्त के क़द से ज़्यादा थी, वो बाहर रखे लकड़ी के ख़ाली बक्से पर चढ़ा था और उसके बाद भी उसे अंदर झांकने के लिए अपने पंजों पर उचकना पड़ रहा था। अंदर स्थिति का मुआयना बेहतर ढंग से करने के लिए निमित्त पंजों पर थोड़ा और उचका लेकिन उसमें उसके पैरों के नीचे से बक्सा फिसल गया।
“मम्मीsss” तेज़ आवाज़ के साथ निमित्त नीचे गिरा।
उसकी चीख और गिरने की आवाज़ बंगले के अंदर तक सुनाई दी।
रोता-कराहता निमित्त अभी उठ भी ना पाया था कि बंगले का दरवाज़ा खुला और मिसेज़ हर्मिट बाहर निकलीं। उनके सफ़ेद खुले बाल हवा के वेग से चेहरे पर आए हुए थे, जिनके बीच से उनकी रो कर सुर्ख़ हो चुकी लाल आँखें उस घड़ी बहुत डरावनी दिखाई दे रही थीं।
“तुम मधु का सन है ना? आशू….निमित्त?” मिसेज़ हर्मिट अंधेरे में निमित्त की दिशा में टॉर्च लाइट फ़्लैश करते हुए बोलीं।
निमित्त की घिग्घी बंधी हुई थी, उससे जवाब देते ना बना।
“बोलता क्यों नहीं? तुम निमित्त ही है ना? तुम सबसे नॉटी छोकरा है! इधर क्या करता है…यू बग्गर! तुम्हारा मदर फ़िकर करता होगा,” मिसेज़ हर्मिट ने आँखें तरेरते हुए पूछा।
“भाग स्कैलीsss,” निमित्त चीखते हुए अपनी जान फेंक कर वहाँ से भागा। आँधी तेज़ हो गयी थी।
“यू लिटल बाबा…यू बग्गर…वाई ड़ू यू ट्रबल योर मदर सो मच? मेरा साथ आओ छोकरा, हम तुमको ले के जाएगा तुम्हारा मम्मा के पास,” पीछे से मिसेज़ हर्मिट की आवाज़ आई।
“चुड़ैल पीछे पड़ गयी है स्कैली,” रोता-बिलखता निमित्त अपने घर की ओर अंधाधुंध भागा।
अंधेरे और घबराहट में कभी वो दिवार से टकराता तो कभी किसी पेड़ से। वो तब तक भागता रहा जब तक फार्म हाउस गेट तक ना पहुँच गया और अपनी ओर आते साये से टकराया। वो उस साड़ी का स्पर्श और उस रोज़ पर्फ़्यूम को पहचानता था।
“मम्मी,”
निमित्त के नन्हें हाथ उस साये के इर्द-गिर्द यूँ कस गए जैसे उसे कभी अपनी गिरफ़्त से छोड़ेंगे ही नहीं। साये ने उसे गोद में उठा लिया।
“कहाँ था तू आशू?”
निमित्त ने कोई जवाब ना दिया, वो सिर्फ़ अपनी माँ की गोद से चिपका रहा। उसे याद नहीं कि उसी तरह माँ से चिपके हुए कब उसकी आँख लगी, कब आँधी और वो रात गुज़र गयी। पर आँधी और रात अकेले ना गुजरे थे।
अगली सुबह जब निमित्त की आँख खुली तब नाना और माँ कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे, आस-पास के और भी लोग वहाँ इकट्ठा थे और सभी परेशान नज़र आ रहे थे। निमित्त को कुछ समझ ना आया। कुछ देर बाद माँ और नाना उसे लेकर बाक़ी लोगों के साथ मिसेज़ हर्मिट के बंगले पर गए। वहाँ उसे पता चला कि पिछली रात किसी समय मिसेज़ हर्मिट की मौत हो गयी, सुबह जब काम करने के लिए नौकर आया तब सबको इसकी खबर हुई। मिसेज़ हर्मिट के बेटे को कॉल कर के उनके देहांत की सूचना दी गयी थी लेकिन उसने आने में अपनी असमर्थता जताते हुए उसके बग़ैर ही उनका फ़्यूनरल कर देने को कहा।
“वो चुड़ैल नहीं थी स्कैली, चुड़ैल मरती नहीं हैं,” निमित्त भर्राई आवाज़ से अपनी पॉकेट में रखे स्कैली से बोला।
याद पूरी होते ही निमित्त का दिमाग़ यथार्थ में लौटा। मिसेज़ हर्मिट उसे अपने बंगले तक ले आई थीं। सामने बरगद का पेड़, चारों ओर बिखरे सूखे पत्ते, और पुराना बंगला, सब कुछ बिल्कुल वैसा ही था…बिल्कुल उसके बचपन के जैसा।
वृद्धा उसका हाथ पकड़े हुए उसे बंगले के अंदर ले गयी, निमित्त किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उनके पीछे-पीछे चल रहा था।
“सिट डाउन बॉय…प्लम केक खाएगा?” वृद्धा ने आदेशात्मक लहजे में कहा।
निमित्त डाइनिंग चेयर पर बैठ गया, उसने सहमति में सिर हिलाया। निमित्त की आँखें नम थीं।
मिसेज़ हर्मिट एक बोन-चाइना प्रिच में प्लम केक ले आयीं। निमित्त ने केक की ओर देखा, वो जानता था कि उसमें क्या था।
“ईट यू लिटल मंचकिन,” मिसेज़ हर्मिट प्यार से उसके बालों में हाथ फेरते हुए बोली।
निमित्त ने केक पीस उठा कर खा लिया।
“मिसेज़ हर्मिट…फ़ॉर ऑल दीज़ ईयर्स, मुझे आपसे कुछ कहना था..” निमित्त खड़ा होते हुए बोला।
“बोल ना मेरा प्यारा छोकरा…बोल ना बच्चा,” वृद्धा की काँपती उँगलियाँ निमित्त के चहरे पर फिर रही थीं, उसकी नज़रों में ऐसे भाव थे जैसे अपने बेटे को देख रही हो।
“आई एम सो सॉरी…,” निमित्त ने वृद्धा को अपने गले से लगा लिया। निमित्त की आँखों से आँसू गिरे।
“माई चाइल्ड…मेरा नोइल,” वृद्धा भर्राई आवाज़ में बोली।
“आई एम नॉट नोइल…मैं निमित्त हूँ,” निमित्त आहिस्ता से बोला।
“नो! तू मेरा नोइल है…अब तू मुझे छोड़ कर कभी कहीं नहीं जाएगा,” वृद्धा ज़िद भरे लहजे में बोली।
निमित्त की पसलियों में तीखे दर्द की लहर फिर उठी। वो अपनी पसलियाँ पकड़ कर कुर्सी पर ढ़ेर हुआ।
“जानता है तू अब मुझे छोड़ कर कभी क्यों नहीं जाएगा?” वृद्धा ने प्यार से निमित्त का माथा चूमते हुए कहा।
“क्योंकि आपने केक में पॉइज़न मिलाया था,” निमित्त दर्द से दोहरा होते हुए बोला। उसकी साँस उखड़ रही थी। नाक से ब्लीडिंग फिर शुरू हो गयी थी।
“तुमको कैसे पता?” मिसेज़ हर्मिट चौंकी।
“पता नहीं, शायद इसलिए क्योंकि ये मेरा सपना है…आह्ह,”
“तुम छोकरा लोग…बचपन भर अपनी माँ से चिपका रहता है, फिर बड़ा होते ही छोकरी पकड़ कर निकल लेता है…बूढ़ी माँ को मरने के लिए उसके हाल पर छोड़ देता है। माँ रोती है, डे-नाइट डोर ताकती है कि बेटा आएगा…तुम लोग नहीं आता मैन…तुम लोग नहीं आता…माँ के मरने पर मिट्टी डालने भी नहीं आता,” वृद्धा निमित्त को झंकझोरते हुए बोली, उसकी आवाज़ उसके जर्जर जिस्म की तरह ही काँप रही थी।
“आई एम सॉरी मिसेज़ हर्मिट…आई एम सो सॉरी,” निमित्त ने अपने काँपते हाथों में वृद्धा का सफ़ेद चेहरा भरते हुए कहा।
वृद्धा की आँखें डबडबाईं।
“जानता था कि केक में पॉइज़न है तो खाया काहे को?”
“मुझे अपने दर्द से आज़ादी चाहिए, आपको आपका बेटा,” निमित्त मुश्किल से बोला। उसका दिमाग़ अंधेरे में डूब रहा था।
“शायद बचपन की इस आख़री याद के साथ हम दोनों की ख्वाहिश पूरी हो रही है,” निमित्त ने आँखें बंद कर लीं। उसकी हड्डियों का दर्द असहनीय हो रहा था। वृद्धा ने अपना सिर निमित्त के सीने पर रख दिया।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…” कोई उसे पुकारता है, पर आवाज़ कहाँ से आ रही कुछ पता नहीं चल रहा।
क्या वाक़ई कोई पुकारता भी है? या फिर ये भी उसके मन की उपज है?
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
निमित्त ने आँखें खोलीं। उसके मुँह में खून का खारापन था। वो कहीं लेटा हुआ था, ऊपर आसमान में पेड़ों के झुरमुट के बीच से झांकता चाँद उसके साथ-साथ चल रहा था। निमित्त को एहसास हुआ कि वो बह रहा है। शायद कोई नदी थी। वो किसी नाव पर था। नाव धारा के साथ बह रही थी। उसने खुद को उठाने की कोशिश की तो जिस्म में दर्द की लहर दौड़ गयी। उसने धीरे-धीरे सरक कर खुद को नाव के कोने से टिका कर सहारा लिया। नदी की सतह पर कुछ रौशनियाँ उसकी नाव के साथ चल रही थीं। निमित्त ने देखने की कोशिश की। ये जलती हुई चिताएँ थीं जो नदी की धारा पर बहते हुए जल रही थीं। इनके बीच कुछ तैरता हुआ निमित्त की नौका की ओर बढ़ रहा था, इतना चपल, इतना तीव्र जैसे कोई मत्स्य, कोई जलचर हो। जलती चिताओं के साथ गेंदे के फूल, माटी के जलते दिए, धूप और अगरबत्ती भी नदी की धारा में बह रहे थे। इनके बीच से उस साये ने अपना सिर पानी की सतह से ऊपर निकाला। सिर्फ़ दो आँखें नज़र आ रही थीं। दो सुंदर आँखें। निमित्त उन आँखों को देख रहा था जब उस लड़की ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और दोनों हाथ उसकी नाव पर टिका कर नाव के साथ-साथ तैरने लगी।
निमित्त उसका चेहरा पहचानने की कोशिश कर रहा था पर ऐसा लग रहा था जैसे उसका चेहरा हर पल बदल रहा था।
“तुम कौन हो?” आख़िरकार निमित्त ने सवाल किया।
“अंदर आ जाऊँ?” लड़की की आवाज़ पतली और खनक़दार थी।
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया। लड़की किसी मछली सी फिसलती हुई नाव के ऊपर आ गयी। उसके झीने पारदर्शी वस्त्र भीग कर उसके जिस्म से चिपके हुए थे। निमित्त ने अपनी नज़रें फेर लीं। लड़की सरक कर उसके क़रीब आ गयी। लड़की की नज़रें निमित्त के जैसे रोम-रोम से गुज़र रही थीं। अपना चेहरा निमित्त की गर्दन के पास लाते हुए लड़की ने ज़ोर की साँस खींची। निमित्त को अपनी त्वचा पर असहनीय तपिश का एहसास हुआ।
“मौत की गंध। तुम मर रहे हो,” लड़की उसे देख कर मुस्कुराते हुए बोली।
उसकी लम्बी उँगलियाँ निमित्त के माथे पर फिरी, माथे से छूटती खाल उसने अपने नाखून में भर कर खींची।
“हाँ, पक्का मर रहे हो। यहाँ कोई ऐसे ही नहीं आता,” लड़की मुस्कुराई।
“यहाँ लोग बस ऐसे आते हैं,” लड़की ने हाथ उठा कर नाव के इर्द-गिर्द नदी पर तैरती चिताओं की ओर इशारा करते हुए कहा।
“आशूsss” फिर से वो आवाज़ गूंजती है।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…” कोई उसे पुकारता है, पर आवाज़ कहाँ से आ रही कुछ पता नहीं चल रहा।
क्या वाक़ई कोई पुकारता भी है? या फिर ये भी उसके मन की उपज है?
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“क्या तुमने वो आवाज़ सुनी?” निमित्त ने लड़की से सवाल किया।
“किसकी है?”
“पता नहीं…यही तो पता नहीं चल रहा! पर लगता है जैसे कोई पुकारता हो,”
“उसे ढूँढते हुए यहाँ तक चले आए?” लड़की की आवाज़ में खनक के साथ इस बार अचरज का पुट भी था।
निमित्त ने अपने चारों तरफ़ बहती जलती चिताओं की ओर देखा।
“ये धारा किधर बहती है?”
“अच्छी जगह नहीं है, जल्दी ही देखोगे। पर तुम यहाँ आए कैसे? यहाँ कोई इस तरह नहीं आता,”
“पता नहीं, तुम कैसे आई?” निमित्त ने लड़की की ओर देखते हुए सवाल किया।
“जीवन ऊर्जा का आभास हुआ, मृत, जलते शवों के बीच कोई था जो अब तक पूरी तरह मरा नहीं था…बस यही देखने चली आयी कि कौन है,”
निमित्त ने कोई जवाब नहीं दिया। उसका मन दुविधा में था।
“क्या सोचते हो? आवाज़ के पीछे जाऊँ या धारा में बहूँ?” लड़की उसकी आँखों में झांकते हुए बोली, जैसे उसके मन के विचार पढ़ रही हो।
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया।
“मैं ले जा सकती हूँ उस आवाज़ के पास,” लड़की ने होंठों पर रहस्यमयी मुस्कान लिए हुए कहा।
“क्या सच?” निमित्त का चेहरा खिला।
“हाँ! तुम्हारी ऊर्जा महसूस कर के तुम्हारे पीछे आ सकती हूँ तो उसकी भी कर लूँगी…लेकिन..”
“लेकिन क्या?”
“मुझे बदले में क्या मिलेगा?”
“क्या चाहती हो?”
“क्या दे सकते हो?”
निमित्त ने अनिश्चितता से अपने कंधे उचकाए।
“प्रेम दे सकते हो?” लड़की सरक कर निमित्त के पास बैठ गई।
“मुझे नहीं लगता कि हम दोनों के प्रेम की परिभाषा एक है,” निमित्त ने मुस्कुरा कर लड़की की आँखों में देखते हुए कहा।
“क्यों? क्या मैं तुम्हें सुंदर नहीं लगती?” लड़की ने आँखों में प्रणय भाव लिए हुए कहा।
“तुम…तुम बहुत सुंदर हो…” उसकी आँखों में देखते हुए निमित्त के मुँह से जैसे स्वतः ही निकला।
लड़की का चेहरा बदल रहा था। उसमें निमित्त को जैसे किसी और का चेहरा दिखाई दे रहा था। निमित्त को डेजा वू (Déjà vu) का एहसास हुआ। जैसे वो ये पूरा कॉन्वर्सेशन ज़िंदगी में पहले भी कर चुका हो। उसका दिमाग़ फिर से उन धुंधली यादों में डूबने लगा।
“वॉट्स द मैटर निमित्त? डोंट यू थिंक आई एम ब्यूटिफ़ुल?”
“आई…मम्म…यू नो…यू आर रीयली…म्म…ब्यूटिफ़ुल,” निमित्त अटकते हुए बोला।
वो नर्वस था और निमित्त जब भी नर्वस होता है उसके थॉट और स्पीच का सिंक टूट जाता है।
लड़की ने अपना सिर निमित्त के सीने से टिका दिया। उसके बालों में अब भी हल्की नमी थी और ताजे हेयर शैम्पू की गंध। निमित्त ने हौले से अपना चेहरा नीचे किया और लड़की के सिर व बालों पर एक चुम्बन अंकित किया। बालों की नमी और ख़ुशबू अब निमित्त के होंठों पर थी।
निमित्त ने अपना हाथ उसकी बाँह पर रखा। उसकी बाँह बर्फ़ सी सर्द थी। उसने खुद को निमित्त में समेट दिया।
“निमित्त, आई एम फ़ीलिंग सो कोल्ड, स्नगल अप विद मी,” लड़की की आवाज़ में भारीपन था।
उसके जिस्म की ठिठुरन, अपनी उँगलियों के पोरों पर उसके खड़े होते रोएँ का स्पर्श, अपने सीने के नीचे उसके उभारों की बढ़ती चुभन, उसकी सुगंध में बढ़ते फेरोमॉन्स, निमित्त की टी-शर्ट के नीचे सरकती उसकी हथेली का एहसास…निमित्त इस याद को यहीं रोक देना चाहता था।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…” कोई उसे पुकारता है, पर आवाज़ कहाँ से आ रही कुछ पता नहीं चल रहा।
क्या वाक़ई कोई पुकारता भी है? या फिर ये भी उसके मन की उपज है?
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
“आहह्ह्ह….sss” निमित्त ने यूँ गहरी साँस खींचते हुए आँखें खोली जैसे उसके फेफड़े ऑक्सिजन ख़त्म होने से फट पड़ने पर उतारू हों।
वो हाँफते हुए उठ बैठा। नाव पर वो अकेला था, उसके साथ वाली लड़की ग़ायब हो गयी थी। नाव के अग़ल-बग़ल बहती चिताएँ नाव से आगे निकल रही थीं। नाव की रफ़्तार अब धीमी पड़ रही थी जैसे किनारे लगने वाली हो। निमित्त ने सामने देखा।
जैसे किसी नदी के तट पर नौकाएँ आकर लगती हैं, बहती हुई सभी चिताएँ किनारे को जा कर लग रही थीं। उसकी नाव भी उस ओर बढ़ रही थी। नदी के किनारे एक विशाल तोरण द्वार था। मौर्य क़ालीन शिल्प व वास्तुकला पर आधारित एक विशाल तोरण द्वार जिसपर ऊपर से लेकर नीचे तक आग लगी हुई थी और आग की लपटें अंधेरे आसमान जितनी ऊँची उठ रही थीं। पर ये धधकती लपटें उस पाषाण तोरण द्वार को जला नहीं रही थीं सिर्फ़ उससे यूँ लिपटी हुई थीं जैसे उस अंधकार में वहाँ आने वालों के लिए आगम पथ प्रकाशमान करने को प्रज्ज्वलित हों। निमित्त जानता था कि वो जीवन और मृत्यु के बीच, दो दुनियाओं के बीच की सीमा रेखा पर पहुँच गया था।
निमित्त नौका से उतरा और उस प्रज्ज्वलित द्वार की ओर बढ़ा। द्वार के पार एक साया खड़ा था जिसका क़द कम से कम बारह फ़ीट था, उस साये का कोई चेहरा नहीं था बल्कि चेहरे के स्थान पर सिल्यूएट फ़ॉर्म में ऐसा लग रहा था जैसे अंतरिक्ष का निर्वात अथवा स्याह विवर(Black Hole) का अंधकार हो जिसकी तरफ़ अधिक देर तक देखा नहीं जा सकता था वरना वो अंधकार देखने वाले के समूचे अस्तित्व को अपने अंदर निगल लेता। निमित्त ने अपनी नज़रें नीचे कर लीं। वो साया अंदर की ओर बढ़ा, निमित्त भी चुपचाप उसके पीछे हो लिया।
निमित्त को यूँ लगा जैसे वो अपने शहर बनारस की किसी पुरानी, संकरी गली से गुज़र रहा है। उस गली के दोनों तरफ़ आसमान जितनी ऊँची क़तारें थीं, जिस तरह बैंक के सेफ़्टी डिपॉज़िट के अंदर लॉकर बने होते हैं वैसे ही गली के दोनों ओर असंख्य खाँचों की क़तारें थीं। कुछ के अंदर चिताएँ जल रही थीं और कुछ के अंदर ताबूत रखे हुए थे। उन्हें अचरज से देखते हुए निमित्त उस लम्बी संकरी गली से गुज़र रहा था जो लगता था अंतहीन है और कभी ख़त्म ही नहीं होगी।
“सब यहीं आते हैं। ज़िंदगी भर लड़ते हैं कि कौन बड़ा…जलने वाला या फिर दफन होने वाला और फिर अंत में आकर इस क़तार में शुमार हो जाते हैं…हाहाहा” उस ऊँचे क़द वाले साये की गरजदार आवाज़; जो किसी गहरे अंधेरे कुएँ से एको हो कर आती लग रही थी, निमित्त को अपने दिमाग़ के अंदर गूंजती प्रतीत हुई।
निमित्त की हड्डियाँ फिर दर्द से ऐंठ रही थीं। एक भी कदम आगे बढ़ाना मुश्किल हो रहा था।
“अपना स्थान चुन लो,” आवाज़ फिर गूंजी।
और अधिक चलने या दर्द बर्दाश्त करने की क्षमता निमित्त में शेष ना थी। वो एक रिक्त खाँचे के सामने रुक कर खड़ा हो गया। उससे थोड़ा आगे बढ़ चुका ऊँचा साया निमित्त को उस रिक्त खाँचे के सामने खड़ा देख कर ठिठका। उसका चेहरा नहीं होने के बावजूद उसके बॉडी मैनरिज़म से पता लग रहा था कि उसे निमित्त का वो रिक्त स्थान चुनना रत्ती भर भी नहीं भाया है। निमित्त को कुछ समझ आता उससे पहले ही वो साया निमित्त के पास आया और उसे किसी रुई के ढ़ेर की तरह उठा कर उस रिक्त स्थान में फेंक दिया। ऐलिस इन वंडरलैंड के रैबिट होल की तरह वो रिक्त खाँचा एक संकरी टनल के जैसा था जिसमें निमित्त गिरता ही चला जा रहा था। निमित्त के हड्डियों का दर्द और उसका क्लॉस्ट्रॉफ़ोबिया उस पर जैसे एक-साथ हावी हो रहा था। वो पूरा ज़ोर लगा कर चीख रहा था लेकिन उसके गले से कोई आवाज़ बाहर नहीं निकल रही थी। उसे यूँ प्रतीत हुआ जैसे एक पूरे जीवनकाल का समय उसने टनल में गिरते हुए गुज़ारा है।
टनल में गिरता निमित्त उस बरगद के पेड़ की खोह से बाहर गिरा जहां से उसने सफ़र शुरू किया था। वो वापस उस अंधेरे जंगल में था। निमित्त ज़मीन पर अपनी हथेलियों और घुटनों के सहारे टिका हुआ था, उसके लम्बे बिखरे बाल चहरे पर आए हुए थे। कुछ देर तक अपनी उखड़ी साँसों को नियंत्रित करने के बाद उसने सीधा होने की कोशिश की। अकड़न उसकी गर्दन और रीढ़ की हड्डी में फैल रही थी। वो कराहते हुए बहुत मुश्किल से सीधा हुआ।
उसने अपने हाथों और घुटनों पर लगी मिट्टी झाड़ी और कमर पर दोनों हाथ रख कर रीढ़ कमान की तरह पीछे की ओर तानी ताकि दर्द और अकड़न से कुछ निजात मिले। चेहरा ऊपर उठाते ही उसे पेड़ की टहनी से चाँदी की महीन तार जैसी डोरी से लटकता कुछ अपनी तरफ़ आता प्रतीत हुआ, जैसे किसी पंछी का टूटा पंख हवा में तैरते हुए नीचे आ रहा हो। निमित्त ने अपनी हथेली उसकी तरफ़ उठाई। एक नन्ही, महीन सी मकड़ी उस चाँदी जैसे चमकदार जाले की डोरी से होती हुई निमित्त की हथेली पर आ गिरी।
नॉर्डिक मान्यता के अनुसार स्पाइडर का दिखाई देना किसी मित्र के आने का संकेत होता है। निमित्त का कोई मित्र नहीं था…अब निमित्त का कोई भी मित्र नहीं था। उसने अपनी आँखें सिकोड़ कर हथेली की तरफ़ देखा, उसका दिल बैठ गया। उसकी हथेली पर आयी मकड़ी मरी हुई थी। निमित्त जानता था इस ‘निमित्त’ का मतलब। उसकी पसलियों में तीखा दर्द शुरू हुआ।
“नो-नो-नो….ये नहींsss…” निमित्त असहाय भाव से चीखा। उसे अपने कंधे पर कुछ नमी महसूस हुई। क्या ये किसी के आंसुओं की नमी थी? नहीं! ये उससे काफ़ी गाढ़ा था। ये खून था जो ऊपर से निमित्त पर टपक रहा था। बरगद की शाखा से एक मोटी रस्सी बंधी हुई थी जिससे लटकती एक लाश धीरे-धीरे निमित्त की ओर उतर रही थी। उसके दोनों पैर पिंडलियों के नीचे एंकल पर से स्लिट किए हुए थे जिनसे टपकता खून निमित्त के ऊपर गिर रहा था।
“रॉबिनsss…मेरा भाईss” उस एक पल में निमित्त के दिल, उसकी आत्मा का दर्द उसके शरीर के दर्द पर हावी था।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…” कोई उसे पुकारता है, पर आवाज़ कहाँ से आ रही कुछ पता नहीं चल रहा।
क्या वाक़ई कोई पुकारता भी है? या फिर ये भी उसके मन की उपज है?
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
निमित्त फिर अपनी यादों के अंधकार में डूब गया।
31st December 2018 11:55 p.m.
“When my time comes
Forget the wrong that I’ve done
Help me leave behind some reasons to be missed
And don’t resent me
And when you’re feeling empty
Keep me in your memory
Leave out all the rest
Leave out all the rest”
रात के बारह बजने को थे, बनारस की आधी आबादी सो चुकी थी, जो जाग रहे थे वो नए साल के जश्न में डूबे थे। रविदास घाट बिल्कुल सुनसान पड़ा था। सिर्फ़ वहाँ दो साये बैठे थे जिनमें से एक लगभग 26 साल का था और दूसरा उससे उम्र में कुछ 12 साल बड़ा होगा। कम उम्र वाला Linkin Park का “leave out all the rest” गा रहा था, दूसरे बंदे के हाथ में गिटार था, उसकी उँगलियाँ तेज़ी से Em, G, C, Am, Em, G, C, Am, Em chords पर थिरक रही थीं। दोनों के चारों तरफ़ बीयर की ख़ाली बॉटल्स और कैन सम्भाल कर रखे थे जिन्हें वहाँ से जाने से पहले दोनों डस्टबीन के हवाले कर के जाने वाले थे, जैसा वो हमेशा करते थे…रॉबिन के हैदराबाद जाने से पहले। रॉबिन आठ महीने बाद वापस लौटा था, अब तक काफ़ी कुछ बदल गया था।
“चेस्टर बेनिंगटन इज़ लव,” रॉबिन जॉंइंट का ड्रैग लेते हुए बोला, पुलोवर और विंड चीटर और हाथों में वुलन ग्लव्ज़ पहने होने के बावजूद वो ठंड से ठिठुर रहा था।
“ऐब्सफ़किंगल्यूटली,” निमित्त गिटार बजाते बोला, उसके होंठों के बीच कैमल सिगरेट दबी हुई थी। रॉबिन से बिल्कुल उलट निमित्त सिर्फ़ एक कॉटन टी-शर्ट और डेनिम में बैठा था।
“यार भईया कैसे रह लेते हो इतनी ठंड में भी सिर्फ़ एक टी-शर्ट पहन के?”
“जवानी जाने का नाम नहीं ले रही है मेरी, साले!” निमित्त ने अपना हमेशा वाला टेम्पलेट रिप्लाई दिया।
रॉबिन मुस्कुराया। वो निमित्त को कुछ पल देखता रहा, जैसे कुछ कहना चाहता हो, फिर सामने नदी की उठती-गिरती लहरों को देखने लगा।
“बोल दे, जो भी तेरे भीतर चल रहा है। तू जानता है मैं जज नहीं करता…लोगों को उनकी वल्नरेबिलिटीज़ और उनके वीक मोमेंट्स के लिए,” निमित्त ने गिटार एक ओर रखा और सिगरेट ख़त्म करता हुआ बोला।
“आपको याद है भईया, जब मैंने ऑक्टोबर में आपको ड्रंक कॉल किया था…”
“14th ऑक्टोबर को, रात के एग्ज़ैक्ट्ली 2 बज कर 48 मिनट पर। हाँ याद है,” निमित्त बिना रॉबिन की ओर देखे बोला।
“अगर उस रात आप…आप कॉल नहीं उठाते तो मैं…मैं…,”
“…पंखे से लटकने वाला था, जानता हूँ। तूने बताया नहीं, फिर भी जानता हूँ,” निमित्त शांत भाव से बोला, वो अब भी रॉबिन की ओर नहीं देख रहा था।
“…सॉरी भईया,” रॉबिन की आवाज़ भर्राई।
“तुझे मैंने बताया था माँ के मिसकैरेज के बारे में?” निमित्त ने रॉबिन की ओर देखते हुए सवाल किया।
रॉबिन ने सहमति में सिर हिलाया।
“अगर माँ का मिसकैरेज नहीं होता तो मेरा तेरे जितना बड़ा एक छोटा भाई होता। तुझमें मैंने हमेशा अपना वो छोटा भाई देखा है रॉबिन जो कभी ये दुनिया नहीं देख सका,”
“आई एम सो सॉरी भईया…मुझसे लिया नहीं जा रहा था,” रॉबिन निमित्त से लिपट कर फफक के रो दिया।
“लाइफ़ ने हम दोनों के ही “L” कैप्स लॉक में लगाए हैं, वो भी साइड वेज़…”
“…एनल बोलना भूल गए आप भईया,” रॉबिन निमित्त की बात बीच में काटते हुए बोला।
“हाँ साले, एनल भी कर लिया लाइफ़ ने हमारा “L” लगा के, पर कभी तो घड़ी की बंद सुइयाँ भी सही टाइम दिखाएँगी भाई! टेक ए डीप ब्रेथ, पुट योर हेड हाई एंड मिडल फ़िंगर हायर एंड डोंट फ़किंग गिव-अप…अब नशे में भंड होके मुझसे इससे ज़्यादा मोटिवेशनल स्पीच दी नहीं जा रही,”
रॉबिन हंसा।
“लाइफ़ बाक़ी जितनी बी.टी. दे रही थी वो तो झेल ही रहे थे भईया, निकिता छोड़ के गयी तो मुझसे लिया नहीं गया,”
“देख भाई, ये प्यार के मैटर में हम दोनों की लगी पड़ी है, तुझसे गर्लफ़्रेंड सम्भाली नहीं गयी और मुझसे शादी। मैं तो कहता हूँ तू मुझे देख के इन्स्परेशन ले…ये शादी, इश्क़, मोहब्बत, ल***-लस्सन, ये सब से दूर रहने का भाई,”
“राइट भईया,”
“ख़ैर..”
“विद अनुपम या विद आउट अनुपम भईया?”
“तू है तो ख़ैर विद अनुपम ही होगा साले! तू जुलाई में अपना फ़ाइनल सब्मिशन कर के मेरे पास आ जा, दोनों भाई पहले एक महीने गोवा जा के दारू की शॉर्टेज क्रीएट करेंगे, उसके बाद साथ में ग्रैफ़िक नॉवल निकालेंगे,”
“येप्प!”
“इसी बात पे थोड़ा गला गीला…ऐ साला…रॉबिन, तू सारी दारू पी गया?” निमित्त सभी बॉटल और कैन ख़ाली देख कर चौंका।
“अरे भईया वो आपकी स्पीच गले से उतारने के लिए दारू लगती है ना!”
“सारा गाँजा भी फूंक गया?” निमित्त ने वीड के ख़ाली पैकेट की ओर देखते हुए कहा।
“आपकी बात आज तक किसी को होश में रह कर समझ आयी है भईया?” रॉबिन झूमते हुए मासूमियत से बोला।
“अबे…अब बाक़ी की रात सूखे-सूखे गुजरेगी। साले, साल शुरू होते ही पनौती लगा दी तूने अब पूरे साल पनौती लगेगी!” निमित्त रॉबिन का गला दबाते हुए बोला।
दोनों घाट की सीढ़ियों पर लेट गए और नशे की पिनक में रह-रह कर ठहाके लगाते रहे।
“ए रॉबिन! प्रॉमिस मी, दोबारा ऐसे सूयसाइडल थॉट्स कभी भी आए तो तू उसी वक्त मुझे कॉल करेगा…या टेक्स्ट करेगा,” निमित्त अचानक सीरीयस होते हुए बोला।
“यस भईया,”
“ऐसे नहीं, वाइकिंग्स प्रॉमिस कर!” निमित्त उठाते हुए बोला। उसने अपनी हथेली पर थूका और हाथ रॉबिन की ओर बढ़ाया।
रॉबिन ने भी अपनी हथेली पर थूका और निमित्त का हाथ थाम लिया।
“वाइकिंग्स पैक्ट भईया,”
“ब्रदर्स फ़ॉर लाइफ़,”
2nd July 2019
सुबह के लगभग दस बज रहे थे जब निमित्त की आँख खुली। उसे सोते हुए सोलह घंटे से ऊपर हो गया था। उसका सिर बुरी तरह घूम रहा था। कोक के पाँच ड्रैग, हैश-वीड, वोदका, पिछली शाम निमित्त ने अपनी सारी हदें खुद तोड़ दी थीं। वो किसी भी तरह से अपनी मौजूदा दुश्वारियाँ भूल जाना चाहता था और उसके लिए फ़िलहाल ड्रग्स के अलावा कोई दूसरा रास्ता निमित्त को सुझाई नहीं दे रहा था। उसका सिर दर्द से फट रहा था। बेड पर टटोलते हुए वो अपना फ़ोन ढूँढने लगा।
फ़ोन खोलते ही निमित्त को झटका लगा। पिछली रात तीन बजे का रॉबिन का मिस्ड कॉल था। निमित्त का हाथ काँपा। फ़ोन उसके हाथ से छूट गया। उसने झपट कर फ़ोन उठाया और रॉबिन को कॉल लगाया, दूसरी तरफ़ से नम्बर स्विच्ड ऑफ़ बता रहा था। निमित्त ने मैसेंजर खोला तो एक अननोन मैसेज रिक्वेस्ट पॉप हुई। निमित्त ने काँपती उँगलियों से मैसेज ओपन किया।
“हाई भईया, दिस इज़ गौरव, रॉबिन्स रूममेट। रॉबिन इज़ नो मोर। ही टुक हिज़ लाइफ़ लास्ट नाइट। वी ड़ू नॉट हैव हिज़ पेरेंट्स कॉंटैक्ट डिटेल। हमारे पास सिर्फ़ आपका ही कॉंटैक्ट था। प्लीज़ आप उसके पेरेंट्स को इन्फ़ॉर्म कर दीजिए और जितनी जल्दी हो सके हैदराबाद आ जाइए,”
निमित्त के दोनों कानों के बीच तीखी सीटी बज रही थी। उसके रॉबिन के पिता एड्वर्ड को फ़ोन किया। निमित्त का दिमाग़ जैसे हायबर्नेशन में चला गया था। अगली चीज़ जो उसे याद है; वो रॉबिन के रूम के बाहर गौरव के साथ खड़ा था। रूम के फ़्लोर पर चारों ओर ख़ून बिखरा हुआ था।
“यू सेड ही हैंग्ड हिमसेल्फ़। फिर फ़्लोर पर ब्लड क्यों है?” निमित्त की आवाज़ काँप रही थी।
“व..वो…भईया,” गौरव सकपकाया।
“बोलो…,”
“एज़ यू कैन सी, रूम की सीलिंग काफ़ी नीची है। स्टूल पर खड़ा हो कर जब रॉबिन ने खुद को हैंग किया तो इम्पल्सिवली उसके पैर वापस स्टूल को आ जा रहे थे…” गौरव बोलते-बोलते चुप हुआ।
“फिर?” निमित्त के दांत भिंच गए, वो किसी सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था।
“रॉबिन ने स्क्रैपर नाइफ़ से अपने दोनों पैर स्लिट किए ताकि वो ब्लीड करे और स्टूल पर बैलेन्स ना बना पाए,”
निमित्त चीखना चाहता था। उसके कानों के बीच तीखी सीटी बज रही थी।
अब वो मॉर्ग के बाहर खड़ा था। वो और रॉबिन के दोस्त उसकी बॉडी रिलीज़ होने की फ़ॉर्मैलिटी पूरी कर रहे थे। निमित्त दूर खड़े रॉबिन के बाप, उसकी सौतेली माँ और उसके सौतेले भाई की बातें साफ़ सुन सकता था।
“हैदराबादी बिरयानी इज़ सो ओवर रेटेड, इससे बेटर तो लखनऊ की बिरयानी है,” एड्वर्ड बोल रहा था।
“कोलकाता की बिरयानी सबसे बेस्ट है,” एड्वर्ड की दूसरी बीवी बोली।
“ये भाई का गेमिंग लैप्टॉप मैं रख सकता हूँ ना? आई होप पुलिस वाले लैप्टॉप ख़राब ना कर दें,” मार्क का सौतेला भाई बोला।
निमित्त के कानों के बीच सीटी बज रही थी।
वो आगे बढ़ कर एड्वर्ड का कॉलर पकड़ कर उसे झँझोड़ना चाहता था, चिल्लाना चाहता था।
“ये दोनों मार्क के कुछ नहीं लगते पर तेरा बेटा था वो! दो साल का था जब उसकी माँ उसे छोड़ के चली गयी, तूने कभी अपने बाप होने का एहसास नहीं कराया तेरी बीवी कभी उसकी माँ नहीं बनी, तेरे जवान बेटे की लाश लेने आए हैं कम से कम झूठा ही सही आँख में पानी तो रख!” निमित्त का रोम-रोम चिल्ला रहा था सिर्फ़ उसकी ज़बान मौन थी।
अगले दिन बनारस के “सिगरा सिमेट्री” में रिश्तों का तमाशा क्या खूब देखने को मिला। सबकी आँखों में झूठा पानी भर-भर के आया। सौतेली माँ लोगों को सुनाते हुए दहाड़े मार-मार कर रोई कि अपने बेटे से बढ़ कर जिसे पाला था वो चला गया, बिरयानी का क्वालिटी असेस्मेंट करने वाला बाप भी रोया कि उसके दो ‘कंधों’ में से एक टूट गया, सौतेले छोटे भाई के लिए गेमिंग लैप्टॉप मिलने की ख़ुशी दबा कर रोने की ऐक्टिंग करना थोड़ा मुश्किल था पर उसने भी जी-जान लगायी लेकिन सबसे स्टार पर्फ़ॉर्मेन्स रॉबिन की एक्स निकिता की थी जो अपने पिछले बॉयफ़्रेंड के लिए रॉबिन को छोड़ गयी थी। उस दिन खूब बारिश हुई, शायद ऊपर वाला भी उनके घड़ियाली आँसू नहीं देखना चाहता था इसलिए उनका काम हल्का कर दिया।
लगभग दो घंटे तक धुआँधार ऐक्टिंग पर्फ़ॉर्मेन्स के बाद सभी मंझे हुए कलाकार अपनी ज़िंदगी में वापस लौट गए। अब वहाँ सिर्फ़ निमित्त और ज़मीन से दो गज नीचे रॉबिन बचे थे और बरसात थी जो थम नहीं रही थी।
“आई एम सॉरी रॉब, तेरे मरने का कारण कोई और नहीं बस मैं हूँ। उस रात अगर मैं नशे में बेसुध नहीं होता तो आज तू यहाँ नहीं होता। किसी का कुछ नहीं गया….मैंने अपना भाई खो दिया यार,” अब निमित्त फूट-फूट कर रोया।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
निमित्त यथार्थ में आया। बरगद के पेड़ से लटकी रॉबिन की लाश उसकी गोद में थी। उसे घूरती हुई।
“देखता क्या है साले, जवानी आज भी जाने का नाम नहीं ले रही मेरी,” निमित्त भर्राई आवाज़ में बोला, उसकी आँखें छलक गयीं।
“बस अब खैर…विद आउट अनुपम होता है…तू जो नहीं है। बीमारी से उँगलियाँ स्टिफ़ हो गई हैं इसलिए गिटार पहले की तरह नहीं बजा पाता….साली उँगलियाँ ही नहीं फिसलती फ़्रेट्स पे..बट आई कैन ऑल्वेज़ सिंग फ़ॉर यू…”
“I dreamed I was missing
You were so scared
But no one would listen
Cause no one else cared
After my dreaming
I woke with this fear
What am I leaving
When I’m done here?
So, if you’re asking me, I want you to know
When my time comes
Forget the wrong that I’ve done
Help me leave behind some reasons to be missed
And don’t resent me
And when you’re feeling empty
Keep me in your memory
Leave out all the rest
Leave out all the rest”
निमित्त ने अपनी आँखें खोलीं, वो घुटनों के बल बरगद के नीचे बैठा था, उसकी हथेली पर सिर्फ़ एक नन्ही, महीन मरी हुई मकड़ी थी और कुछ नहीं।
जाने कितनी ही देर तक वो यूँ ही वहाँ घुटनों पर बैठा सिसकता रहा।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
“अब तुम्हारा क्या करूँ मैं नन्हे दोस्त, तुम्हें मैं यूँ ही तो नहीं छोड़ सकता,” निमित्त अपनी हथेली पर रखी मकड़ी से बोला।
उसने इधर-उधर देखा और एक टूटी हुई सूखी टहनी उठा कर बरगद के नीचे की काई लगी मिट्टी खोदने लगा। छे इंच गहरा खोद कर उसने मकड़ी को उसमें दफन किया।
“रेस्ट इन पीस…मेरे दोस्त,” निमित्त के होंठों से स्वतः ही निकला।
इन शब्दों से उसके दिमाग़ को करेंट सा झटका लगा। ये याद, जो उसके अंतर्मन के किसी अंधेरे कोने में कहीं दबी बैठी थी वो अचानक से उभरी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
निमित्त ने अपनी चुभती हुई आँखें खोली, उसकी आँखों में अब भी नींद थी, सुबह के छे नहीं बजे थे वरना उसकी नींद खुद-ब-खुद खुल जाती। कमरे में साठ वॉट के ई.सी.जी. बल्ब की रौशनी थी यानी खिड़की के बाहर उजाला नहीं हुआ था क्योंकि सुबह होते ही सबसे पहले खिड़की से रौशनी अंदर आती है। साढ़े सात साल का निमित्त समझने की कोशिश कर रहा था कि क्या हो रहा है। रात के किसी समय रूम की लाइट तभी जलाई जाती है जब किसी की तबियत ख़राब हो, जो अमूमन निमित्त ही होता था लेकिन वो तो सो रहा था! निमित्त ने घड़ी देखी तो सुबह के 4 बज कर 56 मिनट हो रहे थे। माँ ने थोड़े दिन पहले ही निमित्त को घड़ी देखना सिखाया था।
पापा की आवाज़ आ रही थी, वो मम्मी को पुकार रहे थे। पापा की आवाज़ में वो घबराहट निमित्त ने जीवन में पहली बार सुनी थी। वो बेड पर उठ के बैठ गया। मम्मी को निमित्त अपने सामने बैठा देख रहा था, पर कुछ अजीब था…कुछ अलग। उसकी माँ पत्थर के बुत की तरह बैठी थीं, चहरे पर कोई भाव नहीं, सिर्फ़ आँखों से आँसू गिर रहे थे। पापा उन्हें पुकार रहे थे, पर वो ऐसी नज़रों से उन्हें देख रही थीं जैसे उन्हें पहचानती ही ना हों। निमित्त ने अपना सिर माँ की गोद में रख दिया।
“मम्मी? क्या हुआ मम्मी? ग़ुस्सा हो क्या? बात नहीं करोगी?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया, वो वैसे ही पत्थर के पुतले के समान बैठी रहीं। अब निमित्त डर गया था, उसके अंदर कई आवाज़ें एक साथ चिल्ला रही थीं, वो आवाज़ें जो माँ के बोलते ही शांत हो जाती थीं। अब तक निमित्त की एलसेशियन डॉग शेर भी अंदर आ गयी थी। शेर के आने पर माँ ज़रूर कुछ बोलेंगी निमित्त जानता था, पर माँ कुछ नहीं बोलीं। निमित्त के दोनों कानों के बीच पहली बार तेज-तीखी सीटी बजी जैसे उसका दिमाग़ फट जाएगा।
सुबह के ग्यारह बज रहे थे। निमित्त एक अजीब सी जगह पर था। उसके पापा डॉक्टर थे इसीलिए बचपन से ही उसने अनगिनत क्लिनिक, डिस्पेन्सरी, नर्सिंग होम और हॉस्पिटल देखे थे, इन सबके बीच का फ़र्क़ भी वो जानता था लेकिन जिस जगह वो था वो जगह अलग थी। उसे बस इतना समझ आया था कि माँ बीमार हैं और उन्हें डॉक्टर के पास लाया गया है लेकिन ये जगह उसकी समझ में नहीं आ रही थी। पापा माँ को लेकर डॉक्टर्स चेम्बर में गए थे, निमित्त के ज़िद करने के बावजूद उसे अंदर नहीं ले गए और सख़्त हिदायत दी थी कि वो जहां है वहाँ से बिल्कुल हिलेगा भी नहीं।
हिदायतें मानने में निमित्त हमेशा बुरा था।
अपनी पैंट पॉकेट में रखे स्कैली को ज़ोर से पकड़े हुए निमित्त कुछ देर तक चेम्बर के बाहर लगी बेंच पर बैठा रहा।
“नहीं स्कैली, पापा ने यहीं बैठने को बोला है, वो डाँटेंगे,” निमित्त ने गर्दन उचका कर लम्बे अंधेरे कॉरिडोर की तरफ़ देखते हुए कहा जिसके दूसरे छोर पर कहीं से रौशनी और ढ़ेर सारी आवाज़ें आ रही थीं, कुछ वैसी ही आवाज़ें जो माँ के ना होने पर निमित्त को अपने अंदर से आती लगती हैं।
निमित्त ने चेम्बर डोर की ओर देखा, अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। निमित्त बेंच से उठा और कॉरिडोर में बढ़ा।
“कितना अंधेरा है यहाँ स्कैली, और अजीब सी बदबू,” निमित्त कॉरिडोर के दूसरे छोर पर पहुँचा।
वहाँ एक बड़ा सा हॉल था, जहां ढ़ेर सारे बेड लगे हुए थे जैसे हॉस्पिटल के जेनरल वॉर्ड में होते हैं। लगभग सारे ही बेड ऑक्युपाइड थे लेकिन इन पर पेशंट अजीब से थे। निमित्त के वहाँ आते ही वो सब उसे घूर रहे थे। एक औरत थे जिसके सिर के बाल अजीब ढंग से कटे हुए थे, कहीं-कहीं से उसका गंजा सिर यूँ नज़र आ रहा था जैसे वहाँ से बाल उखाड़ लिए गए हों, कहीं-कहीं बिल्कुल छोटे बाल थे और उनके बीच बालों की लम्बी लटें। वो औरत निमित्त को देख कर अजीब ढंग से मुस्कुराई, निमित्त ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ हिला कर उसे “हेलो” किया। औरत ने हाथ के इशारे से निमित्त को अपने पास बुलाया।
“आपके बाल किसने काटे?” निमित्त उसके पास आता हुआ बोला।
औरत ने जवाब नहीं दिया, वो सिर्फ़ निमित्त को देख कर मुस्कुराती रही। उसके पीछे एक खिड़की थी, जिससे बाहर एक आँगन और छोटा सा बाग़ीचे जैसा एरिया नज़र आ रहा था। निमित्त ने नज़र घुमाई तो देखा कि जिस कॉरिडोर से वो हॉल में आया था उसके अलावा हॉल के दूसरे छोर पर एक और दरवाज़ा था जो उस आँगन और बाग़ीचे की ओर खुलता था जो खिड़की से नज़र आ रहे थे। वहाँ दरवाज़े की चौखट पर एक औरत थी। निमित्त के अंदर से एक आवाज़ आयी। निमित्त उस ओर बढ़ गया।
चौखट पर खड़ी औरत की उम्र निमित्त की माँ के आस-पास ही थी। उसके हाथ में ऐल्यूमिनीयम की एक थाली थी जिसमें चावल और उसके ऊपर दाल थी। वो औरत हवा में बड़बड़ा रही थी जैसे किसी से कोई ज़रूरी बात कर रही हो, निमित्त को यह बात अजीब नहीं लगी। वो भी स्कैली से अक्सर ऐसे ही बात करता है। निमित्त उसके पास जा कर खड़ा हो गया। औरत की नज़र उस पर पड़ी। उसने निमित्त से कुछ कहा लेकिन निमित्त को उसकी बात बिल्कुल समझ ना आयी।
“खाएगा? खाएगा?” वो औरत निमित्त के सामने थाली नचाते हुए बोली।
निमित्त ने इनकार में सिर हिलाया।
वो औरत फिर से हवा में किसी से बात करने लगी और चौखट पर बैठ गयी। आँगन की कच्ची ज़मीन से उसने मुट्ठी में भर के मिट्टी उठाई और इत्मिनान से दाल-चावल में मिला कर खाने लगी।
“नहीं, ये मत खाओ। गंदा है, बीमार पड़ जाओगी,” कहते हुए निमित्त ने थाली के किनारे में दाल-चावल; जिसमें अभी मिट्टी नहीं सनी थी, उसका कौर बनाया और उस औरत को खिलाने लगा।
“अरे हमार बचवा! हमार लईका !!” उस औरत ने ज़ोर से चिल्लाते हुए थाली फेंकी, उसके मुँह में अब भी निमित्त का दिया कौर भरा था। उसने झपट कर निमित्त को अपनी गोद में उठाया और आँगन से होते हुए बाग़ीचे के पार भागी। निमित्त को कुछ समझ नहीं आया।
वो औरत निमित्त को लेकर घनी झाड़ियों और ऊँची बाउंड्री वॉल के बीच छुप गयी। निमित्त को पापा की आवाज़ सुनाई दी।
“आशूsss”
साथ में डॉक्टर की भी आवाज़ आ रही थी और कुछ और लोगों की भी।
“बच्चा इस तरफ़ आया कैसे? कहाँ मर गए थे तुम सब के सब?”
“पान खाए गए रहे डाक साहब,”
तेज़ पदचापों की आवाज़ होती है, कदमों और आवाज़ों का शोर।
वो औरत प्यार से निमित्त के बाल सहलाते हुए अपना ब्लाउज़ उठाती है। निमित्त उसके वक्ष देखता है, वो अपना एक वक्ष निमित्त के होंठों से लगाती है और गुनगुनाती है, जैसे कोई लोरी गा रही हो। निमित्त प्रतिवाद नहीं करता।
कदमों की आवाज़ें पास आती हैं।
वो औरत निमित्त को वहीं छोड़ कर झाड़ियों में कहीं ओझल हो जाती है। निमित्त कुछ नहीं कहता। वो चुपचाप झाड़ियों में यूँ बैठा रहता है जैसे लुका-छुपी खेल रहा हो।
उस दिन निमित्त को पापा से जितनी डाँट पड़ी, उसकी याददाश्त में उतनी पहले कभी नहीं पड़ी थी। निमित्त के दोनों कानों के बीच सीटियाँ बज रही थीं, उसे पापा की डाँट के शब्द याद नहीं, उसका दिमाग़ अपने सिर पर फिरते हाथ और होंठों से लगे वक्ष के स्पर्श में घूम रहा था।
डाँट खाने का कोरम पूरा कर के उसे वापस अंदर लाया गया। इस बार पापा और डॉक्टर उसे चेम्बर के भीतर ले गए। माँ अब भी सुबह जैसी ही बुत बनी बैठी थीं। डॉक्टर ने निमित्त को उसकी माँ के सामने खड़ा किया और नरम भाव से सवाल किया।
“क्या आप इस बच्चे को पहचानती हैं?”
माँ ने कुछ देर निमित्त की ओर देखा, उनके चेहरे पर कोई भाव ना आए।
“ध्यान से देखिए, जवाब दीजिए। क्या इसे पहचानती हैं?”
माँ ने कोई जवाब ना दिया, अपनी नज़रें फेर लीं।
निमित्त ने अपनी दाहिनी तर्जनी उठा कर माँ की बाँह पर पोक किया, वो जानता था माँ को ये पसंद नहीं, उन्हें चिढ़ मचती है ऐसा करने से, वो डाँटती हैं, ग़ुस्सा करती हैं।
“आशू…मेरा बच्चा,” माँ ने काँपती आवाज़ में कहा। फिर वो फूट-फूट कर रोईं, निमित्त भी उनसे लिपट कर रोया।
उस एक सुबह से ज़िंदगी बिल्कुल बदल गयी। अगले कई महीनों तक माँ या तो दवाइयों के असर में सोई रहतीं या फिर अपनी बेसुधी के आलम में रहतीं। निमित्त के अलावा वो किसी को नहीं पहचानती थीं। पापा और नाना दोनों परेशान रहते। फार्महाउस में सैकड़ों चिड़िया, जानवर थे। सबकी देख-रेख माँ ही करती थीं, माँ के बीमार पड़ने से सभी एक-एक कर के मरने लगे। पापा और नाना ने ज़्यादातर चिड़ियों को पिंजरे खोल कर उड़ा दिया। मुर्ग़े-मुर्गियों के जोड़े, ख़रगोश, तोते, ये जान-पहचान वालों को दे दिए गए। आख़िर में सिर्फ़ निमित्त, शेरा और दो डॉक्टर चिड़िया बचीं जिन्हें निमित्त स्कूल से लौटते वक्त माँ के साथ लाया था। माँ की लूना मोपेड पर स्कूल की छुट्टी होने पर वापस आना निमित्त के बचपन की सबसे सुखद यादों में से एक था। ऐसे ही एक दिन स्कूल से लौटते हुए निमित्त को एक पंछी वाला पिंजरे लिए जाता दिख गया। उसके एक छोटे से पिंजरे में दो नन्ही डॉक्टर चिड़िया थीं। उनकी लाल चोंच बिल्कुल माँ के सूट के रंग से मिलती थी और उनके रोएँ जैसे रुई के फाहे थे। उनमें से एक सफ़ेद और एक काली थी। माँ ने काली का नाम रैना और सफ़ेद का नाम नीना रखा।
सारे पंछी उड़ा दिए जाने के बाद सिर्फ़ रैना और नीना बचे। पापा और नाना के समझाने के बाद भी निमित्त उन्हें उड़ाने को, या किसी को देने को राज़ी ना हुआ। उसने फ़ैसला किया कि दोनों का ध्यान खुद रखेगा। एक बार जब निमित्त स्कूल में था तब बिल्ली ने उनके पिंजरे पर हमला बोल दिया था लेकिन शेरा ने दोनों को बचा लिया।
फिर एक रात तेज़ तूफ़ान आया। पापा डॉक्टर्स कॉन्फ़्रेन्स के लिए बाहर गए हुए थे, माँ दवा के असर में सो रही थीं, नाना भी सो चुके थे। निमित्त माँ के बग़ल में सोया था जब उसे शेरा के ज़ोर-ज़ोर से भौंकने की आवाज़ आयी। बाहर तेज़ बारिश हो रही थी और ज़ोर की हवा के साथ पानी की बौछार थपेड़ों जैसी लग रही थी। निमित्त भागते हुए बाहर आया। शेरा ज़ोर-ज़ोर से भौंक रही थी।
“क्या हुआ शेरा?”
“कूँss…कूँsss”
शेरा ने उसे अपने साथ चलने का इशारा किया। निमित्त उसके पीछे भागा।
आँगन में पिंजरा नीचे गिर के टूट पड़ा था, शायद तेज़ हवा के थपेड़े से गिर कर टूटा। पिंजरे में नीना का निर्जीव शरीर था, सुंदर, सफ़ेद रुई के फाहे से पंख मिट्टी और खून से सने थे। रैना वहाँ नहीं थी।
“रैना!! रैना??” निमित्त ने आवाज़ लगाई।
“रैना कहाँ है शेरा?”
“कूँsss…कूँsss”
निमित्त फार्म हाउस के पिछली तरफ़ भागा, जहां आम-अमरूद, अनार, शरीफ़े, फ़ालसे, जामुन, पपीते और मौसमी के पेड़ थे। शेरा भी उसके साथ भागी। तेज़ बारिश और अंधेरे में एक नन्ही चिड़िया कहाँ मिलनी थी! क्या पता वो चिड़िया ज़िंदा थी भी या नहीं। अगर नहीं भी थी तो भी उसका मिलना निमित्त के लिए ज़रूरी था।
वो भागते हुए अगले हिस्से में आया जहां माँ टमाटर, लौकी, कुंदरु, सेम, मटर, बीन्स, शलग़म और मशरूम लगाती थीं। इनमें से अधिकतर सब्ज़ियाँ और पेड़ देख-रेख नहीं मिलने से सूख चुके थे। रैना यहाँ भी कहीं नहीं मिली। निमित्त फार्म हाउस के बग़ल के हिस्से में पहुँचा जहां गुलाब, मोगरा, रात की रानी, ट्यूलिप और मिड-नाइट लिली की क्यारियाँ थीं। वहाँ अंधेरे और बारिश में काफ़ी देर तक निमित्त और शेरा रैना को ढूँढते रहे, फिर थक कर हार मान ली।
निमित्त को अचानक कुछ ध्यान आया। उसने इधर-उधर देखा जैसे कुछ ढूँढ रहा हो, फिर लिली की क्यारी की गीली मिट्टी अपनी नन्ही उँगलियों से खोदने लगा। शेरा दुम हिलाते हुए उसे कौतूहल से देख रही थी, फिर वो भी अपने पंजों से मिट्टी खोदते हुए निमित्त का साथ देने लगी। थोड़ी ही देर में दोनों ने वहाँ काफ़ी बड़ा गड्ढा तैयार कर लिया।
निमित्त अपनी दोनों हथेलियों की तह में नीना को छुपा कर वहाँ लाया और उसे आहिस्ता से उस गड्ढे में लिटा कर वापस उस पर मिट्टी डालने लगा।
“रेस्ट इन पीस नीना,”
वो निमित्त के जीवन की पहली कब्र थी, बस वो ये नहीं जानता था कि अभी उसे आने वाले जीवन में काफ़ी क़ब्रें तैयार करनी हैं।
आँगन में शेड के नीचे माँ ने पुराने कपड़ों की गुदड़ी और पुआल के ढ़ेर से शेरा का बिस्तर तैयार किया था। बारिश में भीगे और कीचड़-मिट्टी में सने निमित्त और शेरा उस ढ़ेर पर पहुँचे। शेरा गुदड़ी पर गोल होकर लेट गई और ठंड, दुःख और शोभ से ठिठुरता निमित्त उसके साथ लेट गया। बारिश सुबह तक नहीं रुकी, निमित्त के दोनों कानों के बीच बजती सीटी और आँगन में बिछे पत्थरों पर गिरती बारिश की बौछार का शोर जब शांत हुआ तब भोर हो चुकी थी। घबराए हुए नाना उसे उठा रहे थे।
“आशू बेटे…यहाँ क्यों सोए हो बच्चे? पिंजरा कैसे टूटा? चिड़िए कहाँ हैं,” नाना ने उसे गोद में उठाते हुए पूछा।
“रैना खो गयी…मिल ही नहीं रही, मैंने बहुत खोजा,” निमित्त रुआँसा होते हुए बोला।
“और दूसरी वाली?….नीना?”
“मिड-नाइट लिली की क्यारी में,” निमित्त ने क्यारी में बनी छोटी सी कब्र की तरफ़ इशारा कर सुबकते हुए कहा।
उस टाईम माँ की देख-रेख के लिए एक दाई और नर्स आते थे जो कि सुबह आते थे और शाम तक वहीं रहते थे। इतनी देर में निमित्त को रूम में जाना अलाउड नहीं होता। जिस दिन स्कूल ना हो उस दिन निमित्त ये समय पीछे पेड़ों के बाग़ीचे में खेलते हुए, या फिर किसी पेड़ की सबसे ऊँची डॉल पर चढ़ कर कोई किताब पढ़ते हुए या फिर नाना के पास उनके फ़ौज के दिनों के क़िस्से या फिर वेस्टर्न माईथॉलॉजी की कोई कहानी सुनते हुए बिताता था। अन दिनों नाना ज़्यादातर परेशान रहते थे और किसी सोच में डूबे रहते इसलिए कहानियाँ नहीं सुनाते थे। निमित्त ने ध्यान दिया था कि जिस रात उसने नीना की कब्र बनाई थी उसके बाद से नाना और परेशान रहने लगे थे।
निमित्त मुर्गियों के ख़ाली दड़बे में शेरा के साथ घुस कर खेल रहा था; ये दड़बा नाना के रूम के तीसरे दरवाज़े के ठीक नीचे था; नाना के रूम में चारों तरफ़ एक-एक दरवाज़ा था जो अलग-अलग जगहों पर खुलता था। निमित्त ने देखा नाना चिंता में डूबे अपनी चेयर पर बैठे थे और टेबल पर कार्ड्स सजा रहे थे। ये वो साधारण वाले ताश के पत्ते नहीं थे जो निमित्त ने अक्सर नाना को विल्यम गार्ड नाना के साथ खेलते देखा था, ये वो दूसरे कार्ड्स थे जो निमित्त को बहुत पसंद थे, जिन्हें नाना बहुत कम निकालते थे और निमित्त को कभी छूने नहीं देते। इनमें हर कार्ड पर सुंदर रंग-बिरंगे ड्रॉइंग बने हुए थे जो निमित्त को अपनी तरफ़ बहुत ज़्यादा ही आकर्षित करते थे। नाना को वो कार्ड्स निकालते देख निमित्त दड़बे के ऊपर चढ़ा और छलांग लगा कर कमरे में आ गया।
“क्या कर रहे हो नाना? सुंदर वाले कार्ड निकाल रहे हो?”
नाना ने मुस्कुरा कर सहमति में सिर हिलाया।
“इनको कैसे खेलते हैं? ये डंडे वालों की स्वॉर्ड वालों से फ़ाइट कराते हैं क्या?” निमित्त नाइट ऑफ़ स्वॉर्ड और किंग ऑफ़ वॉंड कार्ड्स उठा कर उन्हें एक-दूसरे से लड़ाने के अन्दाज़ में हवा में नचाते हुए बोला।
“नहीं, इनसे टाइम ट्रैवल करते हैं। पास्ट, प्रेज़ेंट और फ़्यूचर देखते हैं,”
“आप जो कहानियाँ सुनाते हैं उनके जैसे?” निमित्त एक्सायटेड होते हुए बोला।
“वैसा ही कुछ। ट्राई करोगे?” नाना ने मुस्कुरा कर निमित्त को देखा।
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया। नाना ने कार्ड डेक समेटा और निमित्त की हथेली पर रख दिया।
“शफ़ल करो,”
निमित्त की उँगलियाँ कार्ड पर फिसली, उसने नाना को अक्सर कार्ड शफ़ल करते देखा था। कार्ड उसकी उँगलियों के बीच यूँ घूम रहे थे जैसे हर कार्ड एक अदृश्य, महीन डोरी से उसकी उँगलियों से बंधा हो और जैसे एक पपेटियर अपनी उँगलियों के इशारे से कठपुतलियों को नचाता है वैसे निमित्त के इशारे पर वो कार्ड्स थिरक रहे हों।
“स्प्रेड करो,”
निमित्त जानता था कि कार्ड्स को टेबल पर उनका फ़ेस नीचे की ओर कर के फैलाना है। उसकी नन्ही हथेली ने कार्ड डेक ज़ोर से टेबल पर पटका, उसने अपनी बाँह आर्क की तरह घुमाई और 78 पत्ते अर्ध गोलाकार बनाते हुए टेबल पर फैल गए।
“अब?” निमित्त से अपनी एक्सायट्मेंट सम्भाले नहीं संभल रही थी।
“अब ध्यान लगाओ। कार्ड्स पर कॉन्सेंट्रेट करो। अपने अंदर की आवाज़ सुनो, देखो कि कौन से कार्ड तुम्हें सबसे ज़्यादा अट्रैक्ट कर रहे हैं, फिर उनमें से कोई सात कार्ड चुनो,”
“सात ही क्यों?”
“तुम्हारा बर्थ नम्बर है, ये कार्ड पुल तुम्हारे जीवन की स्प्रेड-शीट होगा,”
“मतलब?” निमित्त अपना सिर खुजाते हुए बोला। नाना की कोई बात उसकी समझ नहीं आ रही थी।
“जब समय आएगा मतलब भी समझ जाओगे। अभी ध्यान लगाओ और कार्ड चुनो,”
निमित्त ने दोनों हाथ उठा कर यूँ बढ़ाए जैसे एक-साथ ढ़ेर सारे कार्ड उठा लेना चाहता हो।
“एक-एक कर के,” नाना ने हिदायत देते हुए कहा।
निमित्त ने पाउट किया, उसकी आँखों में कई दिनों बाद फिर से वो चमक आयी। उसने हवा में अपनी उँगलियाँ शरारत से नचाई, जैसे उसने टीवी पर जादूगर को जादू करते टाइम नचाते देखा था ठीक वैसे ही।
“कार्ड चुन पाजी!” नाना ने प्यार से घुड़की लगाते हुए कहा।
निमित्त ने कार्ड्स की ओर देखा, हर कार्ड ही जैसे चिल्ला रहा था, उससे खुद को चुनने को कह रहा था। जिसकी आवाज़ सबसे धीमी थी, निमित्त ने सबसे पहले उसे चुना। उँगली के नीचे कार्ड दबा कर उसने स्प्रेड से अलग किया।
“सीधा करो इसे,”
निमित्त ने कार्ड सीधा किया।
“द मून! तुम्हारे अंतर्मन के डर और भ्रम दिखाता है, तुमसे कहता है कि वो मत देखो जो दुनिया देखती है, वो बिल्कुल मत देखो जो नज़रों के सामने है, जो स्पष्ट है, गोचर है। अपने इंट्यूशन की हमेशा सुनना। जो नज़रों को नहीं दिखता वो ढूँढना, लोग और परिस्थितियाँ जैसी नज़र आएँगी वो वास्तव में वैसी हों ज़रूरी नहीं। जो दिखाने की, बताने की, स्थापित किए जाने की कोशिश की जाए उससे परे, जो छुपाया जा रहा हो उसे समझना,”
निमित्त के पल्ले इनमें से एक भी बात नहीं पड़ी लेकिन उसके ज़हन में नाना के शब्द छप गए। उसने दूसरा कार्ड निकाला।
“द सन! द मून के बाद द सन का आना दर्शाता है कि जीवन में कितने भी घने अंधियारे में क्यों ना फँसो, तुम उससे हमेशा बाहर निकलने का रास्ता तलाश लोगे। ध्यान रखना, रौशनी हमेशा अपने अंदर तलाशना,”
निमित्त ने तीसरा कार्ड निकाला। नाना ने अचरज से उसकी ओर देखा।
“द व्हील ऑफ़ फ़ॉर्चून! तुम्हारा जीवन कभी स्थिर नहीं होगा, कभी स्थायित्व नहीं होगा। अपने कर्म से भाग्य बदलोगे, अपना भी…और खुद से ज़्यादा जो कोई भी तुमसे जुड़ेगा उसका, अगला कार्ड निकालो…सुनो…आशू, ध्यान से चुनो। चार नम्बर वेस्टर्न माईथॉलॉजी में अलग-अलग मायने रखता है, ज़्यादातर अशुभ और कर्म प्रधान और हिंदू मान्यता में चार राहु का नम्बर है,”
“कर्म क्या?…और ये राहु कौन है नाना?” निमित्त अब इस खेल से ऊब रहा था।
“बताऊँगा, पहले कार्ड चुनो,”
निमित्त ने चौथा कार्ड निकाला।
“द चैरीयट! इच्छाशक्ति, आत्मविश्वास और दृढ़ता दिखाता है। जो सोचोगे उस पर अटल रहोगे, एक बार जो ठान लिया, उसके बाद कितनी भी विषमता क्यों ना आए तुम्हें कोई तुम्हारी सोच से डिगा नहीं पाएगा, लेकिन इसके साथ ही ध्यान रखना…तुम्हारी चुनौतियाँ वहाँ से शुरू होंगी जहां एक आम इंसान हिम्मत हार देता है,”
निमित्त खुश था। उसे अपने बारे में अच्छी बातें सुनना पसंद था, जो उसे आज काफ़ी समय बाद भर-भर के सुनने को मिल रही थीं। अगला कार्ड तो उसने पूरे जोश में उछाला।
“आशू! ऐसे नहीं…ध्यान से!” नाना ने डाँट लगाई, लेकिन पत्ता उछल चुका था और हवा में गोल-गोल नाच रहा था।
नाचता हुआ पत्ता निमित्त के सामने टेबल पर सीधा गिरा।
“द मजिशियन! तुम्हारे अंदर अपनी कल्पना को यथार्थ में बदलने की क़ाबिलियत होगी, अपनी सोच से जिंदगियाँ बदलोगे…उनकी भी जिनको तुम जानते नहीं…तुम दूसरों के लिए जो भी प्रिडिक्शन करोगे वो मैनिफ़ेस्ट होगा…लेकिन ध्यान रखना…तुम्हारे वो स्पाइडर-मैन कॉमिक का अंकल बेन क्या कहता था?”
“विद ग्रेट पावर कम्स ग्रेट रिस्पॉन्सिबिलिटीज़,” निमित्त ख़ुशी से चहकते हुए बोला।
इस समय तक स्पाइडर-मैन उसका फ़ेवरेट कॉमिक सुपर-हीरो था और उसका ऑल्टर-ईगो पीटर पार्कर फ़ेवरेट कैरेक्टर। अब तक उसकी लाइफ़ में बैटमैन से रिलेट करने वाला फ़ेज़ शुरू नहीं हुआ था।
“अब ध्यान से सुनो आशू। आख़री दो कार्ड्स बहुत ध्यान से, बहुत सोच समझ के चुनना। ये सबसे ज़रूरी कार्ड हैं,” नाना ने निमित्त के दोनों कंधे पकड़ कर उसे हिदायत देते हुए कहा।
“तुमने फ़ोर्थ कार्ड के टाइम भी बोला था कि वो सबसे इम्पॉर्टेंट है,” निमित्त पाउट करते हुए बोला।
“बेटा, पहले पाँच कार्ड वो दिखाते हैं जो तुम्हारा अंतर्मन, तुम्हारा स्वभाव और व्यक्तित्व होगा लेकिन आख़री दो कार्ड्स बताएँगे कि जीवन में तुम्हारा उद्देश्य क्या होगा….और तुम्हें मिलेगा क्या,” नाना ने गम्भीर भाव से कहा।
निमित्त ने फैले हुए कार्ड स्प्रेड की ओर देखा। जिस कार्ड की तरफ़ बार-बार उसकी नज़रें जा रही थीं उसने आहिस्ता से उसे उठा कर पलटा।
“द स्टार! होप, हीलिंग एंड इन्स्परेशन! यह पुनरुत्थान और अध्यात्मिक जागृति दिखाता है, दर्शाता है कि तुम सही पथ पर हो साथ ही तुम्हें तुम्हारे जीवन के वास्तविक उद्देश्य से परिचित भी कराता है,”
“और वो है क्या?” निमित्त ने सवाल किया।
“समय आने पर समझ जाओगे। अब आख़री कार्ड उठाओ,”
निमित्त सोच में पड़ गया।
“सुनो आशू बेटा, मैंने अपनी ज़िंदगी में बहुत कम लोगों को स्ट्रेट सिक्स मेजर आर्काना कार्ड्स निकालते देखा है। 0.01% चान्स है कि तुम्हारा आख़री कार्ड मेजर आर्काना से होगा…वो भी अपराइट। इसलिए बहुत सोच समझ कर, ध्यान से चुनना,” नाना ने इससे ज़्यादा सीरीयस होकर निमित्त से पहले कभी कुछ नहीं कहा था।
निमित्त ने खुद को शांत करने की कोशिश की। उसके दिमाग़ में एक-साथ सभी सुपर हीरोज़ के स्लोगन घूमने लगे।
“बाई द पावर ऑफ़ ग्रे-स्कल! आई हैव द पावर!”
“विद ग्रेट पावर कम्स ग्रेट रिस्पॉन्सिबिलिटीज़,”
“इट्स ए बर्ड, इट्स ए प्लेन…नो! इट्स सुपरमैन,”
“आई एम योर वर्स्ट नाइटमेयर…आई एम बैटमैन,”
ये सारी आवाज़ें उसे कन्फ़्यूज़ कर रही थीं। निमित्त ने अपने सिर और बालों को एक झटका दिया। शुरुआत से जिस कार्ड का शोर सबसे अधिक उसे अपने दिमाग़ में महसूस हो रहा था उसने अपना आख़री कार्ड वही खींचा। निमित्त कार्ड पलटने ही वाला था कि उसके दिमाग़ में स्कैली की आवाज़ गूंजी,
“सुन, कार्ड उल्टा कर दे! कर के देख ना…मज़ा आएगा!”
निमित्त की उँगलियों ने कार्ड घुमा कर उसे पलट दिया। जब कार्ड सीधा किया तो नाना जाने कितनी ही देर तक कभी कार्ड को तो कभी निमित्त को देखते रहे।
“अपराइट, डेविल कार्ड! मेजर आर्काना का आख़री पत्ता। तुमने सात कार्ड निकाले…सातों मेजर आर्काना…और सातों अपराइट! आई विश तुमने ये आख़री पत्ता उलटा ना होता और तुम द डेविल कार्ड रिवर्स्ड पोज़िशन में चुनते जैसा तुमने इसे निकाला था…पर क्यों? तुमने लास्ट मोमेंट पर पत्ता क्यों घुमाया?”
“मुझे स्कैली ने कहा था ऐसा करने को,” निमित्त मासूमियत से कंधे उचकाते हुए बोला।
“स्कैली?” नाना ने उलझनपूर्ण लहजे में सवाल किया।
निमित्त ने अपनी पैंट पॉकेट में रखा टॉय निकाल कर उन्हें दिखाया। नाना ने सिर झुका लिया, कुछ देर तक वो सोच में डूबे रहे।
“सुन बच्चे, आम-तौर पर इंसानों के अंदर एक आवाज़ होती है जिसे कॉंशन्स कहते हैं…ये हमें सही और ग़लत का फ़र्क़ बताती है…”
“लेकिन नाना मेरे अंदर तो बहुत सी आवाज़ें हैं, सब एकसाथ बोलती हैं,” निमित्त बात काटते हुए बोला।
“सबसे पहली आवाज़ किसकी सुनाई देती है?” नाना ने अधीरता पूर्वक पूछा।
“सबसे पहले तो स्कैली ही बोलता है,” निमित्त अपनी तर्जनी से अपनी ठुड्डी ठकठकाते हुए बोला।
“तो फिर उसकी कभी मत सुनना, समझे! हमेशा अपने अंदर की दूसरी आवाज़ के साथ जाना,” नाना ने निमित्त की आँखों में देखते हुए कहा।
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया।
“क्या अब मैं ये कार्ड्स रख लूँ?” निमित्त ने डेक समेटते हुए सवाल किया।
“अभी नहीं, अभी सात साल और हैं ये कार्ड्स तुम्हारे पास आने में,” नाना ने उसे कार्ड डेक लेकर उनके लकड़ी के नीले रंग के नक्काशीदार डिब्बे में रखते हुए कहा।
“सात साल क्यों?” निमित्त ने सवाल किया।
नाना ने उसका कोई जवाब ना दिया लेकिन निमित्त जानता था।
“क्या ये कार्ड्स यह भी बताते हैं?”
“समय आने पर तुम्हारे कार्ड्स तुम्हें ऐसा बहुत कुछ बताएँगे जो तुमने उनसे पूछा ना हो, जिसके बारे में तुम जानते नहीं…या फिर जानना ही नहीं चाहते,”
निमित्त को ज़्यादा कुछ समझ ना आया, वो पलटा और दड़बे के ऊपर से छलांग लगा कर बाहर निकल गया।
“तू टेन्शन मत ले स्कैली! तुझे पता है मैं तेरी ही सुनूँगा,” निमित्त ने अपने पॉकेट में रखे स्कैली को थपथपाते हुए कहा।
निमित्त ने इस याद को बस अपने अंतर्मन के सबसे अंधेरे कोने में दफन कर दिया था, जो अब उभर कर बाहर आ गयी थी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
वो याद से बाहर निकला। अंधेरे जंगल में। वो अब तक जंगल में उसी बरगद के नीचे बैठा था।
निमित्त ने अपना स्लिंग बैग खोल कर कार्ड डेक निकाला। उसने लाइटर निकाल कर जलाया और उसे बरगद की जड़ के सहारे टिका कर कार्ड्स शफ़ल करने लगा।
“लेट्स सी…थ्री कार्ड पुल,” निमित्त के दोनों हाथों के बीच पत्ते तेज़ी से नाच रहे थे।
“मैं कौन हूँ…,” निमित्त ने पहला कार्ड खींचा।
“द मजिशियन!, कार्ड अब तक नहीं बदला! मैं क्या ढूँढ रहा हूँ?” निमित्त ने दूसरा कार्ड खींचा।
“द स्टार! इसका मतलब मुझे आज भी समझ नहीं आया,” निमित्त खुद में बुदबुदाया और तीसरा कार्ड खींच लिया।
“मुझे पता है ये डेथ कार्ड ही हो…” बोलते हुए निमित्त ने कार्ड सीधा किया, “…द डेविल! फिर से? अब ऐसा कौन सा डेविल बचा है?”
“सोच निमित्त सोच! डेविल कार्ड यानी टेम्प्टेशन, इल्यूज़न…अटैच्मेंट…अनहेल्थी फ़िक्सेशन…” निमित्त चुटकी बजाते हुए अपने आप में बड़बड़ा रहा था।
उसके दोनों कानों के बीच तीखी सीटी बजी।
“मंजरी!!” उसके होंठों से सिसकारी के साथ वो नाम निकला।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
निमित्त का दिमाग़ एक-बार फिर यादों के अथाह सागर की अन अंधेरी गहराइयों में डूबने लगा जहां पनपते शैवाल नासूर बन कर उसकी आत्मा को रह-रह के घायल कर रहे थे।
Madikeri, Karnataka. December 2019
निमित्त ऊँचे यूक्लिपटस के पेड़ों की फुनगियों के पार आसमान पर बिखरे तारों के बीच पूरे चाँद को देख रहा था। उस समय भी वो टी-शर्ट और डेनिम में था।
“तुम्हें सच में ठंड नहीं लगती?” मंजरी ने मुस्कुराते हुए सवाल किया।
“जवानी जाने का नाम नहीं ले रही मेरी!”
“ओ भाई साहब! डिल्यूज़नल होने का अगर कोई टाइटल मैच होता तो तू अनडिसप्यूटेड चैम्पीयन होता,” मंजरी ने तंज कसा।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त सिर नवाते हुए बोला।
“हाहाहा…यू पिग!” मंजरी ने वेफर का ख़ाली पैकेट फेंक कर निमित्त को मारा।
“इसमें पत्थर लपेट कर मार,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“वैसे कोई प्रूफ़ भी दोगे या सिर्फ़ हवाई फ़ायरिंग करोगे?” मंजरी ने शरारती अन्दाज़ में कहा।
“किस चीज़ का?” निमित्त को कॉंटेक्स्ट समझ ना आया।
“वही…जवानी ना जाने का, मुझे तो लगता है इतने टाइम से आउट ऑफ़ प्रैक्टिस हो कि…” मंजरी निचला होंठ दांत में दबा कर हंसते हुए बोली।
“हॉsss…शरम कर कुछ लड़की! तुझसे कितना बड़ा हूँ मैं, मुझसे ऐसे बात करेगी?” निमित्त बनावटी ग़ुस्सा करते हुए बोला।
“हाहाहा…क्यों? अब क्या हुआ ‘मिस्टर जवानी जाने का नाम नहीं ले रही’ !“
“आज फ़ुल मून है, कोई मैनिफ़ेस्टेशन रिलीज़ करना है तो कर लो,” निमित्त टॉपिक चेंज करते हुए बोला।
“कैसे?”
“बॉनफ़ायर है, फ़ुल मून है। एक पेपर पर अपनी विश लिखो, चाँद को देख कर अपनी विश उससे कहो, फिर पेपर फ़ायर में डाल कर अपनी विश यूनिवर्स में रिलीज़ कर दो, सिम्पल!” निमित्त उसे समझाते हुए बोला।
“अच्छा! अगर पेपर पर तुम्हारा नाम लिख के माँग लूँ तो क्या होगा?” मंजरी उसकी आँखों में झांकते हुए बोली।
“तो मेरे नाम को कोस कर बद्दुआएँ देने वाली लड़कियों में एक और नाम का इज़ाफ़ा होगा जो मुझे नहीं करना,” निमित्त सीरीयस होते हुए बोला।
“यार ये क्या बात हुई निमित्त! हर कोई एक सा हो ये ज़रूरी है क्या?” मंजरी झुंझलाते हुए बोला।
“मैंने कब कहा ऐसा? कहा क्या?”
“तो फिर?”
“प्रॉब्लम किसी में नहीं है, प्रॉब्लम मुझ में है। मुझसे ये आम इंसानों वाली लाइफ़ नहीं जी जाती मंजरी, अगर मैं ऐसा होता तो अपनी शादी ना बचा लेता?”
“वाहियात इंसान हो यार तुम!” मंजरी चिढ़ कर बोली।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त मुस्कुरा कर सिर नवाते हुए बोला।
“निमित्त…”
“येप्प,”
“थैंक्स…”
“किसलिए?”
“तुम जानते हो,” मंजरी एक टक निमित्त को देख रही थी।
“नहीं जानता,” निमित्त ने अनभिज्ञता से कंधे उचकाए।
“तुम मुझे हेल्प नहीं करते तो अपने टॉक्सिक बॉयफ़्रेंड से कभी मूव-ऑन नहीं कर पाती मैं,”
निमित्त ने कोई जवाब ना दिया।
“उसके दोस्त ड्रंक होकर उसके सामने मुझे रेप करने की बात कर रहे थे…मज़ाक़ में ही सही पर कर रहे थे, उसने एक लफ़्ज़ ना कहा उन्हें…अगर तुम बीच में ना आते तो…” मंजरी की आवाज़ भर्राई।
“देख मंजरी, तेरी जगह दूसरी कोई भी लड़की होती तो मैं वही करता जो मैंने किया…और ये अपने आप में बड़ी वजह है कि हमें एक-दूसरे को डेट क्यों नहीं करना चाहिए,”
“क्या वजह?”
“उस दिन मेरे तेरे ड्रंक बॉयफ़्रेंड से झगड़े की वजह से तेरा ब्रेक-अप हुआ। अब अगर हम डेट करेंगे तो सबको यही लगेगा कि मैंने जान के तुम दोनों का ब्रेक-अप करवाया ताकि मैं तुझे डेट कर सकूँ,”
“सीरीयस्ली निमित??!! तुम कब से सबकी परवाह करने लगे,” मंजरी आहत भाव से बोली।
“मंजरी, तू अच्छी लड़की है यार। अपनी एज का कोई ढंग का लड़का ढूँढ। मुझे ये डेटिंग, प्यार-मोहब्बत, रिलेशनशिप, सिचूएशनशिप के वाहियात झमेलों में नहीं पड़ना,” निमित्त ने उसे समझाते हुए कहा।
“मुझे समझ ही नहीं आता आख़िर तुम चाहते क्या हो!” मंजरी चिढ़ कर बोली।
“मुझे साथ चाहिए, सम्भोग नहीं,” निमित्त ने मुस्कुरा कर कहा।
“छी! इतना स्लीज़ी और क्रिंज साउंड करता है ये,”
“ ‘आई सीक कम्पैन्यनशिप, नॉट इंटिमेसी’, अब ठीक है? क्या अल्फ़ाज़ बदलने से मायने बदल गए?”
“फिर हम यहाँ क्यों हैं निमित्त?”
“क्योंकि मुझे तुम्हारे साथ समय बिताना अच्छा लगता है, क्योंकि तुम मेरे साथ सारी रात अकेले गुज़ार सकती हो बिना इस बात की फ़िक्र किए कि मैं तुम्हारी मर्ज़ी के बिना तुम्हें हाथ लगाऊँगा,” निमित्त सपाट भाव से बोला।
“और अगर मैं कहूँ मुझे हाथ लगाने को तो?”
“मैंने पहले भी कहा है मंजरी कि मैं किसी ऐसे इंसान के साथ इंटिमेट नहीं हो सकता जिससे मैं प्यार नहीं करता, जिसके साथ मैं इमोशनली इन्वॉल्व नहीं हूँ,”
“ऑलराइट, फ़ेयर इनफ़! लुक इंटू माई आईज़ एंड से यू डोंट लव मी, मिस्टर निमित्त कालांत्री!” मंजरी ज़िद भरे लहजे में बोली।
“अबे क्या फ़िल्मी तमाशा है ये? तुझे पता है मुझे ये फ़ालतू बॉलीवुडिया रोमैन्स से प्यूक करने का दिल करता है,” निमित्त खड़ा होते हुए बोला।
“देखा! नहीं बोल सकते ना,”
“देख लड़की, तू मेनका बनना चाहती है तो मैं तुझे अभी यहीं तेरे पैरों में लम्बा लेट के साष्टांग दण्डवत प्रणाम करता हूँ…मुझे विश्वामित्र नहीं बनना। लाइफ़, कर्मा, यूनिवर्स, शनिदेव…ये सब मिलकर ऑल्रेडी मेरी लाइफ़ का गैंग-बैंग कर रहे हैं…” निमित्त बोलते-बोलते अटका, “…सॉरी शनि देव, आपका नाम गलती से निकल गया,”
“यार निमित्त, क्या चीज़ हो तुम यार! इतना चाइल्डिश कौन होता है?”
“बचपन से मेरे पास बेस्ट फ़्रेंड के नाम पर टॉय ऐक्शन फ़िगर है…वॉट ड़ू यू एक्स्पेक्ट? एंड जस्ट थिंक..तुमसे ये नहीं लिया जा रहा तो मेरे साथ लाइफ़ कैसे स्पेंड करोगी। मैं ना…इंसान नहीं हूँ…मॉर्फ़ीन का इंजेक्शन हूँ, लोगों का दर्द कम करने के काम आता हूँ पर मेरी लत लगती है। शुरू-शुरू में सब कुछ अच्छा लगता है…आउट ऑफ़ दिस वर्ल्ड लगता है, पर एक बार लत बन गया तो सिर्फ़ दुःख देता हूँ,”
“यू आर इम्पॉसिबल,” मंजरी रुआंसी हो कर बोली।
“कभी घमंड नहीं किया,”
“इस रिप्लाई पर तो मन करता है नाक तोड़ दूँ तुम्हारी,”
“मारोगी तो प्लास्टर तुम्हें ही चढ़ेगा। रात बहुत हो गयी है, रूम पर जा के सो जाओ। सुबह मैसूर के लिए बस पकड़नी है,” निमित्त ने कहा और होम-स्टे में अपने रूम की ओर बढ़ गया।
“नहीं यार स्कैली, मुझे अपनी लाइफ़ में एक और चू***पा नहीं चाहिए, तुझे पता है मुझसे रिलेशनशिप नहीं सम्भलेगा और उससे मेरी मेंटल इलनेस, फिर क्यों बेचारी को एक टॉक्सिक रिलेशनशिप से निकाल कर दूसरे में डालना,” अपने सिर में लगातार गूंजती स्कैली की आवाज़ पर झल्लाता हुआ निमित्त बोला।
निमित्त मंजरी को पसंद करता था पर जानता था कि मंजरी और वो एक-दूसरे के लिए नहीं बने। निमित्त किसी के लिए नहीं बना, उसको झेल पाना किसी के बस की बात नहीं। रात जाने कितनी ही देर तक वो अपनी गुजरी ज़िंदगी के ज़ख्मों को कुरेदता रहा। बाहर से कन्नौज से आए कॉलेज स्टूडेंट्स के शराब पी कर हुड़दंग करने का शोर बढ़ रहा था। निमित्त उन पर ध्यान ना देने की भरसक कोशिश कर रहा था तभी उसका फ़ोन बजा। रात के एक बज कर ग्यारह मिनट हो रहे थे, कॉल मंजरी का था। निमित्त ने हड़बड़ा कर कॉल उठाया।
“क्या हुआ मंजरी?” निमित्त की आवाज़ में घबराहट थी, देर रात बजने वाले फ़ोन रिंग से वैसे भी उसे अलग फोबिया हो गया था।
“यार निमित्त…मुझे बहुत डर लग रहा है। ये लोग रूम के बाहर लॉबी में बहुत ही गंदी-गंदी बातें कर रहे है…किसी ने जस्ट अभी मेरे रूम का डोर भी बैंग किया,” दूसरी ओर से मंजरी की घबराई और रुआंसी आवाज़ आयी।
“तू कॉल पर रह, मैं आ रहा हूँ। जब मैं बोलूँगा तभी दरवाज़ा खोलना,” निमित्त के दोनों कानों के बीच तीखी सीटी बज रही थी।
उसने रूम में इधर-उधर नज़र घुमाई, उसे ऐसी कोई चीज़ दिखाई ना दी जिसे वो हथियार की तरह यूज़ कर सके। उसने अपनी आर्मी नाइफ़ निकाल कर बैक पॉकेट में रख ली। होम-स्टे का ओनर वहाँ से थोड़ी दूरी पर ही रहता था लेकिन उसे बुलाने के लिए निमित्त को मंजरी का कॉल डिसकनेक्ट करना पड़ता जो वो अभी बिल्कुल नहीं करना चाहता था। निमित्त उठा और अपने रूम का दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया। लॉबी में क़तार में कमरे बने हुए थे। निमित्त और मंजरी के कमरे आमने-सामने थे और उनके बीच दोनों ओर चार-चार कमरे थे। इन सभी के आगे आयरन स्टैंड पर पानी के बड़े और भारी मटके रखे थे। लॉबी में तीन-चार लड़के थे जो नशे में बिल्कुल धुत्त थे। निमित्त ने अपने रूम के बाहर रखे मटके को ज़ोर की लात मारी। मटका तेज़ आवाज़ के साथ नीचे गिर के टूटा। लड़कों ने अचकचा कर उसकी ओर देखा।
“देखो ब्रदर, आई डोंट वॉंट एनी ट्रबल। पार्टी करनी है, खूब पार्टी करो…आई डोंट केयर…आई डोंट गिव ए फ़क…बस किसी को बिना वजह परेशान मत करो,” निमित्त खुद को संयत रखने की भरसक कोशिश करते हुए बोला।
“क्या रे…हीरो समझा है खुद को साउथ का?”
“ना! बस लगता साउथ का हूँ…हूँ पक्का नॉर्थ का। बी.एच.यू. प्रॉडक्ट, 2009 बैच, तुम लोगों से दस साल सीनियर हूँ, जो आज कर रहे हो मैं दस साल पहले कर के छोड़ चुका,” निमित्त आगे बढ़ते हुए बोला।
लड़के अचकचाए, उन्होंने सोचा था निमित्त गाली-गलौज, मार-पीट करेगा…वैसे निमित्त ने खुद भी यही सोचा था, शायद मंजरी वहाँ नहीं होती तो वो सिचूएशन को दूसरे तरीक़े से हैंडल करता लेकिन फ़िलहाल वो कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं था।
“देखो यार, तुम लोग भी न्यू-ईयर एंजॉय करने आए हो, हमें भी कल सुबह निकलना है…फ़ालतू में मार-पीट, थाना-पुलिस करना अच्छा लगेगा क्या? क्यों अच्छा-भला मूड स्पॉईल करना। नीचे गार्डेन में बॉनफ़ायर है, पार्टी एरिया है…गो एंड एंजॉय, मैं होम-स्टे ओनर से भी कुछ नहीं कहूँगा,”
लड़कों ने निमित्त को यूँ देखा जैसे कोई अजूबा देख रहे हों। फिर बिना कुछ बोले यहाँ से चले गए।
“दरवाज़ा खोल,” निमित्त ने फ़ोन पर मंजरी से कहा।
“वॉट द फ़क वॉज़ दैट! कैसे किया ये? मुझे तो लगा अभी पक्का मार-पीट होगी,” मंजरी दरवाज़ा खोलते हुए अचरज से बोली, वो कॉल पर बाहर हुई हर बात सुन रही थी।
“अबे…कोई फ़िल्म चल रही है क्या? कि गुंडों से फ़ाइट करूँगा। कॉलेज के लड़के हैं, दारू नहीं संभलती…दैट्स ऑल,” निमित्त अंदर आते हुए बोला। उसने फ़ौरन दरवाज़ा अंदर से लॉक किया।
“तुम सब लड़के एक जैसे होते हो! सुनना था कितनी गंदी-गंदी बातें बोल रहे थे…बड़े आए कॉलेज के लड़के, दारू नहीं संभलती…माई फुट,” मंजरी ने अपने इर्द-गिर्द शॉल लपेटी हुई थी फिर भी वो ठिठुर रही थी, शायद ठंड से ज़्यादा ग़ुस्से, अपमान और डर से।
“यार तुम लड़कियों का अजीब ही हिसाब चलता है, अभी अगर मैं मार-पीट करता तो बोलती कि बात कर के भी सिचूएशन हैंडल करने की कोशिश कर सकते थे, अब बात कर के सिचूएशन हैंडल की तो कलप रही हो कि मारा क्यों नहीं,” निमित्त सोफ़े पर बैठते हुए बोला।
“सॉरी,” मंजरी उसके बग़ल में बैठते हुए बोली।
“कोई बात नहीं, आई नो स्ट्रेस्ड हो,” निमित्त नरम होते हुए बोला।
“अगर वो लोग वापस आए तो?”
“लगता तो नहीं, फिर भी मैं यहीं हूँ। अगर आए तो ओनर और पुलिस दोनों को कॉल करूँगा,”
“मारोगे नहीं उनको?”
“अरे रण चण्डी माता, आप का आशीर्वाद ले कर संहार कर दूँगा उनका…उनके रक्त से अभिषेक करूँगा आपका..अब खुश?” निमित्त दोनों हाथ जोड़ कर मंजरी के सामने सिर झुकाते हुए बोला।
“हाँ ठीक है-ठीक है,” मंजरी मुस्कुराई।
“अब जाइए सो जाइए, खून की प्यासी डायन…”
“ए क्या बोला!’
“सॉरी-सॉरी, गलती हो गयी..”
“हाँ..”
“डायन नहीं…चुड़ैल बोलना था,”
“तेरी तो..” खिलखिलाते हुए मंजरी ने दोनों हाथ निमित्त की ओर बढ़ाए जैसे उसका मुँह नोचना चाहती हो।
“हाँ, ये खूनी-दरिंदी थोड़ी देर पहले क्यों दुबकी परिंदी बन गयी थी? बाहर निकल के बाल खोल के चिल्लाती आमि मोंजोलिका…शोईतान स्टूडेंट के मोरबो,” निमित्त ने उसकी दोनों कलाइयाँ पकड़ते हुए उसे चिढ़ाया।
एकाएक मंजरी ने अपना चेहरा आगे किया और अपने होंठ निमित्त के होंठों पर रख दिए। मंजरी उसे बेतहाशा चूम रही थी।
“मंजरी…रुक…जा…सुन…” निमित्त की आवाज़ हकलाने लगी।
मंजरी ने अपने तपते होंठ निमित्त की गर्दन पर रगड़े। निमित्त को यूँ लगा जैसे उसका दिमाग़ सुन्न हो रहा है।
“मंजरी…मुझसे…कंट्रोल…नहीं…होगा…प्लीज़…स्टॉप”
मंजरी ने निमित्त का हाथ अपने हाथ में लिया और शॉल के अंदर ले आयी, उसने निमित्त का हाथ अपने सीने पर रखा तब निमित्त को एहसास हुआ कि मंजरी ने शॉल के नीचे अपना टॉप और ब्रा ऊपर उठाया हुआ है।
“टेल मी यू डोंट वॉंट दिस?” अपना वक्ष वो निमित्त की हथेली में भरते हुए बोली।
निमित्त के होंठ, उसकी आवाज़, उसका जिस्म बुरी तरह थर्रा रहे थे।
“अगर मैं बोलूँगा कि मुझे ये नहीं चाहिए तो ये सरासर झूठ होगा मंजरी…अगर मैं बोलूँगा कि तुम्हारे रूम तक आते हुए मेरे ज़हन में एक बार भी ये विचार नहीं आया कि हमारे बीच ऐसा कुछ हो सकता है तो वो भी झूठ होगा…अगर मैं कहूँगा कि मेरे दिमाग़ ने एक बार भी तुम्हारे बिना कपड़ों के जिस्म की कल्पना नहीं की…तो…तो शायद वो भी झूठ होगा…और मैं इनमें से कोई भी झूठ बोल कर तुम्हारी नज़रों में महान नहीं बनना चाहता,” निमित्त मंजरी का चेहरा अपने दोनों हाथों में भरते हुए बोला।
“देखना है…मुझे बिना कपड़ों के?” मंजरी उसकी आँखों में झांकते हुए बोली।
“क्या तुम देख पाओगी?” निमित्त उसकी आँखों में झांकते हुए बोला।
“मतलब?” मंजरी को उसकी बात समझ ना आयी।
निमित्त खड़ा हुआ और उसने अपनी टी-शर्ट उतारी।
“ये क्या है,…क…किसने किया है ये?” मंजरी की चीख निकल गयी।
निमित्त का पूरा जिस्म जलती सिगरेट से दागे जाने और ब्लेड से काटे जाने के अनगिनत दागों से भरा हुआ था।
“टेल मी…किसने किया ये?”
“खुद मैंने,” निमित्त की आवाज़ बिल्कुल सर्द थी।
“क..क्यों?”
“अपने पागलपन से डील करने का तब मेरे पास सेल्फ़ हार्म के अलावा कोई दूसरा तरीक़ा नहीं था। इनमें से हर एक दाग के पीछे एक कहानी है, जब-जब ज़िंदगी ने मुझे कोई ज़ख़्म दिया तब मैंने अपने जिस्म की इमारत पर उस दर्द की इबारत को हमेशा के लिए दर्ज कर दिया ताकि कभी चाहूँ तो भूल ना पाऊँ,”
मंजरी के चेहरे पर एकसाथ कई भाव आए और गुजरे।
“हर एक ज़ख़्म जो जिस्म पर है उसकी कहानी मेरी अंतरात्मा पर दर्ज है। सुन पाओगी? एक-एक दाग की दास्तान?” निमित्त मंजरी की आँखों में देखते हुए बोला।
मंजरी का दिमाग़ इस ओवरव्हेलमिंग सिचूएशन को प्रॉसेस नहीं कर पा रहा था।
“क्या हुआ? फ़िल्मी लग रहा हूँ? या साइको? सोचो कितने साल लगे होंगे इतने ज़ख्मों को बनने और भरने में जो पूरा जिस्म भर दें…सोचो कितनी कहानियाँ दर्ज हैं इनमें। आज तक कोई सुन नहीं पाया। किसी ने सुनना नहीं चाहा, किसी ने सुनना तो शुरू किया पर आधी दूरी भी तय ना कर सका, कुछ को तो मेरे कपड़ों के नीचे बसी इन ज़ख्मों के क़ब्रिस्तान की खबर भी नहीं। क्या तुम सुन सकोगी? …उस से पहले…क्या तुम सुनना चाहती हो? एक-एक दास्तान?”
मंजरी ने ख़ाली आँखों से उसकी ओर देखा।
“अगर तुम हर एक दर्द सुनने के बाद भी मेरे साथ रह पायी तो आई स्वियर मंजरी, मैं तुम्हें इतना प्यार करूँगा जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकती हो…लेकिन मैं तुम्हें प्यार तब कर सकता हूँ जब तुम मुझे जान कर, मेरे इन ज़ख्मों से उतना ही प्यार कर सको जितना मुझे है। मुझे प्यार चाहिए, एम्पथी, सिम्पथी, दया, तरस नहीं…क्योंकि तरस खा कर सिम्पथी लव कुछ दिन, कुछ महीने तो चल सकता है लेकिन इंसान ज़िंदगी भर किसी पर तरस नहीं खा सकता…प्यार ज़िंदगी भर किया जा सकता है लेकिन उसके लिए तरस से ऊपर उठना पड़ता है। मैं खुद भी खुद पर तरस नहीं खाता यार…हाहाहा,” निमित्त हंसते हुए बोला।
मंजरी एकटक उसे घूर रही थी।
“यू नो मंजरी…मैं खुद ही खुद को सबकी लाइफ़ से राइट-ऑफ़ कर देता हूँ, मैं तो ख़ुद अपनी कहानी का मेन कैरिक्टर नहीं, किसी और की कहानी का क्या होऊँगा। अब पॉंईंट ये है कि मुझे क्या चाहिए? टेक ए वाइल्ड गेस,” निमित्त उसके बग़ल में बैठते हुए बोला।
“म..मुझे नहीं पता,”
“मुझे बस कोई चाहिए जिसके सामने अगर मेरे इन सूखे ज़ख्मों में से कोई रिसने लगे तो उसे कोफ़्त या घिन्न ना हो, ना ही मुझ पर झूठा प्यार या तरस आए,”
मंजरी कुछ ना बोली।
“समझ आया?”
“डूड, आई एम टू फ़क्ड अप टू प्रॉसेस दिस…मुझे अभी कुछ समझ नहीं आ रहा,” मंजरी शुष्क भाव से बोली।
“कोई बात नहीं, यू कैन क्लोज़ योर आइज़ एंड स्लीप हीयर, आइ विल होल्ड यू….कीप यू सेफ़,” निमित्त अपनी टी-शर्ट वापस पहन कर उसके बग़ल में बैठ कर अपनी बाँह फैलाते हुए बोला।
“आई कैन बी दैट पर्सन फ़ॉर यू निमित्त,” मंजरी ने निमित्त के कंधे पर अपना सिर टिकाते हुए कहा।
“2021 February, तुम्हारी लाइफ़ में कोई आएगा…तुम्हारा फ़ॉरएवर पर्सन तो नहीं, पर मुझसे बेहतर, तुम उसके साथ मूव-ऑन कर जाओगी, तुम्हें कर भी जाना चाहिए,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“फ़क योर डैम कार्ड्स, यू नो आई डोंट ट्रस्ट दिस मम्बो-जंबो” मंजरी आँखें बंद करते हुए बोली।
“यू नो मंजरी, हम जब भी डेविल के बारे में सोचते हैं हम एक भद्दी-घिनौनी आकृति की कल्पना करते हैं, पर डेविल हमारी लाइफ़ में हमेशा हमारी सबसे बड़ी ख्वाहिश, हमारी सबसे अतृप्त इच्छा, हमारी चीर संचित अभिलाषा के रूप में आता…” निमित्त ने बोलते-बोलते नीचे देखा। मंजरी उसकी गोद में सिर टिका कर सो गयी थी। उसने आहिस्ता से मंजरी का सिर पिलो पर रखा और बाथरूम में गया।
बाथरूम में काफ़ी देर तक निमित्त मिरर में खुद को घूरता रहा, फिर अपनी बैकपॉकेट से आर्मी नाइफ़ निकाली और अपनी दाहिनी बाँह पर एक गहरा कट लगाया जिसका निशान जल्दी ना भरे।
“दोबारा नहीं…कभी नहीं,”
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
निमित्त की यादों का रेला टूटता है, वो यथार्थ में आता है…या फिर उस स्वप्न में जो फ़िलहाल उसके अस्तित्व का, उसके अंतर्मन का वास्तविक यथार्थ था। फिर भी, यादों की उस उन्मादित ऊँची लहर पर बांध लगाने की भरसक कोशिश के बावजूद वो याद, उसके उस स्वप्न में, उसके जीवन के अंतिम प्रेम की याद निमित्त को ना चाहते हुए भी आंसुओं के खारेपन से सराबोर कर गई।
January 2020 में निमित्त और मंजरी मैसूर, ऊटी, हैदराबाद और बैंगलोर में अपनी आर्ट एक्सप्लोरेशन कर के अलग-अलग शहरों में लौट गए। मंजरी ने निमित्त की विषमताओं को समझने की भरसक कोशिश की और निमित्त ने खुद पर संयम रखने की कि मंजरी के साथ वो उन सीमाओं को ना लांघे जिन सीमाओं का बंधन निमित्त को कभी बांध ना पाया।
March 2020 में Covid की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया। निमित्त जानता था कि जब उसके साथ रह कर उसे समझना नामुमकिन है तो सवाल ही नहीं उठता कि लॉंग डिस्टेन्स रिलेशन्शिप में कोई उसके साथ चल सके, फिर भी, उसने और मंजरी ने पूरी कोशिश की। इस समय निमित्त के जीवन में हर एक फ़्रंट पर समीकरण परिवर्तित हो रहे थे। निमित्त पूरी दुनिया से कट गया, उसने खुद को सोशल मीडिया से भी हटा लिया।
7th December 2020, निमित्त को सपना आता है कि माँ उसे छोड़ कर जाने वाली हैं। निमित्त जानता था कि ये सपना सिर्फ़ उसके अंतर्मन का भय मात्र नहीं है। 11th December 2020, उसे अपनी माँ के फ़ोर्थ स्टेज कैन्सर का पता चलता है। निमित्त सब कुछ छोड़ कर वापस बनारस जाता है। अगले लगभग तीन महीने वो हर दिन, हर पल अपनी माँ को मौत से लड़ते देखता है…मौत की अपनी एक गंध होती है, ये गंध सिर्फ़ वो ही पहचान सकता है जिसकी मौत आने वाली हो, या फिर जिसने मौत को हर पल अपने क़रीब महसूस किया हो। मौत की ये गंध जैसे निमित्त के रोम-रोम में बस गई।
10th March 2021, ठीक सुबह के 10 बज कर 10 मिनट पर निमित्त अपनी माँ को अपनी गोद में आख़री साँस लेते देखता है। उस दिन, माँ के साथ निमित्त के अस्तित्व का एक बड़ा हिस्सा दम तोड़ देता है और उसकी माँ उसके अंदर जीने लगती है। उसके अगले कितने दिन और कितनी रातें उसकी माँ की कब्र के सिरहाने, बरगद के पेड़ के नीचे बैठे हुए गुजरते हैं उसे याद नहीं।
5th April 2021, भारी दिल और ख़ाली जेब के साथ निमित्त वापस दिल्ली जाने के लिए ट्रेन पर सवार हुआ, उस शहर जाने के लिए जिससे वो सबसे ज़्यादा नफ़रत करता था…वो शहर जिसने उसका चैन, सुकून, रिश्ते, नाम, सम्मान, करियर, सब कुछ उससे छीन लिया था। उस पल निमित्त के लिए उससे ज़्यादा हारा हुआ और उससे अधिक बदकिस्मत इंसान दुनिया में और कोई नहीं था। जीवन में हर कदम पर हारना निमित्त की क़िस्मत थी फिर भी हार ना मानना उसकी फ़ितरत। ज़िंदगी में एक सैकेंड चान्स तो वो भी डिज़र्व करता है; यही सोचते हुए उसे मंजरी का ख़्याल आया। उसने मंजरी को कॉल करने के लिए फ़ोन उठाया पर कुछ सोच के ठिठक गया। कितना लम्बा अरसा हो गया था उसे मंजरी को देखे। वो मंजरी की शरारत भरी आँखें देखना चाहता था। उसने मंजरी को सर्प्राइज़ देने का सोचा और अपना एक साल से इन-ऐक्टिव किया हुआ इंस्टाग्राम हैंडल दोबारा ऐक्टिव किया। मंजरी का इंस्टाग्राम हैंडल ओपन करते ही निमित्त को झटका लगा। उसकी प्रोफ़ाइल कपल फ़ोटोग्राफ़्स से भरी हुई थी जिनमें मंजरी अपनी एज के आस-पास के किसी लड़के के साथ नज़र आ रही थी। ट्रेन चल दी, निमित्त एक-एक फ़ोटोग्राफ़ को घंटों देखता रहा…कभी सोचता कॉल करे, कभी सोचता कि मैसेज करना चाहिए, फिर ये सोच कर रुक जाता कि शायद उसका कुछ भी करना ठीक ना होगा लेकिन आयरॉनी ये थी कि लाइफ़ सिचूएशन हो या रिलेशन, बिना प्रॉपर क्लोज़र के निमित्त से आगे बढ़ा नहीं जाता और ज़िंदगी ह या लोग, उसे सही ढंग से अलविदा किसी से नसीब नहीं होता। आख़िरकार दिल और दिमाग़ की जंग में दिल जीता। रात के तक़रीबन साढ़े बारह बजे निमित्त ने मंजरी को डी.एम. किया।
“हे, यू बोथ लुक गुड टुगेदर…रियली हैपी फ़ॉर या,…टोल्ड यू…माई कार्ड्ज़ आर नेवर रॉंग…हाहाहा”
रुकी हुई ट्रेन कानपुर सेंट्रल से खुली, निमित्त की नज़रें एकटक, अपलक, फ़ोन स्क्रीन पर लगी हुई थीं। थोड़ी देर में मैसेज सीन हुआ, सामने से “typing…” फ़्लैश होता देख निमित्त का दिल जैसे उसके दोनों कानों के बीच नगाड़े के समान चोट कर रहा था, उसके कानों में तेज़ तीखी सीटी बजने लगी। उसके हाथ काँप रहे थे। निमित्त मोबाइल को कस के पकड़े ना होता तो पक्का उसके हाथों से छूट जाता। सामने से बार-बार टाइपिंग फ़्लैश होती फिर ब्लैंक हो जाती जैसे दूसरी तरफ़ से बार-बार टेक्स्ट टाइप कर के डिलीट कर दिया जा रहा हो। निमित्त धैर्यपूर्वक सामने से जवाब आने की प्रतीक्षा करता रहा जब तक मंजरी की डी.पी. और नाम की जगह “user not found” नज़र ना आने लग गया।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
“आशूsss…”
निमित्त को अपने कंधे झुके और भारी महसूस होने लगे। वो थक रहा है इस अभिशाप से जीवन का बोझ ढोते-ढोते। उसे दूर कहीं से सागर की उठती-गिरती लहरों का शोर सुनाई दिया। सागर की खारेपन और नमी से भारी सुगंध जो उसके रोम-रोम में बस रही मौत की गंध पर हावी होती है। निमित्त उठा और उस ओर चल दिया जिधर से वो गंध और शोर आ रहे थे। आपस में बुरी तरह लिपट कर सघन जाल बनाए हुए पेड़ों की शाखा, लताओं और बेलों के पार दूर-दूर तक फैला समुद्री तट था। आसमान में पूरा चाँद निकला हुआ था जिसकी चाँदनी तट की रेत को स्वर्ण धूलि के समान कनक बना रही थी। समुद्र में रह-रह कर ज्वार भाटा आ रहा था जिससे उठती लहरें मानो आसमान में विराजमान चंद्रमा को अपने आग़ोश में लेने को लालायित थीं, पर वो लहरें कितनी ही दृढ़, आंदोलित व उन्मादित सही, चंद्रमा उनकी पहुँच से बहुत ऊपर था।
तट के छोर पर भागे आते लहरों के ख़रगोश जैसे हर बार अपनी अतिक्रमण सीमा का विस्तार करते हुए आगे बढ़ रहे थे। वहीं किनारे पर, चाँदनी की स्पॉटलाइट के ठीक नीचे, एक वृक्ष के गिरे हुए तने पर एक आकृति बैठी नज़र आ रही थी। उस आकृति की पीठ निमित्त की ओर थी, दूरी भी काफ़ी अधिक थी लेकिन निमित्त उस आकृति को पहचानता था। निमित्त उसकी ओर बढ़ा।
निमित्त की जाँघें अब पत्थर के समान कड़ी हो चुकी थीं, दाहिने पैर की टूटी हड्डी और घुटनों का दर्द बर्दाश्त की सीमा लांघ चुका था। फिर भी अपने अस्तित्व में मौजूद इच्छाशक्ति का आख़री कतरा तक झोंक कर वो उस आकृति के पास पहुँचा।
“माँsss…”
उसकी माँ बिल्कुल वैसी नज़र आ रही थीं जैसी वो तब दिखती थीं जब निमित्त सात साल का था। उन्होंने गहरे लाल रंग की साड़ी पहनी थी जिसपर ब्लैक कलर के बड़े हिबिस्कस फ़्लावर प्रिंट थे, होंठों पर लाल लिपस्टिक, हाथों में प्लेन लाल चूड़ियाँ, गले में मंगलसूत्र, माथे पर गोल लाल बिंदी और माँग में सिंदूर और कानों में सागर जैसे नीले रंग के टॉप जो बचपन से ही निमित्त को सागर की बूँदों से लगते थे। निमित्त उन्हें नज़रें भर कर यूँ देखता रहा जैसे अपने हर कण में उन्हें समाहित करना चाहता हो, फिर उसके पैरों ने खड़ा रहने से जवाब दे दिया। वो माँ के पैरों के पास रेत में बैठ गया और अपनी पीठ उस तने से टिका ली जिसपर वो बैठी हुई थीं। उनके पैरों में वही चाँदी की पायल थी निमित्त जिसे बचपन में अपने गले में हार की तरह पहनने की कोशिश करता था।
“माँ!?” निमित्त ने दोबारा आवाज़ दी लेकिन माँ ने उसकी तरफ़ ना देखा, ना ही उनके चहरे पर कोई भाव आए। वो भावशून्य पूर्ववत सागर की उठती-गिरती लहरों को देखती रहीं।
“मम्मीsss…ग़ुस्सा हो क्या? बात नहीं करोगी?” निमित्त अपनी तर्जनी उँगली से उनकी बाँह पर पोक करते हुए बोला, जैसा वो बचपन में किया करता था।
“बात करने लायक़ काम नहीं किया है तूने,” माँ का चेहरा अब भी भावशून्य था लेकिन उनकी आवाज़ में जो भाव थे वो निमित्त अच्छी तरह जानता था।
“सॉरी नाsss…” निमित्त शर्म से सिर झुकाते हुए बोला, जैसे वो बचपन में अपनी गलती पकड़े जाने पर किया करता था।
माँ ने उसकी ओर नज़रें की, निमित्त की हिम्मत ना हुई उनसे नज़रें मिलाने की।
“कितनी डायऐज़ेपैम खाई है?”
निमित्त चुपचाप सिर झुकाए बैठा रहा। उसने सवाल का कोई जवाब ना दिया।
“बोलता क्यों नहीं? जवाब दे! कितनी गोलियाँ खाई हैं?”
“द-दस..” वो धीरे से बुदबुदाया।
“इतने पे क्यों रुक गया?”
“इतनी ही थीं..”
“जागेगा तो और ला के फिर खा लेना जितनी जी करे,”
“सॉरी नाsss…”
“क्यों किया आशू?”
“दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था माँ…जिस्म का भी…और आत्मा का भी,” निमित्त ने बहुत मुश्किल से अपनी नज़रें उठाई, उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं।
“तो अपने दर्द को दर्द से काटने की कोशिश करना बंद कर दे आशू। तुझे जब भी लगा कि तेरे साथ कुछ ग़लत हो रहा है तो उसका बदला तूने किसी और से नहीं खुद से लिया। सेल्फ़ हार्म, ड्रग एब्यूज, स्युसाइड अटेम्प्ट, तू ख़ुद को ही ख़त्म करने पर तुला रहा, तूने कभी नहीं समझा कि तेरी इतनी कोशिशों के बाद भी तू क्यों नहीं मरता,”
“…अभी समय नहीं आया है…बारह साल हैं मेरे पास,” निमित्त धीरे से बोला।
“जब जानता था तो फिर भी क्यों ट्राई किया?”
“वर्थ गिविंग ए शॉट, सोचा क्या पता मुक्ति मिल जाए,” निमित्त कंधे उचकाता बोला।
“ऐसे मुक्ति कभी नहीं मिलेगी बच्चे! ईश्वर ने तेरे लिए जो कर्म निर्धारित किया है उससे भागेगा तो हमेशा जीवन-मृत्यु के चक्र में फँसा रहेगा,”
“वही तो समझ नहीं आता ना माँ! क्यों हूँ मैं इस दुनिया में? क्यों जी रहा हूँ? क्यों हर पल घुट-घुट के तिल-तिल के मरूँ? अपने मल्टिपल मायलोमा के लिए स्टेरॉइड और लेनलिडोमाइड पर पूरी ज़िंदगी नहीं बितानी मुझे। ना ही अपने ज़िंदगी के आख़री साल किसी हॉस्पिटल बेड पर, या किसी पर बोझ बन के गुज़ारने हैं। अपने अर्ली साइन्स ऑफ़ डिमेंश्या पहचानता हूँ मैं,”
“इस सोच से नहीं निकलेगा तो यूँ ही हर दिन, हर पल जीते-जी मरेगा। ज़िंदगी भर तू खुद को तकलीफ़ देता रहा वो ठीक था? अब जब ऊपर वाले ने तेरी हठ देख कर तुझे तकलीफ़ दे दी तो तुझसे लिया नहीं जा रहा?”
निमित्त से जवाब देते ना बना।
“बहुत भरोसा है ना अपनी रीडिंग पर? बता क्या कहते हैं तेरे कार्ड्ज़…?”
“अगले बारह साल तक यमराज का बाप भी….सॉरी…यमराज के रिस्पेक्टेड पापा भी नहीं ले कर जा सकते यहाँ से,”
“तू अंतर्यामी है? देखा है तूने कि उसके आगे नहीं जिएगा?”
“मैं थोड़ा सा भगवान..” निमित्त की बात ख़त्म होने से पहले उसके सिर पर ज़ोरदार चपत पड़ी।
“अपनी ये बकवास दुनिया के लिए बचा के रख, मुझे मत सुना!”
“सॉरी,” निमित्त ने दोबारा सिर झुका लिया और अपने होंठ पर तर्जनी रख ली, जैसा माँ उसे बचपन में डाँटते टाइम करवाती थीं ठीक वैसे ही।
“जानता है तू यहाँ क्यों है?”
निमित्त ने इनकार में सिर हिलाया।
“ये तेरा अंतर्मन है बेटा, तेरे जीवन की उन यादों से भरा हुआ अंतर्मन जिन्होंने तुझे वो बनाया है जो आज तू है। शायद इन यादों के ज़रिए तेरा अंतर्मन तुझसे कहना चाहता है कि अब ज़रूरत जागने की है…सिर्फ़ शरीर से नहीं, आत्मा से जागने की। तू जानता भी है कि तू ढूँढ क्या रहा है?”
निमित्त कुछ देर तक चुप-चाप कभी अपने आगे समुद्र और कभी अपने पीछे अंधेरे घने जंगल को देखता रहा। फिर बोला,
“एक जंगल है बहुत घना सा, सुना है वहाँ कभी सुबह नहीं होती। किसी के अंतर्मन सा लगता है, जहाँ अंधियारे की घुटन में यादों के मुरझाये पत्ते सड़ रहे हैं। एक नन्ही चिड़िया इस जंगल में कहीं खो गई है। वो डरी-सहमी किन्ही सीलन भरी झाड़ियों में बैठी है इस आस में कि सुबह होगी और सूर्य की रश्मियाँ उसे इस जंगल से बाहर निकलने का रास्ता दिखाएँगी। वो नहीं जानती कि इस जंगल में कभी सुबह नहीं होती। वो बैठी है सहमी सी अपने पंखों में दुबक के, इस आस में कि शायद उसको ढूँढता कोई आएगा उसे बचाने लेकिन जंगल घना है और सुना है कि वहाँ सुबह नहीं होती! फिर कौन आएगा उस रात के जंगल में एक नन्ही चिड़िया को ढूँढने? क्या किसी को ख़बर भी हुई कि एक नन्ही चिड़िया कहीं खो गई है उस रात के जंगल में जहाँ सुबह नहीं होती? और अगर ख़बर हुई भी तो क्या फ़र्क़ पड़ता है? एक नन्ही चिड़िया ही तो है। रात का जंगल उसे लील जाएगा जैसे अनगिनत परिंदों को लील जाता है और किसी को ख़बर नहीं होती, किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। पर उस नन्ही चिड़िया को तो फ़र्क़ पड़ता है! उसकी हर साँस इस आस पर आ रही है कि कोई आएगा उसे बचाने…उस रात के जंगल से जहाँ सुना है कि कभी सुबह नहीं होती,”
“मिल गई?”
“नहीं माँ, जंगल बहुत घना है…सिर्फ़ अंधेरा ही अंधेरा है…कुछ नज़र नहीं आता…कैसे ढूँढूँ उसे?”
“ये कहानी तेरी है बेटा, ये तुझे ही सोचना होगा कि तू उसे कैसे ढूँढेगा। शायद ज़रूरत अंदर रौशनी आने देने की है। अपने अंतर्मन के अंधेरे से आती उस आवाज़ तक पहुँचना चाहता है जो तुझे उस नाम से पुकारती है जिससे तुझे मेरे अलावा कोई नहीं पुकारता, तो फिर तुझे इन ऊँचे दरख़्तों की दीवार गिरानी होगी,”
“आप बिल्कुल मेरी लिंगो में बात कर रही हैं,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“कभी तूने सोचा है कि मैं वास्तविक ना होकर तेरे अंतर्मन की कल्पना मात्र हूँ? तेरे अकेलेपन से भागते अंतर्मन ने मुझे जैसा चाहा वैसा गढ़ लिया,” माँ ने निमित्त का चेहरा अपने हाथों में लिया और उसकी आँखों में झांकते हुए बोलीं।
“मैं नहीं जानता माँ, जीते जी शायद कभी जान भी नहीं पाऊँगा क्योंकि मैं जानना ही नहीं चाहता। मैं बस एक चीज़ जानता हूँ, अगर इस ज़िंदगी के बाद कोई दूसरी जगह है तो मैं वहाँ आपसे मिलूँगा, अगर इस जन्म के बाद कोई दूसरी दुनिया या जन्म है तो मैं वहाँ भी आपका बेटा बन के आऊँगा और जो हूँ, जो मैं था…उससे बेहतर बेटा बनने की कोशिश करूँगा…हाँ, अपनी शर्ट के सामने के बटन खुले और कॉलर खड़ा फिर भी रखूँगा, सिर्फ़ इसलिए ताकि आप जैसे ही ग़ुस्से से आँखें दिखाएँ मैं झट से बटन बंद कर लूँ….और अगर…अगर इस जीवन के बाद नितांत शून्य और अनंत अंतहीन अंधकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है तो अपने जीवन के उस अंतिम क्षण तक मैं आपको अपनी आत्मा में ऐसे ही बसा के रखूँगा…ठीक वैसे ही जैसे मेरी माँ सारी दुनिया को भूल गयी लेकिन उसे सिर्फ़ उसका बेटा याद रहा,”
“तुझे याद है तेरे बचपन की उस सुबह से पहले की आख़री बात जो मैंने तुझे सिखाई थी?”
“एज़ अबव, सो बिलो,”
“एक दरख़्त जितना ऊँचा, विशाल और छायादार होता है उसकी जड़ें उतनी ही गहरी और मज़बूत होती हैं…अगर दरख़्त के समान दूसरों को छाया देना चाहते हो तो पहले अपनी अंतरात्मा की जड़ें गहरी करो,”
“एज़ विद-इन, सो विद-आउट,”
“जो तुम्हारे भीतर होगा, वही तुम बाहर भी दोगे। अगर अपने अंतर्मन में अंधकार ले कर चलोगे तो बाहर भी अंधेरा मिलेगा, अगर बाहर प्रकाश फैलाना है तो शुरुआत अपने अंतर्मन से करो,”
निमित्त ने सिर हिलाया और उठ कर सागर की लहरों के दूर दौड़ लगाते ख़रगोशों की ओर बढ़ा।
“कहाँ जा रहा है?”
“डूबने जा रहा हूँ, मेरा अंतर्मन है माँ…जब तक डूबूँगा नहीं बाहर नहीं निकल पाऊँगा,”
निमित्त लहरों के बीच कहीं ओझल हो गया।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
उसकी पसलियों में फिर असहनीय दर्द की लहर उठी।
“टक-टक्क-टक-टक्क” मेट्रॉनोम की आवाज़।
निमित्त ने चौंक कर अपनी आँखें खोली, उसका पूरा जिस्म पसीने से तर था। साँस फूली हुई थी और सिर चकरा रहा था। उसके हाथ की अकड़ी हुई उँगलियाँ बेड-साइड टेबल पर कुछ तलाशने लगी। जल्द ही उनकी गिरफ़्त में वुडन मेट्रॉनोम के ब्रास का काँटा आया। मेट्रॉनोम की आवाज़ आना बंद हो गई। बग़ल में रखी बट्लर ग्लास बॉटल और पास ही रखे मेडिसिन स्ट्रिप से एक कैप्स्यूल और एक टैबलेट निकाल कर उसने खाई। अब तक उसका बायाँ हाथ उठना बंद कर चुका था, दोनों पैर काम नहीं कर रहे थे और पसलियाँ मांस व खाल फाड़ कर बाहर आने को उतारू थीं। बॉटल का बचा हुआ पानी अपने सिर पर डाल कर निमित्त चित्त लेट गया और ऊपर घूमते सीलिंग फ़ैन को देखने लगा।
“साले स्कैली, तेरा डायऐज़ेपैम वाला आइडिया बिल्कुल बकवास था! पता है माँ से कितनी डाँट पड़ी है?”
दवा का असर होने में लगभग दो घंटे का समय लगा। निमित्त के हाथ-पैर अब नॉर्मली काम कर रहे थे, उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि उसे किसी भी तरह की कोई प्रॉब्लम है। उसने उठ कर “मूनस्टोन पेंडेंट” गले में डाला, शर्ट पहनी और सामने के चार बटन खुले छोड़ कर कॉलर खड़ा करते हुए बोला,
“चल बेटे स्कैली, लाइफ़ के पिछले चैप्टर क्लोज़। नया सीज़न स्टार्ट करते हैं,”
॰ ॰ ॰
