THE KNOWN STRANGER
बाहर से रह-रह कर पटाखों के धमाके का शोर और बच्चों की किलकारियाँ सुनाई दे रही थीं। आरात्रिका किसी पुराने ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म के गाने की धुन गुनगुनाते हुए आटा गूँथने में व्यस्त थी। उसने घड़ी की ओर देखा। युवान को अब तक वापस आ जाना चाहिए था। यम दिया निकालने का समय हो रहा था।
युवान के वापस आने की प्रतीक्षा करते हुए आरात्रिका गुँथे आटे से दिया बनाने लगी। यह दिवाली आरात्रिका के लिए बहुत ख़ास थी क्योंकि अपने इस नए घर में आरात्रिका और युवान की यह पहली दिवाली थी। आरात्रिका इस दिवाली को सारी ज़िंदगी के लिए एक यादगार बनाना चाहती थी। उसने आटे के दिए में सरसों तेल भरा और रुई की बत्ती लगायी।
“युवान अब तक क्यों नहीं आया!” आरात्रिका घड़ी की तरफ़ फिर से देखते हुए झुंझलाई हालाँकि उसकी झुँझलाहट में फ़िक्र का पुट था।
“आता ही होगा। शायद रास्ते में कोई दोस्त मिल गया हो,” खुद में बड़बड़ाते हुए आरात्रिका ने माचिस जलाई।
उसका हाथ यम दिया जलाने के लिए बढ़ा। ठीक तभी बाहर किसी पटाखे के ज़ोरदार धमाके की आवाज़ से आरात्रिका सिहर गयी और उसके हाथ से छूट कर जलती माचिस उसकी सिल्क की साड़ी पर गिरी।
“शिट!!” आरात्रिका ने फ़ौरन जलती माचिस की तीली खुद से परे की लेकिन तब तक वो उसकी पर्ल वाइट प्योर सिल्क साड़ी में एक छेद दाग चुकी थी।
“नो…नो..नो…दिस काँट हैपन!” अपनी नयी व महँगी साड़ी की दुर्गत देख कर आरात्रिका रुआंसी हो गयी।
युवान उसके लिए कितने प्यार से से साड़ी लाया था। वो युवान से क्या कहेगी! जली साड़ी देख कर युवान कितना ग़ुस्सा करेगा! युवान ने कहा था कि दिवाली के टाइम पर सिल्क नहीं पहनना चाहिए क्योंकि सिल्क जल्दी आग पकड़ता है जिससे ऐक्सिडेंट के चैन्सेज़ ज़्यादा होते हैं लेकिन आरात्रिका अपनी एक्साइट्मेंट कंट्रोल नहीं कर पायी। वो युवान के लिए सज-धज कर तैयार होना चाहती थी। जैसा युवान उसे देखने की कल्पना करता है उससे भी ज़्यादा सुंदर लगना चाहती थी वो, जिसे देख कर युवान के होश उड़ जाएँ लेकिन अब साड़ी का हश्र देख कर खुद आरात्रिका के होश उड़े हुए थे। उसने साड़ी की प्लीट्स ऐसे एडजस्ट की जिससे जला हुआ हिस्सा दिखाई ना दे। अब उसे पूरे टाइम इस बात का ध्यान रखना होगा कि साड़ी का जला हिस्सा छुपा रहे, वैसे भी ये ज़्यादा देर नहीं चलने वाला! वो जितनी उत्तेजक लग रही थी उसे यक़ीन था कि जब युवान उसे देखेगा तो ज़्यादा देर तक साड़ी उसके जिस्म पर रहने ना देगा। इस विचार से लजाते और झेंपते हुए आरात्रिका ने दिया जलाया और दिए को सावधानीपूर्वक अपने दोनों हाथों में लेकर घर के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
बाहर कॉलोनी के बच्चों की एक टोली सड़क के बीच में अनार जला रही थी। उससे कुछ दूर पर कॉलेज के लड़कों का एक ग्रुप था जो हाथ में पकड़े हुए आकाश बाण का पलीता सिगरेट से सुलगाते और उसे सीधा आसमान की ओर छोड़ देते। लेन के दोनो ओर बनी घरों की क़तारें झालर, मोमबत्तियों और दिए की सजावट से रौशन थीं। आरात्रिका आँख भर कर उस मंजर को यूँ देख रही थी जैसे निगाहों के लेंस से उस मोमेंट को हमेशा के लिए अपने दिमाग़ के कैमरे में लगे यादों के मेमरी कार्ड पर सेव कर देना चाहती हो। लाइफ़ में अब सुकून ही सुकून था। सिर्फ़ वो, युवान और उनके एक-दूसरे के साथ एक खूबसूरत भविष्य के सपने जिन्हें साकार करने का पहला कदम उन्होंने इस घर के साथ लिया था। अब आरात्रिका को कोई टेन्शन नहीं थी, बस युवान वापस आ जाए! आख़िर कहाँ रह गया वो? सोचते हुए वो दिशा का अंदाज़ा लगाने की कोशिश करने लगी। उसने अपनी माँ को यम दिए की लौ दक्षिण दिशा की ओर कर के रखते देखा था। यह लाइफ़ में पहला मौक़ा था जब आरात्रिका खुद ऐसा कुछ कर रही थी।
सुबह सूरज उसे ठीक सामने से निकलते दिखाई देता था, उसके आधार पर आरात्रिका ने दक्षिण की ओर दिए की लौ कर के दिया घर की चौखट के बाहर रखा। अभी आरात्रिका दिया नीचे रख कर सीधी भी नहीं हुई थी कि जाने कहाँ से हवा का एक झोंका आया और उसका दिया बुझ गया।
“य…ये तो अपशकुन है। ऐसा नहीं होना चाहिए था…दिया नहीं बुझना चाहिए था,” आरात्रिका का दिल डूबने लगा।
वो दोबारा दिया जलाने के लिए नीचे झुकी, ठीक उसी पल उसके पीछे से आते किसी शख़्स की काली छाया ने आरात्रिका को अपने आग़ोश में ले लिया।
“युवान!” आरात्रिका का चेहरा खिल गया। अपनी आवाज़ में सौ जल तरंगों की खनक लिए आरात्रिका पीछे पलटी लेकिन अपने सामने खड़े शख़्स के चेहरे पर नज़र पड़ते ही उसका चेहरा उतर गया।
“त…तुम?” आरात्रिका के काँपते होंठों से बड़ी मुश्किल से निकला।
उसके सामने खड़े शख़्स की पीठ पर ठीक पीछे लगे लैम्प पोस्ट की लाइट पड़ रही थी जिससे उसकी छाया आरात्रिका पर जैसे ग्रहण लगा रही थी। उस शख़्स का चेहरा साफ़ तौर पर नज़र नहीं आ रहा था फिर भी उन आँखों की चमक को आरात्रिका ने साफ़ पहचाना था जिन्होंने उसकी आँखों से होते हुए जैसे उसके दिल पर भी ग्रहण लगा दिया था।
“आरात्रिका साहा! वॉट ए प्लेजेंट सर्प्राइज़,” उस शख़्स की आँखों की चमक आरात्रिका से नज़रें मिलते ही होंठों पर मुस्कान बन कर बिखर गयी। वो दो कदम आगे बढ़ा, जैसे आरात्रिका से हाथ मिलाना चाहता हो या उसके गले लगना चाहता हो।
आरात्रिका का चेहरा बिल्कुल सर्द और भावहीन था लेकिन उसकी आँखों में उस शख़्स को देखते ही जो घोर अप्रसन्नता के भाव उभरे थे उन्हें छुपाने की आरात्रिका ने तनिक भी कोशिश ना की। आरात्रिका अपनी जगह से इंच भर भी ना हिली। उसकी ओर बढ़ता शख़्स उससे दो कदम की दूरी पर ठिठक कर रुक गया।
“निमित्त कालांत्री!” आरात्रिका के लबों से सिसकारी के साथ वो नाम निकला।
“थैंक गॉड तुमने पहचाना तो, वरना एक पल को मुझे लगा तुमने मुझे कोई गुंडा-बदमाश समझ लिया है,” वो शख़्स पहले की तरह मुस्कुराते हुए बोला।
“तुम यहाँ क्या कर रहे हो निमित्त?” आरात्रिका ने सर्द भाव से सवाल किया।
“मैं नेबरहुड में किसी से मिलने आया था। वापस लौट रहा था कि अचानक तुम पर नज़र पड़ी। तुम्हें पहले नहीं देखा यहाँ,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“दुर्गा पूजा के टाइम ही शिफ़्ट हुई हूँ…अपने हज़्बैंड के साथ,” आरात्रिका ने अपनी आख़री लाइन पर ख़ास-तौर पर ज़ोर देते हुए कहा।
“ओह…दैट्स ग्रेट,” निमित्त पहले की भाँति मुस्कुराते हुए बोला हालाँकि उसकी आँखों की चमक कुछ फीकी पड़ी थी।
“तो कहाँ है?”
“क्या कहाँ है?”
“अरे! क्या नहीं कौन,”
“कौन कौन?”
“तुम्हारा हज़्बैंड! और कौन!! मिलवाओ तो,”
“बाहर गया है, बस आता ही होगा वापस,”
“कोई बात नहीं, अंदर बैठ कर आराम से इंतज़ार कर लेंगे,” निमित्त की मुस्कान और चौड़ी हो गई।
निमित्त की आँखों में हल्की हुई चमक वापस आती देख आरात्रिका की रीढ़ में सिहरन दौड़ गयी। वो बुत बनी खड़ी हुई थी, उसका दिल, उसकी अंतरात्मा बार-बार चीख कर ऊपर वाले से गुहार लगा रहे थे कि काश उसी पल युवान वापस आ जाए और इस बिन बुलायी बला को वहाँ से चलता करे।
निमित्त घर की चौखट की तरफ़ बढ़ा। आरात्रिका अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली, ना ही उसने निमित्त को घर में आने का आमंत्रण दिया। निमित्त ने आहत भाव से आरात्रिका को देखा।
“कम ऑन अरात्रिका! इतने समय बाद मिले हैं घर बुला कर एक कप चाय भी नहीं पिलाओगी क्या?”
आरात्रिका की भाव-भंगिमा में कोई परिवर्तन ना आया।
“अतिथि देवो भवः?” निमित्त ने मुस्कान बिखेरते हुए पूरी बेशर्मी से कहा।
उसे देख कर साफ़ पता लगता था कि उसका बिना अंदर आए और बिना युवान से मिले वहाँ से टलने का कोई इरादा नहीं था।
“आओ,” आरात्रिका ने असहाय भाव से गर्दन हिलाते हुए कहा और बिना निमित्त पर नज़र डाले वापस घर की ओर मुड़ गयी। निमित्त के चेहरे पर खिली मुस्कान और आँखों में चमक पूर्ववत बरकरार थे। उसने आरात्रिका के पीछे कदम बढ़ाए।
निमित्त चौखट पर एक पल को ठिठका। उसकी नज़र बुझे हुए यम दिए पर पड़ी, एकाएक उसके चहरे पर कई भाव एक-साथ आ कर गुजरे, फिर उस मुस्कान ने पुनः अपना वर्चस्व पसार लिया। निमित्त ने घर के अंदर प्रवेश किया।
निमित्त घर के लिविंग एरिया में खड़ा था। नए घर की अपनी एक एनर्जी होती है, प्योर, पॉज़िटिव और वाइब्रेंट। निमित्त ख़ूबसूरती से सजाए हुए उस घर की एनर्जी को महसूस कर रहा था। सपनों, आशाओं और छोटी-बड़ी उम्मीदों की सकारात्मक ऊर्जा से भरा घर! लिविंग एरिया की सीलिंग से ढेरों रंग-बिरंगे कंदेल लटक रहे थे जिनकी रौशनी उन पर एंग्रेव्ड डिज़ाइन पर पड़ने से छत पर वे डिज़ाइन अलग-अलग रंगों के खूबसूरत पैटर्न बना रहे थे। इसके अलावा जगह-जगह लगी वॉल लाइट्स की मद्धिम रौशनी और वातावरण में घुली मिक्स्ड एसेंशियल ऑइल्स की भीनी ख़ुशबू इन्वायरॉन्मेंट को एक रिच ऐम्बीआन्स और फ़ील दे रहे थे।
एक वॉल पर ओक-वुड एंड चेस्टनट का ओपन बुक शेल्फ था जिसपर किताबों के साथ-साथ ऑरीएंटल ग्रीक एंड चायनीज़ सरैमिक आर्टिफ़ैक्ट्स सजाए हुए थे। उसके ठीक बग़ल वाली वॉल को डेडिकेटेड फ़ोटो-वॉल का स्वरूप दिया गया था। ब्रास फ़्रेम स्पॉट-लाइट के नीचे पूरी वॉल पर छोटे-बड़े आकार के फ़ोटो फ़्रेम्स कोलाज़ के रूप में ग्रैफ़िक्ली कम्पोज़ किए गए थे जिनमें युवान और आरात्रिका के इटली, ग्रीस, फ़्रान्स, जर्मनी और इंडोनेशिया में एग्ज़ाटिक लोकेशंस पर डेस्टिनेशन हॉलिडे के फ़ोटोग्राफ़्स लगे थे। निमित्त बारीकी से एक-एक फ़ोटोग्राफ़ का अवलोकन कर रहा था। युवान देखने में हैंडसम था। आरात्रिका और युवान का पेयर फ़ोटोग्राफ़्स में बिल्कुल पर्फ़ेक्ट लगता था और हर एक फ़ोटोग्राफ़ में आरात्रिका बहुत खुश नज़र आ रही थी।
“बैठो मैं चाय लाती हूँ,” आरात्रिका ने सर्द भाव से कहा।
निमित्त का यूँ ज़बरदस्ती घर में घुसा चला आना, उसके और युवान के फ़ोटोग्राफ़्स देखना, हर एक चीज़ आरात्रिका को बुरी तरह असहज कर रही थी। वो पलट कर किचेन में गयी जहां उसने अपना मोबाइल छोड़ा था। उसने फ़ौरन युवान को कॉल लगाया। दूसरी ओर से रिंग जाने की आवाज़ आती रही पर कॉल पिक नहीं हुआ। कुछ देर रिंग बज कर कॉल डिस्कनेक्ट हो गयी। आरात्रिका ने दोबारा कॉल ट्राई किया। कॉल फिर भी अटेंड नहीं हुआ। हार कर आरात्रिका ने युवान को वॉइस मैसेज किया।
“युवान, वेयर द हेल आर यू यार! कॉल क्यों नहीं ले रहे हो? अच्छा लिसेन, वो मेरे कॉलेज टाइम का एक…सीन्यर पता नहीं कहाँ से टपक गया है यार। ही वज़ ए टोटल वीयर्डो बैक इन कॉलेज। आई ट्राइड टू अवॉइड हिम, बट ही केम इन अनइन्वायटेड। वो ज़िद पकड़े बैठा है कि तुमसे मिल कर ही जाएगा। मैं बिल्कुल अकेली हूँ एंड आइ एम नोट गेटिंग गुड वाइब्ज़ अबाउट दिस होल सिनैरीओ। तुम प्लीज़ जल्दी से घर आ जाओ,”
युवान को वॉइस मैसेज भेज कर आरात्रिका चाय बनाने लगी। वो बीच-बीच में लिविंग एरिया की ओर चोर नज़र डालती। निमित्त उसे कभी उसके और युवान के फ़ोटोग्राफ़्स देखता तो कभी बुक शेल्फ पर रखी किताबों को उलट-पलट करता तो कभी सरैमिक वेसेज़ उठा कर उनका मुआयना करता नज़र आता। उसकी हर एक हरकत पर आरात्रिका को बुरी तरह खिज मच रही थी। वो बस जल्द से जल्द निमित्त को अपने घर से दफ़ा कर देना चाहती थी।
कुछ देर बाद आरात्रिका एक ट्रे में चाय का सिर्फ़ एक कप लेकर वापस लिविंग एरिया में आयी। उस समय निमित्त एक इम्पोर्टेड ग्रीक पॉट पर बनी पेंटिंग देख रहा था। उस पॉट की क़ीमत लगभग चार लाख रुपए थी। आरात्रिका को आता देख कर निमित्त ने पॉट वापस उसकी जगह पर रखा और प्लश काउच पर आ कर बैठ गया।
“जस्ट वन कप? तुम नहीं पियोगी?”
“मैं इतनी देर रात चाय नहीं पीती। ना ही किसी के यहाँ इतनी देर रात जा कर चाय की फ़रमाइश करती हूँ…और ना ही पसंद करती हूँ कि कोई ऐसा करे,” चाय की ट्रे सेंटर टेबल पर लगभग पटकते हुए आरात्रिका ने कहा। निमित्त पर उसकी बात का जैसे कोई प्रभाव ना पड़ा। उसने मुस्कुराते हुए चाय उठा ली।
“चाय नहीं पी सकती तो कम से कम कम्पनी तो दे सकती हो?” निमित्त ने चाय का कप ट्रे से उठाते हुए आरात्रिका को अपने सामने वाले काउच की तरफ़ इशारा किया।
चेहरे पर घोर अनिच्छा के भाव लिए आरात्रिका निमित्त के सामने वाले काउच पर बैठ गयी। वो निमित्त की ओर नहीं देख रही थी, उसकी नज़र अपनी फ़िज़िट करती उँगलियों पर थी जब कि निमित्त की नज़र एक पल के लिए भी आरात्रिका से नहीं हटी थी।
“सो! हाउ इज़ लाइफ़?” निमित्त ने कैज़ूअली सवाल किया।
“ग्रेट! लाइफ़ हैज़ बिन इंक्रेडिब्ली जेनरस, ब्लेसिंग मी फ़ार बीयॉन्ड एनीथिंग आई कुड हैव इमैजिंड इन माई वाइल्डेस्ट ड्रीम्स, आई ऐम इन द टॉप पोज़िशन एट द कम्पनी वेयर आई वर्क। युवान का स्टार्ट-अप भी ह्यूज सक्सेस है। हमने अभी नया घर लिया है…लाइफ़ इज़…सॉर्टेड!” आरात्रिका ने एक-एक बात यूँ कही जैसे निमित्त को सुनाने और कुढ़ाने का इरादा हो उसका लेकिन निमित्त पर उसकी बात का कोई विपरीत प्रभाव ना पड़ा। उसने पहले की तरह मुस्कुराते हुए चाय की एक चुस्की ली।
“यू आर टेलिंग मी अबाउट योर प्रोफ़ेशनल अचीवमेंट्स एंड मटीरीयलिस्टिक गेन्स, पर मैंने वो नहीं पूछा। मैंने पूछा कि क्या तुम ज़िंदगी से खुश हो?”
“ज़िंदगी से खुश? क्या क्राएटेरीया है तुम्हारा किसी की ख़ुशियाँ मेज़र करने का? क्योंकि जिस पर्स्पेक्टिव से मैं देखती हूँ मैं बहुत ज़्यादा खुश हूँ। युवान और मैं पर्फ़ेक्ट कपल हैं, एक दूसरे को समझते हैं, एक दूसरे के साथ कम्पैटिबल हैं और साथ मिल कर एक सेफ़ एंड सिक्योर्ड फ़्यूचर बना रहे हैं,” आरात्रिका निमित्त को घूरते हुए बोली, उसकी आँखें जैसे आग बरसा रही थीं।
“गुड…बट इट स्टिल फ़ील्स लाइक यू आर टॉकिंग अबाउट सम बिज़्नेस वेंचर…ए प्रिटी इम्प्रेसिव वन…बट स्टिल ए बिज़्नेस वेंचर एंड नॉट लाइफ़,” निमित्त मुस्कुरा कर चाय की चुस्की लेते हुए बोला।
“लाइफ़ में सबकी प्रायऑरिटीज़ अलग होती हैं एन.के. इसलिए ज़िंदगी को देखने का पर्स्पेक्टिव और ख़ुशियों को नापने के पैरामीटर भी अलग होते हैं। अपने पर्स्पेक्टिव से मैं बहुत खुश हूँ एंड आई डोंट गिव ए डैम अबाउट योर पर्स्पेक्टिव। तुम्हारे लिए हैपी लाइफ़ क्या है एन.के.?” आरात्रिका ग़ुस्से से जैसे फुफकारती हुई बोली।
निमित्त सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गया। उसने आरात्रिका के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया।
“ये ऐसे हिप्पियों की तरह बड़े बिखरे हुए बाल, दाढ़ी-मूँछ, ड्रेस-अप ऐसे करते हो जैसे सच में कोई गुंडा-मवाली हो, शर्ट के बटन खुले, टैटू और ये जंक जूअल्री से लदे हुए, ऐसा रूप बनाए चलते हो कि सोसाइटी में आउट-कास्ट लगते हो। इज़ दिस योर डेफ़िनिशन ऑफ़ बीइंग फ़्री एंड हैपी? बीकज़ इफ़ इट इज़…इट सक्स…बिग टाईम!”
आरात्रिका जान कर निमित्त को इन्सल्ट कर रही थी ताकि वो ऑफ़ेंड हो और वहाँ से चला जाए लेकिन निमित्त पर जैसे उस बेइज़्ज़ती का कोई असर नहीं हुआ।
“मैं जो हूँ, जैसा हूँ…अपने आप से बहुत खुश हूँ,” निमित्त मुस्कुरा कर चाय ख़त्म करते हुए बोला।
“यू नो तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है! तुमसे ये बात पच नहीं रही कि मैं लाइफ़ में तुमसे ज़्यादा सक्सेसफ़ुल, सॉर्टेड और खुश हूँ। तुम यहाँ ये सोच कर आए कि तुम्हें पता चलेगा कि तुमसे मूव-ऑन करने के बाद मेरी ज़िंदगी कितनी बर्बाद हो गयी है, मुझे लाइफ़ में सच्चा प्यार नहीं मिला, ना कोई ख़ुशियाँ मिलीं और ये सब सुन कर तुम्हारी ऑल्रेडी इन्फ़्लेटेड मेल ईगो को वो किक मिलेगी जिसके लिए तुम जीते हो बट अनफ़ॉर्चुनेट्ली तुम्हारे इस सेडिस्टिक प्लेज़र प्लान को मिडल फ़िंगर दिखाते हुए मैंने तुम्हें हक़ीक़त का वो आईना दिखा दिया जिसमें तुम्हें तुम्हारी औक़ात नज़र आ गयी और अब वो तुमसे लिया नहीं जा रहा,”
निमित्त मुस्कुराया।
“तुम्हारा ग़ुस्सा करने का अन्दाज़ आज भी नहीं बदला। आज भी जब ग़ुस्सा करती हो तो मुँह से मानो फूल झड़ते हों…जलते अंगारों से सुलगते लाल फूल। आज भी जब सच छुपा कर अपनी बात ऊपर रखने की कोशिश करती हो तो तुम्हारी वॉइस पिच नॉर्मल से ऊपर हो जाती है और साँसें तेज़ चलती हैं जिसकी ध्वनि शब्दों के बीच आती है,”
निमित्त को इतने इत्मिनान से मुस्कुराते देख कर आरात्रिका अब बुरी तरह चिढ़ गयी थी। उसका दिल कर रहा था कि काउच से उठ कर अपने नाखूनों से निमित्त का मुँह नोच ले। उसकी नज़र निमित्त के बग़ल में रखे उसके पुराने लेदर स्लिंग बैग पर गयी।
“अब भी अपने वो मनहूस टैरो कार्ड्स ले कर चलते हो?”
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया।
“निकालो! तुम्हारे टैरो कार्ड्स कभी ग़लत नहीं होते ना! इन्हीं टैरो कार्ड्स ने बताया था ना कि हमारा साथ में कोई फ़्यूचर नहीं है। निकालो कार्ड्स और करो मेरे लिए रीडिंग तब तुम्हें पता चलेगा कि मैं सही हूँ और तुम ग़लत,” आरात्रिका उसे चैलेंज करते हुए बोली।
“आई डोंट थिंक दैट्स ए गुड आइडिया,” निमित्त के चेहरे के भाव बदले। वो फ़ौरन सीरीयस हुआ। वो आरात्रिका के लिए टैरो रीडिंग नहीं करना चाहता था।
निमित्त के चेहरे के बदले भाव देख कर आरात्रिका के होंठों पर विजयी मुस्कान आयी।
“क्या हुआ? अब स्मर्क कैसे ग़ायब हो गयी तुम्हारी? निकालो कार्ड्स,”
“लेट इट बी, मैंने मान ली तुम्हारी बात। तुम सही, मैं ग़लत। अब खुश?” निमित्त परे देखते हुए बोला।
“ओ-हो-हो-हो, जैसे मेरी बात मान कर मुझ पर कोई एहसान कर रहे हो…तुम ना…अब भी बिल्कुल वैसे के वैसे हो! बेहूदा, बदतमीज़ और वाहियात! एक मिनट में किसी का अच्छा-भला मूड सड़ा दो। तुम्हें इतने सस्ते में तो नहीं जाने देने वाली मैं। मैं कहती हूँ निकालो कार्ड्स!” आरात्रिका ने आदेशात्मक अन्दाज़ में कहा।
“अरू प्लीज़,” निमित्त की आवाज़ में एक पल को याचना का पुट आया।
“डोंट यू डेयर अरू मी! मैं तुम्हारी अरू नहीं हूँ,” आरात्रिका जैसे किसी घायल नागिन की तरह फुफकारते हुए बोली।
“स..सॉरी,”
“कार्ड्स निकालो,” आरात्रिका का लहजा पत्थर सा सख़्त और सर्द था।
चेहरे पर असहाय और अप्रसन्न भाव लिए हुए निमित्त ने अपने स्लिंग बैग से पुराने टैरो कार्ड्स का डेक निकाला और शफ़ल कर के आरात्रिका के सामने सेंटर टेबल पर स्प्रेड कर दिया।
“कार्ड्स मैं खुद पुल करूँगी। तुम्हारा फ़ेवरेट थ्री कार्ड पुल करते हैं,” कहते हुए आरात्रिका ने अपने सामने पलट कर स्प्रेड किए कार्ड्स में से तीन पत्ते निकाल कर अपने आगे रख लिए। निमित्त एक-टक उसे देखता रहा पर कुछ ना बोला। आरात्रिका ने एक-एक कर के तीनों पत्ते सीधे किए। पहले दो कार्ड्स सीधे करते ही उसका कलेजा मुँह को आ गया।
“द टॉवर और डेथ कार्ड!!” आरात्रिका के होंठों से सिसकारी निकली।
कॉलेज में निमित्त ने आरात्रिका को टैरो कार्ड्स पढ़ना सिखाया था। वो जानती थी कि ‘द टॉवर’ और ‘डेथ’, दोनों ही टैरो में मेजर आर्काना कार्ड्स हैं जो किसी आने वाली घोर विपत्ति व संकट के सूचक हैं। द टॉवर आने वाली विपत्ति या ख़तरे को दर्शाता है, वर्तमान में जो कुछ भी है सब-कुछ बर्बाद और तहस-नहस हो जाने का द्योतक है और व्यक्ति के जीवन की दिशा बदलने का संकेत देता है, एक ऐसे बदलाव का संकेत जो सुखद नहीं अपितु घोर पीड़ादायक है। डेथ कार्ड, जो मेजर आर्काना का तेरहवाँ पत्ता है वो भी आने वाले अशुभ समय की चेतावनी देता है, मृत्यु संकेत देता है, यह मृत्यु व्यक्ति की ना हो कर रिश्तों की भी हो सकती है। मेजर आर्काना के दोनों नेगेटिव कार्ड्स एक-साथ आना साफ़-तौर पर इशारा था कि आरात्रिका की ज़िंदगी में कुछ बहुत बुरा होने वाला था।
“तीसरा कार्ड पलटो,” निमित्त आहिस्ता से बोला।
आरात्रिका ने उखड़ी साँसों को सम्भालने का भरसक प्रयास करते हुए काँपते हाथों से आख़री पत्ता पलटा।
“द मजिशियन,” आरात्रिका तीसरा कार्ड देख कर चौंकी।
द मजिशियन भी मेजर आर्काना का कार्ड है जो आत्मिक ऊर्जा को दर्शाता है। व्यक्ति की आत्मा को भौतिक, नश्वर संसार से परे, दूसरी दुनिया से जुड़ने के संकेत देता है।
“एज़ एबव, सो बिलो…” निमित्त बोला।
“…एज़ विद इन, सो विद आउट!” आरात्रिका के मुँह से स्वतः ही निकला।
इस वाक्य का अर्थ था; जितना ऊपर है, उतना ही गहरा…बिल्कुल किसी वृक्ष की जड़ के समान। वृक्ष जितना बड़ा व ऊँचा होगा उसकी जड़ें उतनी ही गहरी होंगी, जितना बाह्य है उतना ही भीतर!
आरात्रिका के पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गयी। वो एक झटके में काउच से उठ खड़ी हुई। उसकी आवाज़ के साथ-साथ उसका पूरा शरीर भी सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था।
“वॉट आर योर इंटेन्शन्स एन.के.? क्यों आए हो तुम यहाँ?”
“तुम्हें मेजर आर्काना के तीन कार्ड्स आए हैं अरात्रिका। इट्स ए वॉर्निंग। तुम ख़तरे में हो,” निमित्त कार्ड्स समेटते हुए बोला।
“ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है। वाई आर यू हीयर एन.के.? आर यू स्टॉकिंग मी? ऑब्वीयस्ली यू आर! वरना हमें एक-दूसरे से कॉंटैक्ट तोड़े इतने साल बीत चुके हैं कि तुम्हें ये पता चल ही नहीं सकता था कि मैं कहाँ हूँ,”
“मैंने कहा ना मैं पास ही किसी से मिलने आया था, तुमसे मिलना महज़ इत्तफ़ाक़…”
निमित्त अपनी सफ़ाई पेश कर रहा था लेकिन आरात्रिका ने उसकी बात बीच में ही काट दी।
“झूठ! सरासर झूठ! मैं तुम्हें अच्छे से जानती हूँ एन.के. तुम्हारी आँखें देखी हैं मैंने। आम-तौर पर तुम्हारी पलकें नहीं झपकती, लेकिन जब तुम झूठ बोलने की कोशिश करते हो तब तुम्हारी पलकें बहुत ज़्यादा झपकती हैं,” आरात्रिका निमित्त की आँखों में देखते हुए बोली।
निमित्त एक-टक उसे देख रहा था जैसे समझने की कोशिश कर रहा हो कि अपनी बात किस तरह रखे।
“तुम्हारे पास वक्त बहुत कम है अरात्रिका। तुम मरने वाली हो,” आख़िरकार निमित्त ने उसकी आँखों में देखते हुए सर्द भाव से कहा।
आरात्रिका का चेहरा डर से सफ़ेद पड़ गया। उसने निमित्त से दूर होते हुए अपने कदम पीछे लिए।
“यू सिक फ़किंग बास्टर्ड! तुम मुझे यहाँ मारने आए हो!! गेट आउट फ़्रॉम हीयर…”
“मेरी बात सुनो अरात्रिका..”
“आई सेड गेट द हेल आउट ऑफ़ माई हाउस वरना मैं शोर मचाऊँगी!”
“दिवाली का टाइम है अरात्रिका। बाहर हो रहे शोर में किसी को तुम्हारी चीख सुनाई नहीं देगी,” इस बार निमित्त की आवाज़ बर्फ़ से ज़्यादा ठंडी थी।
“म…मैं पुलिस को क..कॉल करूँगी,” काँपती हुई आरात्रिका ने हिम्मत दिखाने की भरसक कोशिश करते हुए कहा।
“इतना समय तुम्हारे पास नहीं है अरात्रिका,” निमित्त अपनी जगह से उठ कर आरात्रिका की ओर बढ़ा।
“डोंट यू डेयर कम एनी क्लोजर!“ आरात्रिका चीखते हुए पीछे हटी। निमित्त स्थिर कदमों से उसकी ओर बढ़ा।
पीछे हटती आरात्रिका की पीठ बुक शेल्फ से टकराई। उसकी भयभीत नज़रें अपनी ओर बढ़ते निमित्त पर जमी हुई थीं। उसके टटोलते हाथ अपने बचाव के लिए कोई चीज़ बुक शेल्फ पर ढूँढ रहे थे जब उसकी उँगलियाँ ग्रीक पॉट से टकराईं जिसे कुछ देर पहले निमित्त उलट-पलट कर रहा था।
“एन.के. स्टॉप ऑर आई विल हिट यू,” आगे बढ़ते निमित्त को चेतावनी देते हुए आरात्रिका ने पॉट उठा लिया।
पॉट उठाते ही उसे एहसास हुआ कि पॉट के अंदर कुछ रखा हुआ है। यह बात अजीब थी क्योंकि आरात्रिका ने उसमें कुछ भी नहीं रखा था। सशंकित आरात्रिका ने अपना हाथ पॉट में डाला। उसका हाथ किसी अजीब सी चीज़ से टकराया। जब उसका काँपता हाथ पॉट से बाहर निकला तो उसमें मकई के छिलके और फूस से बनी एक ‘कॉर्न हस्क डॉल’ थी। उस डॉल पर कटे हुए बालों की लटें लपेटी हुई थीं जिन्हें आरात्रिका अच्छी तरह पहचानती थी। आरात्रिका को यूँ लगा जैसे उसके जिस्म में एक कतरा भी जान बाक़ी नहीं है और वो वहीं फ़र्श पर गिर के बिखर जाएगी। उसके एक हाथ में हस्क डॉल यूँ थमी थी जैसे उसके हाथ से चिपक गयी हो जब कि दूसरे हाथ में थमा पॉट छूट कर फ़र्श पर जा गिरा और चार लाख का मर्तबान पलक झपकते चकनाचूर हो गया।
आरात्रिका को जैसे कोई सुध-बुध ना रही थी। उसका दिमाग़ अतीत की यादों में डूब गया था। उस समय में जब आरात्रिका अपने कॉलेज फ़ाइनल ईयर में थी और पिछले चार सालों से निमित्त को डेट कर रही थी।
“हमारे पास अब और टाइम नहीं है निमित्त। मेरी पढ़ाई अब ख़त्म होने को है,” आरात्रिका उलझनपूर्ण भाव से बोली।
“हम्म, आगे क्या सोचा है?” आरात्रिका के लम्बे खुले बालों की पेंटिंग बनाने में व्यस्त निमित्त ने लापरवाही से सवाल किया।
“आगे क्या सोचा है? ये तुम मुझ से पूछ रहे हो निमित्त? तुम्हें नहीं लगता कि ये सवाल मुझे तुमसे करना चाहिए?” आरात्रिका अपनी जगह से उठते हुए बोली।
“ऐ…पोज़िशन मत चेंज करो यार! पेंटिंग ख़राब हो जाएगी। जैसे बैठी थी वैसे ही बैठो, अपने लम्बे बालों को कंधे पर लहराते हुए। बी ए गुड म्यूज। किसी आर्टिस्ट की म्यूज बनना मज़ाक़ नहीं होता,”
आरात्रिका के लम्बे बालों में निमित्त की जान बसती थी। निमित्त का पूरा ध्यान आरात्रिका की ख़ूबसूरती को अपने कैन्वस पर क़ैद करने में था। आरात्रिका के मन में मची उथल-पुथल से या तो निमित्त अंजान था या फिर जानते हुए भी अंजान बना हुआ था।
“मुझे तुम्हारी म्यूज नहीं, तुम्हारी लाइफ़ पार्ट्नर बन कर ज़िंदगी बितानी है निमित्त,”
“हाँ तो बिताओ, उसमें क्या प्रॉब्लम है?”
“कैसे? तुम्हें अपने पेरेंट्स से कैसे इंट्रोडयूस करूँ? मॉम-डैड, ये निमित्त है। मुझसे कॉलेज में चार साल सीन्यर था। हम पिछले चार साल से एक-दूसरे को डेट कर रहे हैं और एक-साथ रहना चाहते हैं…पूरी लाइफ़, बट प्रॉब्लम ये है कि निमित्त जॉब नहीं करता…नहीं…नहीं…इसलिए नहीं कि नाकारा है। कॉलेज में अपने बैच का टॉपर था, गोल्ड मेडलिस्ट, लेकिन जनाब को लगता है कि जॉब करना किसी की ग़ुलामी करना होता है। गले में कम्पनी और बॉस के नाम का पट्टा डालना होता है…इसलिए जनाब जॉब नहीं करते,” आरात्रिका सार्कैस्टिक टोन में बोली।
“यार जॉब करना ही इंसान की ज़िंदगी का उद्देश्य नहीं होता। हमारी फ़ैमिली, हमारी सोसाइटी हमें बचपन से ही कंडिशन करते हैं…पढ़ो ताकि अच्छी जॉब करो, अच्छी जॉब करो ताकि अच्छी शादी हो, फिर बच्चे फिर उनकी रेस्पॉन्सिबिलिटी, जिसे उठाने के लिए और गधा मज़दूरी करो। एक आम-इंसान का लाइफ़ गोल ये होता है अरात्रिका, मेरा नहीं!”
“जिसे आप आम इंसान का लाइफ़ गोल बता रहे हैं ना मिस्टर, उसे फ़ैमिली की रेस्पॉन्सिबिलिटी उठाना कहते हैं,”
“ऐ…तुम ऐसे बोल रही हो जैसे मैं कोई काम नहीं करता,” निमित्त ने आहत भाव से शिकायत की।
“जब दिल आया सामान पैक कर के सफ़र पर निकल जाना, फ़ॉरनर्स के साथ जहाँ-तहाँ हिप्पी बने घूमना, कभी पेंटिंग बनना, कभी कहानियाँ लिखना, कभी योगा और प्राणिक हीलिंग सिखाना…इसको काम नहीं कहते निमित्त,”
“इग्ज़ैक्ट्ली! इसको काम नहीं कहते अरू, इसे ज़िंदगी जीने का ढंग कहते हैं। मुझे ऐसे ही जीना पसंद है,”
“वेरी गुड…बहुत बढ़िया…क्या कहने! इतना सुनने के बाद अगर मेरे माँ-बाप ने मुझे ज़िंदा छोड़ दिया तो फिर मैं उन पर दूसरा न्यूक्लियर बम गिराऊँगी…कि जनाब निमित्त जी महाराज सारी ज़िंदगी मेरे साथ तो रहना चाहते हैं…लॉयल भी हैं, किसी दूसरी लड़की की ओर आँख उठा कर भी नहीं देखते लेकिन ये मुझसे शादी नहीं करेंगे बीकज़ ही इज़ टोटली अगेन्स्ट मैरिज!”
“यार अरू, तुझे पता है ये शादी-ब्याह के चोंचले मुझसे नहीं होते। लाइफ़ से रोमैन्स चला जाता है…तूने आज तक लाइफ़ में एक भी मैरिड कपल देखा है जो एक-दूसरे के साथ खुश हो?”
“होने वाले होते ही हैं!”
“अबे कोई नहीं होता! सिर्फ़ या तो एक-दूसरे से ज़रूरत के लिए जुड़े होते हैं या फिर दुनिया और समाज के डर से। साथ उसके रहना चाहिए जिससे प्यार हो और तब तक रहना चाहिए जब तक दोनों का प्यार बरकरार हो…इसके अलावा सब ढकोसला है,”
“इतने के बाद या तो मेरे पेरेंट्स हार्ट अटैक से खुद मर जाएँगे या ज़हर दे कर मुझे मार देंगे,”
“मुझे लाइफ़ तेरे साथ बितानी है तेरे पेरेंट्स के साथ नहीं,”
“क्या किसी ने कभी तुम्हें बताया है निमित्त कि तुम बहुत ही वाहियात इंसान हो?” आरात्रिका खिज कर बोली।
“हाँ तो? पैदाइशी हुनर है पर कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त पेंटिंग बनाते हुए निर्विकार भाव से बोला।
“यार निमित्त इतने डिल्यूज़नल कैसे हो सकते हो तुम? तुम्हें समझ क्यों नहीं आ रहा कि जिन बातों से तुम्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता उनसे मुझे बहुत ज़्यादा फ़र्क़ पड़ता है। मैं तुम्हारी तरह अपने माँ-बाप, परिवार, समाज, सबको ताक पर नहीं रख सकती, मेरे लिए ये सब ज़रूरी हैं,”
“ये बात तुम्हें मेरे साथ रिलेशनशिप में आने से पहले सोचनी चाहिए थी अरू! मैं तो आज भी वही हूँ जो मैं पहले था और मैं हमेशा यही रहूँगा। मैंने लाइफ़ को लेकर अपनी विचारधारा तुम्हें शुरू में ही बता दी थी, तुम्हें कभी धोखे में नहीं रखा,’
“तुम ना…इंसान के रूप में चलते-फिरते ड्रग्स हो! तुम्हारी लत बहुत तेज़ लगती है और तुम्हारा नशा सर चढ़ कर बोलता है…सामने वाला हाई में रहता है लेकिन फिर धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि तुम उसकी सेहत के लिए कितने बुरे हो पर तब तक वो तुम्हारा इतना आदी हो चुका होता है कि ना तुम बर्दाश्त होते हो और ना ही तुमसे दूर रहते बनता है,” आरात्रिका की भावनाएँ निमित्त के बेपरवाह रवैए से आहत हुई थीं। उसे लगा कि निमित्त उसे समझेगा…या एट लीस्ट समझने की कोशिश करेगा।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला और ब्रश स्ट्रोक्स से पेंटिंग में आरात्रिका के लम्बे बालों की लटों में हाईलाइट देने लगा।
आरात्रिका की आँखें डबडबा गयीं। उसके अंतर्मन में असहाय होने की जो टीस उस पल में उठी थी उसका एहसास वो निमित्त को कराना चाहती थी लेकिन वो निमित्त को इतना तो जानती थी कि भावनाएँ चाहे कोई भी हों उन्हें महसूस कराने के लिए निमित्त के लिए सिर्फ़ शब्द नाकाफ़ी होते हैं। आरात्रिका ने इधर-उधर नज़र घुमाई, निमित्त के आर्टिस्ट टूल बैग में उसे एक कैंची रखी दिखाई दी। उसने आव देखा ना ताव, फ़ौरन कैंची उठाई और अपने लम्बे बालों को काट कर कंधे तक छोटा कर दिया। निमित्त के चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे उसने आरात्रिका को कैंची अपने पेट में घोंपते देख लिया हो। वो पागलों की तरह चीखा।
“ये क्या किया??!!” निमित्त का पूरा शरीर काँप रहा था। फ़र्श पर बिखरे आरात्रिका के कटे बालों पर जड़वत उसकी आँखें सुर्ख़ लाल हो गयीं और आँसू यूँ गिरे जैसे तेज़ाब बह निकला हो।
“अब तुम्हें एहसास हुआ निमित्त कि कैसा फ़ील होता है जब कोई हमसे वो छीनता है जिससे हम जान से ज़्यादा प्यार करते हैं? बिना इस बात की परवाह किए कि हम पर क्या बीतेगी!”
निमित्त के जबड़े भिंचे हुए थे, मुट्ठियाँ कसी हुई थीं, सुलगते अंगारों सी सुर्ख़ आँखों में अनगिनत भाव लिए निमित्त आरात्रिका की ओर बढ़ा। एक पल को आरात्रिका को लगा कि निमित्त उस पर हाथ उठाने वाला है। वो अपनी जगह से हिल भी ना पायी। शिकारी के जाल में फँसी असहाय हिरणी के मानिंद आरात्रिका ने अपनी आँखें भींच लीं।
दो मज़बूत बाहों ने आरात्रिका के समूचे अस्तित्व को अपने आग़ोश में समेट लिया। निमित्त की गर्म साँसें आरात्रिका के माथे से टकरा रही थीं, उनकी झुलस का एहसास होने से पहले वहाँ आंसुओं की दो बूँदें गिरी। निमित्त का बेक़ाबू हो कर धड़कते विद्रोही दिल की हर एक धड़कन की चोट आरात्रिका को अपने गले पर लगती महसूस हो रही थी।
“तुम्हारे बिना जी नहीं सकता, मर जाऊँगा जैसी बकवास फ़िल्मी बातें मुझे करना नहीं आता आरात्रिका लेकिन तुम्हारे बिना जीना पड़ा तो भी कोई दिन ऐसा नहीं होगा जिसमें तुम्हारे ना होने की घुटन मुझे मारने का एहसास ना कराए,” निमित्त भर्राए गले से बोला।
“वाहियात आदमी हो तुम…बिल्कुल वाहियात!” आरात्रिका ने सुबकते हुए कहा और खुद को निमित्त की बाहों में ढीला छोड़ दिया।
“कभी घमंड नहीं किया!”
उस पल में आरात्रिका चाह कर भी खुद को खिलखिलाने से ना रोक पायी।
निमित्त फ़र्श पर बिखरे आरात्रिका के कटे बालों को बहुत एहतियात से समेट कर अपने लेदर स्लिंग बैग में रखने लगा।
“ये क्या कर रहे हो?”
“तुम्हारी मुझसे अनरीयलिस्टिक एक्स्पेक्टेशन्स और मेरे क्वेस्चनेबल रैंडम लाइफ़ डिसिज़न्स को देखते हुए लगता है कि जल्द ही जल्द ही हमारी राहें अलग होंगी,”
“ओ-हो-हो-हो, वाह रे मिस्टर रोमियो! मुझसे अलग हो कर जनाब मेरे कटे बालों से ताउम्र इश्क़ लड़ाएँगे लेकिन जब साथ हैं तो मुझे हमेशा के लिए अपना बनाने का एफ़र्ट नहीं लगाएँगे, है ना?” आरात्रिका ने सार्कैस्टिक टोन में कहा।
उसकी बात पर निमित्त मुस्कुराया।
“मैं जो नहीं हूँ वो नहीं बन सकता अरू। मैं तुम्हारी और बाक़ी लोगों की तरह प्रैक्टिकल नहीं हूँ…अगर कोशिश भी करूँगा तो प्रिटेंशियस हो पाऊँगा मगर प्रैक्टिकल नहीं। अब खुद सोचो, क्या अपनी सारी लाइफ़ तुम किसी ऐसे आदमी के साथ बिताना चाहती हो जो असली नहीं है…सिर्फ़ प्रिटेंड कर रहा है? वो होने का नाटक कर रहा है जो वास्तव में वो कभी नहीं हो सकता,”
आरात्रिका ने कोई जवाब ना दिया। वो जानती थी कि निमित्त को बदलना नामुमकिन था।
“और किसने कहा कि मैं तुम्हारे बाल तुम्हारे जाने के बाद ग़म में इश्क़ लड़ाने के लिए समेट रहा हूँ,” निमित्त के चेहरे की मुस्कान वापस आयी।
“तो फिर?”
“आज से कई साल बाद जब तुम मुझे भुला कर अपने मन-पसंद के किसी प्रैक्टिकल लाइफ़ पार्ट्नर के साथ अपनी हंसती-खेलती ज़िंदगी गुज़ारने के सपने बुनोगी तब ये बाल काम आएँगे….तुम्हारी वूडू डॉल बनाने के! इसी डॉल से तुम्हें कंट्रोल कर के दोबारा अपना बनाऊँगा मैं,” निमित्त की आँखों में शरारत थी।
उस पल में आरात्रिका का दिल जानता था कि चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए, निमित्त ऐसा कभी नहीं करेगा।
“यू नो, निमित्त….वाहियात इंसान हो यार तुम! बिल्कुल आला दर्जे के बेहूदा और वाहियात,”
“कभी घमंड नहीं किया!”
आरात्रिका की यादों का रेला एक झटके से रुक गया। दो मज़बूत बाहें उसके अस्तित्व को अपने आग़ोश में समेट रही थीं। बहुत साल बीत गए थे, लेकिन अपने माथे पर पड़ती अन गर्म सासों की तपिश आरात्रिका आज भी पहचानती थी।
बीते दिनों की यादों में डूबी आरात्रिका कुछ पल के लिए भूल गयी थी कि उसका खूबसूरत भूतकाल एक भयावह प्रेत छाया बन कर उसके वर्तमान पर ग्रहण लगाने आया है। आरात्रिका के जिस्म ने ज़ोर की झुरझुरी ली। उसने पूरी ताक़त लगा कर निमित्त को खुद से परे धकेल दिया।
“दूर रहो मुझसे! मैं तुम्हारी कभी नहीं हो सकती निमित्त। आई टोल्ड यू आई एम मैरिड,” आरात्रिका काँपते स्वर में बोली।
“नो यू आर नॉट! आई नो यू वर लाइंग,” उससे अलग होता निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
आरात्रिका ने निमित्त की आँखों में देखा। वो जानती थी कि निमित्त उसका हर झूठ पकड़ लेता है…आज भी।
“अपने घर की पहली दिवाली के लिए ट्रेडिशनल गेट-अप में तैयार हुई हो लेकिन तुम्हारी माँग में सिंदूर नहीं है, ना ही गले में मंगलसूत्र है और ना ही पैरों में बिछिया। मुझे पता है ये ट्रेडिशन, ये कस्टम तुम्हारे लिए कितने मायने रखते हैं। अगर तुम वाक़ई मैरिड होती तो इन चीजों के बिना कभी तैयार नहीं होती,”
“ह…हम जल्द ही शादी करने वाले हैं..म..मेरे पेरेंट्स को भी पता है युवान के बारे में,” आरात्रिका जैसे सफ़ाई देते हुए बोली।
“ऑब्वीयसली। अपने पेरेंट्स के कन्सेंट के बग़ैर तुम अपना लाइफ़ पार्ट्नर कभी नहीं चुनोगी ये बात मुझ से बेहतर कौन जानता है,”
“निमित्त प्लीज़…हमारा चैप्टर ओवर हो गया है,”
“तुम मुझे जानती हो अरात्रिका। मुझे पढ़ी हुई किताबें दोबारा पड़ने की आदत है। मेरे लिए कभी कोई चैप्टर ओवर नहीं होता,”
“तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते निमित्त। मैं युवान के साथ हूँ…युवान किसी भी मिनट वापस आता होगा। तुम अपनी ख़ैर मनाओ और युवान के आने से पहले यहाँ से चले जाओ वरना अगर युवान आ गया तो तुम्हारी इस हरकत पर तुम्हारा वो हाल करेगा जो तुम सोच भी नहीं सकते,” आरात्रिका निमित्त को चेतावनी देते हुए बोली।
“युवान नहीं आएगा अरात्रिका। युवान अब कभी वापस नहीं आएगा,” निमित्त की आवाज़ इतनी सर्द थी कि उसका एक-एक लफ़्ज़ आरात्रिका की रीढ़ में सिहरन पैदा कर गया।
“क…क्या किया है तुमने युवान के साथ…यू सन ऑफ़ ए बिच…वॉट हैव यू डन?” आरात्रिका पागलों की तरह चीखी।
निमित्त ने कोई उत्तर ना दिया। वो फिर से आरात्रिका की ओर बढ़ा।
“मैं तुम्हारी कभी नहीं हो सकती निमित्त,” आरात्रिका ने चीखते हुए हाथ में थमी कॉर्न हस्क डॉल के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
“नोsss…” निमित्त पहली बार ग़ुस्से में चिल्लाया। निमित्त के जबड़े भिंचे हुए थे, मुट्ठियाँ कसी हुई थीं, सुलगते अंगारों सी सुर्ख़ आँखों में अनगिनत भाव लिए निमित्त आरात्रिका की ओर बढ़ा।
आरात्रिका पलटी और सीढ़ियों से ऊपर की तरफ़ भागी जो उसके और युवान के बेडरूम को जाती थी।
“आरात्रिका रुक जाओ! एक बार मेरी बात सुनो!” निमित्त चिल्लाते हुए आरात्रिका के पीछे आया।
आरात्रिका सीढ़ियों पर बेतहाशा भागती हुई ऊपर पहुँची लेकिन कुछ देख कर उसकी रफ़्तार को लगाम लग गयी। उसके बेडरूम से खून से सने कदमों के निशान बाहर निकलते दिखाई दे रहे थे। आरात्रिका का दिल उसके मुँह को आने लगा। बहुत मुश्किल से वो बेडरूम तक पहुँची। पूरा बेडरूम उथल-पुथल हुआ हुआ था। वहाँ सारा सामान बिखरा पड़ा था। डबल बेड पर बिछी पर्ल वाइट बेडशीट खून सोख कर सुर्ख़ सराबोर थी। उसी खून से सने कदमों के निशान बाहर तक जा रहे थे।
“य..ये कैसे हो सकता है। म…मैंने तो बेडरूम सजाया था…य…ये खून किसका है…युवान कहाँ है?” आरात्रिका खुद में बुदबुदायी।
अब तक निमित्त उसके पीछे आ चुका था। उसने आहिस्ता से अपना हाथ आरात्रिका की बाँह पर रखा।
“मैं तुम्हें सब समझाता हूँ अरात्रिका, मेरे साथ आओ,” निमित्त ने पीछे से आरात्रिका को अपनी बाहों के घेरे में कसते हुए बैक-हग किया। इस बार आरात्रिका ने प्रतिवाद ना किया। वो जैसे कोई निर्जीव वस्तु बन चुकी थी। उसके शरीर में अब जान नहीं थी लेकिन उसके दिमाग़ में विचारों की आंधियाँ कौंध रही थीं।
निमित्त बैक-हग किए हुए ही आरात्रिका को वापस सीढ़ियों की ओर लाने लगा।
“जानते हो निमित्त आज छोटी दिवाली है। कल की दिवाली का मैं कितनी बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी ये मैं बता नहीं सकती। कल मैं और युवान अपने घर में एक-साथ पहली लक्ष्मी पूजा करने वाले थे,” आरात्रिका पागलों के मानिंद खुद में बड़बड़ा रही थी। निमित्त कुछ ना बोला।
“जानते हो निमित्त छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी क्यों कहते हैं? आज के दिन घर से एक यम दिया क्यों निकालते हैं?”
निमित्त ने कोई जवाब नहीं दिया। आरात्रिका आगे बोलती रही।
“मेरी माँ कहती हैं कि घर के सभी लोगों के नाम से आटे और सरसों तेल का एक यम दिया आज निकालने से घर के लोगों की प्राण रक्षा होती है, उन पर असमय मृत्यु नहीं आती। आज के दिन नरक के द्वार खुलते हैं और नरक के सारे शैतान धरती पर विचरते हैं। जिस घर के बाहर यम दिया ना जल रहा हो वहाँ नरक का कोई शैतान मृत्यु ले कर आता है। मैं यम दिया निकाल रही थी…युवान के और अपने लिए…हमारी ख़ुशियों के लिए…पर वो दिया बुझ गया…फिर मुझ पर ग्रहण जैसी किसी की छाया पड़ी…और दक्षिण से तुम आए…नरक के शैतान बन के…मृत्यदूत बन के। तुम मेरी ख़ुशियों को खा गए निमित्त…तुम मेरी ख़ुशियों का खा गए…” आरात्रिका फूट-फूट कर रोने लगी।
निमित्त की पकड़ एक पल के लिए आरात्रिका पर ढीली हुई। आरात्रिका ने पलट कर निमित्त को सीढ़ियों पर ज़ोरदार धक्का दिया। उसकी इस अप्रत्याशित हरकत के लिए निमित्त तैयार नहीं था, वो अपना संतुलन बनाए ना रख सका और सीढ़ियों से नीचे लुढ़कता चला गया। आरात्रिका भी सीढ़ियों से नीचे की ओर भागी। वो फ़ौरन निमित्त की पहुँच से दूर, घर से बाहर भाग जाना चाहती थी। आरात्रिका ने घर का बंद दरवाज़ा खोलने की कोशिश की पर दरवाज़ा नहीं खुला। ये कैसे हो सकता था? निमित्त उसके घर के दरवाज़े कैसे लॉक कर सकता था?
आरात्रिका को चक्कर आने लगे। उसका दिमाग़ उसे अंधेरे में डूबता जान पड़ रहा था। सीढ़ियों से गिर निमित्त अब तक संभल चुका था और आरात्रिका की ओर बढ़ रहा था। आरात्रिका को कुछ समझ ना आया। वो स्टडी की ओर भागी। निमित्त भी उसके पीछे आया।
“आरात्रिका वहाँ जाने से पहले मेरी बात सुनो!” निमित्त चीखा।
आरात्रिका ने निमित्त की बात पर कोई ध्यान ना दिया। उसने स्टडी का बंद दरवाज़ा खोला तो अंदर भरा गाढ़ा धुआँ उसके नथुनों से टकराया। अंदर कहीं आग लगी थी। डरते कदमों से आरात्रिका अंदर दाखिल हुई। उसकी आँखों के सामने जो दृश्य था वो उसके सबसे भयंकर दुस्वप्न से भी अधिक भयावह था।
स्टडी में फ़्लोर पर आरात्रिका ने खुद को पड़ा देखा। वो सिर्फ़ ब्लाउज़ और साड़ी शेपवीयर में थी। उसकी सिल्क साड़ी उससे कुछ दूरी पर खुली धूँ-धूँ कर जल रही थी और उसकी आग स्टडी में लगे पर्दों तक पहुँच चुकी थी। फ़र्श पर पड़ी आरात्रिका की कलाई की नस कटी हुई थी और काफ़ी सारा खून फ़र्श पर बिखरा हुआ था। उस खून में बने नंगे पैरों के निशान थे। इससे ज़्यादा बर्दाश्त कर पाना आरात्रिका के बूते में नहीं था। उसका शरीर कटे पेड़ सा नीचे गिरने लगा। दो मज़बूत बाहों ने उसे फ़र्श से टकराने से पूर्व थाम लिया और ठंडे पड़ते उसके जिस्म को अपने गर्म आग़ोश में भर लिया।
“निमित्त…मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा…क्या हो रहा है?” आरात्रिका रुआंसी होते हुए बोली।
“तुम्हारा दिमाग़ तुम्हें ट्रॉमा से प्रोटेक्ट करने के लिए एक ऑल्टरनेट रीऐलिटी गढ़ रहा है अरात्रिका, ताकि तुम उस मृत्यु तुल्य पीड़ादायक घटना को याद ना कर पाओ लेकिन तुम्हारा उस घटना को याद करना आवश्यक है। याद करने की कोशिश करो अरात्रिका…आज शाम मेरे आने से पहले क्या हुआ था?” आरात्रिका को अपनी बाहों में भरे फ़र्श पर बैठे निमित्त ने उसके कान में फुसफुसा कर कहा।
“मैं युवान के आने का वेट कर रही थी और यम दिया निकालने की तैयारी कर रही थी…”
“नहीं…उससे पहले। युवान के घर से जाने से पहले क्या हुआ था अरात्रिका?”
आरात्रिका ने अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालने की कोशिश की, उसे कुछ याद नहीं आ रहा था।
“कोशिश करो अरात्रिका। याद करो! क्या हुआ था आज शाम,” निमित्त निर्देशात्मक अन्दाज़ में बोला।
आरात्रिका के मस्तिष्क में जैसे सैकड़ों फुलझड़ियाँ और अनार एक-साथ छूटने लगे।
“आज शाम म…मैं बहुत खुश थी। युवान के लिए तैयार हो रही थी। युवान मेरे लिए ये साड़ी लाया था और साउथ-सी पर्ल नेकलेस। मैं गाना गुनगुना रही थी,”
“मोर गोरा अंग लेई ले, मोहे श्याम रंग देई दे…”
“ह..हाँ…मैंने केस से नेकलेस निकाला तो उसके साथ ही इन्वॉइस स्लिप बाहर गिरी। मैं उसे सम्भाल कर वापस रख रही थी पर कुछ देख कर रुक गयी। पर्चेस स्लिप में दो साउथ-सी पर्ल नेकलेस का प्राइस और डिटेल थे। युवान ने एक जैसे दो नेकलेस ख़रीदे थे। एक मेरे लिए, और एक…”
“और एक..?”
“मुझे पिछले कुछ महीनों से लग रहा था कि युवान और मेरे बीच कोई तीसरा आ गया है, मैंने कई बार युवान से बात करने की कोशिश भी की लेकिन उसने हर बार इससे डिनाई किया और उल्टा मुझे ही इन्सिक्योर, सिनिकल और जाने क्या-क्या बोलता रहा। हमारे कॉमन फ़्रेंड्ज़ को भी मैंने कई बार पीठ-पीछे बात करते सुना था कि युवान का अफ़ेयर उसकी बिज़्नेस पार्ट्नर के साथ चल रहा है। कुछ दोस्तों ने मुझे इनडाईरेक्ट हिंट किया पर हर बार युवान इस बात से इनकार करता और मुझे शक्की बता कर गैसलाइट करता और गिल्टी फ़ील करवाता,”
“लेकिन जब तुमने पर्चेस स्लिप के साथ उसे कन्फ़्रंट किया तो वो अपना अफ़ेयर डिनाई नहीं कर पाया,”
“ऑन द कॉंट्रेरी, वो अफ़ेयर डिनाई करना ही नहीं चाहता था। इसने कहा कि ये नेकलेस उसका मुझे पार्टिंग गिफ़्ट है। वो मुझसे ब्रेक-अप कर रहा है और अपनी बिज़्नेस पार्ट्नर के साथ अपना रिलेशनशिप दिवाली वाले दिन ऑफ़िशियली अनाउन्स करने वाला है। उसने कहा कि वो अपनी बिज़्नेस पार्ट्नर के साथ बेटर फ़्यूचर एंड लाइफ़ प्रॉस्पेक्ट्स देखता है…हम दोनों की कम्पैटिबिलिटी उसके सामने काफ़ी ऐव्रेज है। उसने कहा कि वो अपनी पार्ट्नर के घर जा रहा है, मेरे पास सिर्फ़ सुबह तक का टाइम है यहाँ से अपना सब कुछ समेट कर उसका घर ख़ाली करने का,”
“फिर क्या हुआ?”
“मुझसे ये ह्यूमिलीएशन और बिट्रेयल बर्दाश्त नहीं हुआ। हमारा बेडरूम में बड़ा झगड़ा हुआ। मैंने कहा ये सिर्फ़ उसका घर नहीं है, मैंने इस घर में अपना आत्मा लगाई है। मैं रोई, गिड़गिड़ायी, मिन्नतें की पर वो मुझे छोड़ कर चला गया,” आरात्रिका फफक कर रो पड़ी।
निमित्त की बाहों का कसाव उसपर और बध गया, निमित्त उसके माथे, उसके बालों को चूमने लगा।
“युवान के जाने के बाद क्या हुआ अरात्रिका?”
“मुझसे अपना अस्तित्व बर्दाश्त नहीं हो रहा था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपने पेरेंट्स से क्या कहूँगी, उन्हें कैसे फ़ेस करूँगी। मैंने नाइफ़ उठाई और अपनी रिस्ट स्लिट कर ली,”
“फिर?”
“मेरा खून चारों तरफ़ मेरे टूटे सपनों की तरह बिखर रहा था। फिर मुझे तुम्हारी याद आयी…मैंने तुम में और बेटर एंड सिक्योर्ड फ़्यूचर में से दूसरा ऑप्शन चुना…आज मेरे पार्ट्नर ने भी मेरे साथ ठीक वही किया। मैं मरने से पहले तुम से माफ़ी माँगना चाहती थी..तुमसे और अपने पेरेंट्स से। इन द एंड मैं किसी की ख़ुशी नहीं चुन पायी, ना उनकी, ना अपनी और ना तुम्हारी,”
“शशशsss…डोंट बी हार्ड ऑन योरसेल्फ़,”
“मुझे लगा इस तरह मर गयी तो मर के भी सुकून नहीं मिलेगा…आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी। मैं बची हुई हिम्मत जुटा कर बेडरूम से निकली और ब्लीडिंग रोकने के लिए किचेन में गयी। मैं सिंक में पानी के नीचे खून धो रही थी…बाहर बच्चे पटाखे चला रहे थे। मेरा दिमाग़ यूँ अंधेरे में डूब-उतर रहा था जैसे मैं नशे में हूँ। एक जलता रॉकेट खुली खिड़की से किचेन के अंदर आ गया। मैं बेसुध थी। मुझे पता नहीं चला कब उसकी चिंगारी मेरी साड़ी पर जा लगी। मैं फ़र्स्ट-एड का सामान लेने स्टडी तक आयी। स्टडी का ऑटमैटिक डोर मेरे पीछे बंद हो गया। अंदर आने पर मुझे एहसास हुआ कि मेरी साड़ी में आग लगी हुई है। मैंने साड़ी खुद से बहुत मुश्किल से अलग की पर अब खुद को सम्भालने की जान मुझ में नहीं बची थी। मैं वहीं गिर गयी,” फ़र्श पर पड़े अपने जिस्म की ओर देखते हुए आरात्रिका ने कहा। उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
“एक्सेसिव ब्लड लॉस और आग व धुएँ की वजह से ऑक्सिजन लेवल कम होने के कारण एसफ़िक्सिया से तुम्हारा दिमाग़ कोमा में चला गया। तुम्हारे दिमाग़ ने तुम्हें आज शाम के ट्रॉमैटिक इन्सिडेंट से प्रोटेक्ट करने के लिए एक ऑल्टरनेट नैरेटिव तैयार किया। अपनी लाइफ़ के लास्ट मोमेंट में तुम खुद को यम दिया निकालते और युवान के वापस आने का वेट करते देख रही हो,”
“क्या मैं मर रही हूँ?…या मर चुकी हूँ?” आरात्रिका की आवाज़ काँपी।
निमित्त ने जवाब ना दिया, बस उसे अपनी बाहों में समेट लिया।
“मुझे मरना नहीं है निमित्त,”
“मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा,”
“मौत को कैसे रोकोगे निमित्त? तुम भगवान नहीं हो,”
“तुम मेरे इन्फ़्लेटेड सेव्यर सिंड्रोम, सेल्फ़ अब्सेशन और हायटेंड सेल्फ़ वर्थ के डिल्यूज़न को काफ़ी अंडरएस्टिमेट कर रही हो अरू। पूरा तो नहीं…पर मैं थोड़ा सा भगवान हूँ,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“मुझे यूँ ही थामे रखोगे?”
“येप्प,”
“सारी रात?”
“येप्प,”
“सारी ज़िंदगी?”
“सिर्फ़ तुम्हारी ज़िंदगी की अगली सुबह तक,”
“सुनो…”
“येप्प,”
“तुम बहुत ही वाहियात इंसान हो..”
“कभी घमंड नहीं किया,”
आरात्रिका ने अपने समूचे अस्तित्व को निमित्त के आग़ोश में समेट दिया…नरक चतुर्दशी की उस रात, दक्षिण से आए उस ग्रहण में। फिर चारों ओर अंधेरा छा गया।
“मिस आरात्रिका साहा…क्या आप मुझे सुन सकती हैं? अगर हाँ तो अपनी पलकें धीरे से झपकाइए,”
आरात्रिका के कानों में एक अजनबी आवाज़ पड़ी। उसने अपनी पलकें झपकायीं।
“शी इज़ आउट ऑफ़ डेंजर नाउ,” उस अजनबी आवाज़ ने किसी से कहा।
आरात्रिका ने बहुत मुश्किल से अपनी गर्दन घुमाई। वो हॉस्पिटल के आई.सी.यू. में थी। डॉक्टर उसके माता-पिता से कह रहा था। उसकी माँ उसे देख कर सिर्फ़ रोए जा रही थीं, उसके डैड डॉक्टर को धन्यवाद दे रहे थे।
“इस धन्यवाद का हक़दार मुझसे और हमारी मेडिकल टीम से पहले वो शख़्स है जिसने कल समय रहते आरात्रिका के मोबाइल से हॉस्पिटल कॉल कर के ऐम्ब्युलेन्स बुला ली। अगर थोड़ी भी देर हो जाती तो आरात्रिका का बचना नामुमकिन था,” डॉक्टर ने कहा।
“पर वो है कौन? वो कमीना युवान तो मेरी बेटी को मारने के लिए अकेला छोड़ गया। किसने कॉल किया आप लोगों को?” आरात्रिका के डैड ने सवाल किया।
“वी डोंट नो! जब मेडिकल टीम पहुँची तब वहाँ सिर्फ़ आरात्रिका थी,”
आरात्रिका ने अपनी आँखें बंद की तो दो बूँद आँसुओं की उसके गालों पर ढलक गयी। आज दिवाली थी। उसके जीवन की अमावस्या में भी एक ग्रहण ने आरात्रिका प्रज्ज्वलित कर दी थी।
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Crisis Apparition- The phenomenon where an individual sees or senses the presence of another person, often appearing suddenly and unexpectedly, during a life-threatening or highly stressful situation. This figure often takes on the appearance of a comforting or helpful presence, and is perceived to offer guidance, support, or even warning during moments of extreme physical or emotional crisis.
Crisis apparitions are typically reported in situations where a person feels close to death or in severe distress—such as during an accident, near-drowning, surgery, or a sudden medical emergency. The apparition may appear in various forms: as a loved one, an unknown comforting figure, or even as an animal that seems to assist or calm the individual in distress. People who experience crisis apparitions often report feelings of peace, relief, or a sudden clarity of thought. The experience might feel vivid and realistic to the person, often leaving a lasting impression that feels more real than a typical dream or hallucination.
Explanations for crisis apparitions vary. Some interpretations suggest they may be spiritual, such as guardian angels or spirit guides, while others view them as psychological responses to extreme stress. In psychology, they might be explained by the brain’s survival mechanisms, which can create sensory hallucinations to comfort or help a person cope with overwhelming situations.
Corn Husk Dolls- These dolls are crafted with intent and symbolism, serving not only as simple toys or decorations but as protective charms. Small charms, like beads or feathers, or hairs may be added to the doll to represent additional layers of protection.
These protective dolls are thought to act as guardians, warding off unwanted energy and providing a sense of safety.
In essence, corn husk dolls used for protection carry a dual significance: they are symbols of connection to the earth and agricultural cycles, and they are also created with the intention of guarding the maker, household, or community, bridging practical craftsmanship with deep cultural and spiritual meaning.
