Nimitt kalantri Digest-1

Nimitt kalantri Digest-1

Nimitt kalantri Digest-1

To Obtain Something, Something of equal value must be lost.

To Obtain Something, Something of equal value must be lost.

“शश श ssss…चुप हो जा स्कैली, सुनने की कोशिश कर,” 

उन्नीस साल का निमित्त झुँझला कर यूँ हवा में हाथ हिलाता हुआ बोला जैसे ख़ुद से बात कर रहा हो।  

निमित्त गंगा की उठती-गिरती लहरों में अपनी घुटी सिसकियों की आवाज़ दबाने की भरसक कोशिश कर रहा था।  

रात के तीन से कुछ ऊपर का समय होगा। उसका अंदाज़ा था शायद दस या पंद्रह मिनट। निमित्त की रिस्ट वॉच तीन बज कर तीन मिनट पर बंद हुई थी। हनुमान घाट पर घुप्प सन्नाटा पसरा हुआ था। उस समय का बनारस आज के इंस्टा रील्स के बनारस से बिल्कुल अलग था। यह बनारस निमित्त को अपने जैसा लगता था। अल्हड़, मदमस्त, अपने भौकाल में जीने वाला, इसे दूसरों के लिए ख़ुद को अजूबा बना कर प्रस्तुत करने की ज़रूरत नहीं थी, बल्कि अपने अलग होने पर गर्व था…बनारस को भी और निमित्त को भी।  इस समय के बनारस में “देर रात” दस बजे तक हो जाया करती थी, आम इंसान अपने घरों को जा कर सो चुके होते। अस्सी से लेकर दशाश्वमेध घाट के बीच सिर्फ़ हरिश्चंद्र घाट ऐसा था जहाँ रात भर जलती चिताओं की रौनक होती, बाक़ी इक्का-दुक्का घाटों पर ही लैंप पोस्ट्स थे जिनके पीले बल्ब बा-मुश्किल यदा-कदा जलते थे। वैसे भी इनके जलने का कोई औचित्य ना था क्योंकि इस समय तक घाटों पर होना “कूल” और “इन थिंग” नहीं हुआ था। रात दस बजे के बाद घाट पर या तो चरसी और गंजेड़ी पाए जाते थे या फिर नागा साधु और अघोरी। इनके अलावा एक प्रजाति आर्टिस्ट्स, दिल टूटे आशिकों और म्यूजिशियंस की थी जो दिल के जज़्बात रंगों, धुनों या आहों में बयान करने एकांत और अंधियारा तलाशते घाटों पर आते, जहाँ सोते हुए कुत्तों और शांत बहती गंगा के अलावा उन्हें देखने सुनने वाला कोई ना हो। निमित्त इनमें से किसी भी श्रेणी में फिट नहीं होता था। फिर भी वो वहाँ था।

“रात आई तो वो जिनके घर थे, वो घर को गए सो गए, रात आई तो हम जैसे आवारा फिर निकले राहों में और खो गए…” उसका गला रूँधा हुआ था। शरीर ने झुरझुरी ली। झुरझुरी की वजह वातावरण में व्याप्त ठंड ना थी। घाट पर बैठे निमित्त का सिर लगातार आगे-पीछे हिल रहा था जैसे उसपर कोई प्रेत चढ़ा हो। 

“स्कैली…कहा ना चुप हो जा! नहीं सुननी मुझे अभी तेरी बकवास,” इस बार निमित्त कुछ ज़ोर से चिल्लाया। उसे यकीन था कि उसे सुनने वाला वहाँ कोई नहीं। 

“गाँजा फूँकने के लिए अभी छोटा नहीं है तू?” पीछे से आवाज़ आई। 

“रास्ता नापो,” 

निमित्त ने बिना पीछे पलटे कहा। अपनी आवाज़ संयत रखने का उसने भरसक प्रयास किया फिर भी रुँधा हुआ गला दगा दे गया। उसे कोई परवाह नहीं थी कि पीछे से आती आवाज़ किसने दी, या तो कोई गंजेड़ी था या शायद अघोरी, जो पैसे मांगने के चक्कर में था।    

पीछे से पदचापों की आवाज़ आई, जैसे कोई लंबे डग भरता हुआ उसकी तरफ़ बढ़ रहा हो। निमित्त ने अब भी पलटने की ज़हमत ना उठाई। अगर ये कोई चोर या उठाईगीरा था तो उसे अपनी हरकत पर अफ़सोस होने वाला था। निमित्त ने दो महीने पहले ही अपनी कराटे फर्स्ट दान ब्लैक-बेल्ट ट्रेनिंग पूरी की थी। 

वो साया लंबे डग भरता हुआ घाट की सीढ़ियों से उतरा और निमित्त की बायीं बगल आ बैठा। 

“तीस क़दम,” साये ने घरघराती आवाज़ में कहा। 

निमित्त ने प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी ओर देखा।   

“तुमने रास्ता नापने को कहा था। मुझमें और तुम में तीस क़दम का फ़ासला है,” साये ने दार्शनिक के समान सिर उठाते हुए कहा। निमित्त की नज़रें उसकी तरफ़ गईं। अजीब सा आदमी था वो। उसके काले रंग की दुशाला ओढ़ी हुई थी जो उसके चेहरे का काफ़ी हिस्सा कवर कर रही थी। फिर भी, कंधों तक आते लंबे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछों के अतिरिक्त, उसकी चमकती हुई नज़रें आवरण से साफ़ झाँक रही थीं। गले में ढेरों मालाएँ, गोदने से भरे दोनों हाथों की कलाइयाँ बंधनों से और सभी उँगलियाँ अंगूठियों से भरी हुई थीं। ना! यह कोई औघड़ या साधु नहीं था, वे ऐसा स्वाँग नहीं धरते। यह कोई तांत्रिक, जादूगर या बहरूपिया था। 

“सूँ-सूँ-सूँ” वो कुत्ते की तरह नाक ऊपर उठा कर कुछ सूंघने की कोशिश करने लगा। 

निमित्त अब भी प्रश्नवाचक नज़रों से उसकी तरफ़ देख रहा था। क्या चाहिए था इस शख़्स को?

“ना! गाँजा तो नहीं पिया है तूने। तेरे इर्द-गिर्द किसी पदार्थ की गंध नहीं। पर गंध है ज़रूर…” उस शख़्स ने जान कर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया। शायद उसे अपेक्षा थी कि निमित्त उससे अपनी बात पूरी करने को कहेगा। निमित्त ने अपना मुँह फेर लिया। इस बहुरूपिये की नौटंकी में उसे कोई दिलचस्पी ना थी। 

“यह गंध है…मृत्यु की,” बहुरूपिये ने अपना वाक्य पूरा किया। 

निमित्त के शरीर ने ज़ोर की झुरझुरी ली। उसकी उँगलियाँ स्वतः ही दाहिने जॉ-लाइन पर उभरे गहरे ज़ख़्म पर गईं जो अब भी ताज़ा था। 

“किसी अपने को खोया है तूने, कोई ऐसा जो तेरे लिए बहुत ख़ास था…प्राणों से प्रिय,” बहुरूपिये की आँखें कटोरियों में पलटीं, जैसे अपने तीसरे नेत्र पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहता हो। 

निमित्त की आँखों से दो बूँदें गिरीं, उसके कंपकंपाते होंठों में आया खारापन गले में उठती टीस में घुल गया। 

“तेरी उम्र के लड़के, लड़की ना मिलने पर यूँ टेसूए बहाते हैं,”

“हा-हा-हा-हा,” निमित्त के रूँधे गले से वातावरण से भी सर्द हँसी निकली, आँखों से गिरती कुछ और बूँदें उसका स्वाद खारा कर गईं। 

“लड़की के लिए रोऊँ, मातम मनाऊँ, दिल टूटा मजनूँ बन जाऊँ…इतना कमज़ोर ना बनाया ऊपर वाले ने,”

“निर्मोही! केतु है तू…मोहपाश बाँधता नहीं तुझे। प्रेम में हो तो सर्वस्व न्योछावर कर दे, वरना यूँ मुँह मोड़ ले जैसे बग़ल में हरिश्चंद्र(घाट) पर जलती देहों के फूटते कपाल से मुक्त हुई आत्मा ने संसार से बंधन तोड़ लिया हो,”

“मेरे बटुए में बीस रुपए हैं और वो मैं नहीं देने वाला। सुबह अखाड़े से वापस लौटते समय भेलूपुर पर “गणेश बुक स्टॉल” खुल जाएगा। कॉमिक्स ख़रीदनी है मुझे,” निमित्त भावहीन स्वर में बोला। 

“मैंने पैसे कब माँगे?” बहरूपिये ने मुस्कुराते हुए सवाल किया। 

“फिर इतनी मेहनत क्यों कर रहे हो?” 

“मेहनत कैसी? तुझे तेरे बारे में बता रहा हूँ, राह दिखा रहा हूँ,”

“नहीं देखनी,”

“ज़िद्दी तो हद्द है तू,”

“कभी घमंड नहीं किया,”

दो पल दोनों के बीच चुप्पी छाई रही। 

“इतनी देर में लोग मेरे बारे में सवाल कर लेते हैं, कि मैं कौन हूँ? उनके बारे में इतना कैसे जानता हूँ?” 

“मुझे कोई दिलचस्पी नहीं,” 

निमित्त पर प्रत्यक्षतः बहरूपिये की बातों का कोई प्रभाव ना पड़ा था। उसने पलट कर हनुमान घाट पर सीढ़ियों के ऊपर बने अखाड़े की ओर देखा। ठंड में भी भोर के चार बजे अखाड़े का कपाट खुल जाता था, यानी अभी चार नहीं बजे थे। 

“फिर भी, दिमाग़ में ख़याल तो आया होगा कि मैं कौन हो सकता हूँ?”  

“मेंटलिस्ट हो। मेरी बॉडी लैंग्वेज, इमोशंस और एक्सप्रेशन पढ़ रहे हो,”

“साइकिक, जादूगर या कोई पहुँचा हुआ सिद्ध सन्यासी भी तो हो सकता हूँ?”

“जादूगर इल्यूज़न का सहारा लेते हैं…दृष्टिभ्रम, नज़रों का धोखा। सिद्ध सन्यासी या साइकिक होते तो तुम्हें पता होता मैं किसकी मृत्यु का शोक मना रहा हूँ,”

“केतु के साथ बृहस्पति। तेरी नज़रें आत्मा कुरेद सकती हैं किसी की…पर अभी इतना पैना नहीं हुआ है तू। शिक्षा, सीख और सबक, तीनों बहुत बाक़ी हैं तेरे जीवन में,” बहरूपिया मुस्कुराते हुए बोला, उसकी आवाज़ में प्रशंसा का पुट था। 

अब निमित्त को अंदाज़ा हो रहा था। यह गुरु बनने के चक्कर में जाल डालता कोई गुरुघंटाल था। निमित्त ने कुछ ना कहा, वो चुपचाप अपने स्थान से उठा और सीढ़ियों से ऊपर की तरफ़ बढ़ने लगा। 

“हमें लगता है कि हम उन्हें पाल रहे, कि उन्हें हमारी देख-भाल की ज़रूरत है। पर वास्तव में हमें उनकी ज़रूरत होती है,”

“?” निमित्त ठिठक कर रुक गया। वो झटके से बहुरूपिये की तरफ़ पलटा। 

“काशी के कोतवाल बाबा काल भैरव की नगरी है यह। बाबा स्वयं अपने वाहन को तेरी रक्षा के लिए, तेरा साथ देने और तेरे मार्गदर्शन के लिए भेजते हैं। केतु की साइकिक पावर्स भी सीधी तौर पर जुड़ी हुई हैं…”

“कुत्तों से!! यानी तुम्हें मालूम था?” निमित्त सकपकाया। 

बहरूपिया उसकी ओर ही देख रहा था। उसकी आँखों में एक चमक उभरी। निमित्त के कदम जैसे स्वतः ही वापस उस बहरूपिये की तरफ़ मुड़ गए। 

“यह दर्द तेरा है। सिर्फ़ तेरा। इसे कोई भी ऐसा ना समझ पायेगा जिसने कभी किसी जीव का अपनी संतान के समान लालन-पालन ना किया हो। अपनी संतान को खोने के समान घोर वेदना, असहनीय पीड़ा, अस्तित्व में कभी ना भरने वाला वो रिक्त स्थान, इसे हर कोई नहीं समझ सकता। इसीलिए यहाँ आ कर उससे शिकायत कर रहा है जिसकी उठती लहरें तेरे अंतर्मन की गहराई को टटोल लेती हैं,” बहरूपिया घाट की निचली सीढ़ियों पर आती गंगा की लहरों की तरफ़ देखते हुए बोला। 

दो पल के लिए फिर वहाँ सन्नाटा पसर गया। उन दोनों के बीच बस गंगा की लहरों की ध्वनि थी। आज नदी शांत ना थी। पर शायद निमित्त को शांत करने के लिए उसकी उठती-गिरती लहरें यूँ ऊपर तक आ रही थीं जैसे निमित्त के सिर पर प्रेम से हाथ फेरना चाहती हों।

“वुफ़…śśś हाऊśśś” घाट के ऊपर, दूर कहीं से कुत्ते का रुदन सुनाई दिया।       

“एक हफ़्ते का था वो जब पापा उसे ले कर आए थे। मेरी फीमेल डॉग “शेरा” की डेथ के बाद। टाइगर इतना छोटा था कि ना चल पाता था, ना ही ख़ुद से खा पाता था। बॉटल से दूध पीना तक नहीं आता था उसे। रूई के फाहे दूध में डुबो कर उनसे दूध पिलाता था मैं उसे,” निमित्त बहुरूपिये से ज़्यादा जैसे ख़ुद से बोला। 

“कितने साल का था?”

“आठ साल। मैं ग्यारह साल का था जब पापा टाइगर को ले कर आए थे,”

“हमारे साथी यूँ ही नहीं जाते। या तो हम पर आती हुई बालाओं को अपने साथ ले जाते हैं, या फिर हमें सही राह पर लाने के लिए,”

निमित्त कुछ ना बोला। 

“मृत्यु और शोक तेरे साथ चलते हैं…और सदैव चलेंगे। यह दोनों तेरे सबसे बड़े शिक्षक भी हैं और मार्गदर्शक भी। जब-जब जीवन में तू अपनी राह भटकेगा, अपने उद्देश्य से दूर जाएगा, अपने असल स्वरूप को भूलेगा, यह मृत्यु और शोक, और इनसे उत्पन्न घोर वेदना तुझे सही मार्ग दिखायेगी,”

“मेरे जीवन में ज़्यादा लोग नहीं खोने के लिए। “ब्रूस वेन” बनने के लिए मेरी उम्र थोड़ी ज़्यादा है और मल्टी-बिलियनेयर ऑर्फ़न बनने के लिए बजट थोड़े से काफ़ी कम,” 

“मृत्यु सदैव इंसानों की हो आवश्यक नहीं। रिश्तों, भावनात्मक संबंधों या फिर विश्वास का अंत भी मृत्यु तुल्य वेदना देता है लड़के। जब तू सबसे ग़लत होगा तब किसी को खोयेगा…खोएगा ताकि ख़ुद को पा सके,”

उस बहरूपिये की बात तीर की तरह निमित्त की अंतरात्मा में चुभी। शायद इसलिए क्योंकि इस सच का एहसास निमित्त को ख़ुद भी अपने अंदर कहीं ना कहीं था, जिसे नकारने की कोशिश में वो निरंतर इस विचार से द्वंद्व कर रहा था। 

निमित्त का जबड़ा भिंच गया। 

“यह घाव देख रहे हो? टाइगर ने मरने से कुछ दिन पहले मुझे बुरी तरह काटा था। उसका कैनाइन अपने जबड़े के मांस फाड़ता हुआ आज भी महसूस होता है मुझे। मुझे उस दिन, उस पल ही पता था कि वो जल्द ही मुझे छोड़ कर हमेशा के लिए जाने वाला है। जानता था कि यह उसका “पार्टिंग गिफ्ट” है जो हमेशा मेरे साथ रहेगा। अपने चेहरे पर गर्व के साथ सहेज कर रखूँगा उसकी आखरी निशानी। पर उसके जाने से मुझे अकेलेपन के अलावा कुछ ना मिला। कोई राह नहीं दिख रही मुझे टाइगर के जाने से। पहले से भी ज़्यादा भटका हुआ और दिशाहीन हूँ मैं,”

“ट्रू विजडम रिक्वायर्स सैक्रिफाइस। ओडिन ने भी ज्ञान के लिए अपनी आँख क़ुर्बान की थी। पर जब हम अज्ञानी के साथ अनभिज्ञ भी हों कि हमें ज्ञान की आवश्यकता है, तब हमारे लिए क़ुर्बानी वो देते हैं जो हमें अपनी जान से भी अधिक प्रेम करते हैं,”

निमित्त की कुछ समझ ना आया। 

“यूनिवर्स का लॉ हमेशा याद रखना। टू ऑब्टेन समथिंग, समथिंग ऑफ इक्वल वैल्यू मस्ट बी लॉस्ट,” बहरूपिया अपनी जगह से उठते हुए बोला। उसकी नज़रें ऊपर अखाड़े की तरफ़ थीं। 

निमित्त की नज़रों ने बहरूपिये की नज़रों का अनुसरण किया। अखाड़े के कपाट खुल रहे थे। निमित्त की नज़रें आदतन स्वतः ही अपनी कलाई घड़ी पर गईं। सुबह के चार बज रहे थे। उसकी बंद घड़ी ख़ुद-ब-ख़ुद चलने लगी। बहरूपिया तेज़ क़दमों से चलता हुआ निमित्त से विपरीत दिशा में जा रहा था। 

“तुम कौन हो?” निमित्त ने उसे पीछे से आवाज़ देते हुए सवाल किया। 

बहरूपिया एक पल को ठिठका, फिर पीछे मुड़ा। उसकी आँखों में चमक और अधरों पर रहस्यमयी मुस्कान थी। 

“लोगों को उनके सच का आईना दिखाता हूँ, उनकी उस अक्स से पहचान करवाता हूँ जिसे वो जानते तो हैं लेकिन पहचानते नहीं हैं। मैं तो सिर्फ़…निमित्त मात्र हूँ,” लंबे डग भरता हुआ बहरूपिया दूर नज़र आते हरिश्चंद्र घाट की जलती चिताओं की ओर बढ़ गया। 

निमित्त जाने कितनी देर तक वहाँ यूँ ही खड़ा रहा। गंगा और निमित्त के अंतर्मन, दोनों का उफान धीरे-धीरे शांत हो रहा था। वो अखाड़े की ओर बढ़ गया। उसके ज़हन में वो बहरूपिया और उसकी बातें निरंतर घूम रहे थे। क्या वो वाक़ई कोई साइकिक था? निमित्त को पढ़ना इतना आसान नहीं था, फिर भी उसे यूँ पढ़ गया वो जैसे निमित्त हर नई कॉमिक्स को एक साँस में पढ़ जाता था। उस बहरूपिये ने एक बात तो बिल्कुल सही थी, निमित्त लोगों की असलियत पहचानने में अच्छा था लेकिन अभी उसे काफ़ी कुछ सीखना था। वो सिर्फ़ अपने अनट्रेंड इंस्टिंक्ट्स पर चल रहा था। उसे ट्रेनिंग की ज़रूरत थी। ह्यूमन बिहेवियर एंड साइकोलॉजी को समझने की, उसकी सूक्ष्मता को जानने की ज़रूरत थी ताकि वो अपने इंट्यूशन और इंस्टिंक्ट्स को शार्प कर सके। उसे एक मेंटॉर की ज़रूरत थी। 

अगले दिन सुबह ग्यारह बजे निमित्त वाराणसी के पिशाच मोचन स्थित डॉक्टर बीरेंद्र उपाध्याय की क्लिनिक में था जिनकी गिनती देश के टॉप साइकोलॉजिस्ट्स में होती थी। 

॰ ॰ ॰

सागर की लहरें तेज़ी से मॉर्जिम बीच की उस चट्टान से टकरा रही थीं जिस पर पलक और निमित्त बैठे थे। पलक एक-टक निमित्त को देख रही थी और अतीत में डूबा निमित्त अपनी आँखों के सामने, अपने दिल में उमड़ती भावनाओं के समान उफनते सागर को। 

“यानी टाइगर का जाना निमित्त को उस शख़्स के पास ले गया जिसने निमित्त को ह्यूमन साइकोलॉजी सिखाई?” पलक ने सवाल किया। 

निमित्त मुस्कुराया। 

“गया तो मैं अपने डिप्रेशन की ट्रीटमेंट के लिए था, टाइगर का जाना मुझसे लिया नहीं जा रहा था। अंदर तक टूट गया था। पापा मेरे लिए परेशान थे। उन्होंने अपने फ्रेंड से बात की, जो उस समय इंडिया के टॉप साइकोलॉजिस्ट थे। बट आई वॉज़ ए डिफिकल्ट पेशेंट। ए रेबेल किड, एंड समहाउ, आई आलरेडी न्यू ऑल द टेम्पलेट साइकोलॉजिकल टैक्टिक्स दैट द गुड डॉक्टर ट्राइड एप्लाइंग ऑन मी। ना सिर्फ़ मैं उसके माइंड गेम्स के पैंतरे जानता था, बल्कि बहुत आसानी से इंडिया के टॉप साइकोलॉजिस्ट के दिमाग़ से खेलने की कोशिश कर रहा था,”

“फिर? जीत गए?”

“जीतने के लिए नहीं खेल रहा था। डॉक्टर बीरेन्द्र उपाध्याय और मैं एक-दूसरे के साथ एक साइकोलॉजिकल चेस मैच खेल रहे थे। बकौल डॉक्टर उपाध्याय, उन्हें पहली बार कोई ऐसा मिला था जिससे खेलने में उन्हें मज़ा आ रहा था, पर यह मज़ा तब तक अधूरा था जब तक ओपोनेंट यानी मैं नौसिखिया था। अगले डेढ़ साल में इंडिया के टॉप साइकोलॉजिस्ट से मैंने ह्यूमन बिहेवियर, क्रिमिनल साइकोलॉजी एंड ह्यूमन माइंड को पढ़ने और समझने की ट्रेनिंग ली। अगले डेढ़ साल फादर ऑफ मॉडर्न साइकोलॉजी विलहेल्म वण्डट, फ़ादर ऑफ अमेरिकन साइकोलॉजी विलियम जेम्स, सिगमंड फ्रॉइड, कार्ल यंग, अल्फ्रेड एडलर और बुर्रहस फ्रेडरिक स्किनर को पढ़ने में डूब गया। टाइगर के जाने का दर्द और ख़ालीपन मानव मनोविज्ञान से भरने की कोशिश करने लगा,”

“तभी लोगों को इतना बेहतर समझते हो। कई बार वो ख़ुद भी अपने आप को उतना नहीं समझते जितना आप उनकी वास्तविकता को समझ और जान लेते हैं,”

“कभी घमंड नहीं किया,”

“कर लो फिर,”

“ना! मुझे औलाद का दर्जा दे कर पीठ में छुरा घोंपने वाला गुरु हो या अपने आप को मेरा करीबी दोस्त, मेरा शुभचिंतक बता  कर पीठ पीछे जड़ खोदने की कोशिश करने वाले दो मुंहे लोग, या फिर मुझे डेल्यूशनल बता कर अपनी बिलो स्टैण्डर्ड, डिग्रेडेड थिंकिंग पर आवरण डालने की नाकाम कोशिश करने वाले सो कॉल्ड सपोर्टर्स, जिनकी असलियत बाहर लाने के लिए इनके मन के विपरीत एक-दो बातें कहनी पड़ती हैं बस। फिर ख़ुद ही ये अपने दोस्त, शुभचिंतक, दिली हमदर्द का चोला उतार कर नंगे हो जाते हैं। जब तक इनके वास्तविक चेहरे दिखाई दे रहे वही काफ़ी है मेरे लिए,”

“वो दो बच्चों की अम्मा आंटियों को भूल गए जिनकी एज और वेस्ट साइज़ दोनों ही फिफ्टी टच करने को है पर आपसे ऑकल्ट के नाम पर कुछ और सीखना चाहती हैं,” पलक ने चुटकी लेते हुए कहा, उसकी आँखों में शरारत थी। 

निमित्त को अपनी ओर देखता पा कर पलक ने उँगली अपने होंठों पर रख ली। निमित्त मुस्कुराया। 

“पहले दिन से आंटी की नियत का पता था,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला। 

“फिर सिखाने को राज़ी क्यों हुए?”

“क्या बोलता? तुम ठरकी हो, आगे जा कर मुझ पर डोरे डालोगी और मना करने पर विक्टिम कार्ड खेलोगी?”

“हाहाहाहा,” पालक पेट पकड़ कर हँसी। “अरे सौ तरीके होते हैं पीछा छुड़ाने के। कह देते टाइम नहीं है, नहीं सिखा सकता। कुछ भी दूसरा बहाना कर देते,”

“तस्दीक करनी थी कि सही हूँ या नहीं,”

“क्या करनी थी?”

“श्योर होना था। यूँ समझो कि हर बार मेरा इंट्यूशन मुझे लोगों के असली रंग पहले ही दिखा देता है, पर मैं भरसक कोशिश करता हूँ उनपर यकीन करने का, वे जो ख़ुद को बता रहे उसे ही सच मानने का, लेकिन अंत में मेरा इंट्यूशन…कुछ दानिशमंद दोस्तों की ज़ुबान में मेरा डिल्यूज़न ही सही निकलता है,”      

पलक मुस्कुराई। 

“थैंक्स, मुझसे अपनी लाइफ़ का ये हिस्सा शेयर करने के लिए,”

“थैंक्स, मुझे यह याद दिलाने के लिए,” निमित्त उसकी आँखों में देख कर मुस्कुराता हुआ बोला। 

“मतलब?”

“मतलब ये कि मैं इस घटना के बारे में बिल्कुल भूल चुका था। जब तुमने कहा कि अपनी लाइफ से जुड़ा कोई इंसिडेंट सुनाइये तो अचानक ही याद आ गया,”

पलक के चेहरे पर शरारती मुस्कान उभरी। 

“अच्छा! फिर तो इसी बात पर एक और सुनाना बनता है,”

“अंधेरा हो रहा है। मॉलम वापस पहुँचने में लगभग दो घंटे लगेंगे,” निमित्त उठता हुआ बोला। 

“अरे रास्ते में बाइक चलाते-चलाते सुना देना…” पलक अपनी धुन में बोलती हुई आगे चल रही थी। उसे देख कर मुस्कुराता हुआ निमित्त उसके पीछे। उसके ज़हन में अचानक एक आवाज़ गूंजी। 

“टू ऑब्टेन समथिंग, समथिंग ऑफ इक्वल वैल्यू मस्ट बी लॉस्ट”

The End