ॐ नमः हरिहराय

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ही लव्ज़ मी ‘नॉट’

HE LOVES ME "NOT"

चैप्टर-02 द कैट एंड द लिटिल गर्ल

नितिन के. मिश्रा 


अंश की तीक्ष्ण आँखें रात के अंधेरे में सामने वाली कॉटिज से यूँ चमकती दिखाई दे रही थीं जैसे रात के अंधेरे में भी अनंतिका के जिस्म का रोम-रोम टटोल रही हों। 

अनंतिका हैरान थी, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 


शाम जब वो उसके घर पर अंश से मिली थी तब वो उसे एक बिल्कुल ही नॉर्मल लड़का लगा था। रात होते ही आख़िर अंश के बच्चों जैसे चेहरे पर वो सख़्त दरिंदों जैसे भाव क्यों आ जाते हैं? शाम उसकी आँखों की गहराई में जो मासूमियत अनंतिका ने देखी और महसूस की थी वो रात के अंधेरे में उस तीक्ष्ण चमक में क्यों बदल जाती है? आख़िर क्यों अंश अनंतिका की कॉटिज और उसे इस तरह घूरता रहता है? 


अनंतिका के पास अपने सवालों के कोई माकूल जवाब फ़िलहाल ना थे लेकिन उसने फ़ैसला किया कि वो इस बाबत अंश से बात ज़रूर करेगी। अपने सवालों में उलझी अनंतिका की नज़रें सामने कॉटिज की तरफ़ एक बार फिर उठीं। अंश अब भी वैसे ही खड़ा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे अनंतिका को ही घूर रहा हो। हड़बड़ा कर अनंतिका ने खिड़की बंद कर दी और वापस आ कर बेख़बर सो रहे निखिल के पहलू में उससे लग कर सो गयी।


अगले दिन सुबह से ही निखिल और अनंतिका शाम की पार्टी की तैयारी में जुट गए। 


सैटरडे होने के कारण निखिल को ऑफिस नहीं जाना था इसलिए तैयारी में वो भी अनंतिका का पूरा-पूरा साथ दे रहा था। 


पार्टी एरिया के रूप में उन्होंने कॉटिज के लॉन को यूज़ करने का निश्चय किया परन्तु सही रख-रखाव ना होने की वजह से लॉन पूरी तरह जंगल में बदला हुआ था। निखिल अपने 1400W के जैपनीज़ लॉन मोअर के साथ बाहर पहुंचा। लॉन की हालत देखकर निखिल ने अपने माथे का पसीना पोंछा और मन ही मन बड़बड़ाया।


“इसे ठीक करने में तो तू भी लॉन जैसा ही उजड़ा नज़र आने लगेगा बेटा निखिल,”

निखिल का दिल किया कि अन्दर जा कर अनंतिका से बोले कि पार्टी की व्यवस्था उन्हें कॉटिज के हॉल में कर लेनी चाहिए, लेकिन फिर उसे ध्यान आया कि अनंतिका पहले ही हॉल में अपना स्टूडियो सेट-अप कर चुकी है।


“मैं कुछ हेल्प करूँ?”

निखिल की निगाहें आवाज़ की दिशा में उठीं। अपनी कॉटिज के बाहर खड़ा अंश उसे देखकर मुस्कुरा रहा था।


“नहीं यार, आय’ल्ल मैनेज,” निखिल ने चेहरे पर औपचारिक मुस्कान लाते हुए कहा और अपना लॉन मोअर स्टार्ट किया।


जिन लोगों की जिंदगी का ज़्यादातर हिस्सा बड़े शहर और अपार्टमेंट में जीते हुए गुज़रा हो उन्हें गार्डनिंग का अनुभव कम ही होता है। गमलों में महंगे और फ़ैन्सी पेड़-पौधे लगाना एक बात है लेकिन लॉन सँभालने के लिए मोअर से अधिक स्किल की ज़रूरत होती है। अगले दो मिनट में ही निखिल को ये बात समझ में आ गई, वो पसीने से तर हुआ बुरी तरह हांफ रहा था और लॉन की बेतरतीब झाड़ियाँ जैसे उसे देखकर मुँह चिढ़ा रही थीं।


“मैं वाकई ये काम जल्दी कर सकता हूँ, अपनी कॉटिज का लॉन मैं खुद ही मैंटेन करता हूँ,” अंश अब भी वहीं खड़ा हुआ निखिल को देखकर मुस्कुरा रहा था। निखिल ने सहमति में अपना सर हिला दिया।


अनंतिका शाम की पार्टी के लिए स्नैक्स ऑर्गनाइज कर रही थी। हांफता और पसीना पोंछता निखिल किचेन में उसके पास आया और एक रोस्टेड पनीर का टुकड़ा उठा कर मुँह में डाल लिया।


“लॉन हो भी गया? इतनी जल्दी?” अनंतिका ने चौंक कर निखिल की तरफ़ देखते हुए पूछा।

निखिल ने मुँह में एक और रोस्टेड पनीर का टुकड़ा डालते हुए एक फ़्लाइइंग किस उसकी तरफ उछाली और किचेन की खिड़की की और इशारा किया। अनंतिका ने खिड़की से बाहर झाँका, लॉन में उसे अंश नजर आया। 


अनंतिका ने प्रश्नवाचक नज़रों से निखिल की ओर देखा। निखिल ने लापरवाही से अपने कंधे उचकाए।


“उसने खुद सामने से आकर हेल्प ऑफर की यार, मैं क्या करता!” निखिल के चेहरे पर आयी शीपिश स्माइल के पीछे के इम्पिश एक्स्प्रेशन अनंतिका से छुपे नहीं थे। 


“मैं क्या करता!!’ अनंतिका ने निखिल के बोलने के अन्दाज़ को मॉक किया। ‘नॉट कूल निखिल, नॉट कूल एट ऑल!!” अनंतिका बिफरते हुए बोली।


निखिल ने अनंतिका से उस घड़ी ना उलझने में ही अपनी भलाई समझी। ड्रिंक्स काउंटर के लिए ड्रिंक की व्यवस्था करने का एक्सक्यूज़ देकर निखिल किचेन से सरक लिया। 

अनंतिका को वाकई निखिल की इस हरकत पर अत्यधिक क्रोध आ रहा था। 


रात फिर से अंश के साथ घटी घटना के बाद वो जब तक क्लीयर कट उससे बात नहीं कर लेती तब तक उसे अंश से कैसा भी फ़ेवर लेना सही नहीं लग रहा था। रात वाली घटना के बारे में क्योंकि उसने निखिल को कुछ भी नहीं बताया था इसलिए वो अब फ़िलहाल खुल कर निखिल पर भी ग़ुस्सा नहीं कर सकती थी।


उसने एक उड़ती हुई नज़र खिड़की के बाहर डाली। इतनी ही देर में अंश ने लॉन की ज़्यादातर बड़ी झाड़ियाँ और खर-पतवार लगभग साफ़ कर दिए थे। उसकी स्वेट-शर्ट पसीने से पूर्णतः तर-बतर थी और उसके जिस्म से चिपकी हुई थी और उस घड़ी वो बॉगेनवेलिया के एक बेतरतीब झाड़ को ट्रिम कर कर रहा था। बोगनविलिया की तीखी टहनियाँ उसकी स्वेट-शर्ट की बाहों में फंस कर उसे उधेड़ रही थीं। उन टहनियों से परेशान अंश ने पसीने से शरीर पर चिपकी हुई स्वेट-शर्ट को उतार कर नीचे घास पर फेंक दिया।


अनंतिका अंश पर से अपनी नज़रें नहीं हटा पा रही थी। 


माइकल एंजलो के रेनेसां स्कल्पचर डेविड के सामान अंश का तराशे हुए मार्बल जैसा जिस्म अनंतिका की नज़रों के सामने था। पसीने की बूँदें शरीर पर पड़ती सूर्य की किरणों से कांतिमान हुई चमक रही थीं। 


अंश के चिकने शरीर पर एक भी बाल नहीं था, देख कर पता चलता था कि उसने बॉडी शेविंग की हुई है। उसके रिप्ड चेस्ट और फ़्लैट वॉशबोर्ड ऐब्स से फिसलती हुई पसीने की बूँदें उसकी एक्स्ट्रीम्ली लो-वेस्ट जींस के अंदर कहीं गुम हो रही थीं। जाने कितनी ही देर मंत्रमुग्ध सी अनंतिका अंश को यूं ही घूरती रहती, उसका दिमाग़ बार-बार अंश की लो-वेस्ट जींस के अंदर घूम रहा था। क्या उसने वहाँ भी खुद को शेव किया है? अनंतिका ने अपने सर को झटक कर इस थॉट को दिमाग़ से निकालने की कोशिश की। 


आख़िर क्या सोच रही थी वो! अनंतिका की साँसें तेज चल रही थीं, इस विचार को जितना ही वो अपने दिमाग़ से निकालने की कोशिश कर रही थी उतना ही ये विचार उसे उत्तेजित और आंदोलित कर रहा था। अनंतिका को एहसास ही नहीं हुआ कब उसके हाथ अपने ही जिस्म पर फिसलने लगे थे। उसके हाथ यूँ ही खुद पर फिसलते रहते अगर अंश की नज़रें अचानक उस किचेन विंडो की ओर ना उठ जातीं। एक पल के लिए अंश और अनंतिका की नज़रें एक-दूसरे से मिलीं। अगले ही पल अनंतिका ने अपने हाथ अपने जिस्म से हटाए और झेंपते हुए अंश पर से अपनी नज़रें हटा लीं।


***


शाम के सात बज रहे थे, लॉन स्ट्रिंग लाइट्स से बेहतरीन रूप से सुसज्जित था जहां एक ओर बार काउंटर और एक ओर वेज एंड नॉन-वेज स्नैक्स सर्विंग टेबल पर सजे हुए थे। इस व्यवस्था का बड़ा श्रेय अंश को जाता था जिसने ना सिर्फ लॉन साफ़-सुथरा किया बल्कि वहां की पूरी व्यवस्था अनंतिका के निर्देशानुसार चाक-चौबंद की थी। 


पार्टी में गेस्ट वाकई गिनती के थे, बामुश्किल 8-10 लोग। उस वक्त निखिल अनंतिका को कम्पनी की हेड प्रेरणा से इंट्रोड्यूस करा रहा था। 


प्रेरणा की कंपनी ‘पी। डी। कॉर्प्स’ चकराता में रीसॉर्ट्स, टूरिज़म के अलावा टिम्बर एंड लैंड माइनिंग में कार्यरत थी। यूं तो पी.डी. कॉर्प्स का खुद का काफी बड़ा पर्सनल एकाउंट्स डिपार्टमेंट था फिर भी कंपनी हेड प्रेरणा का अंदेशा था कि लम्बे समय से कंपनी के एकाउंट्स में धांधली चल रही है जिसमें कम्पनी के टॉप लेवल एग्जीक्यूटिव्स का भी हाथ है। इसीलिए प्रेरणा ने पर्सनल लेवल पर दिल्ली की सबसे टॉप चार्टेड एकाउंटिंग फर्म से निखिल को कंपनी के एकाउंट्स रिव्यू करने के लिए बुलाया था।


प्रेरणा की नज़रें लगातार अनंतिका का जायज़ा ऊपर से नीचे तक ले रही थीं। अनंतिका के चेहरे पर एक फेक फॉर्मल प्लास्टिक स्माइल चिपकी हुई थी जबकि अंदर से वो बुरी तरह बोर हो रही थी।


“एक्स्क्यूज़ मी, हैव मी मेट बिफ़ॉर? यू लुक फ़ैमिल्यर…लाइक ए घोस्ट फ़्रॉम समवेयर आय फ़र्गॉट,” अनंतिका के मुँह से जैसे स्वतः ही निकला। प्रेरणा का इस तरह घूरना उसे क़तई पसंद नहीं आ रहा था। 


“वाउ…दैट्स सम क्रीएटिव फ़्रेज़िंग देयर, बट आय एम प्रिटी श्योर दिस इज़ आर फ़र्स्ट एंकाउंटर,”

प्रेरणा ठंडे स्वर में बोली। उसके चहरे पर भी एक फ़ेक स्माइल थी। 


“अनी क्या कर रही है…ये उस कम्पनी की हेड है जिसके अकाउंट्स हैंडल करने मैं आया हूँ,” निखिल अनंतिका के कान में फुसफुसाते हुए बोला। 


वो सिचूएशन निखिल के लिए काफ़ी ऑक्वर्ड थी और वो भरसक कोशिश कर रहा था स्थिति को सम्भालने की। अनंतिका ने मुस्कुराते हुए खुद को वहाँ से ‘एक्स्क्यूज़’ कर लिया।

 

इस तरह की सो-कॉल्ड पार्टीज़ से अनंतिका को सख्त चिढ़ थी जहां अजीबोगरीब और स्नॉब अजनबियों के बीच ज़बरदस्ती औपचारिकता निभाने की नौटंकी करनी पड़े। अनंतिका के लिए पार्टी करने का मतलब बहुत अलग था। पार्टी मतलब कोई सीमाएँ और बंदिशें नहीं। मदमस्त और मदहोश हो जाने की हद तक बेफिक्र हो जाना, खुद को भुला देना, सामाजिकता और झूठे अहम का नकाब हटा कर खुद से रूबरू होना, चंद पलों में जिंदगी भर की परेशानियों को दफन कर देना।अनंतिका की पार्टी ऐसी ही होती थी। 


अनंतिका की नज़रें अंश को खोज रही थीं, वो उसे कहीं नजर नहीं आ रहा था। दिन भर अनंतिका के साथ पार्टी की अरेंजमेंट करवाने के बाद शाम को अंश वापस अपने घर गया था ताकि अपनी माँ के लिए डिनर तैयार कर सके और फिर नहा-धो कर पार्टी में वापस आए। 


दिन भर निखिल ने उससे जिस तरह कोल्हू के बैल जैसे काम लिया था उसके बाद अनंतिका को उम्मीद नहीं थी कि अंश शाम की पार्टी में वापस आने वाला था। ठीक उसी पल वातावरण में अकूस्टिक गिटार की धुनें गूंजी। अनंतिका की नज़रें स्वतः ही उन मधुर, कर्ण प्रीय स्वर ध्वनियों के स्रोत की दिशा में घूम गईं। 


Bm…G…Em…A…Bm…G…Em गिटार कॉर्ड्स बज रही थीं। 


अनंतिका की नज़रें गिटार बजाने वाले पर पड़ी। अंश लॉन के एक कोने में बैठा गिटार बजा रहा था। निखिल और अंश दोनों के चेहरों पर हल्की मुस्कान आई, दोनों ने अपनी आँख दबा कर एक-दूसरे को इशारा किया। अनंतिका समझ गई कि ये सेटिंग निखिल और अंश ने पहले ही एक-दूसरे के कर ली थी कि अंश शाम को पार्टी में गिटार बजाएगा, बस इसके बारे में दोनों में से किसी ने भी अनंतिका को नहीं बताया था।


अंश के संगीत में ओरिजिनैलिटी के साथ-साथ एक कशिश, एक रूहानियत थी जो अनंतिका के दिलो दिमाग पर सुरूर बनकर चढ़ रही थी। अनंतिका एकटक अंश को देख रही थी, उसे पता भी नहीं चला कब अंश का संगीत खत्म हो गया। 


अनंतिका की तंत्रा तालियों की आवाज़ से भंग हुई। पार्टी में मौजूद लोग अंश की पीठ थपथपा कर उसे शाबाशी दे रहे थे। अंश की नज़रें अनंतिका पर टिकी हुई थीं। लोगों से पीछा छुड़ाकर वो दूर खड़ी, उसे देखकर मुस्कुराती अनंतिका के पास पहुंचा।


“तो तुम म्यूज़िशियन भी हो…इम्प्रेसिव,” अनंतिका मुस्कुराते हुए बोली।


“वो आपके हस्बैंड से सुबह बात हो रही थी तो बात-बात में बात निकल आई। ये उनका ही आईडिया था,” अंश सहज भाव से मुस्कुराते हुए बोला।


“एक्स्क्यूज़ मी!…निखिल इज़ नॉट माई हस्बैंड!” अनंतिका थोड़ा चिढ़ कर बोली।


“ओह…फ़ियाँसे?”


“नो…वी आर इन ए लिव-इन रिलेशनशिप,” अनंतिका ने ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा हालाँकि उसके चेहरे से साफ़ ज़ाहिर था कि इस विषय पर बात करना उसे पसंद नहीं था। अनंतिका ने महसूस किया कि ये बात सुनते ही अंश का चेहरा यूं चमक उठा था जैसे उसे कोई मन चाही मुराद मिल रही हो। 


अनंतिका असमंजस में थी।


क्या वो अंश के मनोभाव का सही अर्थ समझ रही थी? 


उससे भी बड़ी उलझन ये थी कि वो खुद अपने मनोभावों से परेशान थी जो उसके दिल में अंश को ले कर उमड़ रहे थे। वो अंश से पिछली रात के बारे में बात करना चाहती थी लेकिन ये सही समय या माहौल नहीं था। 


ठीक उसी समय अनंतिका की नज़रें अपनी कॉटिज में पहली मंजिल की उस खिड़की पर पड़ी जो उसके और निखिल के बेडरूम की थी। वहाँ उसे एक साया खड़ा नजर आ रहा था। अँधेरे में खड़ा एक काला साया जिसकी चमकती आँखें अनंतिका को ही घूर रहीं थीं।


***


“तुमने खिड़की पर किसी गेस्ट को देखा होगा जो पार्टी से निकल कर घूमते हुए ऊपर जा पहुंचा होगा,” निखिल कुछ सोचते हुए बोला, परन्तु उसकी आवाज़ में संशय स्पष्ट झलक रहा था।


“सभी गेस्ट्स नीचे लॉन में थे निखिल, कोई भी कॉटिज के अंदर नहीं आया,”

उस समय पार्टी खत्म हो चुकी थी और सभी मेहमान वापस जा चुके थे। 


निखिल और अनंतिका कमरे में अकेले थे जिसकी खिड़की पर पार्टी के दौरान अनंतिका को एक रहस्यमयी साया नज़र आया था। अनंतिका की नज़रें अब भी उसी खिड़की पर टिकी हुई थीं।


“रिलैक्स अनी , ज़रूरी तो नहीं कि पार्टी के दौरान हर समय तुम्हारी नज़रें हर एक गेस्ट पर रही हो। इट्स क्वाइट पॉसिबल कि जब तुम मोमेंट्रिली कहीं और ऑक्युपाइड हो उस दौरान कोई गेस्ट वॉशरूम जाने के इरादे से अंदर दाखिल हुआ हो जिसपर तुम्हारी नजर नहीं पड़ी,”


“यू आर नॉट गेटिंग माय पॉइंट निखिल,” अनंतिका ने अपना चेहरा निखिल की ओर घुमाया, निखिल उसके चेहरे पर असहमति और रोष के भाव साफ़ देख सकता था। 


“कोई गेस्ट अगर कॉटिज में आता भी तो वो इस कमरे में दाखिल नहीं हो सकता था क्योंकि मैंने इस कमरे को बाहर से लॉक किया था जिसकी चाभी सिर्फ मेरे ही पास है," अनंतिका ने एक की-चेन निखिल के चेहरे के सामने झुलाई जिसमें एक इकलौती चाभी लटक रही थी।


“फिर तो सिर्फ एक ही बात हो सकती है…तुम्हें नज़र का धोखा हुआ होगा," निखिल फिर से गंभीर भाव से सोचते हुए बोला। 

अनंतिका ने असहाय भाव से अपने कंधे उचकाए और उस कन्वर्सेशन को वहीं ड्रॉप कर दिया। वो जानती थी कि उस मुद्दे पर निखिल से और अधिक बहस कर के कोई निष्कर्ष नहीं निकलने वाला। 


निखिल वैसा ही था। 


जिन चीज़ों के बारे में वो एक बार अपना ओपिन्यन बना लेता था उससे उसे डिगाना या फिर अपनी बात समझा पाना लगभग असंभव कार्य था। शायद ये एक प्रोफेशनल ट्रेट था जो धीरे-धीरे उसके स्वभाव पर हावी हो रहा था। अनंतिका ने एक बार फिर कमरे की खिड़की पर नजर डाली। कॉटिज की नीची दिवार और बॉगेनवेलिया पेड़ों के उस पार बगल वाली कॉटिज में अंश के कमरे की लाइट जल रही थी। 


अनंतिका ने उठकर खिड़की के पर्दे खींच दिए और निखिल से कुछ कहे बिना उसकी ओर पीठ घुमा कर बेड पर लेट गई। निखिल ने हौले से कमरे की लाइट्स ऑफ कर दीं और वो भी अनंतिका के बगल में लेट गया। 


निखिल ने अँधेरे में अनंतिका की ओर देखा, वो जानता था कि अनंतिका सोई नहीं है सिर्फ उसके साथ हुई असहमति और नोक झोंक के कारण उससे बात नहीं कर रही है। 


निखिल ने हौले से अपना हाथ अनंतिका की कमर पर रखा। निखिल का हाथ अनंतिका की कमर से फिसलते हुए उसकी जाँघों के बीच जा पहुँचा।


“नॉट टुनाइट निखिल!” अँधेरे में अनंतिका की भावहीन और सर्द आवाज़ आई।


“अनंतिका प्लीज़…लेट्स डू इट,” निखिल ने अपना हाथ अनंतिका की पैंटी से बाहर नहीं निकाला। निखिल की साँसें गर्म और तेज चल रही थीं, वो अनंतिका को सहलाते हुए बोला। 


“निखिल डोंट!!” अनंतिका ने निखिल का हाथ अपनी पैंटी से निकाल कर यूं अपने जिस्म से परे झटक दिया जैसे वो कोई ज़हरीला सांप या बिच्छु हो।


निखिल ने अपमान का घूँट पीते हुए अपना हाथ वापस खींच लिया और अनंतिका से परे करवट ले ली। उसके अंदर बहुत कुछ उबल रहा था। निखिल का जी चाहा कि अनंतिका की बांह अपनी गिरफ़्त में लेकर उसे अपनी ओर घुमाए और उसे झँझोड़ कर पूछे कि शाम को पार्टी के दौरान उसने अनंतिका और अंश को जो करते देखा था उसका मतलब क्या था! 


लेकिन निखिल ने फ़ौरन ही अपने आवेग और भावनाओं पर काबू पाया। निखिल का हाथ अपनी अंडरवेयर में गया, अनंतिका के नग्न जिस्म को फ़ैंटसाइज़ कर के निखिल काफ़ी देर तक जर्क-ऑफ़ करता रहा फिर थक कर सो गया। 


निखिल की तरफ़ पीठ कर के सोने का नाटक कर रही अनंतिका जानती थी कि निखिल क्या कर रहा है, उसने ऐसा प्रिटेंड किया जैसे वो सो रही है और निखिल की हरकत से बेख़बर है। अनंतिका के दिमाग में अब भी उथल-पुथल मची हुई थी। अनंतिका को यकीन था कि उसे कोई वहम नहीं हुआ था और वाकई ही उसने पार्टी के दौरान कमरे में खिड़की के पास एक साया खड़ा देखा था। 


कुछ घंटे पहले घटी घटनाएँ उसके दिमाग़ में फ़िल्म रील की तरह रीप्ले हो रही थीं।


“वहाँ कोई है…रूम में कोई है!!” अनंतिका पैनिक में चिल्लाई।


“कहाँ?” अंश की नज़रें उस दिशा में उठी जिधर अनंतिका की आँखें टिकी हुई थीं।


अनंतिका देखने की भरसक कोशिश कर रही थी कि खिड़की पर नजर आ रहा साया किसका था लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे हर गुजरते क्षण के साथ वो साया धुंधला और धूमिल होता जा रहा हो। 


अनंतिका ने नज़रें अंश की ओर घुमाई, अंश भी खिड़की की ओर देख रहा था। उस घड़ी अंश के चेहरे पर सैकड़ों भाव कुछ ही पलों में आ और जा रहे थे। 


“तुमने देखा ना उसे?”


“नहीं, खिड़की पर तो कोई भी नहीं है!” अंश जैसे खुद को संयमित करते हुए बोला।


अनंतिका ने नज़रें अंश की ओर से वापस खिड़की की तरफ घुमाई, खिड़की पर जहां दो पल पूर्व ही उसने वो चमकती आँखों वाला साया देखा था वहां कुछ भी नहीं था। 

“खिड़की का पर्दा हिला होगा,” अंश कंधे उचकाते हुए बोला। 


“बकवास मत करो! तुमने भी उसे देखा था,”


“मैंने कुछ भी नहीं देखा, मैं सिर्फ देखने की कोशिश कर रहा था कि तुम क्या देख कर इतना डर रही हो,” 


“वो जो कोई भी था अब भी कॉटिज के अंदर ही होगा,” अनंतिका तेज़ क़दमों से चलते हुए कॉटिज के मुख्य द्वार की ओर बढ़ गई।


“रुको मैं भी साथ आता हूँ,” अंश ने अनंतिका को पीछे से आवाज़ दी, लेकिन अपनी धुन में बढ़ी चली जा रही अनंतिका पर कोई प्रभाव ना पड़ा।


कॉटिज के ग्राउंड फ्लोर पर सेंट्रल हॉल में एक बड़ा सा झूमर था जिसपर लगी लाइट्स उस घड़ी जल रही थीं और अन्दर पूरे एरिया में उसका मद्धिम प्रकाश फैला था। इसके अलावा वहां कोई बड़ी लाइट नहीं जल रही थी। किचेन छोड़ कर बाकी दरवाज़े बंद थे। घुमावदार स्पाइरल स्टेयर्स से ऊपर जाती पहली, दूसरी और तीसरी मंजिल पर भी पुराने ज़माने की बनी कॉटिज की ऊंची छत से लटकते विशाल झूमर की लाइट्स का हल्का प्रकाश पड़ रहा था अन्यथा वहां घोर अन्धकार विद्यमान था।


“देखा। कोई नहीं है यहाँ,”

अनंतिका अपने पीछे से आई आवाज़ से चौंक कर पलटी। दरवाज़े पर अंश खड़ा मुस्कुरा रहा था।


“दरवाज़ा बंद कर दो और अंदर से ताला लगा दो,” अनंतिका उसे कमांड देने के अन्दाज़ में बोली। 


“वॉट?”


“डू एज़ आइ से!,”

अंश ने यूं अनंतिका के आदेश का पालन किया जैसे कोई आज्ञाकारी बच्चा अपनी टीचर के आदेश का करता है। 


उस घड़ी निखिल लॉन में बनाए गए बार के पास खड़ा था और प्रेरणा दीवान से बात करने में मशगूल था। 


निखिल की उड़ती हुई नज़र कॉटिज के बंद होते दरवाज़े पर आकर टिक गई। उसने दरवाज़े की घटती झिर्री के पीछे अंश और अंश के पीछे खड़ी अनंतिका को साफ़ देखा। अनंतिका अंश के साथ कॉटिज के अन्दर क्यों जा रही थी?


“प्लीज़ एक्सक्यूज़ मी फॉर ए मिनट,” निखिल शालीनतापूर्वक प्रेरणा से बोला और अपने हाथ में थमा बियर मग बार काउंटर पर रख कर कॉटिज के दरवाज़े की ओर बढ़ा।


प्रेरणा की नज़रें निखिल का ही अनुसरण कर रही थीं। निखिल कॉटिज के बंद फ्रंट डोर पर जा कर रुका, प्रेरणा ने रात के अँधेरे में किसी विशाल पहाड़ी के मानिंद तन कर खड़े कॉटिज पर नज़र डाली। ना जाने क्यों प्रेरणा के चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे वो किसी गहन पशोपेश में पड़ गई हो।


निखिल ने कॉटिज के दरवाज़े पर हाथ रखकर उसे हौले से धकेला, लेकिन दरवाज़ा अंदर से बंद था। क्यों? कॉटिज का दरवाज़ा अन्दर से बंद करने की ज़रूरत क्यों पड़ गई अनंतिका और अंश को? वो भी चलती पार्टी के बीच! दो क्षण असमंजस और विरोधाभास के दो पाटन के बीच झूलता निखिल ये सोचता रहा कि उसे क्या करना चाहिए, फिर उसकी नज़रें लॉन में चल रही पार्टी और मेहमानों पर गई। ज़्यादातर एक-दूसरे से बातों में और खाने-पीने में मशगूल थे। फिर उसकी नजर प्रेरणा पर गई, प्रेरणा उसे ही देख रही थी। निखिल ने निश्चय किया कि उस बाबत वो अनंतिका से बाद में बात करेगा और वो वापस प्रेरणा के पास आ गया।


“एवरीथिंग ऑलराईट?” प्रेरणा ने चेहरे पर मुस्कान बिखेरते हुए पूछा।


“येप! ऑल गुड,” निखिल मुस्कुराते हुए बोला। 


उसने एक नजर प्रेरणा पर डाली, प्रेरणा ने हल्का मेक-अप किया हुआ था जिसमें वो हद से ज्यादा खूबसूरत नजर आ रही थी। आम-तौर पर उसने प्रेरणा को मेक-अप का इस्तेमाल करते हुए नहीं देखा था लेकिन सच्चाई तो ये थी कि प्रेरणा दीवान की ख़ूबसूरती किसी भी कृत्रिम सौन्दर्य प्रसाधन की मोहताज नहीं थी। छब्बीस वर्षीय प्रेरणा दीवान चकराता की दीवान रियासत की इकलौती वारिस थी। पीढ़ियों से चली आ रही दीवान खानदान की ज़मींदारी भले ही समय के साथ खत्म हो गई हो लेकिन पुश्तैनी रौब और रुतबा पहले की भाँति बरकरार था। उसके पिता रोमेश दीवान का अपने जीवनकाल में चकराता में काफी नाम और दबदबा था फिर भी दबी आवाज़ में लोग उनकी रंगीन मिजाजी और खुले हाथ से पैसा उड़ाने की फितरत पर बातें किया करते थे। 


अपनी मृत्यु के समय तक रोमेश दीवान करोड़ों की पुश्तैनी दौलत पानी कर चुके थे। जब रोमेश दीवान की मृत्यु हुई उस समय प्रेरणा दीवान डिपार्टमेंट ऑफ़ फ़ाइनैन्शियल स्टडीज़ एंड बिज़्नेस एकनॉमिक्स, यूनिवर्सिटी ऑफ़ देल्ही, साउथ कैम्पस से एम.बी.ए. कर रही थी। 


पिता की मृत्यु के बाद जब प्रेरणा ने प्रॉपर्टी एंड ऐसेट्स इवैल्यूएशन कराया तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके पिता लगभग सारी पुश्तैनी दौलत अपनी ऐयाशी में उड़ा चुके थे। 


प्रेरणा ने हार नहीं मानी और अपनी सूझ-बूझ से बची हुई सारी पूँजी लगा कर पी.डी. कॉर्प्स की स्थापना की। ये प्रेरणा की सूझ-बूझ और दूरदृष्टि का ही नतीजा था कि पी.डी. कॉर्प्स इतने कम समय में इतनी बड़ी कंपनी बन गई थी।


“आइ होप इस कॉटिज में आपको कोई दिक्कत नहीं हो रही होगी,” प्रेरणा भावपूर्ण ढंग से बोली। जिस कॉटिज में निखिल और अनंतिका रह रहे थे वो भी प्रेरणा की ही मिलकियत थी।


“नॉट एट ऑल! दिस प्लेस इज़ डोप,”


“ग्लैड यू लाइक इट। बहुत लम्बे समय से इस जगह की मेंटेनेस नहीं हुई है। आप लोगों के आने से पहले भी सिर्फ ऊपरी तौर पर साफ़-सफाई करवा दी गई थी। लेकिन मैं देख रही हूँ कि आपने इस जगह का नक्शा आते ही बदल दिया है,” प्रेरणा प्रशंसनीय भाव से नज़रें लॉन में घुमाते हुए बोली।


निखिल मुस्कुराया, उसने वापस अपना बीयर मग उठा कर प्रेरणा का अभिवादन किया और एक बड़ा घूँट भरा। प्रेरणा ने भी अपनी शैरी की एक छोटी सी चुस्की ली।


 

“मैं कल ही यहाँ के केयरटेकर को भेजती हूँ, वो इस जगह को बिलकुल दुरुस्त कर देगा,”


“इसकी ज़रूरत नहीं है। हमें रहने के लिए जितनी जगह चाहिए वो बिलकुल दुरुस्त है,” निखिल मुस्कुराते हुए बोला, उसकी उड़ती नज़रें एक बार फिर कॉटिज के दरवाज़े पर पड़ी। दरवाज़ा अब भी बंद था।


अनंतिका पदचापों को दबाते हुए बिना आवाज़ सीढ़ियों की ओर बढ़ी। अंश उसके पीछे ही था।

“लगता है आप जासूसी नॉवेल्स ज्यादा पढ़ती हो,” अंश ने सार्कास्टिक टोन में कहा।


“शशशशssss…।आवाज़ मत करो, जो भी यहाँ है वो चौकन्ना हो जाएगा," अनंतिका ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा। 

अब तक वो घुमावदार स्पाइरल स्टेयर्स चढ़ना शुरू कर चुकी थी।


“कोई होगा तब तो चौकन्ना होगा," अंश भी अनंतिका की नक़ल करते हुए फुसफुसा कर बोला। 

ठीक उसकी समय पहली मंजिल पर सीढ़ियों के सामने से एक साया बिजली की गति से एक ओर अँधेरे से निकल कर दूसरी ओर अँधेरे में समा गया। ये सब कुछ इतना क्षणिक हुआ कि अनंतिका और अंश में से कोई भी उस साये को सही तौर पर देख नहीं पाया फिर भी उसकी उपस्थिति और उस हरकत की क्षणिक झलक दोनों को ही मिली। एक पल के लिए दोनों ही सन्न हो गए।


“अब क्या कहते हो?” अनंतिका फुसफुसाई। 


“मुझे देखने दो।,” अंश ने गंभीर भाव से कहा और सीढ़ियों पर अनंतिका की ओर बढ़ा।


उसी समय सीढ़ियों के ऊपर, अँधेरे कोने से एक साये ने अनंतिका के ऊपर छलांग लगाईं। अनंतिका के गले से चीख उबली। सीढ़ियों पर खड़ी अनंतिका इस अप्रत्याशित हमले से अपना संतुलन बनाए ना रख सकी, उसके पैर सीढ़ियों पर पीछे की ओर फिसले और उसका जिस्म कटे पेड़ की भाँति लड़खड़ाते हुए नीचे भहराया। 


अनंतिका अब भी चीख रही थी और उसने भय के कारण अपनी दोनों आँखें किसी छोटी बच्ची की भाँति भींच कर बंद कर रखी थीं। नीचे गिरती अनंतिका की तीन-चार हड्डियां चिटक जाना निश्चित थीं यदि उन दो मज़बूत बाहों के घेरे ने उसे सम्भाल ना लिया होता। सीढ़ियों के गिर कर पथरीले फर्श से टकराने के बजाए उसका सर अंश के कंधे से जा लगा। 


अनंतिका के उभार अंश के पुष्ट सीने की कसी मांसपेशियों पर दबाव बनाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, अंश की मज़बूत बाहें बरगद की टहनियों की तरह अनंतिका की सुडौल कमर के गिर्द लिपट गईं। अनंतिका और अंश के अधरों के बीच महज़ कुछ मिलीमीटर का फासला था। अंश की गर्म सासें अनंतिका महसूस कर सकती थी, वो चीखना बंद करके शांत हो चुकी थी और धीरे-धीरे अपनी आँखें खोल रही थी। 


अनंतिका के चेहरे पर अब भी भय व्याप्त था। 


अपनी उस अवस्था में अनंतिका अंश को संसार की सबसे मासूम लड़की दिखाई दे रही थी। अंश का जी चाहा कि वो सभी वर्जनाओं को तोड़ दे और अपने और अनंतिका के लबों के बीच का वो नागवार फासला फ़ौरन मिटा दे लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। सिर्फ अंश ही जानता था कि उस घड़ी, उस स्थिति में उसने किस तरह अपने पर काबू रखा था। उस अवस्था में भी अनंतिका के चेहरे के भाव देखकर अंश खुद को मुस्कुराने से नहीं रोक पाया। 


अनंतिका बड़ी-बड़ी आँखों से अंश को घूर रही थी जो उसके पूरे वजूद का भार उठाए सीढ़ियों के मुहाने पर खड़ा उसे एकटक देखे जा रहा था और मुस्कुरा रहा था। अनंतिका ने अपनी दोनों भावें उठा कर अंश से रहस्यमयी साये के बारे में मूक प्रश्न किया। अंश ने मुस्कुराते हुए अपनी आँखों की पुतलियाँ एक तरफ नचाई। अनंतिका की नज़रें उस दिशा में उठीं, जिधर अंश इशारा कर रहा था। एक काली बिल्ली उसे तेज़ी से हॉल की ओर भागती नजर आई। 


अंश ने अनंतिका को यूं आहिस्ता से नीचे फर्श पर उतारा जैसे वो कोई कांच की बनी हुई नाज़ुक गुड़िया हो जो हल्की सी ठेस लगने से भी टूट जाएगी। अनंतिका के जिस्म को खुद से अलग करना अंश को बहुत ही नागवार लग रहा था। जबकि अनंतिका का चेहरा झेंप में कानों तक सुर्ख लाल हो गया था। 


“वो रहा आपका रहस्यमयी साया,” अंश मुस्कुराते हुए बोला। अनंतिका कुछ पल असमंजस के भाव चेहरे पर लिए बिल्ली को देखती रही। हॉल में पहुँच चुकी बिल्ली अनंतिका की तरफ पलटी, उसकी कंजी आँखें मद्धिम प्रकाश में हीरों की मानिंद चमक रही थीं।


“आपने कमरे में इसे ही देखा होगा,”


“नहीं, वो साया आदम कद था,”


“नीचे और इतनी दूरी से क्या पता चलता है! वैसे अब खतरा टल चुका है, अगर हम फ़ौरन बाहर नहीं निकले तो लोग हमारे इस बंद कॉटिज में अकेले होने का कुछ और ही मतलब निकालना शुरू कर देंगे,”


अनंतिका आश्वस्त तो नहीं हुई कि उसने खिड़की पर जो साया देखा था वो बिल्ली का था लेकिन उस घड़ी उसने कन्वर्सेशन ड्रॉप कर दी। अंश ठीक कह रहा था। अनंतिका ने मन ही मन निश्चय किया कि अभी कॉटिज में घटित घटनाओं के बारे में वो निखिल को कुछ भी नहीं बताएगी। वो निखिल से सिर्फ खिड़की पर दिखे साये के बारे में ही बात करेगी। बाहर निकलने से पहले उसने अंश से सवाल किया।


“सुनो! तुम देर रात को हमारे कॉटिज की तरफ़ अंधेरे में क्या देखते रहते हो?” अनंतिका को खुद से इतना ब्लंट्ली सवाल करने की उम्मीद नहीं थी लेकिन उसे दूसरा कोई तरीक़ा समझ ना आया अपना सवाल रखने का।


अंश उसके सवाल पर थोड़ा झेंपते हुए बोला।

“ऐक्चूअली, मुझे स्लीप वॉकिंग की आदत है। रात को नींद में उठ कर चलता हूँ। कमरे से बाहर ना निकल जाऊँ इसलिए मम्मा रूम बाहर से लॉक कर देती हैं। हो सकता है आपने मुझे स्लीप वॉकिंग करते देखा होगा…आय..आय एम रीयली सॉरी,”


“इट्स ओके। मुझे नहीं पता था तुम्हें स्लीप वॉकिंग सिंड्रोम है,” अनंतिका अंश के जवाब से पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी, उसे ऐसा लगा जैसे अंश खुद को बचाने के लिए झूठ बोल रहा है। फिर भी उसने ये कॉन्वर्सेशन वहीं ड्रॉप कर दिया। 


कॉटिज का दरवाज़ा खुला और अनंतिका बाहर निकली, अंश उसके पीछे था। अनंतिका ने देखा कि लॉन में खड़े निखिल की नज़रें उसपर ही थीं। पार्टी के दौरान दोनों में कोई इंटरेक्शन नहीं हुआ। 


***


रात के तकरीबन तीन बज रहे थे, अनंतिका की नज़रों से नींद अब भी कोसों दूर थी। 


उसका दिमाग किसी फिल्म के टेप की तरह शाम की घटनाओं को बार-बार रिवाइंड करके चला रहा था। हर बार घटनाएँ पहले से अधिक अनरियलिस्टिक प्रतीत होने लगती थीं। ये एक सामान्य प्रक्रिया है कि जब भी किसी घटना को बार-बार दिमाग में चलचित्रों के रूप में चलाने की कोशिश की जाती है इंसानी मस्तिष्क हर बार घटनाओं का अलग प्रारूप प्रस्तुत करता है। घटनाएँ बेशक वही होती हैं लेकिन इंसानी मस्तिष्क उन्हें अपने अनुरूप गढ़ता है और हर प्रारूप में दूसरे से छोटी ही सही लेकिन असमानता अवश्य होती है। 


ये तब भी होता है जब हम नींद के दौरान देखे गए किसी सपने को अपने दिमाग में बार-बार दोहराते हैं, हर बार दिमाग उस स्वप्न का भिन्न प्रारूप हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है और हर दोहराव के बाद स्वप्न की स्पष्टता धूमिल पड़ती जाती है और धीरे-धीरे स्वप्न हमारे स्मृति पटल पर एक धुंधली सरीयलिस्ट पेंटिंग के स्वरूप में रह जाता है। 


मस्तिष्क पटल पर बार-बार चल रहे फ़्लैशबैक में जो घटना अनंतिका के ज़हन में सबसे स्पष्ट थी वो थी अंश के उसे बाहों में पकड़ कर गिरने से बचाने की। 


अनंतिका बार-बार अंश के जिस्म की ख़ुशबू, उसकी साँसों की ताप अपनी त्वचा पर पड़ने की कल्पना कर रही थी और उत्तेजना से उसके रौंगटे खड़े हो जा रहे थे। उस पल अनंतिका अंश के आगोश की कल्पना कर रही थी। जिस तरह उसके उभार अंश के सीने से रगड़ खा रहे थे वो उस एहसास को फिर से महसूस करना चाहती थी। क्यों? क्यों कर रही थी वो अंश के आगोश की कल्पना? अनंतिका के अंतर्मन जैसे उससे ही ये सवाल सा दाग दिया। क्या इसीलिए उसे निखिल का स्पर्श इतना नागवार लग रहा था? 


अनंतिका आम लड़कियों से काफी अलग थी और इसका सबसे बड़ा कारण उसके गुज़रे हुए अतीत, उसके बचपन का एक भयावह सच था जिसने अनंतिका की जिंदगी और उसकी सोच की दिशा पूरी तरह बदल दी थी। निखिल अनंतिका की जिंदगी में पहला लड़का नहीं था, उससे पहले भी अनंतिका कई रिलेशनशिप्स में रह चुकी थी। उसका कोई भी रिलेशनशिप एक-डेढ़ साल से अधिक नहीं चल पाता था जिसकी एक बड़ी वजह अनंतिका का डॉमिनेंट नेचर था। 


एक आम लड़की से अलग, अनंतिका को कभी भी शर्म का एहसास नहीं हुआ था। अपने इतने पार्टनर्स में से किसी एक के स्पर्श ने भी उसके चेहरे को सुर्ख लाल कभी नहीं किया था। किसी भी लड़के के स्पर्श ने उसके अंदर उन भावनाओं का आवेग जागृत नहीं किया था जिन्हें उसने जीवन में पहली बार तब महसूस किया जब अंश ने उसे छुआ था। अंश के स्पर्श की कल्पना मात्र से ही उसे अपनी सासें तेज़ होती प्रतीत हुई। उसका जिस्म द्रवित हो रहा था। उसने अपना सर झटका जैसे इस घटना और अंश के ख्याल को अपने दिमाग से निकाल फेंकना चाहती हो। 


अनंतिका ने फर पिलो को कस कर अपने सीने से भींच लिया और आँखें बंद करके ज़बरदस्ती सोने की कोशिश करने लगी। लेकिन ये कोशिश नाकाम ही साबित हुई, उसकी बंद आँखों के सामने बार-बार अंश का मुस्कुराता हुआ चेहरा आ रहा था। झुंझलाकर अनंतिका ने अपनी आँखें खोल लीं।


“इन्फेट्यूएशन की शिकार किसी सोलह साल की टीनएजर जैसे बिहेव करना बंद कर अनंतिका!!”


अनंतिका ने मन ही मन खुद को डांट लगाईं। 


कसमसा कर उसने बगल करवट ली। उसकी बगल में लेटे निखिल की गहरी साँसों की हल्की आवाज़ कमरे में सुनाई दे रही थी, जो उसके गहरी नींद में डूबे होने की चुगली कर रही थी। अनंतिका ने एक नज़र निखिल पर डाली, उस घड़ी निखिल का चेहरा बिलकुल शांत नजर आ रहा था। 


अंश के प्रति अनंतिका के मन में जिन भावों का बीजारोपण हो चुका था उसके लिए वो खुद को निखिल की गुनाहगार समझ रही थी। उसने प्यार से सोते हुए निखिल के बालों में उंगलियाँ फिराई। निखिल किसी छोटे बच्चे की तरह कुनमुनाया और फिर सो गया। अनंतिका उसकी इस अदा पर मुस्कुरा दी। आज निखिल पर वो कुछ ज्यादा ही हार्श हो गई थी, उसने फैसला किया कि सुबह उठते ही वो निखिल की सारी शिकायतें दूर कर देगी। निखिल को चैन से सोता हुआ देखकर अनंतिका ने एक बार फिर सोने के लिए आँखें बंद की ही थीं कि निखिल की साँसों के साथ एक और आवाज़ ने उसके कानों पर चोट की। ये बहुत ही हल्की पदचापों की आवाज़ थी। 


उसकी पलकों के पट फ़टाक करके खुल गए। किसी स्प्रिंग लगी गुड़िया के जैसे बेड पर उठ बैठी अनंतिका।


क्या उसके कान बज रहे थे? कहीं उसका दिमाग कोई खेल तो नहीं खेल रहा था। अनंतिका ने अपनी ऊपर-नीचे होती साँसों को रोक कर कान पर जोर डाला। नहीं, ये उसका भ्रम नहीं था। रात के उस सन्नाटे में वाकई किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी और कम से कम ये बात निश्चित थी कि वो पदचाप बिल्ली के नहीं बल्कि किसी इंसान के थे। 


अनंतिका ने एक नजर सोते हुए निखिल पर डाली। अनंतिका के चेहरे पर असमंजस के भाव थे, वो समझ नहीं पा रही थी कि उसे इस परिस्थिति में निखिल को उठाना चाहिए या नहीं। कुछ पल अनिश्चितता से वो सोते हुए निखिल को देखती रही। उसने अपना हाथ निखिल के कंधे की ओर बढ़ाया लेकिन लगभग फ़ौरन ही वापस खींच लिया। अनंतिका फैसला ले चुकी थी, उसने अकेले ही बेड से उतर कर दरवाज़े की ओर कदम बढ़ाए। 


कमरे में शेन्डलियर का हल्का पीला प्रकाश था जबकि कमरे से बाहर बिलकुल ही घुप्प अन्धकार छाया हुआ था। अनंतिका ने रौशनी के लिए अपना मोबाइल फोन साथ ले लिया था लेकिन उसकी लाइट ऑन नहीं की थी। लाइट जलाने से वहां मौजूद घुसपैठिया सावधान हो सकता था या फिर बौखलाकर उसपर हमला भी कर सकता था। 


अनंतिका ने पूरी कोशिश की कि कमरे का दरवाज़ा बिना आवाज़ के खुले लेकिन पुरानी इमारत के भारी दरवाज़े का बोझ उठाती चूलें और क़ब्ज़े एक हलकी कराह लेने से बाज़ ना आए। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ कुछ वैसी ही थी जैसी 80 के दशक की हिंदी हॉरर फिल्मों में होती थी। अनंतिका ने कमरें से बाहर कदम रखा। उस घड़ी वैसे भी उसे यही प्रतीत हो रहा था कि वो किसी भूतिया हवेली में खड़ी है। चारों ओर घुप्प अन्धकार के साथ वहां के वातावरण में एक अजीब सी मनहूसियत भी व्याप्त थी, एकाएक ऐसा लग रहा था जैसे उस जगह का तापमान काफी गिर गया हो। 


डर और उत्तेजना के अलावा वातावरण में बढ़ गई ठंड भी कारण थी कि अनंतिका के जिस्म के रौंगटे खड़े हो गए थे और रह-रह कर उसे कंपकंपी छूट रही थी। उस घड़ी उसने सिर्फ अपना झीना नाईट गाउन ही पहना हुआ था और उसे अफ़सोस हो रहा था कि उसने अपने जिस्म पर वुलन स्टोल क्यों ना लपेट लिया। वो दोबारा कमरे में लौटने का रिस्क नहीं लेना चाहती थी, बार-बार खुल-बंद होते दरवाज़े की आवाज़ उसके प्लान को फेल कर देती। 


कमरे से बाहर निकल कर अनंतिका कुछ देर तक वहीं खड़ी रही। अपने कानों पर जोर देकर वो सुनने की कोशिश करने लगी कि आखिर पदचापों की आवाज़ किस दिशा से आ रही थी। इसके अलावा कुछ देर तक अँधेरे में खड़े रहने के कारण उसकी आँखें इतनी अभ्यस्त हो गईं कि अपने आस-पास का क्षेत्र वो अनुमानित रूप से देख समझ सकती थी। 


अँधेरे सन्नाटे में उस घड़ी अनंतिका की उखड़ी हुई साँसों का शोर गूँज रहा था। अनंतिका ने अपनी सांस रोक ली ताकि पदचापों की आवाज़ सुन सके। कुछ देर तक कोशिश करने के बाद उसके कानों में पदचापों की बहुत हल्की सी ध्वनि ने चोट की। अनंतिका की नज़रें स्वतः ही ऊपर छत की ओर उठ गई। पदचापों की आवाज़ ऊपर दूसरी मंजिल से आ रही थी। अनंतिका का दिल जैसे धक करके रह गया। ऐसा कैसे हो सकता था? दूसरी और तीसरी मंजिल को जाती हुई सीढ़ियों पर एक दरवाज़ा था जिसपर बहुत ही मज़बूत ताला जड़ा हुआ था। दूसरी मंजिल तक जाने का रास्ता बंद था फिर भला पदचापों की आवाज़ ऊपर से कैसे आ सकती थी? 


“नहीं, मुझे शायद वहम हो रहा है। वैसे भी इतनी बड़ी कॉटिज में और इस घुप्प सन्नाटे में आवाज़ एको हो सकती है। निश्चित तौर पर आवाज़ एको ही हो रही है इसलिए ऊपर से आती लग रही है,”अनंतिका यह सोचते हुए मन ही मन खुद को ढाढ़स बंधाने की कोशिश कर रही थी। 


ठीक उसी समय उसके सर के ऊपर छत पर किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ हुई, अनंतिका के होंठों से एक दबी हुई सिसकारी निकली। अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी, हवा से पदचापों की आवाज़ एको नहीं हो रही थी बल्कि वाकई वो पदचाप उसके सर के ऊपर छत पर यानी दूसरी मंजिल के फर्श पर ही पड़ रहे थे।


सबसे पहला विचार जो अनंतिका के मन में उस घड़ी आया वो यही था कि ऊपर दूसरी मंजिल पर कोई प्रेतात्मा भटक रही है। वैसे भी पुरानी इमारतों और कॉटिज को लेकर लोगों की ऐसी धारणा बहुत ही आम बात है। अनंतिका भूत-प्रेत या अंधविश्वास में यकीन करने वाली लड़की बिलकुल नहीं थी। उसने अपने जीवन में इंसानों को हैवानियत की उन सीमाओं को लांघते देखा था जो कोई अस्तित्वहीन शक्ति नहीं कर सकती थी। 


अनंतिका के चेहरे के भाव सख्त हो गए। पदचापों के साथ एक और बहुत ही हल्की सी आवाज़ अब उसे हवा की सरसराहट में सुनाई दे रही थी। अनंतिका अपनी सांस रोके उस आवाज़ पर ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश कर रही थी। आवाज़ अब पहले से साफ़ सुनाई दे रही थी। ये आवाज़ थी…गाने की! कोई गुनगुना रहा था। 


अनंतिका को धुन बहुत ही जानी-पहचानी लगी। क्या थी वो धुन? कहाँ सुनी थी उसने? वो हल्की गुनगुनाहट अनंतिका के मन-मस्तिष्क में उन गाने की तरह गूँज रही थी जिसके बोल दिमाग में तो होते हैं पर ज़बान पर नहीं आ रहे होते हैं। 


अनंतिका को झुँझलाहट हो रही थी अब। क्यों नहीं याद आ रही थी उसे वो धुन, उसे ऐसा लग रहा था जैसे इस धुन से उसका कोई बहुत ही गहरा और पुराना रिश्ता है। अनंतिका ने झुँझलाहट से अपना सर हाथों में पकड़ लिया। उसके लम्बे बाल उसके चेहरे पर बिखर रहे थे। वो अपना सर अगल-बगल झटकते हुए सिर्फ उस धुन को याद करने की कोशिश कर रही थी। 


अचानक वहां पर उस पदचाप और उस लगभग नहीं सुनाई पड़ती धुन के अलावा एक तीसरी आवाज़ भी गूंजी जो उन दोनों से साफ़ और तीखी थी। ये किसी बच्ची की खिलखिलाने की आवाज़ थी। अनंतिका को अपनी रीढ़ में सिहरन की सर्द लहर दौड़ती प्रतीत हुई। उस खिलखिलाहट को उसने साफ़-साफ़ पहचाना। अब उसे दिमाग में गूंजती उस हल्की धुन के बोल भी ज़ुबान पर साफ़ होते प्रतीत हो रहे थे। आख़िर वो भूल कैसे गयी। अभी एक दिन पहले ही तो उसने सपने में सुनी थी वो नर्सरी राइम। 


खिलखिलाती हुई उस लाल वेल्वेट फ़्रॉक वाली बच्ची का अक्स उसके ज़हन में उभरा, कोहरे से भरे एक धूमिल पड़ते गलियारे में वो छोटी बच्ची खिलखिलाते हुए यूं भाग रही थी जैसे छुप्पन-छुपाई के खेल में किसी छुपे हुए साथी को ढूंढ रही हो। भागते-भागते वो नर्सरी राइम गुनगुना रही थी।


“रिंग अराउंड द रोज़ीस, 

पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़

हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन”


अनंतिका का पूरा शरीर किसी हिस्टेरीया के मरीज़ की मानिंद कांपने लगा। उसे ठंड लग रही थी, बहुत ही ज्यादा ठंड। उसके दांत किटकिटा रहे थे, उसके होंठ थर्रा रहे थे, जिस्म के रौंगटे खड़े था। अपने शरीर को वो अपनी ही बाहों में समेटने की कोशिश कर रही थी, गर्माहट पाने की नाकाम कोशिश। 


“रिंग अराउंड द रोज़ीस, 

पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़

हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन”


अनंतिका के कानों में छोटी बच्ची की पतली, खनकती आवाज़ में नर्सरी राइम की धुन पड़ी। उसने चौंक कर अपना चेहरा उठाया। अनंतिका की आँखें मानो अपने सामने का दृश्य देखकर पथरा सी रही थीं। अपनी आँखों के सामने उसे वो बच्ची खड़ी दिखाई दे रही थी जिसे अनंतिका अच्छी तरह जानती थी। 


हाथ में टेडी बेयर झुलाते हुए वो बच्ची एकटक अनंतिका को ही देख रही थी और राइम गा रही थी। वो बच्ची उस घड़ी ठीक अनंतिका की आँखों के सामने उस गलियारे में खड़ी हुई थी जिसका रास्ता आगे दूसरी मंजिल की सीढ़ियों की ओर जाता था। 


ताज्जुब की बात ये थी कि वहां घुप्प अंधियारा होने के बावजूद अनंतिका को वो बच्ची साफ़-साफ़ नज़र आ रही थी।


अनंतिका ठंड से कांपती हुई, अपने स्थान पर स्तब्ध खड़ी उस बच्ची को एक-टक देख रही थी। अनायास ही अनंतिका को अपनी आँखों से आंसू बहने का एहसास हुआ। उसके बर्फ़ जैसे सर्द गालों पर आंसुओं की गर्म पतली लकीर खिंच रही थी। 


बच्ची अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से, मासूमियत से पलकें झपकाते हुए, अनंतिका को देख रही थी। अनंतिका ने कुछ कहने के लिए अपना मुँह खोला लेकिन उसके गले से आवाज़ ना निकली। भौंचक्की अनंतिका ने अपने हलक पर जोर डाला, आवाज़ फिर भी बाहर ना निकली। उस घड़ी अनंतिका को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी रिमोट का म्यूट बटन दबा कर उसकी आवाज़ बंद कर दी गई हो। अनंतिका बुरी तरह हांफ रही थी। 


बच्ची अनंतिका को देखकर खिलखिला कर हंस दी और अगले ही पल किसी छोटे से खरगोश की तरह कुलाँचे भरती हुई गलियारे में दूसरी मंजिल की सीढ़ियों को जाते रास्ते की ओर आगे बढ़ गई।


“रिंग अराउंड द रोज़ीस, 

पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़

हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन”


अनंतिका को बच्ची के गाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी जो कि बच्ची के साथ-साथ ही उससे दूर होती जा रही थी। अनंतिका ने बच्ची के पीछे अपने कदम बढ़ाए। उसे यूं लग रहा था जैसे आइस बकेट चैलेंज में उसने बर्फीले पानी से भरी बाल्टी खुद पर पलट ली हो उसके बाद जाकर डीप फ़्रीज़र में बैठ गई हो। उसके गले से आवाज़ अब भी नहीं निकल रही थी लेकिन अपनी पूरी इच्छाशक्ति का जोर लगा कर अनंतिका अपनी मौजूदा स्थिति में भी उस बच्ची के पीछे जाने में कामयाब हो गई थी। ठंड से थरथराते-कांपते अनंतिका के पैर सीधे नहीं पड़कर किसी शराबी की तरह आड़े-तिरछे पड़ रहे थे फिर भी लड़खड़ाते क़दमों से वो बच्ची के पीछे जा रही थी।


उसे समझ नहीं आ रहा था कि भला वो बच्ची वहां आई कहाँ से थी और आगे जा कहाँ रही थी। जिन दूसरी मंजिल की सीढ़ियों की ओर वो बढ़ रही थी उनके सीढ़ी घर पर तो ताला लगा हुआ… 

अनंतिका अवाक रह गई। 


सामने दूसरी मंजिल को जाती सीढ़ियों का दरवाज़ा खुला हुआ था। 


वो बच्ची दरवाज़े के मुहाने पर खड़ी थी और पीछे पलट कर अनंतिका को ही देख रही थी। अनंतिका को अपनी ओर देखता पा कर बच्ची एक बार फिर से खिलखिला कर हंसी और खरगोश की भाँति कुलाँचे मारती हुई दूसरी मंजिल को जाती घुमावदार सीढ़ियों पर गायब हो गई। 


अनंतिका भी यूं उस खुले हुए दरवाज़े की ओर बढ़ी जैसे उस बच्ची के सम्मोहन में बंधी हुई हो। घुमावदार सीढ़ियों पर आगे बच्ची भले ही अनंतिका की नज़रों से ओझल हो गई थी लेकिन उसकी खनखनाती आवाज़ में वो नर्सरी राइम अब भी दूर से सुनाई दे रही थी।


“रिंग अराउंड द रोज़ीस,

पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़

हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन”


उस आवाज़ पर खिंची चली जाती अनंतिका दूसरी मंजिल को जाते दरवाज़े की ओर बढ़ रही थी, उसके जिस्म में अब ठंड से अकड़न पैदा हो रही थी। बहुत हिम्मत जुटा कर वो अपना एक-एक कदम आगे बढ़ा रही थी कि अचानक ही किसी ने पीछे से उसका हाथ थाम लिया। अगले ही पल अनंतिका के जिस्म को एक ज़ोरदार झटका लगा और वो भहराते हुए पीछे गिरने लगी। 


अनंतिका ने चीखने की कोशिश की लेकिन उसके हलक से अब भी आवाज़ नहीं निकल रही थी। अनंतिका का बर्फ़ की सिल्ली जैसा सर्द हो चला जिस्म दो बाहों के आगोश में समा गया। उस जिस्म की गर्मी, उसकी खुशबू जानी पहचानी थी। अनंतिका ने अपनी नज़रें उठाई, अंश उसे अपनी बाहों में भरे हुए था। अंश का पूरा चेहरा तमतमाया हुआ था, उसकी आँखें अंगारों के समान जल रही थीं और वो दूसरी मंजिल की सीढ़ियों को जाते उस खुले दरवाज़े को देख रहा था जो स्वतः ही धीरे-धीरे बंद हो रहा था।


अंश की नज़रों का अनुसरण करती हुई अनंतिका की निगाहें भी बंद होते दरवाज़े पर गईं। अनंतिका अंश की बाहों से छूटने के लिए छटपटाई, अंश की बाहों का कसाव अनंतिका के जिस्म पर और ज्यादा कस गया। अनंतिका चिल्लाना चाहती थी, अंश की बाहों से छूटकर उस बंद होते दरवाज़े के पार दूसरी मंजिल को जाती छोटी बच्ची तक पहुंचना चाहती थी लेकिन वो बेबस थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अंश अचानक वहां कैसे पहुँच गया, उसने अंश के चेहरे की ओर देखा और जैसे आँखों से ही उसे छोड़ देने का अनुरोध किया। अंश के चेहरे के तमतमाए भावों में कोई परिवर्तन नहीं आया। अनंतिका को छोड़ने के बजाए अंश ने अपने अंगारों के सामान जलते हुए होंठ सर्द पड़ती अनंतिका की गर्दन पर चुम्बन के रूप में रख दिए। अनंतिका के पूरे जिस्म में जैसे करेंट की लहर दौड़ गई। उसकी सांस उखड़े लगी, जिस्म जैसे एंठने लगा हो। अंश ने उसे अपनी तरफ घुमाया और उसके थरथराहट से कांपते होंठों को अपने होंठों की गिरफ़्त में ले लिया। अनंतिका का प्रतिरोध अब कमज़ोर पड़ रहा था, अंश के हाथ अनंतिका के जिस्म के कोने-कोने पर फिसलने लगे। अनंतिका ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसने अंश की गिरफ़्त से छूटने की अपनी कोशिश भी बंद कर दी। 


अंश के हाथ उसके जिस्म पर फिर रहे थे और वो जैसे उसके हाथों की हरकतों से बचने के लिए उसके ही आगोश में समा रही थी। उस घड़ी अनंतिका को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो किसी आक्रामक बर्फीले तूफ़ान के बीच घिरी हुई थी और उसके जिस्म पर सिर्फ वो झीना नाईट गाउन था और अंश ने किसी गर्म मोटे लबादे के मानिंद उसके पूरे जिस्म को ढंक लिया था ताकि वो बर्फीला तूफ़ान अनंतिका को नुक्सान ना पहुंचा सके। अंश के होंठों ने अनंतिका के होंठों को अपनी गिरफ़्त से आज़ादी दी लेकिन अंश वहीं नहीं रुका। अनंतिका की आँखें अब भी बंद थीं, अंश के होंठ अनंतिका की सुराहीदार गर्दन और उसके कंधों को चूमते हुए नीचे बढ़ गए। एक तीखी सिसकारी के साथ अनंतिका ने अपनी आँखें खोली। उसकी सांस उखड़ी हुई थी, वो बुरी तरह हांफ रही थी और उसका पूरा जिस्म पसीने से नहाया हुआ था। 


अनंतिका ने चौंक कर चारों ओर देखा।


वो कमरे में अपने बेड पर थी, खिड़की से सुबह की धूप छन कर अंदर आ रही थी। अनंतिका को अपना सर यूं घूमता प्रतीत हुआ जैसे उसे अपनी जिंदगी का सबसे बुरा हैंगओवर हुआ हो। उसने एक हाथ से अपना सर पकड़ लिया और आस-पास नज़र घुमाई। बेड पर अपने तकिये के बगल में उसे एक नोट रखा दिखाई दिया।


नोट निखिल का लिखा हुआ था-


“मैंने तुम्हें सुबह उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन तुम काफी गहरा सोई हुई थी। मुझे ऑफिस के लिए निकलना था इसलिए ये नोट छोड़ रहा हूँ, ब्रेकफास्ट बना कर माइक्रोवेव में रख दिया है गर्म करके खा लेना।”


“इसका मतलब पिछली रात जो कुछ भी हुआ वो सपना था?” अनंतिका के मन ने उसके ही चकराए हुए दिमाग से सवाल किया।


“लेकिन ये सपना कैसे हो सकता है। वो सब कुछ मेरे सामने हुआ था। उस बच्ची को मैंने अपनी आँखों के सामने दूसरी मंजिल की सीढ़ियों पर भागते देखा था। वो बर्दाश्त से बाहर ठंड जो सिर्फ जिस्म को ही नहीं बल्कि मेरी आत्मा को भी जैसे जमा रही थी उसकी तड़प को हर पल जिया था मैंने…और…और…अंश का एक-एक स्पर्श, मेरे जिस्म पर फिसलते उसके गर्म होंठों को खुद महसूस किया था मैंने, इतना सजीव भला कोई सपना कैसे हो सकता है?” अनंतिका ने जैसे खुद से ही जिरह लगाईं।


वो अब भी असमंजस में थी।


“दूसरी मंजिल का दरवाज़ा!!” अनंतिका के दिमाग में विचार कौंधा। 


वो बेड से उतर कर गिरते-पड़ते कमरे का दरवाज़ा खोल कर सीढ़ियों को जाते गलियारे में पहुंची। उसने गलियारे में दौड़ लगा दी, लेकिन उसे थोडा ही आगे बढ़कर अपने कदम थाम लेने पड़े। वो भौंचक्की सामने देख रही थी। दूसरी मंजिल को जाती सीढ़ियों का दरवाज़ा यथावत बंद था, उसपर लटकता मोटा ताला जैसे शान से झूलते हुए अनंतिका को मुँह चिढ़ा रहा था। अनंतिका को यूं लगा जैसे वो चक्कर खा कर वहीं गिर पड़ेगी। 


बहुत ही मुश्किल से वो वापस कमरे में लौटी, ठीक उसी समय कॉटिज के मुख्य द्वार की कॉलबेल बजी। अनंतिका ने रूम की खिड़की से नीचे बाहर झाँका, दरवाज़े पर अंश खड़ा हुआ था।


“अंश। तुम यहाँ, सुबह-सुबह?”

अनंतिका अपने बिखरे हुए बालों को समेत कर पोनी टेल के रूप में बांधते हुए बोली। नाईट गाउन में खड़ी अनंतिका को ऐसा करते हुए अंश एकटक देख रहा था। 


अंश के चेहरे पर एक आकर्षक मुस्कान उभरी, उसके गालों पर पड़ने वाले डिंपल और उसकी गोरी त्वचा धूप पड़ने से चमक रहे थे। अंश को जैसे अनंतिका की बात सुनाई ही नहीं दी, वो तो उसे अपने बालों से उलझते-खेलते देखने में मशगूल था। 


अपने बालों से उलझी हुई अनंतिका की नज़र अचानक खुद को घूरते अंश पर पड़ी। अंश को यूं अपनी छातियों की तरफ़ घूरता देख कर अनंतिका को एहसास हुआ कि वो सिर्फ सेमी-ट्रैन्स्पेरेंट नाईट गाउन पहने हुए ही नीचे चली आई है, वो बुरी तरह झेंप गई। उसने अपने हाथ नीचे कर के सीने पर बाँध लिए।


“बताओ, सुबह-सुबह यहाँ क्या कर रहे हो?”


“लगता है आपके घर की घड़ी खराब है,” अंश अपनी रिस्ट वॉच अनंतिका की नज़रों के सामने करती हुई बोला।


“बारह बज गए हैं!” अनंतिका हैरान होते हुए बोली।


उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वो इतनी देर तक सोती रही। पिछली रात का सपना अब भी उसकी आँखों के आगे घूम रहा था। कितना सजीव था सब कुछ। अंश के स्पर्श को याद करते ही अनंतिका के जिस्म ने एक झुरझुरी ली। अंश उसे ही देख रहा था जैसे उसके विचार पढ़ने की कोशिश कर रहा हो।


अनंतिका की नज़रें एक बार फिर अंश की कलाई घड़ी पर पड़ी। वो एक रोमन डायल और खाकी रंग के रग स्ट्रैप वाली बहुत ही पुरानी हैंड वाइंडिंग रिस्ट वॉच थी। जैसी कभी अनंतिका ने अपने बचपन में अपने नाना को पहने देखा था, जिसकी धुंधली सी याद उसे अब भी थी।


“मेरी खानदानी घड़ी है ये, दादा जी को उनके पिता ने दी थी, तब से ये पीढ़ी दर पीढ़ी होते हुए मेरे पिता जी से मुझे मिली है,” घड़ी की ओर गौर से देखती अनंतिका से अंश ने कहा। 


अनंतिका उसे असमंजस के भाव से देख रही थी। उस घड़ी अनंतिका के दिलो दिमाग में एकसाथ इतने विचार कौंध रहे थे कि वो ये भूल ही गई कि अंश दरवाज़े पर खड़ा है और उसने अभी तक अंश को अंदर आने को नहीं कहा है। अंश कुछ देर तक अनंतिका को देखता रहा।

 

“आय एम सॉरी, मैंने शायद गलत टाइम पर आपको डिस्टर्ब कर दिया। आपने कहा था कि मैं आपकी पेंटिंग्स देखने कभी भी आ सकता हूँ, बस इसी लिए चला आया था। मैं फिर कभी आ जाऊँगा,” अंश मुस्कुराते हुए बोला और मुड़कर वापस कॉटिज के गार्डन को क्रॉस करते हुए फ्रंट गेट की ओर बढ़ गया।


“अंश!” 

अनंतिका ने पीछे से आवाज़ दी। 


अंश ने पीछे पलट कर अनंतिका की ओर देखा। 


“कम इनसाइड,” अनंतिका अंश को अंदर आने का इशारा करते हुए बोली।

अंश के चेहरे पर मुस्कान खिल गई। अनंतिका अंश को ही देख रही थी, उसका चेहरा यूं चमक रहा था जैसे किसी बच्चे की अम्युज़मेंट पार्क जाने की जिद मान ली गई हो। अंश के चेहरे पर आए उत्सुकता के भाव देखकर अनंतिका मुस्कुराए बिना ना रह पाई। 

 

अनंतिका अंश को लेकर कॉटिज के ग्राउंड फ्लोर पर बने उस हॉल में पहुंची जिसे उसने अपना आर्ट स्टूडियो बनाया था। वहां कई सारे ईज़ल(पेंटिंग कैनवास रखने के स्टैंड) रखे हुए थे। टेर्पेंटाईन ऑइल, टेक्सचर वाइट, और ऑइल पेन्ट्स की गंध पूरे कमरे में भरी हुई थी जो कि वहां रखे विभिन्न छोटे-बड़े, रंग-बिरंगे डिब्बों से आ रही थी। कुछ कैनवास पर पेंसिल से लाइन आर्ट स्केच की हुई थी, कुछ पर बेस कलर लगाए गए थे लेकिन ज़्यादातर कैनवास खाली थे।


“एग्जिबिशन के लिए नई पेंटिंग सीरीज बना रही हूँ, अभी इसपर काम आगे नहीं बढ़ा है,” अनंतिका कोरे कैनवास की ओर देखते हुए बोली।


“आपके पेंसिल स्ट्रोक्स काफी कॉंफिडेंट और फोर्सफुल हैं। किसी भी आर्टिस्ट के स्ट्रोक्स उसकी पर्सनालिटी के बारे में काफी कुछ बताते हैं,” अंश मुस्कुराते हुए बोला, वो एक कैनवास को गौर से देख रहा था जिसपर एक मेल न्यूड फिगर पेंसिल स्केच किया हुआ था।


“अच्छा! मेरे स्ट्रोक्स क्या बताते हैं मेरे बारे में?” अनंतिका ने मुस्कुराते हुए पूछा। 


अंश ने अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराते हुए अनंतिका को देखा लेकिन उसके सवाल का कोई जवाब ना दिया।


“मेरी बनाई कम्पलीट पेंटिंग्स इधर हैं,” अनंतिका एक ओर रखे कई फिनिश्ड कैनवास की ओर इशारा करते हुए बोली। 

अंश उन पेंटिंग्स की ओर बढ़ गया। 

 

फर्श पर रखे कैनवास करीब से देखने के लिए वो घुटनों के बल नीचे फर्श पर बैठ गया और एक-एक कैनवास उठा कर करीब से देखने लगा। ज़्यादातर पेंटिंग्स कंटेम्पररी स्टाइल में बनी हुई थीं, ज़्यादातर फिगरेटिव और न्यूड्स थे।


“आपकी फिगर स्टडी काफी अच्छी है अनंतिका, वर्ना आजकल तो ज़्यादातर आर्टिस्ट फ्री-स्टाइल और एब्सट्रैक्ट आर्ट का बहाना बना कर सिर्फ आड़ी-तिरछी लाइंस खींचते हैं और उसे अपने विचारों की अभिव्यक्ति साबित करने पर तुले रहते हैं जबकि वास्तविकता में उनसे एक ह्यूमन फिगर ड्राइंग भी ढंग से नहीं बन सकती,” अंश प्रशंसात्मक भाव से बोला।


“थैंक यू अंश,” अनंतिका ने मुस्कुराते हुए कहा। 


अनंतिका ने ध्यान दिया कि फर्श पर बैठे अंश की निगाहें बार बार उसके नाईट गाउन ने निचले हिस्से पर जा रही थी जो कि अनंतिका की जाँघों पर आकर खत्म हो रहा था। अनंतिका झेंप गई।


“तुम पेंटिंग्स देखो मैं अभी आती हूँ,” 

 

अनंतिका ने अंश से कहा और वहां से निकल कर सीढ़ियों की ओर बढ़ गई। अनंतिका पहली मंजिल पर अपने बेडरूम में पहुंची। उसने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और वार्डरॉब से कपडे निकालने लगी। अपनी पसंद के कपडे निकाल कर उसने बेड पर रखे और नाईट गाउन अपने जिस्म से उतारा। अनंतिका ने अपने हाथ बेड पर रखे अंडरगारमेंट्स की ओर बढ़ाए ही थे कि उसे महसूस हुआ कि उसके ठीक पीछे बेडरूम के दरवाज़े पर कोई उसे खड़ा घूर रहा है। 


 अनंतिका चौंक कर पीछे पलटी। दरवाज़े पर कोई नहीं था लेकिन बेडरूम का दरवाज़ा खुला हुआ था जैसे वहां कोई हो जबकि अनंतिका ने बेडरूम में आते ही सबसे पहले दरवाज़ा बंद किया था। उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि उसने बेडरूम का दरवाज़ा बंद करके अन्दर से चिटकनी क्यों ना लगाईं। उसे ऐसा करना चाहिए था, वो भी तब जब वो जानती थी कि उसके अलावा कॉटिज में अंश उपस्थित है। अंश! क्या ये अंश की हरकत थी? क्या अंश उसके पीछे ऊपर बेडरूम तक आया था? 


 अनंतिका को बहुत ज्यादा गुस्सा आ रहा था। उसने दरवाज़ा बंद करके ऊपर से चिटकनी लगाईं और जल्दी से कपडे पहने। फिर वो आंधी-तूफ़ान की तरह सीढ़ियों को रौंदती हुई नीचे स्टूडियो हॉल में पहुंची। 

“आप बहुत टैलेंटेड हैं अनंतिका, क्या आप मुझे पेंटिंग टेक्निक्स में गाइड करेंगी?” अनंतिका को वापस आया देखकर अंश निश्छल भाव से मुस्कुराते हुए बोला।


“अंश, क्या तुम मेरे पीछे ऊपर आए थे?” अनंतिका का स्वर भावहीन था।


“नहीं, मैं तो यहीं बैठा पेंटिंग्स देख रहा था,” अंश कंधे उचकाते हुए निर्विकार भाव से बोला।


अनंतिका तय नहीं कर पा रही थी कि अंश सच बोल रहा है या झूठ। ऐसा भी हो सकता था कि अंश सच बोल रहा हो, दरवाज़ा हवा से खुल गया हो। लेकिन बंद कॉटिज के अंदर इतनी तेज़ हवा कहाँ से आएगी जो लगे हुए दरवाज़े को खोल दे?


“वैसे आपको आर्ट स्टूडियो के लिए कॉटिज की दूसरी मंजिल का हॉल इस्तेमाल करना चाहिए था, वो इस हॉल से ज्यादा बड़ा है। आपको ज्यादा स्पेस मिलता और वहां से आपको इस एरिया के पीछे वाले जंगल का भी अच्छा व्यू मिलता,” अंश अपनी जगह से उठते हुए बोला।


“तुमने इस कॉटिज की दूसरी मंजिल देखी है?” अनंतिका ने चौंकते हुए कहा।


“आपने शायद ध्यान नहीं दिया, इस कॉटिज और मेरी कॉटिज का एक्सटीरियर आर्किटेक्चरल डिज़ाइन ही नहीं बल्कि इंटीरियर भी हूबहू एक जैसा है,” अंश अनंतिका के पास आते हुए बोला।


अनंतिका ने वाकई इस बात पर ध्यान नहीं दिया था।


“लेकिन ऐसा क्यों?”


“रोमेश दीवान, जिनकी ये कॉटिज है वो और मेरे पिता बहुत गहरे दोस्त थे। उनकी दोस्ती के किस्से पूरे चकराता में मशहूर थे,” अंश मुस्कुराते हुए बोला, “दोनों के ही पास पुश्तैनी हवेली थी लेकिन फिर भी दोनों दोस्तों ने एक ही जगह पर अगल-बगल हूबहू कॉटिज बनवाए,”


“कमाल की बात है,” अनंतिका कुछ सोचते हुए बोली।


“अब आप किस सोच में पड़ गयीं?” अंश ने अनंतिका की तरफ देखकर पूछा। 


“क…कुछ नहीं।” अनंतिका के माथे पर उलझन बल बनकर बिखरी हुई थी। 


“बताओ भी!”


“म…मुझे कभी-कभी लगता है कि…कि…मेरे अलावा भी इस कॉटिज में कोई है,”


“सही लगता है आपको। आपके अलावा भी इस कॉटिज में कोई है,” अंश के चेहरे पर बेहद गंभीर भाव थे। 


“क..कौन?” अनंतिका का चेहरा सफ़ेद पड़ रहा था। 


अंश अपना चेहरा हौले से अनंतिका के करीब लाया, ‘निखिल…आपके बॉयफ्रेंड, वो रहते हैं ना यहाँ आपके अलावा,” अंश यूं अनंतिका के कान में फुसफुसाते हुए बोला जैसे उसे बहुत ही राज़ की बात बता रहा हो।


“स्टॉप इट अंश!” खिलखिलाते हुए अनंतिका ने एक हल्की चपत अंश के सर पर लगा दी।


“वेट।।वेट…कोई और भी है,” अंश उसे रोकते हुए बोला। अंश का चेहरा इस बार सच में गंभीर था। अनंतिका भी ठिठक गई।


“वो काली बिल्ली जो कल शाम दिखी थी,” अंश अपनी हंसी और नहीं रोक पाया। पेट पकड़ कर हँसते हुए बोला।


“रुक जा तुझे बताती हूँ,” अनंतिका भी खिलखिलाते हुए बोली और अंश को मारने के लिए उसके पीछे भागी। 


अंश उससे बचते हुए वहां रखे ईज़्ल्स के पीछे छुपने लगा। अंश और अनंतिका में लुका-छुपी का खेल शुरू हो गया था। कुछ देर के लिए अंश के साथ अनंतिका सब कुछ भूल गई। अपना डर, पिछली रात का ख़ौफ़, उसका दुस्वप्न और…निखिल!


***


ऑफिस में बैठे निखिल को चैन नहीं पड़ रहा था। 


उसने पांचवीं बार अनंतिका के मोबाइल पर कॉल लगाया। इस बार भी पूरी रिंग जाने के बाद कॉल मिस्ड हो गई। ऐसा कभी नहीं होता था कि अनंतिका निखिल का कॉल ना उठाए। सुबह इम्पॉर्टेन्ट मीटिंग की वजह से निखिल अनंतिका को सोते हुए ही उसके लिए नोट छोड़ कर आया था, अब उसे अनंतिका की चिंता बुरी तरह सता रही थी। कहीं अनंतिका की तबियत तो खराब नहीं हो गई थी? 


पिछली रात अनंतिका से बहस करने के लिए भी अब निखिल को बुरा लग रहा था। उसने जैसे-तैसे सुबह की मीटिंग तो निपटा ली थी लेकिन अब एक पल भी उसे ऑफिस में रुकना दुश्वार लग रहा था। निखिल अपने ऑफिस केबिन से बाहर निकला। 


प्रेरणा ने ख़ास तौर पर अपने ऑफिस केबिन के बगल वाले केबिन को निखिल के लिए व्यवस्थित करवाया था। निखिल डायरेक्टली प्रेरणा दीवान को आंसरेबल था, ऑफिस में किसी भी अन्य एम्प्लॉई को अनुमति नहीं थी कि वो निखिल से सवाल-जवाब करें।


“प्रेरणा , कैन आय हैव ए वर्ड विद यू,” हड़बड़ाए हुए निखिल ने प्रेरणा के ऑफिस केबिन में प्रवेश किया।


“श्योर निखिल। क्या बात है तुम परेशान लग रहे हो?” प्रेरणा ने अपने लैपटॉप से नज़रें उठाते हुए कहा।


“इट्स अबाउट अनंतिका। वो फोन नहीं उठा रही है। आइ होप शी’ज़ फाइन, पर मैं वापस कॉटिज जाकर चेक करना चाहता हूँ कि वो ठीक तो है,”


“ऑफ़ कोर्स निखिल। तुम जाओ, और जैसी भी स्थिति होगी मुझे इन्फ़ॉर्म करना। आय’म श्योर अनंतिका ठीक होगी, कहीं बिजी होने की वजह से वो तुम्हारे कॉल्स नहीं ले पा रही होगी,”


निखिल ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ प्रेरणा का अभिवादन किया और फिर आंधी-तूफ़ान की तरह वहां से बाहर निकल गया। अपनी एग्जीक्यूटिव चेयर पर बैठी प्रेरणा विचारों के भंवर में फंसी हुई थी। उसने अपने मोबाइल फोन की गैलरी खोली, कुछ पुरानी यादें जो अब भी उसने अपने साथ संजोयी थी मोबाइल स्क्रीन पर सजीव हो उठी। 


प्रेरणा के चेहरे पर एक के बाद एक कई भाव आए और गए। ठीक उसी समय उसका मोबाइल बजा। मोबाइल पर फ़्लैश हो रहे नाम को देखकर प्रेरणा की आँखें जैसे अविश्वास से फैलीं। वो इस कॉल की अपेक्षा नहीं कर रही थी।


***


“ओके-ओके, आइ गिव अप!” अंश ने हँसते हुए अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और सरेंडर करने की मुद्रा में कहा।


अनंतिका भी हंसती हुई अंश की ओर बढ़ रही थी, ठीक उसी समय स्टूडियो में कुछ हलचल ही। एक खाली ईज़ल के पीछे छुपी हुई काली बिल्ली अपनी जगह से निकल कर अंश व अनंतिका के बीच का रास्ता काटते हुए तेज़ी से भागी। 


बिल्ली से टकराकर फर्श पर रखा एक कैन गिर गया जिसमें भरा हुआ टरपेंटाइन ऑइल फर्श पर बिखर गया। इससे पहले कि आगे बढती अनंतिका कुछ समझ पाती वो बुरी तरह नीचे फैले टरपेंटाइन ऑइल पर फिसल कर सामने खड़े अंश से टकराई। अंश भी अपना संतुलन कायम ना रख सका और अनंतिका को लिए हुए नीचे फर्श पर जा गिरा। नीचे गिरते हुए अंश और अनंतिका टरपेंटाइन ऑइल के पास ही रखे कलर कैन्स से टकराए, नतीजतन एक-एक कर के गिरते कैन्स से तरल रंग अंश और अनंतिका को सराबोर करते चले गए। 


अंश फर्श पर पीठ के बल चित्त गिरा हुआ था और अनंतिका उसके सीने पर थी। दोनों टरपेंटाइन ऑइल और विभिन्न रंगों से यों सने हुए थे जैसे अभी-अभी होली खेली हो। रंगों की गंध उनके जिस्म की एक होती खुशबू के साथ घुल रही थी। कुछ पलों के लिए उनकी सासें जैसे रंगों की चिपचिपाहट में ही फंस कर रह गईं। अब वो हंस नहीं रहे थे, सिर्फ एक-दूसरे की आँखों में अपने आपको निहार रहे थे। 


अनंतिका के कपोलों के ऊपर लाल रंग के कुछ छींटे बिखरे हुए थे। अंश ने हौले से अपनी उंगलियाँ अनंतिका के नाज़ुक कपोलों पर फिराई, अनंतिका के होंठ रंग की और चेहरा शर्म की लालिमा से सुर्ख हो उठे। 


अनंतिका के होंठ और उसकी सासें अंश के स्पर्श से थर्रा रहे थे। नियति बार-बार अनंतिका और अंश को करीब ला रही थी, बहुत ज्यादा करीब। अंश को लेकर अनंतिका बहुत ज्यादा पशोपेश में थी। जब अंश उसके सामने नहीं होता था तब अंश को लेकर उसके मन में अनेकों संशय होते थे और जब अंश उसके सामने होता था तब वो सारे संशय जैसे जिस्मों के ताप में वाष्पित हो जाते। अनंतिका ने अंश की उँगलियों को आगे बढ़ने से थाम लिया और उसका सहारा लेकर खड़ी हुई, अंश ने भी खुद को सम्भाला और अनंतिका के पीछे खड़ा हुआ।


आंधी-तूफ़ान की तरह गाड़ी उड़ाता हुआ निखिल कॉटिज तक पहुंचा। कॉटिज के फ्रंट गेट से कॉटिज के मेन डोर तक का फासला भी उसने लगभग उड़ते हुए ही तय किया। उसने कॉटिज की ‘पुल रोप बेल’ खींची, कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। 


निखिल का दिल बैठने लगा, वो पागलों की तरह लगातार बेल को खींचने लगा। थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला, हांफती हुई अनंतिका उसके सामने खड़ी थी।


“न…निखिल! तुम ठीक तो हो? तुम इस समय यहाँ क्या कर रहे…” अनंतिका अपनी बात पूरी भी ना कर पाई, निखिल ने उसे अपने पास खींच लिया और यूं अपनी बाहों में लपेट लिया जैसे उसे डर हो कि अगर उसने अनंतिका को छोड़ा तो वो उसे कभी मिलेगी ही नहीं।


“अ…आइ एम सॉरी अनी…कल रात के लिए… त…तुम फ़ोन क्यों नहीं उठा रही थी…कितना डर गया था मैं तुम्हारे लिए," अनंतिका को खुद से भींचते हुए निखिल एक ही सांस में बोल गया।


“इट्स ऑल राइट निखिल…म…मैं बहुत लेट से सो कर उठी, अभी मैं शावर लेने चली गई थी। मैंने रात शायद मोबाइल वाइब्रेशन पर लगाया था और उसे चेक करना ही भूल गई," अनंतिका प्यार से निखिल के बालों में उंगलियाँ फिराते हुए बोली।


उस घड़ी उसके दिमाग में एक ही बात चल रही थी, अगर निखिल मात्र दस मिनट पहले वहां आ गया होता तो उसके लिए रंगों में सराबोर, एक-दूसरे से उलझे हुए अंश और अपनी स्थिति उसे समझा पाना बेहद मुश्किल हो जाता। ग़नीमत थी कि अंश दस मिनट पहले ही वहां से निकल गया था और अनंतिका खुद को साफ़ करने के लिए शावर लेने चली गई थी। उस दिन वाकई उसे जगने के बाद से ना ही अपना फोन चेक करने का मौका मिला ना ख्याल आया।


“मैं बता नहीं सकता मेरे दिमाग में कैसे-कैसे ख्याल आ रहे थे,” निखिल चैन की सांस लेते हुए बोला।


“अच्छा! जरा मैं भी तो सुनूँ, कैसे-कैसे ख्याल आ रहे थे?” अनंतिका शरारत भरी नज़रों से निखिल की आँखों में झांकते हुए बोली। 


निखिल ने जवाब देने की बजाए अनंतिका को गोद में उठा लिया और कॉटिज के अंदर जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। 


अन्दर आते ही आते ही निखिल के होंठ अनंतिका के होंठों से उलझ गए और उसकी ज़बान अनंतिका की ज़बान का आलिंगन करने लगी। रात की तरह इस समय अनंतिका ने उसे रोकने की कोशिश ना की। इसकी एक बड़ी वजह शायद यह भी थी कि आज जिंदगी में पहली बार अनंतिका अपराध बोध से ग्रस्त थी। अंश को लेकर उसके मन में जन्म ले रही भावनाएँ उसे निखिल के प्रति विश्वासघात करने का बोध करा रही थीं। 


अनंतिका हमेशा से ही उन्मुक्त और स्वच्छंद विचारधारा वाली लड़की थी, अनगिनत लड़कों के साथ उसके अन्तरंग रिश्ते रहे लेकिन अनंतिका ने एक ही समय पर कभी भी दो लोगों से रिश्ता नहीं रखा। अनंतिका जानती थी कि वो ‘सीरियल मोनोगमिस्ट’ है। वो जब भी किसी के साथ एक रिश्ते में रहती थी उस व्यक्ति और रिश्ते के प्रति बेहद वफादार और ईमानदार रहती थी। कभी भी अपने एक रिश्ते के दौरान वो किसी अन्य से रिश्ता स्थापित नहीं करती थी। ये अलग बात है कि उसकी स्वतंत्र सोच, स्वच्छंद विचारधारा और उन्मुक्त जीवनशैली के कारण उसका कोई भी रिश्ता अधिक लम्बा नहीं चलता था। 


उसके रिश्तों के ना चल पाने की बड़ी वजह यह भी थी कि अनंतिका शादी के लिए कभी भी कमिट नहीं कर सकती थी। उसे शादी की प्रथा से ही दिक्कत थी, रिश्ते के साथ बोझ के रूप में आई जिम्मेदारियों और जवाबदेहियों से दिक्कत थी। उसने अपने पिछले संबंधों और उनके टूटने के कारणों को लेकर निखिल को कभी भी अँधेरे में नहीं रखा, अपनी तरफ से वो अब तक निखिल के साथ अपने सम्बन्ध में बिलकुल पारदर्शी थी लेकिन आज उस रिश्ते की पारदर्शिता धूमिल पड़ रही थी और इसके लिए अनंतिका खुद को ज़िम्मेदार मान रही थी।


निखिल ने अनंतिका के कपडे उसके जिस्म से अलग कर वहीं हॉल में ही फेंक दिए, अनंतिका ने प्रतिवाद ना किया। निखिल के होंठ पुनः अनंतिका के होंठों से उलझ गए, वो उसे गोद में उठा कर सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते अनंतिका निखिल की शर्ट के बटन खोल चुकी थी। बेडरूम तक पहुँचते-पहुँचते निखिल की शर्ट उसके जिस्म से अलग होकर पहली मंजिल से उड़ते हुए नीचे हॉल के फर्श की ओर बढ़ रही थी।


अंश शावर के नीचे खड़ा हुआ था, उसकी पीठ पर गिरती पानी की फुहार रंगों को उसके जिस्म से कतरा-कतरा कर धो रही थीं। वॉशरूम के फर्श के सफ़ेद टाइल पर पाने के साथ धुलते हुए वो रंग एक लकीर खींच रहे थे, अंश उन धुलते हुए रंगों को देख रहा था। वो उसे अनंतिका के स्पर्श, उसके जिस्म की गर्माहट, उसकी खुशबू का एहसास अब भी दे रहे थे। अंश ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसकी बंद आँखों के सामने अनंतिका का ही अक्स उभरा। अंश उस घड़ी अनंतिका के अपने साथ वहां शावर में होने की कल्पना करने लगा, उससे अब ये बेचैनी बर्दाश्त नहीं हो रही थी। उसके हाथ अपनी जाँघों के बीच बढ़ गए।


“आज शाम कहीं बाहर घूमने चलते हैं। हम जबसे यहाँ आए हैं कहीं बाहर नहीं निकले,” निखिल अनंतिका की पीठ सहलाते हुए बोला। निखिल इत्मीनान से पीठ के बल बेड पर लेटा था, अनंतिका उसके सीने पर अपना सर टिकाए उसके ऊपर लेटी थी। दोनों के जिस्म पर मात्र एक चादर थी जो कि दोनों को कमर से नीचे ढकी हुई थी। 


“दैट्स ए ग्रेट आईडिया,” अनंतिका चहकते हुए बोली। वाकई उसे बाहर खुली हवा में सांस लेने की सख्त ज़रूरत महसूस हो रही थी।


शाम को अनंतिका और निखिल अपनी एस.यू.वी. में चकराता भ्रमण पर निकले। चकराता वाकई खूबसूरत जगह थी, छोटे-बड़े जंगली इलाकों, पहाड़ों और झीलों से घिरी हुई। वहां कई पुराने खँडहर थे, पुरानी इमारतें थीं तो अर्बन टाउनशिप भी थी। पूरी शाम घूमने के बाद निखिल और अनंतिका डिनर करने के लिए चकराता हाई-वे पर बने एक पुराने से दिखने वाले फ़ूड जॉइंट पर पहुंचे।


‘करीम’स कबाब्स’ नामक उस फ़ूड जॉइंट को एक वृद्ध दम्पति चला रहे थे जिनकी आयु लगभग 60-65 के फेरे में होगी। जगह छोटी और थोड़ी पुरानी सी दिखने वाली ज़रूर थी लेकिन थी बेहद आराम व सुकून दायक। इसके साथ ही कबाब की इतनी वराइयटी और ऐसा लज़ीज़ स्वाद निखिल और अनंतिका ने अपने पूरे जीवन में नहीं चखा था। फ़ूड जॉइंट में कोई वेटर नहीं था, वृद्ध दम्पति स्वयं ही कुक करने और सर्व करने का काम कर रहे थे। उस छोटे से फ़ूड जॉइंट में एक हिस्से की दिवार पर बुक शेल्फ लगे हुए थे जिनपर इंग्लिश, हिंदी लिटरेचर, मैगज़ीन और बच्चों के लिए कॉमिक बुक्स करीने से सजी हुई थीं। वहां आने वाले व्यंजनों के साथ साहित्य का लुत्फ़ भी उठा सकते थे। एक दिवार पर लाइन से कई फ्रेम्स में ब्लैक एंड वाइट तस्वीरें लगी हुई थीं जो कि देखने में वृद्ध दम्पति के युवावस्था की लग रही थीं। 


“बहुत ही सुन्दर तस्वीरें हैं,” अनंतिका करीब से तस्वीरों को देखते हुए बोली।


“यूसुफ़ बहुत हैण्डसम लगते थे ना तब। मैंने जब पहली बार इन्हें देखा था तब ये मुझे क्लिन्ट ईस्टवुड जैसे नजर आए थे, डैशिंग, फुल ऑफ़ चार्म,” वृद्धा अनंतिका के पास आते हुए बोलीं, उनके हाथ में एक सर्विंग ट्रे थी जिसमें रखी ग्लास प्लेट पर दुम्बे के कबाब सजाए हुए थे जिन पर जिंजर जूलिंस के साथ बारीक कटी प्याज़ और धनिया पत्ती गार्निश किए हुए थे, साथ में दही और पुदीने की चटनी थी। 


अनंतिका ने मुस्कुराते हुए वृद्धा के हाथ से सर्विंग ट्रे ले ली।


“फातिमा भी अपनी जवानी के दिनों में बिलकुल जर्मन एक्ट्रेस कैरिन डॉर जैसी नज़र आती थीं। तभी तो इन्हें देखते ही दिल दे बैठा था मैं। उस ज़माने में लव मैरिज आज जितनी आसान क़तई ना थी। इनसे ज्यादा तो इनके अब्बा को निकाह के लिए मनाने में वक्त लग गया,” ओपन किचेन से वृद्ध यूसुफ़ तवे पर गलौटी कबाब पलटते हुए बोले।


अनंतिका और निखिल मुस्कुराए बिना ना रह पाए। निखिल ने अनंतिका के हाथ में थमी ट्रे से कबाब का पीस उठाया और खाने लगा।


“मम्म…इतने लज़ीज़ कबाब मैंने आजतक नहीं खाए,” निखिल ने कबाब चट करते हुए अपना हाथ दूसरे कबाब की ओर बढ़ाया, अनंतिका ने पूरी ट्रे ही उसे थमा दी। 


निखिल उसे देखकर बेशर्मी से मुस्कुराया और ट्रे लेकर अपनी टेबल पर जा बैठा। कुछ ही पलों में निखिल खाने में व्यस्त था, अनंतिका दिवार पर लगी बाकी फोटोग्राफ्स देख रही थी। आगे फोटोग्राफ्स रंगीन हो गई थीं जिनमें दम्पति के साथ एक छोटा बच्चा भी नजर आ रहा था।


“करीम, हमारा इकलौता बेटा,” फातिमा फोटो को देखकर मुस्कुराते हुए बोलीं।


अनंतिका ने फातिमा की आवाज़ में आई थर्राहट में छुपे अपार स्नेह के साथ असीम वेदना को स्पष्ट महसूस किया। आगे की फोटोग्राफ्स करीम के बचपन से युवावस्था तक की थीं जिन में करीम अंश की उम्र के आस-पास नजर आ रहा था। उसके आगे की कोई फोटोग्राफ्स वहां नहीं थी। अनंतिका ने फातिमा की ओर देखा, फातिमा की आँखें भर गईं थीं।


“एकदम अपने अब्बा पे गया था करीम। डैशिंग, हैंडसम एंड ए फाइन जेंटलमैन,” वृद्ध फातिमा की आवाज़ में दर्द के साथ गर्व के भाव भी झलक रहे थे।


“आपका बेटा…”


“दो साल पहले एक हादसे में करीम हम दोनो को अकेला छोड़ कर चला गया,” फातिमा करीम की युवावस्था की एक फोटो पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोलीं।


“आइ एम सॉरी,” अनंतिका उनके कंधे पर हाथ रखते हुए बोली।


“ऊपर वाले के आगे किसी कि नहीं चलती बेटा, जवान लड़के का जनाजा बाप के कंधों पर दुनिया का सबसे भारी बोझ होता है…बट लाइफ मूव्स ऑन। जिंदगी चलती रहती है, वो जाने वाले के लिए नहीं रूकती,” ओपन किचेन से बहार आते यूसुफ़ ने कहा। उनके हाथ में गलौटी कबाब की ट्रे थी, अनंतिका ने आगे बढ़कर ट्रे उनसे ले ली और निखिल के सामने ही टेबल पर रख दी।


“करीम’स कबाब्स के रूप में हम अपने बच्चे की यादों को जिंदा रखे हुए हैं, जिन्हें यहाँ आने वाले लोगों के साथ बांटते हैं,” यूसुफ़ और फातिमा भी अनंतिका और निखिल के पास की टेबल पर बैठ गए। उस घड़ी फ़ूड जॉइंट में दूसरा कोई कस्टमर नहीं था, काफी देर तक उन चारों में बात-चीत का सिलसिला चलता रहा।


“आप दोनों से मिलकर बहुत ज्यादा अच्छा लगा। इस उम्र में भी आप दोनो प्यार और जिंदा दिली की जीती-जागती मिसाल हैं,” अनंतिका मुस्कुराते हुए बोली।


“आप लोग भी बहुत प्यारे बच्चे हैं। अच्छा लगता है जब कोई आप लोगों सा बाहर से आता है और कुछ पल यूं ही बांटता है,” फातिमा के चेहरे पर भी सहज मुस्कान उभरी।


“वैसे आप दोनों यहाँ चकराता में रह कहाँ रहे हैं?”  यूसुफ़ ने निखिल से पूछा।


“प्रेरणा दीवान की कॉटिज में। मैं यहाँ पी.डी. कॉर्प्स के एकाउंट्स हैंडल करने के सिलसिले में आया हूँ,”


“दीवान कॉटिज,” वृद्ध दम्पति के चेहरे पर एकाएक कई भाव आए और गए। 

अनंतिका ने महसूस किया कि वृद्ध दम्पति दीवान कॉटिज का नाम सुनते ही कुछ तनाव में आ गए थे। फातिमा कुछ बोलना ही चाह रही थीं लेकिन यूसुफ़ ने जैसे उन्हें आँखों के इशारे से ही बोलने से मना कर दिया। 


“क्या बात है? आप लोग दीवान कॉटिज के नाम से इस तरह चौंक क्यों गए?” अनंतिका से पूछे बिना रहा नहीं गया।


“क…कुछ नहीं बेटा। बस उस पुराने हादसे की याद आ गई थी…” फातिमा कुछ बोल ही रहीं थीं जब यूसुफ़ ने उनकी बात बीच में ही काट दी। 


“फातिमा, वो सब पुरानी बातें हैं। उन्हें बेवजह दोहरा कर इन बच्चों को क्यों परेशान करना,”

अनंतिका ने महसूस किया कि यूसुफ़ ने यद्यपि यह बात कठोरता पूर्वक नहीं कही थी लेकिन उनकी आवाज़ आदेशात्मक थी, फातिमा चुप हो गईं।


“कैसा हादसा?” इस बार सवाल निखिल ने पूछा। 

निखिल अपने कबाब खत्म कर चुका था और उसकी भंगिमाओं से स्पष्ट था कि वो अनंतिका, यूसुफ़ व फातिमा की बातें भी सुन चुका था। 


“ये बात काफी साल पहले की है जब रोमेश दीवान जिंदा थे। एक परिवार को ये कॉटिज किराए पर रहने के लिए दिया गया था। उस परिवार के साथ एक…एक हादसा हो गया था,” फातिमा ने एक नज़र यूसुफ़ पर डाली, इससे पहले कि यूसुफ़ कुछ कहते फातिमा ने बोलना शुरू कर दिया।


“कैसा हादसा?”


“वहां रहने वाले पूरे परिवार ने आत्महत्या कर ली थी। हस्बैंड और वाइफ की लाश दूसरी मंजिल पर बरामद हुई थी जबकि उनकी आठ साल की बच्ची की लाश तीसरी मंजिल पर पाई गई थी,”


फातिमा एक ही सांस में बोल गईं।


अनंतिका के चेहरे का रंग पीला पड़ गया था। वो पागलों की तरह आँखें फाड़े हुए फातिमा को देख रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले। क्या उसे पिछली रात और उस छोटी बच्ची के बारे में बताना चाहिए जिसे उसने कॉटिज में दूसरी मंजिल की ओर जाते देखा था? लेकिन निखिल को तो उसकी इस बात पर ही यकीन नहीं हो रहा था कि उसने पार्टी के दौरान पहली मंजिल की खिड़की पर किसी को देखा था। नहीं, निखिल उसकी बात पर किसी हाल में यकीन नहीं करने वाला था उल्टा उन दोनों में फिर से पिछली रात की तरह बहस शुरू हो जाती। अनंतिका ने निखिल की ओर देखा, निखिल भी कॉटिज के बारे में हुए ताज़ा रहस्योद्घाटन से थोडा विचलित नजर आ रहा था।


“लेकिन उस परिवार ने सुसाइड क्यों किया?” निखिल ने गंभीर भाव से सवाल किया।


“कोई नहीं जानता, इस बात को हो भी तो काफी साल गए हैं। फातिमा ने बेकार ही आप लोगों को इस बदमज़ा किस्से के बारे में बता दिया, मैं इसीलिए इसे मना कर रहा था,” यूसुफ़ ने बात ख़ारिज करने के अन्दाज़ में कहा।


इसके बाद वो लोग कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करते रहे, अनंतिका ने ध्यान दिया कि कॉटिज के बारे में कोई भी बात करने से अब वृद्ध दम्पति बच रहा था। 

जब अनंतिका और निखिल ‘करीम’स कबाब्स’ से निकले तब रात के लगभग आठ बज रहे थे। 


पूरे रास्ते उनमें कोई विशेष बातचीत नहीं हुई। अनंतिका के दिमाग में वृद्ध दम्पति की बातें घूम रही थीं। आठ साल की बच्ची! उसने भी लगभग उसी उम्र की बच्ची देखी थी। लेकिन दीवान कॉटिज के बारे में अंश और उसकी माँ ने उन्हें कुछ भी क्यों ना बताया? अनंतिका ने मन ही मन निश्चय किया कि वो अगली बार मिलने पर अंश से इस विषय में अवश्य बात करेगी।


गाड़ी कॉटिज के बाहरी गेट पर आकर रुकी।


“निखिल, मुझे ठीक नहीं लग रहा…म…मैं इस कॉटिज में नहीं जाना चाहती,” अनंतिका गाड़ी में बैठे हुए ही बोली।


“डोंट बी सिली अनी, तुमने सुना ना मिस्टर यूसुफ़ ने क्या कहा था। वो इंसिडेंट कई सालों पहले हुआ था। अब उसके बारे में क्या डरना,”


“मुझे इस जगह से अच्छी वाइब्स नहीं आती निखिल,”


“तुम यहाँ आने पर कितनी एक्साइटेड थी अनी, तुम्हें यही तो चाहिए था, एक ऐसी जगह जहां तुम शान्ति से कन्सेंट्रेट करके अपनी पेंटिंग्स पर काम कर सको। अब तुम्हें ये ऑपरट्यूनिटी मिली है तो स्टुपिड कंट्रीसाइड रुमर्स और स्पूक स्टोरीज के पीछे उसे क्यों गंवाना चाहती हो” निखिल उसे समझाते हुए बोला।


अनंतिका चुप हो गई, वो जानती थी कि निखिल से बहस करने का कोई फायदा नहीं था। उसकी नज़रें अनायास ही बगल वाली कॉटिज के फर्स्ट फ्लोर की खिड़की पर चली गई। अंश वहां खड़ा हुआ था और उनकी गाड़ी की दिशा में ही देख रहा था। अंश शायद वो इकलौती वजह था जिसके लिए अनंतिका को उस मनहूस कॉटिज में रहना मंज़ूर था।


सच यही था कि जितनी देर वो निखिल के साथ बाहर थी अंश की यादों से दूर थी, वहां वापस आते ही जैसे अंश की कशिश उसे खींच रही थी। उसने निखिल की ओर देखा, अपराध बोध एक बार फिर से उसपर हावी होने लगा। 


अनंतिका ने अपना सर झटका, जैसे वो अंश के विचार को ही खुद से दूर कर देना चाहती हो। अनंतिका ने मन ही मन फैसला किया कि वो अंश के प्रति बेलगाम हो रहे अपने आकर्षण को अंकुश लगाएगी। निखिल ने आहिस्ता से अनंतिका के पैर पर हाथ रखा।


“अनी...अनी, आर यू ओके?”


अनंतिका ने उसकी ओर देखा, निखिल को उसकी आँखों में गुलाबीपन झलकता नज़र आया। इससे पहले कि निखिल कुछ समझ पाता अनंतिका उसके ऊपर झपट पड़ी, अनंतिका के होंठ निखिल के होंठों से उलझ गए। निखिल ने उसे अपनी बाहों में भर लिया, अनंतिका ने अपने दांतों के बीच निखिल का निचला होंठ भींच लिया। निखिल के मुँह से हल्की सी सिसकारी निकल गई। अनंतिका निखिल का चेहरा बेतहाशा चूम रही थी।


“होल्ड योर हॉर्सेज स्वीटहार्ट। गाड़ी अन्दर तो पार्क कर लेने दो,” निखिल अपना चेहरा अनंतिका से अलग करते हुए बोला।


“नो! आइ वान्ना डू इट राइट हियर, राइट नाओ!!” अनंतिका ने दृढ़ भाव से कहा, इससे पहले कि निखिल उसका प्रतिवाद कर पाता उसने अपना टॉप उतार कर पीछे की सीट पर फेंक दिया। निखिल ने मुस्कुराते हुए सीट का लैच खींचा, सीट पीछे सरक गई। निखिल और अनंतिका की दहकती साँसों की तपिश से एस.यू.वी. के बंद शीशे वाष्पित होने लगे। निखिल की आँखें बंद थीं, वो अनंतिका के जिस्म को अपने जिस्म पर फिसलते महसूस कर रहा था। अनंतिका ने एक चोर दृष्टि बगल वाली कॉटिज के फर्स्ट फ्लोर की खिड़की पर डाली, अंश अब भी वहीं खड़ा था और एकटक उसे ही देख रहा था।


“लेट्स गो इनसाइड,” अनंतिका निखिल के कान में फुसफुसाई। 


“अब क्या हो गया? अभी तो तुम्हें यहीं करना था?” निखिल अचरज से बोला।


“स्पेस कम है मूव्स के लिए, अकाउंटेंट साहब,” अनंतिका खिलखिलाते हुए शरारती भाव से बोली।


निखिल ने जैसे-तैसे गाड़ी अंदर पार्क की। अनंतिका और निखिल किसी हनीमून पर आए नवविवाहित जोड़े की तरह एक-दूसरे से उलझते-जूझते किसी तरह कॉटिज के अंदर अपने बेडरूम तक पहुंचे। उस पूरी रात उन दोनों ने एक दूसरे को सोने ना दिया। भोर होने तक पूरे कॉटिज में दोनों की सिसकारियाँ गूंजती रही। जब अंततः दोनों एक-दूसरे की बाहों में थक कर ढेर हुए तब उन्हें पता भी ना चली कि किस क्षण वो दोनों गहरी नींद के आगोश में डूब गए।


अनंतिका की आँखें खुलीं। चारों तरफ गहन अन्धकार था। उसने उठने की कोशिश की पर उसे ऐसा लगा जैसे उसके पूरे शरीर को लकवा मार गया हो। उसके जिस्म ने हिलने से इनकार कर दिया। अनंतिका की सासें उखड़ने लगीं, वो चिल्ला कर निखिल को बुलाना चाहती थी लेकिन उसके गले से भी कोई आवाज़ ना निकली। 


अनंतिका ने गर्दन और चेहरा अगल-बगल घुमाने की कोशिश की लेकिन कर ना पाई। पीठ के बल सीधी लेटी अनंतिका ने अपनी आँखों की पुतलियों को बगल में घुमाया। उसके बगल में बेड खाली था, निखिल वहां नहीं था। निखिल को वहां ना पा कर अनंतिका ने अपनी नज़रें चारों तरफ घुमाई। उसकी नज़रों की परिधि कमरे की खिड़की के पास खड़े एक साये पर आकर रुक गई। वो साया अँधेरे में था, अनंतिका उसका चेहरा नहीं देख पा रही थी, उसे सिर्फ उसकी चमकती हुई आँखें नज़र आ रही थीं जो उसे ही घूर रही थीं। अनंतिका का चेहरा, उसका जिस्म पसीने से नहा उठा। उसकी आँखें भय से पथराने लगी, होंठ कांपने लगे परन्तु वो खुद को एक इंच भी हिला पाने में असमर्थ थी। साया धीरे-धीरे बेड पर लेटी अनंतिका की ओर बढ़ रहा था यदि अनंतिका के बस में होता तो वो गला फाड़ कर चिल्लाती, लेकिन अभी वो बेबसी से उस साये को देखने के अलावा और कुछ भी नहीं कर सकती थी। साया बेड के किनारे उसके पैरों के पास आकर रुक गया, अनंतिका उसका चेहरा अब देख सकती थी। 


वो अंश था। अंश की आँखें वैसी ही जल रही थीं जैसी उसने पहली रात खिड़की पर सामने की कॉटिज में देखी थी। अंश को वहां देखकर अनंतिका अवाक थी। अनंतिका के नग्न जिस्म पर पड़े इकलौते आवरण, उस चादर को अंश धीरे-धीरे कर के उसके जिस्म से अलग कर रहा था। अनंतिका की आँखों के पोरों से आंसू टपक गए। वो चीखना चाहती थी, खुद को छुपाना चाहती थी लेकिन बिलकुल बेबस थी। अंश बेहद आहिस्ता-आहिस्ता उसके जिस्म को चूम रहा था, अपने दांतों से चुभलाते हुए उसके जिस्म पर हिकीज़ बनाता हुआ अंश नीचे की तरफ़ बढ़ा। अंश ने अपना पथराया और तमतमाया हुआ चेहरा उठा कर अनंतिका को देखा, इसके बाद उसका चेहरा अनंतिका की दोनों जाँघों के बीच कहीं खो गया। अनंतिका ने अपनी आँखें बंद कर लीं, दूर कहीं से आती नर्सरी राइम की आवाज़ अनंतिका के कानों में पड़ रही थी।


“रिंग अराउंड द रोज़ीस, 

पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़

हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन”


कहानी जारी है  

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