ॐ नमः हरिहराय
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ॐ नमः हरिहराय
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नितिन के. मिश्रा
Prologue
हौंडा सिटी के पहियों की सड़क पर ज़ोरदार रगड़ की आवाज़ रात के सन्नाटे में दूर तक गूंजी। सुनसान खाली स्याह सडक पर गाड़ी किसी फनिहर नाग की भाँति लहरा रही थी। साफ़ ज़ाहिर था कि कार चालक या तो अपनी औकात से अधिक पिए हुए था या फिर जिंदगी से बेज़ार होकर उसने अपने जीवन और कार की कमान छोड़ दी थी।
चकराता के पहाड़ी रास्ते पर एक सौ अस्सी की रफ़्तार से भागती हुई हौंडा सिटी रात्रि आसमान में गर्जन कर रहे मेघों को चुनौती देने के अन्दाज़ में हुंकार भरते हुए साइड बैरियर्स तोड़ कर दर्रे की गहराई नापने लगी।
कुछ ही पलों में दर्रा गगन भेदी धमाके से गूँज उठा। गाड़ी दर्रे में बहती नदी के बीचों-बीच उभरी चट्टानों में से एक से टकराई थी। पिचके कनस्तर सी नजर आ रही हौंडा सिटी का अगला दरवाज़ा उखड़ कर पानी में बह गया था और अप्राकृतिक कोण पर मुड़ा-तुड़ा एक निर्जीव शरीर सीट बेल्ट से लटका हुआ बाहर झूल रहा था।
ऊंचाई से गिरने के कारण गाड़ी की डिक्की खुल गयी थी।
अंदर से दो अलग-अलग मर्दाना और जनाना हाथ बाहर झाँक रहे थे जिनसे टपकती लहू की बूँदें नीचे नदी में गिर कर अपना अस्तित्व खो रही थीं।
गाड़ी से काले धुएँ के उठते गुबार के बीच सुलगती चिंगारियां अठखेलियाँ करते हुए पेट्रोल टैंक से होते रिसाव से जा मिली।
एक और गगनभेदी धमाका हुआ।
इस धमाके के प्रभाव ने चट्टानों के बीच फंसी गाड़ी को नदी की आवेग से उफनती लहरों के हवाले कर दिया। जलती हुई गाड़ी उठती-गिरती लहरों पर सवार यूं बह चली जैसे कटी हुई पतंग हवा के अधीन दिशाहीन होकर बहती है।
कुछ ही देर में पानी पर तैरता आग का वो गुबार नज़रों से ओझल हो गया। दर्रे के ऊपर सड़क के मुहाने पर टूटी हुई साइड बैरियर के पास एक साया खड़ा था जो मूक दर्शक बना उस पूरे दृश्य को देख रहा था। कुछ देर तक वहीं खड़ा रहने के पश्चात वो साया भी रात के अँधेरे में कहीं लोप हो गया।
One Year Later
‘रिंग अराउंड द रोज़ीस, पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़
हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन’
अनंतिका के कानों में छोटी बच्ची की पतली, खनकती आवाज़ में नर्सरी राइम की धुन पड़ी। उसने चौंक कर अपना चेहरा उठाया।
अपनी आँखों के सामने उसे वो 8 साल की बच्ची खड़ी दिखाई दे रही थी। अनंतिका को ऐसा लगा कि वो उस बच्ची को अच्छी तरह जानती है लेकिन फिर भी उसे याद नहीं आ रहा था कि आख़िर वो बच्ची कौन है और अनंतिका उसे कैसे जानती है।
कितनी भोली और मासूम थी वो बच्ची जो सामने खड़ी अपनी हिरणी जैसी बड़ी-बड़ी आँखों से अनंतिका को देख रही थी। उस बच्ची ने गुलाब के रंग की लाल वेल्वेट फ्रॉक पहनी हुई थी और उसके हाथ में एक प्यारा सा सफ़ेद टेडी बेयर था, उसके गोरे और कोमल पैरों में कोई फुटवेयर नहीं थी और उनपर यूं हल्की धूल की परत थी जैसे अभी बाहर मिट्टी में खेल कर आई हो।
अनंतिका ने आस-पास देखा।
उसके पीछे एक पुरानी खंडहर जैसी इमारत थी जिसके चारों तरफ़ ऊँचे पेड़ों और झाड़ियों का एक जंगल सा उगा हुआ था। जंगली क्रीपर्स और वाइन्स ने उस पुरानी खंडहरनुमा इमारत के ज़्यादातर हिस्से पर अतिक्रमण कर लिया था। दूर से देखने पर वो इमारत उस छोटे से जंगल का ही अभिन्न अंग नज़र आती थी।
अनंतिका अब उस इमारत को देख रही और यह याद करने की कोशिश कर रही थी कि उसने वो इमारत कहाँ देखी है। उस अजीब से बियाबान में वो छोटी बच्ची क्या कर रही है?
अनंतिका बच्ची की तरफ़ पलटी और उससे प्यार से पूछा,
“आप कौन हो बेटा? और यहाँ अकेले क्या कर रहे हो? आपके मम्मा-पापा कहाँ हैं?”
वो छोटी बच्ची दो पल अनंतिका को अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से अपलक देखती रही फिर वो खिलखिला कर हंसी और फिर किसी छोटे से ख़रगोश की तरह तेज़ी से भागती हुई ऊँची झाड़ियों के पीछे कहीं ओझल हो गयी।
अनंतिका चिल्लाई।
“अरे रुको! कहाँ जा रही हो? यहाँ झाड़ियों में मत जाओ, चोट लग जाएगी,”
अनंतिका भी उस बच्ची के पीछे घनी झाड़ियों की तरफ़ भागी।
जाने वो बच्ची झाड़ियों के पीछे कहाँ ग़ायब हो गयी थी। सिर्फ़ कहीं दूर से उसकी राइम सुनाई दे रही थी।
‘रिंग अराउंड द रोज़ीस, पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़
हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन’
अनंतिका दूर से आती उस आवाज़ की दिशा में आगे बढ़ी।
आगे झाड़-झंखाड़ और चारों तरफ़ फैली जंगली बेलों और लताओं का जाल और सघन होता जा रहा था। वातावरण में धुँधलका तेज़ी से बढ़ रहा था। कुछ भी साफ़-साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।
अनंतिका ने अपने सामने एक पेड़ की ऊँची डाल से पर्दों की मानिंद लटकती बेलों और लताओं के जाल को हटाया। सामने दूर उसे झाड़ियों के बीच एक पुराना कुआँ दिखाई दिया जिसके पत्थरों को भी लताओं और जंगली बेलों ने अपनी चपेट में ले लिया था।
अपने हाथ में टेडी पकड़े वो बच्ची कुएँ की मुँडेर पर चढ़ी हुई थी और नीचे कुएँ के अंदर झांक रही थी। अनंतिका आतंकित भाव से चिल्लाई,
“नहीं! पीछे हटो वहाँ से!”
उस बच्ची ने इत्मिनान से सर उठा कर अनंतिका की ओर देखा और खिलखिला कर हंसी और फिर से नर्सरी राइम गाने लगी।
‘रिंग अराउंड द रोज़ीस, पॉकेट फुल ऑफ़ पोजिज़
हशा-बुशा, वी ऑल फॉल डाउन’
अनंतिका तेज़ी से बच्ची की तरफ़ भागी लेकिन उसके कुएँ तक पहुँच पाने से पहले ही जंगली बेलों का जाल उसके पैर में फँस गया और वो तेज़ी से नीचे सूखे पत्तों, टहनियों और बेलों पर जा गिरी।
अनंतिका को ऐसा लगा जैसे उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा रहा है, जैसे वो बेहोश होने वाली है।
बेहोश होने से पहले उसने जो आख़री दृश्य देखा वो उस कुएँ की मुँडेर पर खड़ी बच्ची का था।
वो अब भी अनंतिका को देख कर खिलखिला कर हंस रही थी। फिर उसने जैसे खुद को फ़्री फ़ॉल के लिए छोड़ दिया। उसका जिस्म तेज़ी से कुएँ की गहराई में गिरने लगा। अनंतिका ज़ोर से चीखी।
“नहीं!!!”
***
अनंतिका ने चौंक कर आँखें खोली।
उसकी साँस उखड़ी हुई थी और पूरा जिस्म पसीने से नहाया हुआ था।
निखिल ने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया हुआ था और उसे जगाने की कोशिश करते हुए कह रहा था।
“अनी…वेक-अप अनी! कोई बुरा सपना देखा क्या?”
“स।।सपना!?”
अनंतिका चौंक कर सीधी हुई।
वो एस.यू.वी. में निखिल के बग़ल की पैसेंजर सीट पर बैठी हुई थी।
सफ़र के दौरान कब उसकी आँख लग गयी उसे पता ही ना चला।
और फिर वो भयानक सपना! वो बच्ची। और वो खंडहर! वो अजीब सा जंगल और कुआँ! क्या वो सब सपना था?
इतना रीयलिस्टिक सपना अनंतिका ने पहले कभी नहीं देखा था। उसे ऐसा फ़ील हुआ था जैसे वो वास्तविकता में उस सपने को जी रही हो।
निखिल उसकी तरफ़ पानी की बोतल बढ़ाते हुए बोला
“लो थोड़ा पानी पियो।”
“हम चकराता पहुँच गए क्या?”
अनंतिका ने दो घूँट पानी पी कर सवाल किया।
“बिल्कुल! आधे रास्ते के बाद मैं ड्राइव करता रहा और मैडम खर्राटे मार कर सोती रहीं। चलो बाहर आओ।”
कहते हुए निखिल बाहर निकल गया, अनंतिका भी उसके पीछे गाड़ी से बाहर निकली।
“आर यू श्योर दिस इज़ द प्लेस?”
“एब्सोल्यूटली!”
“हम्म…नॉट बैड! नॉट बैड एट ऑल!”! अनंतिका चहकते हुए बोली।
उसके सामने एक काफ़ी पुरानी तीन मंज़िला इमारत थी जो अब भी बुलंद और बढ़िया हालत में थी। पुराने जमाने के कॉटिज के रूप में बनायी गयी उस इमारत के आस-पास की ज़मीन जो कभी एक खूबसूरत और आलीशान बाग़ीचा रही होगी वो अब झंखाड़ में बदल चुकी थी।
उस जगह में एक अजीब सा आकर्षण, एक अनजाना सा सुकून था।
वहां पहुँचने से पहले अनंतिका उस जगह के बारे में काफी संशय में थी, उसे उम्मीद नहीं थी कि साउथ दिल्ली की कटिंग एज लाइफ स्टाइल के बाद चकराता जैसे स्मॉल टाउन की सिम्पल लाइफ में वो एडजस्ट हो पाएगी लेकिन वो जगह उसे अपनी उम्मीद से अधिक पसंद आई थी।
बस ये बात वो निखिल पर जाहिर नहीं करना चाहती थी।
“आई न्यू इट!” निखिल ने जानकार वाक्य अधूरा छोड़ा।
“न्यू व्हॉट?”
“दैट यू विल लव दिस प्लेस,” निखिल नज़रों के कोनों से अनंतिका को परखते हुए बोला।
स्पष्ट था कि निखिल से अनंतिका के मनोभाव नहीं छुपे थे। अनंतिका ने निखिल की ओर देखा, निखिल उसे ही देखकर मुस्कुरा रहा था। निखिल की यही अदा अनंतिका को सबसे ज्यादा पसंद थी, अनंतिका के बिना कुछ कहे ही निखिल उसके दिल की बात समझ जाता था। पिछले तीन साल से अनंतिका और निखिल लिव-इन रिलेशनशिप में थे।
अनंतिका पेशे से एक पेंटर और आर्ट क्यूरेटर थी जबकि निखिल एक एकाउंटिंग फर्म के लिए काम करता था। अनंतिका से निखिल की मुलाक़ात एक आर्ट एग्ज़िबिशन में हुई थी। उस आर्ट गैलरी ओनर के एकाउंट्स निखिल सम्भालता था और ओनर के साइन लेने के लिए गैलरी पहुंचा था। आर्ट गैलरी में उस समय अनंतिका की पेंटिंग्स की एग्ज़िबिशन लगी थी।
पेंटिंग्स से ज्यादा निखिल को अनंतिका पसंद आई थी। पूरे समय वो नज़रें चुरा कर उसे ही देखता रहा, जल्द ही अनंतिका को भी खुद पर स्थित उन नज़रों का एहसास हो गया। पहले पहल अनंतिका ने निखिल को कोई आर्ट क्रिटिक समझ लिया और उसके पास पेंटिंग्स के प्रति उसके रिव्यू जानने के इरादे से पहुंची।
“मुझे आर्ट की समझ नहीं, मैं तो सिर्फ बैलेंस शीट और एकाउंट्स की भाषा समझता हूँ और मेरे हिसाब से अगर ये पेंटिंग्स एसेट हैं तो आपकी ख़ूबसूरती लायबिलिटी,” निखिल मुस्कुराते हुए बोला।
“क्या मतलब?”
“आपकी इस ख़ूबसूरती के आगे आपकी पेंटिंग्स को कोई देख ही नहीं सकता, सबकी नज़रें सिर्फ आप पर ही टिकी हुई हैं,”
“तो अपनी पेंटिंग्स की वैल्यू बढ़ाने के लिए मुझे अपनी ख़ूबसूरती घटा देनी चाहिए?” अनंतिका कुछ सोच कर मुस्कुराते हुए बोली।
“नहीं, एक आपको एक अच्छा अकाउंटेंट हायर करना चाहिए, जो आपकी लायबिलिटीज़ का ख्याल रखे," निखिल ने कहते हुए जेब से अपना विज़िटिंग कार्ड निकाला और अनंतिका की तरफ बढ़ा दिया।
अनंतिका खुद को खिलखिला कर हंसने से ना रोक पाई।
“हाहाहा…दिस इज़ द चीज़ीएस्ट पिक-अप लाइन आई हैव हर्ड इन माय लाइफ,” अनंतिका ने उसका विज़िटिंग कार्ड लेते हुए कहा।
“डिड इट वर्क?” निखिल आशापूर्ण भाव से बोला।
अनंतिका ने उसके विज़िटिंग कार्ड के पिछले हिस्से पर अपना मोबाइल नम्बर लिख कर निखिल की तरफ बढ़ा दिया।
“कॉल मी टू फाइंड आउट,”
वहां से निखिल और अनंतिका के रिश्ते की शुरुआत हुई जो कि कुछ ही महीनों में इतना गहरा हो गया कि दोनों ने एक-दूसरे के साथ रहने का फैसला कर लिया।
दोनों ही आज के समय के आज़ाद ख्याल युवा थे इसलिए शादी करके उम्र भर एक साथ बंधने के बजाए एक-दूसरे से अपनी कॉम्पेटिबिलिटी जाँच-परख लेना चाहते थे।
दोनों के लाइन ऑफ़ वर्क, इंट्रेस्ट, लाइक्स सब कुछ एक-दूसरे से जुदा थे।
निखिल को आर्ट में लेशमात्र भी दिलचस्पी नहीं थी जबकि कला अनंतिका के लिए ऑक्सीजन जितनी ही ज़रूरी थी।
निखिल सेलेक्टिवली सोशल था, पार्टी और जलसों से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। जब तक बहुत ज़रूरी ना हो निखिल रिज़र्व ही रहता था और लोगों से घुलना-मिलना पसंद नहीं करता था। अनंतिका पूरी दुनिया में शायद इकलौती अपवाद थी जिससे पहली मुलाक़ात में ही फ़्लर्ट करने की वो हिम्मत दिखा पाया। वास्तव में अनंतिका दुनिया में इकलौती ऐसी इंसान थी जिसके सामने अपनी सभी विषमताओं और झिझक की परतें खोल कर निखिल एक ज़िंदादिल युवा होता था।
निखिल के बिलकुल ही विपरीत अनंतिका हाइली सोशल और उन्मुक्त लड़की थी।
किसी भी प्रकार के बंधन उसे घुटन का एहसास देते थे। यही कारण था कि वो निखिल के साथ किसी बंधन में नहीं बंधना चाहती थी।
वो अक्सर निखिल से कहती थी कि रिश्ते उसे क्लॉस्ट्रॉफोबिक करते हैं। इन असमानताओं के बावजूद विपरीत आकर्षण का सिद्धांत उनपर पूरी तरह लागू था। निखिल की जिंदगी का सार जहां अनंतिका पर आकर खत्म हो जाता था वहीं अनंतिका के लिए निखिल शायद एक ऐसी बेशकीमती कलाकृति की तरह था जो उसे बेइंतहा पसंद थी।
ढाई साल एक-दूसरे को डेट करने के बाद निखिल ने एक दिन अनंतिका को शादी के लिए प्रपोज़ किया।
निखिल अनंतिका की आदत और ज़रूरत बेशक बन चुका था लेकिन वो खुद नहीं जानती थी कि निखिल उसकी चाहत था या नहीं। अनंतिका के अंतर्मन का ये भावनात्मक द्वंद्व निखिल से छुप नहीं सका। निखिल ने अनंतिका को सोचने के लिए समय दे दिया, जितना भी समय अनंतिका लेना चाहे उतना समय। उस दिन के बाद उनके बीच कभी शादी का मुद्दा नहीं उठा।
फिर कुछ दिन पहले जिस एकाउंटिंग फर्म के लिए निखिल काम करता था उसने निखिल को चकराता में खुली एक एक्सपोर्ट कंपनी के एकाउंट्स हैंडल करने के लिए चकराता भेजने का फैसला किया।
जिस कंपनी के लिए काम करने के लिए निखिल चकराता आया था उसने ही अकॉमडेशन की व्यवस्था की थी।
“अनलोडिंग का काम करने की फीस लगेगी मैडम, मुफ्त में काम नहीं होगा,”
आवाज़ ने अनंतिका की विचार तंत्रा भंग की।
उसने देखा उनकी गाड़ी के पास खड़ा निखिल शरारती भाव से मुस्कुरा रहा था।
“मिस्टर अकाउंटेंट, फीस कैश लेंगे या काइंड?” अनंतिका मुस्कुराते हुए निखिल के पास आई।
“आप हमारी सबसे ख़ास क्लाइंट हैं मैडम, फीस हम हमेशा काइंड में ही लेंगे,” निखिल ने अनंतिका को अप्रत्याशित रूप से अपनी ओर खींचा और बाहों में भर लिया।
“होल्ड योर हॉर्सेस स्वीटहार्ट, वी आर स्टिल आउटडोर,” अनंतिका ने आस-पास नज़रें घुमाते हुए कहा।
उस कॉटिज के बगल में एक और कॉटिज थी जिसे देखकर पता चल रहा था कि वहां लोगों की रिहाइश थी। इससे पहले कि अनंतिका निखिल को रोकती निखिल के होंठों ने अनंतिका के होंठों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया।
अनंतिका के जिस्म पर निखिल का कसाव बढ़ रहा था, उसके पूरे जिस्म में करेंट सी झनझनाहट दौड़ गई। अनंतिका की आँखें स्वतः ही बंद हो गईं।
अनमने मन से प्रतिवाद करते हुए अनंतिका ने निखिल से सीने पर मुक्का मारा। निखिल के सीने पर अनंतिका की उंगलियाँ फिसलने लगी। उसने निखिल की मज़बूत बाहों की गिरफ़्त में खुद को ढीला छोड़ दिया।
अनंतिका की कमर पर टिका निखिल का हाथ उसके जिस्म के विभिन्न कोनों पर फिसल रहा था। निखिल के लबों ने एक लम्बे चुम्बन के बाद अनंतिका के होंठों को आज़ाद किया लेकिन चुम्बन की प्रक्रिया जारी रखते हुए निखिल के होंठ अनंतिका की सुराहीदार गर्दन पर ठहर गए।
अनंतिका को अपनी गर्दन पर निखिल के दांतों की चुभन महसूस हुई, ये चुभन उसे दर्द के साथ-साथ एक सुकून का एहसास भी दे रही थी। अनंतिका के एक पल को आँखें खोली, उसकी नज़रें बगल वाली कॉटिज की ओर ही थीं।
कॉटिज की पहली मंजिल की खिड़की पर उसे एक साया दिखायी दिया। उस साये का रुख उनकी तरफ था और ये स्पष्ट था कि वो उन्हें ही देख रहा है। निखिल की पीठ उसकी तरफ़ थी इसलिए वो खिड़की पर खड़े उस साये की उपस्थिति से पूर्णतः अनभिज्ञ था। वैसे भी निखिल की आँखें बंद थीं, उस घड़ी वो सिर्फ अनंतिका को महसूस कर रहा था।
निखिल का दाहिना हाथ अनंतिका के टैंक टॉप के अन्दर फिसलने लगा और उसके उभारों पर ठहर गया। अचानक ही उसे अनंतिका के शरीर में कसमसाहट महसूस हुई, अनंतिका उसे खुद से परे धकेलने की कोशिश कर रही थी।
“निखिल नो! लुक, समवन इज़ वॉचिंग अस,” अनंतिका की आवाज़ में सख्ती थी, वो वाकई खुद को निखिल से अलग करने की कोशिश कर रही थी।
“देयर इज़ नो वन बेब,” निखिल की उँगलियों का कसाव अनंतिका के उभार पर बढ़ा।
“आइ सेड नो!!” इस बार अनंतिका ने वाक़ई उसे ज़ोर से परे धकेला।
निखिल सकपका कर अनंतिका से अलग हुआ।
अनंतिका का चेहरा बुरी तरह आंदोलित नजर आ रहा था। निखिल की आँखों ने अनंतिका की नज़रों का अनुसरण किया।
“कोई तो नहीं है वहाँ,” निखिल भी उस खिड़की की ओर देखते हुए बोला।
“लेकिन कुछ देर पहले कोई था और वो हम-दोनों को ही देख रहा था,” अनंतिका ने जिद और रोष के मिश्रित भाव से कहा।
निखिल- ‘कोई था तो था, हमें क्या!!’ निखिल ने कंधे उचकाए और फिर से अनंतिका की कमर में हाथ डाल दिया।
“निखिल नो! वी डोंट नो दिस नेबरहुड येट। ये नई जगह है, यहाँ के लोगों को, उनकी सोच को हम नहीं जानते। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये साउथ देल्ही की ओपन सोसाइटी नहीं है बल्कि एक स्मॉल टाउन नेबरहुड है। हमारे ये तौर-तरीके यहाँ लोगों को नापसंद आ सकते है।।।एंड वी डोंट वॉंट टू ऑफेंड एनीवन, राइट?”
“राइट! वैसे भी मूड की बैंड बज चुकी है, सो लेट्स गेट बैक टू वर्क,” निखिल खिज भरे लहजे में बोला और गाड़ी से सामान के बड़े-बड़े बॉक्सेस उतारने लगा।
उन दोनों का पूरा दिन सामान की अनबॉक्सिंग और कॉटिज की बेसिक साफ़-सफाई और अरेंजमेंट करने में गुज़रा। रात तक दोनों ने बेसिक सेट-अप तैयार कर लिया था। उस घड़ी दोनों दिन-भर की थकान से चूर हो चुके थे। निखिल ने पास के ही एक फूड-जॉइंट से डिनर ऑर्डर किया।
“डिनर कब आएगा यार, आइ एम स्टार्विंग!,”
“ऑर्डर किए तो काफ़ी टाइम हो गया, अब तक आ जाना चाहिए था,” निखिल ने रिस्ट वॉच देखते हुए कहा।
ठीक तभी डोरबेल बजी।
“आ गया! तुम प्लेट्स लगाओ अनी, मैं खाना लेकर आता हूँ,” कहते हुए निखिल सीढ़ियों से नीचे की तरफ़ भागा।
इस बीच डोरबेल यूँ लगातार बज रही थी जैसे बजाने वाला खुद ही बेल के ऊपर चढ़ कर खड़ा हो गया हो।
तेज़ कदमों से दरवाज़े की तरफ़ बढ़ते हुए निखिल झुंझला कर चिल्लाते हुए बोला।
“अरे बाबा आ रहा हूँ! एक तो खाना लाने में इतना टाइम लगा दिया उस पर से ऐसे पागलों की तरह बेल बजा रहा है जैसे भूत देख लिया…”
कॉटिज का मेन डोर खोलते हुए निखिल का वाक्य अधूरा रह गया। दरवाज़े के सामने कोई भी नहीं था, उसने सकपका कर नीचे देखा।
खाने के डब्बे दरवाज़े के सामने नीचे फ़र्श पर रखे थे।
निखिल ने कॉटिज के आउटर गेट की तरफ़ देखा। एक लगभग पैंतालीस साल का शख़्स गिरते-पड़ते बाहर की ओर भाग रहा था। निखिल अपने आप में बड़बड़ाया।
“इसे देख कर तो लगता है जैसे इसने सच में भूत देख लिया है,”
कॉटिज का बाहरी आयरन गेट खोलते हुए वो शख़्स वापस मुड़ा।
उसकी डर से पथराई नज़रें पीछे कुछ देख रही थीं। निखिल ने देखा कि उस आदमी का ध्यान निखिल की उपस्थिति की ओर बिल्कुल भी नहीं था। वो तो उसके पीछे कॉटिज की ऊपरी मंज़िल की तरफ़ कुछ देख रहा था।
इससे पहले कि निखिल कुछ समझ पाता उस आदमी की नज़रें निखिल से मिलीं।
“इस मनहूस कॉटिज में नहीं आना चाहिए था। ज़िंदा रहना चाहते हो तो चले जाओ यहाँ से,”
निखिल के कुछ कह पाने से पहले ही वो आदमी वापस मुड़ा और बाहर खड़ी साइकल पर सवार होकर यूँ भागा जैसे मौत उसके पीछे उसके साइकल के कैरियर पर सवार हो। अब तक अनंतिका भी बाहर आ गयी थी।
उसने निखिल से पूछा।
“क्या हुआ? ये डिलीवरी वाला ऐसे क्यों भाग गया? क्या बोल रहा था वो?”
“पता नहीं, लगता है नशा किए हुए था साला! मैं फ़ूड-जॉइंट कॉल कर के कम्प्लेन करूँगा कि ऐसे चरसी-गंजेड़ी, भंगेड़ी लोगों को डिलीवरी के लिए ना भेजा करें। चलो खाना खाते हैं।”
डिनर के बाद दोनों कॉटिज के फर्स्ट फ्लोर पर बने सबसे बड़े कमरे में पहुंचे, जिसे कि वो अपना मास्टर बेडरूम बनाने वाले थे।
फिलहाल उन लोगों ने फर्श पर ही एक गद्दा और चादर बिछा रखे थे| अपने ज़रूरत का छोटा सामान दोनों अपने साथ एस.यू.वी. से ले आए थे जबकि उनका फर्नीचर और अन्य बड़ा सामान अगली सुबह पैकर्स एंड मूवर्स सर्विस द्वारा लाया जाने वाला था। अनंतिका गद्दे पर ढेर हो गई जबकि दरवाज़े पर खड़ा हुआ निखिल उसे ही देख रहा था।
“क्या देख रहे हैं अकाउंटेंट साहब?” अनंतिका ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।
“यू नो, जब तुम यूं मुझे 80s-90s की बीवियों की तरह अकाउंटेंट साहब बुलाती हो तो बहुत अच्छी फीलिंग आती है,”
निखिल एकटक अनंतिका को देख रहा था। कितनी बेइंतहा खूबसूरत थी वो, किसी तितली की भाँति उन्मुक्त और प्रकृति के सौंदर्य से आच्छादित। जो यूं ही उड़ते हुए उसके काँधे पर दो पल के लिए आ बैठी थी, और अब निखिल की हसरत यही थी कि उसे हौले से अपने प्रेम के आगोश में सदा के लिए कैद कर ले परन्तु वो जानता था कि तितली का सौन्दर्य, उसका यौवन उसकी स्वतंत्रता, उसकी उन्मुक्त उड़ान में था, बंधन में नहीं।
“वहां दरवाज़े पर खड़े क्या सोच रहे हैं अकाउंटेंट साहब? सुबह तो बड़े किंकी हो रहे थे…ज़रा यहाँ आइए आपको ऐसी हरकतें दिखाती हूँ जो 80s-90s की बीवियां बिलकुल नहीं करती थीं,”
अनंतिका की आँखें शरारत से भरी हुई थीं और आवाज़ में एक मादक कशिश थी। निखिल ने कमरे की लाइट बंद की और अनंतिका की ओर बढ़ा। अँधेरे में गद्दे पर बैठते हुए उसने अनंतिका को स्पर्श किया, अनंतिका अपने कपड़े उतार चुकी थी। निखिल ने भी अपने कपड़ों को जिस्म से परे किया और अनंतिका की दोनों टांगें पकड़ कर उसे नीचे खींचा। जाने कितनी ही देर तक दोनों एक-दूसरे में डूबते और उतरते रहे।
अनंतिका की आँख खुली उस समय लगभग रात के ढाई बज चुके होंगे।
उसे कमरे में सर्द हवा के आने का एहसास हो रहा था। उसने ध्यान दिया कि कमरे की खिड़की खुली हुई है।
कमरे के अंधेरे में बिना कपड़ों के ही अनंतिका उठ कर खिड़की की ओर बढ़ी। खिड़की के पल्ले पकड़ कर अनंतिका उन्हें लगाने ही वाली थी कि उसकी नज़रें सामने की तरफ उठीं।
खुली हुई खिड़की के सामने के कॉटिज के फर्स्ट फ्लोर की वही खिड़की थी जिसपर उसने सुबह उस साये को खड़ा देखा था।
उस समय, खिड़की के पार रौशनी थी जिसमें अनंतिका को खिड़की पर खड़ा साया साफ़ दिखाई दिया|
वो अभी भी वैसे ही खड़ा हुआ था जैसे अनंतिका ने उसे दिन में देखा था। रात के अँधेरे और ठीक-ठाक दूरी के बावजूद अनंतिका उसे साफ़-साफ़ देख सकती थी। वो एक लड़का था, उससे शायद सात-आठ साल छोटा, बीस या बड़ी हद इक्कीस की उम्र का। लम्बा कद और गोरी रंगत वाला। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। अनंतिका नितांत अँधेरे में खड़ी थी लेकिन फिर भी उसे ऐसा लगा कि उस लड़के की आँखें उसे बिना कपड़ों के बिल्कुल साफ़-साफ़ देख सकती हैं।
उस लड़के की नज़रें अनंतिका को अपने हर अंग पर फिसलती महसूस हुईं। अनंतिका हड़बड़ा कर खुली हुई खिड़की के पल्ले की ओट में हुई। अनंतिका ने हौले से पल्ले की ओट से सामने झाँका, लड़के की स्थिति में कोई परिवर्तन ना आया था वो यथावत खड़ा उसकी ओर देख रहा था। अनंतिका झुक कर फर्श पर बैठ गई और अपने हाथ उचका कर उसने खिड़की के पल्ले बंद कर दिए और मन ही मन ये फैसला किया कि अगले दिन वो सबसे पहला काम घर के खिड़की-दरवाज़ों पर पर्दे डालने का करेगी।
अगली सुबह निखिल जल्द ही काम पर जाने के लिए निकल गया।
सुबह के दस बजे के करीब पैकर्स एंड मूवर्स की ट्रक उनका सामान ले आई। पैकिंग सर्विस वालों को इंस्ट्रक्ट करके अनंतिका फर्नीचर, एप्लायंसेज और अन्य भारी सामान घर में व्यवस्थित करवाने में लग गई।
अपने पेंटिंग ईज़ल, कैनवास व आर्ट का बाक़ी सामान उसने ग्राउंड फ्लोर के हॉल में रखवाया, वो बड़ा हॉल आर्ट स्टूडियो बनाने के लिए बिलकुल परफेक्ट था। उस हॉल से जुड़े छोटे हॉल को लिविंग रूम बना कर वहाँ काउच, सेंटर टेबल और लिविंग रूम का बाक़ी सामान एडजस्ट कर दिया गया। बाकी गैर-ज़रूरी छोटे-बड़े सामान को छोटे हॉल से लगे हुए एक कमरे में डम्प कर दिया गया।
ग्राउंड फ्लोर पर बने बड़े रसोईघर में किचेन का सारा सामान व्यवस्थित कर दिया गया जबकि बेडरूम की व्यवस्था पहली मंजिल पर बड़े कमरे में की गई जहां पिछली रात अनंतिका और निखिल सोए थे। उस कमरे के अलावा भी पहली मंजिल पर दो और कमरे थे लेकिन अनंतिका ने उन्हें यथावत छोड़ दिया।
दोपहर दो बजे तक अनंतिका के अनुरूप पूरा घर व्यवस्थित हो चुका था।
पैकिंग सर्विस वालों के जाने के बाद अनंतिका ने लंच का ऑर्डर उसी फ़ूड-जॉइंट में दिया जिससे पिछली रात उन लोगों ने डिनर मंगाया था।
उसने पिछली रात आए डिलीवरी वाले की शिकायत भी की और ख़ास हिदायत दी कि किसी ढंग के आदमी को ही डिलीवरी के लिए भेजें। ऑर्डर प्लेस करने के बाद अनंतिका थकान उतारने के लिए नहाने चली गई।
बाथटब का हल्का गुनगुना पानी उसे बहुत सुकून दे रहा था। अनंतिका ने अपनी आँखें बंद कर लीं और जिस्म को बाथटब में ढीला छोड़ दिया। वो यहाँ आकर वाकई खुश थी। ये जगह उसके काम करने के लिए बिलकुल उपयुक्त थी और निखिल का साथ। अगर वो इतनी ही खुश थी तो फिर वो निखिल का मैरिज प्रपोज़ल ऐक्सेप्ट क्यों नहीं कर रही थी? आखिर दोनों पति-पत्नी की तरह रह रहे थे फिर शादी से गुरेज़ क्यों? अनंतिका के अंतर्मन ने उससे सवाल किया।
उसी समय कॉटिज की कॉलबेल बजी। अनंतिका हड़बड़ा कर बाथटब से उठी, उसने अपने गीले बालों पर टॉवल लपेटा और शरीर पर बेदिंग गाउन डाल लिया। अनंतिका ने मन में सोचा कि पिछली रात के मुकाबले आज डिलीवरी वाला काफी जल्दी ऑर्डर ले आया। उसके दरवाज़े तक पहुँचने से पहले कॉलबेल एक बार फिर बजी।
अनंतिका ने दरवाज़ा खोला, सामने वही लड़का था जिसे उसने बगल वाली कॉटिज की खिड़की पर देखा था। अनंतिका ने उसके वहां होने की कल्पना नहीं की थी।
“हाय। आय एम अंश। अंश राजपूत,” लड़के ने एक सहज मुस्कान के साथ बोला।
उसे देखकर बुरी तरह चौंक गई अनंतिका वस्तुस्थिति अब भी समझ नहीं पा रही थी।
“आय एम सॉरी, मैंने शायद गलत टाइम पर आपको डिस्टर्ब किया,”
अनंतिका को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे, वो बस बेदिंग गाउन पहने हुए बेवकूफों की तरह उसके सामने खड़ी उसका चेहरा देख रही थी।
“आप लोग यहाँ नए शिफ्ट हुए हैं, आई एम द बॉय नेक्स्ट डोर…लिटरली,”
लड़के ने बगल की कॉटिज की तरफ इशारा करते हुए कहा।
अनंतिका अभी भी क्लूलेस थी, वो सिर्फ उस लड़के को ही देख रही थी। उसकी मुस्कान वाकई आकर्षक थी, पिछली रात तो उसने उसे दूर से और कुछ अँधेरे में देखा था अभी दिन के उजाले में सामने से देखने पर वो और भी नौजवान और खूबसूरत नजर आ रहा था।
लड़के ने अनंतिका की ओर देखा।
“लुक…आय एम सॉरी, मैं बस आपको इनवाईट करने आया था,”
“इनवाईट?”
“जी। आप लोग हमारे पड़ोस में नए रहने आए हैं, इसलिए मेरी मॉम ने आज रात आप लोगों को डिनर पर इनवाईट किया है। उन्हें आर्थराइटिस है इसलिए खुद नहीं आ सकीं,”
अंश ने बगल वाले कॉटिज की तरफ इशारा किया।
अनंतिका ने कॉटिज की तरफ देखा, एक लगभग साठ वर्ष की उम्र की महिला उसे कॉटिज के दरवाज़े पर व्हीलचेयर पर बैठी नजर आई। अनंतिका को अपनी तरफ देखता पा कर महिला के चेहरे पर एक सहज मुस्कान उभरी, उसने अनंतिका की तरफ हाथ हिलाया। अनंतिका ने सर हिला कर महिला का अभिवादन किया।
“सो, आर यू गाइज़ कमिंग टुनाइट फॉर डिनर?” अंश ने आशापूर्ण ढंग से पूछा।
उस समय वो अनंतिका को किसी बच्चे जैसा प्यारा नजर आ रहा था। अंश की आँखों में वो अजीब सी चमक, वो तीक्ष्णता नहीं थी जो पिछली रात अनंतिका ने खिड़की पर देखी थी। क्या वो उसकी नज़रों का धोखा था? उसके दिमाग का वहम?
“एक्सक्यूज मी, आर यू देयर?”
अपने ही विचारों में उलझी अनंतिका के चेहरे के सामने अंश ने अपना हाथ हिलाया।
“अ…आय एम सॉरी…” अनंतिका हडबडाई, “हम लोग आ जाएँगे डिनर के लिए,”
अनंतिका झेंप में मुस्कुराते हुए बोली।
“दैट्स ग्रेट! ओके देन, सी यू टुनाइट।” अंश ने मुस्कुराते हुए कहा और अपनी कॉटिज की तरफ बढ़ गया।
अनंतिका की नज़रें अंश से हट नहीं रही थीं। अंश अपनी कॉटिज पहुँच कर दरवाज़े पर खड़ी अपनी माँ से कुछ कह रहा था। उसी समय डिलीवरी बॉय अनंतिका का लंच ऑर्डर ले आया।
***
“डिनर इज़ ऑसम!”
“आप बहुत अच्छा खाना बनाती हैं आंटी,”
अनंतिका ने फिश फिलेट और स्टर फ्राइड मशरूम्स टेस्ट करते हुए कहा।
अनंतिका उस समय एक मरून कलर का डिज़ाइनर गाउन पहना हुआ था जिसमें वो बेहद खूबसूरत नजर आ रही थी। उसने बहुत ही लाइट मेक-अप किया था जो उसे बहुत सूट कर रहा था।
अनंतिका की पर्सनालिटी में एक गजब का आकर्षण था जो उसके सेल्फ़-कॉन्फिडेंस और पॉजिटिव एटीट्यूड की वजह से किसी को भी उसका मुरीद बना देता था। निखिल ने रॉयल ब्लू कलर का फिटेड सिल्युट सूट जैकेट पहना हुआ था, हल्का स्ट्बल उसके तराशे हुए चेहरे और मज़बूत जॉ-लाइन को निखार रहा था साथ ही लेटेस्ट फैशन के क्रू-कट स्टाइल में कटे बाल जो हेयर वैक्स से करीने से सेट किये हुए थे उसपर बहुत फब रहे थे।
“बिलकुल! मेरे ख्याल से तुम्हें आंटी से कुकिंग लेसन्स लेने चाहिए,” निखिल मंत्रमुग्ध सा मटन चॉप खाता हुआ बोला।
ये विडंबना ही थी कि निखिल खाने का शौक़ीन था और अनंतिका को कुकिंग करना बिलकुल पसंद नहीं था।
“बेटा, अगर कुकिंग लेसन्स लेने हैं तो अंश से लेने होंगे| खाना अंश ने बनाया है,” महिला के स्वर में गर्व का पुट था। डाइनिंग टेबल पर अपनी माँ के बगल वाली कुर्सी पर बैठे अंश के चेहरे पर एक शर्मीली सी मुस्कान आई। अनंतिका ने देखा कि शर्म से अंश के कान और गाल लाल हो गए|
“यार अंश! आय सैल्यूट यू डूड, क्या खाना बनाते हो यार। आजकल तो लड़कियाँ भी इतना लज़ीज़ खाना नहीं बनाती,” निखिल ने अनंतिका पर कटाक्ष करते हुए अंश से कहा।
“खाना बनाने में अब ये लड़का-लड़की वाला फैक्टर कहाँ से आ गया?” अनंतिका चिढ़ कर बोली।
“ऐसी कोई बात नहीं है। आर्थराइटिस की वजह से मॉम को खड़े रहने में प्रॉब्लम होती है इसलिए कुकिंग और घर के सारे काम मैं ही करता हूँ,” अंश बात पलटते हुए बोला।
“आप दोनों यहाँ अकेले रहते हैं? आय मीन अंश के फादर…?” निखिल ने मिसेज़ राजपूत से सवाल किया।
“हिज़ फादर पास्ड अवे लास्ट इयर। रोड एक्सीडेंट में अंश के फादर की गाड़ी पहाड़ी दर्रे में गिर गई थी,” मिसेज़ राजपूत की आवाज़ एकाएक सर्द हो गई।
“अ..आय एम एक्सट्रीमली सॉरी टू हियर दैट,” निखिल खेद व्यक्त करते हुए बोला।
“इसके बाद ही अंश ने मेरे लाख मना करने पर भी अपना कॉलेज ड्रॉप कर दिया और दिल्ली से वापस मेरी देखभाल करने यहाँ आ गया,”
“आर्टिस्ट बनने के लिए फॉर्मल डिग्री की ज़रूरत नहीं होती मॉम। लेओनार्दो-द-विन्ची और रफेल जैसे आर्टिस्ट किसी आर्ट कॉलेज से नहीं निकले थे," अंश सहज भाव से मुस्कुराते हुए बोला।
“तुम पेंटिंग करते हो?” अनंतिका ने चौंक कर पूछा।
“कोशिश करता हूँ,” अंश ने मुस्कुराते हुए दीवारों की तरफ इशारा किया, अनंतिका की नज़रें चारों तरफ दीवारों पर लगी हुई पेटिंग्स पर पड़ी।
“ये सभी पेंटिंग्स मेरे बेटे ने बनाई हैं,” मिसेज़ राजपूत गर्व से बोलीं।
पेंटिंग्स वाकई अच्छी बनी हुई थीं, टेक्निकल डिटेल्स की कमी थी परन्तु ये स्पष्ट था कि अच्छी ट्रेनिंग मिलने पर अंश बेहतरीन आर्टिस्ट बन सकता था।
“भई वाह, ये तो कमाल की बात हो गई। यार अंश तुम अनंतिका तो कुकिंग सिखा दो और अनंतिका तुम्हें पेंटिंग की बारीकियां सिखा देगी,” निखिल जो अपना मटन चॉप खत्म कर चुका था अपनी उंगलियाँ चटकारते हुए बोला।
“आप भी आर्टिस्ट हैं?” अंश ने चौंक कर अनंतिका को देखा।
अनंतिका ने मुस्कुराते हुए सहमति में सर हिलाया।
खाने के बाद काफी देर तक अंश और अनंतिका वैन गॉग की पेंटिंग ‘स्टारी नाइट्स’ से लेकर माइकल एंजलो के स्कल्पचर ‘पिएत्ता’ पर चर्चा-परिचर्चा करते रहे।
अनंतिका को एहसास हुआ कि अंश के बारे में उसका बनाया हुआ फर्स्ट इम्प्रैशन गलत था। वास्तव में अंश अपने समय के यंग्सटर्स से काफी अलग एक धीर-गंभीर और ज़िम्मेदार नौजवान था।
जब अनंतिका ने पहली बार अंश को उसके कॉटिज की खिड़की पर देखा था तब वो उसे कोई साइको-क्रीप लगा था और दूसरी बार पिछली रात अँधेरे में अनंतिका के जिस्म को अपनी नज़रों से टटोलता हुआ एक पर्वर्टेड पीपिंग टॉम लेकिन अब उसे एहसास हो रहा था कि क्योंकि सुबह वाली घटना से ही अनंतिका के मन ने अंश के लिए गलत अवधारणा बना ली थी इसीलिए रात वाली घटना के समय अंश उसे खुद को घूरता हुआ सा लगा होगा। भला इतने घुप्प अन्धकार में और इतने फासले से वो उसे कैसे देख सकता था? शायद अंश भी रात के एन उसी समय उठ कर अपनी खिड़की पर आया हो जिस समय अनंतिका अपने कमरे की खिड़की बंद करने के उठी थी।
“काफी देर हो चुकी है, अब हमें चलना चाहिए,” निखिल एकाएक घड़ी देखते हुए बोला। रात के ग्यारह बज रहे थे।
“ओह! बातों में समय का पता ही नहीं चला। थैंक्स फॉर द लवली इवनिंग एंड डिनर, वी हैड ए ग्रेट टाइम।,”अनंतिका मुस्कुराते हुए बोली।
निखिल ने महसूस किया कि ये बात अनंतिका ने मिसेज़ राजपूत से अधिक अंश को कॉम्प्लीमेंट करने के लिए कही है।
“इसे अपना ही घर समझो बेटा, तुम जब चाहों यहाँ आ सकती हो,” मिसेज़ राजपूत ने अनंतिका के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
“इन-फ़ैक्ट आप लोग हमारे यहाँ क्यों नहीं आते। कल सैटरडे है और हम एक हाउस वॉर्मिंग पार्टी प्लान कर रहे हैं। बहुत छोटी सी ही पार्टी होगी, यहाँ चकराता में जिस कम्पनी के लिए काम कर रहा हूँ उसके ही कुछ लोगों को बुलाया है, बाकी तो हम लोग यहाँ किसी को जानते नहीं। इट विल रियली बी ग्रेट…अगर आप लोग पार्टी में आएं,” निखिल उत्साहित भाव से बोला।
“मैं घर से बाहर कहीं जाती-आती नहीं बेटा, अंश ज़रूरत जा सकता है,” मिसेज़ राजपूत की नज़रें जैसे निखिल और अनंतिका से गुजरते हुए अंश पर आकर ठहर गईं।
उनकी नज़रों में कुछ ऐसे भाव थे जैसे अंश के मनोभाव पढ़ने की कोशिश कर रही हों।
अंश दो क्षण खामोश रहा फिर उसने हौले से सहमति में सर हिलाया।
“ग्रेट…फिर कल शाम मिलते हैं” निखिल ने कहा फिर उसने और अनंतिका ने वहाँ से विदा ली।
“नाइस पीपल," निखिल ने चेंज करते हुए कहा।
“हम्म,”
बैड पर लेटी अनंतिका अपने ही विचारों में डूबी हुई थी|
उसने अपना गाउन उतार दिया था। कमरे में जल रहे शैन्डलियर की मद्धिम पीली रौशनी उसके सुडौल जिस्म पर पड़ रही थी, उसकी त्वचा यूं दीप्तिमान थी जैसे सुबह उगते सूरज की पहली सुनहरी किरण हो।
निखिल ने एक भरपूर नजर उसपर डाली, ब्लैक लॉन्जरी में अनंतिका का दमकता जिस्म और अधिक आकर्षक और उत्तेजक लग रहा था।
“अच्छा सुनो, तुम्हारा स्टूडियो सेट-अप हो गया?”
“हाँ। नीचे बड़े हॉल में स्टूडियो सेट कर लिया है। सोच रही हूँ कल से पेंटिंग्स पर काम शुरू करूँ,”
“दैट्स ग्रेट! माय लेडी पिकासो इस ऑल सेट फॉर एक्शन,”
निखिल बैड की ओर बढ़ते हुए बोला, उस समय वो सिर्फ बॉक्सर्स में था और उसकी आँखों में शरारती भाव थे।
“एण्ड मिस्टर कासनोवा लुक्स डेस्पिरेट फॉर सम एक्शन राइट नाउ,” अनंतिका खिलखिलाते हुए बोली।
निखिल ने अनंतिका के ऊपर बैड पर जम्प लगा दी। दोनों कुश्ती लड़ने का खेल करते बच्चों की तरह एक-दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो गए।
अनंतिका ने पिलो उठा कर निखिल के सर पर दे मारा, निखिल ने भी दूसरा पिलो उठा कर जवाबी हमला किया। दोनों की पिलो फाइट में तकियों की सिलाई उधड़ गई। फर पिलोज़ से फर निकल कर हवा में बिखरने लगे। निखिल ने अनंतिका को अपनी बाहों में जकड़ कर बैड पर गिरा दिया। अनंतिका ने प्रतिवाद ना किया, सिर्फ उसकी निगाहें कमरे की खिड़की की तरफ उठीं।
आज कमरे की खिड़कियाँ लगी हुई थीं और उनपर पर्दे भी खिंचे हुए थे। निश्चिन्त अनंतिका ने अपनी बाहें निखिल की गर्दन में डाल दीं, निखिल उसकी गहरी आँखों में एकटक देख रहा था। अनंतिका ने किसी रेस्लर की तरह एक झटके से निखिल को पलटी देकर नीचे गिरा दिया और उसपर सवार हो गई। उसका एक हाथ पीठ के पीछे गया और उसकी ब्रा अनहुक होकर एफ़र्टलेसली बाहों से सरकते हुए अनंतिका के नीचे लेते निखिल के सीने पर जा गिरी।
निखिल का हाथ ब्रा अपने ऊपर से हटाने को बढ़ा। अनंतिका ने उसकी दोनों कलाइयाँ पकड़ लीं और उसके हाथ अपने सीने पर रख लिए। उसने अपनी ब्रा निखिल की गर्दन में लपेटी और स्ट्रैप लगाम की तरह थाम ली। निखिल पर सवार अनंतिका का जिस्म लयबद्ध तरीक़े से आगे-पीछे होने लगा। कभी वो निखिल के गले में लिपटी ‘लगाम’ का कसाव बढ़ा देती तो कभी ढीला छोड़ देती।
दोनों की सिसकारियाँ कमरे से बाहर कॉटिज में गूंज रही थीं। रात कितनी देर तक दोनों एक दूसरे से यूं ही जूझते रहे और कब थक कर एक दूसरे की बाहों में सो गए उन्हें पता भी ना चला।
अनंतिका को एहसास हुआ कि उसके जिस्म पर से क्विल्ट बहुत ही धीरे-धीरे सरक रहा है, जैसे कोई उसके कपड़े उतार रहा हो। उसे महसूस हुआ कि बैड के करीब कोई खड़ा हुआ है जिसकी दो जोड़ी आँखें उसे घूर रही हैं।
अनंतिका ने चौंक कर आँखें खोली।
सामने कोई ना था, हालांकि क्विल्ट उसके जिस्म से सरका हुआ था। उसके ठीक बगल में निखिल बेखबर सो रहा था।
अनंतिका को कमरे में ठंड का एहसास हुआ तो स्वतः ही उसकी नज़रें रूम की खिड़की की ओर उठ गईं।
खिड़की खुली हुई थी और उसपर से पर्दा भी सरका हुआ था जिससे बाहर की सर्द हवा अंदर आ रही थी। अनंतिका अवाक थी, खिड़की तेज़ हवा के झोंके से खुल गई हो सकती थी लेकिन उसपर से पर्दा हवा से हट जाना मुमकिन नहीं था।
अनंतिका बैड पर से उठी। बैड के पास ही हैंगंर पर से उसने नाईट गाउन उतार कर अपने ऊपर डाला और खिड़की की तरफ बढ़ी। अनंतिका ने खिड़की बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उसकी नज़रें स्वतः ही सामने उठ गईं। सामने कॉटिज की खिड़की पर अंश खड़ा नजर आया। ठीक पिछली रात की तरह उसे घूरता हुआ। उसकी आँखें एक-बार फिर रात के अंधेरे में चमक रही थीं।
कहानी जारी है।
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