ॐ नमः हरिहराय
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ॐ नमः हरिहराय
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हेय पीपल,
फिर उपस्थित हूँ निमित्त कालांत्री केसाथ आप सब केसम्मुख। सर्वप्रथम आप सभी को 'गुरु पूर्णिमा' की शुभ कामनाएँ । गुरु...जिनका स्थान पिता जितना ही उच्च होता है, जो 'पिता तुल्य' हैं, उनको प्रणाम।
विचारने योग्य बात है कि मातृत्व अर्थात्माता का स्थान हम किसी भी नारी रूप को दे देते हैं...मुझे तो...एक छोटी बच्ची में भी अपनी माँ की झलक मिल जाती है लेकिन पिता का स्थान और सम्मान हम जीवन मेंगिने-चुने लोगों को ही देतेहैं। आप हर स्त्री के लिए येकह सकते हैं कि वो माँ समान है परंतुअमुक व्यक्ति मेरेपिता समान हैअथवा 'पिता तुल्य' है आप जीवन में किसी एक आध व्यक्ति को ही इस सम्मान के योग्य समझेंगे। इन शब्दों की गरिमा कोई ऐसा व्यक्ति नहीं समझ सकता जो भावनात्मक दरिद्रता से ग्रस्त हो और अपनी वैचारिक तंगी को आदर अथवा ढकोसले का मापदंड बनाए बैठा हो। हर बार की तरह यहाँ फिर स्पाइडर-मैन उर्फ़ पीटर पार्कर के चिचा बेन क्वोट किए जाएँ गे, "विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेट रेस्पॉन्सिबिलिटीज़,"।
'पिता तुल्य'...येशब्द अगर 'पावर' हैं तो इनकी गरिमा बनाए रखना वो 'रेस्पॉन्सिबिलिटी' है जो इन शब्दों से जुड़े दोनों लोगों के कंधों पर है। यहाँ निमित्त और प्रोफ़ेसर संजीव गौतम दोनों ही फेल होते हैं... या दोनों में से कोई एक? इस सवाल का जवाब मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ, फ़ैसला सुनाना मेरा कार्य नहीं, मैं तो बस 'निमित्त' मात्र हूँ।
ये इस कहानी का चैप्टर 03 ना हो कर चैप्टर 2.5 है क्योंकि ये एक इंटर्ल्यूड चैप्टर है जो मौजूदा कहानी से सीधी तौर पर जुड़ा हुआ नहीं परंतु आगे जा कर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। बाक़ी सोशल मीडिया पर फ़ॉलो वाली बात बार-बार करने में बोरियत होती है, मर्ज़ी हो फ़ॉलो कर लें, मर्ज़ी ना हो तो ना करें। कहानी को लेकर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
आपका कथासारथी,
नितिन के. मिश्रा
नितिन के. मिश्रा
षडंगादि वेदो मुखेशास्त्र विद्या,
कवित्वादि गद्यम, सुपद्यम करोति।
मनश्चैन लग्नम गुरोरंघ्रि पद्मे
ततः किं, ततः किं, ततः किं, ततः किं।।
13 साल पूर्व
“वो मर जाएगी…मेरी बच्ची को बचा लीजिए प्रोफ़ेसर…मेरी बच्ची को बचा लीजिए,” उस महिला ने गिड़गिड़ातेहुए गुहार लगाई।
“कु छ नहीं होगा आपकी बेटी को…ये वादा है मेरा,” उस शख़्स की आवाज़ गहरी थी। सुकून दायक और गहरी। जैसे शांत सागर की लहरें बिना उठे भी उसकी गहराई का एहसास कराती हैं, बिल्कुल वैसी।
सारी नज़रें उस मल्टी-स्टोरी अपार्टमेंट के दसवें फ़्लोर पर टिकी हुई थीं, जहां एक लगभग 18 साल की लड़की बाल्कनी के एक्स्टेन्शन पर खड़ी थी और उसे देख कर लगता था वो किसी भी पल नीचे कूद जाएगी।
उसकी आँखों से बहते आँसू थमनेका नाम नहीं ले रहे थे।
नीचे पुलिस, दमकल विभाग और ऐम्ब्युलेन्स आ चुके थे। पुलिस की महिला काउन्सिलर मेगाफ़ोन पर लड़की से बात करने, उसे समझा-बुझा के नीचे उतारने की भरसक कोशिश कर रही थी। पर सब व्यर्थ।
लड़की ने फ़्लैट का मुख्य दरवाज़ा अंदर से लॉक किया हुआ था और धमकी दी थी कि अगर किसी ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की तो वो फ़ौरन ही नीचे कूद जाएगी।
नीचे सोसाइटी कॉम्पाउंड में मीडिया वालों का ताँता लगा हुआ था।
“हम इस समय हैं दिल्ली के मयूर विहार फ़ेज़-वन की राजा बाग सोसाइटी में जहां अट्ठारह वर्षीय आकृति खन्ना अपने दसवीं मंज़िल के फ़्लैट की बाल्कनी से कूदने वाली हैं…सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार आकृति पिछले कुछ महीनों से डिप्रेशन में चल रही हैं, इसके अतिरिक्त अन्य कारणों का पता नहीं चल सका है। हमारे चैनल पर बने रहिए, हम हर पल का सीधा प्रसारण आप तक लेकर आ रहे हैं…”
“क्या आकृति कूदेगी? यदि आपका जवाब ‘हाँ’ हैतो AK ‘Y’ टाइप करिए और अगर ‘ना’ है तो AK ’N’ और भेज दिए 58686 पर,”
“आख़िर क्या हुआ ऐसा आकृति के साथ जो नन्ही सी लड़की ने पूरी दुनिया के सामने इतना बड़ा कदम उठाने की ठान ली? जवाब मिलेगा सिर्फ़ हमारे चैनल पर। आज की स्पेशल रिपोर्ट देखना ना भूलें लेकिन उस से पहले एक मिनट हमारे स्पॉन्सर्स के लिए,”
चारों ओर शोर ही शोर था।
“वो किसी की नहीं सुनेगी प्रोफ़ेसर…कभी सोचा नहीं था कि जिसे मैंने ज़िंदगी दी, जिसके लिए अपनी ज़िंदगी की हर ख़ुशी ताक पर रख दी उसे अपनी आँखों के सामने अपनी जान लेते देखूँगी..” भावनाओ ंऔर भय के बोझ ने उस महिला के बूढ़े हो चले घुटनों को ज़मीन पर टिका दिया।
प्रोफ़ेसर संजीव गौतम ने महिला को सहारा दिया।
“भरोसा रखिए…आपकी बेटी को कुछ नहीं होगा,”
महिला की आस और प्रोफ़ेसर पर आस्था, दोनों कमजोर पड़ रहे थे।
प्रोफ़ेसर संजीव गौतम ने फ़ोन पर एक नम्बर स्पीड डायल किया। उनके कान में लगे इयर प्लग में निमित्त की आवाज़ आयी।
“येस प्रोफ़ेसर,”
“प्रोफ़ेसर के बच्चे…क्या कर रहा है?”
“कोशिश.”
“किस चीज़ की?”
“लड़की को रोकने की पहल करने की,”
“कब करेगा? उसके कूदने के बाद?”
“म…मुझसे नहीं होगा प्रोफ़ेसर। ये किसी के जीवन का सवाल है,” निमित्त की आवाज़ में संशय था।
“इग्ज़ैक्ट्ली …ये किसी के जीवन का सवाल है। सिर्फ़ उस लड़की के नहीं, उस माँ के भी जो अपनी बेटी को इस अवस्था में देख के आधी तो वैसे ही मर चुकी है। अगर वो लड़की कूद गई तो सिर्फ़ एक बेटी नहीं…उसके साथ एक माँ का विश्वास भी मरेगा…इसीलिए तुझे करना ही होगा निमित्त,”
“अ…अगर मैं बात करने गया और वो मुझे देखते ही कूद गई तो?” निमित्त का उलझन भरा स्वर प्रोफ़ेसर को सुनाई दिया।
“अपनी शक्ति को पहचान निमित्त। इस मानव संसार में विचार सेअधिक शक्तिशाली कुछ नहीं। एक विचार जीवंत हो तो राम राज्य ला दे, एक विचार कलुषित हो तो महाभारत करवा दे…और तुझ में वो क़ाबिलियत है कि तू लोगों के विचारों को नियंत्रित कर सकता है, उनके दिमाग़ के साथ खेल सकता है…उनके विचार सिर्फ़ पढ़ ही नहीं, बदल भी सकता है,”
“अगर फेल हुआ तो जीवन भर इसकी मौत का बोझ मुझ पर होगा,”
“वो तो तब भी होगा अगर तूने कोशिश ही नहीं की और ये लड़की मर गई,” प्रोफ़ेसर ने तर्क देते हुए कहा।
निमित्त कुछ ना बोला।
“मुझ पर विश्वास है तुझे?” प्रोफ़ेसर ने गम्भीर भाव से पूछा।
“खुद से ज़्यादा,” इस बार निमित्त की आवाज़ में कोई संशय न था।
“और मुझे उतना ही अटूट विश्वास तुझ पर और तेरी क़ाबिलियत पर है मेरे बच्चे,” प्रोफ़ेसर की आवाज़ गहरी थी। इतनी गहरी जो निमित्त की अंतरात्मा में उतर गई। उसने कॉल डिस्कनेक्ट कर दी।
आकृति ने डबडबाई आँखों से नीचे देखा। सब कुछ धुंधला था और उसकी आँखों के सामने यूँ घूम रहा था जैसे बचपन में अपनी माँ का हाथ पकड़ कर ‘घिरनी’ घूमने के बाद होता था। बचपन और माँ को याद करते ही आकृति के मन में टीस उठी।
नीचे सैकड़ों लोगों की भीड़ के बीच भी वो अपनी माँ को, उन धुंधली आँखों से भी साफ़-साफ़ देख सकती थी।
“सब ख़त्म हो गया…सब कुछ ख़त्म हो गया…आय एम सॉरी मम्मा,” आकृति ने हिचकती आवाज़ में कहा। उसका दाहिना पैर एक्स्टेन्शन से बाहर निकला। वो एक पल को ठिठकी।
नीचे शोर बढ़ गया था।
लेकिन उस शोर के बीच भी भी उसे वो आवाज़ यूँ सुनाई दी जैसे उसके अंदर, उसकी अंतरात्मा में गूंजी हो।
“बिल्कुल सही सोच रही हो…दर्द होता है, बहुत ज़्यादा असहनीय पीड़ा। जिस पल ऊपर से तेज़ी से गिरता जिस्म सख़्त ज़मीन से टकराता है, मानव मस्तिष्क पूरी तरह जागृत अवस्था में होता है। दिमाग़ के रेसेप्टर्स जिस्म के टकराने से पहले ही इंसान को एहसास दिला देते हैं कि उसका ये कदम कितना ग़लत था…लेकिन अब बहुत देर हो चुकी होती है…पता है इसीलिए ऊपर से गिर के मरने वाले कई लोगों का हार्ट ज़मीन से टकराने से पहले ही फेल हो जाता है… लेकिन तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होगा। तुम्हारा दिल मज़बूत है, वो डरेगा, उस मोमेंट को और दर्दनाक बनाएगा जब तुम ज़मीन से टकराओगी,”
आकृति ने चौंक कर ऊपर देखा। ग्यारहवें फ़्लोर के, उसके ठीक ऊपर वाले फ़्लैट की बाल्कनी से एक साया नीचे ठीक उसके पास कूदा।
“क..कौन हो तुम? पास मत आना वरना मैं कूद जाऊँ गी,” आकृति हड़बड़ाई।
“रिलैक्स! तुम्हें पकड़ कर ज़बरदस्ती तुम्हारी जान बचाने का मेरा कोई इरादा नहीं। अभी ज़ोर ज़बरदस्ती कर के तुम्हें बचा भी लिया तो तुम मरने का कोई और रास्ता व मौक़ा ढूँढ निकालोगी। जिसमें ना शोर होगा ना लोगों की भीड़,” उस अजीब से, बंजारों या हिप्पी जैसे नज़र आते शख़्स ने इत्मिनान से कहा और बाल्कनी में लगे झूले पर बैठ गया।
“फिर यहाँ क्यों आए हो?”
“तुम्हारे सवाल का जवाब देने,” निमित्त इत्मिनान सेबोला।
“सवाल? कैसा सवाल…कौन सा जवाब?”
“जो तुमने ख़ुद से पूछा था जब तुम नीचे कूदने से पहले ठिठकी थी,”
“तुम्हें कैसे मालूम मैंने क्या पूछा?”
“तुमने अपने मन में खुद से दो सवाल किए…दोनों इस मौक़े पर खड़े शख़्स के लिए बिल्कुल जायज़ सवाल थे। पहला, क्या नीचे गिरने पर दर्द होगा…जिसका जवाब मैं दे चुका। दूसरा, क्या तुम्हारी मम्मा तुम्हें माफ़ कर पाएगी?”
आकृति सन्न रह गई। उस शख़्स ने जैसे उसका मन पढ़ लिया था।
“त…तुम्हें कैसे पता मैंने खुद से क्या सवाल किए?”
“तुम्हारे दूसरे सवाल का जवाब ये है कि नहीं…तुम्हारी मम्मा तुम्हें नहीं, बल्कि अपने आप को मरते दम तक माफ़ नहीं कर पाएगी,” उसके सवाल को नज़रंदाज़ करते हुए निमित्त ने कहा।
“मैं उनकी वजह से ऐसा नहीं कर रही…” आकृति रुआँसा होते हुए बोली।
“मुद्दा वो नहीं, मुद्दा ये है कि तुम्हारी नज़रों में उनकी हैसियत, उनकी ममता और उनका प्रेम अपनी जान लेने की वजह के सामने छोटे पड़ गए। तुम्हारे जाने के बाद अपने जीवन के हर पल…अपनी अंतिम साँस तक वो सिर्फ़ यही सोचेंगी कि अगर उन्होंने तुम्हें थोड़ा और प्यार दिया होता…थोड़ा अधिक समझा होता तो शायद तुम उनके साथ…उनके पास होती,”
“नहीं…नहीं…नहीं…ये सच नहीं…मम्मा ने बहुत ज़्यादा प्यार दिया है मुझे…मैं बस उनको फ़ेस नहीं कर सकती,”
“तुम्हारी गलती नहीं आकृति। तुम अब भी जीवन को समझने की कोशिश कर रही हो। तुमने अपने बॉयफ़्रेंड के कहने पर उसके साथ अपनी ‘प्राइवेट पिक्स’ शेयर कीं क्योंकि तुम उसे उसकी शर्तों पर ये जताना चाहती थी कि तुम उसके प्रति कितनी डिवोटेड हो,” निमित्त की आवाज़ में इतना अपनत्व था जैसे वो हमेशा से आकृति को जानता हो, उसका हमराज़ हो।
आकृति का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया।
“तुम ये भी जानते हो?”
“और ये भी कि तुम्हारे उसी बॉयफ़्रेंड ने अपने दोस्तों के सामने शान बघारते हुए तुम्हारी उन ‘प्राइवेट पिक्स’ की नुमाइश लगा दी,”
“क…कै से पता है तुम्हें?” आकृति की आवाज़ बैठ गयी थी। उसके होंठों से सिर्फ़ हल्की फुसफुसाहट निकली।
“तुम्हारा दिमाग़, तुम्हारे विचार पढ़ सकता हूँ मैं…और तुम्हारा सोशल मीडिया भी। जहां तुमने अपने एक्स को ब्लॉक किया हुआ है लेकिन उसके और उसके दोस्तों और उनके कॉमन फ़्रेंड्स के चैट और कॉमेंट्स पब्लिक हैं,”
आकृति के शरीर ने झुरझुरी ली। वो एक्स्टेन्शन पर ही घुटनों के बल बैठ गई।
“मैं चार साल की थी जब मम्मा-पापा का डिवॉर्स हुआ था। पापा ने कभी मुड़ के भी हमारी तरफ़ नहीं देखा…हम ज़िंदा भी हैं या मर गए इसकी भी खबर नहीं ली। उन्होंने दूसरी शादी कर ली क्योंकि उन्हें बेटा चाहिए था। मम्मा नहीं झुकीं, नहीं टूटीं…वो मेरे लिए जीती चली गयीं..और मैंने…मैंने सिर्फ़ उन्हें शर्मिंदगी दी है,”
“ना! अब तक दी नहीं है…अभी उन्हें सिर्फ़ इस बाद का गहरा दर्द है कि उनकी बेटी के साथ कुछ इतना ग़लत हुआ है कि वो प्यार करना और समाज में सिर उठा के चलना दोनों से जीवन भर कतराएगी…शर्मिंदगी तुम उन्हें नीचे कूद कर दोगी,”
“मैं कैसे फ़ेस करूँ उन्हें?”
“आँखों में आँखें डाल के और बाहें फैला के…कुछ बोलना मत, वो माँ हैं, तुम्हारी खामोशी समझ जाएँगी,”
आकृति के चेहरे पर उलझन भरे भाव आए। निमित्त झूले से उठा और अपनी जेब से एक टैरो कार्ड्ज़ का डेक निकाल कर शफ़ल हुए उसके पास पहुँचा।
“इनमें से कोई तीन कार्ड चुनो,” वो आकृति की तरफ़ डेक बढ़ाते हुए बोला।
इस दौरान उसने देखा कि दोनों बग़ल की बाल्कनी पर रेस्क्यूटीम पहुँच चुकी है। नीचे क्रेन पर भी फ़ायर ब्रिगेड वाले तैनात थे। उसने हाथ से उन्हें रुकने का इशारा किया। सभी अपनी जगह रुक गए। नीचे मीडिया में भी हलचल थी, खबर अब और मसालेदार हो रही थी।
“आख़िर कौन है ये रहस्यमयी शख़्स जिसने ऐन मौक़े पर पहुँच के आकृति को नीचे कूदने से रोक लिया? क्या येआकृति का आशिक़ है जिससे रूठ के आकृति जान देने चली थी और जिसने फ़िल्मी हीरो के अन्दाज़ में एंट्री मार के अपनी माशूक़ा को बचा लिया? अपनी राय जल्दी से हमें कॉमेंट कर के बताएँ,” नीचे विश्वस्तरीय न्यूज़ रिपोर्टिंग अपने चरम पर थी।
आकृति ने झिझकते हुए पहला टैरो कार्ड खींचा।
“ ‘द टॉवर’। ये कार्ड विनाश दर्शाता है, एक दुखदायी अंत। यह अंत सोच का हो सकता है…या फिर हमारे पुराने व्यक्तित्व का। अधिकतर लोग इसे टैरो डेक के सबसे बुरे कार्ड्ज़ में से एक मानते हैं, पर मैं नहीं। मेरे हिसाब से ये सबसे पॉज़िटिव कार्ड्ज़ में से एक है…क्योंकि अगर पुराने का अंत नहीं होगा तो नए की स्थापना कैसे होगी? ये कार्ड दिखाता है कि तुम्हारे अब तक के जीवन में जो भी आईडियोलॉजीज़ थीं, तुम्हारी जो कोर पर्सनैलिटी थी उसका एक दुखदायी अंत होने का समय आ गया है ताकि तुम जीवन में एक नयी शुरुआत करो। अगला कार्डपुल करो,”
आकृति नेदूसरा कार्ड निकाला।
“फ़ोर ऑफ़ सॉर्ड्ज़ । ये कार्ड दर्शाता है कि तुम्हारे लिए समय है खुद पर ध्यान देने का, रुक के अपने जीवन के बारे में सोचने और विचार करने का और अपने आंतरिक दर्द और रिक्त स्थान को भरने का। अब फ़ाइनल कार्ड खींचो,”
आकृति नेअंतिम कार्ड निकाला।
“ ‘द सन’, टैरो डेक का सबसे पॉज़िटिव कार्ड। जब तुम अपने नए व्यक्तित्व के साथ जीवन की फिर से शुरुआत करोगी तो ज़िंदगी में वैसे ही चमकोगी जैसे रात का अंधियारा दूर कर के सुबह का सूरज निकलता है। यूँ समझो कि अपने बॉयफ़्रेंड के इमोशनल एंट्रैपमेंट में फँसने वाली आकृति खन्ना आज वाक़ई यहाँ से गिर के मर गई। अब जो लड़की मेरे साथ नीचे जाएगी वो अपनी माँ जितनी ही सशक्त और सबल है,”
“प…पर…अगर मेरे एक्स ने वो पिक्स इंटर्नेट पर पोस्ट कर दीं तो मैं कहीं की नहीं रहूँगी,” आकृति अब भी उलझन में थी।
“पहली बात…येअच्छा ही है कि तुम टीनएजर्स के पास पुअर क्वालिटी कैमरा फ़ोन होता हैऔर तुम लोग ऑफ़ ऐ ंगल से ब्लर और ग्रेनी पिक्स लेते हो। किसी आम लड़की को, जिसका चेहरा जाना- पहचाना ना हो, उसकी पिक्स देख के आयडेंटिफ़ाई करना मुश्किल है। तुम डिनाई कर सकती को कि पिक्स तुम्हारी नहीं हैं,”
“ऐसा थोड़े ही होता है,” आकृति आहत भाव से बोली।
निमित्त कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला।
“ठीक है, कल सुबह कुछ ऐसा होगा जिसके बाद तुम्हें इस बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी,”
“ऐसे कैसे?”
“ऐसे ही! मुझ पर भरोसा करो…मुझ पर भरोसा कर के आज तक किसी का बुरा नहीं हुआ,” निमित्त की आँखों में झलकती शरारत के बावजूद उनमें एक सच्चाई थी।
आकृति एक्स्टेन्शन से वापस बाल्कनी में निमित्त के पास आ गई। नीचे इकट्ठा भीड़ के उन्हें ‘चियर’ करने का शोर गूंजा।
“एक और बात…मीडिया गिद्ध की तरह तुम्हारे लिए घात लगाए बैठा है। जैसे ही तुम यहाँ से बाहर निकलोगी रिपोर्टर्स तुम पर टूट पड़ेंगे। तुम्हारी इस उपद्रवी…फ़सादी हरकत का कारण जानने के लिए तुम्हें भंभोड़ेंगे,” निमित्त संजीदा होते हुए बोला।
आकृति ने घबरा कर उसकी आँखों में देखा।
“कह देना बोर हो गई थी, लाइफ़ में थ्रिल और अटेन्शन सीक कर रही थी, चाहती थी कि पूरी दुनिया की नज़रें तुम पर हों इसलिए महज़ फ़ुटेज खानेकी नियत से तुमने ऐसा किया,”
“प…पर सब लोग हँसेंगे मुझ पे…ट्रोल की जाऊँ गी..मज़ाक़ बन के रह जाऊँ गी,”
“और अगर तुमने ऐसा नहीं किया तो पता है क्या होगा?”
आकृति ने नज़रों से इनकार करते हुए निमित्त की आँखों में देखा।
“भूखे शिकारी कुत्ते देखे हैं कभी? वो अपने शिकार की गंध ही नहीं, उसका भय भी सूंघ लेते हैं। ठीक इसी तरह ये मीडिया वाले तुम्हारे इस ऐक्ट की असल वजह सूंघने लग जाएँगे और तुम्हारी उन प्राइवेट पिक्स का सच जो अब तक चंद लोग जानते हैं वो पूरी दुनिया के सामने होगा,”
आकृति भयभीत नज़र आई।
“मेरी बात सुनो…और समझो आकृति, फ़र्क़ इससे नहीं पड़ता कि हम दुनिया की नज़रों में क्या हैं। समाज हमें देख कर मखौल उड़ाता है या थू-थू करता है। फ़र्क़ इससे पड़ता है कि हम अपनी नज़रों में क्या हैं, हमारी अंतरात्मा हमें कैसे देखती है। सुबह उठ कर जब आईने में अपनी आँखों में देखो तो क्या नज़र आता है? खुद पर शर्मिंदगी होती है, घिन्न आती है, अफ़सोस होता है…या फिर गर्वहोता है कि हम जो हैं, ना वो कोई समझ सकता है ना जान सकता है। मूर्खों की भीड़ को अपना मज़ाक़ बनाते देख उनके अस्तित्व पर मन ही मन अट्टहास करने का मज़ा ही अलग होता है,”
आकृति ने सकुचाते हुए सहमति में सिर हिलाया।
“मीडिया किसी भी न्यूज़ को तब तक खींचती है जब तक व्यूअर्स उससे ऑर्गैज़म ले रहे हैं। न्यूज़ चैनल से चिपके विकृत बुड्ढों की भीड़ जो हर खबर में विभत्सता तलाशती है ताकि अपनेअंतर्मन की कुंठा की तुष्टि कर सके । किसी लड़की का बलात्कार कितने लोगों ने, कितनी बार और कैसे किया इसमें ‘हाई’ लेने, सोशल मीडिया पर चार दिन हैशटैग्स चलाने और मोमबत्ती जला कर पाँचवें दिन पॉलिटिक्स या क्रिकेट में डूब के उस मुद्दे को टिश्यूपेपर की तरह फेंक देने वाले बुद्धिजीवी समाज को ऐसी बेवक़ूफ़ और लाइम लाइट की भूखी लड़की की स्टोरी में कोई इंट्रेस्ट नहीं होगा जो सिर्फ़ मज़े के लिए मरने चढ़ गई। लोग इंट्रेस्ट नहीं लेंगे तो मीडिया भी तुम्हारा पीछा छोड़ देगा,”
इस बार आकृति का सिर दृढ़ भाव से हिला।
“एक आख़री बात…संसार में पिता का स्थान ‘सूर्य’ का है। पिता भी सूर्य की तरह अंधियारे रास्तेको प्रकाशमान करता है, प्राण ऊर्जा देता है…खुद जलता है ताकि अपने संसार…अपने परिवार को जीवन दे सके । जब भी जीवन में पिता की और पिता के मार्गदर्शन की कमी महसूस करो, आसमान में उगते सूर्य को एक कलश जल अर्पित कर ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ मंत्र का जाप करना,”
आकृति आगे बढ़ के निमित्त के गले लग गई।
“थैंक-यू…थैंक-यूसो मच,”
“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। बाह्य शत्रु से तो हर वीर करे है द्वंद्व…महावीर कहलाए वही जो जीते अपने मन का अंतर्द्वंद्व,” निमित्त की आवाज़ जैसेआकृति की अंतरात्मा में गूंजी।
“अब तुम सामने के रास्ते से निकलोगी और मीडिया को फ़ेस करोगी। मैं फ़ायर एग्ज़िट से बग़ल वाले ब्लॉक में जाऊँगा और पीछे के रास्ते से निकल जाऊँगा,” निमित्त फ़्लैट का दरवाज़ा खोलते हुए बोला।
कॉरिडोर के दूसरे एंड पर लिफ़्ट उस फ़्लोर पर आ के रुक रही थी।
“मीडिया वाले आ रहे हैं…ऑल द बेस्ट आकृति,”
“अरे….पर वो तुम्हारे बारे में पूछेंगे तो क्या कहूँगी?”
“कह देना कोई वाहियात डेस्पो था…जो मरती लड़की देख कर चान्स मारने चला आया,” निमित्त ने आँख मारते हुए कहा और फ़ायर एग्ज़िट विंडो से छज्जे पर कूद गया। पीछे लोगों के हुजूम का शोर सुनाई दे रहा था।
इस घटना के कुछ घंटों बाद एक और हंगामा हुआ। पार्टी करते हुए आकृति के एक्स और उसके दोस्तों ने शराब और एल.एस.डी. के नशे में पहले अपनी पूर्ण निर्वस्त्र फ़ोटोग्राफ़्स होम प्रिंटर पर प्रिंट कर के पूरी लोकैलिटी में पोस्टर चिपकाए, फिर अपने मोबाइल फ़ोन्स जला दिए और उसी नंग-धडंग अवस्था में एरिया के पुलिस थाने जा कर पुलिस वालों से मार-पीट की।
ऐसे कोई भी सबूत या गवाह नहीं थे जो निमित्त को इस घटना से जोड़ सकें।
रात के समय निमित्त और प्रोफ़ेसर संजीव गौतम प्रोफ़ेसर के घर के गार्डेन में बैठे थे, दोनों के सामने बियर के आधे ख़ाली ग्लास थे। प्रोफ़ेसर निमित्त को देख के यूँ मुस्कुरा रहे थे जैसे उसकी हरकत के लिए उसे डाँटना चाहते हों लेकिन साथ ही उस पर इतना गर्व था कि फूले नहीं समा रहे।
***
“बहुत बदमाश है तू…हद से ज़्यादा! मन की करता है…किसी की नहीं सुनता,” प्रोफ़ेसर के अल्फ़ाज़ शिकायती अवश्य थे लेकिन लहजा ऐसा था जैसे प्रशंसा कर रहे हों।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त अबोध बच्चों से एक्स्प्रेशन चेहरे पर लिए हुए मुस्कुराया और अपना बियर का ग्लास ख़ाली किया।
प्रोफ़ेसर ने ग्लास दोबारा भर दिया।
“वैसे ये कहना ग़लत है…मुझ मासूम पर सरासर ज़्यादती है कि मैं किसी की नहीं सुनता। आपकी तो सुनता हूँ,”
“ग़नीमत है…वरना पता नहीं क्या ही करता तू,”
निमित्त मुस्कुराया।
“तूने बेहतरीन काम किया निमित्त…मेरी अपेक्षा से कहीं अधिक बेहतरीन…” इस बार प्रोफ़ेसर खुल कर प्रशंसा करते हुए बोले।
“श्रेय आपको जाता है, जो किया आपके लिए हुआ…मैं तो बस ‘निमित्त’ मात्र हूँ,”
“त्च! हर बार अपने किए का क्रेडिट मुझे क्यों देता है? जो किया तूने किया,”
“ना! मैंने किया क्योंकि मेरे गुरु ने मुझे बताया कि मैं कर सकता हूँ। आपने कभी नहीं कहा मुझसे कि अपने किए का क्रेडिट मुझे दिया कर…मैं खुद देता हूँ, अपनी इच्छा से, अपने आदर के प्रतीक के रूप में,”
संजीव की आँखों के पोरों में हल्की ख़ुशी की नमी छलछलाई, जिसे वो ख़ूबसूरती से बियर का ग्लास उठा कर डुबो गए। फिर एकाएक संजीदा हुए।
“ ‘स्टडीज़ इन इंडियन ऑकल्ट साइंस एंड डार्क आर्ट्स ’ आय बेट, ज़्यादातर लोगों ने इसका नाम भी नहीं सुना होगा। लोगों को इल्म ही नहीं कि ऐसी कोई विधा भी होती है। हमारे देश मेंऑकल्ट को लेकर सिर्फ़ दो तरह का मत रखने वाले लोग हैं। एक साले वो जाहिल-गंवार जो तंत्र-मंत्र का मतलब सिर्फ़ टोना-टोटका समझते हैं। जिनकी बुद्धि मोहल्ले की शादीशुदा औरतों और अंडरएज बच्चियों पर वशीकरण से ऊपर नहीं उठती और दूसरे वो जो इसको अंधविश्वास और ढकोसला मानते हैं। शर्म की बात है कि जिस भारतवर्ष ने दुनिया को ‘यंत्र-तंत्र और मंत्र’ की महाशक्ति का ज्ञान दिया वहाँ ऑकल्ट और डार्क आर्ट्स सिर्फ़ सड़कछाप औघड़ और तांत्रिकों का खिलौना बन कर रह गया है,”
निमित्त शांति से उनकी बात सुन रहा था। उसने सहमति मेंअपना सिर हिलाया। प्रोफ़ेसर की आँखें अब गुलाबी हो रही थीं। निमित्त जानता था कि अब प्रोफ़ेसर जो भी बोलेंगे वो दिल से बोलेंगे, दिमाग़ से नहीं।
“तू टैलेंटेड है निमित्त…बहुत ज़्यादा टैलेंटेड। तू जीवन में जो कुछ भी करना चाहेगा वो कर पाने की क़ाबिलियत है तुझमें,”
“वही तो कर रहा हूँ,” निमित्त सहज भाव से बोला।
“क्यों कर रहा है? ये रास्ता तुझे जीवन में किसी मंज़िल तक लेकर नहीं जाएगा। ऊपर वाले ने तुझे जो नियामत बक्शी है वो हर किसी को नसीब नहीं होती। इसका सही इस्तेमाल कर, अपना जीवन बना। एक कामयाब इंसान बन, इस लाइन को छोड़ के जीवन में कुछ ढंग का कर,”
निमित्त मुस्कुराया। उसने अपना बियर पिचर ख़ाली किया, एक गहरी साँस खींची…जैसे आगे जो बोलने वाला है उसके लिए हिम्मत जुटा रहा हो। फिर बोला,
“नियामत का तो पता नहीं, पर दूसरों से अलग हूँ ये बात बचपन में काफ़ी जल्दी समझ आ गई थी। मुझे समझने वाला मेरे नाना के अलावा दूसरा कोई ना था। उनकी डेथ के बाद मैं मँझधार की कश्ती था, ना खैवइया ना पतवार। मेरे नाना हमेशा कहा करते थे…किताबों से दोस्ती कर आशू, उन्हें अपना दोस्त बना, जीवन में किसी और दोस्त की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। नाना के जाने के बाद उनका रिक्त स्थान किताबों से भरना शुरू किया…यही वो समय था जब आपको पहली बार पढ़ा। पहली बार पढ़ के ही लगा कि कोई तार जुड़ गया है। आप सागर में मध्य बने उस विशाल लाइट हाउस जैसे थे जिसकी रौशनी मेरी भटकी, बिना पतवार की नाव को राह दिखा रही थी,”
निमित्त शांत हुआ, प्रोफ़ेसर ने दोनो के पिचर भरे।
“आपको पता नहीं, पर जब आपसे मिला भी नहीं था तब से आप मेरे गुरु हैं। ऑकल्ट को लेकर आपकी और प्रोफ़ेसर ‘भारतेंदु नागराजन’ की इन-डेप्थ नॉलेज, आपकी आइडिओलॉजीज़, आपके विचार, आपकी हर एक बात ने मेरा मार्गदर्शन एक गुरु की तरह किया है….मुझे निमित्त कालांत्री बनाया है,”
प्रोफ़ेसर खुद को भावुक होने से रोकने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे।
“मुद्दा ये है कि इस अनकन्वेन्शनल पाथ पर आप चले, बिना कुछ हासिल करने की लालसा लिए… और आपने मुझे बना दिया। आज मैं चल रहा हूँ…बिना किसी लालसा के, शायद यही ब्रह्मांड का ‘निमित्त’ है…शायद मैं भी ऐसी भटकी नावों को राह दिखा सकूँ जिनके पतवार छूट गए हैं,”
प्रोफ़ेसर की आँखों में वही भाव थे जो एक गर्व से भाव-विभोर हुए पिता की आँखों में होते हैं। “पता है निमित्त…मैं तुझ में अपना गुजरा हुआ कल देखता हूँ,”
“जानता हूँ…और मैं आप में अपना आने वाला कल…बस मैं आप जितना विनम्र नहीं,” निमित्त मुस्कुरा कर बोला।
“ये राह बहुत कठिन है बेटे,”
“पहली बार चलना शुरू किया था तब से चाल वक्री है मेरी…देख लेंगे,” निमित्त बेपरवाही से बोला।
प्रोफ़ेसर ने निमित्त को समझाने का अंतिम प्रयत्न किया,
“मान ली तेरी बात लेकिन अब तू बिन पतवार की नाव नहीं है बेटे। अपनी शक्ति को पहचान, तू अथाह, अनंत महासागर है जिसकी थाह कोई नहीं लगा सकता। अब तुझे इस पुराने बूढ़े लाइट हाउस की ज़रूरत नहीं…अब तुझे मेरी ज़रूरत नहीं,”
“पर आपको तो है ना…मेरी ज़रूरत। कैसे छोड़ दूँ आपको यूँ ही? मैं कहीं नहीं जा रहा प्रोफ़ेसर, आप धक्का मार के निकालेंगे फिर भी नहीं जा रहा,”
प्रोफ़ेसर ने हथियार डालने के अन्दाज़ में सिर हिलाया।
“वैसे…एक चीज़ की लालसा है मुझे,” निमित्त कुछ सोचते हुए बोला।
“किस चीज़ की?”
“आपका सपना पूरा करना है। ‘तंत्रपुरम’ ढूँढना है आपके साथ मिल के। मैं चाहता हूँ कि सारी दुनिया जाने कि मेरे गुरु कितने महान हैं, आपको वो नाम और सम्मान मिले जिसके आप अधिकारी हैं,” निमित्त संजीदा स्वर में बोला।
प्रोफ़ेसर भी गम्भीर हुए,
“ ‘तंत्रपुरम’…क़ाबिनी के जंगलों में बसी एक प्राचीन नगरी जिसे आज अधिकतर इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता मिथक मानते हैं। प्राचीन भारत में उन्नत तंत्र विज्ञान का केंद्र था तंत्रपुरम जो एकाएक यूँ ग़ायब हो गया जैसे धरती पर उसका अस्तित्व कभी था ही नहीं। मेरा और प्रोफ़ेसर भारतेंदु का सपना था तंत्रपुरम का सच दुनिया के सामने लाना। लेकिन तंत्रपुरम तलाशते हुए एक दिन प्रोफ़ेसर भारतेंदु भी उस रहस्यमयी प्राचीन नगरी की तरह ही ग़ायब हो गए…जैसे उनके समूचे अस्तित्व को ही ब्रह्मांड से इरेज़ कर दिया गया हो,”
“जानता हूँ। यह भी कि अपने पार्ट्नर प्रोफ़ेसर भारतेंदु के एकाएक ग़ायब होने के बाद आप गहरे अवसाद में चले गए और आपने वर्षों तक लिखना बंद कर दिया था,”
“तो ये भी समझ लो कि भारतेंदु के जाने से जो झटका मेरे जीवन को लगा था वो मैं दोबारा नहीं झेल सकता। तुम तंत्रपुरम का नाम भी नहीं लोगे,” प्रोफ़ेसर जैसे निमित्त को चेतावनी देते हुए बोले।
“मैं कहीं नहीं जा रहा प्रोफ़ेसर। एक कार्ड खींचिए,” निमित्त तपाक से अपना टैरो डेक प्रोफ़ेसर के सामने करते हुए बोला।
प्रोफ़ेसर ने उसे एक सख़्त लुक दिया।
“अरे खींचिए भी!”
प्रोफ़ेसर संजीव गौतम ने अपनी आँखें बंद की जैसे ध्यान केंद्रित कर रहे हों, और एक कार्ड डेक से बाहर खींचा।
“बिंगो! ‘व्हील ऑफ़ फ़ॉर्चून’…आने वाले दस साल हमारे लिए रोलर-कोस्टर राइड होंगे…ऊपर ज़्यादा, नीचे कम। हम वहाँ होंगे जहां हम पहुँचना चाहते हैं…उस शीर्ष पर पहुँच कर हम वो कर रहे होंगे जो हम करना चाहते हैं,”
“चियर्स टू दैट,” प्रोफ़ेसर की आवाज़ गहरी और गम्भीर थी।
हमेशा की तरह निमित्त के कार्ड्ज़ बिल्कुल सही थे। अगले दस सालों में प्रोफ़ेसर संजीव गौतम के सानिध्य में निमित्त ने हर मुश्किल और हर दुश्मन का मुँह तोड़ते हुए इंडियन ऑकल्ट साइंस और प्रोफ़ेसर संजीव गौतम को उनका वो सम्मान और स्थान दिला दिया जिसके वे हक़दार थे।
वर्तमान समय
“ग़द्दार, दोगला, दग़ाबाज़, विश्वासघाती…गुरुघाती! इनमें से किसी भी उपाधि या उपनाम से नवाज़िए, इस शख़्स पर ये सभी ऐन फिट बैठते हैं…जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ नन अदर देन निमित्त कालांत्री की, जिसने सिर्फ़ अपने गुरु का ही नहीं, बल्कि उन हज़ारों-लाखों लोगों का भी काटा है जो इस पर विश्वास रखते थे,” एक फ़ेमस यूट्यूबर अपने लाइव पॉड्कैस्ट में बोल रहा था।
व्यूअर्ज़ की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही थी।
“प्रोफ़ेसर संजीव गौतम के तलवे चाट कर उनके फ़ॉलोअर्स के बीच नाम कमाने वाला ये इंसान इस कदर गिर गया कि इसने लोगों के विश्वास ही नहीं, उनकी जान से भी खिलवाड़ करना शुरू कर दिया। अनएथिकल प्रैक्टिस एंड कॉंडक्ट के आरोप तो इस पर हमेशा से ही लगते रहे लेकिन अपनी बढ़ती पॉप्युलैरिटी के नशे और घमंड में चूर इसने लाखों लोगों को ठगा और एक मानसिक रूप से बीमार लड़की का ‘एक्सॉर्सिज़म’ करने के नाम पर उसका ग़लत फ़ायदा उठाया। इसका ये घिनौना चेहरा कहीं दुनिया के सामने उजागर ना हो जाए इस डर से उस लड़की की हत्या कर के उसे ‘ऐक्सिडेंटल डेथ ड्युरिंग एक्सॉर्सिज़म’ का रूप दे दिया,”
वीडियो पर निमित्त के लिए ‘हेट कॉमेंट्स’ की बाढ़ आ गई।
यूट्यूबर ने अपने मोबाइल पर निमित्त का एक पुराना इंटरव्यू प्ले कर के कैमरा के सामने कर दिया।
“आपको इसका एक पुराना इंटरव्यू दिखाता हूँ। देखिए कितना बड़ा ढोंगी..दोगला और पाखंडी है ये इंसान,”
इंटरव्यू में होस्ट ने निमित्त से सवाल किया,
“आपके लाखों चाहने वाले हैं निमित्त। आपके फ़ॉलोअर्स आपको भगवान की तरह पूजते हैं…कैसा फ़ील होता है ये देख के?”
निमित्त सहज भाव से मुस्कुराया,
“मैं भगवान नहीं। मैं सिर्फ़ ‘थोड़ा सा भगवान’ हूँ…बस उतना ही जितने वो लोग हैं जो मुझसे प्रेम और मुझ पर विश्वास रखते हैं,”
“अपनी इस कामयाबी का श्रेय किसे देना चाहेंगे?”
“कामयाब तो अभी हुआ नहीं…सफ़र लम्बा है। हाँ, आगे बढ़ने की ऊर्जा और साहस देने का श्रेय मेरे गुरु प्रोफ़ेसर संजीव गौतम को जाता है। जीवन में पिता का स्थान कोई नहीं ले सकता, और गुरु वो होता है जिसका ओहदा और गरिमा पिता जितना ही उच्च होता है…इसलिए वे मेरे लिए ‘पिता तुल्य’ हैं,”
यूट्यूबर ने वीडियो पॉज़ की।
“सुना आपने! क्या कह रहा है ये ढोंगी ड्रामेबाज़…’पिता तुल्य’…आक्क-थू!” द्वेष व घृणा से उसने थूकने का उपक्रम किया, फिर बोला।
“अपने फ़ायदे और लोगों की वाहवाही बटोरने के लिए ये ऐसी लच्छेदार बातें करता है और फिर अपने उसी गुरु को बर्बाद करने की क़समें खाता है। कॉमेंट कर के बताइए दोस्तों आपका क्या कहना है…मुझे तो लगता है ये दोगला अपने सगे बाप का भी नहीं होगा!”
कॉमेंट्स में फिर गालियों की बाढ़ आई।
यूट्यूबर ने आगे कहा,
“आचार्य संजीव गौतम और उनके ‘आर्टऑफ़ लव, पर्सनल हीलिंग एंड अवेकनिंग’ ने लाखों लोगों की जिंदगियाँ संवारी हैं। अपने इस यूट्यूब चैनल के माध्यम से मैं अपने फ़ॉलोअर्स, फ़ैन्स और पूरे देश से अपील करना चाहूँगा कि आचार्यज़ी को सपोर्ट करें…उनके राइट हैंड…सॉरी…उनकी राइट हैंड ‘मंथरा’ जी को सपोर्ट करें। एक मर्द के शरीर में जन्म लेने वाली मंथरा ने इस पुरुष प्रधान समाज को उसकी औक़ात दिखाते हुए अपने अंदर के नारी स्वरूप को स्वीकारा है…आज इंडिया में ‘एल.जी.बी.टी.क्यूक्वीन’ के रूप में सोशलिस्ट्स एंड इंटेलेक्चूअल्स के बीच मंथरा जी का नाम बहुत आदर और सम्मान से लिया जाता है। उनका आचार्यजी के साथ खड़ा होना ये संदेश देता है कि आचार्य ज़ी निमित्त कालांत्री जैसे रूढ़िवादी और दक़ियानूसी विचारधारा के पाखंडियों का बहिष्कार कर के नए समय और देश के युवाओ ं के साथ चलने वाले हैं और उनका मार्गदर्शन करने वाले हैं। साथ ही मेरे माध्यम से मंथरा ज़ी ने आप सभी से ये अपील की है कि निमित्त कालांत्री जैसी समाज की गंदगी का खुलेआम बहिष्कार करें, ये जहां कहीं भी छुपा बैठा हो, इसका घिनौना चेहरा दुनिया के सामने लाने में हमारी मदद करें,”
वीडियो ख़त्म हुआ। मल्हार ने होंठों के बीच दबी सिगरेट ऐश-ट्रे में झोंकी और फ़ोन पर एक नम्बर डायल किया। दूसरी तरफ़ कुछ देर रिंग जाती रही फिर कॉल पिक हुआ।
“हेल्लो..”
“निमित्त कालांत्री का अता-पता ढूँढ रहे हो? वो गोवा में छुपा बैठा है…मोल्लेम में,”
कहानी जारी है।
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