ॐ नमः हरिहराय
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ॐ नमः हरिहराय
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नितिन के. मिश्रा
13 साल पूर्व.
मोल्लेम गाँव, गोवा
“जूली चल ना…शाम होने वाली है, आई डाँटेगी,”
“तुम लोग जाओ, मैं थोड़ी देर में आ जाऊँगी,”
एक पत्थर पर चुपचाप बैठी तेरह वर्षीय जूली ने बिना उन बाक़ी बच्चों की तरफ़ देखे कहा जो उसे साथ घर चलने के लिए बुला रहे थे। जूली का मूड काफ़ी ख़राब था और फ़िलहाल वो किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी।
“तू नहीं चलेगी तो आई मुझे डाँटेगी कि मैं तुझे अकेला छोड़ के क्यों आया,” जूली का छोटे भाई मैक्स ज़िद करते हुए बोला।
“मैंने बोला ना मैं थोड़ी देर में आ जाऊँगी…चल भाग यहाँ से वरना पत्थर से सिर फोड़ दूँगी तेरा,” जूली बुरी तरह झल्ला कर चीखी। उसने पास ही पड़ा पत्थर फेंकने के लिए उठा लिया।
“नहीं आना मत आ…गो टू हेल,” मैक्स ने जूली को मुँह चिढ़ाते हुए कहा और बाक़ी बच्चों के साथ वहाँ से चला गया।
जूली जानती थी कि उसकी आई सही थी। मोल्लेम गाँव से लगे वेस्टर्न घाट्स के जंगल और आस-पास का जंगली इलाक़ा दिन ढलने के बाद सुरक्षित नहीं था…इंसानों की वजह से नहीं! मोल्लेम छोटा सा गाँव है जहां आपराधिक घटना के नाम पर किसी की सायकल भी चोरी नहीं होती। हर कोई एक-दूसरे को जानता था, और बाहर से घूमने आने वाले लोग भी शाम ढलने के बाद उधर नहीं आते थे। ख़तरा साँप और बिच्छुओं से था जो दिन ढलते ही बाहर निकलते हैं। हालाँकि उनमें सभी ज़हरीले नहीं थे लेकिन वहाँ करैत या कोबरा का निकलना आम बात थी।
वैसे तो जूली भी समय से वापस घर चली जाती थी लेकिन उस दिन मैक्स और बाक़ियों के साथ वापस ना जाने की वजह थी। जब वो निश्चिंत हो गई कि सब जा चुके हैं तो उसने पीछे मुड़ कर एक-बार फिर अपनी फ़्रॉक देखी। सफ़ेद फ़्रॉक पर नीचे की तरफ़ ख़ून के गहरे धब्बे लगे थे जो छुपाए ना छुपते। जूली अंधेरा होने का इंतज़ार कर रही थी ताकि सीधा भाग के आई के पास जाए और उसे कोई ना देखे। उसे पेट के निचले हिस्से में दर्द और चुभन महसूस हो रही थी, और अपनी इस अवस्था की वजह से उसे बुरी तरह झुँझलाहट और ग़ुस्सा आ रहा था।
जूली का घर गाँव के बाहरी हिस्से में था। वो अंधेरे और झाड़ियों की ओट में छुपते हुए जाती तो उसे कोई ना देखता। अब अंधेरा इतना घिर चुका था कि वो आगे बढ़ सकती थी।
“अरे जूली! अंधेरा घिर गया है, यहाँ जंगल में क्या कर रही है?”
जूली मुश्किल से कुछ कदम ही बढ़ पाई थी कि किसी ने पीछे से आवाज़ दी। जूली उस आवाज़ को पहचानती थी। वो ठिठक के रुक गई।
“क…कुछ नहीं…घर जा रही थी,” जूली ने सकपका कर कहा।
एक साया झाड़ियों की ओर से उसकी तरफ़ बढ़ा। साये के हाथ में बड़ी बैटरी वाली टॉर्च थी जिसकी लाइट जूली पर पड़ रही थी।
“अंधेरे में साँप-बिच्छू डस लेंगे, वैसे भी बरसात का समय है। मेरे साथ चल। टॉर्च की रौशनी से साँप और जंगली जानवर पास नहीं आएँगे,”
जूली ने कोई जवाब ना दिया, वो सिर झुकाए, दोनों हाथ कमर के पीछे बांधे खड़ी रही।
“चल ना, ऐसे क्यों खड़ी है?”
फिर कोई जवाब नहीं।
“ये पीछे क्या छुपा रही हो?” साया दो कदम आगे बढ़ा।
साया उसके पीछे देखने की कोशिश कर रहा था, जब कि जूली अपनी पीठ उसकी तरफ़ नहीं कर रही थी। साया ठिठका, जैसे उसे जूली के ऐसा करने का कारण समझ आ गया हो।
“अच्छा! तो ये बात है,”
जूली ने नज़रें झुका लीं।
“अरे इट्स ओके। ये बिल्कुल नॉर्मल है। दिस शोज़ हमारी जूली अब बड़ी हो गई है। कम ऑन, लेट्स गो। जल्दी से तुम्हें आई के पास ले कर चलते हैं,” साये की आवाज़ में आत्मीयता और अपनत्व थे।
जूली उसे अच्छी तरह जानती थी। भरोसा करती थी।
जूली ने स्वीकृति में सिर हिलाया और चुपचाप उस साये के आगे-आगे चलने लगी। टॉर्च लाइट उसके आगे पगडंडी रास्ते पर पड़ रही थी।
कुछ कदम आगे बढ़ने पर जूली की झिझक कम हो गई। अब वो इत्मिनान से तेज़ कदम बढ़ा रही थी। वो जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहती थी। आई के पास।
अचानक। जूली के पीछे से आती टॉर्च लाइट यूँ नाची जैसे भूकम्प आया हो।
“तड़ाक”
जूली के सिर पर पीछे से टॉर्च की हार्ड मेटल बॉडी टकराई। करेंट सी तेज़ लहर जैसे उसके शरीर में उठी। सारे शरीर का खून जैसे उसके सिर में इकट्ठा हो रहा था जो कि चोट वाली जगह से सोते के समान फूट निकला। जूली ने चीखते हुए दोनो हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उसका शरीर कमान की तरह पीछे की तरफ़ मुड़ा। दो मज़बूत हाथों ने शिकंजे की तरह उसकी पतली और मुलायम गर्दन जकड़ ली।
जूली का शरीर बुरी तरह छटपटा रहा था।
उसका गला घोंटते हाथ काँपने लगे। जैसे अपनी पूरी ताक़त ना लगा पा रहे हों। जूली ने एकाएक अपना शरीर ढीला छोड़ दिया जिससे उसका पूरा भार उन काँपते हाथों पर आ गया। वो हाथ उस भार को सम्भाल ना पाए। जूली की गर्दन उन हाथों की गिरफ़्त से छूट गई।
वो जितनी तेज़ भाग सकती थी भागी।
“आईsss”
जूली ने चीखने की कोशिश की। चोट के दर्द और गला रुँधने के कारण उसकी चीख धीमी और फँसी हुई निकली।
“र..रुक जाओ। चिल्लाओ मत। कोई सुन लेगा…”
उसका पीछा कर रहे साये की आवाज़ में घबराहट झलक रही थी।
सहमी हुई जूली चाह कर भी बहुत तेज़ नहीं भाग पा रही थी। उसके पीछे आते साये के हाथ-पैर भी जैसे घबराहट से फूले हुए थे। जूली का पीछा करते हुए उसे यूँ लग रहा था कि उसके पैरों में भागने की शक्ति नहीं है।
जूली भागते हुए उस मोड़ के क़रीब आ पहुँची थी जो जंगल के बाहर, उसके घर को जाता था। दूर से किसी गाड़ी की हेडलाइट की हल्की रौशनी आती मालूम दी। जूली और सड़क के बीच मुश्किल से दो सौ मीटर का फ़ासला था। वो जान फेंक कर भागी।
“बचाओsss”
अब बस एक झाड़ियों का झुंड पार करना था और वो अपने हमलावर के चंगुल से निकल जाती। हेडलाइट किसी बड़ी कार की थी। उस इलाक़े में ऐसी कार वो ऐसे समय दिखना आम बात नहीं थी।
जूली अब कँटीली झाड़ियों को पार कर रही थी जिनमें उलझ कर उसकी फ़्रॉक जगह-जगह से फटने लगी। काँटों से खुद लहूलुहान होती जूली को इसकी कोई परवाह नहीं थी। उसे बस आई के पास पहुँचना था। वो जानती थी कि अगर वो भाग के खुद को आई के आँचल में छुपा लेगी तो बच जाएगी।
बड़ी गाड़ी अब बिल्कुल पास आ गई थी।
जूली ने पूरा ज़ोर लगा कर खुद को आगे धकेला।
उसी समय एक उड़ता हुआ पत्थर जूली के सिर के पिछले हिस्से से टकराया। जूली मुँह के बल झाड़ियों में जा गिरी। उसका नन्हा हाथ झाड़ियों के बाहर सड़क पर था। शायद गाड़ी वाले को हेडलाइट की रौशनी में वो नज़र भी आ जाता लेकिन उससे पहले ही हमलावर ने बेरहमी से उसे झाड़ियों के अंदर खींच लिया।
कँटीली झाड़ियों में उलझ कर जूली के बालों का बड़ा गुच्छा स्कैल्प से उखड़ गया। काई और मिट्टी पर बेरहमी से घसीटे जाने से खून की लकीर बन रही थी।
“जाने दोss…आई के पास जाना है…”
जूली के गले से फँसे हुए वो आख़री अल्फ़ाज़ निकले। उसके बाद उसके चारों ओर अंधेरा छा गया।
हमेशा के लिए।
वर्तमान समय.
मोल्लेम गाँव, गोवा
गिरीश बाबू अपने सामने बैठे शख़्स को अपलक घूर रहे थे। वो यूँ लगता था जैसे कोई राजा सन्यासी का वेश धर के बैठा हो। उसके बैठने के अन्दाज़, चेहरे के हाव-भाव, बॉडी-लैंग्वेज से शान झलकती थी…अकड़ नहीं। गिरीश बाबू ने ध्यान दिया उस शख़्स की पलकें नहीं झपकती थीं।
अपने साठ साल के जीवन में गिरीश बाबू की नज़रों के सामने ऐसे लोग इक्का-दुक्का ही आए थे जिनकी आँखों में गिरीश बाबू का रौब, उनका आदर या फिर भय ना हो। इस शख़्स की आँखें ऐन ऐसी ही थीं। वो ना गिरीश बाबू के रुतबे-रुआब से चकाचौंध थी और ना ही उनके राजनीतिक रसूख़ के भय से झुकी हुई।
“हमने तुम्हारी केस-फ़ाइल गौर से पढ़ी है कालांत्री। तुम पर लगे आरोप अगर सच हैं तो तुम्हारे जैसे इंसान को या तो जेल में होना चाहिए या फिर मेंटल असायलम में,”
निमित्त के भाव विहीन चेहरे में कोई परिवर्तन नहीं आया, उसकी आँखें अब भी जैसे गिरीश बाबू की आत्मा में झांक रही थीं और उन्हें बेहद असहज कर रही थीं।
“पहली बात, मुझे ऐसे लोग नहीं पसंद जो दूसरों को उनके उपनाम से पुकारते हैं। रूढ़िवादी, असभ्य और दक़ियानूसी होने की पहचान है ये। दूसरी और अहम बात, आपने यहाँ मुझे मेरे मुक़दमे पर सुनवाई के लिए नहीं बुलाया है। मैं यहाँ आपकी बेटी इरा के लिए आया हूँ, आपके लिए नहीं,”
निमित्त सर्द भाव से बोला। उसकी नज़रें अब भी अपलक गिरीश बाबू को घूर रही थीं।
गिरीश बाबू का चेहरा क्रोध से तमतमा कर लाल और विकृत हो गया। कमरे में उन दोनों के अलावा मौजूद चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम और डॉक्टर थापा अपनी साँस रोके बैठे थे जैसे किसी भी पल तीसरा विश्व युद्ध शुरू होने का अंदेशा हो।
“इरा की सुरक्षा के लिए ही तुमसे ये सवाल करना ज़रूरी है कालांत्री,” वस्तुतः गिरीश बाबू ने निमित्त की ‘पहली बात’ को बिना कोई तवज्जो दिए, अपने पूर्ववत अन्दाज़ में कहा।
“मैं ऐसे आदमी को अपनी इरा के आस-पास भी फटकने नहीं दूँगा जो उसके लिए ग़लत इरादा रखता हो। तुम इरा को ट्रीट करो उससे पहले मुझे सबूत चाहिए कि तुम ढोंगी-पाखंडी नहीं जैसा दुनिया कहती है। मुझे जानना है कि तुम में वाक़ई साइकिक पावर्स हैं भी या नहीं,”
“और मान लीजिए कि मैं ऐन वैसा ही ढोंगी और पाखंडी हूँ जैसा दुनिया कहती है, तो?” निमित्त के होंठों पर एक सर्द मुस्कान उभरी।
“तो दुनिया की नज़रों से तो निमित्त कालांत्री ग़ायब ही है, मैं तुम्हें हमेशा के लिए ग़ायब करवा दूँगा,” गिरीश बाबू की आवाज़ भी निमित्त की मुस्कान जितनी सर्द हुई।
“अपने रुतबे के झूठे ग़ुरूर में चूर नेता की आड़ में एक भयभीत और लाचार पिता का अंतर्नाद है ये,” निमित्त पर गिरीश बाबू की धमकी का कोई प्रभाव ना पड़ा।
“निहायत ही बदतमीज़ और बेहूदा इंसान हो,” गिरीश बाबू दांत भींचते हुए बोले।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त के चेहरे पर इस बार बच्चों सी निश्चल और बेपरवाह मुस्कान थी।
गिरीश बाबू ने डॉक्टर थापा और कदम की तरफ़ देखा, जैसे तय नहीं कर पा रहे हों कि निमित्त के विषय में उन्हें क्या निर्णय लेना चाहिए। थापा और कदम भी कभी एक-दूसरे का तो कभी गिरीश बाबू का मुँह ताक रहे थे।
निमित्त का हाथ अपने बेल्ट में लगे होल्स्टर पर गया, कदम एकाएक चौकन्ना हुआ।
“तलाशी तो पहले ही ले चुके हो, अब सतर्क होने में ‘अल्फ़ा’ को क्यों कॉम्प्लेक्स दे रहे हो?” निमित्त होल्स्टर से टैरो कार्ड डेक निकालते हुए इत्मिनान से बोला। कदम जो कि निमित्त के पीछे था, इस बात पर भौंचक्का था कि बिना पीछे पलटे निमित्त को कदम के मूवमेंट्स और एक्स्प्रेशन का पता कैसे लगा। निमित्त की कुर्सी के बग़ल में बैठे अल्फ़ा की दुम अपना नाम सुन कर ख़ुशी से यूँ हल्के-हल्के हिली जैसे फ़र्श पर झाड़ू लगा रही हो।
निमित्त टैरो कार्ड्ज़ शफ़ल कर रहा था। उसके दोनों हाथों के बीच सभी 78 पत्ते यूँ नाच रहे थे जैसे हर एक पत्ता जीवित हो। उसके हाथों में थिरकते पत्तों का नृत्य देख कर मँझे से मंझा पत्तेबाज़ भी दांतों तले उँगलियाँ दबा लेता।
निमित्त का दाहिना हाथ तेज़ आवाज़ के साथ टेबल पर आया और आर्क बनाते हुए घूमा। गिरीश बाबू के सामने टेबल पर अर्ध-चंद्राकार में 78 पत्ते ‘फ़ेस-डाउन’ पोज़िशन में बिछ गए।
निमित्त अपनी दोनों कुहनियाँ कुर्सी के हत्थों पर टिकाए हुए बैठा था, उसकी उँगलियों के टिप एक दूसरे से लगे हुए, उसके चहरे के सामने ‘हाकिनी मुद्रा’ बना रहे थे।
“इनमें से कोई भी एक कार्ड चुनिए। सिर्फ़ एक। कार्ड्ज़ फ़ेस-डाउन पोज़िशन में रखे हैं। अपना कार्ड इस तरह चुनिएगा कि मुझे इल्म ना हो कि आपने कौन सा कार्ड चुना है,” निमित्त गिरीश बाबू से बोला।
गिरीश बाबू ने अपनी सिंहासन जैसी बड़ी एग्ज़ेक्यूटिव चेयर में बेचैनी से पहलू बदला। कुछ पल सोचने के बाद उन्होंने अपनी उँगलियों की ओट से छुपाते हुए एक कार्ड उठा लिया।
“आपका व्यक्तित्व एक शासक का है। ‘मोहब्बतें’ के अमिताभ बच्चन की तरह आपके लिए भी परम्परा, प्रतिष्ठा और अनुशासन सर्वोपरि हैं इसीलिए आपके आस-पास के लोग, अपने भी और पराए भी, आपको सूर्यवंशम की ‘ज़हर वाली खीर’ खिलाने की हसरत रखते हैं। आप रूढ़िवादी हैं, सख़्त हैं और लोगों को अपनी मर्ज़ी से चलाने के आदि हैं। आपने अपने लिए जो कार्ड चुना है वो इन सभी ‘गुणों’ को दर्शाता है। आपने अपने लिए ‘द एम्परर’ कार्ड चुना है,”
हाकिनी मुद्रा में बैठा निमित्त इस अन्दाज़ में बोला जैसे किसी टेप रिकॉर्डर पर प्री-रिकॉर्डेड टेप बज रहा हो।
गिरीश बाबू ने अपने हाथ में थामे कार्ड पर निगाह डाली, उनका मुँह खुला रह गया। उन्होंने कार्ड निमित्त, कदम और डॉक्टर थापा की तरफ़ सीधा किया। कार्ड ‘द एम्परर’ ही था।
निमित्त ने अपनी कुहनियाँ कुर्सी से उठा कर सामने टेबल पर टिका दीं, उसके हाथ अब भी हाकिनी मुद्रा बनाए हुए थे।
“आपकी अंतरात्मा पर बोझ है,”
“हर किसी के होता है,” गिरीश बाबू असहज भाव से बोले।
“ना। ये वैसा बोझ नहीं। ये बोझ है…किसी की जान लेने का…ना…एक से अधिक जानें लेने का,” निमित्त जैसे सीधे गिरीश बाबू की आत्मा में झांकते हुए बोला।
गिरीश बाबू इस बार कुछ ना बोले। सिर्फ़ उन्होंने अपनी कुर्सी पर बेचैनी से पहलू बदला। कदम और डॉक्टर थापा एक-दूसरे का मुँह देख रहे थे।
“जो जानें आपने लीं वो निर्दोष नहीं थीं…गुनाहगार थीं…फिर भी, जान लेने का अधिकार आपका नहीं था। जब हम जीवन दे नहीं सकते तो उसे लेने का अधिकार भी हमारा नहीं। इसलिए, आप पर मानव हत्या के पाप का बोझ है,” निमित्त भावहीन स्वर में बोला। उसकी पलकें एक बार भी ना झपकीं, ना ही पत्थर जैसे सर्द चेहरे पर कोई भाव उमड़े।
“शायद उसी पाप की क़ीमत मेरी इरा चुका रही है,” गिरीश बाबू नज़रें झुकाते हुए बोले। उनकी झुकी नज़रें और कंधे गवाह थे कि हारे हुए पिता के सामने अंदर के शासक ने घुटने टेक दिए हैं।
“सिन्स ऑफ़ द फादर,” निमित्त शांत भाव से बोला।
“इंसान के कर्मों का फल सिर्फ़ वो नहीं भोगता, उसकी संतानें और उसकी संतानों की संतानें भी भोगती हैं। यदि कर्म अच्छे होंगे तो उनका फल कर्म करने वाले को मिले या ना मिले उसकी संतानों को अवश्य मिलेगा और यदि कर्म बुरे होंगे, या फिर मनुष्य कोई अक्षम्य अपराध करेगा तो उसका दंड वो तो अगले जन्म में प्रारब्ध कर्मों के रूप में लेकर जाएगा ही, साथ ही उसकी इस जन्म की पीढ़ियाँ भी उस अपराध का दंड भुगतेंगी,”
कमरे में घुप्प सन्नाटा छा गया। कोई कुछ ना बोला।
“अगर आप मेरी ‘साइकिक अबिलिटीज़’ का परीक्षण कर चुके हों तो मैं इरा को देख सकता हूँ?”
निमित्त खड़ा होते हुए बोला।
“आओ मेरे साथ,”
गिरीश बाबू कमरे से बाहर निकले, निमित्त, कदम और डॉक्टर थापा उनके पीछे थे। अल्फ़ा निमित्त के साथ-साथ चल रहा था।
वो एक लम्बे ओपन कॉरिडोर से गुजरे। निमित्त की नज़रें चारों ओर पैन हो रही थीं। ओपन कॉरिडोर के एक तरफ़ विशाल गार्डेन और मार्बल फ़ाउंटन था जो रेनेसाँ आर्टिस्ट और स्कल्प्टर माइकल ऐंजेलो से प्रभावित था और देख कर पता लगता था कि उस एक फ़ाउंटन की क़ीमत कई रईसों की हवेलियों से अधिक थी। कॉरिडोर के हर पिलर के पास ऑटमैटिक राइफ़ल लिए एक कमांडो तैनात था। हर पिलर के ऊपर सीसीटीवी कैमरा इंस्टॉल्ड था।
कॉरिडोर से होते हुए वो लोग लॉबी में पहुँचे जहां हैंगिंग गार्डेन बनाया गया था। वहाँ एक तरफ़ पुराने जमाने की घुमावदार सीढ़ियाँ थीं जिनसे होते हुए वो लोग पहली मंज़िल पर पहुँचे। नीचे की तर्ज़ पर ही ऊपर भी कॉरिडोर था, फ़र्क़ इतना था कि यहाँ कॉरिडोर के दोनों तरफ़ कमरे थे।
निमित्त ने अंदाज़ा लगाया कि ग्राउंड फ़्लोर का इस्तेमाल ऑफ़िस वर्क के लिए व पॉलिटिकल पार्टी के कार्यकर्ताओं के आने-जाने के लिए किया जाता है जब कि ऊपरी मंज़िल प्राइवेट एरिया है जहां सिर्फ़ फ़ैमिली, कुछ ख़ास नौकर-चाकर व कदम और डॉक्टर थापा जैसे करीबी लोगों को ही आने की अनुमति है।
नीचे की तर्ज़ पर यहाँ भी कॉरिडोर में कैमरा लगे हुए थे हालाँकि यहाँ पहरा देते कमांडोज़ की संख्या नीचे के मुक़ाबले कम थी, फिर भी, किसी अजनबी का घुसपैठ करना सरासर नामुमकिन था। इरा के कमरे के बाहर दो कमांडोज़ तैनात थे।
गिरीश बाबू के साथ क़ाफ़िला रूम में दाखिल हुआ। निमित्त दरवाज़े पर ही ठिठक के रुक गया। उसके साथ अल्फ़ा भी।
निमित्त ने अपनी आँखें बंद की और चेहरा ऊपर को उठाया। जैसे कुछ सूंघने की कोशिश कर रहा हो। उसके हाथ हवा में कुछ टटोलने लगे। गिरीश बाबू, डॉक्टर थापा और कदम सवालिया नज़रों से निमित्त के कार्यकलाप देख रहे थे।
“ये कर क्या रहा है?” डॉक्टर थापा ने फुसफुसा कर कदम से पूछा।
“ढोंग। ये जो कर रहा है उसे ढोंग कहते हैं,” कदम ने फुसफुसा कर जवाब दिया। उसका स्वर और चेहरा दोनों ही उस घड़ी भावहीन थे।
कुछ पल बाद निमित्त ने आँखें खोलीं और अंदर दाखिल हो गया। अंदर एक बड़े गोल बेड पर बेहोश इरा लेटी हुई थी। उसे ड्रिप चढ़ रही थी, साथ ही वहाँ डॉक्टर थापा ने इलेक्ट्रोकार्डीओग्रैम और पल्स ऑक्सीमीटर इंस्टॉल किए हुए थे जो इरा के जिस्म से जुड़े थे और लगातार एक निश्चित अंतराल पर ‘बीप’ की ध्वनि निकाल रहे थे जिसके साथ मॉनिटर पर नज़र आती रेखाएँ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
सुभद्रा पहले से ही वहाँ मौजूद थी जो इरा के सिरहाने एक चेयर पर बैठी थी। उसके अलावा वहाँ नर्स यूनिफ़ॉर्म में एक बूढ़ी गोवानी महीना थी जिसकी उम्र सत्तर से कम बिल्कुल ना होगी, क़द साढ़े चार फ़ीट से बामुश्किल कुछ ऊपर होगा, शरीर पर यूँ लग रहा था जैसे मांस है ही नहीं, सिर्फ़ ढाँचे पर ढीली, झुर्रीदार खाल मढ़ दी गई हो। उसके काले पड़े होंठ लकीर जैसे पतले और यूँ एक-दूसरे से मिले हुए थे जैसे किसी ने पर्स की ज़िप लगा दी हो। उसकी आँखें पीली और पुतलियाँ धुंधली हो चली थीं लेकिन फिर भी उन आँखों में एक अलग ही चमक थी।
“इन सभी उपकरणों को बंद कर दीजिए और सब लोग यहाँ से बाहर निकल जाइए,” निमित्त जैसे सब को आदेश देते हुए बोला।
“दैट्स रिडिक्युलस! ये मशीन्स इरा के वाइटल स्टैट्स मॉनिटर कर रही हैं, ये बिल्कुल बंद नहीं होंगी,” डॉक्टर थापा तल्ख़ भाव से बोले।
“इरा इज़ नॉट इन कोमा। शी डज़ंट नीड इलेक्ट्रोकार्डीओग्रैम एंड पल्स ऑक्सीमीटर अटैच्ड टू हर। देयर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्ज़ आर डिस्रप्टिंग हर नैचरल एनर्जी फ़्लो,” निमित्त ने शांत भाव से जवाब दिया।
“इरा इज़ नॉट इन कोमा? फिर क्या है ये? डॉक्टर थापा की आवाज़ में तल्ख़ी बढ़ी।
“उस इन्सिडेंट ने इरा के चेतन मस्तिष्क को बुरी तरह हिला दिया है। उसका नन्हा सा दिमाग़ इतने उच्च स्तरीय फ़ियर, स्ट्रेस और ट्रॉमा को प्रॉसेस नहीं कर पाया। इस असहनीय मानसिक दबाव से इरा अपना मानसिक संतुलन ना को दे इसलिए उसके नर्वस सिस्टम ने उसके चेतन मस्तिष्क को एक डीप स्लीप…एक हायबर्नेशन में डॉल दिया है,” निमित्त इत्मिनान से अपनी बात समझाते हुए बोला।
जब किसी की ओर से कोई सवाल या प्रतिवाद ना आया तो उसने आगे कहा।
“ये कुछ वैसा ही है जैसे किसी स्मार्ट होम की पावर सप्लाई ओवरलोड होने से ट्रिप कर जाए और घर का ऑपरेटिंग सिस्टम पावर बैक-अप यूनिट पर काम करे। फ़िलहाल इरा का नर्वस सिस्टम भी बैक-अप यानी उसके अवचेतन मस्तिष्क पर चल रहा है,”
“यह ठीक कैसे होगा?” गिरीश बाबू ने सीधा सवाल किया।
“इरा का नर्वस सिस्टम उसके कॉंश्यस माइंड को प्रोटेक्ट करने की कोशिश कर रहा है, इसलिए वो उसे होश में नहीं आने देगा…कम से कम तब तक नहीं जब तक उसे ये यक़ीन ना दिलाया जाए कि इरा होश में आने पर सुरक्षित रहेगी। उसके कॉंश्यस माइंड को ये यक़ीन दिलाने और इरा के नर्वस सिस्टम को मेन ग्रिड पर लाने के लिए मुझे इरा के सब-कॉंश्यस में जाना होगा, और इस काम के लिए मुझे एकांत चाहिए,”
गिरीश बाबू ने आँखों के इशारे से डॉक्टर थापा को उपकरण बंद करने का आदेश दिया। डॉक्टर थापा ने बिना प्रतिवाद या प्रतिक्रिया के उपकरणों की पावर सप्लाई बंद कर दी। निमित्त के कहे अनुसार सभी लोग रूम से बाहर निकले, सिर्फ़ बूढ़ी नर्स बुत के समान अपनी जगह खड़ी रही।
“क़सम से, ये गिरीश भाऊ को अपनी बेटी की टेक-केयर के वास्ते इससे जवान नर्स नहीं मिली थी? बुड्ढी को खुद आइ.सी.यू. में लिटा के ग्लूकोज़ चढ़ाने की ज़रूरत है,” स्कैली की आवाज़ निमित्त के दिमाग़ में गूंजी।
“आप भी बाहर चलिए प्लीज़,” स्कैली की बात नज़रंदाज़ करते हुए निमित्त नर्स से विनम्र भाव से बोला।
“हम बेबी को अकेला छोड़ के कहीं नहीं जाएगा,” नर्स की आवाज़ बेहद महीन थी और ये शायद उम्र का असर था कि आवाज़ बुरी तरह काँप रही थी लेकिन आवाज़ की कम्पन के बावजूद उसमें एक अनुशासनात्मक लहजा साफ़ झलक रहा था।
“इरा अकेली नहीं है, मैं हूँ यहाँ इसके साथ,” निमित्त शांत भाव से बोला।
“इसीलिए तो बिल्कुल नहीं जाएगा! एक गुंडा-मवाली टाइप दिखने वाला आदमी के साथ अन-कॉंश्यस बच्ची को हम बिल्कुल नहीं छोड़ेगा,” इस बार आवाज़ काँपी हुई और महीन के साथ-साथ तीखी भी थी जैसे अपने शरीर में बची जान का एक-एक कतरा लगा कर वो चीखी हो।
“आइला, बुड्ढी डाँटती है! काटती भी है क्या?” स्कैली बोला।
अल्फ़ा निमित्त की टांगों के बीच दुबक गया। खुद निमित्त भी एक पल को सकपका गया।
“आ जाओ आंटी डॉरिस, उसे करने दो जो वो करना चाहता है,” दरवाज़े के बाहर खड़े गिरीश बाबू नर्स को समझाते हुए बोले।
“नो! हम बेबी के पास से कहीं नहीं जाएगा। इसको जो करना है हमारी प्रेज़ेन्स में करे,” नर्स डॉरिस भी दृढ़ भाव से बोली।
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया और प्रतिवाद ना किया।
निमित्त ने रूम का दरवाज़ा अंदर से लॉक किया। अल्फ़ा चुपचाप एक कोने में जा बैठा।
निमित्त ने अपने होल्स्टर से एक चौकोर लकड़ी का छोटा सा बॉक्स निकाला जिसमें छोटी-छोटी शीशियाँ खाँचों में रखी हुई थीं। इनमें से एक में गंगाजल था जो उसने बेड के चारों तरफ़ छिड़का। फिर दो-तीन शीशियों से रोज़मेरी, सैंडलवुड, फ़्रैंकिंसेन्स और पिपरमिंट ऑइल छिड़के। बेड के चारों तरफ़ फ़्लोर पर उसने सी-सॉल्ट और सिन्नेमन पाउडर से एक षट्कोण बनाया, जिसके कर कोने पर एक सिल्वर कैंडल जलाई। इसके अलावा उसने सेज जला कर बेहोश इरा के पास बेडसाइड टेबल पर रख दिया।
नर्स डॉरिस बग़ैर कोई व्यवधान उत्पन्न किए निमित्त के कार्यकलाप देखती रही।
इरा के सिरहाने के पास रखी जिस चेयर पर सुभद्रा बैठी थी निमित्त उस पर बैठ गया। उसने अपने होल्स्टर से कुछ क्रिस्टल पेबल्स निकाले।
निमित्त का हाथ बेहोश इरा की तरफ़ बढ़ा।
“ऐ, क्या करता है?” नर्स डॉरिस चेतावनी भरे स्वर में बोली।
उसकी चेतावनी का निमित्त पर कोई प्रभाव ना पड़ा।
“ये ‘मूनस्टोन’ है। फ़ीमेल एनर्जी बैलेन्स करता है, इमोशनल हीलिंग के काम आता है। ये इंसान की कुंडलिनी में उसके स्वाधिष्ठान यानी सेक्रल चक्र पर असर करता है, उसके अवरुद्ध हटाता है,” निमित्त हाथ में थमा मूनस्टोन इरा की नाभि पर रखते हुए बोला।
“टाइगर्स आइ। ये बल और साहस देता है, भय से लड़ने की इच्छाशक्ति जागृत करता है। यह मणिपुर चक्र यानी सोलर प्लेक्सस के अवरोध खोलता है,” निमित्त ने टाइगर्स आइ क्रिस्टल इरा के पेट के ऊपरी हिस्से पर बीचोंबीच रखते हुए कहा।
“ये है ‘रोडोक्रोसाइट’। इनर चाइल्ड हीलिंग में सहायक होता है और इंसान के अनाहत यानी हार्ट चक्र पर असर करता है,” निमित्त ने रोडोक्रोसाइट पेबल इरा के सीने के बीचोंबीच रखा।
“और इसके थर्ड आइ चक्र यानी अजना/आज्ञा चक्र के लिए ‘ऐमथिस्ट’ जो स्पष्टता, अंतर्ज्ञान और दूरदर्शी अंतर्दृष्टि देता है,” निमित्त ने ऐमथिस्ट इरा की दोनों भौंहों के बीच रखा।
सतर्क हुई नर्स डॉरिस सामान्य होकर पूर्ववत खड़ी हो गई।
निमित्त ने अपने गले से रक्त चंदन की माला उतारी जिसके सिरे पर पीतल की पुरानी, कलात्मक नक़्क़ाशी वाली चाभी लटक रही थी। चाभी पर ढेरों चिन्ह अंकित थे।
“इससे क्या करेगा?” नर्स ने सशंकित भाव से पूछा।
“ऐथेरनथॉर्न-की। ये एक पुरातन केल्टिक कंजी है जो मेरे लिए ‘दूसरी दुनिया’ और दूसरों के सपनों व अंतर्मन में प्रवेश के द्वार खोलती है,”
निमित्त ने बेहोश इरा का बायाँ हाथ अपनी दाहिनी हथेली पर रखा और ऐथेरनथॉर्न-की उसकी हथेली पर रख दी। फिर अपने हाथ से इरा का हाथ पकड़ते हुए मुट्ठी बंद कर ली।
अगले ही पल कुर्सी पर बैठे निमित्त की गर्दन नीचे यूँ झूल गई जैसे कुर्सी पर बैठे-बैठे सो गया हो। नर्स डॉरिस अपनी जगह पर पूर्ववत खड़ी रही।
इरा के रूम के बाहर बेचैनी बढ़ रही थी। सुभद्रा बार-बार अपने स्टोल का सिरा उँगलियों में फँसा कर खींचती और हर दस सेकंड बाद स्मार्ट वॉच और बंद दरवाज़े पर नज़र डालती। गिरीश बाबू के लिए कॉरिडोर में एक चेयर लगा दी गई थी। वो इरा के रूम के ठीक सामने बैठे एकटक दरवाज़े को घूर रहे थे। मल्हार भी अपनी वाइफ़ रॉशेल के साथ वहाँ आ गया था। सिक्योरिटी कमांडोज़ और घर के सर्वेंट्स को उस समय वहाँ आने की अनुमति नहीं थी हालाँकि दो कमांडो सीढ़ियों के पास तैनात थे।
परिवार वालों से कुछ दूरी पर एक पिलर की ओट में डॉक्टर थापा और चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम खड़े थे। उनकी नज़रें भी इरा के रूम के बंद दरवाज़े पर टिकी हुई थीं.
“क्या लगता है कदम, क्या ये निमित्त कालांत्री इरा को ठीक कर पाएगा?” अपनी नज़रें बग़ैर दरवाज़े से हटाए डॉक्टर थापा ने सवाल किया।
चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम ने डॉक्टर थापा को एक जजमेंटल लुक दिया।
“कम ऑन डॉक्टर थापा, आप भी? यू आर ए मैन ऑफ़ साइंस! आइ थॉट यू वर बेटर देन दिस,”
“इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसने बिना देखे गिरीश बाबू के लिए बिल्कुल सही टैरो कार्ड पहचाना…और…और वो उसकी हत्या का बोझ होने वाली बात?”
डॉक्टर थापा पर कदम के जजमेंट का कोई प्रभाव ना पड़ा। उनकी नज़रें पूर्ववत दरवाज़े पर टिकी हुई थीं।
“ही इज़ ए कॉन-मैन। ऐसे चीप कार्ड-ट्रिक्स सड़क पर और सर्कस में तमाशे दिखाने वाले जादूगर आम करते हैं। रहा सवाल उसके हत्या वाली बात का तो वो सरासर तुक्का था जो क़िस्मत से सही लग गया,”
“तुक्का था? क्या सच में?”
“बिल्कुल! खुद सोचिए, गिरीश रायकर पॉलिटिकल लॉबी में काफ़ी बड़ा और पावरफ़ुल नाम है। और कौन सा बड़ा पॉलिटीशियन ऐसा है जिसके साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मानव हत्या का केस ना जुड़ा हो?”
कदम के तर्क से डॉक्टर थापा पूर्णतः सहमत तो नहीं थे फिर भी उन्होंने अनमने ढंग से सहमति में सिर हिला दिया।
“ही इज़ ए नट-केस। आधा पागल है ये आदमी। आपको यक़ीन नहीं होता ना? ठीक है…अगर ये आदमी इरा को ठीक कर के इस कमरे से बाहर ले आया तो मैं अपनी मूँछें मुंडवा दूँगा,” कदम तैश में आते हुए बोला।
डॉक्टर थापा की नज़रें कदम के तमतमाए चेहरे और उसकी तीखी, तराशी मूँछों पर गई, फिर दोनों वापस से सामने दरवाज़ा निहारने लगे।
निमित्त घुप्प अंधकार में था।
चारों ओर फैला नितांत घुप्प अंधकार।
उसके गले में बंधा वेगविसिर वाइकिंग कम्पस रेडियम की तरह चमक रहा था और उसके आगे बढ़ने के लिए मार्ग प्रकाशित कर रहा था।
समय का कोई अंदाज़ा नहीं।
निमित्त ने अपने दाहिने हाथ पर बंधी ज़ोडीऐक क्रोनो-कम्पस वॉच पर निगाह डाली। घड़ी की सुइयाँ रुकी हुई थीं जैसे घड़ी बंद पड़ गई हो।
“हम्म,”
निमित्त अपनी सोच में उलझ हुआ उस नितांत शून्य के अंधकार में आगे बढ़ता रहा, जैसे वो किसी एक बहुत लम्बी, अंधेरी सुरंग से गुजर रहा हो जिसका छोर नज़र नहीं आ रहा। जैसे वो सुरंग कभी ख़त्म ही नहीं होगी। ना उसके दूसरे छोर पर कभी प्रकाश नज़र आएगा।
उस लम्बी अंधेरी सुरंग में सिर्फ़ उसके बूट्स की सख़्त हील की आवाज़ गूंज रही थी। वेगविसिर पेंडेंट की रौशनी सिर्फ़ निमित्त को अगला कदम बढ़ाने भर की गुंजाइश दे रही थी।
“ठक-ठक-ठक”
उसके बूट्स की आवाज़ एको हो रही थी।
फिर कुछ बदला।
बूट्स अचानक सूखे पत्तों के झुरमुट पर पड़े। निमित्त के नीचे की ज़मीन अब सख़्त नहीं थी, नरम पड़ रही थी। गीली मिट्टी और उसपर बिछे सूखे पत्तों की चादर।
अंधेरा अब भी कम ना हुआ था पर इतना एहसास हो रहा था कि निमित्त उस सुरंग से बाहर निकल चुका है।
“आईsssss….”
अंधेरे में कहीं से किसी बच्ची के चीखने की तीखी आवाज़ गूंजी।
निमित्त चौंक कर पलटा। वो समझने की कोशिश कर रहा था कि आवाज़ किस ओर से आयी थी लेकिन सफल ना हो सका। ऐसा लग रहा था मानो चारों तरफ़ से वो आवाज़ एको हो रही है।
फिर सन्नाटा छा गया।
निमित्त ठिठक कर अपनी जगह रुक गया और ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश करने लगा।
“ह्मफ़-ह्मफ़-ह्मफ़”
हाँफने की आवाज़।
कोई बच्ची अपनी उखड़ी साँसों को सम्भालते हुए, खुद को बचाने के लिए भाग रही थी।
निमित्त बिल्कुल चौकन्ना था लेकिन उसने कोई आवाज़ ना की। वो पहले जान लेना चाहता था कि जो आवाज़ें वो सुन रहा है वो किसकी हैं…क्या हैं।
तेज़ भागते कदमों की आहट निमित्त के पीछे से आई, जब तक वो पलटा, एक तेज़ रफ़्तार साया उसकी बाँह से टकराते हुए दूसरी तरफ़ भागा। निमित्त के वेगविसिर अपने हाथ में थाम लिया। उसकी रौशनी में वो देखने की कोशिश कर रहा था कि वो किससे टकराया। क्या वो इरा थी?
अंधेरे में कुछ नज़र ना आया। कहीं कोई ना था। ऐसा लग रहा था जैसे हवा ठोस साये का रूप लेकर उससे टकरा कर गुजरी हो।
इससे पहले कि निमित्त कुछ समझता या संभल पाता उसके पीछे से फिर एक साया भागते हुए आया और निमित्त से टकराते हुए गुजरा। इस साये के हाथ में फ़्लैशलाइट थी। यह सब कुछ इतनी तेज़ी से घटित हुआ कि निमित्त के समझ पाने से पूर्व ही पूरा घटनाक्रम जैसे अंधेरे में घुल गया था।
कुछ बचा था तो सिर्फ़ घुप्प अंधकार और उसमें व्याप्त भय और मृत्यु की महक।
निमित्त ने हाथ में थमा वेगविसिर चारों दिशाओं में घुमाया। जिस ओर वेगविसिर का प्रकाश सबसे अधिक था निमित्त उस दिशा में आगे बढ़ा।
“व्रूमsss..”
दूर कहीं से आती गाड़ी के इंजन की आवाज़ सुनाई दी।
“बचाओ-बचाओsss”
एक बार फिर बच्ची की चीख गूंजी।
निमित्त उस ओर भागा। उसके पीछे दोबारा हवा में सरसराहट उभरी। इस बार पहले से कहीं तेज़ और तीखी। निमित्त फ़ौरन एक ओर हुआ, जहां उसका चेहरा था वहाँ से जैसे सनसनाते हुए हवा में एक पत्थर गुजरा।
“ठाक”
पत्थर किसी से टकराने की ज़ोरदार आवाज़ हुई और उसके बाद झाड़ियों पर किसी के गिरने की।
ऐसा लग रहा था जैसे निमित्त किसी पूर्व घटित घटनाचक्र के बीच था लेकिन उस घटनाक्रम का हिस्सा नहीं था।
फ़्लैशलाइट वाला साया एक बार फिर निमित्त के क़रीब से गुजरा। इस बार उस साये की आकृति की हल्की झलक मिली।
निमित्त उसके पीछे भागा।
अंधेरे में धुंधला सा दृश्य उभर रहा था। जैसे धूमिल पड़ चुकी फ़िल्म रील किसी पुराने प्रोजेक्टर पर चलाई जा रही हो।
कँटीली झाड़ियों पर मुँह के बल एक लड़की गिरी हुई थी। उम्र लगभग तेरह साल होगी लेकिन ये इरा नहीं थी। हमलावर साये ने हड़बड़ा कर अपनी फ़्लैशलाइट बुझाई। गाड़ी के इंजन की आवाज़ बहुत क़रीब आ गई थी। झाड़ियों के पार हेडलाइट की रौशनी में निमित्त ने उस हमलावर को लड़की की दोनों टांगे पकड़ कर बेरहमी से झाड़ियों पर से घसीटा। लड़की की फ़्रॉक और बाल झाड़ी में उलझ गए। साये का चेहरा निमित्त को नज़र नहीं आ रहा था।
सब कुछ बहुत धुंधला था।
साया बेरहमी से लड़की की दोनों टांगें पकड़ कर उसे किसी शिकार किए हुए जानवर के जैसे घसीट कर कार की रौशनी से दूर ले जाने लगा। काई पर घसीटे जाने से खून की लकीर बन रही थी।
निमित्त आगे बढ़ा, जैसे उस साये को रोकना चाहता हो, लेकिन पूरा दृश्य अंधकार में यूँ घुल गया जैसे धुएँ का बना हो जो निमित्त की हलचल से बिखर गया।
फिर सिसकियों की आवाज़ आई।
कोई सुबक कर रो रहा था। धीमी और घुटी आवाज़ में। निमित्त अंदाज़े से उस आवाज़ की दिशा में बढ़ा। उसके हाथ में थामे वेगविसिर की चमक बढ़ रही थी। यानी वो सही दिशा में अग्रसर था। अपने लक्ष्य के क़रीब था।
अंधेरे में एक आकृति उभरी। खुद में सिमटी और डर से थर-थर काँपती हुई। अपनी नन्ही बाहों में खुद को समेट के बचने का असफल प्रयास करती हुई। निमित्त ने वेगविसिर की रौशनी में उसका चेहरा देखा। वो इरा थी।
“न..नहीं…मुझे…छोड़…दो..”
निमित्त को पास आता देख वो और बुरी तरह काँप गई। लगातार जाने कब से रो रही थी वो। उसका गला रुंध गया था। रोते-रोते हिचकी बंध गई थी।
“श्श्श्श…प्यारी बच्ची,” निमित्त की आवाज़ उस घड़ी एक माँ जैसी कोमल थी जो अपने रोते हुए शिशु को चुप कराने की कोशिश कर रही हो।
निमित्त ने अपना दाहिना हाथ इरा की ओर बढ़ाया। सहमी हुई इरा ने हाथ ना थामा। वो बस निमित्त को देख रही थी। जैसे पढ़ने की कोशिश कर रही हो।
“मुझ पर भरोसा करो। मुझ पर भरोसा कर के आज तक किसी का बुरा नहीं हुआ,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
उसकी आँखों में एक सच्चाई थी, एक बच्चों सी मासूमियत, जो इरा को ऐन अपने जैसी लगी। अपनत्व का एहसास कराती हुई। इरा ने अपना काँपता हुआ हाथ निमित्त की तरफ़ बढ़ाया। निमित्त ने बहुत ही आहिस्ता से इरा का हाथ थामा, जैसे वो इंसान नहीं, रुई के फाहे से बनी गुड़िया हो।
उस स्पर्श में कुछ था। इरा को एहसास हुआ जैसे अब कोई भी बुराई उसका कुछ बुरा नहीं कर सकती। वो भागते हुए निमित्त से लिपट गई और फूट-फूट कर रोने लगी।
“श्श्श्श…बस प्यारी बच्ची। अब सब ठीक है,” निमित्त ने आहिस्ता से इरा के सिर पर हाथ फेरा।
“वो..वो…मुझे…न…नहीं…छोड़ेगा…” निमित्त से लिपटी इरा सिसकते हुए बोली।
निमित्त अपना चेहरा इरा के बाएँ कान के पास लाया।
“ओम् नमो हनुमते, रुद्रवताराय, सर्वशत्रु संहारणाय, सर्वरोग हराय, सर्ववशीकरणाय, राम दूताय स्वाहा,”
मंत्रोच्चारण के साथ-साथ निमित्त की दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा इरा की भौंहों के बीच, उसके अजना/आज्ञा चक्र यानी थर्ड आइ पर एक अदृश्य ‘ॐ’ बना रही थीं। निमित्त फिर इरा के कान में फुसफुसाया।
“ये रुद्र हनुमान मंत्र है। हनुमान जी रक्षक हैं और बुरी शक्तियों के संहारक भी। उनके रहते कोई भी भूत-पिशाच, बुरी शक्ति उनके भक्त का बुरा नहीं कर सकती। हनुमान जी हर मतिभ्रम, मायाजाल, प्रेत बाधा को काट देते हैं और इंसान के अजना चक्र यानी उसकी थर्ड आइ को ऐक्टिवेट करते हैं। अब मैं दोबारा ये मंत्र पढ़ कर तुम्हारी थर्ड आइ को तीन बार टैप करूँगा। तीसरे टैप पर तुम नींद से जागोगी। तुम्हारे साथ अब तक जो कुछ भी हुआ तुम हर वो बुरी घटना भूल जाओगी, तुम्हें सिर्फ़ ये मंत्र याद रहेगा। ठीक है?”
इरा का सिर सहमति में हिला।
“ओम् नमो हनुमते, रुद्रवताराय, सर्वशत्रु संहारणाय, सर्वरोग हराय, सर्ववशीकरणाय, राम दूताय स्वाहा,”
निमित्त ने अपनी तर्जनी और मध्यमा से इरा की थर्ड आइ को टैप किया।
एक.
दो..
तीन…
निमित्त और इरा ने एक साथ आँखें खोलीं। इरा अपने बेड पर लेटी थी, निमित्त उसके बग़ल में चेयर पर था, इरा के हाथ में ‘ऐथेरनथॉर्न-की’ थी और उसका हाथ निमित्त के हाथ में था। अल्फ़ा किसी समय उठ कर निमित्त के पैरों में आ बैठा था और फ़िलहाल उन दोनों को जागता देख कर ख़ुशी से दुम हिला रहा था। निमित्त की नज़रें नर्स डॉरिस पर गयीं। ऐसा लग रहा था जैसे वो कुछ बुदबुदा रही थी लेकिन निमित्त और इरा को होश में आता देख कर उसके पतले होंठ फ़ौरन ही पर्स की ज़िप की तरह बंद हो गए।
इरा निमित्त और अल्फ़ा को देख कर हल्के से मुस्कुराई।
“आप कौन हो?”
“हेय किड्डो, आई एम योर फ़्रेंड। यू कैन कॉल मी ‘एन.के.’ एंड दिस इज़ अल्फ़ा,” निमित्त सहज भाव से मुस्कुराते हुए बोला।
इरा ने हौले से अल्फ़ा के सिर पर हाथ फिराया। अल्फ़ा ने प्यार से इरा की हथेली पर अपना सिर टिका दिया।
“क्या आपको हनुमान ज़ी का मंत्र याद है बच्चे?” निमित्त ने प्यार से सवाल किया।
“ओम् नमो हनुमते, रुद्रवताराय, सर्वशत्रु संहारणाय, सर्वरोग हराय, सर्ववशीकरणाय, राम दूताय स्वाहा,”
इरा के मुँह से जैसे स्वतः ही मंत्र निकला। वो खुद भी हैरान थी कि उसने ये मंत्र कब और कहाँ सुना और उसे ये मंत्र याद कैसे हुआ।
निमित्त मुस्कुराया। उसने अपने होल्स्टर के ज़िपर से एक लगभग दो इंच की, ठोस चाँदी से बनी हनुमान ज़ी की मूर्ति निकाली और इरा की हथेली पर आहिस्ता से रख दी।
“ये हमेशा अपने साथ रखना। हनुमान जी रक्षा करेंगे,”
इरा ने मूर्ति मुट्ठी में बंद कर ली।
“अब चलिए, आपके डैडी और बाक़ी लोग आपका वेट कर रहे हैं,”
निमित्त उठते हुए बोला।
बाहर अब बेचैनी हद से अधिक बढ़ रही थी। दरवाज़े को ताकती गिरीश बाबू और सुभद्रा की आँखें जैसे पलकें झपकाना भूल गई।
दरवाज़ा खुला।
“डैडीsss…सुभी माँsss”
इरा चहकते हुए बाहर निकली। निमित्त और अल्फ़ा उसके पीछे थे।
“इराsss…मेरी बच्ची,” गिरीश बाबू की आवाज़ में पिछले चार दिनों में पहली बार ख़ुशी झलकी।
इरा भाग कर पहले गिरीश बाबू और फिर सुभद्रा के गले लग गई। मल्हार वहाँ ना टिका। उसने सुलगती आँखों से पहले गिरीश बाबू के गले लगती इरा को, और फिर निमित्त को घूरा और दनदनाते हुए वहाँ से निकल गया। रॉशेल सहज भाव से सुभद्रा के पास आ खड़ी हुई और इरा से बातें करने लगी।
डॉक्टर थापा और चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम जहां थे वहीं बुत बन कर खड़े थे। डॉक्टर थापा कभी इरा को तो कभी कदम के चहरे और मूँछों को देखते। कदम के चहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसका दिल फट के रोने का कर रहा हो लेकिन ये भाव झलक ना जाए इसलिए जबरन चेहरे को सख़्त बनाने की कोशिश कर रहा हो, जिससे चेहरा विकृत हो रहा था।
एक ओर खड़ा निमित्त इत्मिनान से जैसे वहाँ मौजूद हर शख़्स की छोटी से छोटी हरकत, भाव-भंगिमा और बॉडी लैंग्वेज स्कैन कर रहा था।
गिरीश बाबू निमित्त के पास आए।
अब उनकी नज़रों में निमित्त के लिए वो सशंकित और तल्ख़ भाव नहीं थे, बल्कि कृतज्ञता थी।
“हम समझ नहीं पा रहे निमित्त कि तुम्हारा धन्यवाद कैसे करें,” गिरीश बाबू कृतज्ञ भाव से बोले।
“अभी नहीं गिरीश बाबू। अभी ये ख़त्म नहीं हुआ है, अभी तो शुरुआत है,” निमित्त का चेहरा और आवाज़ गहरे और गम्भीर थे।
गिरीश बाबू का चेहरा उतर गया।
निमित्त की आँखों में वो पढ़ सकते थे कि हालात कितने चिंताजनक थे। गिरीश बाबू का दिल बैठने लगा।
इरा की नज़रें निमित्त और गिरीश बाबू की तरफ़ घूमीं।
निमित्त के फेशियल एक्स्प्रेशन फ़ौरन चेंज हुए। उसने मुस्कुराते हुए इरा की ओर ‘वेव’ किया।
“मुस्कुराइए गिरीश बाबू। इरा को लगना चाहिए कि सब कुछ नॉर्मल है। मैंने इस घटनाक्रम से जुड़ी इरा की स्मृतियों को अवरुद्ध कर दिया है। उसे याद नहीं कि उसके साथ क्या हुआ था। उसकी मेंटल सैनिटी बचाने के लिए ऐसा करना ज़रूरी था,” निमित्त इरा की तरफ़ हाथ हिलाते हुए बोला।
अब तक कदम और डॉक्टर थापा भी उनके पास आ गए थे। गिरीश बाबू और बाक़ियों ने निमित्त के कहे अनुसार ही मुस्कुराते हुए इरा की तरफ़ हाथ हिलाया।
“मैं कुछ समझा नहीं निमित्त, आख़िर ये हो क्या रहा है?” गिरीश बाबू चेहरे पर मुस्कान चिपकाए हुए थे लेकिन उनकी आवाज़ में चिंता साफ़ झलक रही थी।
“पूरी तरह तो मैं भी नहीं समझ पाया हूँ लेकिन इतना बता सकता हूँ कि ये जो कुछ भी है वो इरा के अंदर घर कर चुका है। फ़िलहाल यूँ समझ लीजिए कि मैंने उसे इरा के अन-कॉंश्यस की जेल में क़ैद कर दिया है। इसीलिए बहुत ज़रूरी है कि इरा के आस-पास का माहौल हाइली पॉज़िटिव एंड वाइब्रेंट रहे। उसके लिए किसी भी तरह का शॉक, फ़ियर, ऐंग्ज़ाइयटी या ट्रॉमा एक ट्रिगर का काम करेगा जो उस चीज़ को रिलीज़ कर देगा जो उसके अंतर्मन में क़ैद है,” निमित्त ने गिरीश बाबू को समझाते हुए कहा।
उसकी बात सुन कर डॉक्टर थापा और कदम एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
“अब आगे क्या करना है?” गिरीश बाबू ने चिंतित भाव से सवाल किया।
“सबसे पहले मुझे वो बॉक्स देखना है जिससे ये सारा क़िस्सा शुरू हुआ,”
“ठीक है। हमारे साथ हमारे रूम में आओ,” गिरीश बाबू ने कहा और अपने रूम की ओर बढ़े।
इरा, सुभद्रा और रॉशेल उस घड़ी अल्फ़ा के साथ खेलने में व्यस्त थीं।
निमित्त गिरीश बाबू के पीछे जाते हुए ठिठका और वहाँ खड़े डॉक्टर थापा और कदम से मुख़ातिब हुआ।
“आप दोनों ऐसे मातमी सूरत बनाए क्यों खड़े हैं? मुस्कुराइए। ऊपर वाले ने शकल कितनी भी बुरी दी हो, मुस्कुराने पर बेहतर ही दिखती है,”
“कहना क्या चाहते हो? हम दोनों बदसूरत हैं?” कदम उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरते हुए बोला।
“तौबा! तौबा!! तौबा!!! मजाल है मेरी? मैंने ऐसा कब कहा? ये तो आप खुद कह रहे हैं। मैं तो सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि बच्ची के आस-पास माहौल ख़ुशनुमा रखना है। अब अपनी शक्लों का तो आप कुछ कर नहीं सकते, ऐसा करते हैं दोनों के नाम का कुछ करते हैं,”
“नाम का करते हैं? क्या करते हैं?” कदम ने सशंकित भाव से सवाल किया।
निमित्त अपनी दाढ़ी में उँगलियाँ फिराते हुए उन दोनों को देखने लगा। उस घड़ी उसकी नज़रों में शरारत साफ़ झलक रही थी।
“बचपन में आपको आपकी मम्मी किस नाम से बुलाती थीं?” निमित्त ने अचानक से डॉक्टर थापा पर सवाल दाग दिया।
हमला अचानक से हुआ था। सवाल इतना अप्रत्याशित था कि जवाब बिना सोचे, स्वतः ही उनके मुँह से निकल गया।
“शंटू,”
कदम ने खा जाने वाली नज़रों से डॉक्टर थापा को घूरा, जैसे निमित्त के सवाल का जवाब देकर उन्होंने घोर पाप किया हो। डॉक्टर थापा ने सकपका कर यूँ नज़रें चुरा लीं जैसे कोई बच्चा स्कूल में टीचर से गलती पकड़े जाने पर चुराता है।
“आए-हाए क्या बात है! शंटू जी! आप लगते भी शंटू हो,” निमित्त चहकते हुए बोला।
“और आपको क्या बुलाते थे बचपन में?” निमित्त ने अब कदम से सवाल किया।
कदम ने कोई जवाब ना दिया। सिर्फ़ निमित्त को यूँ घूरता रहा जैसे आँखों से ही ए.के. 47 चला कर उसे छलनी करने का इरादा रखता हो।
“चलो कोई बात नहीं। नहीं बताना है मत बताओ, आख़िर प्राइवेसी नाम की भी कोई चीज़ होती है। ऐसा करते हैं, डॉक्टर थापा का नाम शंटू है तो आपको….बंटू बुला लेते हैं। ठीक है ना?” निमित्त सहज भाव से बोला।
कदम का चेहरा ग़ुस्से से अंगारे के समान लाल हो गया। उसकी परवाह किए बिना निमित्त ने इरा को आवाज़ लगाई।
“इरा, अंकल शंटू एंड अंकल बंटू भी आप लोगों के साथ खेलना चाहते हैं,”
इरा खिलखिला कर हंसी।
निमित्त ने उन दोनों को देख कर आँख मारी और एक फ़्लाइइंग किस देते हुए वहाँ से निकल गया। डॉक्टर थापा और कदम अपनी जगह पर बुत बने खड़े रहे।
“मैं अपनी पहले कहीं बात वापस लेता हूँ डॉक्टर थापा। ये आदमी आधा पागल नहीं है,” कदम ग़ुस्से से काँपते हुए, फुसफुसा कर बोला।
डॉक्टर थापा की प्रश्नवाचक नज़रें उसकी तरफ़ घूमीं।
“ये आदमी पूरा पागल है…और साथ ही निहायत ही बेहूदा और वाहियात भी,”
कदम ने अपना वाक्य पूरा किया। डॉक्टर थापा का सिर मशीनी अन्दाज़ में सहमति में हिला।
ठीक उसी समय निमित्त ने पीछे से आकर आहिस्ता से दोनों के कंधों पर हाथ रखा और कदम जितने ही धीमे स्वर में फुसफुसा कर बोला,
“कभी घमंड नहीं किया,”
उन दोनों को उसी अवस्था में छोड़ कर निमित्त गिरीश बाबू के रूम में पहुँचा।
गिरीश बाबू ने वह लकड़ी का बक्सा निकाल कर निमित्त के हवाले कर दिया। निमित्त इत्मिनान से एक सोफ़ा चेयर पर जा बैठा और उस बॉक्स का बारीकी से मुआयना करने लगा।
“हम्म,” बॉक्स पर की गई नक़्क़ाशी पर उँगलियाँ फिराते हुए निमित्त की हुंकार निकली। इस घड़ी वो जितना संजीदा और गम्भीर नज़र आ रहा था उसे देख कर कोई कह नहीं सकता था कि वो कुछ ही क्षण पूर्व बाहर डॉक्टर थापा और कदम को अपनी हरकतों से कलपा कर हटा है।
बाहरी तौर पर बॉक्स का अवलोकन कर लेने के बाद निमित्त ने आहिस्ता से उसकी लिड खोली। अंदर से आती तीखी दुर्गंध उसके नथुनों से टकराई। अंदर यूज़्ड सैनिटेरी पैड से बनाई हुई वूडू डॉल थी जिसमें सात सुइयाँ धंसी हुई थीं।
“वर्जिन्स ब्लड! सबसे ख़तरनाक और अचूक हेक्सेस में से एक," निमित्त के मुँह से स्वतः ही निकला।
कहानी जारी है
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