ॐ नमः हरिहराय

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सिन्स ऑफ द फादर्स

THE SHAMAN KING

 

चंद शब्द 


सर्वप्रथम आप सभी को सिर नवा कर धन्यवाद और मुझे बधाई कि आप लोगों ने कहानी के साथ-साथ शुरुआती राइट-अप इतना पसंद किया कि आख़िरकार “दो शब्द” बोल के दो सौ शब्द लिखना सार्थक हुआ और इसे अब “चंद शब्द” कर दिया है…आगे ये और बढ़ेगा(अब झेलिए)। 


इस एपिसोड को लिखने में मेरी अपेक्षा से थोड़ा अधिक विलम्ब हुआ (इतने में कई पाठकों की साँसें अटकी होंगी कि कहीं आधी कहानी पढ़वा के फिर तो नहीं भाग गया कमबख्त) फिर भी मुझे लगता है इस एपिसोड को पढ़ कर आप महसूस करेंगे कि इसमें इतना समय लगना लाज़मी था। चैटरूम के अतिरिक्त पोस्ट्स द्वारा सक्रीय रहने की कोशिश है, आप में से जितने भी लोग जुड़ते हैं उन सबको धन्यवाद। मुझे आशा (पारिख नहीं) है पर्सनल लेवल पर कनेक्ट कर के आप को भी उतनी ही सुखद अनुभूति हुई होगी जितनी मुझे हुई है। सोशल मीडिया पर भी आप में से जितने लोग जुड़े हैं आप सभी मेरे लिए अत्यंत मूल्यवान हैं। वैसे, मूल्यवान पर आप सभी को एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ जो मैं बचपन में कई बार ज़िद कर-कर के माँ और नाना से सुनता था। 


मैसूर के पास एक छोटे से गाँव में एक वृद्धा रहती थी (नाम मैं भूल गया, आप अपनी सुविधानुसार कुछ भी रख लें)। वृद्धा का पूरा जीवन, उसका बचपन, जवानी, सब कुछ उसी स्थान पर गुजरा था। बचपन में जब उसने होश सम्भाल तो अपने माता-पिता को खजूर से गुड़ बनाते देखा। वो दिन भर गुड़ पकाते और अगले दिन नगर हाट में जा कर गुड़ बेचते। उसने भी छोटी उम्र में ही गुड़ बनाने का हुनर सीख लिया। उसे गुड़ बेहद प्रीय था, खाने में जब तक गुड़ ना हो उसके गले से निवाला नीचे ना उतरे। इसी तरह वो बड़ी हुई और गाँव के ही एक लड़के से उसकी शादी हो गई। अब जो काम वो माता-पिता के यहाँ कर रही थी वो अपने पति के साथ मिल कर करने लगी। एक तरह से कह सकते हैं कि उसके अस्तित्व ने जीवन के खाँचे में उसके माता-पिता का स्थान ले लिया। दोनों पति-पत्नी खजूर से गुड़ बनाते और फिर नगर हाट में जा कर बेचते। समय गुजरा, उसके बच्चे हुए। यूँ गुड़ बना और बेच कर ही उसने और उसके पति ने बच्चों का लालन-पालन किया, यथासंभव अच्छी शिक्षा दी ताकि उनके बच्चे अपने जीवन को बेहतर बनाएँ, उन्हें आजीविका के लिए गुड़ ना बेचना पड़े। समय थोड़ा और गुजरा, उसके बेटे बड़े हो गए, उनकी शादी भी हो गई। इस दौरान वृद्धा का पति चल बसा। अब गुड़ बनाना उसके लिए सम्भव ना था लेकिन वृद्धा को अब भी प्रतिदिन भोजन में गुड़ चाहिए था। दोनों बहुओं के लिए वृद्धा का खाने में गुड़ खाना तीन टाइम बेकार का खर्च था हालाँकि दोनों के पति अच्छी आमदनी कर रहे थे लेकिन चढ़ी उम्र वालों को शायद इस बात का इल्म ही नहीं होता कि एक दिन उनकी भी उम्र ढलेगी। वृद्धा की खाने में गुड़ की ज़िद के साथ घर में उसपर ज़्यादती बढ़ी और रोज़-रोज़ की किट-किट से तंग आकर एक दिन उसके बेटों ने अपनी पत्नियों का कहा मानते हुए वृद्धा को घर से निकाल दिया। वृद्धा गाँव के बाहर एक पेड के नीचे डेरा डाल कर रहने लगी और दो वक़्त की रोटी के लिए आते-जाते राहगीरों से मिलने वाली भीख पर आश्रित हो गई। अब वृद्धा प्रतिदिन भीख में मिली पाई-पाई जोड़ती फिर पंसारी की दुकान से थोड़ा सा गुड़ ख़रीद कर खाती। जीवन के अंतिम दिन इसी प्रकार कभी गुड़ के फेरे तो कभी गुड़ की आस में कट रहे थे कि एक दिन वृद्धा ने रास्ते से बड़ा भारी क़ाफ़िला गुजरते देखा। हाथी-घोड़ों और सैनिकों का बड़ा लाव-लश्कर। देखते ही देखते राहगीरों और तमाशबीनों का हुजूम उस जुलूस को देखने के लिए जुट पड़ा। वृद्धा को भी कौतूहल हुआ। वो अपनी लकड़ी टेकते हुए भीड़ में शामिल हुई और क़ाफ़िले को देखने लगी। इतना बड़ा और सजा-धजा क़ाफ़िला उसने अपने पूरे जीवन में नहीं देखा था। 


वृद्धा ने पास खड़े राहगीरों से सवाल किया, “सुनो भैया, ये क्या हो रहा है?” 

किसी ने बताया कि मैसूर नरेश का क़ाफ़िला गुज़र रहा है। वृद्धा को भी इच्छा जागी राजा को देखने की। उसने देखा सबसे ऊँचे हाथी की पीठ पर नक्काशीदार पालकी में राजा अपनी रानियों के साथ सवार था। खूबसूरत वस्त्रों और आभूषणों, रत्नों, माणिक और मोतियों से लदे राजा का रौब देख कर वृद्धा चकाचौंध थी। 


उसने राहगीर से पूछा, “सुनो भैया, ये राजा बहुत पैसे वाला है क्या?” 


राहगीर हंसते हुए बोला, “अरे आस-पास के पचास राज्यों तक हमारे राजा जैसी शान-ओ-शौक़त किसी दूसरे की नहीं,”।


वृद्धा मंत्रमुग्ध सी राजा को देखते हुए बोली, “अच्छा! इतना बड़ा आदमी है? फिर तो गुड़ बहुत खाता होगा ना?”


राहगीर हंसने लगा, फिर बोला, “अरे वो राजा है। मैसूर पाक, राज भोग, बादाम का हलवा, पंचमेवे की खीर और रबड़ी और ऐसे उत्कृष्ट मिष्ठान तो उनके हर वक्त के भोजन में होते हैं,”

वृद्धा ने कभी इन चीजों का नाम भी नहीं सुना था। उसे ना इन मिठाइयों के स्वाद मालूम थे और ना ही गुड़ के सम्मुख इनका रुतबा व ओहदा। उसके लिए तो गुड़ ही सर्वोपरि था। उसने फिर सवाल किया। 


“हाँ, ये सब तो ठीक है…लेकिन गुड़ भी तो खाता होगा ना? जब मर्ज़ी करे, जितना मन करे उतना गुड़ खाता होगा?”


राहगीर उसका उपहास करते हुए बोला, “अरे माई, इतना बड़ा राजा मज़दूरों और भिखारियों की तरह गुड़ थोड़े ही खाएगा,”


वृद्धा ने राजा की ओर तिरस्कार पूर्ण नेत्रों से देखा और बोली, “हुँह! गुड़ नहीं खाता? भला फिर काहे का राजा है!,” उसे अब जुलूस में कोई रूचि शेष ना थी। 

अब…सबसे पहले तो मेरी सहानुभूति उनके लिए जिन्हें लग रहा था कि कहानी के अंत में बुढ़िया बाग़बान के बच्चन के जैसे ज़बरदस्त कम-बैक करेगी…असल जीवन में ऐसा कुछ नहीं होता मित्र। इसके बाद आते हैं इस बात पर कि इस कथा को कहने के पीछे कथासारथी का उद्देश्य क्या है? (UPSC इग्ज़ैम में आएगा कुछ सालों बाद, अभी से याद कर लो)


हम सभी वास्तव में उस वृद्धा जैसे हैं जिसके लिए अपने तो अपने, दूसरों के सुख और सम्पन्नता का मापदंड ‘गुड़’ है। बस सबका गुड़ अलग होता है। किसी ने जीवन को सिर्फ़ पैसों के तराज़ू में तौला है तो उसका गुड़ पैसा है, वो दूसरों के सुख की तुलना भी इस आधार पर करता है कि फ़लाँ आदमी कितना पैसा कमा रहा। किसी के लिए गुड़ सामाजिक रुतबा है, किसी के लिए सिक्योर्ड लाइफ़, अच्छी लाइफ़स्टाइल, तो किसी के लिए पावर। सबके गुड़ अलग होते हैं और अपने इस पसंदीदा गुड़ के स्वादानुसार हम निर्धारित करते हैं कि अमुक व्यक्ति राजा है या रंक। बस ऐसा करते हुए हमें भी वृद्धा की तरह इस बात का आभास नहीं होता कि हमारा गुड़, जिसको हम सुख की पराकाष्ठा समझते है वो सामने वाले के लिए बिल्कुल तुच्छ और नगण्य भी हो सकता है। और जैसे ही हमें एहसास होता है कि हमारे अस्तित्व और हमारे बहुमूल्य जीवन का मूलभूत आधार, हमारा गुड़ सामने वाले के लिए ‘ढेले’ भर की क़ीमत भी नहीं रखता हम सामने वाले को राजा से रंक घोषित कर देते हैं। हमारा पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का एक ऐसा मिक्स्चर है, जो केवल हमारे लिए ही सत्य है। 


कहानी की बॉटमलाइन सिर्फ़ इतनी है कि अपनी कसौटी पर लोगों को कसना ग़लत है, आपको गुड़ पसंद है, शौक़ से खाइए (इतना भी ना खाइए कि डाइबेटीज़ हो जाए) लेकिन हो सकता है सामने वाला आपके पसंदीदा गुड़ का ना तलबगार हो और ना ही जरूरतमंद। 


आज के लिए इतना ही, सोशल मीडिया पर मुझे या निमित्त कालांत्री को फ़ॉलो कर सकते हैं (दिल करे तो, ना करे तो हमें क्या!) चैटरूम जॉइन कर सकते है, वहाँ दिन के एक-दो फेरे लगा लेता हूँ। अब एपिसोड पढ़िए, मैं चलता हूँ मुझे गुड़-चने खाने जाना है। 


आपका कथासारथी,

नितिन के. मिश्रा  

एपिसोड 03: द शामन किंग

 नितिन के. मिश्रा 



“आगे बढ़ने से पहले एक गम्भीर मुद्दे पर चर्चा…जो हमें ऐसे तो शुरुआत में ही कर लेनी चाहिए थी पर नहीं हुई, अब कर लेनी चाहिए,” 

गिरीश बाबू अपनी सिंहासन जैसी एग्ज़ेक्यूटिव चेयर के हेड-रेस्ट पर सिर टिकाते हुए गम्भीरता पूर्वक बोले।


निमित्त मुस्कुराया। 

“मैं सोच ही रहा था कि ‘नेता जी’ ने अब तक पैसे की बात क्यों नहीं की,”


“यानी वास्तव में लोगों के विचार पढ़ते हो,” 


“लोगों को पढ़ता हूँ,” निमित्त भावहीन स्वर में बोला। 


“पर मैं नहीं पढ़ता। इसीलिए साफ़-सीधी बात करने की आदत है मुझे,”


“फिर भी इतने सफल नेता हैं…कमाल की बात है,” इस बार निमित्त ने चुटकी लेते हुए कहा। 

उसके व्यंग पर गिरीश बाबू ने कोई तवज्जो ना दी


“इरा होश में आ गयी है…बिल्कुल ठीक-ठाक, हंसती-खेलती…पहले के जैसी। हमें जो चाहिए था वो मिल गया। तुमने अपना काम पूरा किया। अब उस काम का जो भी पारिश्रमिक तुम्हें सही लगता है वो बोलो। तुम जितना माँगोगे उतना मिल जाएगा तुम्हें…बल्कि उससे ज़्यादा ही मिलेगा। पर अब ये क़िस्सा ख़त्म चाहिए मुझे,”


निमित्त हवा में हिसाब लगाने की ऐक्टिंग करने लगा। कभी वो उँगलियों पर कुछ जोड़-घटाना करता तो कभी हवा में बुदबुदाते हुए उंगलियाँ नचाता जैसे कोई बहुत ही जटिल मैथ्स इक्वेशन सॉल्व करने की कोशिश कर रहा हो। गिरीश बाबू धैर्यपूर्वक उसका ये गिमिक ख़त्म होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। आख़िरकार उसने सिर झटकारा, अपने कंधे उचकाए जो माथे से पसीना (जो कि एक बूँद भी ना था) पोंछने की ऐक्टिंग करते हुए बोला,

“बाबा रे…मुझसे तो नहीं हो रही इतनी कठिन कैल्क्युलेशन। आप ही बता दीजिए, कितनी क़ीमत आंकते हैं आप अपनी बेटी की जान की,”


गिरीश बाबू का चेहरा क्रोध और अपमान से सुर्ख़ हुआ,

“कालांत्री! तमीज़ से बात करो,”


निमित्त इत्मिनान से मुस्कुराया,

“उसके लिए तमीज़ से कहिए उसे खुद आकर मुझसे बात करनी पड़ेगी…वो क्या है ना, मैं थोड़ा शर्मीला हूँ…थोड़ा शाई टाइप…खुद से जा के लेडीज़ लोग से बात नहीं करता,”

गिरीश बाबू दांत पीस कर रह गए। उन्हें समझ ना आया कि आगे क्या बोलें 


निमित्त पूर्ववत मुस्कुराते हुए बोला,

“मैं आपको एक क़िस्सा सुनाता हूँ। मैं बचपन से ही गणित में काफ़ी कमजोर था। मेरी माँ अक्सर मुझे लेकर चिंता करतीं। कहती थीं कि तू भोले का भोला ही रह जाएगा। अगर हिसाब-किताब नहीं सीखेगा तो कैसे कटेगी तेरी ज़िंदगी? जब बड़ा हुआ तब एहसास हुआ कि माँ की ज़्यादातर बातों की तरह ये बात भी बिल्कुल सही थी। ये लेन-देन, हिसाब-किताब, नफ़ा-नुक़सान, पैसे-कौड़ी के चक्करों में ना मन रमता और ना ही ये मेरे पल्ले पड़ते, लेकिन बंदे का गणित कमजोर था, दिमाग़ नहीं…कभी घमंड नहीं किया वैसे। हाँ, तो मैंने सफ़ेद मूँछों वाले चाचा चौधरी के कम्प्यूटर से तेज़ अपना दिमाग़ लगाया। मेरी माँ के हिसाब से मैं भोला…और मेरे हिसाब से तो ब्रह्मांड में सिर्फ़ एक ही ‘भोले’ हैं,” 


निमित्त ने उँगली से ऊपर की तरफ़ इशारा किया,


“मैंने बोला, हे भोले भंडारी! आप तो पूरे संसार का लेखा-जोखा, व्यवस्था देख लेते हैं, मुझे मूरख का भी देख लो। जैसे रखोगे रह लूँगा, कभी शिकायत नहीं करूँगा। भोले तो भोले हैं, उन्होंने मेरी सुन ली। उस दिन के बाद से इस संसार में निमित्त कालांत्री की सांसारिक व्यवस्था भोले के भरोसे चलती है। ज़रूरत से ज़्यादा मैंने कभी कुछ माँग नहीं और मेरी आवश्यकता से कम कभी भोले ने पड़ने नहीं दिया,”


गिरीश बाबू अब मुँह बाये हुए निमित्त को देख रहे थे। 

 

“जितनी मेरी आवश्यकता है और जितना भोले को लगता है कि मैं डिज़र्व करता हूँ उतने की व्यवस्था वो कर देते हैं। भोले हर किसी को उसकी ज़रूरत अनुसार ही देते हैं…आपकी ज़रूरत ज़्यादा है, तो आपको ज़्यादा दिया है,” निमित्त ने चारों ओर नज़रें घुमाते हुए कहा। 


उसने पहले अपनी उँगली ऊपर की तरफ़ पॉइंट की, “जब देने वाला दाता ही मेरा है…”, फिर गिरीश बाबू की तरफ़ करते हुए बोला, “…तो मैं ‘दीन’ से क्या माँगूँ?" 


गिरीश बाबू की आवाज़ थोड़ी विनम्र हुई,

“माफ़ी चाहता हूँ निमित्त…मेरे बात रखने का तरीक़ा शायद ग़लत था, मेरा इरादा नहीं। तुम मेरी पोज़िशन समझने की कोशिश करो…”  


“बेटी के होश में आते ही पिता की पोज़िशन बैकसीट लिए पॉलिटीशियन ने टेक-ओवर कर ली है। आप एक बड़ी राइट विंगर पार्टी के प्रॉमिनेंट लीडर हैं। ऑपज़िशन और लेफ़्ट विंगर्स आपको घेरने का मौक़ा ढूँढते रहते हैं। पिछले कई सालों की मेहनत से फ़ाइनली आप अपनी ‘धर्म निरपेक्ष’ इमेज बना पाए हैं, ऐसे में खुद आपके घर में एक एक तांत्रिक-ओझा का होना, वो भी जिस पर आपराधिक मामले दर्ज हों,  ये बात आपके विरोधियों को आपको घेरने का बेहतरीन मुद्दा दे देगी,”


“वाक़ई तुम्हारा दिमाग़ हर पहलू पर सोचता है कालांत्री। लेकिन ये डर सिर्फ़ एक पॉलिटीशियन का नहीं है, एक पिता का भी है। ऑपज़िशन और मीडिया को अगर तुम्हारे यहाँ होने की भनक लग गयी तो वो कारण भी ढूँढने की कोशिश करेंगे…और मैं इरा का नाम इसमें नहीं घसीटना चाहता,”


“मेक्स सेन्स…बट…मेरे यहाँ से चले जाने से इरा की दुश्वारियाँ नहीं चली जाएँगी,” निमित्त गम्भीर होते हुए बोला। 


उसने वुडन बॉक्स गिरीश बाबू के सामने टेबल पर रखा,

“आपको पता है ये वुडन बॉक्स वास्तव में क्या है?”


गिरीश बाबू ने उत्तर देने के बजाय प्रश्नवाचक नज़रों से निमित्त को देखा। 


“यह एक डिब्बक बॉक्स है,”


“डिब्बक?”


“यहूदियों द्वारा प्रयोग में लाया जाने वाला डिब्बक/डिब्बूक बॉक्स एक लकड़ी का प्राचीन वाइन कैबिनेट होता है,”


“ये वाइन रखने के लिए है?”


“नहीं, अतृप्त आत्मा यानी डिब्बक को रखने के लिए,”


“पर अभी तो तुमने बोला कि डिब्बक/डिब्बूक प्राचीन वाइन कैबिनेट होता है,”


“ना! मैंने कहा कि डिब्बक/डिब्बूक ‘बॉक्स’ वाइन कैबिनेट होता है। डिब्बक के बारे में सही तौर पर कम ही लोग जानते हैं, इसके बारे में अधिकतर लोगों की जानकारी मलयालम हॉरर फ़िल्म ‘एज़्रा’ या उसके हिंदी रीमेक ‘डिब्बक’ तक ही सीमित है लेकिन उसमें एक बड़ा नुक़्स है। ‘डिब्बक’ सुनने में हिंदी के शब्द ‘डिब्बे’ सा ज़रूर साउंड करता है लेकिन वास्तव में इसका ओरिजिन हीब्रू के शब्द ‘डावक' से है जिसका मतलब है 'पैरासिटिक पोज़ेशन’, यानी डिब्बक का मतलब ये लकड़ी का बॉक्स नहीं बल्कि उसमें बंद ऊर्जा है,”


गिरीश बाबू के माथे पर बल पड़े। 


“सोलहवीं शताब्दी के काबलिस्ट रैबाई आइज़ैक लूरीआ व उनके समकालीन सूफ़ियों ने इसपर तफ़सील से लिखा है। यहूदियों में ‘गिलगुल’ का अर्थ होता है पुनर्जन्म, इब्बर या इब्बूर वो सद-आत्माएँ होती हैं जिन्हें पुनर्जन्म तो नहीं मिलता लेकिन वो किसी का “पोज़ेशन” या तो उस व्यक्ति की भलाई, या फिर किसी अधूरे रह गए भले कार्य को पूरा करने के लिए करती हैं जबकि इनसे ठीक विपरीत डिब्बक वो अतृप्त आत्मा होती है जिसके पापों के कारण उसे मुक्ति ना मिली हो। अनरेज़ॉल्वड ट्रॉमा, जघन्य पाप कर्म और अधूरे कार्मिक साइकल उस आत्मा को बेहद उग्र और उद्दंड बनाते हैं। ये ‘साइकिक पैरासाइट’ डिब्बक बॉक्स के माध्यम से उन लोगों को अपना होस्ट बनाती है जो इमोशनली, मेंटली या स्पिरिचूअली कमजोर या बीमार हों…या फिर बच्चे…जो अब तक अपने दिमाग़, अपने सब-कॉंशियस और कॉंशियस में संतुलन नहीं बना पाए हैं। एक लड़की के लिए प्यूबर्टी, उसकी फ़र्स्ट मेन्स्ट्रूअल साइकल ऐसा ही समय होता है जब शरीर और मन में हो रहे परिवर्तन का तारतम्य चेतन और अवचेतन मस्तिष्क से सही ढंग से नहीं बैठता,”


निमित्त के अंतिम वाक्य पर गिरीश बाबू ने असहजता से पहलू बदला। 


“अब आते हैं इस बात के दूसरे पहलू पर,” निमित्त चेयर पर पीछे टिक कर बैठ गया। उसने अपने चीर-परिचित अन्दाज़ में, एक पैर पर दूसरा पैर चढ़ाया, दोनों कुहनियाँ चेयर के आर्म रेस्ट से टिका लीं और उँगलियों के पोरों को जोड़ते हुए हाकिनी मुद्रा बनाई। 


“इरा के सब-कॉंशियस के जिस हिस्से हो मैंने ब्लॉक किया है वहाँ ‘इन्फ़ेस्टेड मेमरी’ है। ये इन्फ़ेस्टेड मेमरी ही डिब्बक का सोर्स है जो इस डिब्बक बॉक्स में बंद वूडू-डॉल के ज़रिए इरा तक पहुँचाई गई है,”


“इन्फ़ेस्टेड मेमरी?”


“ह्यूमन मेमरी को कई कैटेगॉरीज़ में बाँटा जा सकता है। जैसे, अक्वायर्ड मेमरी, एक्स्पीरीयन्स्ड मेमरी, इमोशन, सोमैटिक, ऐन्सेस्ट्रल, कार्मिक या सोल मेमरी, इत्यादि-इत्यादि…लेकिन ये सभी मेमरीज़ व्यक्ति की अपनी होती हैं, चाहे इस जन्म की या अपने पिछले जन्मों की, पर इन्फ़ेस्टेड मेमरी किसी दूसरे व्यक्ति की एक्स्पीरीयन्स की हुई मेमरी होती है जिसे जबरन होस्ट के सब-कॉंशियस में ‘प्लांट’ किया जाता है,”


“क्या है उस इन्फ़ेस्टेड मेमरी में जो इरा के सब-कॉंशियस में प्लांट की गई है?”


गिरीश बाबू के सवाल के जवाब में निमित्त ने जो कुछ भी इरा के सब-कॉंशियस में जाने पर देखा था वो बताता चला गया। सारी बात सुन कर गिरीश बाबू ने अपना सिर पकड़ लिया। 


“यहाँ आते समय सुभद्रा ने मुझे मेरे आने से पहले घाटी घटनाओं के बारे में डिटेल में बताया था, इस घर में रहने वाले एक-एक सदस्य, नौकरों और कर्मचारियों इत्यादि के बारे में भी जितनी जानकारी दी जा सकती थी, सब कुछ। जब इरा के साथ वो “पोज़ेशन एपिसोड” हुआ था उस समय आपने तेरह साल पहले के किसी श्राप का ज़िक्र किया था। इरा को “पज़ेस” करने वाले “साइकिक पैरासाइट” ने भी कहा था कि उसने तेरह साल इस पल की प्रतीक्षा की है। इससे यह पता चलता है कि आपको पूरा-पूरा अंदाज़ा है कि यह डिब्बक किसका है,” निमित्त ने इत्मिनान से अपनी बात ख़त्म करते हुए प्रश्नवाचक नज़रों से गिरीश बाबू की तरफ़ देखा। 


गिरीश बाबू ने नज़रें फेर लीं। निमित्त ने इस पर कोई प्रतिक्रिया ना दी। वो पूर्ववत गिरीश बाबू को अपलक देखता रहा। कुछ देर तक दोनों के बीच एक बोझिल सन्नाटा व्याप्त रहा, उसके बाद गिरीश बाबू बोले,


“तुमने “त्रियो-किलर” के बारे में सुना है?”


“मुझे लगा “त्रियो-किलर” मात्र एक “बैकवुड मिथ” है,” 


“हुँह…”बैकवुड मिथ”! मोल्लेम जैसे रिमोट गाँव-क़स्बों, जो जंगल से घिरे हों, उनमें होने वाली भयावह घटनाओं के लिए एक “फ़ैन्सी” शहरी टर्म,” गिरीश बाबू विषादपूर्ण ढंग से बोले। 


“तेरह साल पहले गोवा से लगे वेस्टर्न घाट्स के जंगलों और आस-पास के क्षेत्र से टीनएज बच्चियों के ग़ायब होने की खबर आई थी। ग़ायब हुई हर बच्ची की उम्र तेरह साल थी। हर महीने एक तेरह साल की बच्ची रहस्यमयी तरीक़े से इन इलाक़ों से ग़ायब हो जाती। पुलिस, सी.बी.आई., सी.आई.डी व अन्य सरकारी एजेन्सीज़ भी इन बच्चियों का सुराग लगाने में नाकाम हुई थीं। बच्चियों के ग़ायब होने का ये सिलसिला लगभग एक साल तक चला था। इंटरनेट और मीडिया ने ऐसी थ्योरी सर्क्यूलेट करनी शुरू की कि यह किसी साइकोपैथ सीरीयल किलर का काम है। मीडिया ने उसे नाम दिया “त्रियो-किलर” हालाँकि कभी भी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, ना ही गुमशुदा हुई बच्चियों में से किसी के भी शव बरामद हुए। फिर हर महीने बच्चियों का ग़ायब होना जैसे अचानक शुरू हुआ था वैसे ही अचानक बंद भी हो गया और न्यूज़ या “त्रियो-किलर” थ्योरी पर इंटरनेट पोस्ट्स आना भी बंद हो गयीं। कभी पता नहीं चल पाया कि वास्तव में उन ग़ायब हुई बच्चियों के साथ क्या हुआ, ना ही ये पता चल पाया कि वास्तव में कोई त्रियो-किलर है भी या नहीं,” निमित्त उस पूरी घटना को रिकॉल करते हुए बोला। 


गिरीश बाबू ने अपनी चेयर पर आगे झुकते हुए अपनी कुहनियाँ टेबल से टिकाईं। 

“बारह बच्चियाँ ग़ायब हुई थीं कालांत्री। हर बच्ची तेरह साल की। उनके परिवार कभी जान नहीं पाए कि उनकी बच्चियों के साथ क्या हुआ। बस अपने भय और दर्द में वो सिर्फ़ यही कामना करते रहे कि या तो उनकी बच्चियाँ सही-सलामत मिल जाएँ या फिर उन बच्चियों को सुकून की मौत नसीब हुई हो…क्योंकि इन दोनों बातों के बीच जो कुछ भी आता है वो किसी बच्ची के घर वालों के सबसे भयानक दुस्वप्न से भी अधिक भयावह है,”


गिरीश बाबू की आवाज़ ही नहीं उनके जिस्म में भी भावनात्मक आवेग से उत्पन्न होते कम्पन निमित्त साफ़ तौर पर महसूस कर रहा था। 


“तेरह साल की छोटी बच्चियाँ कालांत्री…मेरी इरा आज तेरह साल की है और भगवान जानता है कि मेरे जीवन को कोई एक दिन नहीं गुजरा जब उन मासूम बच्चियों को याद कर के मेरा दिल ना डूबा हो कि कहीं अगर मेरी इरा के साथ ऐसा कुछ हुआ तो…नहीं…नहीं…मेरी इरा को कुछ होने से पहले मैं दुनिया को जला कर ख़ाक कर दूँगा,”


“समरथ को नहीं दोष गोसाईं,” निमित्त शांत भाव से बोला। 


“यही सही, इस नाते भी मेरा दायित्व बनता था कि उन बच्चियों के अपराधी को दंड दूँ,” गिरीश बाबू ज़िद भरे स्वर में बोले। 


“हम्म…वास्तव में क्या हुआ था?”


“उसका नाम कापालिक नीलजेबूब था। ओझा, तांत्रिक, काला जादू करने वाला कापालिक था वो जो वेस्टर्न घाट्स के घने जंगलों में घूमता रहता था। मोल्लेम के लोग भय खाते थे कापालिक नीलजेबूब के नाम से। कभी-कभी वो महीनों, सालों तक नज़र नहीं आता, लोगों का मानना था कि वो काली शक्तियों की सिद्धि के लिए जंगल में कहीं अघोर साधना करता है। फिर वो एकाएक प्रेत के जैसे प्रकट होता। उसके आते ही मोल्लेम में कोई ना कोई घोर अपशकुन होता..महामारी और त्रासदी आती और फिर नीलजेबूब ग़ायब हो जाता। ऐसा लगता था जैसे अपनी काली शक्तियों और प्राप्त की हुई सिद्धियों का मोल्लेम के लोगों पर परीक्षण करने ही आया है वो,”


“नीलजेबूब। नाम तो यहूदी है। कापालिक है यानी आधा यहूदी और आधा हिंदुस्तानी हो सकता है,” निमित्त जैसे खुद में बड़बड़ाया या फिर स्कैली से बात करते हुए। फिर गिरीश बाबू से मुख़ातिब हुआ, “आप कंटिन्यू कीजिए,”


“नीलजेबूब को नज़र आए सालों बीत गए थे। मोल्लेम के लोग निश्चिंत होने लगे थे कि शायद इस बला से आख़िरकार उन्हें छुटकारा मिल गया, लेकिन तेरह साल पहले नीलजेबूब फिर एकाएक नज़र आया। पहली बच्ची के ग़ायब होने से एक-दो दिन पहले। और फिर हर महीने, लगातार, बच्चियों के ग़ायब होने के समय और जगह के आस-पास नीलजेबूब को देखा गया। लोगों ने उसे पकड़ने की कोशिश की…पर वो तो जैसे इंसान नहीं कोई छलावा था। किसी के हाथ आने से पहले ही वो जंगलों में ग़ायब हो जाता,”


“पुलिस ने कार्यवाही नहीं की?”


“कार्यवाही करने के लिए ख़ास कुछ था नहीं। कोई सबूत नहीं थे जो नीलजेबूब के विरुद्ध पुख़्ता केस बनाते। सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि नीलजेबूब का कोई पता-ठिकाना ना मिल रहा था। पुलिस की लाख कोशिशों के बाद भी वो उनके हाथ नहीं आया,”


“फिर?”


“फिर मैंने मुंबई से ख़ास तौर पर इस केस को हैंडल करने के लिए इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे को बुलाया,”


“एंकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे? जिसे पुलिस डिपार्टमेंट और मीडिया इंस्पेक्टर  ‘चीता’ बुलाते हैं?”


“ऐन वही। जिस तरह चीता एक बार अपने शिकार के पीछे पड़ जाए तो उसका शिकार कर के ही दम लेता है उसी तरह एक बार इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे उर्फ़ चीता अगर किसी अपराधी के पीछे पड़ जाए तो समझो उसका ‘केस क्लोज़’ कर के ही दम लेगा,”


“तो इस इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे…चीता ने नीलजेबूब को ढूँढ निकाला?”


“ना सिर्फ़ ढूँढ निकाला बल्कि उस राक्षस…उस दरिंदे, जानवर को उसके सही अंजाम तक भी पहुँचाया,”


निमित्त सोच में पड़ गया। 


“इंस्पेक्टर ने अपनी स्पेशल थर्ड-डिग्री के ऐसे दांव-पेंच उस कापालिक पर आज़माए कि उसके शरीर ने प्राण त्याग दिए। बस अफ़सोस इस बात का है कि मरने से पहले नीलजेबूब ने ये ना क़बूला कि उसने उन बारह बच्चियों के साथ क्या किया,” गिरीश बाबू ने आगे कहा। 


“लेकिन इस हिसाब से तो अगर ये डिब्बक नीलजेबूब का है तो उसे आपसे पहले इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे से बदला लेना चाहिए। आख़िरकार उसने नीलजेबूब की जान ली,”


“हमारे कहने पर ली, हमारे हुक्म की तामील करते हुए ली,”


“और इस बात का इल्म नीलजेबूब को था?”


“बिल्कुल! बक़ौल इंस्पेक्टर चिरंजीवी, उस कापालिक के अपने प्राण त्यागने से पहले के अंतिम अल्फ़ाज़ यही थे कि वो मुझे और मेरे वंश को श्राप देता है कि उसकी मौत का बदला मेरा वंश अपने लहू से चुकाएगा। ख़ून याद रखता है, बदला भी,”


“हुम्म…”  निमित्त ने गहरी हुंकार भारी और गिरीश बाबू की ओर देखा। 


“और सबसे बड़ा सबूत खुद अपने आप में यह तथ्य है कि उस कापालिक के मारे जाने के साथ ही बच्चियों का ग़ायब होना बंद हो गया। अगर वो त्रियो-किलर नहीं होता तो उसकी मौत पर यह सिलसिला ना रुकता,”


“कापालिक की लाश का क्या हुआ?”


“चीता ने ठिकाने लगा दी, कहाँ ये सिर्फ़ वही जानता है। हमने पूछा नहीं क्योंकि जानने में हमारी कोई दिलचस्पी ना थी। हमारी हिदायत सिर्फ़ इतनी थी कि वो कभी मिलना नहीं चाहिए…और वो नहीं मिला,”


“द एम्परर,” निमित्त बोला, “जो टैरो कार्ड आपने आपने लिए चुना, दिखाता है उस रूढ़िवादी, सख़्त, अनुशासक प्रजा पालक को जो पिता समान है। जैसे एक पिता अपने परिवार की रक्षा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, उसके लिए सही और ग़लत के कोई मायने नहीं रह जाते वैसे ही एक प्रजा पालक अपनी प्रजा की रक्षा के लिए सही और ग़लत की परिधि से परे जा कर निर्णय लेता है…दंड देता है,” इस बार निमित्त के लहजे में जेन्यूइन अप्रीशीएशन था। 

“तुम्हारी वो ‘सूर्यवंशम की ज़हर वाली खीर’ वाली बात ओवर स्टेट्मेंट थी। हमारी फ़ैमिली और मोल्लेम के लोग, सभी हमसे दिली मुहब्बत रखते हैं। हाँ, हम मानते हैं हमारे फ़ैसले कठोर और आचरण सख़्त है पर हम जो करते हैं सबकी भलाई सोच के करते हैं,”  


“और ये बात हमें लाती है इस केस के तीसरे और सबसे अहम पहलू पर,” निमित्त डिब्बक बॉक्स खोलते हुए बोला। अंदर से सड़ते रक्त की तीखी दुर्गंध उठी। निमित्त पर जैसे उस दुर्गंध का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था, जैसे वो उसका आदि हो। उसने सैनिटेरी पैड और कॉटन अंडरगार्मेंट से बनाई हुई वूडू डॉल निकाल कर अपने हाथ में ले ली, 


“डिब्बक को बॉक्स के अंदर लाने, ब्लड स्टेंड अंडरवियर और सैनिटेरी पैड चुरा कर उसे ब्लैक मैजिक से वूडू डॉल बनाने और डिब्बक बॉक्स को इरा के रूम तक पहुँचाने का काम करने वाला कोई भूत-प्रेत, चुड़ैल, पिशाच, आत्मा नहीं बल्कि जीता-जागता इंसान है,”


“कौन?”


“यही तो पता लगाना है,” निमित्त ने हाथ में थमी वूडू गुड़िया का उलट-पलट कर मुआयना करते हुए कहा। 


“पर ये कैसे हो सकता है? इरा को पहली बार मेन्सेस हुए हैं ये बात या तो सिर्फ़ इरा जानती थी या सुभद्रा। मुझे भी इस बारे में नहीं पता था तो किसी और को पता होने का सवाल ही पैदा नहीं होता,”


“इस सवाल का जवाब है मेरे पास,” निमित्त इत्मिनान से बोला। 


“सुभद्रा इरा से एक माँ के जैसे प्यार तो करती है लेकिन उसमें एक नैचरल मदर्स इन्स्टिंक्ट नहीं है। जिस माँ की बच्ची टीन्स में प्रवेश करने पर हो वो पहले से बच्ची को मेन्सेस के बारे में बताती है, फ़र्स्ट यूज़ के लिए पहले ही सैनिटेरी पैड का इंतज़ाम कर के रखती है। पर सुभद्रा को ये एक्स्पिरीयन्स नहीं है। उसके लिए इरा अब भी बच्ची है। इसीलिए जब एक दिन अचानक से इरा ने पहली बार ब्लीड किया तो उससे इरा और सुभद्रा दोनों बुरी तरह घबरा गए। सुभद्रा और इरा के बॉडी शेप में स्वाभाविक तौर पर बड़ा अंतर है। इस पैड को देखिए, इरा ने हेविली ब्लीड किया था और सुभद्रा का सैनिटेरी नैप्किन इरा को फिट नहीं आता,”


निमित्त की बात से गिरीश बाबू बुरी तरह असहज और विचलित हुए। 


“इ…इतना डिटेल में जाने की ज़रूरत नहीं है कालांत्री, सीधे मुद्दे पर आओ,”


निमित्त मुस्कुराया, “ज़रूरत है गिरीश बाबू। सबसे पहले तो बच्चियों के लिए उनके मेन्सेस कोई हौवा या शर्म की बात नहीं है ये एहसास कराए जाने की ज़रूरत है। बाक़ी शारीरिक प्रक्रियाओं की तरह यह भी एक सहज प्रक्रिया है जिस पर खुल कर बात होनी चाहिए ताकि बच्चियाँ असहज ना हों, शर्मिंदगी और झेंप ना महसूस करें। हाँ मैं मानता हूँ कि स्यूडो फ़ेमिनिस्ट्स की तरह सोशल मीडिया पर अपने पीरियड्स फ़्लॉंट और सेलिब्रेट करने का भौंडापन सरासर बहूदगी है लेकिन परिवार के अंदर हर व्यक्ति का दायित्व है कि बच्चियों के लिए ये झेंप और शर्मिंदगी का सबब ना बने,”


गिरीश बाबू का सिर स्वतः ही सहमति में हिला। 


“मेरी थ्योरी है कि या तो इरा के पीरियड आने पर उसे खुद को साफ़ करने का बोल कर उसके लिए उसके हिसाब के सैनिटेरी पैड लेने सुभद्रा खुद आनन-फ़ानन मार्केट भागी या फिर उसने किसी ऐसे इंसान को भेजा जो विश्वासपात्र हो। जितना मैं सुभद्रा को समझता हूँ, वो ये काम किसी दाई-नौकर से नहीं करवाएगी, किसी पुरुष से भी नहीं, उसकी वजह झेंप भी है और यह फ़ैक्ट भी कि इरा की ज़रूरत का अंदाज़ा कोई पुरुष नहीं लगा सकता, इसीलिए मुझे लगता है वो खुद ही मार्केट गई। हड़बड़ाई सुभद्रा का असमय मार्केट जाना, इरा का रूम में बंद होना, फिर सुभद्रा के वापस आते ही इरा का नहा कर ड्रेस चेंज होना। इतनी बातें उस शख़्स के लिए काफ़ी थीं यह जानने को कि इरा पहली बार ब्लीड कर चुकी है। अब उसको सिर्फ़ गार्बेज से यूज़्ड पैड और अंडरवेयर उठाना था,”


“पर है कौन वो शख़्स?”

“आपके करीबी और विश्वासपात्रों में से कोई एक। पिछले तेरह सालों में…उस नीलजेबूब के मरने के बाद इस कोठी में सुभद्रा के अतिरिक्त और कौन कौन आया है…आय मीन स्टाफ़, नौकर-चाकर?”


“कोई भी नहीं। यहाँ जितने भी स्टाफ़ हैं वो पीढ़ियों से काम कर रहे हैं, जो नए हैं वो भी कम से कम पिछले पच्चीस-तीस सालों से,” गिरीश बाबू इनकार में सिर हिलाते हुए बोले। 

“मेरी थ्योरी के अनुसार यह दो या दो से ज़्यादा लोगों का काम है। पहला लो-लेवल ऑपरेटर है, जिसने इरा के मेन्सेस की जासूसी की और फिर वूडू डॉल बनाने का सामान हासिल किया और दूसरा वो है जो पर्दे के पीछे से खेल रहा है, आपके बेहद करीबी और विश्वासपात्रों में से कोई, जिसने इस लो-लेवल ऑपरेटर को ऐक्सेस दिया है,” निमित्त ने अपने होल्स्टर से अपना ख़ास सिल्वर कॉइन निकाल लिया था जिसे वो फ़िलहाल अपनी उँगलियों के बीच नचा रहा था। ऐसा वो तब करता था जब कुछ सोचने में अधिक दिमाग़ लगा रहा हो। 


“ऐसा तो कोई भी नहीं है,” गिरीश बाबू ने दिमाग़ पर ज़ोर देते हुए कहा। 


“डॉक्टर थापा और अपने चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम के बारे में आपका क्या विचार है?”


“सवाल ही पैदा नहीं होता,” गिरीश बाबू उसकी बात का पुरज़ोर खंडन करते हुए बोले, “डॉक्टर थापा बीस साल पहले मेरे साथ नेपाल से यहाँ आए थे। बीस वर्ष पूर्व नेपाल के राजनीतिक दौरे पर हमारी मुलाक़ात डॉक्टर थापा से हुई थी। उस समय डॉक्टर थापा वहाँ के राजा मानवेंद्र के निजी चिकित्सक थे। उस समय हमारी पहली पत्नी…मल्हार की माँ रंजना की तबियत पहली बार ख़राब होना शुरू हुई। उपचार डॉक्टर थापा ने ही किया था। उनके साथ जल्द ही एक मित्र सा सम्बंध बन गया, जब हम नेपाल से वापस आए तो डॉक्टर थापा भी हमारे बुलाने पर हमारे साथ चले आए और हमेशा के लिए यहीं के हो कर रह गए। थापा सिर्फ़ हमारे फ़ैमिली डॉक्टर नहीं, हमारे सबसे करीबी और अज़ीज़ दोस्त हैं,”


“और चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम?”


“कदम का और हमारा साथ और पुराना है कालांत्री। लगभग पच्चीस साल पहले की बात है, कदम कमांडो ट्रेनिंग लेकर निकला ही था और हमारा बॉडीगार्ड था। हमारे सबसे बड़े विरोधी, ऑपज़िशन लीडर नागफन भंडारकर ने किराए के किलर हायर कर के हम पर गोलियाँ चलवाई। हमारे और गोलियों के बीच कदम दीवार बन कर खड़ा हो गया था। दस गोलियाँ खायी थी उसने। चार पीठ, दो कंधे, तीन पैरों और एक लगभग सिर को छूते गुजरी थी, फिर भी कदम ढाल बन कर खड़ा रहा। पूरे छे महीने लगे उसे अपने पैरों पर खड़ा होने में और खड़ा होते ही वो वापस हथियार उठा कर हमारे बग़ल में आ खड़ा हुआ। आगे कई मौक़ों पर कदम ने हमारे लिए अपनी जान दांव पर लगाई है। तुम दौलत की बात करते हो कालांत्री, मुझे लगता है मैं इतना सौभाग्यशाली हूँ कि महादेव ने मुझे जीवन में डॉक्टर थापा, कदम, सुभद्रा जैसे लोग नियामत की तरह बक्शे हैं,”


“और मल्हार? अपने बेटे के बारे में क्या सोचते हैं आप? देख कर पता चलता है कि वो इरा से चिढ़ रखता है,”


“मल्हार पूरी दुनिया से चिढ़ रखता है लेकिन चिढ़ रखना और नफ़रत करना दो अलग बातें हैं,”


“इसकी वजह इरा का आपकी दूसरी पत्नी की संतान होना है?”


“मल्हार बहुत छोटा था जब हमने उसे पढ़ाई के लिए बोर्डिंग स्कूल भेज दिया था। अपनी माँ रंजना से कभी मल्हार को वो ‘मातृत्व’ वाले प्रेम का सुख नहीं मिला और ना ही हमसे एक पिता-पुत्र का परस्पर सम्बंध और भावनात्मक जुड़ाव। इस अभाव ने मल्हार के भीतर बचपन से ही एक हीन भावना, एक कुंठा को जन्म दे दिया। जब रंजना को लास्ट स्टेज कैन्सर डाइग्नोज़ हुआ तब मल्हार तेरह-चौदह साल का था। रंजना के जाने के बाद हमने मल्हार को अपने पास बुला तो लिया पर हमें यह एहसास हुआ कि आत्मिक रूप से हमारा बेटा हमसे शायद इतना दूर हो चुका है कि वो फ़ासला तय करने में उम्र गुज़र जाएगी,”


“हुम्म…फिर,”


“इस दौरान हमारे जीवन में इरा की माँ इंदू आई। इंदू के रूप में मल्हार को वो मातृत्व मिला जो अपनी माँ रंजना से नहीं मिला था। हमने जीवन में पहली बार मल्हार को खुश देखा, सोलह साल का मल्हार पूरे दिन इंदू के आगे-पीछे ‘इंदू माँ-इंदू माँ’ करते हुए किसी छोटे बच्चे की तरह डोलता रहता, उससे फ़रमाइशें करता। इंदू ने अपने प्रेम से मल्हार के मन पर मरहम लगा दी थी जिसने मेरे और मल्हार के रिश्तों के घाव भी भर दिए। सब ठीक था, फिर इंदू प्रेगनेंट हुई। मल्हार अपने छोटे भाई/बहन के आने को लेकर बहुत एक्सायटेड था। इरा के होने के बाद तो वो उसे गोद से नीचे ही नहीं रखता था…फिर धीरे-धीरे इंदू इरा में व्यस्त होती चली गई, मल्हार से यह नहीं लिया गया। उससे उसकी माँ एक बार फिर छिन रही थी। इससे पहले कि हम इस मुद्दे पर मल्हार से बात करते…वो मनहूस रात आयी जब इंदू की कार का ऐक्सिडेंट हुआ। ड्राइवर और इंदू दोनों की मौक़े पर ही मौत हो गई, ये ऊपर वाले का चमत्कार ही था कि नन्ही इरा सीट के निचले हिस्से में सुरक्षित रह गई। पता नहीं क्यों पर मल्हार ने इंदू की मौत के लिए इरा को ज़िम्मेदार मान लिया। उस दिन से मल्हार के दिल में हर चीज़ के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ आक्रोश है लेकिन हम अपनी औलाद को जानते हैं। वो सही ग़लत का फ़र्क़ समझता है,”


“जानते तो ख़ैर धृतराष्ट्र भी थे दुर्योधन को,” निमित्त ने तपाक से कहा। 


गिरीश बाबू ने उसे खा जाने वाली नज़रों से घूरा जिस पर निमित्त ने लापरवाही से अपने कंधे उचकाए और फिर उँगलियों के बीच नचा रहे सिक्के को हवा में उछाल कर कैच करते हुए बोला,


“बहरहाल, अब आप सारी वस्तुस्थिति से अवगत हैं। इस वूडू डॉल में सात सुइयाँ हैं, यानी इरा पर सात बार अटैक होगा…अलग-अलग तरीक़ों से। हर आघात उसे पहले से अधिक कमजोर बनाएगा और आख़री आघात से पहले तक वो सिर्फ़ नाम मात्र को ही जीवित बची होगी। सात में से पहला अटैक हो चुका, उसका मैग्निट्यूड भी आप देख चुके हैं। हर अगले अटैक का लेवल पिछले वाले से बढ़ता जाएगा। अगर अब भी आप चाहते हैं की मैं यहाँ से चलता बनूँ तो बंदे को कहीं आने में उतनी ख़ुशी नहीं मिलती जितनी लोगों की ज़िंदगी और उनके घर से जाने में मिलती है,” 


“तुम्हें यक़ीन है कि इसके पीछे कोई अंदर का इंसान है?”


“सौ फ़ीसदी!…और उसके साथ कोई ऐसा जो बाद में आया है…नीलजेबूब की मौत के बाद…या फिर अभी हाल-फ़िलहाल में एक-दो साल पहले। यह जो भी है मुझे इन्वेस्टिगेट करने और इरा पर किए गए ‘हेक्स’ की काट करने में समय लगेगा,”


“दिक़्क़त ये है कालांत्री कि यू आर कॉंट्रवर्सीज़ फ़ेवरेट चाइल्ड। तुम साँस भी लेते हो तो एक कॉंट्रवर्सी हो जाती है,”


“कभी घमंड नहीं किया,”


“घमंड मत करो..फ़िक्र करो। इसको मेरी हिदायत समझो…या चेतावनी, इरा की ख़ातिर मैं तुम्हें रुकने दे रहा हूँ लेकिन अगर तुम्हारी वजह से कोई बखेड़ा या हंगामा खड़ा हुआ या मीडिया में बात फैली तो मेरे पास तुम्हें दफ़ा करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता ना होगा,”

 

निमित्त ने माथे से दो उँगलियाँ लगा कर सैल्यूट के अन्दाज़ में गिरीश बाबू की बात अक्नॉलेज की। 


“अब अगला कदम क्या है तुम्हारा,”


“अजी कदम मेरा कहाँ…कदम तो आपका है,” निमित्त इत्मिनान से बोला। 


गिरीश बाबू ने प्रश्नवाचक नज़रों से उसे देखा, वो उसकी बात ना समझ पाए। 


“चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर…कदम..वो तो आपका है,”


“कहीं भी शुरू हो जाते हो? अजीब इंसान हो तुम कालांत्री,” गिरीश बाबू खिज कर बोले। 


“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त ने सिर नवाते हुए कहा और हवा के सिक्का उछाल कर कैच करते हुए टेबल पर पटका। 


“हेड्स…क्वीन विक्टोरिया! मेरे ख़याल में हमें सुभद्रा को बुला कर बात करनी चाहिए। शायद आगे बढ़ने की लीड वहीं से मिलेगी,”


गिरीश बाबू ने सुभद्रा को कॉल कर के अंदर बुलाया। निमित्त ने फटाफट सुभद्रा को सारी बात और वस्तुस्थिति से अवगत कराया जिसके सुन कर सुभद्रा चिंतित भी थी और भौंचक भी। 


“बाप रे! आपने तो इरा के फ़र्स्ट मेन्सेस का पूरा घटनाक्रम यूँ हूबहू बयान कर दिया जैसे आँखों देखा हो,” सुभद्रा अचरज और प्रशंसा के मिश्रित लहजे में बोली। 


“लेकिन इसमें कोई कड़ी मिसिंग है, कुछ है जो मुझसे छूट रहा है। इसीलिए तुम्हें बुलाया है,”


“नहीं, सब कुछ आपने बिल्कुल सही बताया है…सिर्फ़ सैनिटेरी पैड लेने मैं खुद नहीं गई थी क्योंकि मुझे इरा को खुद को क्लीन करने में हेल्प करना था,”


“फिर कौन गया था?”


“मैंने इस काम के लिए पलक को भेजा था,” सुभद्रा सोचते हुए बोली। 


“पलक? ये पलक कौन है? इसके बारे में क्यों नहीं पता मुझे?”


“इरा की टीचर है। इरा ऑन-लाइन स्कूलिंग कर रही है, जिसमें उसे गाइड और हेल्प करने के लिए पलक आती है,” सुभद्रा ऑब्वीयस टोन में बोली। 


“इरा तेरह साल की है, अब पैदा होते ही तो पलक पढ़ाने आने नहीं लग गई होगी…कब से आ रही है?” निमित्त के अधरों पर अब तीखी मुस्कान नाच रही थी। 


“पिछले दो साल से, उससे पहले इरा की पढ़ाई मैं ही देखती थी,”


निमित्त ने विजयी भाव से गिरीश बाबू को देखा,


“बिंगो! मिल गया वो शख़्स जो ना सिर्फ़ पिछले दो साल से यहाँ आ रहा है बल्कि जिसे इरा के पीरियड की फ़र्स्ट-हैंड इन्फ़र्मेशन भी थी,”


“क्योंकि उस समय पलक इरा को पढ़ा ही रही थी जब इरा को ब्लीडिंग स्टार्ट हुई। पलक ने ही आकर मुझे इन्फ़ॉर्म किया। मैं आनन-फ़ानन इरा के पास आई और सैनिटेरी पैड लाने के लिए पलक को मार्केट भेज दिया,”


“तुमने मुझे इस पालक के साग…आय मीन पलक के बारे में पहले क्यों नहीं बताया?”


“अरे आपने मुझसे इस कोठी के लोगों, फ़ैमिली मेम्बर्स और स्टाफ़ के बारे में पूछा था…पलक इनमें से नहीं आती…एक मिनट..” सुभद्रा एकाएक चौंकी, “आप कहीं ये तो यहीं सोच रहे कि इस सब के पीछे पलक है?”


“फ़िलहाल कोई मत नहीं बना रहा लेकिन सबसे स्ट्रॉंग कंटेंडरशिप उसी की है,”  निमित्त कॉइन उँगलियों के बीच नचाता हुआ बोला। 


“नो..नो..नो..नो…दैट्स नॉट पॉसिबल। आप पलक से मिले नहीं हैं इसलिए ऐसा सोच रहे हैं। पलक बहुत अच्छी लड़की है। अपनी माँ के साथ पास ही रहती है, बेचारी अपने कॉलेज एक्स्पेन्सेज़ उठाने के लिए प्राइवेट क्लासेज़ लेती है,”


“हाँ तो ऐसा कहाँ लिखा है कि कॉलेज एक्स्पेन्सेज़ मीट करने के लिए प्राइवेट क्लास लेने वाली बेचारी लड़की वूडू डॉल नहीं बना सकती?” निमित्त तर्क देते हुए बोला। 

सुभद्रा उसका मुँह ताकते रह गई। 


“यार निमित्त, कुछ भी बोलते हो आप!” 


निमित्त ने लापरवाही से कंधे उचकाए,

“कहाँ पाई जाएगी ये पालक…आय मीन पलक?”


“लीव पर है?”


“कब से?”


“ज..जिस दिन इरा को पीरियड आए थे उसके बाद से,”


“मतलब एक वीक से, वेरी कन्वीन्यंट,” 


“उसने पहले से बता के लीव ली थी..और फिर ये भी देखिए कि जिस दिन ये मनहूस वूडू बॉक्स मिला उस दिन पलक यहाँ आई ही नहीं थी,” सुभद्रा तर्क देते हुए बोली। 


“सो व्हॉट? यहाँ उसका जो भी अकॉम्प्लिस है उसने बॉक्स प्लांट किया होगा,”


सुभद्रा निमित्त के तर्क से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं थी। 


“वैसे कालांत्री की बात में पॉइंट तो है सुभद्रा, हर्ज क्या है अगर एक बार पलक से सवाल-जवाब कर लें तो?” गिरीश बाबू गम्भीर भाव से बोले। 


“जैसा आप ठीक समझें,” सुभद्रा ने प्रतिवाद ना किया, “पलक कल से वापस जॉइन करने वाली है,”


“बढ़िया! इसके अलावा मुझे इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे से भी बात करनी है,” निमित्त गिरीश बाबू से मुख़ातिब हुआ। 


“ठीक है, फ़िलहाल उसकी पोस्टिंग मडगाँव है। मैं उसे कॉल कर दूँगा, तुम कल उससे भी जा कर मिल सकते हो,”


“मुझे एक बुलेट या क्रूज़ बाइक चाहिए होगी,”


“बाइक क्यों? गाड़ी ले जाओ, जो भी तुम ले जाना चाहो,”


“ना! आय एम ए बाइकर बाई हार्ट। मैं फ़ोर व्हीलर तभी चलाता हूँ जब क़यामत आई हो, क्योंकि अगर क़यामत नहीं भी आई है तो मेरे फ़ोर व्हीलर चलाने से आ जाती है। बुलेट या क्रूज़ बाइक इस लिए क्योंकि अल्फ़ा को बैकसीट पर बैठने में और मुझे चलाने में सहूलियत होती है,”


“हम्म…इंतज़ाम हो जाएगा। तुम्हारे रहने की व्यवस्था हम इसी फ़्लोर पर करवा देते हैं, कॉर्नर रूम में,”


“सामान रखने की व्यवस्था कहिए, बंदा अपना डेरा नीचे बाग़ीचे में डालेगा,”


“अरे! ये क्या बात हुई?”


“इतना ख़ूबसूरत और आलीशान बाग़ीचा है आपका, आख़िर क्या कमी है आपके बाग़ीचे में जो ये भँवरा नहीं रह सकता?” निमित्त अपनी शरारती मासूमियत से बोला। 


गिरीश बाबू सकपका गए,

“बड़े वाहियात आदमी हो यार,”


“कभी घमंड नहीं किया,”


कहते हुए निमित्त उठ खड़ा हुआ। 


निमित्त और सुभद्रा वहाँ से निकले। निकलते वक्त निमित्त ने डिब्बक-बॉक्स अपने साथ ले लिया। बाहर अल्फ़ा और इरा अब भी खेल रहे थे। पास ही डॉक्टर थापा और कदम खड़े थे। निमित्त उन दोनों को अनदेखा कर के नीचे की तरफ़ बढ़ गया। सुभद्रा भी उसके साथ थी। 


“आपको सच में लगता है कि ये पलक ने किया होगा?”


“मैं नहीं जानता। बिना उससे बात किए मैं कुछ नहीं कह सकता। पर अब भी कई तार ऐसे हैं जिनका सिरा नहीं मिल रहा,”


“मसलन?” 


“मसलन गिरीश बाबू ने कहा कि मल्हार इंदू देवी से बहुत स्नेह रखता था, उन्हें ‘इंदू माँ’ बुलाते ना थकता था जबकि तुमने बताया कि इरा के कमरे से निकलते वक्त मल्हार इरा को बिल्कुल उसकी माँ यानी इंदू देवी की तरह पागल करार दे रहा था। कैरेक्टर के दोनों वर्ज़न मैच नहीं हो रहे। अगर कापालिक नीलजेबूब इंस्पेक्टर चीता के हाथ लग गया था तो उसे ‘त्रियो-किलर’ के रूप में दुनिया के सामने लाने में क्या प्रॉब्लम थी?”


“उसके ख़िलाफ़ सबूत ना थे, वो बच निकलता,” सुभद्रा सोचते हुए बोली। 


“फ़ॉल्स एविडेन्स प्लांट करना हमारे पुलिस डिपार्टमेंट के लिए कौन सा मुश्किल काम है? वो भी तब जब गिरीश बाबू जैसे बड़े नेता हाँ हाथ सिर पर हो। चैतन्य ताम्बे कापालिक की लाश के साथ ऐसे सौ सबूत पेश कर सकता था जो नीलजेबूब को ‘त्रियो-किलर’ घोषित कर देते। डिपार्टमेंट की और सरकार की वाह-वाही होती, ताम्बे की वर्दी पर दो-चार तमग़े बढ़ जाते लेकिन इसकी जगह उसने नीलजेबूब की लाश, उन गुमशुदा बच्चियों के राज़ और इस केस को भी हमेशा के लिए गुमनामी में दफन कर दिया, क्यों?”


निमित्त के तर्क पर सुभद्रा भी सोचने को मजबूर हो गई। अब तक वे नीचे आ चुके थे। उन्हें बाहर गेट पर गार्ड्ज़ का शोर सुनाई दिया। 


“भगाओ इसे यहाँ से!”


“कमबख्त उठ ही नहीं रहा! लाठी से मारो,”  बाहर से गार्ड्ज़ की आवाज़ें आयीं। 


“क्या हो रहा है?” सुभद्रा ने चौंक कर उस तरफ़ देखा। 


“पता नहीं, मैं देखता हूँ,” सुभद्रा के कुछ बोलने से पहले ही तेज़ डग भरते हुए निमित्त बाहरी गेट की तरफ़ बढ़ गया। 

कोठी की आउटर बाउंड्री से लग कर एक बैल बैठा था जिसके अगले पैर पर घाव था जो शायद किसी गाड़ी के टक्कर मारने से हुआ था। घाव पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं, दर्द और मक्खियों से पहले से ही परेशान बैल को कोठी के सुरक्षाकर्मी वहाँ से हटाने की कोशिश कर रहे थे। कभी वो उसे लाठी और डंडों से कोंचते तो कभी उसके मुँह पर पानी फेंकते। 


“ऐsss!! छोड़ दो उसे,” निमित्त की आवाज़ किसी फटते बादल के समान गरजी। ऊपर खड़े थापा, कदम और इरा का ध्यान भी उस तरफ़ चला गया। 


“जानवर वो है, हरकतें तुम क्यों कर रहे हो जानवरों सी?” निमित्त इतने क्रोध में था कि सुरक्षाकर्मी सकपका गए। 


फिर अपना रुआब दिखाते बोले,

“यहाँ गंदगी करेगा तो हमें सुनना पड़ेगा और जवाब देना पड़ेगा ऊपर। तुमको क्या भई? तुम्हारा सगे वाला लगता है क्या,” 


निमित्त की आवाज़ सर्द थी, इतनी सर्द जितनी शायद अगर मृत्यु बोल पाती तो उसकी होती,

“हाँ लगता है मेरा सगे वाला, और जो निमित्त कालांत्री का सगा है उसे कष्ट पहुँचाने का अधिकार ब्रह्मा को भी नहीं,”


गार्ड दो कदम पीछे हुए। 


“अगर किसी ने भी इसपर लाठी उठाई तो मैं एक जादू दिखाऊँगा। उसकी वो लाठी ग़ायब हो जाएगी…दिखाई नहीं देगी लेकिन महसूस इतनी ज़्यादा होगी कि ना उठते बनेगा, ना बैठते…,”


निमित्त की चेतावनी गार्ड्ज़ को अपने हलक में अटकती महसूस हुई जिसे बड़ी मुश्किल से उन्होंने थूक के साथ घोंटा। 

निमित्त बैल की तरफ़ मुड़ा,

“का हो नंदी महाराज! हियाँ बाहर गाँव मा काहे ऐसी-तैसी करात हौवा आपण,” निमित्त यूँ बोला जैसे किसी पुराने बिछड़े दोस्त से मसखरी कर रहा हो। 


बैल ने अपनी जगह पर बैठे-बैठे सींग हिलाए। 


“अरे-रे-रे…चला ठीक बा…ग़ुस्साए मत। तनी बैठा हम आत हई,” निमित्त ने हंसते हुए बनारसी में कहा और अंदर की ओर बढ़ गया। सुभद्रा व ऊपर खड़े लोग उसे अचरज से देख रहे थे। 


“एक्स्क्यूज़ मी सुभद्रा, गॉटा टेक केयर ऑफ़ दिस बिग गाय,” कहते हुए निमित्त निचली मंज़िल की पैंट्री में दाखिल हुआ। 


“ये आख़िर कर क्या रहा है?” निचले क़द के डॉक्टर थापा उचक नीचे झांकने की कोशिश करते हुए बुदबुदाए। 


“शो-ऑफ़ है, शो-ऑफ़ कर रहा है,” कदम ने रूखे स्वर में जवाब दिया।


कुछ देर बाद निमित्त अंदर से एक बोल में गर्म पानी, मरहम पट्टी का सामान, और एक बाल्टी भर के भिगोए हुए मूँगफली-चने-गुड़ और ज्वार-बाजरे की रोटियाँ लिए हुए बाहर निकला। गिरीश बाबू की कोठी के पीछे ही उनका प्राइवेट घोड़ों का अस्तबल था जहां घोड़ों के खाने का इंतज़ाम कोठी की निचली पैंट्री में ही किया जाता था। 


निमित्त ने पहले बैल के घाव को साफ़ कर के उसपर मरहम-पट्टी की, फिर उसके साथ ही मूँगफली-चने-गुड़ और रोटी खाने बैठ गया। 


“ये साला गोवा में मैदे की रोटी खा-खा के दिमाग़ ख़राब हो गया है गुरु, अरे जब तक देसी शरीर को अनाज नहीं मिलेगा तो काम कैसे चलेगा? नहीं चलेगा ना…वही तो! अब देखो गुरु, हम दबाएँगे रोटी में देसी घी, गुड़, चना और मूँगफली, बाल्टी में जो बच रहा है तुम उस पर कॉन्सेंट्रेट करो,” बैल के पास पालथी मार के बैठे निमित्त ने रोटी को रोल की तरह लपेटा। 


बैल ने लपक कर उसके हाथ से रोटी रोल खा लिया। 


“वेरी चालाक ब्रो!” निमित्त शरारती अन्दाज़ में मुस्कुराया। 


लगभग एक घंटे तक निमित्त और बैल की चुहलबाज़ी चलती रही। सुभद्रा देख रही थी उस अजीब शख़्स को, जो ना तेरह साल पहले उसकी समझ में आया था और ना आज समझ आ रहा था। बस वो इतना जानती थी कि निमित्त शायद वो पहेली था जिसे बनाने वाला भी सुलझाने का तरीक़ा भूल गया है। 


एक घंटे बाद बैल उठ कर अपनी राह चल दिया। 


रात गहरा रही थी। 

बहुत समझाने और मिन्नतें करने पर भी निमित्त कमरे में सोने को तैयार ना हुआ और नीचे बाग़ीचे में पहुँच गया। जिस समय सुभद्रा निमित्त को गुडनाइट बोलने के लिए गार्डेन में पहुँची, वो और अल्फ़ा नीम के पेड़ के नीचे खड़े थे। निमित्त मुँह ऊपर उठाए हुए बात कर रहा था जैसे पेड़ पर कोई बैठा हो। जिसमें अल्फ़ा भी बीच-बीच में भौंक कर अपना पूरा योगदान दे रहा था। 


“भौं-भौं,”


“नहीं रे अल्फ़ा, अपन लोग बाद में आए ना! जो पहले से रह रहा उससे तो पर्मिशन लेना माँगता है,” निमित्त अल्फ़ा को समझाते हुए बोला। 


“एक काम करते हैं, अपनी-अपनी टेरिटॉरीज़ डिफ़ाइन कर लेते हैं…मैडम आप पेड़ के ऊपर सो जाइए, नो वरीज़। मैं और अल्फ़ा नीचे अजस्ट कर लेंगे, क्यों अल्फ़ा?” निमित्त पेड़ पर किसी से बोला फिर अल्फ़ा से मुख़ातिब हुआ।


“वुफ़्फ़,”


“किससे बात कर रहे हैं निमित्त?”  सुभद्रा ने कौतूहल से पूछा, “क्या स्कैली से?”


“अरे नहीं, ये पेड़ पर जो मैडम बैठी हैं उनसे,” निमित्त ने सहज भाव से ऊपर पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा। 


“प…पेड़ पर कौन बैठी है? क…कोई चुड़ैल है क्या?” सुभद्रा ने हिचकिचाते हुए नज़रें उठाईं। 


ऊपर पेड़ की डाल पर एक काली बिल्ली बैठी दिखाई दी जिसकी आँखें चमक रही थीं। 


“म्याऊँsss,”


“ये हैं मैडम किटी,” निमित्त बोला 

“किटी क्यों बोलता है ‘हौले’, पुसी क्यों नहीं बोलता?” स्कैली की आवाज़ आई। 


“वुफ़्फ़” अल्फ़ा यूँ भौंक जैसे स्कैली को डाँट रहा हो। 


“ए हौले, ये अपने खच्चर को समझा ले आजकल इसका ढ़ेंचू-ढेंचू बढ़ते ही जा रेला है,”


“स्कैली, दो मिनट के लिए चुप हो जा मेरे बाप,” निमित्त आवाज़ दबा कर स्कैली को डाँटते हुए बोला। 


सुभद्रा उसे और अल्फ़ा को देख कर मुस्कुरा रही थी। 


“निमित्त…” सुभद्रा कुछ बोलते-बोलते ठिठकी। 


निमित्त उसकी तरफ़ घूमा, उस घड़ी निमित्त की आँखों में किसी शरारती बच्चे सी चंचलता थी। 


“थैंक-यू…हर उस चीज़ के लिए जो आपने की है…कर रहे हैं,”


“मैंने कुछ भी नहीं किया, जो कुछ भी किया-धरा है वो मम्मी और महादेव का है, मैं तो बस ‘निमित्त’ मात्र हूँ,” निमित्त चेहरे पर मासूमियत और आँखों में शरारत लिए बोला। 


“देख रहे हैं डॉक्टर थापा। कभी बैल से बात करता है कभी बिल्लियों से, शामन किंग क्यों, खुद को सीधे-सीधे टार्ज़न…’जंगल जिम’ क्यों नहीं घोषित कर देता,” ऊपर बाल्कनी पर हाथ में जाम लिए खड़े कदम से चिढ़ते हुए कहा। डॉक्टर थापा की गर्दन सहमति में हिली। 


दोनों ऊपर से निमित्त के एक-एक क्रियाकलाप पर नज़र रखे हुए थे। 


“अपना और इरा का ख़याल रखना सुभद्रा। हालाँकि मुझे उम्मीद नहीं कि आज रात कुछ होगा, फिर भी चौकन्ना रहना और अगर कुछ भी गड़बड़ लगे तो फ़ौरन मुझे कॉल करना,” निमित्त सुभद्रा को हिदायत देते हुए बोला। 


सुभद्रा ने सैल्यूट के अन्दाज़ में निमित्त का आदेश तस्दीक़ किया। 

कुछ देर निमित्त से बात करने के बाद सुभद्रा सोने चली गई। डॉक्टर थापा और कदम भी अपने-अपने कमरों में चले गए। 


सबके सो जाने के बाद निमित्त ध्यान मुद्रा में बैठ गया। जाने कितनी ही देर वो अपनी इस ध्यान समाधि में डूबा रहा। उसकी तंत्रा बिल्ली के हल्के ‘परिंग’ साउंड से भंग हुई।


“क्या हुआ मिस किटी? क्या दिखा तुम्हें,” निमित्त ने ऊपर पेड़ की डॉल की तरफ़ चेहरा उठाते हुए पूछा। बिल्ली वहाँ नहीं थी, वो पहले ही उतर चुकी थी। 

निमित्त के बग़ल में अल्फ़ा चारों टांगें ऊपर किए हुए इत्मिनान से सो रहा था। 


“उठा इस गधे को, घोड़े बेच के सो रहा है,” स्कैली की आवाज़ आई। 

“सोने दो, हम चलते हैं,” निमित्त अपनी जगह से उठा और बिना आवाज़ चलते हुए कोठी की तरफ़ बढ़ा। 


ऊपर की मंज़िल पर, लॉबी में उसे एक साया विचरता नज़र आया। 


“डॉक्टर थापा!” निमित्त के होंठों से फुसफुसाहट निकली। 

“ऐ शालाsss…ये शाब’ज़ी थापा वूडू का पापा है?” स्कैली फ़ेक नेपाली ऐक्सेंट में बोला। 

“अभी पता नहीं, पर कुछ अजीब है…” निमित्त का ध्यान मशीनी अन्दाज़ में चलते थापा पर था। 

“हाँ, थोबड़ा तो अजीब है इसका..जैसे तेल में डूबे भटूरे पर मक्खन टपका दिया हो,”

“नहीं स्कैली, वो नहीं। इसकी चाल देखो…इसका चेहरा…ऐसा लग रहा है जैसे ये किसी के वश में है,” 

डॉक्टर थापा का चेहरा और आँखें पथराई हुई थीं। वो मशीनी अन्दाज़ में यूँ चल रहा था जैसे कोई रिमोट कंट्रोल से उसे चला रहा हो। चलते हुए थापा लॉबी के पिछली तरफ़ मुड़ गया। नीचे गार्डेन से थापा को फ़ॉलो करता हुआ निमित्त भी उस तरफ़ मुड़ा। 


ऊपर की फ़्लोर पर उस तरफ़ मल्हार का रूम था जहां उसे दो साये और खड़े नज़र आए। इनमें से एक मल्हार था जो काफ़ी तैश में नज़र आ रहा था और दूसरे साये से; जिसकी पीठ निमित्त की तरफ़ थी, धीमी आवाज़ में कुछ बात कर रहा था। डॉक्टर थापा अन दोनों की तरफ़ बढ़ा। थापा को देख कर मल्हार फ़ौरन अपने कमरे में घुस गया और रूम का दरवाज़ा बंद कर लिया। दूसरा साया भी पीछे मुड़ा और उसने ऊपर से नीचे छलांग लगा दी। लगभग बारह-चौदह फ़ीट की ऊँचाई से कूद कर भी साया बिना गिरे, बिना किसी खरोंच के नीचे लैंड हुआ। 


निमित्त इस पूरे घटनाक्रम के यूँ अप्रत्याशित मोड़ लेने के लिए तैयार ना था..और ना ही वो साया। उसके नीचे कूदते ही निमित्त और वो साया आमने-सामने पड़े। निमित्त उसके चेहरे, उसकी चमकती आँखों और उसकी वेशभूषा से ही समझ गया कि वो एक ओझा-तांत्रिक…एक शामन है। 


उस शामन ने भी निमित्त के उस घड़ी वहाँ होने की अपेक्षा ना की थी। उसके होंठों से निमित्त को देख कर सिसकारी निकली,


“द शामन किंग…!!” 


इससे पहले कि निमित्त कोई हरकत करता वो ओझा किसी छलावे की तरह कूदते-छलांग लगाते बारह फ़ीट की आउटर बाउंड्री वॉल लांघ कर ग़ायब हो गया। निमित्त ने उसके पीछे जाने की चेष्ठा ना की। उसने डॉक्टर थापा को देखा, जो वापस अपने कमरा में जा रहा था। 

फिर सब कुछ शांत हो गया। 


“पर्रर्रर्र” निमित्त के बूट पर काली बिल्ली ‘परिंग’ करते हुए लिपट रही थी। 


“थैंक्स मिस किटी, अब हमें भी सोना चाहिए,” निमित्त उसके फ़र सहलाते हुए बोला। 


उस रात और कोई दूसरा घटनाक्रम घटित ना हुआ। 


* * *  


निमित्त के कहे अनुसार गिरीश बाबू ने उसके लिए अगली सुबह एक क्रूज़ बाइक का इंतज़ाम करवा दिया था और सुबह दस बजे इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे से उसकी मीटिंग भी फ़िक्स कर दी गई थी। मोल्लेम से मडगाँव वाया रोड लगभग एक से डेढ़ घंटे का रास्ता है। निमित्त सुबह के आठ बजे ही कोठी से मडगाँव के लिए निकल गया। निमित्त क्रूज़ बाइक चला रहा था और उसके पीछे अल्फ़ा अपने अगले पंजे निमित्त के कंधे पर टिकाए इत्मिनान से बैठा था। 


वे मोल्लेम से पंजिम-बेलगाम रोड पर बामुश्किल आधा-एक किलोमीटर आगे बढ़ा होगा कि सुनसान इलाक़े में बाइकर्स का एक क़ाफ़िला उसके साथ-साथ चलने लगा। गोवा, ख़ासकर पंजिम-बेलगाम हाई-वे पर बाइकर्स का क़ाफ़िला आम बात है जो गोवा और वेस्टर्न घाट्स के बीच रोड-ट्रिप करते हैं लेकिन इस बाइकर क़ाफ़िले के आते ही निमित्त के सिक्स्थ सेंस ने उसे ख़तरे के संकेत दिए। निमित्त ने बाइक की स्पीड बढ़ाई। रियर-व्यू मिरर रिफ़्लेक्शन में उसे बाइक सवारों के पास हॉकी स्टिक, बेसबॉल बैट, क्रिकेट बैट इत्यादि नज़र आए। छे बाइक्स पर क़ुल बारह गुंडे सवार थे। इनमें से कुछ ने हाथ में मोबाइल-फ़ोन लेकर वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन कर रखी थी। 


“वुफ़्फ़-वुफ़्फ़” अल्फ़ा जैसे निमित्त को आगाह करने के लिए भौंका। 


“जानता हूँ अल्फ़ा, ये बारात हमारे लिए सजी है लेकिन बारात में नाचने आए इन हिजड़ों से हम उलझ नहीं सकते,”


“क्या बोल रहा है हौले? बाइक रोक और इनमें से एक-एक के घर की लेडीज़ लोग का हाल-चाल ले ले…क़ायदे से,” स्कैली की आवाज़ आई। 


“नहीं कर सकता स्कैली। गिरीश बाबू की वॉर्निंग याद है ना? एक और कॉंट्रवर्सी और मुझे यहाँ से जाना होगा। इनका इस तरह मेरी ताक में बैठना और मोबाइल में वीडियो रिकॉर्ड करना बताता है कि मेरी टिप इन्हें किसी घर वाले ने दी है..शायद मल्हार ने। मैंने इनमें से किसी एक को हाथ भी लगाया तो ये लोग उसका वीडियो वायरल कर देंगे। हमारे पास ऑप्शन नहीं…”


निमित्त की बात पूरी नहीं हो पाई। उससे पहले ही लाल बाइक पर सवार गुंडे ने; जो बाक़ियों का लीडर लग रहा था, बैट बूमरैंग की तरह घूमा कर फेंका। बैट निमित्त की बाइक के पिछले टायर से टकराया। गाड़ी साँप की तरह लहराई। भरसक कोशिश के बावजूद निमित्त ने बाइक पर अपना कंट्रोल खो दिया। बाइक बुरी तरह स्किड हुई। निमित्त और अल्फ़ा ने जम्प लगा दी। अल्फ़ा सही-सलामत लैंड हुआ पर निमित्त की कुहनियों और घुटनों पर अच्छी-ख़ासी चोटें आयीं। 


जब तक निमित्त सम्भाल कर खड़ा हुआ बाइक सवारों ने उसे घेर लिया। लाल बाइक वाला, जो देखने में कोई चरसी-हिप्पी लग रहा था कूद कर नीचे उतरा। 

“हिहिही…अरे कोई बोलो अपने कालांत्री को…इन सब चीजों में कुछ नहीं रखा। जाओ भईया, कोई नौकरी धंधा ढूँढो। ज़ोमैटो, ब्लिंक-इट, या पैसे हों तो ओला-उबर का काम करो। इज़्ज़त की रोटी कमाओ, नाम जपो, किरत करो, संघ चक्कों …हिहिहिही…हाहाहाहा,” हिप्पी निमित्त को मॉक करते हुए बोला। 


“गर्रर्रर्र…sss…” अल्फ़ा के जबड़े भिंच रहे थे। 


“नो अल्फ़ा, सिट।” निमित्त की बर्फ़ सी सर्द आवाज़ आई। अल्फ़ा चुप-चाप बैठ गया। 


“हेहेहे…ही नीड्ज़ फ़्रेंड्ज़ गाइज़…हिहिही…ही नीड्ज़ हेल्प…हाहाहा,” हिप्पी फिर पागलों सा बड़बड़ाया, “देख कालांत्री, बंद कर ये ड्रामेबाजी और वापस लौट जा। जा के अपने दिमाग़ का इलाज करवा। तेरे गुरु ने तो तुझे लात मार के निकाल दिया है, अब कोई नौकरी-धंधा ढूँढ, ऐसे तेरे जैसे पागल को कोई काम भी नहीं देगा, ऐसा कर पंचर बनाने की दुकान खोल ले, चार पैसे कमा, यहाँ से कट ले,”


“नाम क्या है तेरा?” निमित्त ने भावहीन स्वर में सवाल किया। 


“हेहेहे…ही आस्क्स माय नेम…ही नीड फ़्रेंड्ज़…हाहाहा…जुपे..द नेम इज़ जोंस…जुपे जोंस,”   चरसी पागलों के जैसे डोलते हुए बोला। 


“देख भाई जुपे-चूपे…तू जो भी है, ज्ञान और गां$ बिना माँगे फैलाने वाले की कोई इज़्ज़त नहीं रहती…और तू ऑलरेडी काफ़ी फैला चुका है। अब समेट और निकल ले यहाँ से। तुझसे मेरी कोई अदावत नहीं, जबरन उड़ता तीर मत ले,” निमित्त सर्द भाव से बोला। 


किसी भांग खाए बंदर की मानिंद झूमता जुपे एक पल को स्थिर हुआ। उसने निमित्त को घूरा फिर पागलों की तरह हंसने लगा। 


“हिहिहिही…हेहेहेहे…हाहाहाहा,”


“भड़ाक!!” जुपे के हाथ में थमा बैट निमित्त के चेहरे से पूरे फ़ोर्स से टकराया। निमित्त के मुँह में खून का खारा स्वाद भर गया। 


“वुफ़्फ़..” अल्फ़ा ने गरजते हुए जुपे पर अपने जबड़े फाड़े। 


“अल्फ़ा नो!!” निमित्त खून थूकते हुए बोला। 


“हिहिहिही…हाहाहाहा…ही नीड्ज़ हेल्प…डोंट गिव हिम हेट…डोंट हेट हिम गाइज़…ही नीड्ज़ हेल्प…ही नीड़ फ़्रेंड्ज़…हाहाहाहा..”पागलों की तरह फ़्रेज़ लूपिंग करते हुए जुपे ने पूरे फ़ोर्स से बैट निमित्त को दे मारा। निमित्त अपनी जगह से एक इंच भी ना हिला, बैट दो टुकड़ों में बंट गया। 


“रिकॉर्डिंग ऑन रखो। सारे एक साथ घेर के मारो इसे…तब तक मारो जब तक हाँ तो ये हाथ ना छोड़ दे या अपनी जान की भीख ना माँगने लगे,” अपना आपा खोया जुपे इतनी ज़ोर से चिल्लाया कि उसकी आवाज़ फट गई। 


“अल्फ़ा तू निकल यहाँ से,” निमित्त ने अल्फ़ा को आदेश दिया। अल्फ़ा टस से मस ना हुआ। 


“अल्फ़ा मेरी बात सुन…जस्ट गो!!” निमित्त चिल्लाया। अल्फ़ा अपनी जगह से ना हिला। 


“क्या कर रहा है हौले!! मार ना…चीर डाल इन्हें टांग पे टांग चढ़ा के,” स्कैली की आवाज़ गूंजी। 


“आज नहीं स्कैली। ये यही चाहते हैं…और हिजड़ों के चाहने से “निमित्त” नहीं बदलता,”


“धाड़-ताड़-धड़ाक” चारों तरफ़ से रॉड, हॉकी, बैट एक-साथ निमित्त के जिस्म से टकराए। बारह के बारह गुंडे एक-साथ मिल कर निमित्त को मारने में अपनी पूरी ताक़त झोंक रहे थे, जैसे गीदड़ों और सियारों का झुंड किसी सिंह को गिराने की कोशिश कर रहा हो। उनके फ़ोन कैमरा निमित्त पर तने हुए। 


“हाहाहा…शामन किंग…हाहाहा…द शामन किंग है ये…हाहाहा…क्या हुआ शामन किंग जी? कहाँ गई आपकी अलौकिक शक्तियाँ?” जुपे निमित्त के चहरे पर ताबड़-तोड़ घूँसे बरसात हुआ बोला। 


“रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः
उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः
भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः
ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः” 

निमित्त के मुँह से रक्त रंजित महाकाल स्तोत्र के स्वर निकले। 


“गिराओ इसको…ये मुझे खड़ा नहीं दिखना चाहिए,” अपनी हीनता पर विक्षिप्त हुआ जुपे चिल्लाया। 

उन बारह गुंडों के सम्मिलित प्रहार भी उस एक शख़्स को डिगा ना पाए। शर्ट फट कर सामने से खुल गई थी, नाक और मुँह से ख़ून बह रहा था। जिस्म पर जगह-जगह चोटें गहरी छाप छोड़ रही थीं…लेकिन उसका चेहरा! एक शिकन तक नहीं। कोई भाव नहीं। और उसकी आँखें…अंतरिक्ष के स्याह विवर(ब्लैक होल) में उतनी कालिमा और गहराई ना होगी जो प्रकाश को सोख कर लील जाता है जितनी उस समय निमित्त की पुतलियों में थी। 


“सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः
अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः
स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः
परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते
पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते”


“गड़-गड़-गड़-गड़” 

एकाएक धरती काँपी, जैसे भीषण भूकम्प धरा का सीना चाक करना चाहता हो। हाँ भूकम्प ही तो था वो। क्रोध का प्रलयनाद। रौद्र और अद्भुत। अकल्पनीय और प्रचंड। 


“भड़ाम” एकाएक जैसे कोई उल्कापिंड फट पड़ा हो। गुंडों की फ़ौज छितर गई। चारों ओर रुदन और चीत्कार मच गया। 

वो गाय और बैलों का एक हुजूम था जो बिदक कर उधर से गुज़र रहा था। इतना बड़ा, उद्दंड, उग्र, रौद्र और प्रचंड समूह जिसके आगे उनके हॉकी, बैट फेल थे। किसी का सिर खुरों से रौंदा गया तो किसी के पेट में बैल ने सींग घुसेड़ दिए। 


सर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुते
ब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुते
रूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुते
स्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमः
नमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमः
हुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमः


निमित्त अपने स्थान से तिनका भर भी ना हिला। वो यूँ ही खड़ा रहा, महासागर सा गहरा और अनंत, अपने अंदर असंख्य ज्वारभाटा समेटे और पर्वत सा अडिग व अचल। उसके अग़ल-बग़ल से भागता हुआ झुंड हुंकार भरते गुज़र रहा था। 

झुंड गुज़र जाने के बाद पीछे गुंडों का मलीदा छूटा। जिसके बीच किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी। जुपे अपने मल-मूत्र, रक्त और कीचड़ में लिसड़ा छटपटा रहा था, किसी बैल ने उसकी टांगों के बीच सींग घुसेड़ दिए थे। अंतड़ियाँ बाहर निकल रही थीं, अंडकोश फूट कर लटके हुए थे, दृश्य इतना विभत्स था कि कमजोर दिल का इंसान बर्दाश्त ना कर पाए। 


निमित्त लड़खड़ाता हुआ, अपने घायल पैर को घसीटता हुआ जुपे के पास पहुँचा। जुपे का चेहरा अब उनकी विक्षिप्त हंसी से नहीं बल्कि घोर पीड़ा से विकृत था। निमित्त उस घड़ी उसे किसी भेड़िए जैसा नज़र आया, जो इत्मिनान से, मंद गति से अपने शिकार की तरफ़ बढ़त है। जुपे ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला, शायद दया की भीख माँगने के लिए लेकिन अल्फ़ाज़ की जगह ढेरों खून उगल दिया। निमित्त उसके पास आकार घुटनों पर बैठा। 


“फ़िक्र मत कर जुपे…तू मरेगा नहीं…इनमें से कोई नहीं मरेगा। जीवन और मृत्यु देना मेरा अधिकार नहीं…मैं तो “निमित्त” मात्र हूँ। अब से लेकर अपने जीवन के अंतिम क्षण तक तुम लोग अपने पाप कर्मों का प्रायश्चित करोगे ताकि अगले जन्म में तुम्हारे प्रारब्ध कर्म कलुषित ना हों…महादेव तुम्हें सद्गति और सन्मार्ग प्रदान करें…नाम जप करो,”

निमित्त लड़खड़ाते हुए उठा, अब उसकी टांगें जवाब दे रही थीं। सिर बुरी तरह घूम रहा था। अल्फ़ा उसे सम्भालने की कोशिश कर रहा था पर यह अल्फ़ा के वश की बात नहीं थी।


 निमित्त को लगा उसका शरीर उसके दिमाग़ के वश में नहीं है। वो पीछे गिरने को हुआ। पर पीछे से किसी ने उसे सहारा दे दिया। निमित्त ने बहुत मुश्किल से अपनी बंद होती आँखें खोल कर सहारा देने वाले को देखने की कोशिश की। हल्के भूरे रंग के उस बैल ने नीचे गिरते निमित्त को अपने सिर का सहारा दे कर सम्भाल लिया था। उस बैल के पैर पर अब भी वो पट्टी बंधी थी जो निमित्त ने पिछली रात बांधी थी। 


“वेरी चालाक…ब्रो…” निमित्त धीमी आवाज़ में बोला। 

बैल ने उसे अपनी पीठ पर कैसे चढ़ाया ये निमित्त को याद नहीं, कुछ देर बाद वो बैल अपनी पीठ पर अर्धमूर्छित निमित्त को बिठाए वापस कोठी की ओर बढ़ रहा था, अल्फ़ा उसके साथ-साथ चल रहा था और दूर ऊँची झाड़ियों के पीछे से दो चमकदार आँखें उस विचित्र क़ाफ़िले को जाते देख रही थीं। झाड़ियों के पीछे से एक ऊँची आकृति बाहर निकली। वो एक ग्रे-वुल्फ़ था। 


“शामन किंग…आह्ह….हाहाहा…शामन किंग है वो…हाहाहा…आह्ह,” जुपे की दर्द से विकृत आवाज़ निकली। 


* * * 


“आचार्य जी की जय…जय महाकालsss” उन्मादित भीड़ आश्रम के बाहर जय-जयकार कर रही थी। 


आचार्य संजीव गौतम के दर्शन के लिए कई घंटों से प्रतीक्षा करते भक्त अब थकान से चूर अवश्य थे लेकिन उनकी आस्था में कोई कमी ना आई थी। हर कुछ देर में अपने ‘जुनून’ का प्रदर्शन करने और अपने गुरु, अपने भगवान को प्रसन्न करने के लिए वो जयघोष करते। 


“आचार्य जी की जय…जय महाकालsss”


“शांत कराओ इन हरामख़ोर जाहिलों की फ़ौज को,” आश्रम के गर्भ-गृह में बैठे आचार्य संजीव गौतम ने बार-बार आते भीड़ के शोर से चिढ़ कर झल्लाते हुए आदेश दिया। 


धरती के समान गोल घेराव वाला एक शिष्य, जिसके चेहरे से ही चापलूसी, चाटुकारिता और घोर काइयाँपन टपकता था, हड़बड़ा कर उठा और अपने मोटे लेंस वाले चश्मे से बटन जैसी गोल और मक्कारी से भरी आँखें भिंचकाते हुए बोला,


“आप फ़िक्र ना करें गुरु जी, हम हैं ना। सब सम्भाल लेंगे,” 


यह आचार्य संजीव गौतम का पी.आर. मैनेजर और स्पोक्सपर्सन था। अपने थुलथुले, चर्बी से झूलते शरीर को मुश्किल से हिलाता हुआ वो गर्भ-गृह से बाहर निकल गया। गर्भ गृह के एक अंधेरे कोने से एक आवाज़ आयी। एक दोहरी आवाज़ जो मर्द और औरत दोनों की प्रतीत हो रही थी,


“कालांत्री का पता लग गया है। गोवा में है। मंत्री गिरीश रायकर के यहाँ डेरा डाले है। जुपे जोंस नाम के एक लोकल गुंडे और उसके गैंग को भेजा था कालांत्री से डील करने। पता नहीं कैसे…साले ने पूरे गैंग को आई.सी.यू. पहुँचा दिया,” 


“पागल भेड़िए का शिकार करने के लिए भाड़े के भांड नहीं भेजे जाते मंथन!”


“चटट-चटट-चटट” किन्नरों जैसी तालियाँ फोड़ने की आवाज़ अंधेरे में गूंजी और अंधकार से जैसे परछाई की कालिमा इंसानी रूप लेकर निकली हो ऐसे मंथरा प्रकट हुई,


“भेड़िया नहीं…कुत्ता…हिहिही…विकृत कुक्कुर….हाहाहा…आप फ़िक्र मत करिए, इस विकृत कुक्कुर का शिकार मंथरा खुद करेगी,”


कहानी जारी है 

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