ॐ नमः हरिहराय
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ॐ नमः हरिहराय
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नितिन के. मिश्रा
31st December. Western Ghats. Goa, India.
“मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूँ…,”
“पैलेस की सिक्योरिटी डबल कर दी है सर, हम सीसीटीवी रिकॉर्डिंग चेक कर रहे हैं जिसने भी ये किया है वो बच नहीं…”
“सर…” मॉनिटर पर नज़रें गड़ाए बैठा कमांडो चिल्लाया।
उस बंद कमरे में मौजूद हर निगाह पहले कमांडो के सफ़ेद पड़े चेहरे पर और फिर उसकी विस्मय से पथराई आँखों से होती हुई मॉनिटर स्क्रीन पर गयी जहाँ रिकॉर्डिंग का एक सेगमेंट लूप रिप्ले हो रहा था।
रिकॉर्डिंग में एक तेरह साल की बच्ची नज़र आ रही थी जो की मार्बल स्टैच्यू जैसी जड़वत खड़ी थी और पथराई आँखों से अपने सामने ख़ाली वुडेन टेबल की तरफ़ देख रही थी। अगले ही पल कमरे की बड़ी फ़्रेंच विंडो का पर्दा हवा में लहराया और टेबल पर एक 6x8 इंच का आयताकार बक्सा जैसे पलक झपकते हवा में प्रकट हो गया। स्तब्ध खड़ी लड़की आगे बढ़ी, सीसीटीवी ग्रेनी वीडियो आउटपुट में भी उसके चेहरे और आंखों में झांकता डर साफ़ झलक रहा था। लड़की के काँपते हाथों ने बॉक्स लिड खोली और लीड खोलते ही उसके अंदर जो था उसे देख कर लड़की पागलों के समान बुरी तरह चीखी।
चीख सुन कर रूम का दरवाज़ा तेज़ी से खुला और घबरायी हुई सुभद्रा भीतर दाखिल हुई। वीडियो लूप बार-बार यहीं ख़त्म हो रहा था।
“आउट…नाउ,” कदम के आदेश पर सीसीटीवी ऑपरेट करता कमांडो फ़ौरन उठ कर वहाँ से बाहर निकल गया।
“किसे पकड़ोगे कदम? कैसे पकड़ोगे?” आवाज़ की थरथराहट गिरीश बाबू की मनःस्थिति स्पष्ट बयान कर रही थी। दरवाज़े की चौखट पर खड़े लगभग साठ साल के गिरीश बाबू के एक हाथ में वही वुडन बॉक्स था जो वीडियो फ़ुटेज में लड़की ने खोला था।
“सर!” कदम की चौकन्ना आवाज़ गूंजी जो गिरीश बाबू को किसी लंबी सुरंग के दूसरे छोर से आती मालूम दी।
गिरीश बाबू का शरीर सुन्न पड़ रहा था। उस घड़ी जैसे उनके दिमाग़ को नीचे मार्बल फ्लोर की तरफ़ तेज़ी से गिरते उनके जिस्म की तनिक भी परवाह नहीं थी। अगर चीफ़ सिक्योरिटी ऑफ़िसर कदम ने सही वक्त पर गिरीश बाबू को थाम ना लिया होता तो यकीनन उन्हें मुँह के बल गिरने से गंभीर चोटें आती, पिछली बार से भी कहीं गंभीर।
“डैड!” उस सुरंग के पार से मल्हार की आवाज़ भी सुनाई दी।
और साथ ही डॉक्टर थापा की, “पल्स डिप हो रही है। कदम, इन्हें फ़ौरन बेडरूम में लिटाओ मैं एम्बुलेंस बुलाता हूँ,”
गिरीश की शर्ट के बटन खुले और सीने पर स्थेटोस्कोप का मैटेलिक ठंडा स्पर्श महसूस हुआ।
“न…नहीं। मैं कहीं नहीं जाऊँगा, इरा को छोड़ कर कहीं नहीं जाऊँगा,” गिरीश की आवाज़ भले ही धीमी थी लेकिन इस कदर सर्द और आदेशात्मक थी। वहाँ मौजूद हर शख़्स जानता था कि उनकी बात काटी नहीं जा सकती।
“मुझे मेरे रूम में ले चलो,”
डॉक्टर थापा, कदम और मल्हार ने सहारा देकर उन्हें उठाया। परेशान हाल सुभद्रा उनके पीछे-पीछे चल रही थी।
दो मिनट बाद गिरीश बाबू अपने रूम में थे। बॉक्स अब भी उनके साथ था।
“तुम चारों के अलावा मुझे किसी पर भरोसा नहीं है…सच कहूँ तो शायद ख़ुद पर भी नहीं। सिचुएशन तुम चारों अच्छी तरह जानते हो…मेरी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करना…”
“अभी आपको रेस्ट करना चाहिए, हम बाद में बात…”
“मेरी बात बीच में मत काटो थापा,”
रूम में सन्नाटा छा गया।
“इरा से ज़्यादा ज़रूरी अभी कुछ भी नहीं,” गिरीश बाबू कलप कर बोले।
पूर्ववत सन्नाटा व्याप्त रहा।
“तुम सब ने अपनी आँखों से देखा ना वो वीडियो फ़ुटेज भी और उस बॉक्स में जो है वो भी। अब शक की कोई गुंजाइश नहीं कि जो कुछ भी हो रहा है उसके पीछे पारलौकिक शक्तियां और इस परिवार को तेरह साल पहले लगा शाप है जिसकी क़ीमत मेरी इरा चुका रही है,” गिरीश बाबू ने यह वाक्य वहाँ उपस्थित लोगों से ज़्यादा जैसे ख़ुद से कहे।
“मैं पारलौकिक शक्तियों में नहीं मानता गिरीश बाबू, और मान लीजिए ऐसा कुछ हो भी तो अदृश्य शक्तियां वो सब कुछ कैसे रखेंगी जो उस बॉक्स में है,” डॉक्टर थापा ने तर्क देते हुए कहा, हालांकि उसकी आवाज़ में संशय स्पष्ट झलक रहा था।
“मैं डॉक्टर थापा से सहमत हूँ, सर। मुझे भी लगता है कि इस सब के पीछे कोई इंसान है। बेहद शैतानी और विकृत मानसिकता वाला इंसान।” कदम डॉक्टर थापा के कथ्य का समर्थन करता हुआ बोला।
ठीक उसी समय कॉरिडोर में एक तेज़-तीखी चीख गूंजी।
“डैडीsss….”
चीख की तीव्रता इतनी अधिक थी कि रूम के शीशम के मोटे दरवाज़े को भेदते हुए भीतर तक गूंजी।
“इरा…मेरी बच्चीsss” गिरीश बाबू का कलेजा चीख पर लरजा।
उस पल में गिरीश बाबू जैसे इरा के अतिरिक्त बाक़ी सब भुला बैठे। अपनी शारीरिक अवस्था भी। उनकी काँपती टाँगें भारी-भरकम बदन का जितना बोझ ले पायीं उसकी लिमिट पुश करते हुए वो बगुले की भाँति बेड से उछले और अगले ही पल रूम का दरवाज़ा खोल कर कॉरिडोर में दौड़ लगा दी।
बाकियों में से किसी ने भी उन्हें रोकने की कोशिश नहीं की, बल्कि बाक़ी लोग भी फुर्ती से गिरीश बाबू के पीछे लपके।
गिरीश बाबू के बगल वाले रूम के पीछे से कुछ अजीब आवाज़ें आ रही थीं। जैसे किसी जानवर का गला तीखे धारदार हथियार से रेता जा रहा हो। गिरीश बाबू ने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की लेकिन सफल ना हुए।
“डोर अंदर से लॉक्ड है,”
“आप साइड हट जाइए सर, मैं देखता हूँ,” कदम अपनी शर्ट स्लीव्स रोल करते हुए बोला।
वहाँ मचा कोलाहल सुन कर कुछ सिक्योरिटी कमांडो कॉरिडोर की तरफ़ बढ़े।
“उन्हें रोको कदम। पता नहीं अंदर क्या देखने को मिलेगा,” गिरीश बाबू डूबती आवाज़ में बोले।
कदम की आँखों का इशारा ही कमांडोज़ के लिए काफ़ी था। कमांडोज़ पहले अपनी जगह ठिठके और फिर वहीं से वापस घूम गए।
अंदर से आती आवाज़ें हर पल बदल रही थीं। कुछ देर पहले बलि दिए जाते जानवरों के रंभाने की आवाज़ अब हल्की फुसफुसाहट में तब्दील हो गई थी, जैसे कोई प्राचीन, लुप्त हो चुकी अनजानी भाषा में मंत्र बुदबुदा रहा हो।
“जल्दी करो कदम!!” गिरीश बाबू असहाय भाव से चिल्लाए।
कदम और डॉक्टर थापा ने दरवाज़ा तोड़ना शुरू किया। शीशम का मज़बूत दरवाज़ा इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। कदम ने एक नज़र मल्हार पर डाली। मल्हार इत्मीनान से पैंट पॉकेट में हाथ डाले खड़ा था, उसने आगे बढ़ने या कदम और डॉक्टर थापा का साथ देने की कोई चेष्टा नहीं की।
ये उस दबे गुस्से का असर था जो उस पल कदम को मल्हार पर आया था या फिर गिरीश बाबू की अवस्था और इरा की सलामती की फ़िक्र, उसके अगले दो धक्कों के आगे दरवाज़े की चिटकनी जवाब दे गई। सभी धड़धड़ाते हुए अंदर दाखिल हुए।
रूम के बीचों-बीच लगे लार्ज साइज़ राउंड बेड के ऊपर वही लड़की खड़ी हुई थी जो सीसीटीवी वीडियो में थी। उसके चेहरे के एक्सप्रेशन डिस्टॉर्टेड थे, आँखें कटोरियों में लगभग पीछे को पलटी हुई और जिस्म अकड़ा हुआ।
“आ गया गिरीश बाबू। कैसा लगा अपनी बेटी का लहू सूंघ के?” लड़की के गले से घरघराहट के साथ जो आवाज़ निकली वो किसी बच्ची की नहीं थी। भारी, अस्पष्ट और घरघराहट के साथ उसके गले से आती आवाज़ की पिच कभी ऊँची तो कभी हल्की फुसफुसाहट सी होती जिसमें शब्द समझने मुश्किल हो जाते।
“इरा! मेरी बच्ची! क्या हो रहा है तुझे…” गिरीश बाबू ने चीख कर अपने कदम आगे बढ़ाए जो अगले ही पल थमे और पीछे खींच लिए गए।
“इसके पास आने की कोशिश की तो इसके जिस्म की हड्डियां मांस फाड़ कर बाहर निकलेंगी,” चेतावनी के साथ इरा के अंग अप्राकृतिक कोणों पर मुड़ने लगे।
“तेरी बेटी रजस्वला हो गई है गिरीश बाबू। तेरह साल इंतज़ार किया है मैंने इस पल का। तेरे वंश का विनाश अब शुरू होता है।”
“कौन हो तुम? मेरी इरा के साथ क्या किया है तुमने?”
“अब तक कुछ नहीं किया, पर अब इसके साथ ऐसे कृत्य किए जाएँगे कि इसका हाल देख कर तेरी अंतरात्मा कलप उठेगी,”
लड़की के अकड़े हुए हाथ उसकी स्कर्ट के निचले सिरे पर कसे और उसे ऊपर उठाने लगे।
“देख इसे देख कर तेरी बूढ़ी रगों में उबाल आता है क्या,”
इरा की स्कर्ट उसकी जांघों तक उठी। गिरीश बाबू, कदम, डॉक्टर थापा और मल्हार ने नज़रें फेर लीं।
“इधर देखो सब,” इरा के रूँधे गले से आदेश गड़गड़ाते हुए निकला। उसके अकड़े हुए हाथ यूँ ठिठक रहे थे जैसे रुक जाने की तीव्र चेष्टा कर रहे हों लेकिन कोई अदृश्य शक्ति उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे रुकने नहीं दे रही। इस स्ट्रगल में इरा का जिस्म मिर्गी के मरीज़ सा थर्राने लगा।
“नहींsss…” इससे अधिक सहन करने की क्षमता सुभद्रा में ना थी। वो चीखते हुए आगे बढ़ी और बेड पर रखे ब्लैंकेट से इरा को लपेट दिया। एकाएक इरा का जिस्म ढीला हुआ और वो अपने होश खो कर सुभद्रा के कंधे पर झूल गई। गिरीश बाबू, कदम और डॉक्टर थापा फुर्ती से आगे बढ़े। बेहोश इरा को सावधानीपूर्वक लिटा दिया गया।
“एक्सट्रीम शॉक से कोलैप्स कर गई है। इसे ऑब्जर्वेशन में रखना होगा,” डॉक्टर थापा ने बेहोश इरा की पल्स चेक करते हुए कहा।
“ये कहीं नहीं जाएगी, बेस्ट डॉक्टर्स की टीम बुलाओ थापा, जो भी फ़ैसिलिटी और इक्विपमेंट चाहिए सब यहीं इनस्टॉल करो,” गिरीश बाबू ने आदेशात्मक अंदाज़ में फ़रमान जारी किया।
डॉक्टर थापा ने अनिच्छित रूप से स्वीकृति में सिर हिलाया।
“इसके अलावा….” गिरीश बाबू कहते हुए बीच में ठिठके, फिर थोड़ा रुक कर बोले, “किसी साइकिक को भी बुलाओ,”
“आपका मतलब है किसी साइकिएट्रिस्ट को?”
“क्या ये तुम्हें किसी साइकिएट्रिस्ट के वश का रोग लगता है थापा? हमें कोई सिद्ध तंत्रिका चाहिए। एक पहुँचा हुआ शामन जो पारलौकिक शक्तियों का सामना कर सके,”
“ये आप क्या कह रहे हैं सर,” भौंचक होते हुए कदम बोला।
“तो और क्या कहूँ?” इस बार गिरीश बाबू की आवाज़ में एक असहाय और बेबस पिता का दर्द साफ़ झलक रहा था, “तुम लोगों ने देखी ना मेरी इरा की हालत! बताओ, क्या वो आवाज़, लहजा और हरकत मेरी मासूम बच्ची की थी?”
कोई जवाब ना आया।
“या तो इरा पोजेस्ड है या फिर किसी ने उसपर वशीकरण किया है। सच का पता लगाने के लिए ऐसा व्यक्ति चाहिए जो काले जादू और ऐसी शक्तियों का एक्सपर्ट हो,”
“ये बहुत बड़ा रिस्क होगा सर, ऐसे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। मुझे तो ऐसे सभी लोग फ्रॉड लगते हैं, लेकिन अगर मान लें कि कोई सही जानकार मिल भी गया तो इसकी क्या गारंटी है कि वो इरा की सिचुएशन और आपकी पोजीशन का ग़लत फ़ायदा नहीं उठाएगा?”
“कदम ठीक कह रहा है गिरीश बाबू, बात अगर एक बार बाहर निकली तो जंगल की आग के जैसे फैलेगी। आपका नाम, रेप्यूटेशन, पॉलिटिकल करियर, सब बर्बाद हो जाएगा,”
“अपनी इरा के लिए मैं सब गँवाने को तैयार हूँ थापा, मेरी इरा बचनी चाहिये,”
“इस लड़की का दिमाग़ ख़राब है। पागल है ये, बिल्कुल अपनी माँ की तरह,…” अब तक चुप खड़ा मल्हार चिढ़ कर बोला।
“मल्हार!” गिरीश बाबू की क्रोध से काँपती आवाज़ गरजी।
मल्हार ने यूँ दाँत पीसे जैसे अपने मन से उमड़ते शब्दों को बड़ी मुश्किल से बाहर निकालने से रोक रहा हो, फिर वो एकाएक पलटा और अपने पीछे दरवाज़ा तेज़ आवाज़ में पीटते हुए वहाँ से निकल गया। उसकी इस हरकत पर किसी ने भी तवज्जो ना दी जैसे उससे ऐसा ही कुछ अपेक्षित था।
“मैं किसी को जानती हूँ जो हमारी हेल्प कर सकता सकता है,” सुभद्रा गंभीर स्वर में बोली।
“कौन?” गिरीश बाबू की आँखों में आई आस उनकी आवाज़ से झलकी।
सुभद्रा कुछ पल ठिठकी, जैसे उस नाम को ज़ुबान पर लाने के लिए काफ़ी हिम्मत जुटाने की ज़रूरत हो उसे।
“निमित्त…निमित्त कालांत्री,”
“व्हॉट! नो! आई स्ट्रॉंगली डिसएग्री। वो आदमी ख़ुद आधा पागल है। जिसे ख़ुद मेंटल एसाइलम में होना चाहिए वो इरा की ट्रीटमेंट क्या करेगा?” डॉक्टर थापा ने सुभद्रा के प्रस्तावित नाम का पुरज़ोर खंडन करते हुए कहा।
“डॉक्टर थापा सही कह रहे हैं सर। मुझे इस तरह का काम करने वाले सभी ढोंगी और पाखंडी ही लगते हैं उसमें ये आदमी सबसे बड़ा पाखंडी है,” कदम भी अपना मत रखते हुए बोला।
गिरीश बाबू कुछ पल खामोश रहे, जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहे हों।
“निमित्त कालांत्री…ये नाम सुना-सुना लग रहा है, पर ठीक से याद नहीं आ रहा,”
“आचार्य संजीव गौतम का चेला था। दो साल पहले इसके ऊपर धोखाधड़ी, चार सौ बीसी और ग़ैर इरादतन हत्या का केस हुआ था। मीडिया ने इस मामले को काफ़ी तूल दी थी लेकिन साक्ष्यों के अभाव में कुछ साबित नहीं हो सका और ये कालांत्री बच निकला। उसके बाद से ये कहाँ है, क्या कर रहा है, इसका पता-ठिकाना कहाँ है कोई नहीं जानता,” कदम नपे-तुले शब्दों में बात रखते हुए बोला।
“आचार्य संजीव गौतम…वो “आर्ट ऑफ़ लव, पर्सनल हीलिंग एंड अवेकनिंग” वाले?” गिरीश बाबू दिमाग़ पर ज़ोर डालते हुए बोले।
“ऐन वही। कालांत्री एक समय में इनका स्टार डिसिपल था, फिर लालच और अपने गुरु से बड़ा बनने की ज़िद ने इसका दिमाग़ ख़राब कर दिया,”
गिरीश बाबू ख़ामोश हो गए। उनकी आँखों में जो आस सुभद्रा ने जगायी थी वो उनके चेहरे के साथ बुझ गई। सुभद्रा ने अपनी बात पर कोई तर्क ना करते हुए जैसे पराजय स्वीकार ली और बेड पर बेहोश लेटी इरा का सिर स्नेहपूर्वक सहलाने लगी। सुभद्रा की आँखें भर आईं।
“तुम इस…निमित्त कालांत्री को कैसे जानती हो?” गिरीश बाबू ने सवाल किया।
“कॉलेज में मेरा सीनियर था…मैंने देखा है सर ये आदमी क्या कर सकता है,”
गिरीश बाबू की नज़रें बेहोश इरा से होते हुए सुभद्रा की छलछलाई आँखों तक गईं। वो आँखें ममता और करुणा से छलछलाई थीं पर उनमें कोई छल नहीं था।
“याद है सुभद्रा जब तुम पहली बार यहाँ आई थी, इरा मुश्किल से दो महीने की थी। बिन माँ की बच्ची, जिसका शायद जीवित बचना भी मुश्किल था। तुम यहाँ सिर्फ छे महीने के कांट्रैक्ट पर नैनी और केयरटेकर के रूप में आई और आज तेरह साल बीत चुके हैं,”
सुभद्रा खामोश रही, बस उसकी आँखों से दो आँसू ढलके।
“तुम जीवन में बहुत कुछ कर सकती थी, यंग और टैलेंटेड थी, पूरी लाइफ तुम्हारे सामने थी। मुझे याद है तुम आर्टिस्ट बनना चाहते थी, दुनिया घूमना चाहती थी…लेकिन इसकी जगह तुमने इरा की माँ बनना चुना। तेरह साल तुम्हारे जीवन का हर क्षण इरा को समर्पित रहा है। अगर दुनिया में सबसे ज़्यादा….मुझसे भी ज़्यादा किसी ने इरा को प्रेम दिया है तो वो तुम हो सुभद्रा,”
गिरीश बाबू की बात का झुकाव किस ओर रुख़ कर रहा था ये भाँप कर कदम कुछ बोलने को हुआ, गिरीश बाबू का हाथ किसी शासक के समान उठा। उस मूक आदेश के वज़न से कदम गर्दन झुकाए खड़ा हो गया।
“तुम्हें वाक़ई लगता है कि ये आदमी हमारी मदद कर सकता है? इरा को ठीक कर सकता है?” गिरीश बाबू सुभद्रा की आँखों में झांकते हुए बोले जैसे उसकी आत्मा से सच टटोलने की कोशिश कर रहे हों।
“मुझे पूरा विश्वास है सर, अगर दुनिया में कोई इंसान इरा की मदद कर सकता है तो वो सिर्फ़ यही है,” इस बार सुभद्रा के स्वर में गूंजती दृढ़ता में संशय का लेशमात्र भी पुट ना था।
“लेकिन कदम कह रहा है कि वो कहाँ गया, उसका ठिकाना कहाँ है कोई नहीं जानता। उसे ढूँढोगी कैसे?”
“परसों 2 जनवरी है सर,”
“हाँ, तो?”
“अगर निमित्त कालांत्री ज़िंदा है, तो वो पूरी दुनिया में कहीं भी क्यों ना हो, 2 जनवरी को ठीक शाम के 5:55 मिनट पर वो सिर्फ़ एक ही जगह मिलेगा और वो जगह मैं जानती हूँ,” सुभद्रा हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई, उसने स्नेह से इरा का माथा चूमा।
“मुझे फ़ौरन निकलना होगा सर,”
“कहाँ?”
“उसके शहर,”
2 January. Varanasi. India
Time: 5:54 pm
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्
निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्
शाम के छे बजने में छे मिनट बाक़ी थे। दूर अस्सी घाट से रुद्राष्टकम की ध्वनि आ रही थी। सुभद्रा रविदास घाट की कच्ची सीढ़ियों के पास, सुनसान अँधेरे कोने में खड़ी थी और शांत गंगा की लहरों को देख रही थी। वहाँ काफ़ी ठंड थी। स्वेटर, मफलर, पैडेड ओवरकोट के बावजूद शीत-लहरी उसके जिस्म में झुरझुरी पैदा कर रही थी।
वहाँ का वातावरण सुभद्रा जो जैसे खींच के तेरह साल पहले की यादों की उन गलियों में ले जा रहा था जिन तक जाने के रास्ते वो कब का बंद कर चुकी थी।
दीपक।
उसके जीवन में आया पहला और आखरी लड़का। दीपक और सुभद्रा का प्यार किसी कहानी या फ़िल्म के टिपिकल कॉलेज रोमांस सा नहीं था। पहली बार मिल कर ही दोनों ने एक-दूसरे से जो आत्मिक जुड़ाव महसूस किया था वो जल्द ही एक अटूट प्रेम में बदल गया। लेकिन अटूट प्रेम सम्बन्ध भी अमर नहीं होते…और ना ही अटूट प्रेम करने वाले इंसान।
कॉलेज मैनज्मेंट के रूल्ज़ अमेण्डमेंट और आउटडेटेड कोर्स इन्फ़्रस्ट्रक्चर में चेंजेज़ के लिए दीपक व अन्य स्टूडेंट्स पीसफ़ुल प्रोटेस्ट कर रहे थे जब यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन के कुछ लड़कों और यूनिवर्सिटी प्रॉक्टर गार्ड्ज़ के बीच झड़प शुरू हो गयी। देखते ही देखते झड़प ने पथराव और जवाबी लाठीचार्ज का रूप ले लिया जिसमें दीपक के सिर पर गम्भीर चोटें आईं। कॉलेज से सर सुंदर लाल हॉस्पिटल ले जाने के बीच ही दीपक ने दम तोड़ दिया। स्टूडेंट्स के आक्रोश को देखते हुए यूनिवर्सिटी ने सिर्फ़ कार्यवाही की ख़ानापूर्ति करते हुए दोषी गार्ड्ज़ को निष्कासित कर दिया।
शाम में कॉलेज के सभी स्टूडेंट्स दीपक की आत्मा शांति के लिए गंगा में दीप प्रज्ज्वलित करने इकट्ठा हुए थे। एक-एक कर के सभी चले गए, पीछे रह गए तो गंगा पर तैरते दिये, जो लहरों के साथ बहते हुए दूर चले जा रहे थे और उन दियों से भी दूर जा चुके दीपक की यादों के साथ सुभद्रा, जिसकी आँखों से बहते आंसुओं की गहराई गंगा से कम ना थी।
सुभद्रा ज़ोर से चीखी। अपने अंदर की घुटन और अकेलापन शायद उस चीख के साथ बाहर निकालना चाहती थी लेकिन चीख में दर्द निकला तो उसकी जगह जैसे वेदना ने ले ली। सुभद्रा से घुटन अब बर्दाश्त नहीं हो रही थी। वो घाट की सीढ़ियों से उठी और लड़खड़ाते कदमों से नीचे नदी की ओर बढ़ी। आँखें आँसुओं से धुँधलाई हुई थीं, जो घिरती शाम के धुँधलके में, गंगा में डूबते सूरज के साथ ही अपने जीवन और दर्द दोनों को डुबो देना चाहती थी। सुभद्रा के पाँव पानी से स्पर्श हुए। बनारस में जनवरी की सर्दी में ख़ून जमा देने लायक़ बर्फीले पानी से अधिक सिहरन उसकी रीढ़ में उस आवाज़ से दौड़ गई।
“रुक जाओ,”
सुभद्रा चौंक कर पलटी। ऊपर सीढ़ियों पर अंधेरे में एक साया बैठा था जो अब नीचे उसकी ओर उतर रहा था। उस साये के पास आते ही सुभद्रा ने उसे पहचाना। वो उनका सीनियर था। निमित्त कालांत्री।
सुभद्रा ने निमित्त को सुबह उन सिक्योरिटी गार्ड्ज़ को पीटते देखा था जिन्होंने दीपक पर लाठी चलाई थी। निमित्त ही सबसे पहले घायल दीपक को गोद में उठा कर हॉस्पिटल की ओर भागा था। उसकी वाइट शर्ट पर ख़ून के धब्बे अब सूख कर गहरा चुके थे। कॉलेज में निमित्त ने शायद ही कभी दीपक या सुभद्रा से बात की होगी। इन-फ़ैक्ट सुभद्रा ने निमित्त को कॉलेज में शायद ही किसी से कभी बात करते देखा था। वो अजीब सा था। वीयर्डो, क्रीपी जीन्यस, पैरानॉर्मल फ़्रीक, वग़ैरह-वग़ैरह निमित्त के टाइटल थे जो कॉलेज में उसे दिए जाते थे।
“क्या करने जा रही थी?” निमित्त लगभग उसे डाँटते हुए बोला।
“क…कुछ नहीं,” सुभद्रा के रुँधे गले से हल्की आवाज़ निकली।
“झूठ। तुम कूदने जा रही थी। जान लेना महापाप है, भले ही जान अपनी क्यों ना हो। जब हम जीवन दे नहीं सकते तो उसे लेने का अधिकार भी हमारा नहीं,”
“क्यों नहीं है मेरा अधिकार? जीवन मेरा है, मैं नहीं तो कौन तय करेगा?” सुभद्रा दर्द में चीखी।
“महादेव। संसार उनका, तो अधिकार भी उनका। जीवन हो या मृत्यु, किसे क्या देना है तय महादेव ही करते हैं,” निमित्त उँगली ऊपर आसमान की ओर उठा कर मुस्कुराते हुए बोला।
“दीपक की जान लेने में ना हिचकिचाए महादेव, मुझसे मेरा प्यार छीनने में ना हिचकिचाए, फिर मेरी जान लेने में क्या तकलीफ़ है उन्हें?”
“तुम्हारा समय नहीं आया है अभी। रहा सवाल प्यार का, तो वो अगले छे महीने में तुम्हारे जीवन में वापस आ जाएगा,”
“तुम क्या हो? अंतर्यामी? भगवान? मेरी ज़िंदगी में दीपक की जगह कोई नहीं लेगा…कभी नहीं!” सुभद्रा ग़ुस्से और दर्द से बिफर कर बोली।
“प्रेम के हर रूप में सबसे ऊपर, सबसे श्रेष्ठ क्या है, पता है? मातृत्व। प्रेम तुम्हारे जीवन में वापस आएगा, लेकिन मातृत्व के रूप में। महादेव ने जो लिया है, उससे ज़्यादा वो तुम्हें दे देंगे,”
निमित्त की कोई भी बात सुभद्रा की समझ में नहीं आ रही थी। शायद सब सही थे निमित्त के बारे में, उसका दिमाग़ सही जगह पर नहीं था।
“मातृत्व? अगले छे महीने में? तुम पागल-वागल हो क्या?”
“अपनी जान लेने की कोशिश मत करना, मर नहीं पाओगी। निमोनिया होगा सो अलग,” निमित्त ने चेतावनी देते हुए कहा और वापस जाने को पलटा।
“यू नो…आज यहाँ जितने भी लोग आए दीपक को श्रद्धांजलि देने, प्रेस वाले, मीडिया वाले, हफ़्ते-दस दिन में तुम लोग दीपक का नाम भी भूल जाओगे। फिर इतना दिखावा, ये सब ड्रामा किस लिए? वो सिर्फ़ मेरी यादों में रह जाएगा हमेशा के लिए। मैं उसकी जगह किसी को नहीं लेने दूँगी, कभी नहीं।” सुभद्रा कलप कर बोली।
ऊपर चढ़ता निमित्त सीढ़ियों पर ही ठिठक कर रुक गया।
“अगर ऐसा है तो मैं तुमसे वादा करता हूँ, अब से लेकर जब तक मैं ज़िंदा हूँ और अपनी पैरों पर खड़ा हूँ, मैं हर साल आज के दिन, ठीक इसी समय यहाँ दीपक को श्रद्धांजलि देने आऊँगा,” निमित्त वापस उसके पास आते हुए बोला।
“तुम आओगे श्रद्धांजलि देने? हर साल? अरे तुम दीपक को सही से जानते तक नहीं थे,”
“किसी से जुड़ाव होने के लिए उसे जानना ज़रूरी नहीं होता,”
“तुम डिल्यूज़नल हो क्या?” सुभद्रा खिज कर बोली।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त ने मुस्कुराते हुए कहा।
“तुम अगर ये सब ‘सिंपिंग’ के लिए कर रहे हो, ये सोच के कि इसका बॉयफ़्रेंड अभी-अभी मरा है, बंदी फ़्री हुई है तो सिम्पथी दिखा के, रोने के लिए कंधा देने के बहाने चान्स मार लेता हूँ तो फ़क-ऑफ़! इससे ज़्यादा डिस्गस्टेड हरकत दूसरी नहीं हो सकती,” सुभद्रा अंधेरे में उसे घूरते हुए बोली।
निमित्त ने मुस्कुराते हुए अपना हाथ सुभद्रा की ओर सीधा किया। सुभद्रा घबरा कर झटके से दो कदम पीछे हुई।
“ॐ ह्रीं यं हं अनाहताय नमः” निमित्त आँखें बंद कर के मंत्रोच्चारण कर रहा था।
सुभद्रा को यूँ लगा जैसे उसके दिल में दर्द का जो बोझ था वो हल्का हो रहा है।
“ॐ शोक विनाशिन्यै नमः,” तुम्हारा अनाहत चक्र…हार्ट चक्र शांत हो जाएगा।
सुभद्रा को अपने अंदर उमड़ता दर्द और भावनाओं का आवेग शांत पड़ता मालूम हुआ।
“मे लव फ़ाइंड यू इन वेज़ दैट मेंड योर हार्ट,…ॐ नमः हरिहराय” इतना कह कर तेज़ कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ते हुए निमित्त वहाँ से ओझल हो गया।
ये निमित्त के उच्चारित उन मंत्रों का असर था या भावनाओं का आवेग थमने का, सुभद्रा ने अपनी जान लेने की कोशिश नहीं की। उस दिन के बाद उसकी निमित्त से कोई बात ना हुई।
कॉलेज में वो एक-दो बार नज़र आया फिर भी उसने सुभद्रा से बात करने की कोशिश ना की। एक महीने बाद सुभद्रा ने कॉलेज ड्रॉप कर दिया। कॉलेज की हर चीज़ उसे दीपक की याद दिलाती थी। ऐसे में वहाँ रहना और पढ़ना उसके लिए दूभर था।
सुभद्रा ट्रेडिशनल एंड फोक आर्ट स्टडी के लिए देश के विभिन्न प्रांतों में घूमते हुए वहाँ की लोक कलाओं को सीखने लगी। उसका इरादा दुनिया के अलग-अलग देशों में जा कर वहाँ की रीजनल आर्ट स्टडी करने का था। ये सपना उसने और दीपक ने साथ देखा था जो अब उसे अकेले ही पूरा करना था लेकिन इस सपने की क़ीमत और लागत सुभद्रा की माली हैसियत से बड़े थे।
लगभग पाँच महीने बाद सुभद्रा अपनी मासी के बुलाने पर गोवा पहुँची। उसकी मासी गिरीश बाबू की सेक्रेटेरी थीं और रिटार्यमेंट की कगार पर थीं। मासी सुभद्रा को अपने साथ लेकर इस आस में गिरीश बाबू के घर पहुँचीं कि उनकी जगह गिरीश बाबू सुभद्रा को रख लें लेकिन सुभद्रा को इस काम में लेशमात्र भी दिलचस्पी ना थी।
सुभद्रा गिरीश बाबू के ऑफ़िस से निकली ही थी जब किसी नवजात बच्ची के रोने की आवाज़ ने उसे बुरी तरह विचलित कर दिया।
पैलेस कॉरिडोर में तीन-चार आया उस दो महीने की बच्ची को चुप कराने और फ़ॉर्म्युला मिल्क पिलाने की भरसक कोशिश कर रही थीं और बच्ची ज़ार-ज़ार हो कर बिलख रही थी। सुभद्रा से यह देखा ना गया। उसने आगे बढ़ कर आया से बच्ची ले ली। बच्ची ने सुभद्रा की गोद में जाते ही रोना बंद कर दिया।
जब कानों को रुदन की आदत पड़ जाए तो अचानक मिली खामोशी अधिक भयभीत करती है। बच्ची का रोना बंद होने से घबराए गिरीश बाबू जब भागते हुए ऑफ़िस से बाहर निकले तब सुभद्रा अपनी गोद में बच्ची को दूध पिला रही थी।
गिरीश बाबू ने उसी वक्त सुभद्रा को इरा के लिए नैनी और केयरटेकर की पोस्ट पर मुँह माँगी सैलरी पर हायर कर लिया। उस काम के लिए सुभद्रा को जितने पैसे मिल रहे थे कि अगले छे-आठ महीने में वो इतने पैसे इकट्ठा कर लेती जिससे पूरी दुनिया घूम सके। सुभद्रा ने फ़ैसला कर लिया कि वो पैसे जमा होने तक वहाँ काम करेगी, उसके बाद हमेशा के लिए देश छोड़ देगी।
देखते ही देखते छे महीने बीत गए।
इरा अब आठ महीने की हो चुकी थी। इन छे महीनों में कोई दिन ऐसा ना गुजरा जब दीपक की यादों ने उसे ना घेरा हो लेकिन इन यादों में अब दर्द नहीं था, ये सिर्फ़ खूबसूरत यादें थीं उन लम्हों की जो सुभद्रा और दीपक ने साथ गुज़ारे थे, इनमें प्रेम था, समर्पण और सुकून था।
2 जनवरी फिर से आ चुकी थी।
दीपक की यादें उस तारीख़ को सबसे अधिक थीं।
सुभद्रा अपने फ़ोन पर दीपक और अपनी फ़ोटोग्राफ़्स स्क्रोल कर रही थी जब उसे व्हाट्सऐप पर अननोन नम्बर से एक वीडियो आया। रविदास घाट पर गंगा में एक दिया टिमटिमाते हुए लहरों पर बह रहा था। सुभद्रा ने टाइम देखा, शाम के 5:55 हो रहे थे।
उसे एकाएक निमित्त याद आ गया।
वो अब तक निमित्त और एक साल पहले घाट पर हुई घटनाओं को भूल चुकी थी। उसकी नज़रें वीडियो पर टिकी हुई थीं जब आठ महीने की इरा ने सुभद्रा को देख कर अपने पहले लफ़्ज़ कहे,
“म..म्म…मा”
“महादेव ने तुमसे जो लिया है वो उससे अधिक तुम्हें लौटा देंगे…प्रेम तुम्हारे जीवन में अगले छे महीने में मातृत्व के रूप में वापस आएगा…मे लव फ़ाइंड यू इन वेज़ दैट मेंड योर हार्ट”, निमित्त की आवाज़ जैसे उसके कानों में गूंजी।
तब से हर साल 2 जनवरी को शाम 5:55 पर उसके पास गंगा की लहरों पर एक दिया छोड़े जाने का वीडियो आ जाता।
इरा बड़ी होती चली गई, उसके बड़े होने के साथ ही सुभद्रा का इरा से प्रेम इतना बढ़ता चला गया कि उसे छोड़ कर चले जाने की इच्छा ही चली गई। सुभद्रा इरा और गोवा की हो कर रह गई।
इस दौरान वो अक्सर निमित्त को खबरों में देखती, यूँ ही लोगों की अंधेरे में भटकती ज़िंदगी को रास्ता दिखाते, नाउम्मीदी से भरे लोगों में आस जगाते और ऐसा करते हुए दोस्त से अधिक अपने लिए दुनिया में दुश्मन बनाते।
सुभद्रा ने कभी निमित्त से कॉंटैक्ट करने की कोशिश ना की, ना ही प्रत्येक 2 जनवरी को भेजे जाने वाले वीडियो के अलावा निमित्त ने अपनी ओर से सुभद्रा से कॉंटैक्ट करने की कोशिश की। कुछ साल बाद इरा के साथ कलंगूटे बीच पर खेलते हुए सुभद्रा का फ़ोन सागर की लहरों में बह गया। उस फ़ोन के साथ ही निमित्त से उसका जो 2 जनवरी का तार जुड़ा था वो भी टूट गया। फिर दो साल पहले निमित्त पर हुए पुलिस केस की खबरें मीडिया में आई और उसके बाद निमित्त जैसे सोशल मीडिया से कहीं ग़ायब हो गया।
पर अब तक सुभद्रा को यक़ीन हो चुका था कि चाहे कुछ भी हो जाए, निमित्त अपना 2 जनवरी का वादा ज़रूर निभाता होगा।
हर-हर महादेव शम्भु, काशी विश्वनाथ गंगे,
हर-हर महादेव शम्भु, काशी विश्वनाथ गंगे…
अंधेरा घिर चुका था, अस्सी घाट से आती शाम की आरती की आवाज़ से अतीत में डूबा सुभद्रा का दिमाग़ यथार्थ में आया।
निमित्त वहाँ नहीं था।
इतने साल बीत चुके थे, आख़िर कोई कब तक निभा सकता है किसी अंजान अजनबी से किए वादे को? गलती सुभद्रा की ही थी, उसने ज़रूरत से ज़्यादा ही आस लगा ली थी शायद…लेकिन अब वो क्या करेगी? निमित्त तो मिला नहीं, वापस जा कर गिरीश बाबू को कैसे फ़ेस करेगी? उसकी इरा का क्या होगा?
सुभद्रा का दिल डूब गया।
ठीक तेरह साल पहले की तरह आज भी वो इस घाट से ख़ाली हाथ लौटने को पलट रही थी जब दूर गंगा की लहरों के साथ बहा जाता एक टिमटिमाता दीपक उसे दिखाई पड़ा जिसपर उठती-गिरती लहरों के कारण पहले उसका ध्यान नहीं गया था…और आरती के घंटों, ढोल, शंखनाद और नगाड़ों के बीच सुनाई दी गंगा से निकलती वो आवाज़ जिसे उसने सुना बहुत कम था लेकिन पहचानती बहुत ज़्यादा थी।
“शिव शिव शिव शम्भु, महादेव शम्भु,
महादेव शम्भु, महादेव शम्भु…शम्भु..
शम्भु..सदा-शिवम…शम्भु…सदा-शिवम्,”
नदी से प्रेत की तरह बाहर निकला वो शख़्स।
कंधों तक लम्बे लहरदार बाल, लिनेन वाइट शर्ट, टर्क्वॉज़ डेनिम, लेदर होल्स्टर और बूट्स के अलावा रुद्राक्ष व अन्य मालाओं से लदा हुआ वो वैसे ही पानी में उतर गया था। अंधेरे में, इतने सालों बाद भी सुभद्रा ने उस अजीब से शख़्स को साफ़ पहचाना। वो निमित्त के अलावा दूसरा कोई और हो ही नहीं सकता था। नदी किनारे एक ऊँचे क़द का काला जर्मन शेफ़र्ड बैठा था जो अंधेरे में नज़र नहीं आ रहा था, वो निमित्त के नदी से बाहर आते ही दुम हिलाते हुए उठ खड़ा हुआ।
“वुफ़्फ़-वुफ़्फ़”
“आजा बेटा अल्फ़ा, तू भी डुबकी लगा ले, मम्मी बुला रही हैं,” निमित्त ने पास आते जर्मन शेफ़र्ड पर अपने बालों का पानी झाड़ा। अल्फ़ा ठंडे पानी की बौछार से बचने के लिए कुलाँचे भरने लगा। दोनों उसी तरह खेलते हुए सीढ़ियाँ चढ़ कर सुभद्रा के पास पहुँचे।
“न…निमित्त…कहाँ थे आप?”
“मैं तो यहीं था, जब तुम फ़्लैशबैक में खोई हुई थी। सोचा तुम्हें कुछ देर यादों के साथ पर्सनल स्पेस दे कर मम्मी से मिल लूँ,”
“मम्मी?” सुभद्रा ने उलझन में सवाल किया।
निमित्त ने गंगा की तरफ़ इशारा करते हुए यूँ कहा जैसे बहुत ऑब्वीयस सी बात कह रहा हो, “मम्मी…मॉम, माँ, माते, बेबे, अम्मा, अम्मी, माई, आई…किसी भी नाम से पुकार लो,”
सुभद्रा ने उसे सिर से पैर तक यूँ देखा जैसे कोई अजूबा देख रही हो।
“आपको ठंड नहीं लगती? निमोनिया ना होगा?”
“माँ के आग़ोश में कभी ठंड लग सकती है भला? ऐसे भी जवानी जाने का नाम नहीं ले रही मेरी,” निमित्त अपने माथे पर बिखरे बालों को उँगलियों से पीछे संवारते हुए बोला।
सुभद्रा देख रही थी उस अजीब से इंसान को, समझने की कोशिश कर रही थी कि अपनी बात किस तरह रखे उसके सामने। निमित्त ने मुस्कुराते हुए उसकी आँखों में देखा।
“कह दो। मैं जानता हूँ कि तुम सिर्फ़ ये जानने यहाँ नहीं आई कि मैं हर 2 जनवरी को यहाँ आता हूँ या नहीं,”
“आप तो सब जानते हैं, मुझे जाने बिना भी तेरह साल पहले मुझे देख के बता दिया था कि मेरे जीवन में मातृत्व के रूप में प्रेम लौटेगा…तो क्या अब यह नहीं जान पा रहे कि उसी मातृत्व की रक्षा के लिए मैं यहाँ आपको ढूँढते हुए आई हूँ?”
“मैं कैसे जान सकता हूँ? मैं पूरा भगवान नहीं,” निमित्त शांत भाव से बोला।
“पूरे भगवान नहीं? मतलब थोड़े से हैं?” सुभद्रा ने व्यंगात्मक लहजे में सवाल किया।
“हर कोई होता है…’थोड़ा सा भगवान’, बस लोग भूल जाते हैं कि ईश्वर ने इंसान को अपनी प्रतिकृति में बनाया है और पूरे ब्रह्मांड को सूक्ष्म रूप में मानव शरीर में समाहित किया है। भगवान और शैतान, सही और ग़लत, उजाला और अंधेरा, दोनों इंसान के अंदर हैं। अब इंसान ऊर्जा के इन विपरीत स्वरूपों में संतुलन बनाता है या किसी एक स्वरूप की ओर पलड़ा झुकने देता है, यही निर्धारित करता है इंसान की शख़्सियत,” निमित्त के भाव पूर्ववत शांत थे, उनमें कोई परिवर्तन ना आया।
“आपने बनाया है…?…संतुलन…?”
“शायद नहीं, इसीलिए कहता हूँ कि थोड़ा सा भगवान हूँ, बाक़ी का….” निमित्त ने जान के अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया।
“मुझे आपकी हेल्प चाहिए, निमित्त,” सुभद्रा सीधे मुद्दे पर आते हुए बोली।
अगले दो मिनट में सुभद्रा सारी सिचूएशन निमित्त को समझाती चली गई। निमित्त भावहीन बुत सा खड़ा सुनता रहा। अल्फ़ा उसके पैरों के पास इत्मिनान से बैठा हुआ था।
“गिरीश बाबू? वो पॉलिटीशियन?” सुभद्रा की बात ख़त्म होने पर निमित्त ने सवाल किया।
सुभद्रा का सिर सहमति में हिला।
“बड़ा और पावरफ़ुल आदमी है, उसे मेरी मदद क्यों चाहिए? बोलो कोई हाई-प्रोफ़ाइल सिलेब्रिटी साइकिक या शामन हायर कर ले,” निमित्त भावहीन स्वर में बोला।
“ये कोई मार्केटिंग गिमिक या पब्लिसिटी स्टंट नहीं जिसके लिए फ़ेक सिलेब्रिटी साइकिक हायर किए जाएँ, ये इरा की लाइफ़ का सवाल है निमित्त…यू हैव टू हेल्प मी,”
“पॉलिटीशियन, पुलिस वाले, और वकील, इन्हें मैं सबसे निम्न कोटि पर रखता हूँ। आत्मा विहीन, ख़ाक ज़मीर और इंसानियत से कोरे। ना ऐसे लोगों से वास्ता रखना मुझे पसंद है और ना ही ऐसे लोगों का मेरे रास्ते में आना,” कहते हुए निमित्त आगे बढ़ने को हुआ।
“गिरीश बाबू ऐसे नहीं हैं। बाक़ियों से अलग हैं। मोल्लेम के लोग उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं,”
“गुड फ़ॉर हिम, गुड फ़ॉर ‘मोल्लेम के लोग’, नॉट माई सूप”
“इट्स नॉट अबाउट गिरीश बाबू! इट्स अबाउट इरा….तेरह साल की बच्ची है वो। इरा डिज़र्व नहीं करती…जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है,”
“वेल्कम टू रीऐलिटी, सुभद्रा। अक्सर इनॉसेंट लोगों के साथ वही होता है जो वो डिज़र्व नहीं करते…डील विद इट। मैं तुम्हारी इसमें कोई हेल्प नहीं कर सकता। चल अल्फ़ा,” निमित्त जैसे अपना फ़ाइनल डिसिज़न सुनाते हुए बोला।
उसके कमांड पर पैरों के पास सोया अल्फ़ा फ़ौरन उठ खड़ा हुआ। सुभद्रा को निराशा की मँझधार में उतराता छोड़ कर निमित्त आगे बढ़ गया।
“मैंने गलती की यहाँ आ के। शायद दुनिया ठीक ही कहती है तुम्हारे बारे में। तुम एक सिरफिरे और ख़ुदगर्ज़ इंसान हो जो अपने अलावा किसी का भला नहीं सोच सकता,” वितृष्णा से भरी सुभद्रा ने पीछे से उलाहना देते हुए कहा।
निमित्त के कदम ठिठके, जब उसने चेहरा पीछे सुभद्रा की ओर घुमाया तो उसकी आँखों में चमक और होंठों पर विषादपूर्ण मुस्कान थी।
“कभी घमंड नहीं किया,” निमित्त की आवाज़ पहले की भाँति ही शांत और गहरी थी।
“कभी लोगों की भलाई के लिए जीने वाला क्या इतना गिर गया है कि अब खुद की ईगो से आगे कुछ देख नहीं सकता? ईश्वर बनने की लालसा और अपने गुरु से बड़ा बनने की लालच ने तुम्हारी आत्मा भ्रष्ट कर दी है,”
“हाँ, ये सही है। अपनी लाइफ़ का येइच तो ड्रीम है कि उस भूली-बिसरी ढाई ईंट की उजड़ी रियासत के पोपले राजा जी की लेनी है…जगह, है ना ‘हौले’?” निमित्त के दिमाग़ में स्कैली की सार्कैस्टिक आवाज़ गूंजी जो सिर्फ़ उसे और अल्फ़ा को सुनाई दी।
स्कैली की बात पर कंट्रोल करने की लाख कोशिश करते भी निमित्त की हंसी छूट गई।
“मुँह बंद कर स्कैली, सीरीयस सिचूएशन में कॉमेडी मत किया कर,” निमित्त अपने बग़ल में चेहरा घुमा कर यूँ बोला जैसे किसी से दबी आवाज़ में बात कर रहा हो।
निमित्त को यूँ हवा में खुद से बड़बड़ाता देख सुभद्रा संशय में थी, “किस से बात कर रहे हो?”
“स्कैली से,”
“स्कैली?”
“नेवर माइंड। सुनो…तुम ये जो कुछ भी कह रही हो बिल्कुल सच है। मैं ऐन ऐसा ही हूँ। हैपी? नाउ वॉट? निमित्त कालांत्री हेट ग्रूप जॉइन कर लो, वहाँ जितनी रुदालियाँ हैं उनके साथ सुर मिला के मेरे नाम पर अपने कपड़े फाड़ो, अपनी छाती पीटो मेरी बला से। अब तो मैंने पुष्टि कर दी कि मैं कितना वाहियात इंसान हूँ, तो फिर इतने वाहियात इंसान की मदद क्यों चाहिए? ऐसे इंसान से उतनी दूरी बनाओ जितनी शैतान से,” निमित्त शांत भाव से मुस्कुराते हुए बोला।
सुभद्रा के चेहरे के भाव बदले। उसके कातर नेत्र निमित्त की आँखों में झांक रहे थे। निमित्त जानता था कि सुभद्रा की बेबसी और लाचारी फ़्रस्ट्रेशन बन कर निकल रहे थे। निमित्त ने कोई प्रतिक्रिया ना दी।
“आ…आई एम सॉरी निमित्त। मैं अपने आपे में नहीं हूँ, इसीलिए अनर्गल बक रही हूँ,”
“नो नीड फ़ॉर अपॉलॉजीज़, मैं तो स्वीकार कर रहा हूँ कि तुमने जो कुछ भी कहा वो बिल्कुल सही है,” निमित्त कंधे उचकाते हुए बोला।
“अगर ये सच होता तो तुम यहाँ दीपक के नाम का दिया नहीं जला रहे होते निमित्त। मैं जानती हूँ तुम वो नहीं जो दुनिया समझती है, क्योंकि दुनिया वही समझती है जो तुम चाहते हो कि वो तुम्हारे बारे में समझे,” सुभद्रा उसके पास आते हुए बोली।
“इन्स्टिगेशन और रिवर्स सायकॉलजी, दोनों ही मुझ पर वर्क नहीं करते सुभद्रा। मेरे फ़ैसले और फ़ितरत, कोई बदल नहीं सकता,” निमित्त अपना चेहरा सुभद्रा के क़रीब लाते हुए आहिस्ता से बोला।
सुभद्रा ने कोई जवाब ना दिया। निमित्त तीसरी बार वहाँ से जाने के लिए पलटा।
“आ गया गिरीश बाबू। कैसा लगा अपनी बेटी का लहू सूंघ के?…इसके पास आने की कोशिश की तो इसके जिस्म की हड्डियां मांस फाड़ कर बाहर निकलेंगी,…तेरी बेटी रजस्वला हो गई है गिरीश बाबू। तेरह साल इंतज़ार किया है मैंने इस पल का। तेरे वंश का विनाश अब हो कर रहेगा।”
पीछे से आती आवाज़ ने निमित्त के बढ़े कदमों को बांध लिया।
सुभद्रा अपने मोबाइल फ़ोन पर दो दिन पहले इरा के साथ हुए इन्सिडेंट की सीसीटीवी फ़ुटेज प्ले कर रहे थी।
निमित्त ने मोबाइल उसके हाथ से ले लिया। उसकी नज़रें इरा से हट नहीं पा रही थीं।
“इरा को अब तक होश नहीं आया है निमित्त। गिरीश बाबू सिर्फ़ मेरे कहे पर भरोसा कर के अपनी बेटी को बचाने के लिए तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। हम नहीं जानते कि इरा होश में आएगी भी या नहीं और अगर आएगी तो वो शैतान उसका क्या हाल करेगा…अब तुम जा सकते हो, इस बार मैं तुम्हें नहीं रोकूँगी,” सुभद्रा निमित्त के हाथ से मोबाइल लेते हुए शुष्क भाव से बोली।
निमित्त की उँगलियाँ अपने गले में बंधे माँ दुर्गा के लॉकेट पर फिरने लगीं।
“ये कैसी दुविधा में डाल दिया, मम्मी? दिल कहता है इसकी मदद करने को, दिमाग़ मना कर रहा है,” निमित्त लॉकेट पकड़ के बुदबुदाया।
“दुविधा में मम्मी नहीं, ये निकम्मी डाल रही है। सुन ‘हौले’, तूने जब-जब दिल की सुनी है, उड़ता हुआ सतरंगी तीर तेरे दिल के साथ-साथ कहीं और भी पैवस्त हुआ है। दिमाग की सुन और दफ़ा कर इसकी दुःख भरी दास्तान,” स्कैली की आवाज़ फिर निमित्त के दिमाग़ में गूंजी।
“एक मिनट,” निमित्त शांत भाव से सोचते हुए बोला, “अगर मम्मी चाहती हैं कि मैं तुम्हारी हेल्प करूँ तो अगले एक मिनट में कोई ना कोई इशारा देंगी,”
“इशारा?…कैसा इशारा?”सुभद्रा ने सवाल किया।
“मुझे क्या पता,” निमित्त कंधे उचकाते हुए बोला, “कोई भी इशारा…कुछ भी, मैं समझ जाऊँगा,”
“अ…और अगर कोई इशारा नहीं मिला तो?” सुभद्रा ने सशंकित भाव से पूछा।
“तो मुझे तुम्हारे साथ ना जाने का अफ़सोस नहीं होगा,” निमित्त ने शांत, भावहीन स्वर जवाब दिया।
सुभद्रा की नज़रें अपनी स्मार्ट वॉच पर जा टिकीं। निमित्त भी अपने दाहिने हाथ पर बंधी ‘ज़ोडीऐक कम्पस वॉच’ की सेकंड की सुई घूर रहा था।
“शाबाश मेरे ‘हौले’, क्या मस्ट आइडिया भिड़ाया है तूने। अब मम्मी खुद तो महाभारत सीरीयल के माफ़िक़ नदी से ह्यूमन फ़ॉर्म में निकल कर तुझे साइन देने से रहीं,” स्कैली की आवाज़ फिर से निमित्त और अल्फ़ा को सुनाई दी।
अल्फ़ा ने शिकायती भाव आँखों में लिए हुए निमित्त को घूरा, उसके गले से हल्की गुर्राहट निकली। निमित्त ने लापरवाही से कंधे उचकाए।
सुभद्रा के लिए वो एक मिनट उसकी लाइफ़ का सबसे लम्बा मिनट था। हर बदलता सेकंड जैसे उसके दिल पर चोट कर रहा था। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ रही थीं लेकिन उनके चारों ओर जैसे सब कुछ थम गया था। हवा चलनी बंद हो गई थी, गंगा की लहरें भी शांत थीं। एक लहर भी ऊपर-नीचे नहीं हो रही थी जिसे ‘इशारा’ मान लिया जाए। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरी कायनात को किसी रिमोट कंट्रोल से ‘पॉज़’ बटन दबा कर फ़्रीज़ कर दिया हो। जैसे जनवरी की उस सर्द रात पूरी कायनात जम गई हो।
“कोई इशारा नहीं, कुछ भी नहीं…जवाब साफ़ है सुभद्रा। मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता,” निमित्त सर्द भाव से बोला। एक मिनट लगभग ख़त्म होने पर ही थे।
“बहुत बढ़िया, बला टली! चल अल्फ़ा, आज पहलवान की दुकान पर ‘मल्लइयो’ की ट्रीट मेरी तरफ़ से…पैसा ये ‘हौला’ देगा,” स्कैली की आवाज़ अल्फ़ा और निमित्त को सुनाई दी।
“भौं-भौंsss” अल्फ़ा यूँ भौंका जैसे अपना विरोध जता रहा हो। या फिर कारण कुछ और था?
निमित्त ठिठका और पीछे नदी की तरफ़ पलटा, जिस ओर देख कर अल्फ़ा भौंक रहा था।
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते
“वुफ़्फ़-वुफ़्फ़” अल्फ़ा के भौंकने में इस बार उसकी ख़ुशी और उत्साह साफ़ झलक रहे थे, वो अपने अगले पंजे ज़मीन पर पटकते हुए, अपनी दुम हिला रहा था।
निमित्त की नज़रें गंगा के किनारे पर आकर रुकते उस स्टीमर पर टिकी थीं। महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र की आवाज़ स्टीमर डेक पर लगे स्पीकर्स से आ रही थी। निमित्त मुस्कुराया।
“गई मल्लइयो” इस बार स्कैली की आवाज़ जैसे कलपते हुए बोली।
निमित्त के भावहीन चहरे पर अर्थपूर्ण मुस्कान आई, “अल्फ़ा कैबिन में ट्रैवल करेगा, कार्गो में नहीं,”
“डन!” सुभद्रा अल्फ़ा के फ़र में उँगलियाँ फिराते हुए बोली।
“चलो, मल्लइयो की ट्रीट मेरी तरफ़ से,” निमित्त सीढ़ियाँ चढ़ते हुए बोला। अल्फ़ा और सुभद्रा उसके पीछे हो लिए।
ऊपर गली में सायकल पर एक बनारसी अपनी धुन और गाँजे की पिनक में गुनगुनाते हुए गुजरा, “…पहले अपने मन साफ़ करो, फिर औरों का इंसाफ़ करो। यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक नादान चुनो…”
“…जिसने पाप ना किया हो, जो पापी ना हो,” निमित्त भी उसी तरन्नुम में गाना मुकम्मल करते हुए गुजरा।
कहानी जारी है
~ नितिन के. मिश्रा
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