MALAR KI MASAANI
मल्हार की मसानी
THE PHOENIX WOLF CASE FILES: CASE 876

*mobile rings*
निमित्त ने कॉल रिसीव की मगर कुछ ना बोला।
“ह…हैलो, निमित्त कालांत्री?” दूसरी ओर से किसी अधेड़ उम्र के आदमी की shaky voice आई।
“Who wants to know?” निमित्त ने भावहीन स्वर में सवाल किया।
“म…मेरा नाम संदेश श्रीवास्तव है। मुझे आपकी मदद चाहिए,“
“मुझे नहीं करनी।” निमित्त ने flatly reply करते हुए कॉल disconnect कर दी।
एक मिनट बाद उसका फ़ोन दोबारा बजा।
निमित्त ने इस बार भी कॉल रिसीव की और कुछ ना बोला। सामने से संदेश की आवाज़ आई जिसमें कातर भाव साफ़ झलक रहा था।
“प्लीज़ एक बार मेरी बात सुन लीजिए निमित्त। मैं बहुत मुश्किल में हूँ, सिर्फ़ आप मेरी मदद कर सकते हैं। मेरी वाइफ़ की जान ख़तरे में है…और सिर्फ़ आप उसे बचा सकते हैं,” संदेश ने जो एक बार साँस खींची तो बात ख़त्म कर के ही छोड़ी।
लाइन पर दो पल सन्नाटा पसरा रहा। फिर निमित्त का भावहीन स्वर उभरा।
“हम्म…बीवी तुम्हारी है तो मैं क्यों बचाऊँ? खुद बचा लो,”
“काश ऐसा करना मेरे वश में होता। मेरी वाइफ़ देवयानी possessed है मिस्टर कालांत्री। हर सम्भव कोशिश कर चुका हूँ उसे बचाने की। पीर-फ़क़ीर, पुजारी-तांत्रिक, प्रीस्ट, शामन, अघोरी-occultist, tarot experts, सबकी ख़ाक छान ली। अब तक लाखों रुपए इसके पीछे खर्च कर चुका हूँ। इनमें से कुछ बिल्कुल fraud निकले, कुछ के बताए और किए उपाय थोड़े टाइम तक वर्क करते लेकिन हर बार घूम फिर कर हालात और देवयानी की हालत पहले से भी बदतर हो जाते। आप मेरी आखिरी उम्मीद हैं,”
लाइन पर फिर से सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर बाद निमित्त की आवाज़ आई। इस बार उसकी आवाज़ में नरमी थी।
“बोलो, मैं सुन रहा हूँ,”
“मेरा साम संदेश श्रीवास्तव है…”
“बता चुके हो। आगे बोलो।”
संदेश सकपकाया। फिर संभलते हुए आगे बोला।
“जी। मैं दीवार आइलैंड के मल्हार गाँव में रहता हूँ। देवयानी से मेरी शादी को लगभग दस साल हो गए…लव मैरिज की थी हमने। अब तक हमारे बच्चे नहीं हैं।”
“किए नहीं या हुए नहीं?”
“शुरुआत में किए नहीं…ऐक्चूअली…शादी के शुरुआती एक-दो साल तक सब कुछ अच्छा था। हम खुश थे एक-साथ। मैं अपना करियर जमाने की कोशिश कर रहा था,”
“करते क्या हो?”
जवाब आने में एक क्षण का विलम्ब हुआ। निमित्त का दिमाग़ इस विलम्ब के दौरान सामने वाले के अंतर्मन में चल रहे जोड़-घटाने को पढ़ने का आदि था।
“फ़िलहाल तो कुछ नहीं करता। पहले independent music composer था। अपने YouTube channel पर म्यूज़िक बना कर डालता था। देवयानी से मेरी मुलाक़ात भी इसी वजह से हुई। उसे मेरा म्यूज़िक पसंद था। शुरू-शुरू में online chatting होती थी। फिर जब पता चला कि वो भी गोवा की रहने वाली है तो मुलाक़ातें होने लगीं। हमारी शामें आरम्बोल या कंडोलिम बीच पर बीतती। मैं उसके लिए गाने कम्पोज़ करता, घंटों उसके लिए गिटार पर अपनी बनाई धुनों में उन गीतों को पिरोता…और वो चुपचाप, मुस्कुराती हुई कभी सागर की लहरों तो कभी मेरी आँखों को देखती हुई मुझे सुनती रहती..”
संदेश भावावेश में बहते हुए असल मुद्दे से भटक गया पर निमित्त ने उसे ना टोका। वो चुपचाप उसे सुनता रहा। काफ़ी देर तक संदेश अपने और देवयानी के प्रेम की बातें करता रहा, फिर एकाएक उसे एहसास हुआ कि वो मुद्दे से भटक गया है। वो फ़ौरन ट्रैक पर आते हुए बोला,
“शादी के बाद मेरा सपना अपना solo music album launch करने का था। देवयानी भी उस समय पणजी की एक tours and travels firm में जॉब कर रही थी। इसलिए हमने फ़ैमिली बढ़ाने के लिए कुछ समय रुकने का फ़ैसला किया लेकिन दो साल बाद चीजें बिगड़ने लगीं।”
“कहते रहो,”
“म…मैं जो कहने वाला हूँ उसे समझना थोड़ा मुश्किल है…आ…आप पागल समझेंगे मुझे,”
“मुझे तो सारी दुनिया पागल लगती है…और दुनिया को मैं, इसकी फ़िक्र तुम मत करो। तुम अपनी कहो,”
“Black magic. मुझ पर काला जादू किया गया था….मुझ पर और देवयानी पर। दरअसल मुझे बचपन से ही supernatural and paranormal entities दिखाई देती हैं…”
कहते हुए संदेश ख़ामोश हुआ, निमित्त की प्रतिक्रिया भाँपने के लिए।
मौन।
कोई प्रतिक्रिया ना आई। संदेश ने आगे कहना शुरू किया।
“मैं पहले गोवा, पुणे, नासिक और मुंबई में local events, concerts करता था। Youtube channel भी अच्छा जा रहा था। लगभग 10K followers हो चुके थे। Music Album के लिए गाने record कर रहा था ताकि किसी बड़ी music company को album release करने के लिए अप्रोच कर सकूँ पर एकाएक सब बदल गया। शुरुआत देवयानी के बीमार पड़ने से हुई। Normal typhoid, फिर jaundice…लगभग 6 महीने देवयानी bedridden रही। मेरा ज़्यादातर समय उसकी take care में जाता। Music के लिए ना समय मिलता और ना ही अंदर से inspiration आती। धीरे-धीरे concert और shows के offer आने बंद हो गए। देवयानी की भी जॉब चली गई। लाइफ़ में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे हमारी ख़ुशियों को किसी की नज़र लग गई है,”
“फिर?”
“फिर हम एक सिद्ध तांत्रिक से मिले। उसने पता लगा लिया कि हम पर किसने काला जादू किया है,”
“किसने?”
“मेरी खुद की सगी बुआ ने। मेरी बुआ इससे पहले भी ऐसी हरकत कर चुकी थी। जब मैं बच्चा था, बुआ ने मेरे पीछे एक पिशाच लगा दिया था। वर्षों तक उस पिशाच ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। फिर एक पीर ने मुझे उस पिशाच से छुटकारा दिलाया। इसके बाद ही मेरा म्यूज़िक करियर स्टार्ट हुआ। मैं देवयानी से मिला। मेरी लाइफ़ ट्रैक पर आने लगी थी और बुआ ने एक बार फिर मेरी ख़ुशियों को अपने काले इरादों का निशाना बनाया,”
“हम्म….काफ़ी लाड़ले लगते हो बुआ के…वैसे इतना श्योर कैसे हो कि बुआ का प्यार ही काले जादू की बौछार बन कर बरसा था तुम्हारी नई बसी बगिया में? यह कर के उसका क्या फ़ायदा?”
“तांत्रिक ने ही अपनी शक्तियों से यह पता लगाया कि ये सब बुआ का किया-धरा है। उसी तांत्रिक ने काले-जादू की काट भी की,”
“फिर? सब ठीक हो गया?”
“कुछ समय के लिए हाँ। दरअसल, उस तांत्रिक ने ही बताया था कि बुआ के किए काले-जादू को पूरी तरह ख़त्म नहीं किया जा सकता। बुआ जब तक ज़िंदा रहेगी उसका किया काला-जादू अपना असर दिखाता रहेगा। यह सिलसिला उसके मरने के बाद ही ख़त्म होगा,”
“तो? बुआ मर गई?”
“न…नहीं, अब भी ज़िंदा है। हम उससे कोई सम्बंध नहीं रखते, पर वो रह-रह कर अपनी इन घिनौनी हरकतों से बाज नहीं आती,”
“मेरा सवाल अब भी वही है, इसमें बुआ का क्या फ़ायदा?”
“बुआ का एक लड़का है। आलसी, नाकारा-कामचोर और मंदबुद्धि। वो बचपन से ऐसा था। मैं पढ़ने में अच्छा था, मेहनती था, मेरे म्यूज़िक और मेरे स्वभाव के कारण सब मुझे पसंद करते थे जब कि उसे हमेशा दुत्कार मिलती थी। बुआ को ये बात बर्दाश्त ना थी। अपने बेटे को लेकर हीन भावना के कारण उसे मुझसे ईर्ष्या होने लगी। बचपन में मैं बुआ का लाड़ला था। जब भी बुआ के घर जाता वो प्यार से मेरी पसंद का खाना बना कर मुझे अपने हाथों से खिलाती। पर मुझे नहीं पता था कि वो खाने की आड़ में मुझे अपने टोने-टोटके का शिकार बना रही है। धीरे-धीरे कर के बुआ का लड़का हर चीज़ में मुझसे बेहतर होने लगा जब कि मैं पूरी मेहनत करने पर भी पिछड़ता जा रहा था। यही समय था जब मुझे पिशाच, आत्माएँ और paranormal entities नज़र आनी शुरू हुई। उस समय मेरे एक दूर के मामा, जो पहुँचे हुए सिद्ध भग़त थे, उन्होंने मेरी माँ के कहने पर मेरे लिए जाप और अनुष्ठान किए, तब किसी तरह मैं इन चीज़ों से बाहर आ पाया, इसके बाद माँ ने मेरा बुआ के घर आना-जाना बंद कर दिया,”
“ये कब की बात है? तुम्हारे बचपन की?”
“हाँ,”
“जब तुमने बचपन में बुआ से नाता तोड़ लिया तो जवानी में तुम पर और तुम्हारी बीवी पर काला जादू कैसे किया उसने?”
“बताता हूँ, वो भी बताता हूँ। दरअसल, देवयानी आज के समय की मॉडर्न, आज़ाद ख़याल लड़की है। आज कल तो ऐसे भी रीति-रिवाजों, मान्यताओं और इन चीज़ों को अंधविश्वास, दक़ियानूसी पिछड़ी सोच बोलना फ़ैशन है, ऐसा करने वाले खुद को कूल समझते हैं और इन बातों में मानने वालो को फूल,”
“हम्म…अपना-अपना नज़रिया है,”
“मैंने शादी से पहले ही देवयानी को अपनी बुआ और उसकी काली करतूतों के बारे में सब कुछ बताया था और साफ़ तौर पर उसे बुआ से दूर रहने की हिदायत दी थी। देवयानी मेरी सोच और बातों से सहमत तो नहीं थी, फिर भी उसने मेरी बात ना काटी। लेकिन बुआ के जीवन का मक़सद ही मुझे बर्बाद कर के अपने बेटे का जीवन संवारना था, वो भला कहाँ पीछे हटने वाली थी,”
“तो अब बुआ को कौन से इग्ज़ैम में अपने लौंडे के percentage तुमसे ज़्यादा चाहिए थे?”
“लाइफ़ के इग्ज़ैम में। मुझसे बेहतर मार्क्स ला कर भी उसका लड़का बेरोज़गार बैठा था। बिना दहेज के भी कोई उससे अपनी लड़की ब्याहने को तैयार ना था। वहीं मेरा म्यूज़िक करियर बढ़िया जा रहा था, देवयानी जैसी खूबसूरत, गुणी, अपने पसंद की लाइफ़ पार्ट्नर मिली थी। बुआ की छाती पर साँप कैसे ना डँसते। एक दिन जब मैं घर पर नहीं था तब मिलने के बहाने वो घर पर आ धमकी। आप तो जानते हैं निमित्त, ऐसे लोगों में अपनी बातों के जाल में सामने वाले को फाँस लेने की सम्मोहन शक्ति होती है,”
“हम्म…”
“बुआ ने अपनी चाशनी घुली चिकनी बातों के सम्मोहन में मेरी भोली-भाली देवयानी को फाँस लिया। देवयानी को यक़ीन हो गया कि बुआ दिल की बहुत अच्छी है और हमारा भला चाहती है, और मैंने ही उसे समझने में गलती की। मेरे ना रहने पर बुआ का देवयानी से मिलने आना-जाना अक्सर का कार्यक्रम हो गया जिसकी मुझे कोई ख़बर ना थी। मुझे इस बाबत कुछ ना बताने के लिए बुआ ने ही देवयानी को पाठ पढ़ाया। उसने देवयानी से कहा कि सही समय आने पर मुझे बताएँगे वरना अगर अभी मुझे आभास हुआ तो मैं बुआ का घर आना और देवयानी से मिलना बंद करा दूँगा…और मैं ऐन ऐसा ही करता,”
“तुम्हें कब पता चला?”
“बहुत देर से। एक दिन मैं अपनी अल्बम रिकॉर्डिंग से वापस घर लौटा। देवयानी ने मेरे आगे सफ़ेद खीर की कटोरी रख दी। मेरे वापस आने पर देवयानी अक्सर मेरी पसंद का कुछ ना कुछ खाने का आइटम बना कर रखती थी। खीर वाक़ई बढ़िया बनी हुई थी। मैं चुटकियों में कटोरी चाट गया। मैं खीर और देवयानी के culinary skills की तारीफ़ करते नहीं थक रहा था जब उसने कहा कि ये खीर ख़ास हमारे लिए बुआ जी बना कर लाई हैं तो मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन और हाथ से ख़ाली खीर की कटोरी निकल गई। मैं पागलों की तरह चिल्लाया। देवयानी मुझे यक़ीन दिलाने की कोशिश कर रही थी कि बुआ हमसे प्यार करती हैं, हमारा भला चाहती हैं, मैं उन्हें ग़लत समझ रहा हूँ लेकिन मैं जानता था कि मैं सही हूँ और जीवन में अब सब ग़लत होने वाला है।”
“कभी ये ख़याल आया कि तुम भी ग़लत हो सकते हो और देवयानी सही?”
“आया था। बराबर आया था। बारम्बार आया था। देवयानी के समझाने और मनाने पर मैंने ये मान भी लिया कि मुझे ही समझने में गलती हुई, बुआ ने कुछ नहीं किया…लेकिन फिर इस घटना के कुछ दिन बाद ही देवयानी बीमार पड़ी और फिर वो सिलसिला शुरू हुआ जो मैंने पीछे आपको बताया। मैं काफ़ी जगहों की ख़ाक छानता हुआ एक एक पीर दरवेश बाबा के पास पहुँचा,”
“तो इस बार तुम पीर-दरवेश के पास पहुँच गए। क्यों? ये cultural shift लेने की क्यों सूझी। इस बार अपने वो बगुला भग़त….sorry-sorry…क्या था वो…हाँ…मामा भग़त के पास क्यों ना गए जिसने बचपन में तुम्हारे पर बुआ स्पॉन्सर्ड ब्लैक-मैजिक वाइट-वॉश किया था?”
“सबसे पहले उनके पास ही गए थे पर इस बार उन्होंने मदद करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि इस बार जो शक्ति हमारे पीछे लगाई गई है उसे क़ाबू कर पाना उनके वश की बात नहीं। इसके बाद हम कई जगह भटकते रहे, अंत में अजमेर के पहुँचे हुए पीर-दरवेश के पास जा कर इस मुश्किल से जान छूटी। उन पहुँचे हुए पीर ने बताया कि बुआ ने हमारे ऊपर एक खबीस छोड़ा है,”
“कौन था वो खबीस?”
संदेश हड़बड़ाया, फिर संभलते हुए बोला,
“खबीस बोले तो…एक नापाक रूहानी ताक़त होती है, ये जिन्नों की एक क़ौम है,”
“फिर? तुम्हारे पीर ने खबीस उतार दिया?”
“हाँ। आख़िरकार, बहुत मुश्किल का सामना कर के उन्होंने खबीस से हमारा छुटकारा करवाया।”
“तो ये तुम्हारी शादी के दो-तीन साल बाद का क़िस्सा है?”
“जी हाँ,”
“तो अब क्यों सुना रहे हो? खबीस वापस लौट आया?”
“नहीं-नहीं…इस बार जो आया है वो तो कुछ और ही है। उस खबीस से भी बहुत ज़्यादा भयानक।”
“और ये “बहुत ज़्यादा भयानक” भी तुम्हारी बुआ का चो..(स्कैली हरामख़ोर…) छोड़ा हुआ है?”
“नहीं। ये वाला देवयानी की बुआ का छोड़ा हुआ है?”
“अबे! ये तुम दोनों मियाँ-बीवी की बुआओं ने collab कर के कोई सीक्रेट संगठन बनाया हुआ है क्या?”
“मैं समझाता हूँ…सब समझाता हूँ। मल्हार गाँव में देवयानी के डैड का पुश्तैनी बंगला जो कई पीढ़ियों पहले इनके पुरखों ने बनवाया था, उसके साथ लगी कुछ ज़मीन है जिसपर काजू की खेती होती है। तक़रीबन पाँच साल पहले देवयानी के साथ मैं यहाँ शिफ़्ट हो गया। इस समय तक हम दोनों के पास ही ना कोई काम बचा था ना घर चलाने को पैसे। देवयानी के डैड के कहने पर हम उनके साथ इस भूत बंगले में रहने आ गए। यहाँ देवयानी के मॉम-डैड, उसका बड़ा भाई और उसका परिवार पहले से रह रहे थे। इस जगह की एनर्जीज़ कभी भी अच्छी नहीं थी। ऐसी मान्यता है कि पहले से ज़मीन पर कोई प्राचीन मंदिर था जिसे पुर्तगालियों ने तोड़ दिया। बाद में यह ज़मीन पुर्तगालियों ने अपनी सेवा के बदले इनाम स्वरूप इनके पुरखों को दी थी जहां यह बंगला बनाया गया,”
“इतनी लम्बी backstory में फ़िलहाल जाने की ज़रूरत नहीं। फटाफट मुद्दे पर आओ,”
“यहाँ आने के थोड़े समय में मुझे एहसास हुआ कि इस जगह पर ज़रूर पारलौकिक शक्तियों का क़ब्ज़ा है। देवयानी को भी यह चीज़ फ़ील हुई,”
“एक मिनट! तुमने कहा ये देवयानी का पुश्तैनी मकान है। यानी उसका बचपन-जवानी सब यहीं बीता, ठीक?”
“बराबर,”
“और तब उसे कभी इन पारलौकिक शक्तियों का आभास नहीं हुआ, पर शादी के बाद तुम्हारे साथ यहाँ वापस आने पर उसे भी वही लगा जो तुम्हें लगा….या फिर तुम्हें ऐसा लगा कि देवयानी को भी वही लगा जो तुम्हें लगा, जबकि ऐसा था नहीं?
“इन घटनाओं के क़िस्से तो उसने बचपन से सुने थे लेकिन यह उसके लिए सिर्फ़ डरावनी कहानियाँ थीं जो बच्चों को डराने के लिए सुनाई जाती हैं, इन पर उसे यक़ीन नहीं था पर इस बार वापस लौटने पर कुछ ऐसी घटनाएँ होने लगीं कि देवयानी को भी यक़ीन हो गया कि उसके पुश्तैनी मकान में कुछ गड़बड़ है,”
“कैसी चीजें?”
“देर रात किसी के सिसक-सिसक कर रोने की आवाज़ें आना। कदमों की आवाज़ें, जैसे कोई पूरे घर में घूम रहा हो…कभी गुनगुनाते हुए, तो कभी सिसकते हुए। कभी-कभी ऐसा लगता जैसे किसी की निगाहें चौबीस घंटे हमें घूर रही हों…”
“आगे?”
“हाँ, आगे से…पीछे से भी…हर जगह से घूर रही हों….”
“अरे आगे बोल मेरे भाई…कहानी की गाड़ी आगे बढ़ा। थोड़ी देर पहले कह रहा था बुआ ने काला जादू कर दिया, अब कह रहा पुश्तैनी भूत है, विरासत में मिला है…दहेज में तुम्हारे साथ आया है। अरे भई, कहना क्या चाहते हो?” निमित्त कलपते हुए बोला।
“समझाता हूँ। सब समझाता हूँ। दरअसल देवयानी के डैडी का एक और मकान है दीवार आइलैंड पर,”
“एक और घर? पिछले में विरासती भूत था इसमें क्या है? पुश्तैनी पिशाचिनी?”
“नहीं-नहीं, इसमें कुछ भी नहीं। ये प्रॉपर्टी उन्होंने अपने एक दोस्त से ख़रीदी थी जो गोवा छोड़ कर यू.एस. सेटल हो गया। यह वाला घर उन्होंने अपने बेटे, यानी देवयानी के बड़े भाई के नाम कर दिया। उसका बड़ा भाई अपनी फ़ैमिली के साथ यहाँ शिफ़्ट हो गया। अब पुश्तैनी घर में बचे देवयानी के मॉम-डैड, देवयानी और मैं।”
“हम्म,”
“देवयानी के डैड ने अपनी विल में पुश्तैनी मकान और उसके साथ लगे काजू के बाग अपनी बेटी…यानी देवयानी के नाम कर दिए,”
“तुम्हारा मतलब तुम्हारे और देवयानी के नाम नहीं…सिर्फ़ देवयानी के नाम?”
“हाँ, सिर्फ़ देवयानी के नाम। पर मुझे इसमें कोई दिक़्क़त नहीं, ना ही उस प्रॉपर्टी में कोई दिलचस्पी है,”
“आमतौर पर पुश्तैनी ज़मीन-मकान का लीगल वारिस बेटा या बेटे का बेटा होता है। इस हिसाब से पुश्तैनी घर लड़के को मिलना चाहिए था और दूसरी प्रॉपर्टी लड़की को,” निमित्त विचार करते हुए बोला।
“है ना! लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि देवयानी का बड़ा भाई ना इस मनहूस, भूतिया मकान में रहना चाहता था और ना ही इससे कोई वास्ता रखना चाहता था। इसलिए उसे इससे बेहतर प्रॉपर्टी ख़रीद कर दे दी गई और ये भूत बंगला हमारे सिर आ गया,”
“लेकिन देवयानी के पेरेंट्स भी तुम दोनों के साथ इसी भूत बंगले में रह रहे थे? वो नहीं गए अपने बेटे के साथ रहने?”
“हाँ। वो लोग यहीं रह रहे थे। अब असली कहानी शुरू होती है…”
“शुक्र है भगवान का…” निमित्त होंठों में बुदबुदाया।
“देवयानी की बुआ, यानी उसके डैड की छोटी बहन जो कलंगूट में रहती हैं वो एक दिन एकाएक आ धमकीं और इस पुश्तैनी प्रॉपर्टी में अपने हिस्से की माँग करने लगीं। हिस्सा ना दिए जाने की सूरत में कोर्ट केस की धमकी देने लगीं। देवयानी के डैड ने उन्हें बेइज़्ज़त कर के, दुत्कार कर वहाँ से दफ़ा कर दिया। जाते-जाते बुआ धमकी दे कर गई कि उस बंगले में रहने वाले हर इंसान का सर्वनाश हो जाएगा। इसके बाद से वहाँ अक्सर ऐसी चीजें बरामद होने लगीं जिनका प्रयोग काला जादू करने के लिए किया जाता है। पहले से ही बदतर हालात और बिगड़ने लगे। देवयानी के डैड बेहद परेशान रहने लगे। उन्हें अनजान साये नज़र आने लगे। वो हर समय अपने-आप में बड़बड़ाते रहते। रातों को सोते हुए चीख कर उठ बैठते, कहते थे कि उन्हें फील होता है जैसे कोई उनकी छाती पर चढ़ के बैठा है। हर समय डरे-डरे नज़र आते। पागलों की तरह अपने आप से बातें करते। फिर दो साल पहले एक ऐक्सिडेंट में उनकी मौत हो गई। मेरा ऐसा मानना है कि उनकी मौत के पीछे भी देवयानी की बुआ का हाथ है,” संदेश अपनी बात पर ज़ोर देते हुए बोला।
“हम्म…यानी सारी प्रॉपर्टी अब देवयानी की मिल्कियत थी?”
“हाँ। और आप सोच भी नहीं सकते उसके बाद क्या हुआ?”
“जो कुछ भी देवयानी के डैड के साथ हो रहा था वो सब देवयानी के साथ होने लगा।” निमित्त शांत पर आश्वस्त भाव से बोला
“ओह! आपने तो सोच लिया…आई मीन जान लिया। हाँ, बिल्कुल वैसा ही हुआ जैसे आपने कहा। देवयानी के डैड की डेथ के बाद देवयानी के साथ भी वही सब कुछ होना शुरू हो गया। वो रातों को सोते हुए अचानक से चीख मार कर बिस्तर पर बैठ जाती। कहती कि उसके सीने पर कोई सवार है। अपने आप में बड़बड़ाती रहती, कहती उसे आवाज़ें सुनाई देती हैं जैसे कोई उससे बात कर रहा हो। उसकी हरकतें बिल्कुल पागलों जैसी होने लगीं,”
“कोई प्रोफेशनल हेल्प सीक करने की कोशिश की,”
“बहुत से साइकिक, ऑकल्टिस्ट ट्राय किए…”
“प्रोफेशनल हेल्प से मेरा मतलब है किसी साइकेट्रिस्ट को कंसल्ट करने की कोशिश की?”
संदेश थोड़ा सकपकाया, जैसे उसे निमित्त से ऐसे बेतुके सवाल की अपेक्षा नहीं थी,
“देवयानी के डिप्रेशन का ट्रीटमेंट चल रहा है। अब भी रेग्युलर दवाइयां लेती है लेकिन उन दवाइयों से वहम दूर होता है, खतरा नहीं। देवयानी के साथ जो कुछ भी हो रहा यो उसके या मेरे दिमाग़ की उपज नहीं, एक भयावह सच है जिसे हम हर दिन जी रहे हैं, भुगत रहे हैं। दवाइयां अब देवयानी पर ख़ास असर नहीं करती। मुझे डर है कि देवयानी का दिमाग़ ये डर, ये प्रेशर अब ज़्यादा समय तक सहन नहीं कर पाएगा। या तो जो भी काली शक्ति देवयानी के पीछे लगी है वो देवयानी को ख़त्म कर देगी या फिर इस डर के साये में जीते-जीते थक कर देवयानी का दिमाग़ जवाब दे जाएगा और वो ख़ुद को ही ख़त्म कर लेगी,” कहते हुए संदेश एकाएक चुप हुआ।
“क्या देवयानी ने हाल-फ़िलहाल में ख़ुद को चोट पहुँचाने की कोई कोशिश की है?”
“जी। हालात इतनी तेज़ी से बिगड़ रहे हैं कि मुझे डर है किसी भी दिन देवयानी के साथ वैसी कोई घटना घट सकती है जैसी घटना ने उसके डैड की जान ले ली।”
लाइन पर फिर से निस्तब्ध सन्नाटा पसर गया। कुछ देर बाद निमित्त की गंभीर आवाज़ गूंजी।
“हम्म…ठीक है। मैं आपका केस लेने को तैयार हूँ,”
“Thank-you…thank-you so much Nimitt. मैं बता नहीं सकता आपने मेरे ऊपर कितना बड़ा एहसान किया है,”
“ना। कोई एहसान नहीं कर रहा। एहसान की दुकान से अपनी ना लेनी है ना देनी। अगर आपको मेरी प्रोफेशनल सर्विसेज चाहिए तो मेरे काम की आप पूरी फीस भरेंगे।”
निमित्त के स्पष्ट-सपाट लहजे से संदेश सकपकाया, फिर संभलते हुए बोला।
“जी, बिल्कुल-बिल्कुल। क्या फीस चार्ज करेंगे आप?”
“दो लाख रुपए। ट्वेंटी फ़ाईव थाउजेंड एडवांस, सेवेंटी फ़ाईव थाउजेंड मेरे दीवार आइलैंड पहुँचने पर और रिमेनिंग वन लैख काम पूरा होने पर,” निमित्त यूँ बोला जैसे दिमाग़ी गुणा-भाग कर हिसाब लग रहा हो।
“ये…ये तो बहुत ज़्यादा है,” संदेश का हतोत्साहित स्वर फ़ोन पर सुनाई दिया।
“तुम्हारी दुश्वारियां भी तो ज़्यादा है। “खबीस पर काला-जादू फ्री, पैरानॉर्मल पर पिशाच फ्री” वाली तर्ज पर मर्ज़ पाले हुए हैं तुमने। जब मर्ज़ बड़े हों तो इलाज का बिल भी बड़ा ही आता है,”
संदेश कुछ देर शांत रहा जैसे माइंड मेक-अप करने की जद्दोजहद कर रहा हो। फिर आहिस्ता से बोला,
“ठीक है। मुझे मंज़ूर है।”
“बढ़िया, जिस नंबर पर कॉल किया है उस पर ही एडवांस अमाउंट UPI पेमेंट कर दो,”
संदेश ने निमित्त के निर्देश का पालन किया। निमित्त के फ़ोन पर बैंक अकाउंट क्रेडिट होने का मेसेज आया।
“बढ़िया। Your case is locked.”
“आप यहाँ कब आयेंगे?”
“कल सुबह-सुबह,”
“अभी नहीं आ सकते?”
निमित्त की नज़रें अपनी रिस्ट वॉच पर गईं। शाम के साढ़े सात होने को थे।
“Nope! अभी मुझे कहीं और होना है। अपना कम्पलीट एड्रेस मुझे टेक्स्ट करिए। कल सुबह मिलते हैं,” निमित्त ने बगैर सामने से उत्तर की प्रतीक्षा किए कॉल डिसकनेक्ट कर दी। काउच के पास बैठे अल्फ़ा की नज़रें निमित्त की और उठीं।
“चल अल्फ़ा, “घुम्मी-घुम्मी” टाइम,” निमित्त एक झटके में काउच से जम्प मार कर खड़ा होते बोला।
“घुम्मी-घुम्मी” अल्फ़ा के लिए मैजिक वर्ड थे। अल्फ़ा जानता था कि इसके बाद वो और निमित्त बाहर सैर पर निकलने वाले हैं।
“तुमसे मिलने की तमन्ना हैsss…प्यार का इरादा हैsss…और एक वादा है जा sss नम…
जो कभी हम मिलेsss…तो ज़माना देखेगा अपना प्यारsss…ओ मेरे यारsss,” 90s के रोमांटिक बॉलीवुड सॉंग गुनगुनाते हुए निमित्त ने अपने लंबे बालों में हेयर ब्रश फिराया और कानों पर हेडफ़ोन चढ़ा लिया।
“ओ हो sss…तो हमारे राजकुमार मॉलम के बाज़ार में बेकार भटकने के अपने डेली कार्य के लिए तैयार हो रहे हैं,” स्कैली की सरकास्टिक टोन वाली आवाज़ गूंजी।
“इस कुत्ते को बोल भौंकना बंद कर दे,” निमित्त अल्फ़ा की ओर देखते हुए बोला।
“सटक गएगा है कर रे हौले? अल्फ़ा तो भौंकाइच नहीं,” स्कैली की कन्फ्यूज्ड आवाज़ आई।
“तुझे नहीं, अल्फ़ा से बोल रहा था मैं कि इस कुत्ते से बोले भौंकना बंद करने को,” निमित्त स्कैली को टारगेट करते हुए बोला।
“वूफ़-वूफ़” अल्फ़ा अपनी दुम हिलाते हुए भौंका, जैसे निमित्त का इंस्ट्रक्शन फॉलो करते हुए स्कैली पर भौंक रहा हो।
“हाँ-हाँ, अपुन के ऊपर भौंक और इस हौले की साइड ले तू भी। इसको कुछ मत बोलना। भाई साहब सेम टाइम, सेम प्लेस, डेली पिछले एक साल से बस चले ही जा रहे हैं। पिछले एक साल में ये येड़ा जितना चल चुका है उतने में वास्को-डी-गामा चलते हुए गोवा पहुँच जाता,” स्कैली एक साँस में बोला।
“चल बेटे, हम चलते हैं अपने काम पर। इस हरामखोर की बकवास पर ध्यान मत दे,” निमित्त अल्फ़ा से बोला।
“हाँ, अपुन की मच-मच पर बेशक ध्यान मत दो पण मच-मच के पीछे का सच नहीं बदलेगा। इरा का केस ख़त्म हुए एक साल बीत गया। भाई साहब एक साल से मॉलम में टिके हुए हैं, काय कूँ?” स्कैली जैसे अल्फ़ा से बोला।
“वुफ़” अल्फ़ा अपने लंबे कान हिलाते हुए हल्के से भौंका जैसे स्कैली से जवाब पूछ रहा हो।
“लड़की का चक्कर कुत्तू भईया, लड़की का चक्कर। गर्मी, जाड़ा, बरसात कोई भी मौसम हो, भाई साहब पिछले एक साल से डेली एक टाइम पर निकल कर मॉलम मार्केट की खाक छानते हैं ताकि पलक को देख सकें। एंड माइंड यू, अकेले ये येड़ा नहीं है, लड़की भी येड़ी है बाप! वो भी डेली सेम टाइम, सेम प्लेस, सेम गेम कर रेली है। दोनों शाम में दो घंटे तक ख़ाली फोकट मार्केट में भटकते हैं ताकि चोरी-चोरी एक-दूसरे को देख सकें। अबे वो क्राइम पेट्रोल वाला अनूप सोनी और सावधान इंडिया वाला मुच्छड़ मिल कर इतना नहीं चले होंगे जितना ये दोनों पगला-पगली एक साल में चल चुके हैं इसके बाद भी इस फुदकते फट्टू से इतना नहीं होता कि लड़की को जा कर हेलो बोल दे,”
“देख तेरा ज़्यादा हो रहा है अभी, हाँ,” निमित्त स्कैली को वार्न करते हुए बोला।
“ज़्यादा? अबे लाउ(luvv) में डूबे लौंडे, आँखें खोल दुनिया देख। ये 90s वाले “चोरी-चोरी जब नज़रें मिली” वाले रोमांस का ज़माना नहीं है बाप! अब तो तेरे कुक्कुर की भी जनरेशन आ गई है?”
“क्या बक रहे हो माछेर झोर?”
“Gen-Alpha! जेन-अल्फ़ा का ज़माना है बाप! इतना स्लो-मो रोमांस करेगा तो लड़की चलते-चलते किसी और के साथ चल देगी और तू चलता ही रह जाएगा,”
“बकवास मत कर स्कैली। मैं क्यों जाऊँगा उसके पीछे? ये सिर्फ़ कोइन्सिडेन्स है कि हमारे वॉक पर निकलने की टाइमिंग सेम है,”
“वाह बेटे! पूरी दुनिया को बना रेला है, मेरे को मत बना समझा। चल एक काम कर, तू उसको ताड़ने को नहीं जाता ना, तो आज मत जा वॉक पर। मस्त दोनों भाई बैठ के 80s cringe horror देखेंगे, क्या बोलता है?”
निमित्त सकपकाया। उसने अल्फ़ा की और देखा, अल्फ़ा उसे देख कर दुम हिला रहा था।
“व…वो मुझे और अल्फ़ा को दीपक की दुकान पर “रॉस ऑमलेट खाने का है…है ना अल्फ़ा?”
“वुफ़” अल्फ़ा ने सहमति में गर्दन हिलाई।
“दो घंटे ऑमलेट खाओगे भाड़-भूजों?”
“तो तेरी क्यों सुलग रहे भूतिये? चल अल्फ़ा, इस कुत्ते की बकवास नहीं सुननी,”
“हाँ-हाँ जा, पर एक बात सुनता जा। लड़की के चक्कर में भाई को छोड़ के जा रहा है ना, जब-जब तेरी लाइफ़ में किसी फीमेल ने एंट्री ली है तो तेरा विधिवत ‘काटने’ के बाद ही एग्जिट हुई है। इस बार भी यही होगा,” स्कैली उसे वॉर्निंग देते हुए बोला।
निमित्त ने कोई जवाब ना दिया। वो और अल्फ़ा रूम से बाहर निकले। निमित्त ने अपना पुराना “ब्रास आउल लॉक” दरवाज़े पर लगाया जिसकी चाभी उसकी गले में लटक रही थी। सीढ़ियों से नीचे उतर कर निमित्त और अल्फ़ा “क्रिसेंट कॉटेज इन” के कंपाउंड में आए। क्रिसेंट कॉटेज Inn cum home-stay था जिसे जॉयस फ़र्नांडीज़ नामक विडो चलाती थी। जॉयस की उम्र तक़रीबन 70 के आस-पास होगी और वो पूरे एरिया में “जॉयस फुफ़्फ़ो” के नाम से जानी जाती थीं। साउथ गोवा, ख़ास कर मॉलम में आने वाले सैलानियों की गिनती नॉर्थ व वेस्ट गोवा की तुलना में नगण्य थी। एक साल पहले जब निमित्त वहाँ आया था तब जॉयस फुफ़्फ़ो घाटे में चल रही क्रिसेंट कॉटेज इन को बेचने का विचार कर रही थीं। निमित्त को जॉयस फुफ़्फ़ो के साथ अपनी पहली कन्वर्सेशन अब भी याद थी।
“मेरा बुड्ढा शादी बना के मेरे को इधर लाया। पिछले पचास साल ये घर सिर्फ़ घर नहीं था, हमारी लाइफ, ड्रीम्स, हैप्पी मोमेंट्स का विटनेस था, मैन। मेरा बुड्ढा टू ईयर्स पहले ऑफ हो गया, मैंने सोचा मैं भी इस घर से ऑफ हो के जाएगी, पण बुड्ढी को जीने के लिए खाना भी तो माँगता है ना मैन? इधर मंथ में मुश्किल से 2-4 टूरिस्ट आता है, मैक्सिमम टूरिस्ट लोग या तो फैंसी रिसोर्ट में रुकते या फिर मॉडर्न फैसिलिटी वाले गेस्ट हाउस में। इधर पुरानी ‘कंट्री साइड इन’ में कोई नहीं रुकना चाहता। यहाँ होटल फैसिलिटी नहीं है, मैं कर भी नहीं सकती।”
“बढ़िया। मुझे होटल और रिसोर्ट वाली फैसिलिटी चाहिए भी नहीं,” निमित्त सपाट भाव से बोला।
“तो फिर तुमको क्या माँगता है मैन?”
“सेपरेट लिविंग स्पेस, अटैच्ड बाथरूम और किचन के साथ। मेरे और अल्फ़ा के लिए काफ़ी है,”
“रूम में एसी भी नहीं है,”
“परफ़ेक्ट! मुझे चाहिए भी नहीं,”
जॉयस फुफ़्फ़ो ने हैरत से निमित्त को देखा।
“तेरा स्क्रू ढीला है क्या छोकरा?”
निमित्त ने मासूमियत से मुस्कुराते हुए सहमति में सिर हिलाया।
“कभी घमंड नहीं किया,”
“मैं ये जगह बेचने का सोच रही लड़के। I can’t afford a place like this anymore. इधर का मेंटेनेंस, रेनोवेशन, ये सब बुड्ढी के बस का नहीं, तुम कोई दूसरा जगह देख ले, मैन,”
“That’s sad. मैं तो साल भर के लिए लिविंग स्पेस रेंट पर लेने का सोच रहा था, वन टाइम एडवांस पेमेंट के साथ। 30 थाउजेंड पर मंथ रेंट ठीक रहेगा?” निमित्त मासूमियत से बोला।
जॉयस फुफ़्फ़ो का मुँह खुला रह गया।
“तुम सच्ची मैड है छोकरा। इधर लोग तेरे को फूल बना के लूट लेगा। ऐसा किसी को बोलने का नहीं, 30 thousand per month, are you out of your mind? इधर हाफ प्राइस में तेरे को इससे बेटर प्लेस मिल जाएगा,”
“पर मुझे बेटर प्लेस नहीं चाहिए ना, मुझे तो इस विंटेज लिविंग को एक्सपीरियंस करना है। ये जगह मेरे लिए बिल्कुल परफेक्ट है,” निमित्त ने अपनी चेकबुक निकाली और 3,60,000/- का चेक काट कर जॉयस फुफ़्फ़ो की तरफ़ बढ़ाते हुए बोला।
“तुम कोई शेडी बिज़नेस में तो नहीं है लड़के? ड्रग्स, स्मगलिंग? कोई दूसरा दो-नम्बर का धंधा?” जॉयस फुफ़्फ़ो ने सशंकित भाव से निमित्त को घूरते हुए सवाल किया।
“मुझे देख कर लगता है कि मैं ऐसा कुछ कर सकता हूँ?” निमित्त ने अपनी सूरत मासूम बनाते हुए पूछा।
“बुड्ढी का अक्खा लाइफ सब टाइप के कैरेक्टर देखते बीता है। आदमी का थोबड़ा देख के उसका सोल रीड करती मैं,” जॉयस फुफ़्फ़ो निमित्त के साथ से चेक लेते हुए बोली।
“क्या रीड किया फिर?”
“तू स्काउंड्रेल नहीं है, पण मेनेस है…ट्रबल मेकर है। बुड्ढी को ट्रबल तो नहीं देगा?” जॉयस फुफ़्फ़ो अपनी छोटी आँखें और सिकोड़ते हुए, निमित्त को घूरते हुए बोली।
“तौबा-तौबा! ऐसा करूँ तो अल्फ़ा की पूंछ टेढ़ी हो जाये,” निमित्त ने अपने दोनों कान पकड़े और जीभ दांतों के बीच दबाते हुए बनावटी मासूमियत से कहा।
अल्फ़ा ने अपनी पूंछ देखी और गोल घूमते हुए अपनी पूंछ पकड़ने की कोशिश करने लगा। जॉयस फुफ़्फ़ो मुस्कुराए बिना ना रह सकी। निमित्त एकाएक सीरियस हुआ,
“हमारी आत्मा…सोल..सारे इमोशंस फील करती है। ख़ुशी, प्यार, अपनापन, दुख, गुस्सा। सोल के सपने, इच्छाएँ, आशाएँ, भावनाएँ, सब रिफ्लेक्ट कैसे होते हैं? उस बॉडी से जिसमें वो सोल रहती है…यानी बॉडी सोल का घर होती है। उसी तरह हम जिस घर में रहते हैं वो घर हमारे सपने, इच्छाएँ, भावनाएँ रिफ्लेक्ट करता है। यानी हम सोल हैं तो हमारा घर वो बॉडी है जिसमें सोल रहती है। हर सोल को बॉडी चाहिए। इसलिए कोई भी इंसान ये डिज़र्व नहीं करता कि उससे उसका अस्तित्व…उसका घर छीन लिया जाए,” निमित्त की आँखों के पोरों पर एक पल को नमी छलकी जिसकी जगह फ़ौरन ही शरारत ने ले ली।
जॉयस फुफ़्फ़ो के चेहरे पर एक हल्की लेकिन आश्वस्त मुस्कान उभरी।
“इधर लाइट बहुत जाती है, बैक-अप सिस्टम नहीं है…wi-fi भी नहीं है, ज़िंदा रह लेगा?”
“I’ll thrive!”
“चलो तुमको तुम्हारा स्पेस दिखाती मैं,” जॉयस फुफ़्फ़ो निमित्त को लेकर सराय के कंपाउंड से गुज़रते हुए दाहिनी ओर बने सेपरेट, इंडिपेंडेंट एस्टेब्लिशमेंट की तरफ़ बढ़ी। सात चपटी-चौड़ी सीढ़ियों के ऊपर एक वुडेन फेंस पोर्टिको था जहाँ ढेरों छोटे-बड़े प्लांट पॉट्स रखे थे। सामने दो पल्ले का दरवाज़ा था जिस पर ताला लटक रहा था।
“तेरे को अपना लॉक लगाना होगा,” जॉयस फुफ़्फ़ो ताला और पीतल का धरहरा खोलते हुए बोली।
निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया।
अंदर एक मॉडरेट साइज लिविंग कम डाइनिंग स्पेस था। उसके सामने किचन था। किचन का बैकडोर बैकयार्ड की तरफ़ खुलता था। उस तरफ़ कोई भी बाउंड्री या फेंसिंग नहीं थी। बैकयार्ड अपने आप में छोटा-मोटा जंगल नज़र आता था जो पीछे स्वॉम्प और मॉलम के जंगली एरिया से मिलता था। किचन के बगल में एक बड़ा मास्टर बेडरूम था। बेडरूम से लगा एक छोटा स्टडी स्पेस और अटैच्ड बाथरूम थे। इस रूम के सामने एक छोटा रूम था जिसे क्लॉक रूम या गेस्ट बेडरूम की तरह यूज़ किया जा सकता था। इस रूम में भी एक बालकनी डोर था जो दाहिनी तरफ़ बसे घरों की दिशा में खुलता था।
“इससे बेटर मेरे पास कुछ नहीं,” फुफ़्फ़ो निमित्त को जगह दिखाते हुए बोली।
“ये बेस्ट है,” निमित्त चहकते हुए बोला।
“तुझे पसंद आया अल्फ़ा?” निमित्त ने अल्फ़ा से पूछा।
“वुफ़्फ़-वूफ़” तेज़ी से अपनी दुम हिलाते हुए अल्फ़ा ने अपनी सहमति जताई।
“फाइनली…हमारा घर, हमारा अपना घर,” निमित्त अल्फ़ा के बालों में उँगलियाँ फिराते हुए बोला।
अगले दो दिनों में निमित्त वहाँ शिफ्ट हो गया। क्रिसेंट कॉटेज इन में यदा-कदा आने वाले सैलानियों; जिनमें अधिकतर ट्रैवल ब्लॉगर्स होते थे, उनसे निमित्त को कोई मतलब नहीं होता था। निमित्त अपना ज़्यादातर वक़्त अपने स्पेस में बिताता। अपने केसेज़ के सिलसिले में या तो निमित्त हफ़्तों; कई बार महीनों गोवा से बाहर रहता, और जब वापस आता तो कई दिनों तक कमरे से बाहर ना निकलता लेकिन गोवा में रहने पर किसी भी हाल में वो शाम के साढ़े सात से साढ़े नौ के समय मॉलम मार्केट में ही पाया जाता। हालांकि उस जगह को मार्केट कहना ग़लत था।
वेस्टर्न घाट्स के तराई क्षेत्र में बसे मॉलम गाँव में मुश्किल से 400-500 घर थे। पूरा क्षेत्र घने जंगल, पैडी फील्ड्स और वॉटर फॉल्स से घिरा हुआ था। यहाँ से असल मार्केट, जैसे कर्चोरम मार्केट या वाल्पोई सिटी सेंटर लगभग 20km दूर थे लेकिन शाम के समय गाँव में छोटा खुला बाज़ार लगता था जहाँ रोज़मर्रा की ज़रूरतों के सारे सामान उपलब्ध था और खाने-पीने के लोकल फ़ूड स्टॉल्स थे। शाम के समय लोकल्स व सैलानी इवनिंग वॉक, रनिंग व ट्रेकिंग करने के लिए निकलते। वृत्तीय आकार में बसे गाँव की घुमावदार लेन्स एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं। व्यक्ति एक लेन से गोल घूमते हुए दूसरी में निकलता। दोनों ओर फ़ुटपाथ पर रंग-बिरंगी कपड़ों व आर्टिफ़ैक्ट्स की दुकानें और स्ट्रीट-फ़ूड स्टॉल लगते। इस एक साल में निमित्त लगभग वहाँ लगने वाली हर दुकान के एक-एक आइटम को और वहाँ नज़र आने वाले हर रेग्यूलर चेहरे को याद कर चुका था। पर उसका दिल सिर्फ़ एक चेहरे पर आ कर रुकता था।
निमित्त का दिमाग़ एकाएक फ़्लैशबैक से बाहर निकला। कॉटेज के सामने वाले हिस्से में जॉयस फुफ़्फ़ो रहती थीं। फ़िलहाल वहाँ कोई सैलानी ना था। निमित्त और जॉयस सराय में अकेले थे। उस घड़ी जॉयस फुफ़्फ़ो अपने पोर्टिको में रॉकिंग चेयर पर बैठी ऊँघती नज़र आ रही थीं। निमित्त उन्हें अपने जाने की इत्तला करना चाहता था पर उसने रात में वापस आने पर यह करने का फ़ैसला किया।
निमित्त अल्फ़ा के साथ कॉटेज से बाहर निकला।क्रिसेंट कॉटेज इन उस लेन की आखरी इमारत थी। दोनों तरफ़ ऊँचे खजूर के पेड़ और घनी झाड़ियाँ। लेन में दो-चार सेपरेट हाउसेस और थे। उन्हें क्रॉस कर के निमित्त दाहिनी तरफ़ मेन रोड पर मुड़ा।
यहाँ लेन के दोनों तरफ़ पटरियों पर दुकानें लगी थीं। सबसे पहला स्टॉल एक ठेला था जो फैंसी कलर्स से स्प्रे-पेंट किया हुआ था और इसपर ग्राफिटी स्टाइल में “दीपक की दुकान” लिखा था। दुकान पर एक तीस-पैंतीस साल का, छोटे कद और बिल्कुल दुबली-पतली क़द-काठी का व्यक्ति खड़ा था जो निमित्त को उधर आता देख तेज़ी से उसकी ओर हाथ हिला रहा था। ये दीपक शिरोडकर था। दीपक मॉलम का लोकल था। वो दिन में पेंटर का काम करता था; कैनवास और वॉल पेंटिंग्स से लेकर घरों के व्हाइट-वॉश करने तक, दीपक हर वो काम करता था जिसमें उसका वास्ता रंगों से पड़ता रहे और घर चलाने के लिए पैसे आते रहें। शाम के समय दीपक मॉलम मेन रोड पर रॉस ऑमलेट, मैगी, वड़ा-पाव और नारियल पानी का ठेला लगाता था। निमित्त डेली दीपक किसी दुकान पर अल्फ़ा के लिए बॉयल्ड एग लेने के लिए रुकता।
“इवनिंग सायेबा, इवनिंग अल्फ़ा,” निमित्त और अल्फ़ा को पास आता देख दीपक शिरोडकर के टीनू आनंद जैसे बड़े और पीले दाँत बाहर आ गए।
निमित्त ने सिर हिला कर उसका अभिवादन स्वीकार किया।
“रॉस ऑमलेट ट्राय करो ना सायबा, एक-दम फ्रेश एंड कड़क माल बनाया मैं,” दीपक प्लास्टिक स्टूल और चेयर पर कपड़ा मारते हुए बोला।
“नहीं दीपक। अल्फ़ा को उबले अंडे दे दो बस,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला। उसकी नज़रें दीपक की दुकान के आगे मेन रोड पर बायीं और की दूसरी लेन पर टिकी थीं।
“अभी खिलाता है सायबा,” कहते हुए दीपक ने एक साथ चारों बर्नर पर मैगी, रॉस, ऑमलेट, वड़ा-पाव और उबलने को अंडे चढ़ा दिए और अल्फ़ा के लिए पहले से उबाल कर रखे अंडे छीलने लगा। उस घड़ी निमित्त के अलावा दीपक की दुकान पर कोई ग्राहक ना था।
“ये इतना सारा आइटम किसके लिए चढ़ा रखा है?” निमित्त ने सवाल किया।
“बस क्या सायबा, ये तो डेली का है। तुम हमारा दुकान पर आता है, तुम्हारा साथ-साथ बरकत बन कर माँ लक्ष्मी भी आता है। तुम्हारे आने के साथ ही ऐसा ग्राहक लोग का लाइन लगता अपने स्टॉल पर कि एक साल में अपना धंधा डबल हो गया है। तुम एक साल और इधर रह गया तो अपुन ख़ुद का रेस्टोरेंट कम बार खोल लेगा,”
“मेरे आने से ग्राहकों के आने का क्या लेना-देना? तेरा रॉस ऑमलेट इतना ज़बरदस्त है कि कस्टमर ख़ुद ही खिंचे चले आते हैं,” निमित्त ने अपनी बात कम्पलीट ही की थी कि अचानक दीपक की दुकान पर ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी। दीपक ने विजयी मुस्कान के साथ निमित्त को देखा।
“रॉस ऑमलेट देना…मेरे को चीज़ मैगी…मेरे को एग मैगी…मेरे को बटाटा बड़ा और पाव” कस्टमर्स का शोर बढ़ रहा था।
“मिलेगा-मिलेगा, सबको मिलेगा, कोई धक्का-मुक्की नको करने का बाबा, सबसे पहला अपना अल्फ़ा बाबा खायेगा, उसके बाद सब का ऑर्डर लेगा मैं,” दीपक अंडे छील कर अल्फ़ा को खिलाते हुए बोला।
निमित्त की नज़रें बायीं लेन से हट नहीं रही थीं। कभी वो अपनी रिस्ट वॉच देखता तो कभी लेन। तभी निमित्त के पीछे से एक लड़की की हँसी गूँजी और फिर “ओल्ड मनी” परफ्यूम की खुशबू आई। निमित्त ये ख़ुशबू अच्छी तरह पहचानता था।
निमित्त पीछे पलटा।
पलक उसके बिल्कुल क़रीब से, लगभग उससे टच होते हुए गुज़री। एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं। पलक फ़ोन पर अपनी बेस्ट फ्रेंड से बात करते हुए खिलखिला रही थी।
वातावरण में गाने की धुनें गूंजी,
“अहा…हा..ह..हा..हा..ल..ल..ला..ला..ला..राह में उनसे मुलाक़ात हो गई…जिससे डरते थे, वो ही बात हो गई,”
“कमाल है, इस बार तो हरामखोर स्कैली भी गाना नहीं बजा रहा, फिर भी मुझे गाना सुनाई दे रहा है,” निमित्त ख़ुद में बुदबुदाया।
“अबे ओ आशिक़ के चौदहवें चेले, आँखें खोल और ज़रा आजु-बाजू की दुनिया देख,” स्कैली की आवाज़ आई।
निमित्त चौंक कर पलटा, गाना दीपक के ठेले पर लगे ब्लूटूथ स्पीकर से आ रहा था। दीपक निमित्त को देख कर आँखें मटकाते हुए, अपने दाँत निकाल कर मुस्कुराया।
“अल्फ़ा का ख़्याल रखना दीपक, मैं ज़रा वॉक कर के आता हूँ,” निमित्त ने झेंपते हुए कहा और आगे बढ़ गया।
उसके और पलक के बीच लगभग दस कदमों का फ़ासला था, निमित्त ने वो फ़ासला तय करने की कोशिश ना की। फ़ोन पर बात करती हुई पलक अपनी धुन में चली जा रही थी और निमित्त उसके पीछे। आगे दो लेन पार करने पर रास्ता दाहिनी तरफ़, शिव मंदिर की ओर मुड़ता था। पलक उस ओर मुड़ी और मुड़ते हुए उसने एक उड़ती नज़र अपने पीछे डाली। उसने ये एक्शन बिल्कुल कैजुअल रखने की कोशिश की थी। उसकी नज़रें एक पल को पीछे आते निमित्त से मिलीं और फिर वो आगे बढ़ गई। निमित्त को रास्ते में मोहल्ले के बच्चों के हुजूम ने घेर लिया जिनसे निमित्त की अच्छी दोस्ती हो गई थी। भूमिका, दिव्यांशी, अन्विका, रेमो, जैसी, ये सभी निमित्त को घेर कर बतियाने लगे। पलक शिव मंदिर के बाहर खड़ी अपनी बेस्ट फ्रेंड का इंतज़ार कर रही थी। उसकी उड़ती नज़रें बार-बार निमित्त की और उठतीं। कभी घुटनों के बल बैठा निमित्त बच्चों की भीड़ में ग़ायब हो जाता तो वो उचक कर उसे देखने की कोशिश करती और जैसे ही निमित्त की निगाहें उससे मिलती वो झट से अपनी नज़रें यूँ हटा लेती जैसे उसकी और देखने का उसका कोई इरादा ना था।
बच्चों के झुंड से फ़ारिग़ हो कर निमित्त मंदिर की और बढ़ा ही था कि पलक की बेस्ट फ्रेंड वहाँ पहुँच गई। नाटे और बेहद मोटे क़द-काठी की ख़ुशबू के चेहरे पर निमित्त को देखते ही घोर घृणा के भाव उभरे। ख़ुशबू निमित्त को सख़्त नापसंद करती थी और उसके पास ऐसा करने के लिए जस्टीफ़ाइड और वैलिड रीज़न था।
बात एक साल पहले की है जब निमित्त नेबरहुड में नया-नया आया था। एक रोज़ निमित्त अल्फ़ा के साथ अपनी क्रूज बाइक पर सवार हो मेन रोड से गुज़र रहा था कि रॉंग साइड से एक अनियंत्रित हुई स्कूटी तेज रफ़्तार उनकी ओर बढ़ती नज़र आई।
“ये सर्कस से स्कूटर चलाता हाथी किसने छोड़ दिया?” निमित्त अल्फ़ा से बोला। तभी निमित्त की नज़र रोडसाइड पर साइकिलिंग करती पाँच साल की माही पर गई। लहराती स्कूटी उसी तरफ़ रूख कर रही थी। निमित्त ने बाइक का हैंडल घुमाया और डाइव मारते हुए माही को उठा कर बाइक के पेट्रोल टैंक पर बिठा लिया। अनियंत्रित स्कूटी सवार ख़ुशबू पीछे एक पेड़ से जा टकराई और स्कूटी समेत उलट गई।
“पता नहीं ये डबल डेकर बस को स्कूटी चलाने का लाइसेंस कैसे मिल गया,” निमित्त ने जानबूझ कर तेज़ आवाज़ में खुश्बू को सुनाने के इरादे से कहा और उसे उठाए या उसकी मदद किए वहाँ से चला गया।
इस घटना के काफ़ी टाइम बाद निमित्त को पता लग कि ख़ुशबू पलक की बेस्ट फ्रेंड है जब उसने दोनों को साथ में देखा।
“ब्वाहाहाहा….लगता है पूरी कायनात अपनी मरा के तेरी लाउ स्टोरी के लौ लगाने पर तुली है हौले। अबे! लड़की पटाने में सबसे क्रूशियल रोल उसकी बेस्ट फ्रेंड का होता है। इस बेस्ट फ्रेंड नाम की जंतु की सहायता से अड़ियल से अड़ियल घोड़ी की सवारी की जा सकती है…आई मीन लड़की पटाई जा सकती है पर ये दरियाई घोड़ी इस जन्म में तेरी सेटिंग नहीं होने देगी,” स्कैली की आवाज़ निमित्त के ज़हन में गूंजी। निमित्त फ़्लैशबैक से फिर वापस आया।
उसने ख़ुशबू को खा जाने वाली नज़रों से उसे घूरता पाया। निमित्त को अपनी तरफ़ देखता पा कर ख़ुशबू ने नज़रें पलक की ओर घुमाते हुए उससे कुछ कहा। पलक ने एक नज़र निमित्त की ओर देखा फिर ख़ुशबू पलक को लेकर वहाँ से चली गई।
“देख-देख, ख़ुशबू नाम की दरियाई घोड़ी तेरी बिना बसी दिल की बगिया में बदबू फैला रेली है।” स्कैली निमित्त को चिढ़ाते हुए बोला।
शाम की आरती शुरू हो चुकी थी। पलक और ख़ुशबू मंदिर में दाखिल हुई। निमित्त ने दूर से ही शीश नवा कर प्रणाम किया और वापस दीपक की दुकान की तरफ़ मुड़ गया। अल्फ़ा अब तक जी भर के अंडे खा चुका था और ठेले के पास इत्मीनान से बैठा निमित्त की प्रतीक्षा कर रहा था। दीपक की दुकान पर कस्टमर्स की खचाखच भीड़ थी, दीपक उनके ऑर्डर बनाने में व्यस्त था। निमित्त को आता देख अल्फ़ा ख़ुशी से अपनी दुम हिलाने लगा।
“एक रॉस ऑमलेट और पाव पार्सल बाँध देना दीपक,”
“हो सायबा, अभी लो,” दीपक ने फ़ौरन अपने स्टील ग्लास में दो अंडे फोड़े, उसमें प्याज़, हरी और लाल मिर्च, धनिया, पुदीना, नमक और मसाले डाल कर फेंटने लगा।
निमित्त वहाँ से गुज़रते लोगों को देख रहा था। ख़ुशबू और पलक वापस आती दिखाई दीं। निमित्त का चेहरा खिल गया।
पलक ख़ुशबू से बातों में व्यस्त थी, उसकी नज़रें निमित्त की ओर उठीं। निमित्त को पहले से अपनी तरफ़ देखता पा कर पलक ने फ़ौरन अपनी नज़रें फेर लीं। निमित्त हौले से मुस्कुराया। उसके क़रीब से गुज़रती पलक की पलकें एक बार फिर निमित्त की ओर उठीं। कहना मुश्किल था कि पलक के अधरों पर आई मुस्कान निमित्त को देख कर आई थी या अपने साथ चलती ख़ुशबू की किसी बात से। दीपक की दुकान से बिल्कुल लगे हुए एक जंक ज्वेलरी की दुकान थी। खुशबू के साथ चलती हुई पलक कैजुअली वहाँ आ खड़ी हुई और ईयररिंग्स चेकआउट करने लगी। इतने में दीपक ने रॉस ऑमलेट और पाव पार्सल बाँध कर निमित्त को पकड़ाया।
“वो दीपक, मैं क्या बोल रहा था…मैं इधर शायद 4-5 दिन नहीं रहूँगा, बाहर जा रहा काम से,” निमित्त अपनी वॉइस पिच जान कर थोड़ी ऊँची रखते हुए बोला। नज़रों के कोनों से वो पलक को देख रहा था। वो देखना चाहता था कि उसकी बात का पलक पर कोई रिएक्शन होता है या नहीं। विज़िबली उसपर कोई असर नहीं नज़र आया लेकिन उसकी बॉडी लैंग्वेज में एक सटल स्टीफनेस आई, वो निमित्त के डायरेक्शन में लीन कर रही थी जैसे बात सुनने की कोशिश कर रही हो। निमित्त को अपनी ओर चोर नज़रों से देखता पा कर उसने अपनी पीठ निमित्त की तरफ़ घुमा ली। निमित्त अपने आप में मुस्कुराया। उसे जो जानना था वो जान चुका था।
निमित्त ने पैसे निकाल कर दीपक की ओर बढ़ाये।
“रहने दो सायबा, आपकी वजह से मस्त धंधा चल रेला,”
“बेटा धंधा मस्त चलता रहे उसके लिए हर कस्टमर को इक्वल ट्रीट करना पड़ता है। ये ले पकड़,” निमित्त जबरन दीपक को पैसे थमाते हुए बोला।
कुछ देर तक पलक और खुशबू यूँ ही बातें करते हुए टहलते रहे। निमित्त और अल्फ़ा चुपचाप उनके पीछे चलते रहे। जब पलक अपने घर की लेन में मुड़ी तब निमित्त वापस कॉटेज की ओर बढ़ गया। जॉयस फुफ़्फ़ो अब भी अपने पोर्च में रॉकिंग चेयर पर ऊँघ रही थीं। निमित्त बिना आवाज़, दबे पाँव उनके पास गया और रॉकिंग चेयर के बगल में रखी साइड टेबल पर रॉस ऑमलेट का पार्सल रख कर वापस जाने को पलटा।
“तूने खाया?” जॉयस फुफ़्फ़ो की आवाज़ आई।
“भूख नहीं, आप खा लीजिए,” निमित्त मुस्कुराते हुए वापस उनकी तरफ़ मुड़ा।
“सिर्फ़ मेरे वास्ते ले के आया? काय कूँ हैबिट स्पॉयल करता बुड्ढी की?” जॉयस फुफ़्फ़ो निमित्त को बनावटी डाँट लगाते बोलीं।
“मुझे आदत है अपनी लाइफ़ में खूबसूरत लड़कियों को पैंपर करने की,” निमित्त ने मासूम सूरत बनाते हुए जवाब दिया।
“देन गेट ए ब्यूटीफुल गर्ल फॉर योरसेल्फ,”
“Hawww…आप हो ना मेरी लाइफ़ में। किसी और को क्यों लाऊँ भला?”
“बातें मत बना। मेरे को मालूम तू डेली इवनिंग टू ऑवर्स क्यों वॉक करता?”
“कल मॉर्निंग मैं दीवार आइलैंड जा रहा काम से। वापस आते शायद 4-5 दिन लगेंगे,” निमित्त टॉपिक चेंज करने की गुरेज़ से बोला।
“May the Almighty father, the son and the holy spiritual protect you. अपना ख्याल रखने का,” जॉयस फुफ़्फ़ो ने हिदायत दी। निमित्त ने सहमति में सिर हिलाया और दोबारा वापस जाने को पलटा।
“Palak is a nice kid. You should ask her out,”
पीछे से जॉयस फुफ़्फ़ो की आवाज़ पर निमित्त ठिठक कर रुक गया। एक क्षण वो पशोपेश में था कि उसे कुछ कहना चाहिए या उसका इस बात को नजरंदाज कर देना सही होगा।
“मेरे जीवन में कुछ एहसास और मुक़ाम गुज़र चुके हैं, जो कभी वापस नहीं आ सकते, और कुछ एहसास और लोग मेरे लिए नहीं,” निमित्त जॉइस की तरफ़ पलटते हुए बोला।
“ये तुमको तुम्हारा “मम्मी” बोला या तुम ख़ुद से मान के बैठा है?”
“हर बार, हर इंसान के साथ; जिससे भी मैं दिल से जुड़ता हूँ, कुछ निमित्त ऐसे बनते हैं कि मेरा उनके आस-पास होना उनके लिए अभिशाप बन जाता है। तो निमित्त यही कहते हैं कि जो निमित्त के दिल के पास होंगे वो निमित्त के पास कभी ना होंगे,”
“आए…बुड्ढी को अपना गोल-मोल बात में मत लपेट।”
“गुड नाईट फुफ़्फ़ो,” निमित्त ने मुस्कुरा कर कहा और अल्फ़ा के साथ अपने रूम की तरफ़ बढ़ गया।
रात्रि ध्यान और रिचुअल्स ख़त्म करते हुए उसे लगभग रात के 1 बज गए। इस वक़्त तक भी निमित्त की आँखों में नींद नहीं थी। उसके ज़हन में संदेश से हुई कन्वर्सेशन बार-बार घूम रही थी। निमित्त का दिमाग़ संदेश की बातों के तार जोड़ने की कोशिश करता और फिर उसके ज़हन में मार्केट में पलट कर उसे देखती पलक का अक्स उभरता। हाथों में मोबाइल, उँगलियाँ तेज़ी से टाइप करती हुई। स्क्रीनलाइट चेहरे पर पड़ते हुए हल्का ग्लो देती। अधरों पर हल्की सी मुस्कान के बीच उसकी नज़रें अचानक उठीं और सीधा निमित्त की चोरी से उसकी तरफ़ देखती निगाहों से टकराईं। पलक की आँखों में एक चमक उभरी जिसका कारण उसके चश्मे पर पड़ता मोबाइल स्क्रीन लाइट का ग्लेयर नहीं था। निमित्त को अपनी ओर देखता पा कर उसके चेहरे पर जो भाव उभरे वो ऐसे थे जैसे उसने किसी बच्चे को बाग़ीचे से आम चुराते पकड़ लिया हो। पलक के चेहरे पर लिखे भावों की इबारत पढ़ते हुए उसकी आँख कब लगी निमित्त को पता ना चला।
गोवा के उस रास्ते पर निमित्त पहले कब गुज़रा था उसे याद नहीं। चौड़ी लेकिन पुरानी रोड, शायद ओल्ड गोवा की। सड़क के बीचोंबीच एक पुराना बरगद का पेड़ था जिसकी लंबी और घनी जटाएँ नीचे सड़क तक आती थीं। सड़क बरगद के इर्द-गिर्द बनाई गई थी, जिसे तोड़ कर पेड़ की कुछ मोटी जड़ें ऊपर तक आई हुई थीं। रात का समय था, तकरीबन 10-11 बजे का। पेड़ से कुछ आगे सड़क पर स्ट्रीट लाइट जल रही थी जिसकी रौशनी पेड़ पर पड़ती और उसके पीछे एक स्याह, लंबी और भयावह परछाई बना रही थी। सड़क के दोनों तरफ़ 4 फीट ऊँची बाउंड्री थी, लेटराइट ईंटों की कच्ची बाउंड्री, ब्रिक रेड पेंट से रंगी हुई। सड़क के दोनों तरफ़ ऊँचे पेड़ों की टहनियाँ कैनोपी बना रही थीं। निमित्त पैदल इस सड़क से गुज़र रहा था, यह याद करने की कोशिश करता हुआ कि आख़िर उसे जाना कहाँ है। ये रास्ता जाना-पहचाना था, फिर भी अनजाना था। निमित्त रास्ते पर आगे बढ़ा। सड़क किनारे कोढ़ियों और भिखारियों की कतार बैठी हुई थी। इनमें सबसे आगे एक औरत बैठी थी जिसने दुशाला ओढ़ रखी थी। इतनी रात गए भिखारियों को यूँ क़तार लगाए बैठा देख निमित्त अचंभित था। वो आगे बढ़ा, अल्फ़ा निमित्त के आगे-आगे चल रहा था। निमित्त को उस ओर आता देख दुशाला ओढ़ी भिखारिन तेज़ी से उठी और निमित्त की तरफ़ बढ़ी। इससे पहले कि निमित्त कुछ समझ पाता वो भिखारिन निमित्त के सीने से लिपट गई।
“बचा लो बाबू। मुझे बचा लो। सिर्फ़ तुम बचा सकते हो,”
“कौन हो तुम? किससे बच रही हो?”
औरत ने उसके सवाल का जवाब ना दिया। निमित्त ने उसके चेहरे से दुशाला हटाई, चेहरे पर बिखर आए बालों को कान के पीछे समेट कर मुखड़े पर जमी धूल-मिट्टी की परत उँगलियों से पोंछी। खूबसूरत चेहरा खुल कर सामने आ गया। वो कोई भिखारिन नहीं थी। निमित्त को यूँ लगा जैसे वो इस सूरत को पहचानता था पर जानता ना था। आख़िर कौन थी वो?
निमित्त अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालने की कोशिश कर रहा था कि आख़िर उसने इस सूरत को कहाँ देखा है जब पीछे बरगद की परछाइयों के अँधेरे से हुजूम का शोर उमड़ा। निमित्त पीछे पलटा। हाथों में धारदार हथियार लिए हमलावरों की टोली उनका रुख़ किए हुए थी। अल्फ़ा उन पर झपटने के लिए आक्रामक मुद्रा में आया।
“नहीं अल्फ़ा, भागना होगा। रास्ता दिखा,” निमित्त अल्फ़ा को कमांड देते बोला।
अल्फ़ा ने फ़ौरन पलट कर दूसरी दिशा में भागना शुरू किया।
“चलो मेरे साथ,” निमित्त उस औरत की बाँह पकड़ कर उसे खींचते हुए बोला। डर से सूखे पत्ते सी काँपती उस औरत के होंठ थर्रा रहे थे, जैसे चीखना चाहती हो पर भय से दबी आवाज़ ने निकलने से इनकार कर दिया हो। उसकी आँखों में ऐसे भाव थे जैसे बहेलिये के जाल में फँसी गौरैया की आँखों में होते हैं।
“मुझ पर भरोसा करो। मुझ पर भरोसा कर के आज तक किसी का बुरा नहीं हुआ,” निमित्त उस औरत को आश्वस्त करते हुए बोला। “जल्दी चलो। वक़्त नहीं है,”
औरत ने प्रतिवाद ना किया। उसका हाथ पकड़े हुए निमित्त राह दिखाते अल्फ़ा के पीछे भागा। भौंकते और गुर्राते हुए आगे बढ़ते अल्फ़ा के सामने से भिखारियों का झुंड इस तेज़ी से छँटा जैसे मधुमक्खियों के झुंड के बीच किसी ने जलती मशाल फेंक दी हो।
निमित्त के लिए वो राहें अंजान थीं, वो सिर्फ़ अल्फ़ा के इन्स्टिंक्ट्स पर आगे बढ़ रहा था। आगे गोवा के फ़्ली मार्केट्स जैसा एक बाज़ार था। सड़क किनारे पटरियों पर सब्ज़ियों, फलों से लेकर फ़िश, क्रैब, लॉब्स्टर आदि की दुकानें थीं। रंग-बिरंगे, सैलानियों को लुभाने वाले ट्रेडिशनल कोंकण व गोवन परिधानों और जंक जूअल्री के साथ souvenirs व artifacts की दुकानें पटरी पर लगी हुई थीं। अल्फ़ा इनके बीच से कुलाँचे भरता तेजी से भाग रहा था। निमित्त भी उसकी तर्ज़ पर आड़ा-टेढ़ा होता, ज़िग़-जैक भाग रहा था जिससे उनके पीछे आते हमलावर कन्फ़्यूज़ हो जाएँ और उसे उनके व अपने बीच का फ़ासला बढ़ाने का अवसर मिल जाए। दुकानों की क़तारें ख़त्म हो रही थीं। आगे गोअन स्टाइल, सिंगल फ़्लोर, कच्चे-पक्के कैथ्लिक घरों की रिहाइश थी। अल्फ़ा एक आसमानी नीले रंग के घर के खुले दरवाज़े से अंदर घुस गया। कमरा लगभग ख़ाली था, कोने में चटाई बिछी थी जिसपर बैठी 30-35 साल की औरत एक छोटे बच्चे को स्टील के बड़े टिफ़िन से खाना खिला रही थी। अचानक मचे कोलाहल से औरत और उसका बच्चा हदस गए। अल्फ़ा तीर की तरफ़ आगे के खुले दरवाज़े से अंदर और पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गया, उसके पीछे निमित्त भी उतनी ही तेजी से दाखिल-ख़ारिज हुआ। इससे पहले औरत कुछ समझ पाती, हमलावरों का हुजूम भी उतनी ही तेज़ी से अंदर आया और बाहर दफ़ा हुआ।
तेज़ी से भागता अल्फ़ा अगले घर के खुले दरवाज़े से अंदर घुसा। लिविंग एरिया में बैठी फ़ैमिली टीवी देख रही थी, सभी फ़ैमिली मेंबर्स की नज़रें उसे फॉलो कर रही थीं। अल्फ़ा पिछले दरवाज़े से बाहर निकल गया। फ़ैमिली मेंबर्स की नज़रें अल्फ़ा से होते हुए उसके पीछे भागते निमित्त पर गईं। निमित्त भी उसके पीछे अगले दरवाज़े से एंटर और पिछले से एग्जिट हुआ। निमित्त को फॉलो करती उनकी निगाहें उसके पीछे आते अटैकर्स के झुंड पर गईं। अल्फ़ा और निमित्त की तरह वो भी अंदर और बाहर हुए। फ़ैमिली वापस टीवी देखने में तल्लीन हो गई।
उस एरिया एक सभी घर यूँ बने हुए थे जैसे अलग-अलग घर ना हो कर एक ही घर का बहुत लंबा गलियारा हो जो एक कमरे से दूसरे कमरे में खुलता हो। ऐसे अनगिनत कमरों से गुज़रते हुए अल्फा के पीछे भागता निमित्त अचानक पीछे पलटा। वो अकेले भाग रहा था। उसके हाथ में उस औरत का हाथ नहीं था, जिसे हमलावरों से बचाने के लिए निमित्त भागा था। उस औरत का दूर-दूर तक कोई नमो-निशान ना था। जैसे वो कहीं थी ही नहीं। निमित्त ने चौंक कर अपनी हथेली की ओर देखा। क्या वाक़ई उसने किसी का हाथ पकड़ा था या फिर यह सिर्फ़ उसका भ्रम था? नहीं। यह भ्रम नहीं था। हमलावर अब भी उसकी तरफ़ आ रहे थे। वो पूरी तेज़ी से निमित्त की दिशा में भाग रहे थे पर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने स्पीड कम कर के स्लो-मोशन में चला दिया हो। निमित्त की नज़रें अपनी हथेली पर गई, उसके हाथ पर अब भी धूल लगी हुई थी।
निमित्त ने चौंक कर अपनी आँखें खोली। उसके सासें तेज चल रही थीं और वो बुरी तरह हाँफ रहा था। भोर के 3:33 AM बज रहे थे जब उसकी आँख खुली। उसके बेड के नीचे अल्फ़ा इत्मीनान से सोया हुआ था। दोबारा सोने की कोशिश करना व्यर्थ था। निमित्त ने कुछ देर ध्यान लगाया और सफ़र की तैयारी में जुट गया। सुबह लगभग 5:30 am निमित्त और अल्फ़ा निमित्त की ब्लू क्रूज बाइक से अपने सफ़र पर निकले।
गोवा में बरसात शुरू हो चुकी थी। जंगल से गुज़रने वाली रोड जो “पोंडा” जाती थी बरसात के इस मौसम के दौरान हल्की धुंध से भरी रहती थी। यह “ओल्ड गोवा” की वो प्राकृतिक सादगी व अनुभव है जिसे एक्सपीरियंस करने से अधिकतर टूरिस्ट वंचित रहते हैं। काजू के खेत, पैडी फील्ड्स, जंगल , जो गोवा के भीड़ भरे सी बीचेस और हैपनिंग नाईट लाइफ से अलग, एक अलग गोवा का एहसास कराते हैं। मॉलम से पोंडा की तरफ़ बढ़ते हुए गाँवों व अनगिनत छोटे-बड़े मंदिरों की शृंखला शुरू होती है जिनमें श्री मंगेशी टेम्पल व श्री महालया नारायणी टेम्पल प्रमुख हैं। निमित्त व अल्फ़ा रास्तों के किनारे बने छोटे मंदिरों पर रुकते। कुछ देर बैठ के निमित्त एक-टक मूर्तियों को निहारता, या फिर मंदिर के आस-पास से चिकने पत्थर चुन कर अपने लेदर पाउच में रखता, इस दौरान अल्फ़ा खेतों में तितलियों को अपने मुँह में पकड़ने की कोशिश करता। तितलियों का झुंड अल्फ़ा के सिर के ऊपर मंडरा रहा था। अल्फ़ा कुलाँच भरता, अगर गलती से कोई तितली उसके मुँह में आ गई तो भी वो उसे नुक़सान नहीं पहुँचाता, कुछ देर उसे अपने जबड़ों की क़ैद में रख कर विजयी भाव से, ख़ुद पर गर्वान्वित होते हुए दुम हिलाता और फिर मुँह खोल कर तितली को उड़ा देता और दोबारा झुंड का पीछा करता। सुबह के समय गायों व मवेशियों का झुंड इन रास्तों पर अपना अधिकार जमाये, अपनी मस्ती में झूमते हुए चलते मिलना आम बात है। निमित्त और अल्फ़ा बाइक किनारे खड़ी कर, गायों के साथ झूम के चलते, निमित्त देव आनंद साहब के पुराने गीत गाता, “ये दिल ना होता बेचारा, कदम ना होते आवारा, जो खूबसूरत कोई अपना हमसफर होता,” और, “मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िकर को धुएँ में उड़ाता चला गया,” या फिर गायों के पीछे जाते हुए निमित्त देव साहब के मैनरिज्म की नकल उतारता और गाता, “ रुक जाना ओ जाना हमसे दो बातें कर के चली जाना कि मौसम है दीवाना…रुक,रुक,रुक,रुक,”।
पोंडा से ओल्ड गोवा होते हुए निमित्त लगभग ढाई घंटे में ओल्ड गोवा के बेसिलिका साइड जेटी तक पहुँचा। हालांकि वो यह सफ़र एक-सवा घंटे में भी तय कर सकता था, पर उसे कोई जल्दी ना थी। फेरी लेने के लिए निमित्त हमेशा फेरी टर्मिनल के बजाये जेटी जाना प्रेफर करता था। दीवार आइलैंड जाने वाली आठ बजे की फेरी में निमित्त, अल्फ़ा और उनकी क्रूज़ बाइक सवार थी। फेरी के नाम पर मांडवी नदी पर दौड़ते उस धातु के पटरे पर रोजाना आवागमन करने वाले लोकल्स, उनके दोपहिया व चार पहिया वाहनों के अतिरिक्त, सब्ज़ी-फलों के टोकरे, मछली की क्रेट और मुर्गियों के पिंजरे भी सवार थे। धीमी गति से मांडवी नदी पार करती फेरी को आइलैंड पहुँचने में मात्र 10 मिनट का समय लगना था। निमित्त ने संदेश को कॉल लगाया। पहली रिंग पूरी जाने से पहले ही कॉल रिसीव हुई।
“मैं दस मिनट में दीवार फेरी टर्मिनल पर होऊंगा,” निमित्त शांत भाव से बोला।
“मैं पीएदादे स्क्वायर पर ही हूँ। टर्मिनल पहुँचता हूँ,” संदेश की एक्साइटमेंट व नर्वसनेस मिश्रित आवाज़ सुनाई दी।
“नहीं, वहीं रुका। मैं आता हूँ,” निमित्त आदेशात्मक लहज़े में बोला और कॉल डिसकनेक्ट कर दी।
निमित्त ने अपने लेदर पाउच से कैट्स आई स्टोन निकाला और अपनी उँगलियों के बीच नचाते हुए पल-पल पास आते दीवार आइलैंड को देख रहा था।
दीवार आइलैंड। असली गोवा की वो सांस्कृतिक धरोहर जो इतिहास के रक्तिम पन्नों और वर्तमान गोवा की दिखावटी चकाचौंध में खो गई। यह पूरा आइलैंड पुर्तगालियों के आक्रमण, अतिक्रमण और स्थानीय हिंदुओं पर किए गए अमानवीय उत्पीड़न व जबरन किए उनके धर्मांतरण की रक्तिम व घिनौनी यादों के प्रेत सरीखा प्रतीत होता है। ऐसा लगता है जैसे समय का पहिया यहाँ आ कर रुक गया और फिर कभी घूमा ही नहीं। दीवार आइलैंड पर बीच क्लब्स, पब्स, निऑन लाइट्स और फैंसी रिसॉर्ट्स नहीं हैं। पुरातन काल में “देववाड़ी द्वीप” यानी देवताओं का घर या कोंकणी में प्रचलित “दीपावती द्वीप” यानी दीपों के द्वीप नाम से जाना जाने वाला दीवार देवताओं और मंदिरों का गढ़ माना जाता था। सोलहवीं शताब्दी से पहले यहाँ सप्तकोटेश्वर, द्वारकेश्वर, महामाया, व विभिन्न गणपति हुआ करते थे। पुर्तगालियों के कदम देव भूमि पर पड़ते ही उन्होंने इन मंदिरों को ध्वस्त किया, मूर्तियां स्मगल कर दी गईं, धर्मस्थलों को खंडहर बना दिया गया।
बारहवीं शताब्दी के कदम्ब काल में निर्मित सप्तकोटेश्वर के अवशेष और कोटेश्वर तली आज भी अद्वैत, अपराजयी कंकाल से काल पर अट्टहास करते प्रतीत होते हैं जो धर्म को लीलने में असफल रहा। सप्तकोटेश्वर, गणेश और महामाया मंदिर दीवार से विस्थापित कर के मुख्य भूमि गोवा पर पुनर्स्थापित कर दिए गए पर मांडवी से होकर बहती हवा में देवताओं की अट्टहास के साथ अपने लोगों के विनाश पर बहे अश्रुओं की नमी आज भी है। अब दीवार देवताओं का घर नहीं, यहाँ सिर्फ़ बहती मांडवी की लहरों के आगोश में पसरा सन्नाटा, पुराने टूटे-फूटे घर; कई जिनमें कभी खुशहाल परिवार बसा करते थे और अब सिर्फ़ उनकी सिसकियों और यादों के प्रेत हैं, कई जो अब भी अपनी धरोहर का दारोमदार उठाए आबाद हैं, पुर्तगाली आक्रमणकारियों और मिशनरियों द्वारा ध्वस्त किए गए अनगिनत मंदिर और धर्म स्थलों के खंडहर और इनसे जुड़ी अनगिनत कहानियाँ व किंवदंतियां हैं। इन कहानियों और किंवदंतियों के अतिरिक्त दीवर में कुछ और भी था, कुछ ऐसा जिसने सदैव “भूतसंघ नायकम” को अपनी ओर आकर्षित किया था। कुछ ऐसा जिससे निमित्त अब तक रूबरू नहीं हुआ था, पर उसका इंट्यूशन कह रहा था कि जल्द ही इस रू में कोई घटना घटित होने वाली है। निमित्त की सोच को फेरी के साथ ही एक तीव्र झटका लगा। फेरी झटके के साथ किनारे पर रुक रही थी।
“तैयार हो जा अल्फ़ा, हमारी मंज़िल आने को है,” निमित्त कैट्स आई स्टोन वापस पाउच के हवाले करता बोला।
“वुफ़्फ़,”अल्फ़ा ने अपनी सहमति जताई।
फेरी से उतर कर निमित्त और अल्फ़ा क्रूज बाइक पर सवार हुए और पीएदादे स्क्वायर की तरफ़ बढ़े। लगभग दस मिनट में वे दीवार के सबसे हाई पॉइंट पीएदादे स्क्वायर पर स्थित आवर लेडी ऑफ़ पीटी चर्च पर थे जहाँ से दाहिनी ओर की ढलान पर जाता रास्ता मल्हार व नरोआ की ओर जाता था। निमित्त ने अपनी बाइक कुछ पहले रोक दी।
“देखते हैं अल्फ़ा हमारा मेजबान कौन है,” निमित्त ने पिछली सीट पर बैठ कर निमित्त के कंधे पर सिर टिकाये अल्फ़ा से कहा और स्क्वायर के दाहिनी ओर मल्हार को जाते रास्ते पर मौजूद लोगों व गाड़ियों पर नज़र डाली। मॉलम की तरह दीवार आइलैंड की आबादी भी बहुत सीमित है, टूरिस्ट और सैलानियों का आवागमन न्यूनतम। इक्का-दुक्का लोगों, दुकान लगाने को जाते सौदागरों, व कुछ गाड़ियों के अतिरिक्त स्क्वायर बिल्कुल सुनसान था। ऐसे में संदेश को लोकेट करना कोई मुश्किल काम ना था। स्क्वायर के कोने पर, पेवमेंट से लगे हुए एक वाइट ऑल्टो खड़ी थी जिसमें ड्राइविंग सीट पर एक अधेड़ उम्र का, दोहरे बदन, भारी-भरकम डील-डौल का व्यक्ति सवार था। उसकी बॉडी लैंग्वेज से डिस्कम्फर्ट और चेहरे से नर्वसनेस साफ़ झलक रहे थे। अपनी मोटी, फैट से दोहरी हुई और मुश्किल से नज़र आती गर्दन साइड विंडो से बाहर निकाल कर वो उस दिशा में देखता जिधर से निमित्त आ रहा था। निमित्त क्योंकि ऊपरी हिस्से पर था इसलिए संदेश उसे नहीं देख सकता था जबकि वो संदेश और उसकी गतिविधियां साफ़ तौर पर देख रहा था।
संदेश ने मुश्किल से अपनी गर्दन वापस अंदर की। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े आकार के जंगली भालू को अपने से छोटे साइज के पिंजरे में बंद कर दिया गया हो। उसने एक उड़ती निगाह रास्ते पर डाली फिर चुपके से सीट के नीचे से लोकल फेनी की बॉटल निकाल कर दो तगड़े घूँट भरे और अपने सिर को झटका दिया। किसी बुलडॉग की तरह उसके लटके गाल और डबल चिन थुलथुलाये। उसने बॉटल वापस सीट के नीचे प्लांट कर दी। निमित्त अब तक संदेश का पर्याप्त अवलोकन कर चुका था। उसने बाइक स्टार्ट की और संदेश की दिशा में बढ़ा दी।
“उम्मीद है मैंने ज़्यादा इंतज़ार नहीं करवाया,” निमित्त उसकी कार के समीप बाइक रोकते हुए बोला।
“ऐब्सलूट्ली नॉट। मैं आपका ही वेट कर रहा था निमित्त,” संदेश लड़खड़ाते हुए कार से नीचे उतरा। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। निमित्त को एहसास हुआ कि वो जितना नज़र आ रहा था उससे ज़्यादा धुत्त था।
“क्या बात है, सुबह-सवेरे ही कड़वे कुल्ले और घूँट के गरारे किए बैठे हो,” निमित्त व्यंगात्मक लहजे में बोला।
“व…वो…टेंशन थोड़ी ज़्यादा है, जब टेंशन जास्ती (ज़्यादा) होती तभीच ये भी जास्ती होती,” संदेश अपना मुँह पोछते हुए बोला।
संदेश की उम्र तक़रीबन पैंतालीस के आस-पास होगी लेकिन वो देखने में अपनी उम्र से काफ़ी बड़ा लगता था। चेहरे के दोनों तरफ़ कनपट्टियों पर गहरे मेलस्मा पैचेस, आँखों ने नीचे उतने ही गहरे रंग के लटके हुए आई बैग्स, पैची, रूखी स्किन उसके अन्हेल्थी लाइफस्टाइल और फ़ूड हैबिट्स की चुग़ली साफ़ कर रहे थे। उसके बाल, मूँछ-दाढ़ी खिचड़ी थे, अधिकतर बाल सफ़ेद हो रहे थे, यहाँ तक की उसकी नाक से निकल कर मूँछों में मिलते झाड़ू जैसे लम्बे बाल भी सफेद थे। उसकी ओवर साइज्ड टी-शर्ट उसकी लटकी हुई बड़ी तोंद पर कसी हुई थी। टी-शर्ट के निचले हिस्से से उसकी तोंद का निचला भाग झाँक रहा था। लाइट कलर टी-शर्ट और नी-लेंथ कार्गो, जो उसने पहनी थी, उसपर जगह-जगह सॉस, ऑयल और ड्रिंक स्टेंस थे। संदेश की फिजिकल अपीयरेंस का जो खाका उससे बात कर के निमित्त ने अपने दिमाग़ में खींचा था संदेश एन उसपर फिट बैठता था।
“आइए कार में बैठिए, घर चलते हैं,” संदेश कार का बैकडोर खोलते हुए बोला।
“हाँ ये सही रहेगा, अपनी बाइक यहीं स्क्वायर पर लावारिस छोड़ देनी चाहिए मुझे,” निमित्त ने सपाट भाव से व्यंग किया।
मोटे चश्मे से मैग्नीफाई हो कर झाँकती संदेश की छोटी-छोटी आँखें प्रश्नवाचक भाव से निमित्त को घूर रही थीं। संदेश बेवक़ूफ़ों की तरह उसे देख कर ब्लिंक कर रहा था। उसका नशे में धुत्त दिमाग़ प्रोसेस नहीं कर पा रहा था कि निमित्त ने बाइक छोड़ने की बात मज़ाक़ में कही थी या सीरियसली।
“आप कार से आगे बढ़िए, मैं और अल्फ़ा बाइक से आपके पीछे आते हैं,” निमित्त ने अंततः हार मानते हुए कहा।
“ओके-ओके,” संदेश ने तेज़ी से अपना सिर सहमति में हिलाया और लगभग लुढ़कते हुए कार में सवार हुआ।
इग्निशन स्टार्ट करते ही कार ने दो ज़बरदस्त हिचकोले खाये। एक पल के लिए निमित्त को लगा कि कहीं संदेश कार उसके ऊपर ही ना चढ़ा दे।
“पेट्रोल टैंक में भी फ्यूल की जगह दारू डाल दी है क्या साले ने?” बाइक स्टार्ट करते हुए निमित्त ख़ुद में बड़बड़ाया।
“अपुन को ऐसी फील आ रेली है हौले कि ये साइको संदेश पैरानॉर्मल से ज़्यादा त्रास देने वाला है,” स्कैली की आवाज़ आई।
निमित्त ने पीछे पलट कर अल्फ़ा को देखा। स्कैली की बात पर दोनों से सहमति में सिर हिलाया, फिर निमित्त ने ढलान पर साँप सी बल खाती ऑल्टो के पीछे अपनी क्रूज बाइक बढ़ा दी।
पहाड़ी ढलान का रास्ता; जो साओ माटियस यानी मल्हार की तरफ़ जाता है, आच्छादित है पुराने गोअन घरों, काई से रंगी खूबसूरत लेटराइट वॉल्स, अबैंडंड ओल्ड विलाज़; जिनपर प्रकृति ने पूरी तरह अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया है, पुराने सूखे कुएँ और ढेरों बरगद व पीपल के वृक्ष; जिनमें से कई की उम्र वहाँ रह रहे निवासियों से भी ज़्यादा है।
स्क्वायर से मल्हार बढ़ते हुए घरों की आबादी कम होती जा रही थी। दूर तक फैले प्राकृतिक मनोरम दृश्य, पैडी फ़ील्ड्स, नारियल और काजू के वृक्ष और छोटे-बड़े चौराहे नज़र आ रहे थे जिनसे गुज़रते हुए वे मल्हार पहुँचे। यहाँ फिर से कुछ आबादी नज़र आई, गोअन स्टाइल पुराने घर जो एक-दूसरे से जुड़े लगते थे; इनमें से कई घर ख़ाली थे, जिनके बाशिंदे अतिक्रमण के दौरान पलायन कर गए, पर इन घरों को देख कर लगता था जैसे इनमें आज भी रिहाइश है। इसके अतिरिक्त अब लोकल स्पोर्ट्स ग्राउंड नज़र आ रहे थे जहाँ टीनेजर्स सुबह सवेरे खेलते दिखाई दे रहे थे। लोकल स्मॉल शॉप्स, जो धीरे-धीरे खुल रही थीं और छोटे-बड़े चर्चेस।
वे मल्हार के प्रमुख व प्रसिद्ध साओ माटियस चर्च पहुंचे। यहाँ से रास्ता वैंक्सिम साइड, नरोआ साइड और गाँव के छोटे, अंदरूनी रास्तों को जाता था। संदेश की कार ने यह अंदरूनी रास्ते पकड़े। निमित्त की बाइक भी उसके पीछे हो ली। निमित्त आस-पास के एरिया, घरों, पेड़ों, स्पॉट्स का बारीकी से अवलोकन करता आगे बढ़ रहा था। यहाँ खेत और ज़मीनें अधिक थे, जहाँ जंगल ने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था। लेटराइट वॉल्स वाली विलाज़ा और ओल्ड गोअन घरों में अधिकतर ख़ाली थे। जिनमें रिहाइश थी उनके पोर्च पर बुजुर्ग, बच्चे और गोवानी औरतें रोज़मर्रा के काम करते या समय व्यतीत करते नज़र आ रहे थे। संदेश की कार एक कच्ची लेन में मुड़ी। यहाँ खंडहर और जंगल सबसे अधिक थे। उसकी कार की रफ़्तार स्लो हुई और एक काई के आवरण और बैलों से ढँकी लेटराइट वॉल और जंग लगी आयरन ग्रिल के गेट वाले घर के सामने रुकी। निमित्त ने भी अपनी बाइक वहीं रोक दी।
“इधर अपन रेंट पर रह रहे। बाहर से स्कैरी दिखता है पण भीतर से कोज़ी है बिल्कुल,” संदेश कार से निकला और घर की तरफ़ इशारा करते हुए बोला।
“हालांकि देवयानी के डैड की प्रॉपर्टी, वो बंगला जिसका मैं ज़िक्र किया था, जस्ट सामने ही है,” संदेश लेन के पार, सामने वाली विला की तरफ़ इशारा करते बोला।
निमित्त की नज़रें उस तरफ़ गईं। पुराना खंडहरनुमा बंगला जो देखने में 80s एक दशक की किसी भूतिया रामसे मूवी का सेट लग रहा था, ऊँचे, घने पेड़ों के पर्दे से उसकी ओर घूर रहा था। निमित्त को वहाँ से बहुत तीव्र ऊर्जा का आभास हो रहा था।
“घर चल के फ्रेश हो लीजिए, ब्रेकफास्ट भी रेडी है,” संदेश गेट खोलते हुए निमित्त से बोला।
“इतनी बेहतरीन जगह आ कर तो इंसान ऐसे ही फ्रेश फील करेगा। और कितना फ्रेश होना है?” निमित्त ने उसकी बात काटते हुए कहा।
“जैसी आपकी मर्ज़ी। आइए ब्रेकफास्ट कर लीजिए फिर,” संदेश फिर से बेवक़ूफ़ों की तरह ब्लिंक करते हुए बोला।
“फ़िलहाल भूख नहीं। वापस आकर देखूँगा। आओ अल्फ़ा,” बिना संदेश की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए निमित्त अल्फ़ा के साथ उस भूतहा बंगले किसी तरफ़ बढ़ा। बंगले के आर्यन ग्रिल गेट पर चेन लिपटी हुई थी जिस पर पुराने ज़माने का ताला जड़ा था। निमित्त ने पीछे घूम कर संदेश की तरफ़ देखा।
“मैं चाभी ले कर आता हूँ,” संदेश हड़बड़ा कर बोला और घर के अंदर भागा।
निमित्त ने आयरन ग्रिल पकड़ कर अपने बूट दीवार पर टिकाये और भुजाओं पर स्विंग करते हुए शरीर को झटका दिया। एक छलांग में वो गेट के ऊपर और दूसरी जम्प में उसके पार था। उसने अल्फ़ा की ओर देख कर अपने होंठ गोल किए और तीखी सीटी बजाई। यह अल्फ़ा के लिए इशारा था। अल्फ़ा ने आयरन ग्रिल पर जम्प लगाई और कलाबाज़ी खाते हुए अंदर आ गया। निमित्त और अल्फ़ा बंगले के फ्रंट कोर्टयार्ड में थे। यहाँ ज़मीन पर चौकोर लाइमस्टोन बिछे थे जिनके बीच से ऊँची जंगली घास उग आई थी। दीवारों के अलावा पोर्टिको के वुडेन प्लैंक्स और पिलर्स पर काई चढ़ी हुई थी और क्रीपर्स का जाल चारों तरफ़ फैला था। निमित्त ने अपने लेदर पाउच से फ्रंट जिपर से एक वेलवेट की छोटी सी पुड़िया निकाली। इस पुड़िया में सी सॉल्ट, सिनेमन पाउडर और ड्राइड रोजमेरी का मिश्रण था। निमित्त ने यह मिश्रण अपनी दोनों हथेलियों पर लेकर रब किया फिर अपने व अल्फ़ा के ऊपर छिड़का। वेलवेट पाउच वापस होलस्टर के हवाले कर के निमित्त ने अंदर से एक सेलेनाइट पेंडुलम बरामद किया।
“आगे बढ़ते हैं अल्फ़ा,”
निमित्त अपना पेंडुलम थामा हाथ सीधा आगे किये हुए था। सेलेनाइट पेंडुलम कुछ देर तक कम्पन से थिरकता रहा फिर लयबद्ध तरीक़े से दायें-बायें, आगे-पीछे झूलने लगा। अपनी बाँह सीधी किए हुए ही निमित्त सावधानीपूर्वक आगे बढ़ा। अल्फ़ा पूरी तरह चौकन्ना था और निमित्त के साथ-साथ चल रहा था। फ्रंट पोर्च स्टेयर्स के प्लैंक सीलन से सड़ गए थे। पोर्च की वुडेन रेलिंग पर वाइन्स चढ़ी हुई थीं जो सामने आगे बढ़ने का रास्ता बंद कर रही थीं। निमित्त ने दूसरे हाथ से बेलों का जाल हटाया और अंदर बढ़ा। पोर्च के बीच में चौखट थी। दो पाट के दरवाज़े पर किवाड़ लगी थी जिसे खोल कर वो अंदर बढ़ा। घर के बीच में सेंट्रल कोर्टयार्ड था जैसा पुराने कोंकणी, गोअन और कर्नाटक के घरों में प्रचलित था। सेंट्रल कोर्टयार्ड में एक पत्थर का तुलसी घर था जो अब उजाड़ पड़ा था। सेंट्रल कोर्टयार्ड के चारों तरफ़ कमरे बने थे। जिस दरवाज़े से निमित्त अंदर आया था उसके ठीक सामने कोर्टयार्ड के दूसरी तरफ़ वैसा ही पिछला दरवाज़ा था जो पीछे अहाते और बंगले से लगी ज़मीन की तरफ़ जाता था। निमित्त के मन में एक विचार आया कि पहले घर और सभी कमरों का अच्छी तरह मुआयना करे फिर पीछे के एरिया में जाये। उसने पेंडुलम की ओर देखा। पेंडुलम तेज़ी से दायें-बाएँ हिल रहा था।
“नहीं, पहले बाड़ी का मुआयना करते हैं,” निमित्त अल्फ़ा से बोला।
उसने देखा अल्फ़ा बिल्कुल चौकन्ना नज़र आ रहा था, उसके दोनों कान सीधे खड़े थे जैसे कुछ सुनने की कोशिश कर रहा हो। निमित्त कुछ समझता उससे पहले ही अल्फ़ा के गले से गुर्राहट निकली और वो तेज़ी से निमित्त पर झपटा।
“ग़ुर्रssss वुउफ़्फ़sss…”
अल्फ़ा का निमित्त पर झपटना इतना अप्रत्याशित था कि निमित्त को सँभलने का मौक़ा भी ना मिला।
To be continued….
