ॐ नमः हरिहराय
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ॐ नमः हरिहराय
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शुरुआत वाले शब्द
आख़िरकार, लम्बे अंतराल के बाद नए एपिसोड के साथ हाज़िर हूँ। देरी की एक बड़ी वजह मेरा गोवा से बनारस आना रहा। बनारस आना सदैव मेरे लिए एक आंतरिक शांति, सुकून और ठहराव ले कर आता है। “हर-हर महादेव” और घंटों की टंकार के साथ कांवड़ियों और देश भर से आते भक्तों के शोर के बीच दिल को यहाँ एक अलग सुकून की अनुभूति होती है। इसलिए यहाँ आने के बाद जीवन के पल और क़िस्से संजोना शुरू कर देता हूँ, उन्हें कहानियों में पिरोने की प्रक्रिया में थोड़ा अल्पविराम आ जाता है। देरी की दूसरी वजह पर चर्चा किसी और बार करूँगा।
पिछले लम्बे समय से कथासारथी पर कॉंटेंट रेग्युलर करने के लिए प्रयासरत हूँ और अब उस प्रयास में सफलता ज़्यादा दूर नहीं है। ऑगस्ट से रेग्युलर कॉंटेंट का वादा पूरा करने की शुरुआत इस एपिसोड से की जा रही है। यहाँ स्टोरीटेलिंग में कुछ अंकन्वेन्शनल ट्राई कर रहा हूँ, जो आगे कहानी पढ़ के आपकी समझ आएगा, इसलिए पहले से उसके बारे में बात कर के स्पॉइलर नहीं दूँगा। इस एपिसोड को दो हिस्सों में बाँटा गया है, एपिसोड 05 A और एपिसोड 05 B. आज आप एपिसोड 05 A पढ़ेंगे, और इसका दूसरा भाग एपिसोड 05 B परसों पब्लिश होगा। एपिसोड को दो भागों में रखने के पीछे एक कारण तो यह था कि एपिसोड ज़रूरत से ज़्यादा लम्बा हो जाता। इसके अतिरिक्त इस एपिसोड को दो भागों में क्यों रखा गया इसका कुछ अंदाज़ा आपको आज के पार्ट से लग जाएगा, बाक़ी अगले भाग के लिए बचा लेते हैं। मैं कहानी के हर एपिसोड में इवेंट्स का सेग्रेगेशन सोच समझ कर करता हूँ। किस घटनाक्रम के बाद कौन सा घटनाक्रम जाएगा, अथवा एक एपिसोड में कितने सीक्वेन्स होंगे ये सब कुछ पहले से निर्धारित होता है।
एपिसोड के आख़िर में हम निक्की पवार द्वारा बनाया हुआ “अल्फ़ा” का बेहद खूबसूरत फ़ैन आर्ट फ़ीचर कर रहे हैं। शाउट-आउट टू निक्की, कि उन्होंने टाइम निकाल कर ये ऑसम आर्टवर्क बनाया (साथ ही उम्मीद करते हैं कि वो आगे और भी सुपर कूल फ़ैन आर्ट शेयर करेंगी)। निक्की बहुत ही उम्दा आर्टिस्ट हैं, आप उन्हें सपोर्ट करने के लिए उनका इन्स्टग्रैम हैंडल @panwar_hobby_corner फ़ॉलो कर सकते हैं। इसके अलावा यदि आप भी निमित्त कालांत्री या फिर सपोर्टिंग यूनिवर्स के किसी कैरेक्टर पर फ़ैन आर्ट बनाना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। आगामी एपिसोड्स में आपके फ़ैन आर्ट फ़ीचर करने का पूरा प्रयास रहेगा। कमिंग वीक से जिमी मिस्ट्री का आपके बीच पदार्पण हो रहा है, यदि आप चाहें तो जिमी के फ़ैन आर्ट भी बना सकते हैं।
“ही लव्स मी “नॉट”” की प्रतीक्षा जो पाठक कर रहे हैं, उनके लिए अच्छी खबर। अब तक प्रकाशित चैप्टर्स का सिंगल लिंक रेडी हो गया है और वेबसाइट पर एक-दो दिन में अपडेट कर दिया जाएगा। कमिंग वीक से इस धारावाहिक उपन्यास के आगे के चैप्टर भी रेग्युलरली आने लगेंगे। वेबसाइट आप लोगों के सुझावों को ध्यान में रखते हुए कई बदलाव व सुधार किए गए हैं। आगे भी निरंतर सुधार की कोशिश रहेगी। अब आप लोग एपिसोड पर कॉन्सेंट्रेट कीजिए, मैं चलता हूँ मुझे काँच के घरों में रहने वालों को टॉर्चर करने…म..मेरा मतलब टॉर्च लाइट दिखाने जाना है।
आपका कथासारथी,
नितिन के. मिश्रा
नितिन के. मिश्रा
निमित्त की आँख खुली तो बाहर से कौवों के कौंकने का शोर सुनाई दे रहा था।
“अभी तो असली वाला जागे हैं ना?” निमित्त ने आँख खुलने के साथ जैसे स्कैली से सवाल किया।
“नंगा सोया था, नंगा जागा है और क्या प्रूफ़ चाहिए? उठ जा हौले, क्विल्ट खींच तेरी “हाय दैया” होने की तैयारी है,” स्कैली की आवाज़ निमित्त के ज़हन में यूँ गूंजी कि उसकी आँखें ‘फ़टाक’ कर के खुल गयीं।
वो हड़बड़ा कर उठ बैठा, उसके जिस्म पर ओढ़ाया क्विल्ट ढलक कर कमर पर आ टिका। उसका शरीर पसीने और अब तक जिस्म पर लगाए गए लोशन से तर था। निमित्त के शरीर पर सिर्फ़ उसकी “ब्रीफ़” थी।
“वुफ-वुफ़्फ़” निमित्त के जागते ही अल्फ़ा बेड पर चढ़ गया और निमित्त का चेहरा चाटने लगा।
“ईज़ी गुड बॉय,” निमित्त अल्फ़ा के बालों में हाथ फिराता हुआ, उसे प्यार से परे हटाते बोला।
“मैं आपके जगने का इंतज़ार कर रही थी। डॉक्टर थापा को इन्फ़ॉर्म कर देती हूँ कि आप उठ गए हैं,” बेड के पास बैठी सुभद्रा अपनी नज़रें निमित्त से परे रखते हुए बोली।
सुभद्रा की वहाँ उपस्थिति का निमित्त को अब तक एहसास ना था। उसकी उपस्थिति और अपनी अवस्था से निमित्त बुरी तरह झेंपा।
“कहा था ना तेरी “हाय दैया” होने वाली है। अब फटाफट अपने ऊपर खींच ले हौले,” स्कैली की आवाज़ दोबारा आई।
“शट-अप स्कैली, कुछ भी मत बोला कर,”
“क्विल्ट हौले, क्विल्ट अपने ऊपर खींच ले,” स्कैली की आवाज़ पर निमित्त ने हड़बड़ा कर अपनी कमर के नीचे आया हुआ क्विल्ट ऊपर तक खींच लिया।
सुभद्रा भी बिना कुछ बोले बाहर जाने के लिए उठी।
“रुको सुभद्रा, मुझे कुछ बात करनी है,”
दरवाज़े की तरफ़ बढ़ती सुभद्रा निमित्त की आवाज़ पर ठिठक कर रुक गई। वो वापस निमित्त की तरफ़ पलटी।
“मुझे स्ट्रॉंग हँच है कि कल लोशन लगाने के बहाने नर्स डॉरिस ने मुझे डेलिरीएंट्स दिए थे,” निमित्त ने वॉल माउंट पर टाँगे अपने कपड़ों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
“शायद इसलिए कि आपको दर्द में राहत मिले और आप कुछ देर सो पाएँ। डॉक्टर थापा को मैंने आपके इंसोमनिया के बारे में बताया था,” सुभद्रा ने निमित्त के कपड़े उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए जवाब दिया।
“नहीं, इन डेलिरीएंट्स की मात्रा बहुत अधिक थी। इतनी मात्रा में हाथी को “आउट” कर के सर्जरी की जा सकती है। मैं कितनी देर तक सोता रहा?” निमित्त ने इनकार में सिर हिलाया और शर्ट बदन पर चढ़ाते हुए बोला।
“पिछले चौबीस घंटे से,”
“अब डोज़ का अंदाज़ा तुम खुद लगा सकती हो,”
“पर नर्स डॉरिस ऐसा क्यों करेंगी? इससे उन्हें क्या फ़ायदा?”
“ऐस्ट्रल किडनैपिंग। ड्रीम हाईजैकिंग। ल्यूसिड इन्वेज़न के लिए,” निमित्त ने अपनी डेनिम बकल करते हुए सुभद्रा को अपने पहले सपने के बारे में डिटेल में बताया जब कि अपने मंथरा वाले सपने की बात वो पूरी तरह छिपा गया।
निमित्त की बात सुन कर सुभद्रा हैरान थी।
“तो नर्स डॉरिस ने आपको सिडेट किया ताकि अपने सपने में ले जा सके?”
“अपने या किसी और के। हो सकता है डॉरिस ने सिर्फ़ मुझे सिडेट किया और मैं जिसके सपने में था वो शख़्स कोई और ही हो,”
“आपने जो कुछ भी वहाँ…उस सपने में देखा क्या वो सच था? क्या वाक़ई वो भयानक घटना घटित हुई थी?” कहते हुए सुभद्रा की आवाज़ थर्राई और उसके शरीर ने ज़बरदस्त झुरझुरी ली।
“लगता तो यही है। मुझे सपना दिखाने वाला शख़्स जो कोई भी है वो “त्रियो-किलर” और उन ग़ायब हुई लड़कियों का सच जानता है…वो सच जो दुनिया के सच से जुदा है। शायद मुझे उस सपने के माध्यम से वो शख़्स वास्तविक सत्य तक पहुँचने का रास्ता दिखाने की कोशिश कर रहा था…या फिर ये भी हो सकता है कि वो सपना उसने ऐन मुझे बरगलाने, सही रास्ते से हटाने के लिए बुना हो,”
“क…क्या ऐसा भी हो सकता है?”
“मुश्किल है। क्योंकि सपने की हर एक चीज़ इतनी डिटेल में थी जो सिर्फ़ मेमरी से आ सकती है, इमैजिनेशन से इतनी डिटेल क्रीएट करने में ड्रीम स्टेबल नहीं होगा..कलैप्स कर जाएगा, या फिर ग्लिच आएँगे, कैरेक्टर्स का बिहेव्यरल टेम्पो अन्स्टेबल होगा,”
“तो अब आगे क्या?”
“सपना दिखाने वाला चाहता है कि उसने जो लीड मुझे दी है मैं उसपर आगे बढ़ूँ। मुझे इसमें कोई हर्ज नज़र नहीं आता। वो जंगल, काले पत्थरों का मंदिर, पुराना बरगद, उसके नीचे स्थापित ढेरों शिवलिंग, वो घंटियाँ। एक-एक चीज़ की कॉग्निटिव इम्प्रिंट अब मेरी मेमरी में फीड हो चुकी है। मैं इसके ज़रिए उस जगह तक पहुँच सकता हूँ। साथ ही अपने ओरिजिनल प्लान ऑफ़ ऐक्शन को भी पैरेलली फ़ॉलो कर सकता हूँ। इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे से मिलना अब और भी ज़रूरी हो गया है। शायद उस हॉस्पिटल ऐम्ब्युलेन्स और वॉर्डबॉय की बाबत उससे कुछ मालूम हो सके,”
“कम से कम ताम्बे के पीछे जाने की ज़हमत आपको नहीं उठानी होगी। वो खुद यहाँ धमक गया है।”
“इंस्पेक्टर “चीता” यहाँ आया है?”
“आज सुबह ही,”
“खुद से? या किसी ने बुलाया उसको?”
“शायद गिरीश बाबू ने। अभी उनके साथ ही है,”
“हुम्म…” निमित्त शांत हुआ, जैसे कुछ सोच रहा हो।
“आप पलक से भी मिलना चाहते थे ना?”
“वो भी पधारी हुई हैं?”
“इरा को पढ़ा रही है फ़िलहाल,”
“क्या उसे मेरे बारे में पता है?”
“अब तक तो ज़्यादा कुछ नहीं। मैंने यही बताया है कि आप मेरे सीनियर हैं और कुछ दिनों के लिए यहाँ ठहरे हैं। मैंने इरा को भी हिदायत दे दी थी कि आपके विषय में पलक से कुछ ना कहे,”
“हुम्म…अच्छा किया। हालाँकि उसे मेरे बारे में सच देर-सवेर मालूम पड़ ही जाएगा,”
“ऐसी बातें कहाँ छिपती हैं,”
“फिर भी, उससे पहले मैं पलक को अपने तरीक़े से परख चुका होऊँगा। सबसे पहले उससे ही मिलते हैं, फिर चीता से दो-चार होंगे,”
“ठीक है, मैं डॉक्टर थापा…”
“ना-ना, शंटू-बंटू या किसी को भी कुछ कहने की ज़रूरत नहीं। तुम चलो, मैं ज़रा नहा-धो कर, इत्तर-पर्फ़्यूम मार कर आता हूँ। बाहर कोई पूछे तो कह देना अब तक सोया पड़ा हूँ,”
निमित्त की हिदायत पर सुभद्रा ने सहमति में सिर हिलाया और निमित्त को रूम में छोड़ कर बाहर निकल गई।
सुभद्रा के जाते ही निमित्त के चेहरे पर गम्भीर भाव आए। अल्फ़ा अब भी उसके पैरों के पास बैठा था।
“आज कुछ तूफ़ानी करते हैं अल्फ़ा,” निमित्त उसकी गर्दन पर हाथ फिराते हुए बोला। अल्फ़ा के दोनों कान खड़े हो गए, वो जानता था कि निमित्त तभी ऐसा कहता है जब उसके दिमाग़ में शैतान से भी “चोक मी डैडी” बुलवा देने की हद तक कोई शैतानी ख़ुराफ़ात कुलबुला रही हो।
बाहर से कौवों के कौंकने का शोर अब भी सुनाई दे रहा था।
॰ ॰ ॰
सुबह के तक़रीबन दस बज रहे थे। उस दिन मौसम काफ़ी सुहाना था। आसमान में बादल छाए थे जिनके बीच से हल्की धूप झांक रही थी। बाहर लॉन में फ़ाउंटन के इर्द-गिर्द पर्ल व्हाइट राउंड टेबल और चेयर लगाए गए थे। एक टेबल पर डॉक्टर थापा और सिक्योरिटी इंचार्ज कदम बैठे थे जिनके सामने ओरिजिनल बोन चाइना वेयर टी-कप और सॉसर में चाय सर्व की हुई थी। दोनों किसी मुद्दे पर चर्चा करते हुए चाय की चुस्कियाँ और बीच-बीच में चाय के साथ ही सर्व किए हुए कोल्स्लॉ सैंड्विच की बाइट लेते। दूसरे टेबल पर इरा एक लगभग 21-22 साल की लड़की के साथ बैठी थी। लड़की की पीठ क्योंकि निमित्त की तरफ़ थी इसलिए उसका चेहरा नज़र नहीं आ रहा था। एक वेटर हाथ में जूस की ट्रे लिए हुए उनकी टेबल पर खड़ा था। उस वेटर के अलावा वहाँ दो और वेटर थे जो ट्रे में जूस, चाय-कॉफ़ी और सैंड्विच लिए घूम रहे थे। तीसरी टेबल पर बैठी सुभद्रा ब्लैक कॉफ़ी की चुस्कियाँ लेते हुए ऐगथा क्रिस्टी की नॉवल “ईविल अंडर द सन” पढ़ने में तल्लीन थी। चौथी टेबल पर मल्हार और रॉशेल बैठे थे। रॉशेल सिर्फ़ ऑरेंज जूस पी रही थी, बल्कि पी क्या रही थी मात्र ग्लास होंठों से लगाने की औपचारिकता कर रही थी जबकि मल्हार के आगे सी-फ़ूड, चिकेन, और पॉर्क के आइटम्स का ढ़ेर लगा था और वो फ़िलहाल खाने में तल्लीन था। रॉशेल उड़ती हुई डिस्गस्ट भरी नज़र मल्हार पर डालती फिर परे देखने लगती।
गिरीश बाबू यहाँ मौजूद नहीं थे। निमित्त ने देखा कि गिरीश बाबू के लिए ख़ास टेबल ओपन लॉबी में सेट की गई थी जहां से वो लॉन में उपस्थित हर व्यक्ति को देख सकते थे। उनके साथ टेबल पर एक लगभग 35-38 साल का कड़ियल आदमी बैठा था जो शक्ल से ही पुलिसिया लग रहा था। निमित्त को समझते देर ना लगी कि यही इंस्पेक्टर चिरंजीवी ताम्बे उर्फ़ “चीता” है।
सुभद्रा के जाने के बाद निमित्त ने अपना आगे का “गेम-प्लान” तैयार किया जिसमें स्कैली ने उसकी काफ़ी सहायता की। इसके बाद निमित्त नहा-धो कर तैयार हुआ और बे-आवाज़, बग़ैर शोर-शराबे के नीचे आकार लॉबी के एक पिलर से टिक कर खड़ा हो गया था और वहाँ मौजूद एक-एक शख़्स की गतिविधि रीड कर रहा था। जब वो पर्याप्त रीडिंग कर चुका तो इत्मिनान से चहलक़दमी करते और गुनगुनाते हुए लॉन की तरफ़ यूँ बढ़ गया जैसे ऐसा करना उसकी प्रतिदिन की नॉर्मल दिनचर्या का हिस्सा हो। निमित्त के गुनगुनाने ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा।
“ये चाँद सा रौशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा, ये झील सी नीली आँखें…कोई राज़ है इनमें गहरा…”
निमित्त ख़ास तौर पर ये गाना कदम को देखते हुए गा रहा था जिसने शर्त हारने की एवज़ में अपनी मूँछें मुंडवा दी थीं।
निमित्त को अपनी ओर देख कर गाना गाते देख कदम का चेहरा ग़ुस्से से सुर्ख़ लाल हो गया।
“…तारीफ़ करूँ क्या उसकी…जिसने तुम्हें बनायाsss..”
निमित्त को गाता देख वहाँ मौजूद सभी लोगों का ध्यान और निगाहें उस पर गयीं, लेकिन निमित्त ने ध्यान दिया कि पलक एक बार भी उसकी तरफ़ नहीं मुड़ी। वो जिस अवस्था में बैठी थी वैसे ही बैठी रही।
“ये सुबह-सुबह गाना क्यों गा रहे हो?” कदम कड़क कर बोला।
“अजी हुज़ूर-ए-आला, इतना सुहाना दिन है, ऐसा दिलकश समाँ है, ऐसे में तो दिल के तार कोई ना कोई तराना छेड़ेंगे ही। वैसे भी डॉक्टर शंटू ने मेरा ऐसा इलाज किया है कि बिल्कुल रेस के काले घोड़े जैसा चुस्त, दुरुस्त और तंदुरुस्त फ़ील कर रहा हूँ इसीलिए “हिनहिना” रहा हूँ,” निमित्त ड्रामाई अन्दाज़ में डॉक्टर थापा और कदम के सामने सिर नवाते हुए बोला।
“पूरे से तो नहीं ठीक हुए, दिमाग़ी नुक़्स जाने का नाम नहीं ले रहा,” डॉक्टर थापा अपनी चाय की चुस्की लेते हुए होंठों में बुदबुदाए।
“नॉटी-नॉटी डॉक्टर शंटू…कित्ते क्यूट लगते हो आप ऐसे भटूरे जैसे गाल फूला के बुदबुदाते हुए,” निमित्त धीरे से डॉक्टर थापा के दोनों गाल यूँ खींचते हुए बोला जैसे डॉक्टर थापा कोई छोटे बच्चे हों।
डॉक्टर थापा के चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे उन्होंने किसी पागलखाने से भागे ख़तरनाक मरीज़ को अपने सामने साक्षात खड़ा देख लिया हो।
“तौबा…ये तो पहले से भी ज़्यादा पगला गया है,” कदम आँखें बड़ी करते हुए बोला।
“वैसे क्यूट तो आप भी बहुत हो मिस्टर बंटू, और ये क्लीन शेव्ड हो के तो ऐसी बिजलियाँ गिरा रहे हो…आए-हाय-हाय-हाय,” निमित्त ने अपने दोनों हाथ कदम के गाल खींचने के लिए बढ़ाए।
“मैंने तेरे दोनों हाथ तोड़ के गले में लटका देने हैं अगर मुझे छुआ तो,” निमित्त के हाथ अपने गालों तक पहुँचने से पहले ही कदम चेतावनी भरे स्वर में गुर्राया।
निमित्त ने अपने हाथ पीछे खींच लिए और वापस गाना गाने लगा।
“मैं खोज में हूँ मंज़िल की और मंज़िल पास है मेरे। मुखड़े से हटा दो आँचल, हो जाएँ दूर अंधेरे..हो जाएँ दूर अंधेरे…”
“ही-ही-ही-ही,” निमित्त की हरकतों पर इरा मुँह दबा कर हंस रही थी।
“इरा, पे अटेन्शन हीयर,” पलक ने इरा को घुड़कते हुए कहा। वो अब भी निमित्त की तरफ़ नहीं पलटी थी।
निमित्त शम्मी कपूर के मैनरिज़म की नक़ल करते हुए और झूम-झूम कर गाते हुए इरा व पलक की टेबल की ओर बढ़ गया।
“माना कि ये जलवे तेरे, कर देंगे मुझे दीवाना। जी भर के ज़रा मैं देखूँ, अन्दाज़ तेरा मस्ताना…ताsss..रीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया,”
निमित्त की नज़रें पलक के चहरे पर पड़ीं। एक पल को निमित्त ठिठक गया।
पलक दुनिया की सबसे हसीन, बेइंतहा खूबसूरत, अप्सराओं को भी मात देने वाले सौंदर्य की स्वामिनी, लाखों में एक हुस्न की मल्लिका थी ऐसा बिल्कुल नहीं था। वो सिर्फ़ एक 21-22 साल की लड़की थी, जिसके नयन-नक़्श साधारण से कुछ बेहतर थे लेकिन उसकी चश्मे के पीछे छुपी आँखों में एक अलग मासूमियत थी, उस बच्ची सी मासूमियत जिसे समय और हालात ने वक्त से पहले बड़ा बनने पर विवश कर दिया हो। उसके चहरे की गम्भीरता किसी 21-22 साल की कॉलेज गोइंग यंगस्टर की बिल्कुल नहीं थी। वो गम्भीरता उस लड़की की थी जिसने समय से पहले ज़िंदगी में “जीना” नहीं, “सर्वाइव” करना सीख लिया हो। उसकी पूरी पर्सनैलिटी, उसके आउट्लुक, एक्स्प्रेशन, हर एक चीज़ में “सर्वाइवल मोड” तारी था। इसके बावजूद पलक में कुछ ऐसा आकर्षण था, या फिर ये उसके “सर्वायवलिस्ट” होने का असर था जिसने पहली नज़र में ही निमित्त को कुछ इस तरह प्रभावित किया जिसमें ज़्यादातर लड़कियाँ विफल होती हैं।
पलक ने सिर्फ़ एक उड़ती नज़र निमित्त पर डाली और उसे अपनी ओर घूरता पा कर पलक की नज़रें सामने रखी किताब में यूँ धंसी कि उठी ही नहीं।
“तूने अब दो मिनट भी और घूरा तो “पापा” रंजीत, गुलशन “गुल्लू” ग्रोवर, शक्ति “आऊ" कपूर और प्रेम चोपड़ा पर्सनली आ कर तुझे अपना सच्चा उत्तराधिकारी घोषित कर देंगे हौले,” स्कैली की आवाज़ निमित्त के कानों में गूंजने से निमित्त की तंत्रा भंग हुई।
निमित्त ने अपना सिर झटका, जैसे दिमाग़ में आए विचार परे झटकने की कोशिश कर रहा हो।
“हेय एन. के., कम सिट विद अस। अब कैसे हो आप?” इरा चहकते हुए बोली।
“कैसा लग रहा हूँ?” निमित्त ने फ़रमाइशी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, पर पलक ने उसकी तरफ़ कोई तवज्जो ना दी।
“एकदम डैशिंग! अब बैठो भी,” इरा टेबल की ख़ाली चेयर की तरफ़ इशारा करते हुए बोली।
“इरा, पढ़ाई पर ध्यान लगाओ। आज ये चैप्टर फ़िनिश करना ही करना है,” पलक ने इरा को घूरते हुए कहा।
साफ़ पता लगता था कि इरा का निमित्त को वहाँ बैठने के लिए बोलना पलक को बिल्कुल नागवार लगा है बस वो खुल कर यह बात बोल नहीं पा रही थी।
“हाय…आई एम निमित्त कालांत्री…यू कैन कॉल मी एन.के.,” निमित्त ने चेयर पर बैठते हुए अपना हाथ हैंड शेक के लिए पलक की तरफ़ बढ़ाया।
“हैलो।” पलक ने ठंडे, भावहीन स्वर में जवाब दिया। ना उसकी नज़रें किताब से ऊपर उठीं और ना ही उसने निमित्त का बढ़ा हाथ थाम कर हैंड शेक करने का उपक्रम किया।
निमित्त ने बुरी तरह झेंपते हुए अपना हाथ पीछे समेट लिया।
“ब्वाहाहा…हाहाहाहा…अबे हौले…ये तेरे बस का रोग नहीं। चुपचाप लड़की को पैर छू कर “प्रणाम दीदी” बोल और पतली गली से खिसक ले वरना तेरी बेइज़्ज़ती देख के अपुन को बहुत मज़े आने वाले हैं…हिहिही,” स्कैली की आवाज़ आई जिसे निमित्त ने सरासर वैसे ही नज़रअन्दाज़ किया जैसे पलक उसे कर रही थी।
“वैसे…कोई खुद का इंट्रो दे तो उसे बदले में अपना इंट्रो ना देना इज़ बैड मैनर…यू नो,” पलक की तरफ़ एकटक देखते हुए निमित्त बोला।
इस पर भी पलक की ओर से कोई रेस्पॉन्स ना आया। इरा ने एक नज़र निमित्त और पलक को देखा और फिर जैसे सिचूएशन को सम्भालने की कोशिश करने लगी।
“मैं कराती हूँ ना इंट्रो…एन.के., मीट माय टीचर मिस पलक खन्ना…एंड पलक मिस, ये एन.के. हैं। सुभी माँ के फ़्रेंड हैं और कुछ दिन हमारे साथ रहने आए हैं। एन.के. बहुत कूल हैं, ऐनिमल्स से बात करते हैं…मैजिक भी करते हैं…और एन.के. के साथ ये जो “डोग्गो” है ये अल्फ़ा है। अल्फ़ा और मैं बेस्ट फ़्रेंड्ज़ बन गए हैं,” इरा एक साँस में बोली।
निमित्त के बग़ल में आ कर बैठा अल्फ़ा इरा के मुँह से अपना नाम सुन कर दुम हिलाने लगा।
“इफ़ यू डोंट माइंड, आप प्लीज़ किसी दूसरी टेबल पर जा कर बैठेंगे, मुझे इरा को पढ़ाना है,” पलक ने निमित्त की आँखों में देखते हुए बिल्कुल सपाट भाव से कहा।
निमित्त की भाव-भंगिमा और चहरे पर चिपकी मुस्कान में कोई परिवर्तन ना आया, ना ही उसने वहाँ से उठने का उपक्रम किया।
“और इरा, तुम प्लीज़ पढ़ाई पर फ़ोकस करो,” पलक इरा को हिदायत देते हुए बोली।
“चलिए, टीचर्स से तो मुझे बचपन से ही बहुत डर लगता रहा है। हमेशा क्लास से बाहर निकाल दिया जाता था, या फिर बेंच के ऊपर हैंड्ज़-अप कर के खड़ा कर दिया जाता…या मुर्ग़ा बनाया जाता..या कान पकड़ के…” निमित्त अपनी ही झोंक में बोले जा रहा था।
“मिस्टर निमित्त प्लीज़, आप जाएँगे?” पलक उसकी बात बीच में काटते हुए बोली।
“बस एक सवाल है, बचपन से हर टीचर से पूछ रहा हूँ…सबसे पहले अपनी चाइल्डहुड क्रश, मेरी क्लास फ़िफ़्थ की इंग्लिश टीचर जैज़्मिन मिस से पूछा था…उन्होंने जवाब तो नहीं दिया, बस जजमेंटल लुक दिया…जिसमें “जज” कम था और “मेंटल” ज़्यादा था…” निमित्त फिर अपनी धुन में बोला।
“आप प्लीज़ जो पूछना है जल्दी पूछिए,” पलक अपना सिर पकड़ते हुए बोली। उसकी बॉडी लैंग्वेज और मैनरिज़म बता रहे थे कि निमित्त को एक मिनट भी झेलना उसे भारी लग रहा था।
“इरा, अल्फ़ा! उस हेज के पीछे मैंने स्क्विरल जाते देखी थी,” निमित्त ने एक ओर झाड़ियों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
गिलहरी का नाम सुनते ही इरा और अल्फ़ा दोनों उठ कर वहाँ से भागे। टेबल पर सिर्फ़ पलक और निमित्त बचे।
निमित्त ने महसूस किया कि पलक उस घड़ी बुरी तरह असहज थी। जिसका एक कारण यह भी था कि बाक़ी टेबल्स पर बैठे लोगों का ध्यान उनकी तरफ़ ही लगा हुआ था। निमित्त को इसकी कोई परवाह नहीं थी।
पलक अपनी उँगलियाँ फिजिट कर रही थी। निमित्त ने अपने होल्स्टर पॉकेट से एक व्हाइट सेलेनाइट प्लेट निकाल कर टेबल पर रख दी। उसके हाथ में तीन छोटे टम्बल्ड स्टोन नज़र आ रहे थे जो देखने में लट्टू से दिख रहे थे। इनमें से एक क्लीयर क्वॉर्ट्स था, एक ब्लू कायनाइट और एक लैपिस लैज़्यूली। यह तीनों टम्बल्ड स्टोन निमित्त ने सेलेनाइट प्लेट पर यूँ छोड़ दिए कि वो एक-साथ, बिना एक-दूसरे से टकराए, एक रिध्मिक मोशन में प्लेट पर नाचने लगे। पलक चाह कर भी अपनी नज़रें इनसे नहीं हटा पाई।
दूर ओपन लॉबी में बैठे गिरीश बाबू और चिरंजीवी ताम्बे यह सारा नजारा देख रहे थे।
“आई होप आपको अंदाज़ा है कि आपने किस बला को अपने घर और अपनी फ़ैमिली में ऐक्सेस दिया है,” ताम्बे अपनी तीसरी चाय ख़त्म करते हुए बोला।
“इसके तौर-तरीक़े काफ़ी अजीब और बेहूदा हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वो तरीक़े बिल्कुल सटीक और कारगर हैं। इरा को इसने जिस तरह ठीक किया वो अपने आप में चमत्कार से कम नहीं,” गिरीश बाबू ने जूस का घूँट भरते हुए कहा।
गिरीश बाबू को जूस पीते देख चिरंजीवी ताम्बे ने एक वेटर को इशारा कर के पास बुलाया। वेटर पूरी मुस्तैदी से जूस की ट्रे लिए हुए ताम्बे के पास पहुँचा। ताम्बे ने झट से तीन जूस के ग्लास ट्रे से उठा कर अपने सामने रख लिए और सैंड्विच की पूरी प्लेट उठा ली।
“आप जिसे चमत्कार समझ रहे हैं वो छलावा है गिरीश बाबू,” ताम्बे पूरा सैंड्विच एक बार में अपने मुँह में ठूँसते हुए बोला।
“कहना क्या चाहते हो? साफ़-साफ़ कहो चीता,” ताम्बे के लैक ऑफ़ टेबल मैनर्ज़ को नज़रअन्दाज़ करने की भरसक कोशिश करते हुए गिरीश बाबू शुष्क भाव से बोले।
ताम्बे ने बोलने के लिए मुँह खोला लेकिन उसका मुँह सैंड्विच से भरा हुआ था। उसने जल्दी से एक जूस का ग्लास उठा कर आधा ख़ाली किया और जूस के साथ मुँह में भरे सैंड्विच को हलक से नीचे धकेलते हुए बोला,
“लगभग दो साल पहले की बात है। दिल्ली पुलिस कंट्रोल रूम को गुमनाम कॉल आए जिनमें साउथ देल्ही के एक काफ़ी पॉश इलाक़े में ड्रग्स एंड ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग रैकेट के एक घर से रन करने की टिप दी गई। पुलिस ने जा कर जाँच और कार्यवाही की लेकिन टिप फ़र्ज़ी निकली,”
“फिर?”
“फिर लगातार अलग-अलग नम्बर्स और एरिया से कॉल्स आते रहे। हर बार कॉल करने वाला उस एक घर को ही टार्गेट करता। पुलिस टीम बार-बार वहाँ रेड करती, घर में सिर्फ़ एक अधेड़ उम्र के दम्पति रहते थे। उनके बारे में कुछ भी ऐसा नहीं था जो कहीं से भी संदेहास्पद लगे। लेकिन कंट्रोल रूम में कॉल्स आने नहीं रुके। पुलिस ने सादे कपड़ों में अपने आदमी हफ़्ते भर तक उस दम्पति के पीछे लगाए, नतीजा सिफ़र। दोनों बिल्कुल क्लीन थे। हज़बैंड सोसाइटी प्रेसिडेंट था, उसकी वाइफ़ सोसाइटी सेक्रेटरी, समाज में अच्छा नाम और रुतबा। लगभग हर महीने सत्संग, कथा और भंडारे करवाने वाले सात्विक लोग,” ताम्बे ने प्लेट में बचे बाक़ी सैंड्विच पर ढ़ेर सारा केचप डालते हुए कहा।
“अजीब बात है। फिर क्या हुआ?”
“कॉल्स का सिलसिला बंद नहीं हुआ, बल्कि और बढ़ गया। रात के दो-ढाई बजे कॉल आती कि उस घर में चोर घुस गए हैं, कभी कॉल करने वाला कहता कि वहाँ से मार-पीट की आवाज़ें आती हैं। हर बार पुलिस टीम जाती और वहाँ से ख़ाली हाथ वापस लौटती। आख़िरकार रोज़-रोज़ की इस फ़ज़ीहत से आजिज़ आ कर घर के मालिक ने अपनी ऊँची पहुँच का प्रदर्शन करते हुए सीधे पुलिस कमिश्नर पर दबाव बनाया, कि किसी भी सूरत में कोई पुलिस वाला उसके घर के आस-पास फटकना नहीं चाहिए। दूसरी तरफ़ पुलिस तो खुद ही इन कॉल्स से परेशान थी। पुलिस ने उस घर से रिलेटेड कॉल्स पर रेस्पांड करना बंद कर दिया,” कहते हुए ताम्बे ने केचप से लबरेज़ सैंड्विच उठा कर मुँह में ठूँसा।
“अरे मुद्दे की बात पर आओ भई। इस सब का कालांत्री से क्या लेना-देना?” गिरीश बाबू के लिए अब ताम्बे को खाते देखता बर्दाश्त से बाहर हो रहा था।
“सुड़ssss….सुडुक़sss” होंठों से ज़ोर की आवाज़ निकलते हुए ताम्बे ने जूस का बड़ा सा घूँट भरा।
गिरीश बाबू को अधीरता पूर्वक अपनी तरफ़ ताकता पा कर ताम्बे ने अपना सिर ऊपर नीचे हिलाया जैसे तस्दीक़ कर रहा हो कि बस अब मुद्दे पर आने ही वाला है। फिर यूँ लगा जैसे ताम्बे मुँह में भरे जूस और सैंड्विच के कुल्ले कर रहा है जिसे वो हलक से नीचे उतार गया और एक बड़ी सी डकार निकली।
“बर्रsss…,”
“देवा!” गिरीश बाबू किसी दार्शनिक के माफ़िक़ आँखें मूँदते हुए बुदबुदाए, जिसने जीवन के सबसे कष्टदायक दृश्यों का प्रत्यक्ष प्रसारण देख कर भी अपना आपा ना खोया हो।
“इसके बाद किसी ने दम्पति को सलाह दी कि घर पर कोई हवन, यज्ञ, करवा लें जिससे जिस भी दुश्मन की बुरी नज़र है उनपर वो टल जाए। यहाँ एंट्री हुई हिमालय से “अश्व सिद्धि” प्राप्त कर के लौटे बाबा “काला घोड़ा” की। ये साले दिल्ली वाले अमीरों के अलग चोंचले हैं, पहले जीवन भर हरामख़ोरी कर के दो नम्बर का माल बटोरते हैं फिर किसी आबा-बाबा-टाबा की लंगोट पकड़ के लटक जाते हैं कि वो इनकी और इनके दो नंबरिया माल की रक्षा करे। हाँ तो, बाबा काला घोड़ा ने सात दिन का एक अत्यंत गुप्त अनुष्ठान बताया जिसे करने से सारे दुश्मन पराजित हो जाएँगे। सात दिन तक बस उन्हें ना घर से निकलना था, ना बाहरी दुनिया में किसी से भी किसी तरह का सम्पर्क करना था। दम्पति ने बिफ़ोर हैंड अपने सभी जानने वालों को सूचित कर दिया कि अगले सात दिन तक उनसे सम्पर्क ना किया जाए। फिर बाबा काला घोड़ा के साथ ये दोनों मियाँ-बीवी सात दिन के लिए अपने घर में बंद हो गए,” ताम्बे जैसे अपनी बात में वजन डालने के लिए सस्पेन्स बढ़ाते हुए बोला।
“मुझे अब भी इस कहानी का कोई औचित्य, या निमित्त कालांत्री से सम्बंध नहीं समझ आया,” गिरीश बाबू ने शुष्क भाव से उसकी सस्पेन्स बनाने की कोशिश नाकाम करते हुए कहा।
“अब समझ आ जाएगा। अभी तो कहानी का असली पार्ट शुरू हुआ है। अगले सात दिनों तक उस घर से अजीब आवाज़ें आती रहीं। किसी को मारने-पीटने, बुरी तरह टॉर्चर करने की, रोने-बिलखने और गिड़गिड़ाने की। कई बार आस-पड़ोस वालों ने पुलिस को कॉल किया लेकिन पुलिस ने होक्स मान कर रेस्पांड ना किया। जब सात दिन बाद उस घर का दरवाज़ा खुला तो लोगों के होश उड़ गए,”
“ऐसा क्या हुआ था वहाँ?” इस बार गिरीश बाबू ने कौतूहलपूर्वक प्रश्न किया।
“दोनों मियाँ-बीवी अधमरी अवस्था में बाहर निकले…दिमाग़ से विक्षिप्त, मानसिक संतुलन पूरी तरह खो चुके। अपने कपड़े फाड़ रहे थे, सिर के बाल लगभग नोच डाले थे, शरीर की चमड़ी नाखूनों से खरोंच-खरोंच कर उधेड़ रहे थे, मुँह से रेबीज़ वाले पागल कुत्ते के माफ़िक़ झाग गिर रेला था,”
“और ये सब इनके साथ उस बाबा काला घोड़ा ने किया?”
“ना! दोनों ने एक-दूसरे के साथ किया। बाबा काला घोड़ा ने इनको एक बात बोली थी जिसे ये दोनों बके जा रहे थे…”मैं तो बस “निमित्त” मात्र हूँ, ये तुम्हारे कर्मों के फल हैं जो तुम्हें मिल रहे,”
“कैसे कर्म?”
“ये साले धनपशु बिहार, बंगाल और झारखंड से अंडरएज लड़कियों और छोटी बच्चियों को हाउस हेल्प बना कर लाते…बना कर क्या लाते इनके माँ-बाप से ख़रीद कर लाते। फिर शुरू होता इनकी दरिंदगी का खेल। उन बच्चियों का रात-दिन यौन शोषण किया जाता, जो दोनों मियाँ-बीवी मिल के करते। इतना ही नहीं, इन बच्चियों को अमानवीय यातनाएँ देते और यह पूरा सिलसिला वीडियो शूट करते। इतनी घोर यातना सहते हुए बच्ची जब मर जाती तो किसी जानवर की तरह उसकी लाश ठिकाने लगा दी जाती और उसकी जगह दूसरी बच्ची ख़रीद लाई जाती। सालों से ये धंधा चल रहा था, किसी को कानों कान खबर भी ना हुई। फिर इनकी ख़रीद कर लायी आख़री हाउस हेल्प किसी तरह इनके चंगुल से भाग निकली। दोनों ने लोकल थाने में पुलिस कम्प्लेंट भी दर्ज कराई थी कि लड़की इनके घर से लाखों का माल चोरी कर के भाग गई है। ताकि लड़की अगर पुलिस के पास जाए तो उल्टा उसे ही मुजरिम करार दे दिया जाए। लेकिन इस लड़की को विधाता ने शायद इन राक्षसों का काल बना कर भेजा था…तभी तो वो क़ानून के हाथ नहीं लगी, बल्कि राक्षसों के “बिग डैडी” के हाथ लग गई…निमित्त कालांत्री के!”
दो पल दोनों के बीच घुप्प सन्नाटा व्याप्त रहा।
“फिर,”
“कौन कहता है जिसकी कोई नहीं सुनता उसकी भगवान सुनता है? कभी-कभी जिसकी कोई नहीं सुनता उसकी शैतान सुन लेता है। उस मासूम लड़की की वेदना निमित्त कालांत्री नाम के शैतान ने सुन ली। पहले पुलिस को होक्स कॉल्स कर-कर के उस घर पर से शक के सारे कारण मिटा दिए फिर ऐसे हालात पैदा किए कि दम्पति ने खुद ही इसे “काला घोड़ा” के रूप में घर में सात दिन के अनुष्ठान के लिए ऐक्सेस दे दिया। कमीने ने सात दिन में दोनों को सात जन्मों की यातनाएँ दे डालीं वो भी बिना एक उँगली भी खुद उठाए। दोनों के दिमाग़ के साथ इस कदर खेल कि दोनों एक-दूसरे को ही यातना देते रहे और आख़िरकार पागल हो गए। पुलिस के हाथ इन सात दिनों की वीडियो लगी जिसमें ये दोनों एक-दूसरे को ही यातना देते नज़र आ रहे थे। वो वीडियो किसी तीसरे इंसान ने शूट की थी जो कि कोई और नहीं खुद इनका बाबा काला घोड़ा उर्फ़ निमित्त कालांत्री था,”
“ये कैसे पता कि वो शख़्स निमित्त कालांत्री ही था?”
“दोनों मियाँ-बीवी ने बाबा काला घोड़ा का जो डिस्क्रिप्शन दिया वो ऐन निमित्त कालांत्री का था। दोनों चीख-चीख कर कह रहे थे कि इनके चंगुल से भागी लड़की ने ही “काला घोड़ा” को उनसे बदला लेने भेजा है, लेकिन निमित्त कालांत्री पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती थी क्योंकि पहली बात, दोनों मियाँ-बीवी नीम पागल हो चुके थे इसलिए उनकी स्टेट्मेंट केस में कहीं स्टैंड नहीं करती। और दूसरी बात, उनके घर से वीडियो टेप्स का पूरा ज़ख़ीरा बरामद हुआ जिनमें वो अनगिनत बच्चियों का यौन शोषण करते और उन्हें अमानवीय यातनाएँ देते नज़र आ रहे थे। दोनों को फ़ौरन हिरासत में लेकर उनका साइकिक इवैल्यूएशन करवाया गया जिसमें साफ़ हो गया कि दोनों पागल हो चुके हैं,” ताम्बे अपनी बात कंक्लूड करते हुए बोला।
गिरीश बाबू को अचानक एहसास हुआ कि उनके माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहा आई हैं।
“पर ये तो अच्छी बात है ना, निमित्त कालांत्री हमारे साथ है। लोगों के भले के लिए काम कर रहा है, सच्चाई के लिए, मजलूमों और बेगुनाहों को इंसाफ़ दिलाने के लिए काम कर रहा है। तुम और हम दोनों जानते हैं चीता कि वो लड़की अगर पुलिस या वापस उस दम्पति के हाथ लगती तो उसका क्या अंजाम होता। तो क्या ये बेहतर नहीं है कि समाज में एक ही सही लेकिन निमित्त कालांत्री जैसा इंसान भी हो?” गिरीश बाबू ने डिस्मिसिव टोन में कहा।
ताम्बे ने टेबल पर रखे टूथपिक होल्डर से एक टूथपिक निकाली और दांतों के बीच फँसे चिकेन के रेशे खोदते हुए बोला,
“जब इसपर ग़ैरइरादतन हत्या का केस हुआ था तो उस केस का इंचार्ज मेरा दोस्त था। केस क्योंकि काफ़ी हाई प्रोफ़ाइल था इसलिए उसके बारे में काफ़ी कुछ पता है मुझे। केस इंचार्ज ने घंटों तक इंटेरोगेट किया था इस आदमी को और उस इंस्पेक्टर का ख़म ठोंक कर दावा है कि निमित्त कालांत्री से बड़ा चू**** दुनिया में दूसरा कोई नहीं हो सकता। इंसान मारना दूर की बात, ये आदमी झक मारने की भी क़ाबिलियत नहीं रखता…और यहाँ मैं ये बात साफ़ करना चाहूँगा कि ये पुलिस वाला दिल्ली के टॉप कॉप्स में से एक है जो एक नज़र देख कर ही अपराधी को ताड़ सकता है। पुलिस की तरफ़ से जिस सायकायट्रिसट ने निमित्त कालांत्री का साइकिक इवैल्यूएशन किया था उसके हिसाब से निमित्त हाई लेवल सोशिओपैथ है जिसका दिमाग़ी संतुलन हिला हुआ है, वो स्किट्ज़ोफ़्रीनीया का शिकार है और कभी भी एक ख़तरनाक सीरियल किलर के रूप में समाज के लिए गम्भीर ख़तरा बन सकता है। इसका तीसरा साइकिक इवैल्यूएशन इंडिया के टॉप सायकायट्रिसट और उनकी टीम के निरीक्षण में करवाया गया जिनके मुताबिक़ निमित्त कालांत्री के दिमाग़ में कोई नुक़्स नहीं। इसके ख़िलाफ़ कोई केस ना बना और यह शख़्स इत्मिनान से टहलते हुए क़ानून के पंजों से निकल गया,”
“पर तीनों में से कौन सी थ्योरी वास्तव में सच है?”
“तीनों ही,”
“ऐसा कैसे हो सकता है?”
“क्योंकि निमित्त कालांत्री चाहता है कि ऐसा हो। आप समझे नहीं, ही इज़ द मास्टर ऑफ़ मैनिप्युलेशन। इसके बारे में हर शख़्स वही और उतना ही जानता है जितना ये चाहता है कि वो जाने, और हर शख़्स इसके बारे में सोचता भी वही है जो निमित्त कालांत्री चाहता है कि वो सोचे। निमित्त कालांत्री के दुश्मन उससे कितनी और किस हद तक नफ़रत करेंगे ये भी वो खुद कंट्रोल करता है। ये कुछ वैसा ही है जैसे दो लोग शतरंज खेल रहे हैं लेकिन वास्तव में खेल सिर्फ़ एक ही शख़्स रहा है उसने बस दूसरे को इस भ्रम में रखा है कि वो अपनी “फ़्री-विल” से खेल रहा है। आप ये सोच कर खुश होते हैं, सुकून पाते हैं कि निमित्त कालांत्री जैसा छलिया आपके लिए और आपके साथ खड़ा है लेकिन मेरे लिए ये इंसान सबसे बड़ा थ्रेट है क्योंकि जिस दिन निमित्त कालांत्री मानवता के साथ नहीं, मानवता के विरुद्ध हुआ, उस दिन खुद शैतान भी पनाह माँग जाएगा,”
ताम्बे की बात का गिरीश बाबू के पास कोई जवाब नहीं था। दोनों की नज़रें निमित्त की ओर उठ गयीं।
निमित्त के चहरे पर फ़िलहाल किसी छोटे बच्चे सी मासूमियत नाच रही थी, जो टीचर से सवाल करने जा रहा हो।
“शुरू करें?”
पलक की नज़रें सेलेनाइट प्लेट पर नाचते टम्बल्ड टॉप्स से हट ही नहीं रही थीं। उसने सहमति में सिर हिलाया।
“तो शुरू करते हैं पलक…एक सवाल, जिसमें कई सवाल छुपे हैं और हर सवाल की दो चॉइसेज़ हैं, आपको दोनों में से कोई एक चुननी है। ये इंटरैक्टिव स्टोरीटेलिंग जैसा है, और इस स्टोरी का नाम है…
“द ग्लास गार्डेन”
ऐक्ट 01: द अराइवल
“आप एक चलती हुई ट्रेन में हैं। जिस कूप में आप ट्रैवल कर रही हैं उसमें आपके अलावा दूसरा और कोई नहीं,”
निमित्त की आवाज़ जैसे पलक के अंतर्मन में गूंजी। पलक को जैसे ज़ोर का झटका लगा। वो वाक़ई एक ट्रेन कूप में थी। उसके अलावा कूप में और कोई ना था।
“बाहर का दृश्य विचित्र है, ना ये शहर है ना गाँव, ना जंगल…” निमित्त की आवाज़ अब पलक के अंतर्मन में सुनाई दे रही थी और वो उस आवाज़ के निर्देशानुसार ही आने वाले दृश्यों को जी रही थी।
“…यह एक गार्डेन है…दूर-दूर तक फैला हुआ गार्डेन जो पूरी तरह काँच का बना है। क्रिस्टल के बने चमकदार पेड़, फूलों की क्यारियाँ यूँ लग रही हैं जैसे सर्दियों की सुबह की ओस जमा कर उसे फूलों के साँचे में ढाल दिया गया हो। छोटे तालाब हैं जैसे पारदर्शी शीशे बिछा दिए गए हों,”
पलक ने अपना चेहरा कूप ग्लास से टिका लिया और बाहर देखने लगी। बाहर का दृश्य हू-ब-हू वैसा ही था जैसा निमित्त ने बताया था। ट्रेन की रफ़्तार कम होने लगी।
“तुम्हारे बग़ल में सीट पर एक एन्वलप रखा है, उसे खोलो,”
पलक की नज़रें बग़ल की सीट पर गयीं, वहाँ वाक़ई एक एन्वलप रखा था जिसपर अंजान हैंडराइटिंग में पलक का नाम लिखा हुआ था। पलक की काँपती उँगलियाँ एन्वलप की तरफ़ बढ़ी। उसने लिफ़ाफ़ा खोला, अंदर एक सफ़ेद मुड़ा हुआ काग़ज़ था जिसपर लिखा था,
“वेल्कम टू द गार्डेन। यू विल नॉट लीव अंटिल द ट्रूथ इज़ रिवील्ड,”
काग़ज़ पलक के हाथ से छूट कर नीचे गिर गया। ठीक उसी समय काले लिबास में एक साया पलक के कूप के बाहर से गुजरा। उसके हाथ में एक चिड़िया का पिंजरा था जो एक लाल कपड़े से ढँका हुआ था। एक झलक में पलक को यूँ लगा जैसे वो साया निमित्त है, पर वो श्योर नहीं थी। उससे पहले ही वो साया वहाँ से जा चुका था। ट्रेन रूक चुकी थी। शायद वो साया नीचे उतर गया था।
“अब तुम्हारे सामने पहली चॉइस आती है पलक। ट्रेन रूक चुकी है और तुम पूरी ट्रेन में इकलौती मुसाफ़िर हो। क्या तुम यूँ ही बैठी रहोगी या फिर उस अजनबी के पीछे जाओगी,” निमित्त की आवाज़ दोबारा गूंजी।
“म…मैं नहीं जाऊँगी उसके पीछे। मैं यहीं रुकूँगी,” पलक ने फ़ैसला सुनाया।
“उस केस में एन्वलप में तुम्हारे लिए कुछ और भी है, उसे निकालो,”
निमित्त के इन्स्ट्रक्शन पर पलक ने एन्वलप में दोबारा हाथ डाला। इस बार उसमें एक नक्काशीदार पुरानी “स्केलटन-की” और एक छोटे आकार की, काले चमड़े की जिल्द मढ़ी हुई एक डायरी थी जिसके पन्ने भी काले थे।
“खोलो इसे,”
निमित्त का इन्स्ट्रक्शन फ़ॉलो करते हुए पलक ने काँपती उँगलियों से डायरी के पन्ने पलटने शुरू किए। डायरी के दो काले पन्नों के बीच एक सफ़ेद जैज़्मिन फ़्लावर दबा कर रखा हुआ था। उसके ऊपर काले पन्ने पर लाल स्याही से एक इबारत लिखी थी,
“वी बेरीड हर अंडर द विलो,”
घबराहट में पलक के हाथ से डायरी छूट कर नीचे गिर गई। पन्नों के बीच दबाया फूल बाहर आ गिरा।
“स्केलटन-की अपने पास रख लो, आगे काम आएगी,”
पलक ने निमित्त के निर्देश का अनुसरण करते हुए स्केलटन-की अपनी पॉकेट में रख ली।
“मुझे यहाँ से जाना है,” पलक ने काँपती आवाज़ में कहा।
“बिल्कुल! उठो और कूप से बाहर निकलो,” निमित्त की आवाज़ पलक के अंतर्मन में गूंजी।
पलक फ़ौरन अपनी जगह से उठी और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गई। अचानक उसने ठिठक कर पीछे देखा। कूप फ़्लोर पर ब्लैक डायरी और सूखा हुआ जैज़्मिन फ़्लावर गिरे हुए थे। पलक ने वो फूल भी उठा कर एहतियात से अपने पॉकेट में रख लिया फिर वापस पलट कर कूप का दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खोलते ही पलक सन्न रह गई।
“ये क्या जादू है,” पलक को अपनी आँखों पर यक़ीन नहीं हो रहा था।
सामने का नजारा बिल्कुल चेंज हो चुका था। कूप के बाहर ट्रेन नहीं थी बल्कि उस ग्लास गार्डेन का विशाल ग्लास गेट नज़र आ रहा था जिसे पलक कूप विंडो से देख रही थी। पलक ने एक कदम आगे बढ़ाया फिर ठिठक कर वापस पीछे मुड़ने की कोशिश की, लेकिन अब तक उसके पीछे कूप भी ग़ायब हो चुका था। अब आगे बढ़ने के अतिरिक्त कोई विकल्प ना था।
ऐक्ट 02: द गार्डेन गेट
पलक उस ग्लास के बने मिडिवल एरा के डिज़ाइन वाले विशालकाय गार्डेन गेट को देख रही थी। गेट फ़िलहाल बंद था और उसके सामने एक बहुत ही ऊँचे क़द की महिला; जिसकी हाइट कम से कम 7.5’ फ़ीट होगी, एक हाथ में काले रंग का छाता लिए खड़ी थी। उसके दूसरे हाथ में एक नक़्शा था जो उस ग्लास गार्डेन का था लेकिन उस नक़्शे पर से कई रास्ते मिटे हुए थे और नक़्शा आधा-अधूरा नज़र आ रहा था।
“इस ग्लास गार्डेन की बरसात में भी पानी की बूँदें नहीं, बल्कि काँच के टुकड़े आसमान से बरसते हैं,”
पलक की नज़रें ऊपर आसमान की तरफ़ उठीं। आसमान काले बादलों से घिरा हुआ था। कुछ देर पहले रुकी बारिश दोबारा शुरू होने वाली थी।
“तेज़ रफ़्तार से आसमान से गिरने वाली ये काँच की बूँदें तुम्हें बुरी तरह घायल कर सकती हैं। अगर इनसे बचना है तो तुम्हें छाता लेना होगा। दूसरी तरफ़ ये मैप तुम्हें ग्लास गार्डेन में अपना रास्ता ढूँढने में सहायक होगा। परंतु तुम्हें चुनाव किसी एक का ही करना होगा। तुम दोनों नहीं ले सकती,”
आसमान से बूँदें बरसने लगीं। ग्लास गार्डेन का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुल रहा था। पलक ने लपक कर उस लम्बी सफ़ेद औरत के हाथ से छाता ले कर खोला। आसमान से बरसती काँच की बूँदें छाते के बुलेटप्रूफ़ नज़र आते मटीरीयल से टकरा कर इधर-उधर छिटकने लगीं। जिस लम्बी औरत ने पलक को छाता दिया था वो खुद भी काँच की प्रतिमा में बदल गयी और उसके हाथ में थमा नक़्शा भी।
छाते में खुद को छुपाते हुए, बरसती काँच की बूँदों के बीच पलक ने ग्लास गार्डेन में कदम रखे। अंदर काँच की बनी अनगिनत आदमक़द प्रतिमाएँ थीं। ये सभी प्रतिमाएँ बिल्कुल सजीव प्रतीत हो रही थीं, जैसे जीते-जागते इंसानों को काँच की मूर्तियों में बदल दिया गया हो।
“इनमें से हर एक प्रतिमा कभी एक जीता-जागता इंसान था,” इस बार निमित्त की आवाज़ पलक के जिस्म में अंदर तक सिहरन पैदा कर गई।
ऐक्ट 03: द ग्लास स्टैचूज़
ग्लास गार्डेन अपने-आप में एक भूल-भूलैया था। काँच के पेड़, काँच के बने फूलों की क्यारियाँ और रास्ते, पारदर्शी काँच के तालाब और इस गार्डेन में काँच के इंसान जो बिल्कुल सजीव लगते हुए भी निर्जीव थे। आसमान से बरसती काँच की बूँदें इन्हें नुक़सान नहीं पहुँचा रही थीं, इनकी ऊपरी सतह, मुलायम, चिकनी और ठोस थी, लेकिन देखने में यह इतने नाज़ुक लग रहे थे कि हल्की सी ठोकर लगते ही गिर कर चकनाचूर हो जाएँ।
पलक इस ग्लास गार्डेन में भटक रही थी। उसके ज़हन में डायरी के काले पन्ने पर लिखी इबारत कौंधी।
“वी बेरीड हर अंडर द विलो,”
पलक की नज़रें गार्डेन में चारों ओर घूमीं। बारिश तेज़ से मूसलाधार की तरफ़ बढ़ रही थी। आसमान घने बादलों से इस कदर घिर चुका था कि चारों तरफ़ स्याह अंधकार व्याप्त था जिसके बीच उस विचित्र ग्लास गार्डेन और वहाँ स्थापित प्रतिमाओं पर आसमान से कौंधती बिजली प्रतिबिम्बित हो कर एक वृहद् इंद्रजाल उत्पन्न कर रही थी।
“तुम्हारे पास समय कम है पलक,”
“क्या मतलब?”
आसमान से कौंधती बिजली नीचे तालाब पर गिरी।
“छनाकsss….” काँच टूटने की तीखी और ज़ोरदार ध्वनि वातावरण में गूंजी। काँच का ताल चकनाचूर हो चुका था। ठिठक कर खड़ी पलक स्तब्ध उसे देख रही थी।
आसमान में दोबारा बिजली कौंधी। इस बार उसका लक्ष्य ताल या फूलों की क्यारी नहीं, बल्कि काँच प्रतिमाओं का एक समूह था।
“छनाकsss….” फिर हुई तीखी आवाज़ के साथ प्रतिमाओं का समूह टुकड़ों में बिखर गया। काँच के टूटे चेहरों में पलक को अपने चहरे के अनगिनत प्रतिबिम्ब नज़र आ रहे थे।
“वी बेरीड हर अंडर द विलो,” उसके दिमाग़ में फिर से इबारत कौंधी। पलक ने टूटे हुए तालाब की तरफ़ देखा।
तालाब के किनारे काँच के “वीपिंग विलो” पेड़ों का समूह था। वीपिंग विलो अधिकतर नदी और तालाबों के किनारे पाए जाते हैं और इनके पत्ते व शाखाएँ प्राकृतिक रूप से ही यूँ झुकी हुई होती हैं जिन्हें दूर से देखने पर ऐसा आभास होता है जैसे यह सिर झुका कर रुदन कर रहे हों। यह वीपिंग विलो भी ऐन ऐसे ही थे, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना था कि इनके पत्ते, टहनियाँ, शाखाएँ, सब कुछ काँच के बने थे।
पलक वीपिंग विलो के समूह की तरफ़ भागी। वहाँ एक साया खड़ा नज़र आ रहा था। ये वही साया था जिसे पलक ने ट्रेन में देखा था।
“त…तुम..” पलक उसे देख कर ठिठकी।
काले लिबास में वीपिंग विलो के नीचे निमित्त कालांत्री खड़ा था। उसके हाथ में लाल कपड़े से ढँका हुआ पिंजरा था।
“तुम पहली चॉइस में कूप में रुकने के बजाए मेरे पीछे आती तो भी यहीं आती, बीच में तुम दूसरी कोई भी चॉइस मेक करती तो भी तुम यहीं आती पलक। तुम्हारा यहाँ आना नियति है जिसे बदला नहीं जा सकता, सिर्फ़ यहाँ तक पहुँचने का रास्ता तुम अपनी इच्छा से चुन सकती हो…जो कि तुमने चुना,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“क…कौन हो तुम? क्या हो तुम?”
“मैं? मैं तुम्हारे आत्मबोध का “निमित्त” मात्र हूँ,” कहते हुए निमित्त एक ओर सरक कर खड़ा हो गया।
उसके पीछे काँच की एक प्रतिमा थी। एक लड़की की प्रतिमा। उस प्रतिमा का चेहरा देख कर पलक के होंठों से तीखी सिसकारी निकल गयी।
वो प्रतिमा किसी और की नहीं, खुद पलक की थी, लेकिन उसके वर्तमान स्वरूप की नहीं, बल्कि तब की जब वो बारह-तेरह साल की थी। पलक के काँपते कदम अपनी प्रतिमा की ओर बढ़े।
काँच की पलक के चेहरे पर बच्चों सी मासूमियत थी। उसकी आँखें सिर्फ़ इसलिए नहीं चमक रही थीं क्योंकि वो काँच की बनी थीं, उन आँखों ने अब तक जीवन के वो घिनौने और भयावह सच नहीं देखे थे जो किसी बच्ची से उम्र से पहले उसका बचपन छीन लेते हैं। उस काँच के चेहरे पर एक सहज मुस्कान थी जिसे पलक जाने कब का भुला चुकी थी। उस भूली मुस्कान को देख कर अनायास ही उसकी आँखों से दो बूँदें बह गयीं।
उसी पल आसमान में फिर से ज़ोरदार बिजली कौंधी जो सीधे उस वीपिंग विलो पर आ गिरी जिसके नीचे पलक और निमित्त थे।
“छनाकsss….” तीव्र तीखी ध्वनि के साथ वीपिंग विलो की शाखाएँ और पत्ते टूट कर नीचे गिरने लगे।
“अब आख़री फ़ैसला लेने का वक्त आ गया है पलक। तुम्हारे बचपन को पारदर्शी काँच के अस्तित्व में क़ैद की हुई ये मूर्ति किसी भी पल आसमान से बरसती आपदा के सामने चकनाचूर हो जाएगी। तुम्हारे पास सिर्फ़ एक मौक़ा है…एक आख़री मौक़ा…या तो अपने खोए अस्तित्व के इस बिछड़े अक्स को बचा लो, या फिर अपने अपने आज के अस्तित्व को बचा लो,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
“क..कैसे? कैसे बचाऊँ मैं इसे?” पलक ने अपने ऊपर लिया हुआ छाता अपनी काँच की प्रतिमा के ऊपर कर दिया ताकि ऊपर से बरसते टूटे काँच के टुकड़े उसे नुक़सान ना पहुँचाएँ, लेकिन वीपिंग विलो की टहनियाँ टूट रही थीं। जल्द ही पूरा पेड़ टूट कर उनके ऊपर गिरने वाला था।
“तुम्हारे पास एक चाभी है, जो तुम्हें ट्रेन के एन्वलप में मिली थी। वो चाभी इस पिंजरे की है,” कहते हुए निमित्त ने पिंजरे पर ढँका लाल कपड़ा उठा दिया। पिंजरे के अंदर एक काँच का बना दिल था जो धड़क रहा था।
“इस दिल को इसकी सही जगह पर रखते ही तुम्हारा वो हिस्सा जो अब सिर्फ़ एक अक्स, एक प्रतिबिम्ब, एक पारदर्शी काँच की प्रतिमा बन कर रह गया है, फिर से जीवंत हो जाएगा,” निमित्त पलक की आँखों में देखते हुए बोला।
पलक ने बिना एक पल गँवाए अपनी पॉकेट से “स्केलटन-की” निकाली और पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। वो अंदर हाथ डाल कर काँच का दिल निकालने ही वाली थी कि निमित्त ने उसे रोक दिया।
“ना-ना-ना-ना-ना…ऐसे नहीं। ब्रह्मांड की अपनी संहिताएँ और सिद्धांत हैं जिनका उल्लंघन कोई नहीं कर सकता। यूनिवर्स का लॉ कहता है, “टू ऑब्टेन समथिंग, समथिंग ऑफ़ ईक्वल वैल्यू मस्ट बी लॉस्ट,”…यानी जो कुछ भी पाना चाहते हो, उसकी एवज़ में समान मात्रा में कुछ देकर मूल्य चुकाना होगा,” निमित्त के चहरे पर धूर्त भाव आए।
“क्या देकर मूल्य चुकाना होगा?” पलक से सशंकित भाव से सवाल किया।
“दिल का मोल दिल से चुकाओ। अपना दिल निकाल कर इस पिंजरे में रख दो, और ये काँच का दिल वापस अपनी प्रतिमा में लगा दो,” निमित्त ने अपनी पॉकेट से एक नक्काशीदार कटार निकाल कर पलक की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा।
“लेकिन ये कैसे पॉसिबल है?” पलक कन्फ़्यूज़्ड नज़र आ रही थी।
“तुम भूल रही हो कि तुम फ़िलहाल एक कहानी…एक इंटरैक्टिव स्टोरी में हो। यहाँ कुछ भी पॉसिबल है। ये आख़री चॉइस है जो तुम्हें मेक करनी है। अगर हिम्मत है तो कटार उठाओ और अपना दिल चीर निकालो, तुम मारोगी नहीं लेकिन दर्द उतना ही होगा जितना वास्तविक यथार्थ में अपने सीने में कटार उतारने में होता। अगर हिम्मत नहीं…तो मुड़ कर यहाँ से चली जाओ लेकिन पलट कर मत देखना, अपने खोए बचपन को चकनाचूर होते नहीं देख सकोगी,”
पलक की आँखें भर आयीं। गला भर्रा गया,
“प्लीज़..ऐसा क्यों कर रहे हो?” वो लगभग गिड़गिड़ाते हुए बोली।
“क्योंकि ये मेरी कहानी है, यहाँ मैं थोड़ा सा नहीं पूरा भगवान हूँ। “अहं ब्रह्मास्मि” हूँ। यहाँ मैं कुछ भी कर सकता हूँ,” निमित्त मुस्कुराते हुए बोला।
पलक ने एक झटके से कटार उठा कर अपने सीने की तरफ़ तान ली। पूरे वेग से सीना चीरने के लिए नीचे आती कटार कुछ इंच की दूरी पर ठिठक कर रुक गई।
“मुझसे नहीं होगा…नहीं है मुझ में इतनी हिम्मत,” पलक की आवाज़ काँप रही थी। उसमें झलकती हताशा साफ़ कह रही थी कि वो अपनी हार स्वीकार चुकी है।
बिना निमित्त के रीऐक्शन का वेट किए, वो वहाँ से वापस जाने के लिए पलटी। उसके विलो से दूर जाते तेज़ कदम अगली बिजली गिरने की आवाज़ से ठिठक गए। वीपिंग विलो का काफ़ी हिस्सा टूट कर गिर चुका था अब सिर्फ़ वही हिस्सा बाक़ी था जो उसकी काँच की प्रतिमा को कवर किए हुए था। ना चाहते हुए भी वो पीछे मुड़ी। अपने खोए बचपन को यूँ नेस्तनाबूद होने के लिए छोड़ जाने का कलेजा नहीं था उसमें।
“तुमने कहा कहानी मेरी चॉइस पर चलेगी…राइट?”
“जो चॉइस तुम्हारे सामने हैं उनपर,”
“ठीक है, मैं इस काँच के दिल की क़ीमत पिंजरे में रखने को तैयार हूँ,”
“बढ़िया…फिर देर किस बात की?”
“मुझसे ना होगा…तुम कर दो। तुमने कहा ये कहानी ही तो है, तुम यहाँ के भगवान हो…कुछ भी कर सकते हो। तो कटार उठाओ और मेरा दिल निकाल कर अपने पिंजरे में रख लो और आज़ाद कर दो मेरे बचपन को,” पलक एक साँस में बोल गई।
“हूँ! ऐसा हो तो सकता है…लेकिन…” निमित्त सोचने का नाटक करते हुए बोला।
“लेकिन क्या?”
“तुम्हें मुझे ये अधिकार सौंपना होगा। बिना तुम्हारे मुझे अधिकार दिए, मैं तुम्हारा दिल नहीं निकाल सकता,” निमित्त की आँखों में शरारती चमक और होंठों पर तिरछी मुस्कान थी।
“ठ…ठीक है, मैं तुम्हें ये अधिकार सौंपती हूँ,” पलक दृढ़ भाव से बोली।
“बढ़िया,” निमित्त के चहरे पर आए भाव बता रहे थे कि आख़िरकार उसे वो मिल गया जो उसे चाहिए था।
पलक को अंदाज़ा भी नहीं हुआ था कि उसने अनजाने में निमित्त को अपने अंतर्मन में प्रवेश करने की अनुमति दे दी थी। निमित्त एक झटके से आगे बढ़ा और उसका हाथ जैसे पलक के सीने में उतर कर सीधा उसके धड़कते दिल तक पहुँच गया।
“नहीं, ये मूल्य बराबरी का नहीं है,” निमित्त जैसे अपनी हथेली में पलक के दिल को तोलते हुए बुदबुदाया।
“क…क्यों?”
“पिंजरे में जो दिल है वो बहुत हल्का है। उसमें कोई बोझ नहीं। पर तुम्हारा दिल भारी है…बहुत भारी। इस दिल का भार उस काँच के दिल से बहुत अधिक है,” निमित्त अपना हाथ वापस खींचते हुए बोला।
“नहीं…ऐसा मत करो,”
“मैंने कहा ना, समान मोल चुकाना होगा,” निमित्त पलक के बिल्कुल पास आकार उसकी नज़रों में देखते हुए बोला। पलक की पलकें आंसुओं से डबडबाई हुई थीं।
“प्लीज़…मत करो ऐसा,” पलक सिसकते हुए बोली।
“पिंजरे में कुछ रखना होगा। उतने ही वजन का…या कह लो उतना ही हल्का जितना कि उस पिंजरे में रखा दिल है,” निमित्त ने बहुत आहिस्ता से अपना हाथ पलक की पॉकेट में डाला और वहाँ से सूखा हुआ जैज़्मिन का फूल निकाल लिया।
निमित्त ने पिंजरे में वो मुरझाया हुआ फूल रख कर वहाँ से काँच का दिल निकाल लिया और पलक के हाथों में सौंप दिया। पलक की आँखों से बहते आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने आगे बढ़ कर काँच का दिल अपनी ग्लास स्टैचू से टच कराया। काँच का दिल स्टैचू में समा गया और स्टैचू तेरह साल की जीती-जागती पलक में तब्दील हो गई।
“कम ऑन, खुद को ज़ोर से गले लगाओ और बताओ अपने “टीन सेल्फ़” को कि तुम्हें उसपर कितना गर्व है…टू बी सो स्ट्रॉंग, टू बियर सच पेन,” निमित्त की आवाज़ और चहरे के भाव अब बेहद सौम्य थे।
पलक ने आगे बढ़ कर खुद को गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी।
“अब जब तुम जागोगी, तुम्हारा चाइल्डहुड ट्रॉमा हील हो चुका होगा…मेरी आवाज़ को फ़ॉलो करो…थ्री…टू…वन…”
“स्नैप” चुटकी बजने की तीखी आवाज़ के साथ पलक की तंत्रा भंग हुई। उसे यूँ लगा जैसे वो बैठे-बैठे एक गहरी झपकी ले रही थी जिसमें उसने एक विचित्र सपना देखा। निमित्त उसके सामने कुर्सी पर बैठा मुस्कुरा रहा था। सेलेनाइट प्लेट पर नाचते टम्बल्ड टॉप्स अब रुक चुके थे।
पलक के चहरे के भाव निमित्त को देख कर बदले।
“तुम क्या हो?…जादूगर?”
“मैं तो बस “निमित्त” मात्र हूँ,” निमित्त मासूमियत से कंधे उचकाता हुआ बोला।
पलक चुपचाप अपनी जगह से उठी और निमित्त के या वहाँ उपस्थित बाक़ी किसी शख़्स के कुछ समझ पाने से पहले बढ़ कर निमित्त को गले लगा लिया।
“थैंक यू सो मच,”
निमित्त ने अपनी पॉकेट से एक सूखा जैज़्मिन का फूल निकाला और पलक की हथेली पर रख दिया।
“कांव-कांव-कांव”
लॉन और पूरे गार्डेन एरिया में जगह-जगह ढेरों कौवे आ कर बैठ रहे थे।
पलक के मिज़ाज में अचानक आई तब्दीली से वहाँ मौजूद हर शख़्स अवाक् था। खुद गिरीश बाबू भी
“ये क्या जादू हुआ? कुछ पल पहले ये लड़की निमित्त को देख कर बुरी तरह चिढ़ रही थी, अब खुद आगे बढ़ कर उसे गले लगा रही है,”
“मैं आपको यही समझाने की कोशिश कर रहा था गिरीश बाबू। ही इज़ द मास्टर ऑफ़ मैनिप्युलेशन। अपने बारे में लोगों की फ़ीलिंग्स तक कंट्रोल कर सकता है ये इंसान। ही इज़ ए थ्रेट फ़ॉर द सोसाइटी,….बररर्रsss” जूस का आख़री ग्लास ख़ाली कर के डकार मारते हुए चीता ने कहा।
निमित्त ने अपना चेहरा ऊपर आसमान की तरफ़ उठाया। आसमान में कौवों का हुजूम मंडरा रहा था। वो जानता था कि ये उसके लिए संकेत है। बाग़ीचे की एक डॉल पर, पत्तों की ओट में बैठे उल्लू की हल्की “हूट” सुनाई दी। पलक अब भी अपने इमोशन्स प्रॉसेस करने की कोशिश कर रही थी और फ़िलहाल वहाँ से उठ कर जा चुकी थी। सुभद्रा ने आँखों के इशारे से निमित्त से माजरा पूछा। निमित्त ने आँखों के इशारे से ही उसे इत्मिनान दिलाया कि फ़ुरसत से सब कुछ विस्तार में बताएगा और अपनी जगह से उठ कर ताम्बे की ओर गुनगुनाते हुए बढ़ गया।
“तूने अभी देखा नहीं, देखा है तो जाना नहीं, जाना है तो माना नहीं, मुझे पहचाना नहीं, दुनिया दीवानी मेरी मेरे पीछे-पीछे भागे, क़िस्में है दम यहाँ ठहरे जो मेरे आगे, मेरे आगे आना नहीं, देखो टकराना नहीं, किसी से भी हारे नहीं हम…जो सोचें, जो चाहें, वो कर के दिखा दें…हम वो हैं जो दो और दो पाँच बना दें,”
End Of Episode 5 part A.
TO BE CONTINUED
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