ॐ नमः हरिहराय
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ॐ नमः हरिहराय
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भर-भर के शब्द
हेय पीपल,
जैसा कि आप में से काफ़ी लोग जानते हैं, गुजरे दो सप्ताह काफ़ी इवेंटफ़ुल रहे।प्रतिलिपि पर हमने एक “तीन टांगों वाली मादा” का आतंक देखा…(नाम अच्छा है सोच रहा हूँ एक कहानी लिख डालूँ “तीन टांगों वाली चुड़ैल का आतंक”)। लॉंग स्टोरी शॉर्ट, “मिस टी” नाम से फ़ेक प्रोफ़ाइल बना कर यह बंदा चैटरूम और डी.एम. में घुसा और दूसरे रीडर्स से घुलने-मिलने का दिखावा करते हुए डी.एम. में मुझे “हनी ट्रैप” करने की नाकाम कोशिश करता रहा, बेचारे को आभास भी नहीं था कि शुरुआती कुछ इंटरैक्शन्स के बाद ही मैं इसे पहचान गया था और “प्ले-अलॉंग” करता रहा। जब मेरे विरुद्ध कोई भी बात निकलवा पाने में यह नाकाम हुआ तो फ़्रस्ट्रेशन इस कदर हावी हो गई कि अपने संस्कारों का प्रदर्शन खुले तौर पर करने लगा।
मैं सिर नवा के आप सब को प्रणाम करता हूँ…शाउट-आउट टू ऑल यू गाइज़ जिन्होंने इसकी रुग्ण मानसिकता से ग्रस्त प्रलाप पर ढेले की तवज्जो ना दी और मेरे सपोर्ट में खड़े रहे। आप सब के डी.एम. इसका प्रमाण हैं कि इंसान के तौर पर मैंने क्या कमाया है…वैसे अब भी कहता हूँ कि आप में से कोई एक भी रीडर जिसके साथ मैंने कभी डी.एम. में कोई सजेस्टिव या इनअप्रोप्रिऐट कॉन्वर्सेशन किया हो तो वो स्क्रीन-शॉट दें…बल्कि आपमें से कई रीडर तो इस बात पर तंज देते हैं कि 2020 में किए हुए डी.एम. का अब तक जवाब नहीं दिया मैंने (क्षमा करें..पर इतना पीछे जाते मौत आती है, फिर से मैसेज कर दें मैं रिप्लाई दे दूँगा)। जब इतने से “मक़सद” ना पूरा हुआ तो भाई ने हर कहानी पर एक रेटिंग दे कर वहाँ मौखिक मल-त्याग किया। यहाँ भी इसको ढेले की तवज्जो ना मिली। आगे भी ये मायावी मंथरा अलग-अलग रूप धर कर ऐसी “खट्टी-मीठी” हरकतें करता रहेगा तो…सावधान रहें, सतर्क रहें, अपना ख़्याल रखें…अब्बे…(ये तो मेरी लाइन नहीं है)…इसकी रेटिंग अथवा मल-त्याग से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, जानता हूँ आप सब साथ हैं और आपका ये विश्वास मेरी सबसे बड़ी सुपर पावर है…(चिचा बेन, क्वोट पेश कीजिए)…”विद ग्रेट पावर, कम्स ग्रेट रेस्पॉन्सिबिलिटीज़,”।
इसके बाद इसने अनगिनत फ़ेक आई.डी. बना कर मेरी आई. डी. और कॉंटेंट को रिपोर्ट किया। नतीजतन प्रतिलिपि ने पहले आप सबकी सबसे पसंदीदा कहानी “ही लव्ज़ मी “नॉट”” को बिना किसी पूर्व चेतावनी के हटाया और उससे भी मन ना भरा तो मेरी आई. डी. ही ब्लॉक कर दी।
मैं आप में से एक एक के आगे नतमस्तक हूँ, दो दिन तक आप सब ने मिल कर प्रतिलिपि के विरुद्ध मुझे वापस लाने की मुहीम छेड़ दी। किसी एक नाम लेना सही नहीं होगा क्योंकि मुझसे जिस किसी का भी नाम छूटेगा उसके साथ ये नाइंसाफ़ी होगी, इसीलिए यही कहूँगा कि आप सब ने मिल कर मेरे लिए जो कुछ भी किया आपकी वो भावनाएँ मुझ तक पूरी पूरी पहुँची हैं।
बारम-बार आप सब को धन्यवाद। प्रतिलिपि वालों के हौसले आप लोगों का रौद्र रूप देख कर पस्त हो गए इसलिए मुँह पिटा कर मेरी आई.डी. अनब्लॉक करनी पड़ी। मुझे मेल ये भेजा कि मैं अपनी कहानियों में अश्लीलता परोस रहा हूँ और आप लोगों को कहानियों के ज़रिए काला-जादू सिखा रहा हूँ।
प्रतिलिपि की जो भी “कॉंटेंट पॉलिसी” है मैं उसका “सम्मान” करता हूँ, परंतु उनके लेवल का “संस्कारी” और “उच्चतम श्रेणी” का कॉंटेंट देने में पूर्णतः असमर्थ हूँ(इसमें तेरा घाटा, मेरा कुछ नहीं जाता)। इसलिए ना चाहते हुए भी प्रतिलिपि पर अब कहानियाँ पोस्ट करना सम्भव ना होगा। अतः आप सभी पाठकों से अनुरोध है कि जो पाठक हमसे सोशल मीडिया पर नहीं जुड़े हैं उन्हें यहाँ कहानियों के लिंक शेयर करें।
मैं कथासारथी हूँ। मेरा उद्देश्य सिर्फ़ कहानी कहना है, मेरे 7k फ़ॉलोअर्स हैं या 7 इससे मुझे कभी फ़र्क़ नहीं पड़ा…ज़रूरत से ज़्यादा मैंने कभी कुछ माँगा नहीं और आवश्यकता से कम कभी मेरे भोले ने पड़ने ना दिया।
कहानियों पर आए हैं तो कहानियों की भी बात कर लें। ही लव्ज़ मी ‘नॉट’ और सिन्स ऑफ़ द फादर्स सीरीज़ तो चल ही रही हैं, इनके अतिरिक्त दो अन्य किरदार जल्द ही यहाँ पदार्पण करेंगे, जिनमें से एक हैं “जिमी मिस्ट्री”। जो रीडर्स कथासारथी से पहले से जुड़े हैं वो जानते हैं कि जिमी मिस्ट्री सन 2023 सेप्टेम्बर में लॉंच किया गया था जिसकी पहली ग्राफ़िक नॉवल का नाम था "बैन्शी ऑफ़ ब्रह्मपद” लेकिन कुछ कारणों के चलते ये कैरेक्टर दुनिया के सामने नहीं आ पाया…अब तक। जिमी मिस्ट्री से आप अब बहुत जल्द मिलेंगे उसकी पहली वन-शॉट कहानी “नोटेबल्स” में। जिमी के अलावा दूसरा किरदार जो आपके बीच आ रहा है वो है “लोक स्वामी” उर्फ़ लो-की। इनके अतिरिक्त निमित्त कालांत्री की भी स्टैंड-अलोन वन-शॉट कहानियाँ प्लैन कर रहे हैं जिनकी जानकारी अगले राइट-अप में दूँगा।
फ़िलहाल आप एपिसोड पढ़िए, मैं चलता हूँ मुझे पिलपिली चुड़ैल के पपीते पीले करने के लिए काला जादू करने जाना है।
आपका कथासारथी,
नितिन के. मिश्रा
नितिन के. मिश्रा
“निमित्त”
“निमित्त…” सुभद्रा की आवाज़ दूर किसी टनल के पार से आती सुनाई दी।
“उठ जा हौले, क्या ब्रेड पर मक्खन के माफ़िक़ फैलेला है…” फिर स्कैली की आवाज़ आई।
निमित्त ने आँखें खोलीं।
वो गिरीश बाबू की कोठी पर था, उस रूम में बेड पर लेटा हुआ जहां उसके रहने का इंतज़ाम किया गया था, जहां ऑक्युपेन्सी सिर्फ़ उसके सामान की थी…अब तक।
किसी 70s-80s के फ़िल्मी डॉक्टर की तरह निमित्त के बेडसाइड पर बैठे डॉक्टर थापा का स्थेटोस्कोप निमित्त की छाती पर और उँगलियाँ कलाई की नब्ज थामे हुए थीं।
“कह दो मुझे दवा की नहीं दुआ की ज़रूरत है…दुआएँ ऐसे भी बहुत हैं मेरे साथ, हमेशा यही बचाती हैं,” निमित्त की धीमी और कमजोर आवाज़ निकली।
“होश में आते ही शुरू हो गए? बड़े ढीठ आदमी हो यार,” डॉक्टर थापा ने सकपकाते हुए कहा।
“कभी घमंड नहीं किया,”
“वुफ़्फ़-वुफ़्फ़” निमित्त के होश में आते ही अल्फ़ा ख़ुशी से दुम हिलाते हुए उसका मुँह चाटने लगा।
“कोई फ़्रैक्चर या सीरीयस इंटर्नल इंजरी नहीं लग रही। फीवर और दर्द के लिए मैंने दवा ड्रिप में दे दी है। यह पूरी ड्रिप चलने देना डॉरिस आंटी,” डॉक्टर थापा वहाँ खड़ी नर्स डॉरिस को इन्स्ट्रक्शन देते हुए बोले।
डॉरिस की तरफ़ से प्रतिक्रिया में मात्र हल्के से ठुड्डी हिली।
निमित्त ने हल्के से सिर उठा कर रूम में नज़र घुमाई। डॉक्टर थापा से कुछ पीछे ही सुभद्रा खड़ी थी जो ख़ासी चिंतित नज़र आ रही थी। निमित उसकी ओर देख कर मुस्कुराया।
सुभद्रा उसके पास आई।
“अब कैसे हैं?”
“बेहतरीन…उम्दा…लाजवाब…बेहिसाब…ऐन जैसा ऊपरवाले ने बनाया है,” निमित्त बेपरवाही से चुटकी लेते हुए बोला।
“क्या हुआ था आपके साथ?” सुभद्रा पर निमित्त की ठिठोली का कोई प्रभाव ना पड़ा। उसने गम्भीरता से सवाल किया।
“पुराने पीपल की पिलपिली चुड़ैल पीतल की पीली पायल पहन के पॉइज़नस पप्पी लेने पूरी पगलाहट के साथ पीछे पड़ गई थी,” निमित्त ने भी पूरी तरह संजीदा होते हुए जवाब दिया।
“व्हॉट?” सुभद्रा और डॉक्टर थापा चौंके।
“ये चोटें चुड़ैल की पप्पियों से लगी हैं?” डॉक्टर थापा ने सार्कैस्टिक होते हुए सवाल किया।
“ना..पप्पी तो लेने ही नहीं दी, इसीलिए तो पिलपिली चुड़ैल पगलाई। बोली बता पुत्तर मेरी पायल ज़्यादा पीली या पपीते?”
“चुड़ैल के पास पपीते थे?”
“दो-दो,”
“पीपल पर कब से पपीते उगने लगे?”
“पपीते लज़ीज़ थे, चुड़ैल को अज़ीज़ थे…उगे पपीते के पेड़ पर ही थे पर पीपल के क़रीब थे,” निमित्त यूँ शून्य में निहारते हुए बोला जैसे जीवन दर्शन पर कोई अत्यंत गूढ़ ज्ञान दे रहा हो।
“मैं अपनी बात वापस लेता हूँ…इंटर्नल इंजरी के क्लीयर सिम्प्टम्स हैं…फ़िज़िकल नहीं…मेंटल। इसको पंजिम ले जा कर एम.आर.आई. और सी.टी.स्कैन करवाना होगा,” डॉक्टर थापा अपनी जगह से उठते हुए बोले।
“चुड़ैल पिलपिली तो थी पर प्यारी नहीं…पपीते पीले तो थे पर हमारे नहीं,” निमित्त पूर्ववत अपना दर्शनशास्त्र दोहराते हुए बोला।
“अजीब बेवक़ूफ़ इंसान है, सिर्फ़ बकवास करता है और बहुत ज़्यादा करता है,” डॉक्टर थापा उस कमरे से निकलते हुए बुदबुदाए। नर्स डॉरिस भी सहमति में सिर हिलाते हुए उनके पीछे-पीछे रूम से बाहर निकल गई।
निमित्त ने देखा इरा रूम के दरवाज़े पर खड़ी उसकी तरफ़ देख रही थी। इरा को देख कर निमित्त ने हौले से अपना हाथ हिलाया। इरा मुस्कुराते हुए अंदर आ गई जैसे उसके बुलाने की ही प्रतीक्षा कर रही थी।
निमित्त के बुलाने पर इरा उसके बेड पर, उसके पास आ कर बैठ गई। सुभद्रा ने वो चेयर; जिसपर डॉक्टर थापा बैठे थे, अपनी तरफ़ खींची और निमित्त के निकट बैठते हुए गम्भीर भाव से बोली,
“मैं समझ गई थी कि आप असली बात डॉक्टर थापा के सामने नहीं कहना चाहते। अब बताइए, क्या हुआ था? किसने अटैक किया था आप पर?”
निमित्त का चेहरा फ़्लिप सेकंड में बिल्कुल सर्द और संजीदा हो गया।
“भाड़े के टट्टू। ट्रैप करने की कोशिश थी…या तो मुझे हाथापाई करते हुए वीडियो शूट कर के वाइरल करते, कॉंट्रवर्सी और बखेड़ा शुरू करने की साज़िश रचते ताकि मुझे बदनाम कर के यहाँ से भी जाने पर विवश कर दें। जब इसमें फेल हुए तो अपने कमजोर अस्तित्व और बीमार मानसिकता का प्रदर्शन करने पर उतर आए…लेकिन महादेव ने बता दिया कि वो मेरे साथ हैं,”
निमित्त की बात सुभद्रा के अधिक पल्ले ना पड़ी, वो अब भी थोड़ी फ़िक्रमंद नज़र आ रही थी। पर उसने आगे सवाल ना किया।
“मैं यहाँ तक कैसे पहुँचा?” सवाल निमित्त ने ही किया।
“आपको याद नहीं?”
निमित्त ने अनभिज्ञता से कंधे उचकाए।
“मेन गेट से कुछ दूरी पर आप बेहोश मिले थे। अल्फ़ा यहाँ तक आया था और भौंकते हुए मुझे अपने साथ चलने का इशारा करने लगा। जब मैं उसके साथ पहुँची तो आप सड़क पर बेहोश मिले। फिर कदम अपने कमांडोज़ की हेल्प से आपको यहाँ लेकर आए,”
“हुम्म्म,”
कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। निमित्त ने इरा की तरफ़ देखा। वो उसे देख कर मुस्कुरा रही थी।
“मैं डर गई थी आपके लिए एन.के.?”
“मैं बिल्कुल ठीक हूँ किड्डो,” अपनी उँगलियों से इरा के माथे पर बाल बिखेरते हुए निमित्त बोला।
इरा ने अपनी बंद मुट्ठी आहिस्ता से निमित्त के सामने की। निमित्त ने अपनी दाहिनी मुट्ठी से इरा को हौले से “ब्रो फ़िस्ट” दी। इरा ने मुस्कुराते हुए अपनी मुट्ठी निमित्त के चेहरे के सामने खोली। उसकी हथेली पर एक “बेल्ज्यन डार्क चॉकलेट” थी।
“आपके लिए,”
“बस यही तो मुझे चाहिए। हर मर्ज़ की दवा,” निमित्त ने लपक कर चॉकलेट उसके हाथ से ले ली।
निमित्त किसी छोटे बच्चे की तरह चॉकलेट अनरैप करने लगा। उसके हाथ और उँगलियों में अब भी काफ़ी दर्द और अकड़न थी।
“लाइए मैं कर देती हूँ,” सुभद्रा ने चॉकलेट लेने को हाथ बढ़ाया।
“ऐई…मेरी है,” निमित्त अपना चॉकलेट वाला हाथ पीछे खींच कर बनावटी ग़ुस्सा दिखाते हुए बोला।
“अरे मैं सिर्फ़ अनरैप करने को ले रही,”
“नहीं दूँगा,” निमित्त किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह बोला और जैसे-तैसे चॉकलेट रैपर से निकाल कर तपाक से मुँह में डाल ली।
उसकी इस हरकत पर इरा खिलखिला कर हंस दी, खुद सुभद्रा भी बिना मुस्कुराए ना रह पाई।
“हैलो निमित्त, अब कैसे हैं आप?” दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई।
निमित्त के साथ-साथ इरा और सुभद्रा की नज़रें भी उस ओर घूमीं। मल्हार की वाइफ़ रॉशेल दरवाज़े पर खड़ी थी। सबको अपनी तरफ़ देखता देख वो अंदर आ गई।
“आँख खुलते ही तीन-चार खूबसूरत मुखड़ों के दीदार हो जाएँ, और वो मुस्कुरा के हाल पूछ लें, इतने में तो है जलती चिता से खड़ा हो जाऊँ,” निमित्त सिर नवाते हुए बोला।
“वैसे आँख खुलने के साथ तो सबसे पहले आपने डॉक्टर अंकल का फ़ेस देखा था…हिहिही…आपको वो ब्यूटिफ़ुल लगते हैं?” इरा मुँह दबा कर हंसते हुए बोली।
“ऐई..डॉक्टर अंकल नहीं…अंकल शंटू बोलो,” निमित्त ने भी शरारती अन्दाज़ में कहा।
इरा के साथ-साथ सुभद्रा और रॉशेल भी हंस दीं।
“आपके आने के बाद से अब तक हमारा फ़ॉर्मल इंट्रोडक्शन नहीं हुआ। मैं मौक़ा ही तलाशती रह गई आपसे मिलने का…पर ऐसे मौक़े पर मिलेंगे ऐसा नहीं सोचा था,” रॉशेल थोड़ा संकुचा कर मुस्कुराते हुए बोली। अब वो इरा के पास आ कर खड़ी हो गई थी।
निमित्त अधलेटी अवस्था में बेड से उठा और बेड के पैडेड बैक-रेस्ट से अपनी पीठ टिका ली। रॉशेल ने हैंडशेक के लिए हाथ आगे बढ़ाया। निमित्त ने आहिस्ता से उसकी उँगलियाँ थाम कर अभिवादन किया। मौसम में ऊमस अधिक नहीं थी फिर भी रॉशेल की हथेलियाँ नम थीं।
“पीपल मीट व्हेन दे नीड टू मीट,”
“पाउलो कोएल्हो?" रॉशेल चुटकी बजाते हुए बोली।
“बिंगो!” निमित्त ने अप्रीशीएटिव टोन में उसके गेस के सही होने की तस्दीक़ की।
“आय विश यू स्पीडी रिकवरी मिस्टर कालांत्री। जल्द ठीक होईए, यहाँ हम सबको आपकी काफ़ी ज़रूरत है,"
निमित्त ने महसूस किया कि रॉशेल की बॉडी लैंग्वेज में एक भय और असहजता है। वो चोर नज़रों से हर कुछ देर में दरवाज़े की तरफ़ देखती, शायद उसे डर था कि मल्हार उसे वहाँ ना देख ले।
“बंदा हमेशा हाज़िर है,” निमित्त सिर नवाते हुए बोला।
“आपके होश में आने से कुछ मिनट पहले ही गिरीश बाबू आपको देख कर गए हैं,” सुभद्रा ने निमित्त से कहा।
निमित्त ने हौले से सिर हिलाया और मन ही मन सुकून की साँस ली कि उसपर हुए अटैक की बात बाहर नहीं निकली…अब तक।
चॉकलेट निमित्त के मुँह में लगभग घुल चुकी थी और उसे बेहद सुकून की अनुभूति हो रही थी। अब उसे फिर से अपनी इन्वेस्टिगेशन शुरू करनी थी, पर उसके लिए बेड से और इस कमरे से निकलना ज़रूरी था।
“सब लोग रूम ख़ाली करो, इसको दवाई लगाने का है,” नर्स डॉरिस की चुहिया सी महीन और कांपती आवाज़ ने सबका ध्यान आकर्षित किया।
एक हाथ में सरैमिक बोल में गर्म पानी, हैंड टॉवल और दूसरे में किसी अर्क की बड़ी सी शीशी लिए नर्स डॉरिस रूम में वापस आ गई थी।
“चल अल्फ़ा, हम फ़्रिस्बी खेलते हैं,” इरा ने अल्फ़ा के सिर पर हाथ फिराते हुए कहा। अल्फ़ा दुम हिलाते हुए उसके साथ चल दिया।
सुभद्रा और रॉशेल भी वहाँ से निकल गईं। नर्स डॉरिस ने उनके पीछे रूम अंदर से बंद कर के चिटकनी लगा ली।
“ऐ…ऐ..हौले…ये बुढ़िया के इरादे ठीक नहीं लग रेले अपुन को, ये रूम काय कूँ बंद कर रही रे बाबा!” स्कैली की आवाज़ निमित्त के अंदर आई।
“चुप कर ना स्कैली, कितना बड़-बड़ करता है तू,” निमित्त अपने होंठ दबा कर खुद में बुदबुदाया।
“अपना कपड़ा खोलो, लोशन लगाने का है,” डॉरिस जैसे उसे ऑर्डर देते हुए बोली।
“ले लोटा! किसने सोचा था बुढ़ापे की बुझती ढिबरी में हसरतों की हल्की चिंगारी अब भी सुलग रही है…ऑल द बेस्ट हौले, आगे का नजारा मुझसे अपनी नंगी आँखों से ना देखा जाएगा,” स्कैली जैसे निमित्त के मज़े लेते हुए बोला।
“साले स्कैली! हरामख़ोर! दोस्त के नाम पर कलंक है तू,” निमित्त फिर होंठ दबा कर बिसुरा।
“तुम कितना बड़-बड़ करता है मैन! अक्खा टाइम पटर-पटर टेप रिकॉर्डर का माफ़िक़ मुँह चालू रहता तुम्हारा। अभी सीधे-सीधे कपड़ा खोल के पेट के बल उल्टा लेटता है कि नहीं,” नर्स डॉरिस निमित्त के पास आकर आँखें तरेरते हुए बोली।
निमित्त ने चुपचाप अपने शर्ट और डेनिम खोले और उन्हें वॉल हैंगर पर टांग कर बेड पर पेट के बल लेट गया।
“अपुन ने एक-दो डंडे ‘बम’ पर पड़ते भी फ़ील किए थे “हौले”, ये थाई-मसाज की दूर की फूफी “कसाई-मसाज” को बोल ना उधर भी लोशन लगाने को,”
निमित्त ने इस बार स्कैली को इग्नोर करने की भरसक कोशिश की।
“आज की शाम लगे पिक्चर का सीन कोई, हौला अपना हीरो और बुढ़िया हिरोइन कोईsss, स्टोरीsss…हॉरर-मर्डर से घूम-घाम के….आ गई इमोसन मेंsss… आजा डूब जाऊँ नर्स डॉरिस के लोशन मेंsss…स्लो मोशन मेंsss…” खुद को इग्नोर होता देख स्कैली निमित्त के दिमाग़ में गाना गाने लगा।
निमित्त स्कैली को कोसने के लिए मुँह खोलने ही वाला था कि अचानक ठिठक गया। लोशन की शीशी खुलते ही एक तीखी गंध उसके नथुनों से टकराई थी। उसका दिमाग़ फ़ौरन ही उस मिश्रित गंध को अलग-अलग सेग्रेगेट करने लग गया।
उसकी पीठ पर सबसे ज़्यादा चोटें थीं। नर्स डॉरिस की पतली, पेंसिल जैसी उँगलियाँ निमित्त की पीठ और चोटों पर फिर रही थीं। वो लोशन जो कुछ भी था बेहद असरदार था। निमित्त को यूँ महसूस हुआ जैसे उसे दर्द कभी था ही नहीं। लोशन की गंध उसके दिमाग़ पर चढ़ रही थी। क्या था उस लोशन में?
डेलिरीएंट्स! यह डेलिरीएंट्स थे! डेलिरीएंट वो प्राकृतिक औषधियाँ होती हैं जिनका प्रयोग शामन्स पुरातन विधि द्वारा दवाइयाँ बनाने के लिए करते थे। इसके अलावा इनका प्रयोग शामनिक राइट्स और विचक्राफ़्ट में भी किया जाता है।
निमित्त का दिमाग़ जैसे ऑटो-पाइलट मोड पर जा रहा था। उसपर स्कैली के गाने की आवाज़ “वॉर्प” हो रही थी।
“स्टोरीsss…हॉरर-मर्डर से घूम-घाम के….आ गई इमोसन मेंsss… आजा डूब जाऊँ नर्स डॉरिस के लोशन मेंsss…स्लो मोशन मेंsss…”
साथ ही निमित्त का दिमाग़ उस गंध को डिकन्स्ट्रक्ट कर रहा था।
“ब्रगमैन्सिया यानी एंजल्स ट्रम्पेट—शामन्स द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। इंड्युस्ड विज़न, आत्माओं से कम्यूनिकेट करने के लिए सर्वाधिक प्रयुक्त,”
“स्टोरीsss…हॉरर-मर्डर से घूम-घाम के….ssss,”
“मैंड्रागॉरा ऑफ़िसीनैरियम…जिसे “मैंड्रेक” भी कहते हैं—स्ट्रॉंग डिलीरीयम, कॉज़ेज़ हैल्यूसिनेशन्स, सिडेशन…मध्यकालीन ऐनेस्थेटिक ड्रग,”
“आsss गईsss इमोसनsss मेंsss…”
“सैल्वीया डिवीनोरम यानी डिवाइनर्स सेज—कॉज़ेज़ डिसोशीएटिव हैल्यूसिनेशन्स, टाइम/स्पेस वॉर्पिंग…मैज़्टेक शामन्स द्वारा दर्द निवारक के तौर पर सर्वाधिक प्रयुक्त,”
“आ….जा…sss….. डू…..बsss….जा….ऊँsss….न..र्स….डॉरिस….केssss…लोशन मेंsss…”
उस लोशन में एक कॉम्पोनेंट ऐसा था जिसे निमित्त आयडेंटिफ़ाई नहीं कर पाया।
“स्लोsss…मोsss..शssss…नssss…. मेंsss…”
घुप्प अंधकार।
हाँफने की आवाज़! धीमी और घुटी हुई।
किसी बच्ची…नहीं, किसी टीनेज लड़की की। वो डर से बुरी तरह हाँफ रही थी।
निमित्त ने आँखें खोलने की कोशिश की। वो अपने जिस्म का एक रोआँ भी हिला नहीं पा रहा था। उसने उठने का भरसक प्रयत्न किया परंतु निष्फल।
निमित्त ने प्रयत्न करना बंद कर दिया। वो ध्यान लगा कर सुनने की कोशिश करने लगा।
लड़की की साँस डर और ऑक्सिजन की कमी के कारण उखड़ रही थी। उसकी उखड़ी साँसों की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आ रही थी। जैसे कुछ खोदा जा रहा है।
निमित्त को एहसास हुआ कि ये आवाज़ नाखूनों से नर्म भुरभुरी मिट्टी खोदे जाने की है।
अंधकार! चारों ओर सिर्फ़ घुप्प अंधकार और उसमें गूंजती ये आवाज़ें। इस आवाज़ में एक ख़ास बात थी। ये अंदर से बाहर खोदे जाने की ध्वनि थी। यानी वो लड़की किसी गड्ढे या सुरंग में थी…नहीं…कुछ और…एक ताजी खुदी कब्र!
इस पल में निमित्त को एहसास हुआ कि वो हिल क्यों नहीं पा रहा था। उसे साँस क्यों नहीं आ रही थी। वो उस घड़ी उस कब्र के अंदर था। नर्म, भुरभुरी मिट्टी में दबा हुआ। उसके फेफड़ों में ऑक्सिजन ख़त्म हो रही थी। फिर नाखून से मिट्टी खोदने की आवाज़ आई। उसके साथ कोई और भी था उस कब्र में। वो लड़की जो कब्र खोद रही थी।
अब निमित्त अपनी पलकें खोल सकता था, और थोड़ा बहुत शरीर भी हिला सकता था। उसने आस-पास देखने की कोशिश की। अंधकार में कुछ दिखने लगा। कब्र की मिट्टी हट रही थी। आख़िरकार उस लड़की ने बाहर निकलने का रास्ता बना लिया।
“मैं तुम्हारी मदद करता हूँ…” निमित्त उठते हुए बोला। उसका सिर बुरी तरह घूम रहा था…उसे सब कुछ धुंधला नज़र आ रहा था…एक हेज़ी ऐम्प्लिफ़ाइड प्रोजेक्शन की तरह…जैसा सपने में होता है। हमें सपने में सब कुछ वास्तविक दुनिया के मुक़ाबले अनुपात में बड़ा और धुंधला नज़र आता है क्योंकि सपनों में डेप्थ ऑफ़ फ़ील्ड काफ़ी सीमित होती है।
“तुम कौन हो? किसने डाला तुम्हें यहाँ?” निमित्त ने कब्र से बाहर निकलते हुए लड़की से सवाल किया।
लड़की अब तक बाहर निकल चुकी थी और गिरते-पड़ते भागने की कोशिश कर रही थी। उसने पीछे पलट कर देखा।
निमित्त उस लड़की को नहीं पहचानता था। उसने पहले कभी वो चेहरा नहीं देखा था। खून, बरसात के पानी और मिट्टी से सना लड़की का चेहरा भय से सफ़ेद पड़ा हुआ था। उसकी पथराई आँखें निमित्त की दिशा में देख रही थीं और डर से फट पड़ने पर उतारू थीं।
“मुझसे मत डरो, मैं तुम्हें बचाने आया हूँ,” निमित्त ने आगे बढ़ते हुए कहा।
लड़की पर कोई प्रभाव ना पड़ा। वो पहले से भी अधिक भयभीत नज़र आ रही थी। निमित्त को एहसास हुआ कि लड़की उसे देख ही नहीं रही बल्कि उसके पीछे किसी को देख रही है। निमित्त पीछे पलटा। झाड़ियों के पीछे से एक साया बाहर निकल रहा था। निमित्त का चेहरा सख़्त हुआ। मुट्ठियाँ भिंच गईं। अपने नीचे की धरती को रौंदते हुए निमित्त उसकी दिशा में बढ़ा। साया भी उसकी दिशा में बढ़ रहा था।
“मेरी तरफ़ मत आना…” लड़की डर से चीखी।
साये पर कोई असर नहीं हुआ। वो अपने पेस में लड़की की ओर बढ़ रहा था। निमित्त दोनों के बीच आ गया। उसका राइट अपर-हुक साये की ओर बिजली की गति से घूमा।
“सायँsss” निमित्त का हुक पंच साये के आर-पार यूँ निकल गया जैसे उसका शरीर ठोस हाड़-मांस का बना ना होकर कोई त्रिआयामी छाया हो।
“छाया! यह छाया है…एक “एको”…भूतकाल में जो घटित हो चुका उसकी प्रतिध्वनि और छाया मात्र,” निमित्त के मस्तिष्क में विचार कौंधा। “यानी इन्फ़ेस्टेड मेमरी। ठीक वैसी ही जैसी इरा के सब-कॉंशियस में प्लांट की गई थी,”
साया लड़की की तरफ़ बढ़ रहा था। निमित्त ने आगे बढ़ कर फिर एक बार उस साये का रास्ता रोकने की कोशिश की पर वो साया धुएँ के समान निमित्त के आर-पार निकल गया।
“नहीं…नहीं…मेरे पास मत आना,” लड़की उल्टे कदमों से पीछे की तरफ़ हट रही थी।
अचानक उसके पीछे झाड़ियों से एक हाथ निकला और बेरहमी से लड़की के बालों को पकड़ कर उसे झाड़ियों में ऐसे घसीट किया जैसे कोई हिंसक भेड़िया अपने शिकार को खींच लेता है।
“दो हैं…ये दो लोग हैं,” निमित्त सन्न रह गया। वो बेतहाशा झाड़ियों की ओर भागा।
दूसरा साया, जिस पर निमित्त ने वार करने की कोशिश की थी वो भी अब तक उन झाड़ियों के पीछे लोप हो चुका था जिनसे निकले हाथ ने लड़की को खींच लिया था।
निमित्त झाड़ियों के पार निकला। वहाँ जंगल के अलावा कुछ ना था। उसने नीचे देखा। मिट्टी पर कहीं घसीटे जाने के निशान होने चाहिए थे, पर कुछ ना था। ऐसा लग रहा था जैसे वो लड़की, वो हाथ, और वो साया, सब कुछ हवा में घुल गए हों।
“स्कैली? मेरी आवाज़ सुन रहा है?” निमित्त ने स्कैली को पुकारा। कोई जवाब ना आया।
“टन-टनंन-टन्न”
बारिश अब तेज़ हो रही थी। जंगल की धरती पर बिछी, टूट कर गिरी टहनियों और पत्तों पर पड़ती बूँदों के शोर के बीच एक और आवाज़ गूंज रही थी, जो धीमी थी परंतु स्पष्ट सुनाई दे रही थी। घंटियाँ बजने की आवाज़ थी यह। निमित्त ने चारों ओर नज़रें घुमाई।
हवा से लहराते और बारिश में धुँधलाए ऊँचे पेड़ों के समूह के बीच उसे किसी मंदिर की चोटी पर लहराते ध्वज का एहसास हुआ। निमित्त ने ध्यान से उधर देखने की कोशिश की। क्या वो मंदिर वाक़ई काले पत्थरों का बना था या फिर अंधेरे और बारिश के कारण वैसा नज़र आ रहा था? अगर उसकी चोटी पर ध्वजा ना लहरा रही होती तो पेड़ों के समूह में गुम वो भी दूर से एक पेड़ होने का ही आभास देता। निमित्त उसकी तरफ़ बढ़ने की कोशिश करने लगा।
सब कुछ धुंधला नज़र आ रहा था। उसके कदम जैसे उसकी मर्ज़ी अनुसार नहीं पड़ रहे हों। निमित्त को यूँ लग रहा था मानो उसने कच्ची शराब का पूरा पीपा डकार लिया हो।
“ढब-धब्ब-ढब”
बारिश और घंटियों की आवाज़ में एक आवाज़ और जुड़ गई। ये फावड़े या कुदाली से ज़मीन खोदे जाने की आवाज़ थी।
पेड़ों के समूह को पार करता निमित्त मंदिर से अब कुछ ही दूर था। खोदे जाने की आवाज़ तेज़ हो गई थी। निमित्त उस ओर बढ़ा। एक विशाल और बहुत पुराने बरगद के पीछे कुछ था। कुछ ऐसा जिसकी धातुई सतह पर गिरती बारिश की बूँदों का शोर बरगद की सघन जटाओं और पत्तों से दब रहा था। उस पुराने बरगद के नीचे अलग-अलग आकार के ढेरों शिवलिंग रखे थे। उसकी डालों पर ज़ंजीरों से बंधी ढेरों छोटी-बड़ी घंटियाँ लटक रही थीं। घंटियों की आवाज़ यहीं से आ रही थी। निमित्त एक लम्बा घेरा काट कर, वहाँ रखे शिवलिंगों को प्रणाम करते हुए पेड़ के पीछे की तरफ़ बढ़ा। वहाँ पर एक पुरानी ऑम्नी वैन खड़ी थी जिसे सफ़ेद पेंट कर के मिनी-ऐम्ब्युलेन्स का रूप दिया गया था। उसपर चारों तरफ़ पीली पट्टी खींची थी जिसके ऊपर किसी हॉस्पिटल का नाम लिखा हुआ था। अक्षर इतने धुंधले थे कि निमित्त चाह कर भी उन्हें पढ़ ना पाया।
बरगद के पेड़ और वैन को पार करने पर दूर-दूर तक फैली ऊँची जंगली घास थी। यह घास कमर तक ऊँची थी और इतनी सघन थी कि अपने आप में एक जंगल थी। मंदिर इस घास के जंगल के पार था और अब भी इतना अस्पष्ट था कि किसी पेड़ के तने जैसा ही नज़र आ रहा था।
मिट्टी खोदे जाने की आवाज़ इस ऊँची घास के जंगल से ही आ रही थी।
“स्कैली? कहाँ है तू? मुझे अच्छी फ़ीलिंग नहीं आ रही…” निमित्त के होंठ नहीं हिल रहे थे, पर वो बुदबुदा रहा था। स्कैली का कोई जवाब इस बार भी नहीं आया।
लड़खड़ाते कदमों से निमित्त उस ऊँची घास के जंगल में बढ़ा। तक़रीबन बीस कदम आगे बढ़ने पर घास के बीच मिट्टी का टीला लगा हुआ था जो धीरे-धीरे ऊँचा हो रहा था। कोई गड्ढा खोद रहा था…नहीं, गड्ढा नहीं, कब्र! निमित्त जितनी तेज़ हो सका उतनी तेज़ी से उस तरफ़ भागा। वो सही था। मिट्टी के ढेर के पार, ऊँची घास के जंगल के बीचोंबीच एक गहरी कब्र खुदी हुई थी। उस कब्र के अंदर एक शख़्स था, हॉस्पिटल के वॉर्डबॉय जैसी सफ़ेद वर्दी और टोपी में। उसकी पीठ निमित्त की ओर थी। वो कब्र के अंदर था, गोद में उसी लड़की की बॉडी उठाए हुए जिसे निमित्त ने कुछ देर पहले देखा था।
“ऐsss…कौन हो तुम?” निमित्त पूरा ज़ोर लगा कर चीखा।
अब तक वो समझ चुका था कि ये सभी घटनाएँ रियल टाइम में घटित नहीं हो रहीं बल्कि पूर्व घटित घटनाओं का रीप्ले मात्र हैं। फिर भी उस बच्ची का शव देख कर निमित्त अपने क्रोध और भावनाओं के नियंत्रित नहीं कर पाया।
“कौन है तू? क्या किया है तूने बच्ची के साथ?” निमित्त क्रोध में गरजा। उसे उस वॉर्डबॉय की सूरत देखनी थी। वो जानता था कि वॉर्डबॉय की पहचान इस पूरी गुत्थी को पल में सुलझा देगी।
“कौन है तू? मुझे जानना है कौन है तू?” निमित्त दहाड़ते हुए आगे बढ़ा।
निमित्त का इरादा कब्र में उतर कर वॉर्डबॉय की सूरत देखने का था। वो लड़खड़ाते कदमों से ढलान पर उतरा। उसके बूट ढलान की भुरभुरी मिट्टी में धँसने लगे। कब्र बहुत गहरी खोदी हुई थी, लगभग 10-12 फुट गहरी। निमित्त के उतरने से ढलान की मिट्टी नीचे कब्र में मिनी लैंड्स्लाइड की तरह गिरने लगी। अपनी ग्रिप बनाने के लिए निमित्त के हाथ मिट्टी की दीवार में कुछ टटोल रहे थे।
कब्र गहरी होने की वजह से उसकी खड़ी दीवार में आस-पास के पेड़ों की गहरी जड़ें निकली नज़र आ रही थीं। निमित्त ऐसी ही उभरी हुई जड़ पर ग्रिप बनाने की कोशिश करने लगा जिससे वो आसानी से नीचे उतर सके। उसकी उँगलियाँ मिट्टी में किसी चीज़ से टकराई।
निमित्त ने फ़ौरन अपनी ग्रिप बनाने की कोशिश की। उसकी उँगलियाँ उस जड़ जैसी चीज़ पर कसीं। निमित्त के पूरे शरीर में जैसे करेंट की लहर दौड़ गई। ग्रिप बनाने पर उसे एहसास हुआ कि जिस चीज़ को उसने थामा है वो किसी पेड़ की जड़ नहीं बल्कि किसी की बाँह है…उस कब्र की दीवार में दफन किसी गुमनाम लाश की बाँह। निमित्त के खींचने पर बाँह समेत निर्जीव शरीर मिट्टी की भुरभुरी दीवार से बाहर झांकने लगा। वो एक और बच्ची की लाश थी। ज़्यादा पुरानी नहीं।
उसकी आँखें खुली हुई थीं और नाक, मुँह और आँख में मिट्टी भरी हुई थी, जिसके बावजूद कब्र में नीचे गिरते निमित्त को यूँ लगा जैसे उस लाश की खुली, मिट्टी भरी निर्जीव आँखें उसे ही घूर रही हैं।
टाइम जैसे फिर से वॉर्प होने लगा।
निमित्त जैसे स्लो-मोशन में नीचे गिर रहा था। कब्र की दीवार से लड़की की लाश आधी बाहर लटकी हुई, किसी पुरानी घड़ी के पेंडुलम के जैसी झूल रही थी। उसके खुले मुँह में भरी मिट्टी नीचे गिरते निमित्त के ऊपर गिर रही थी।
निमित्त को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उस लाश के मुँह से गिरती मिट्टी धीरे-धीरे बढ़ती चली जा रही है, जैसे उस लाश को खोखला कर के किसी स्टफ़्ड टॉय की तरह उसके अंदर मिट्टी भर दी गई हो। स्लो-मोशन में नीचे गिरता निमित्त कब कब्र की सतह से टकराया और कब ऊपर अध-लटकती लाश; जिसके झूलने की गति पेंडुलम की भाँति मोमेंटम ले चुकी थी, उसको मिट्टी बरसाते हुए दफन करती चली गई, इसका निमित्त को एहसास ना हुआ।
निमित्त का दिमाग़ अंधकार में डूब रहा था। उसका शरीर नीचे कब्र के तल पर था। निमित्त के चेहरे के पास, मुश्किल से आधे हाथ की दूरी पर काले चमड़े की कोल्हापुरी चप्पल पहने दो पैर खड़े हुए थे, जो कि वॉर्डबॉय के थे। निमित्त ने सारी इच्छाशक्ति बटोर कर अपना चेहरा ऊपर की ओर उठाया ताकि उस वॉर्डबॉय की शक्ल देख सके। ऊपर से गिरती ढेरों मिट्टी निमित्त को उस कब्र में दफन करती चली गई।
चारों ओर फिर से अंधकार छा गया।
“एन.के. ssss” इरा के चीखने की आवाज़ से निमित्त की आँखें खुली।
वो कोठी में उसी रूम में बेड पर सोया हुआ था जहां नर्स डॉरिस ने उसे दवाई लगाने के बहाने बेहोश किया था।
निमित्त चौंक कर उठ बैठा। उसके जागने के साथ ही उसके पैरों के पास सोया अल्फ़ा चौकन्ना हो गया।
“एन.के. ssss….हेल्प ssss” इरा की हर क्षण दूर होती आवाज़ फिर से सुनाई दी।
स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह उछल कर निमित्त बेड से उतरा। ग़नीमत यह थी कि उसके कपड़े उसके शरीर पर मौजूद थे। शायद उसके बेहोश होने के बाद नर्स डॉरिस ने पहनाए थे।
“चल अल्फ़ा…जल्दी!” रूम का दरवाज़ा खोल कर निमित्त बाहर भागते हुए बोला। अल्फ़ा उसके पीछे भागा।
बाहर घोर सन्नाटा पसरा हुआ था। पूरी कोठी गहन अंधकार में डूबी थी, ऐसा लगता था जैसे काफ़ी रात बीत चुकी हो।
निमित्त को कोई अंदाज़ा नहीं था कि वो कितने घंटे बेहोश था। उसने अपनी डिजिटल रिस्ट वॉच पर नज़र डाली। घड़ी बंद थी। उसने आसमान की तरफ़ देखा। निमित्त के अंदाज़न उस वक्त रात के दो-ढाई बज रहे थे। इस समय इरा क्यों चीखी? बाहर कॉरिडोर में गार्ड्ज़ भी नहीं थे।
“गार्ड्ज़ कहाँ गए?” निमित्त खुद में बड़बड़ाया।
वो इरा के रूम की तरफ़ भागा। इरा के रूम का दरवाज़ा खुला हुआ था जब कि बाक़ी सभी रूम्स के दरवाज़े बंद थे। इरा का रूम ख़ाली था, वो रूम में नहीं थी।
“इरा? इराsss…?” निमित्त के पुकारने पर कोई जवाब ना आया।
निमित्त रूम से बाहर निकला। बाक़ियों को जगाने का समय नहीं था। इरा की आवाज़ से उसने अंदाज़ा लगाया कि वो कोठी से अधिक दूर नहीं होगी। लॉबी में भागते हुए निमित्त कमरों के पीछे के हिस्से की तरफ़ पहुँचा। ये कोठी का पिछला भाग था जहां पिछली रात उसने मल्हार और उस शामन को देखा था। वहाँ भी कोई नहीं था। निमित्त ने पहली मंज़िल की बाल्कनी से नीचे झांक कर देखा। गार्डेन का पिछला हिस्सा ऊँचे पेड़ों और घनी झाड़ियों से अटा हुआ था जिन्होंने बैक बाउंड्री वॉल को लगभग पूर्णतः ही कवर किया हुआ था फिर भी उसके बीच एक छोटा ग्रिल गेट दिखाई ड़े रहा था जो उस घड़ी खुला झूल रहा था।
“यहाँ पर भी गार्ड होना चाहिए था। सारे सिक्योरिटी वाले आख़िर गए कहाँ?” निमित्त ने उलझन में एक पल से अधिक ना गँवाया।
बाल्कनी से उसने ग्राउंड फ़्लोर के पोर्टिको पर छलांग लगाई और वहाँ से किसी कुशल ऐक्रोबैट की तरह झूलते हुए नीचे लॉन में उतर गया। ग्रिल गेट के दूसरी तरफ़ एक संकरा रास्ता था, बैकडोर ऐली जैसा, जिसपर दोनों तरफ़ से बोगनविलिया की झाड़ियाँ झुकी हुई थीं। निमित्त उस रास्ते से बाहर निकला। वो संकरी बैक ऐली गिरीश बाबू की प्रॉपर्टी के दूसरे हिस्से तक जाती थी जहां उनका प्राइवेट गोल्फ कोर्स और हॉर्स रैंच एक सौ बीस एकड़ में फैले हुए थे।
कोठी के पीछे पड़ने वाले गोल्फ कोर्स और हॉर्स रैंच एक हिस्से में थे जब कि ऐली का दूसरा हिस्सा आगे जा कर वेस्टर्न घाट के तराई जंगली क्षेत्र की ओर निकलता था। निमित्त उस ओर भागा।
“इराsss…इराsss”
घुप्प अंधकार में पथरीले पहाड़ी रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए निमित्त का सहारा सिर्फ़ चंद्रमा की रौशनी थी। सघन लताओं और जंगली बेलों के जाल काई लगे पत्थरों और पेड़ों पर अपना साम्राज्य जमाए हुए थे, इनके बीच जंगली मशरूम के गुच्छे जैसे प्रकृति द्वारा “स्प्रे आर्ट” बनाते हुए जगह-जगह छींट दिए हों। पेड़ों से छन कर आती चाँदनी आगे सघन होते जंगल को प्रकाशमान करने के लिए अपर्याप्त थी। सावधानी से आगे बढ़ने की कोशिश के बावजूद निमित्त जगह-जगह बेलों के जाल के नीचे छुपी चट्टानों से टकरा कर गिरता, संभलने की कोशिश करता और फिर भागना शुरू करता। आगे जा कर रास्ता छितर रहा था, अब वो एक सीधे रास्ते पर नहीं था। यहाँ से अंदाज़ा लगाना मुश्किल होने वाला था कि किस ओर आगे बढ़ना है।
निमित्त स्थिर होकर खड़ा हो गया और ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करने लगा।
उसके दाहिने हाथ की तर्जनी और मध्यमा ऊपर आसमान की तरफ़ उठी हुई थीं और बाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा नीचे धरती की ओर। बाँहें तनी हुईं और शरीर सीधा।
“एज़ अबव, सो बिलो। एज़ विद-इन, सो विद-आउट,”
उसके कानों में तीखी सीटी बजने लगी और फिर सब शांत हो गया।
निमित्त ने आँखें खोली। उसे पता था कि अब उसे किस तरफ़ बढ़ना है। निमित्त भागा…जान फेंक कर भागा। उसका सबसे बड़ा डर उस पर हावी हो रहा था। यह डर एक बार फिर परास्त होने का नहीं था, क्योंकि जीत के लिए तो वो कभी लड़ा ही नहीं। यह डर था एक और मासूम को बचाने में नाकाम होने का।
जाने कितनी ही देर तक भागता रहा वो। और फिर एक ख़ून जमा देने वाली चीख गूंजी।
“ईsssss…”
निमित्त के जिस्म की हर नस में वो चीख जैसे करेंट बन के गुजरी। चीख इरा की थी। निमित्त के घुटने जवाब देने लगे, हाथ-पैर ढीले पड़ गए। बहुत मुश्किल से अपनी पूरी ताक़त बटोर कर वो पेड़ों को समूह को पार करता हुआ उस समतल भू-भाग तक पहुँचा जहां कुछ दूर पर नदी बह रही थी। नदी के किनारे ऊँची उगी जंगली घास के अलावा छोटे-बड़े आकार की उभरी चट्टानें थीं जिनमें से एक के ऊपर एक आकृति लेटी नज़र आ रही थी। आकृति बिल्कुल स्थिर थी, बिल्कुल निर्जीव।
“नहीं…नहीं…नहीं…” निमित्त लड़खड़ाते हुए उस आकृति की ओर भागा।
चाँद की रौशनी नदी की स्थिर सतह पर झिलमिला रही थी और उन पर से होती हुई किनारे पर बिछी ऊबड़-खाबड़ चट्टानों की चादर पर अजीब ढंग से प्रकाश और छाया की कृत्रिम कलाकृति प्रस्तुत कर रही थी। जैसे-जैसे निमित्त आगे बढ़ रहा था चट्टान पर लेटी आकृति के ऊपर से छाया हटती जा रही थी और चाँदनी उसे यूँ अपने आग़ोश में ले रही थी जैसे वो चट्टान और आकृति किसी ब्रॉडवे प्ले के स्टेज पर सेंट्रल कैरेक्टर हों जिनके ऊपर कायनात चाँद की स्पॉटलाइट फ़ोकस कर रहा है।
चाँद की स्पॉटलाइट अब आकृति के निर्जीव अस्तित्व को अपनी शीतलता से सराबोर करते हुए एक अल्प-पारदर्शी चाँदी के आवरण में लपेटती प्रतीत हुई।
“इराsss…” निमित्त गला फाड़ कर चीखा।
इरा के निर्जीव शरीर तक का फ़ासला तय करने में निमित्त को यूँ एहसास हुआ जैसे उसके अस्तित्व के हर कण ने गहन वेदना और घोर मृत्यु तुल्य पीड़ा का वरण करते हुए आंतरिक अंतर्नाद किया है। उस चट्टान तक पहुँचने तक निरंतर उसका दिमाग़ बार-बार यही दोहरा रहा था कि ये सिर्फ़ उसकी फ़ियर इंड्युस्ड, हेविली सिडेटेड, ऐंग्ज़ाइटी ट्रिगर्ड ओवर इमैजिनेशन द्वारा क्रीएटेड हाइपर रीयलिस्टिक फ़ॉल्स प्रोजेक्शन है…लेकिन वो ग़लत था।
वो इरा ही थी।
दूर से देखने पर ऐसा लग रहा था जैसे वो इत्मिनान से नदी किनारे चट्टान पर पीठ के बल लेटी ऊपर आसमान में चाँद को खुली आँखों से एकटक निहार रही है। पास आने पर एहसास होता था कि जिस चट्टान पर वो लेटी है वो खून की छींटों से सराबोर थी। इरा के जिस्म से रिसता रक्त चट्टान के आस-पास की ऊँची जंगली घास और नदी के किनारे की नम मिट्टी को सींच रहा था।
“इराsss…” निमित्त के काँपते हाथों ने इरा को स्पर्श किया, उसका जिस्म ठंडा पड़ चुका था। चेहरा बेजान और आँखें पथराई हुई। कलपते हुए निमित्त ने इरा के शव को गोद में उठा कर सीने से लगा लिया।
“ये नहीं हो सकता…इरा….ssss…” गहन वेदना अब आक्रोश का सैलाब बन कर निमित्त की आँखों से फूट रहा था। इरा के चेहरे को अपनी अंजुलि में भर के ज़ार-ज़ार होकर रोया निमित्त।
“आई एम सॉरी इरा…आई एम सो..सो…सॉरी,”
दर्द बर्दाश्त ना हुआ।
“मम्मी…” ऊपर आसमान की तरफ़ चेहरा कर के चीखा निमित्त, “क्यों? क्यों होने दिया आपने ऐसा? क्या मैं…क्या मैं इतना अयोग्य हूँ? क्या मेरी अयोग्यता का एहसास मुझे कराने की क़ीमत एक मासूम की जान है?”
“ईsss…ही..ही..ही..ही..ही..” वातावरण में एक पगलाहट भारी हंसी गूंजी।
“मुझ पर भरोसा करोsss….मुझ पर भरोसा करने वाले का आज तक बुरा नहीं हुआsss…” कोई निमित्त की नक़ल उतार रहा था।
निमित्त की नज़रें चारों तरफ़ उस शख़्स को ढूँढते हुए सामने, घास के मैदान के पार खड़े दो पठारों पर जा टिकी। एक पठार के पीछे से एक आकृति निकल रही थी।
“कब तक दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाएगा निमित्त कालांत्री? या फिर तेरा पागलपन..तेरा स्किट्ज़ोफ़्रीनीया इतना बढ़ गया है, तू इतना बड़ा पागल हो चुका है कि दुनिया के साथ-साथ तू ख़ुद को भी बेवक़ूफ़ बना रहा है?” वो साया निमित्त की तरफ़ नाचते हुए बढ़ रहा था…जैसे अकेले ही टैंगो कर रहा हो।
“तुझ पर भरोसा कर के आज तक किसी का भला नहीं हुआ। चाहे वो तेरा परिवार हो जिसे तू ये…ये मॉडर्न मिस्टिक…भाड़े का अघोरी-ओझा बनने के लिए छोड़ आया, चाहे तेरे संगी-साथी, या फिर वो जिन्हें तुझ पर भरोसा था…तूने सबको छला है कालांत्री…तेरे जैसे इंसान को जीने का कोई अधिकार नहीं। तेरा साया जिस किसी पर भी पड़ेगा उसका हश्र इस लड़की जैसा ही होगा,”
आंसुओं से भरी निमित्त की आँखें जलते अंगारों के समान धधक उठीं, “कौन हो तुम?”
“तेरी मौत हूँ मैं…मरेगा तू…आहाहाहा…मरेगा,”
“त्रियो किलर?” निमित्त के भिंचे जबड़ों से जैसे ज़हर से लिसड़ा हुआ निकला वो नाम।
“अले-ले-ले-ले-ले…तू नहीं जानता? क्या हुआ द ग्रेट निमित्त कालांत्री की सुपर पावर्स को? अपने उन सड़े हुए पत्तों से नहीं पूछेगा कि मैं कौन हूँ, जिनसे तू दुनिया को बेवक़ूफ़ बनाता है साले फ़्रॉडिए…आहाहाहा…मुझ पर नहीं चला ना तेरा “काला जादू”…अहह..हाहाहाहा…आजा मेरी जान…कम डान्स विद मी…देखो…मैं नॉरा फ़तहि हूँ…ईss…हिहिहिही..” नॉरा फ़तहि के बेली डान्स की भौंडी नक़ल करते हुए शख़्स आगे आया। वो सिर से पैर तक काले लिबास से ढँका था और चेहरे पर उसने “स्कल मास्क” लगाया हुआ था। उसके हाथ में एक लम्बी और धारदार कटार थी जिससे खून टपक रहा था।
“क्यों मारा तूने इरा को?”
“क्योंकि तेरा सबसे बुरा ख़्वाब हूँ मैं…एज़ अबव, सो बिलो के बीच भी एक चीज़ होती है…गहन अनंत अंधकार! मैं वो हूँ, जो तेरे समूचे अस्तित्व को लील जाएगा कालांत्री। तू कालांत्री है तो मैं कालरात्रि हूँ…ई…हिहिही…हाहाहा…” खुद को कालरात्रि पुकारते उस शख़्स ने दोनो भुजाएँ ऊपर उठा कर अट्टहास किया, रात्रि का अंधकार जैसे और अधिक गहरा गया।
निमित्त ने अपने अंतर्मन में इतनी तीव्र हृदयविदारक वेदना पहले भी महसूस की थी। जब जीवन उसे मृत्यु की कगार पर ले आया था। निमित्त के अस्तित्व पर एक पल के लिए ही सही, कालरात्रि का कथन काली स्याही के समान पुत गया। इरा की मृत्यु के बाद वो वैसे भी हार चुका था…खुद अपनी नज़रों में। अपने वजूद पर एक और मृत्यु का बोझ लेकर जीने की हिम्मत नहीं थी निमित्त में।
“हेहेहेहे…क्या हो गया यक्षिणी साधक? ऊवां…उवाँ…मम्मी-मम्मी मुझे बचा लो…मुदे मेली मम्मी ते पाथ दाना है…हिहिही…हाहाहा,” निमित्त को मॉक करते हुए कालरात्रि नाच रहा था और कमर से आगे को झुक कर ट्वर्क कर रहा था।
निमित्त की आँखों से आंसुओं की अंतिम बूँदें जलते अंगारों के समान उसके गालों पर ढलक गयीं। उसने अपनी गोद से उतार कर इरा को आहिस्ता से वापस चट्टान पर रख दिया। आज निमित्त वो अक्षम्य अपराध करने को तैयार था जो उसने प्रतिज्ञा ली थी कि वो कभी नहीं करेगा…किसी की जान लेना।
“ई…हाहाहाहा…कम बेबी कम…लेट्स डान्स…हिहिही,” कालरात्रि यूँ उछल रहा था जैसे किसी जंगली मेंढक को जलते तवे पर बिठा दिया हो।
निमित्त ने अपना कड़ा ऊपर चढ़ाया और अपने नीचे धरती को रौंदता हुए आगे बढ़ा।
तभी कहीं दूर जंगल की ओर से एक आवाज़ उभरी।
“हाऊssss……ssss”
भेड़िए का रुदन!
किसी आम भेड़िए का नहीं, ये उस ग्रे-वुल्फ़ का रुदन था जो निमित्त को अक्सर रहस्यमयी रूप से दिखाई देता और फिर ओझल हो जाता था।
“हाऊssss……ssss”
“वुफ…वूssss…” उस रुदन में एक और रुदन शुमार हुआ।
इस आवाज़ को भी निमित्त अच्छी तरह पहचानता था…ये अल्फ़ा था।
“मैंने कहा था ना कालांत्री, तेरा सबसे बुरा ख़्वाब हूँ मैं। एज़ अबव…सो बिलो के बीच का अंधकार जो तेरे समूचे अस्तित्व को लील जाएगा,” कालरात्रि स्थिर खड़ा हुआ। अब वो नाच नहीं रहा था।
आगे बढ़ता निमित्त ठिठक कर रुक गया। कालरात्रि अपने चेहरे से मास्क हटा रहा था।
“नहीं…ये नहीं हो सकता,” मस्क के पीछे का चेहरा देख कर निमित्त की तंत्रा को आघात लगा।
कालरात्रि ने मास्क नीचे गिरा दिया। निमित्त के सामने काला लिबास पहने खुद निमित्त खड़ा था।
“नहीं…ये कैसे हो सकता है?” निमित्त चीखा।
“तू अब भी नहीं समझा…हाहाहाहा…तू ख़ुद अपना सबसे बड़ा दुश्मन है कालांत्री…हाहाहाहा, आजा.. आगे बढ़, मुक़ाबला कर! अगर थोड़ी भी मर्दानगी बची है तो मार मुझे वरना चूड़ियाँ और नथ पहन कर हिजड़ा बन जा…हाहाहा,” कालरात्रि निमित्त का उपहास करते हुए ठहाका लगा रहा था।
“तू जो भी इंद्रजाल रच रहा है मुझ पर काम नहीं करेगा। तुझे ख़त्म कर दूँगा मैं,” निमित्त चीखते हुए आगे बढ़ा।
“ईss…हाहाहा…यही तो मैं चाहता हूँ…अमरत्व की ओर बढ़ता मैं….ईहाहाहाहाsss…मार कालांत्री मार मुझे…पर मैं कौन? मैं तो तू ही हूँ…आजा…खुद को मार,”
“हाऊssss……ssss”
“वुफ…वूssss…”
आवाज़ इस बार निमित्त के पीछे से उभरी। निमित्त ठिठक कर पीछे पलटा। नदी के किनारे अल्फ़ा और ग्रे वुल्फ़ ऊपर चाँद को देख कर रुदन कर रहे थे, नदी की सतह पर कुछ हलचल हुई और पानी से एक लाल, विचित्र आकार का लॉब्स्टर बाहर निकला। निमित्त की सोच को जैसे फिर एक शॉक लगा। उसने नदी की सतह पर देखा। चाँद, अल्फ़ा और ग्रे-वुल्फ़, लॉब्स्टर और वो पूरा सिनैरीओ उल्टा नज़र आ रहा था। निमित्त के मुँह से स्वतः ही निकला,
“ये..ये टैरो है…”द मून” कार्ड…नहीं…द मून कार्ड दिखाता है मतिभ्रम, इंद्रजाल, नज़रों का धोखा, इल्यूज़न…पानी में पड़ता प्रतिबिम्ब कहता है कि ये “द मून” कार्ड सीधा यानी अपराइट नहीं बल्कि “रिवर्स्ड” है…यानी मतिभ्रम का अंत, इंद्रजाल टूट रहा है, धोखा और धोखा करने वाला सामने आएगा।” निमित्त कालरात्रि की तरफ़ पलटा, “ये टैरो मेरा अंतर्मन मुझे दिखा कर आगाह कर रहा है, मतलब मैं अब भी जागा नहीं…मैं अब भी सपने में हूँ जिसमें किसी ने इन्फ़ेस्टेशन की है,”
“ईssss…या….” कालरात्रि अपना कटार वाला हाथ उठा कर निमित्त को मारने दौड़ा।
“किरर्र….बज़zzz…” वातावरण में ऐसी आवाज़ गूंजी जैसे रेडियो फ़्रीक्वेन्सी ट्यून की जा रही हो।
“मेहरबान…कद्रदान…साहेबान…पानदान…पीकदान…मरून चड्डी वाले शक्तिमान…गुलबदन…गुल-ए-गुलशन, शाहरुख़, ह्रितिक, आमिर और सलमान…अपनी कुर्सियों की पेटी बांध लीजिए, पजामों के नाड़े टाइट कीजिए और फ़ोन की स्क्रीन थोड़ी ब्राइट कीजिए..दिस इज़ योर कैप्टन स्कैली, फ़्लाइट नम्बर “हौला 777” का चार्ज अब हम सम्भाल रहे हैं, आगे आपको जरा ज़ोर के झटके ज़्यादा ज़ोर से लगने की सम्भावना सेठ है,” स्कैली की आवाज़ पूरे वातावरण में गूंजी।
“बूम!!” एक ज़ोर का धमाका हुआ और निमित्त की ओर बढ़त कालरात्रि सूखे पत्ते की तरह एयर-प्रेशर से पीछे हवा में कई फुट ऊपर कलाबाज़ियाँ खाते हुए एक पेड़ से टकराया।
“स्कैली आ गया! कहाँ था तू स्कैली?” निमित्त स्कैली की आवाज़ सुन कर इतना खुश जीवन में शायद पहली बार हो रहा था।
“तू हौले का हौला ही रहेगा…सस्पेन्स रिवील हमेशा क्लाइमैक्स के लिए बचाने का, मिड-ऐक्शन में नो जास्ती बड़-बड़, ओन्ली बड़ा-बड़ा बूम-बूम,” आसमान में चाँद की जगह अब स्कैली अट्टहास करता नज़र आ रहा था। निमित्त के सपने में चाँद स्कैली में बदल गया था।
नीचे गिरा कालरात्रि कीड़े की तरह रेंगते हुए वहाँ से भागने की कोशिश कर रहा था। एक और हवा के झोंके ने उसे दोबारा उठा कर पास की चट्टान पर पटकनी दे दी।
“तो देवियों और सज्जनों अब टाइम है आयडेंटिटी रिवील का। ये पिलपिला क्या बोला था हौला? ये तेरी मौत है? मेरे को ना…ही..ही..ही..तेरी मौत का नंगा नाच देखने का है…हिहिही,” चाँद की जगह नज़र आता स्कैली अट्टहास करते हुए बोला।
कालरात्रि का शरीर हवा में उठने लगा और यूँ अप्राकृतिक कोणों पर तुड़ने मुड़ने लगा जैसे कोई “पेपर-बॉल” बना रहा हो।
“इयाssss….” अब कालरात्रि अट्टहास नहीं कर रहा था, उसकी दर्द में डूबी चीखें पूरे वातावरण में ऐसे गूंज रही थीं जैसे वास्तव में उसके जिस्म की एक-एक हड्डी को कई सौ टुकड़ों में तोड़ा जा रहा हो। उसके शरीर से काला लिबास हटने लगा, उसका चेहरा परिवर्तित होने लगा।
“लेडीज़ एंड लेडाज़, आई गिव यू पोपले राजा की तीसरी टांग,” स्कैली ड्रमैटिक टोन में बोला।
“मल्हार गोखले..” निमित्त की ज़ुबान से निकला।
“उर्फ़ मंथरा…येइच है तेरी पिलपिली चुड़ैल, हौले।” स्कैली उसका वाक्य पूरा करते हुए बोला।
पेपर बॉल की तरह मुड़ने के बाद जब कालरात्रि सीधा हो कर नीचे गिरा तब वो मंथरा में तब्दील हो चुका था और अपने चेहरे पर व आँखों में जमाने भर की घृणा लिए निमित्त को घूर रहा था और गालियाँ बक रहा था।
“क्या रे? माना मेरा हौला थोड़ा “स्लो” है, इसीलिए तो उसको हौला बुलाता है मैं। पर तूने तो हौले को हलवा समझ लिया कि तू मुँह खोल के गप्प कर लेगा…जैसे तेरे राजे के लड्डू हों। बिग मिस्टेक किया मैन…मतलब वुमन…मतलब दे-देम, अल्फ़ा की बीटा में गामा…जो भी तू है। माई हौला इज़ नो हलवा…ओन्ली जलवा…देखेगा?…देखेगी? ले देख!”
मंथरा ने बोलने को मुँह खोला लेकिन उसका मुँह ग़ायब हो गया। मुँह की जगह खाल थी, उसकी नाक के दोनों छेद भी ग़ायब हो गए। उसका शरीर ऐंठने लगा। किसी सिर कटे मुर्ग़े के समान बुरी तरह तड़फड़ाने लगा वो।
“तूने ग़लत आदमी के अंतर्मन में सेंध लगा ली लंगड़े लोमड़े, यह स्कैली का साम्राज्य है, यहाँ सिर्फ़ मेरा एकाधिकार चलता है।
“इरा ठीक है ना?” निमित्त ने उस चट्टान की तरफ़ देखते हुए सवाल किया जहां कुछ देर पहले इरा की लाश थी पर अब वहाँ कुछ भी ना था। ना लाश, ना खून।
“बिल्कुल ठीक है। इस हरामज़ादे ने सिर्फ़ तेरे अंतर्मन के भय को तेरे विरुद्ध हथियार बनाने की कोशिश की है। जिसके लिए एक मासूम बच्ची को ज़रिया बनाया इस घिनौने जंतु ने। ख़त्म कर दे इसे हौले। कटार उठा और बहुत ही आहिस्ता-आहिस्ता गला रेत डॉल इसका। यहाँ इसे मार के तू किसी की जान लेने का भागी भी नहीं बनेगा क्योंकि ये तो सिर्फ़ एक सपना है, लेकिन इसके दिमाग़ का एक हिस्सा मर जाएगा। लंगड़ा लोमड़ा चालाकी नहीं दिखा पाएगा,” स्कैली निमित्त से बोला।
“फिर इसमें और मुझ में क्या फ़र्क़ होगा स्कैली? जो आप दे नहीं सकते वो लेने का अधिकार आपका नहीं। सपना अगर यथार्थ जितना सजीव है तो उसमें किए गए अपराध की उत्कटता भी उतनी ही तीव्र हुई। मुझे ये नहीं करना, बस इसे निकालो यहाँ से हमेशा के लिए।” निमित्त भावहीन स्वर में बोला।
“ठीक है…कर ले तू अपने मन की, बाद में आएगा मेरे पास रोता हुआ तब पूछूँगा,” स्कैली चिढ़ कर बोला।
“स्कैली…”
“ठीक है-ठीक है…लेकिन इतनी आसानी से तो नहीं निकालूँगा। “काला जादू देखना था ना इस लंगड़े लोमड़े को? चलो इसको “काला जादू” दिखाते हैं,” स्कैली धूर्त भाव से हंसते हुए बोला।
“स्कैली…” निमित्त ने अपना सिर पकड़ लिया।
“तो लेडीज़ एंड लेडाज़, “स्कैलीज़ क्रैश कोर्सेज़ इन काला जादू” में आप सबका स्वागत है। हमारे यहाँ आपको या आपके परिवार को परेशान करने वाले पिस्सुओं का हंड्रेड पर्सेंट सफल इलाज करने के “नॉट सो घरेलू” नुस्ख़े बताए जाते हैं, वो भी बिल्कुल मुफ़्त…मुफ़्त…मुफ़्त,” स्कैली ने फिर ड्रामाई अन्दाज़ में बोलना शुरू किया।
“तो आज हम बनाएँगे एनिमी बैनिशिंग स्पेल ज़ार। इसके लिए सबसे पहले एक “ब्लैक जार” लें।”
निमित्त ने देखा कि नदी के पानी पर तैरता हुआ एक काले काँच का विशाल जार वहाँ आ गया।
“इसमें हम डालेंगे काली कॉफ़ी…शत्रु की ऊर्जा क्षीण करने के लिए, जंग लगी कीलें उसके इरादों को भेदने, डिके करने और उनका क्षरण करने के लिए, काली मिर्च उनकी घृणा व कोप को वापस उन तक पहुँचाने के लिए, लहसुन उनकी बुराई को बांधने के लिए, मरे हुए कीड़े उनकी नकारात्मक ऊर्जा और कुत्सित इरादों का अंत दर्शाने के लिए…” स्कैली के बोलने के साथ-साथ ये सारी चीज़ें हवा में उड़ते हुए काले जार में गिरने लगीं।
“अब अपने शत्रु को सू-सू स्नान करवाइए…आई मीन उसका नाम पेपर पर लिख कर उस पेपर को…हमारे पास पूरा समूचा शत्रु है तो हम उसका ही यूज़ करेंगे…डिस्क्लेमर…ये वाला पार्ट ऑप्शनल है…बट इट्स द फ़न पार्ट…हिहिही…बेटा अल्फ़ा…प्लीज़ डू द ऑनर्स,” स्कैली के कहने पर अल्फ़ा आगे बढ़ा और छटपटाती मंथरा को सिर से पैर तक “भिगो” दिया।
“अब अपने शत्रु…आइ मीन उसके नाम वाले पेपर को ब्लैक जार में सील पैक कीजिए और जार पश्चिम दिशा में फेंक दीजिए,” स्कैली के इशारे पर तड़पती मंथरा हवा में तैरते हुए जार में समा गई और ढक्कन बंद हो गया।
“जार को स्पेल कास्ट कर हौले,”
“मैं तुझे अभिशापित करता हूँ कि तू मेरे प्रति जो भी कुत्सित कर्म, कथन, कृत्य अथवा कल्पना रखेगा वो दस हज़ार गुणा बहुगुणित हो कर तुझ पर ही वापस आएगी,” निमित्त ने जार की तरफ़ हाथ सीधा करते हुए कहा।
सील्ड जार नदी के पानी में गिरा और पश्चिम दिशा में बह चला।
“ये तेरे सपने और तेरे अंतर्मन से हमेशा के लिए निकल जाएगा, लेकिन ये “स्पेल-जार” रियल टाइम में भी इसपर काम करेगा,” स्कैली ने निमित्त से कहा।
“अब सिलसिलेवार ढंग से बताओ कि आख़िर हुआ क्या था?” सहमति में सिर हिलाते हुए निमित्त ने सवाल किया।
“ड्रीम स्नैचिंग…ऐस्ट्रल हाइजैकिंग…ल्यूसिड अब्डक्शन,” स्कैली ने जवाब दिया।
“यानी मैं किसी और के सपने में था?”
“सही समझे। नर्स डॉरिस ने तुम्हें डेलिरीएंट्स दे कर कुछ समय के लिए कोमा लाइक स्टेट में डाल दिया। यहाँ से तुम्हारी कॉंशियसनेस को हाईजैक किया गया और या तो खुद नर्स डॉरिस या फिर किसी दूसरे इंसान के सपने में डाल दिया गया। इसीलिए तुम उस सपने को देख तो रहे थे पर उसका हिस्सा नहीं थे। तुमने वहाँ क्या देखा मैं नहीं जानता क्योंकि मैं तुम्हारे सब-कॉंशियस में हूँ लेकिन क्योंकि उस शख़्स के सपने में सिर्फ़ तुम्हारी चेतना थी इसलिए मेरा वहाँ ऐक्सेस नहीं था,”
“हुम्म…इसीलिए मेरे पुकारने पर भी तुम वहाँ नहीं आए,”
“येप्प! ये चान्स की बात है कि जिस समय तुम्हारी चेतना उस शख़्स के सपने में थी उसी समय ये लंगड़ा लोमड़ा तुम्हें ढूँढते हुए ऐस्ट्रल प्रोजेक्शन कर रहा था। तेरे उस राजे..संजीव गौतम के सिर्फ़ दो चेले ही इतनी बेहतरीन ऐस्ट्रल प्रोजेक्शन कर के किसी के अंतर्मन में घुस कर उसके विचार परिवर्तित कर सकते हैं,,,एक तू और दूसरी वो मीठी मंथरा।”
“क्योंकि मेरी चेतना किसी और के सपने में थी और इस वजह से तुम निष्क्रीय थे, तो मंथरा के लिए मेरी सब-कॉंशियस में घुसना इतना ही आसान था जितना किसी वायरस के लिए बिना फ़ायरवॉल के सिस्टम में घुस कर उसे करप्ट करना,”
“बिल्कुल। और वही उसने किया। तुम्हारी चेतना जब ड्रीम अब्डक्शन से निकल कर वापस आई तो उसे लगा तुम जाग गए, पर तुम वास्तव में नहीं बल्कि उस इंद्रजाल उस सपने, उस मतिभ्रम में जागे जो इतनी देर में मंथरा ने तुम्हारे लिए बुना था,”
“हुम्म…”
“लेकिन तुम्हारे अंतर्मन का कोई एक हिस्सा है जिसका फ़ायरवॉल अभेद्य है, जहां ना मैं जा सकता हूँ ना मंथरा। वो किसी ना किसी तरह तुम्हें हर बार बचा लेता है। इस बार भी उसने तुम्हें “द मून” रिवर्स्ड टैरो कार्ड दिखा कर एहसास कराया कि तुम वास्तव में जागे हुए नहीं हो,”
“अगर ना कराता तो?”
“मैंने तुमसे कहा था ना कि मंथरा को यहाँ मार दो, वो मरेगा नहीं पर उसके दिमाग़ का एक हिस्सा रियल टाइम में ख़त्म हो जाएगा। वो वही ट्रिक तुम्हारे साथ खेल रहा था। उसने तुम्हारे डर को सच कर के दिखाया, तुम्हें उकसाया, फिर तुम्हारा रूप लिया ताकि तुम खुद को मार दो, तुम खुद अपने आप को मारते तो तुम्हारे दिमाग़ का एक हिस्सा मरता…या शायद तुम ब्रेन डेड हो जाते,”
“मतलब उसका काम बिना कुछ किए हो जाता,”
“बिल्कुल…अब भी बाज नहीं आएगा अपनी खट्टी-मीठी हरकतों से लंगड़ा लोमड़ा, पर स्पेल उसका किया उसे ही पलट कर दे देगा,”
“हुम्म..”
“अब चल हौले…सुबह हो रही मामू,”
निमित्त ने नदी की ओर देखा। ग्रे-वुल्फ़ हर बार की तरह ग़ायब हो चुका था, अल्फ़ा और स्कैली के अलावा वो वहाँ अकेला था।
“हुम्म…तुम दोनों चलो, मैं कुछ देर में आता हूँ,” निमित्त गम्भीर भाव से बोला और नदी की ओर बढ़ गया।
“वुफ़्फ़-वुफ़्फ़” अल्फ़ा ने जैसे भौंक के सवाल किया।
“वो जा रेल है अपने अंतर्मन के उसी हिस्से के पास जिधर अपुन का भी ऐक्सेस नहीं है। चल अपुन दोनों चलते हैं…वैसे तू मस्त सू-सू किया रे आज,”
“वुफ़्फ़..वुफ़्फ़” अल्फ़ा ने खुश होकर दुम हिलाई।
“इतना सू-सू लाया कहाँ से? तू हौले के बेड पर चढ़ के मत सोया कर…किसी दिन उधर भी कर दिया तो..”
“वुफ़्फ़-गुर्र”
सागर की उठती लहरों का शोर।
दूर तक फैले सागर के क्षितिज पर अब भी रात्रि का आधिपत्य स्थापित करता चंद्रमा विद्यमान था जिसकी किरणें किनारे गिरे एक वृक्ष पर बैठे साये पर पड़ रही थीं। उसके खुले लम्बे बाल और बड़े फ़्लोरल प्रिंट वाली लाल साड़ी का पल्लू हवा में लहरा रहा था।
निमित्त उस साये की तरफ़ बढ़ा।
“आ गया आशू, थका हुआ लग रहा है आज,”
निमित्त ने कोई जवाब ना दिया। वो चुपचाप उस साये के पैरों के पास बैठ गया और अपना सिर उसके घुटनों पर रख दिया।
दोनों हाथ प्यार से निमित्त के उलझे बालों में फिरे, निमित्त की आँखों से दो बूँदें उन पैरों पर ढलक गयीं जिनसे वो लिपटा हुआ था।
“आज मैं हारने के बहुत क़रीब था माँ,”
“मेरे बेटे ने जीवन का सबसे बड़ा सबक़ सीख लिया है, अपनी भावनाओं, अपने ग़ुस्से पर क़ाबू करना सीख लिया है, वो कैसे हार सकता है भला?” माँ ने प्यार से निमित्त के माथे पर बिखरे बालों को उँगलियों से कंघी करते हुए कहा।
निमित्त ने अपना चेहरा उठा कर माँ की आँखों में देखा।
“मैं सही तो हूँ ना माँ?”
माँ ने उसका चेहरा अपनी हथेलियों में भर लिया।
“मैंने पहले भी कहा था आशू, मैं शायद सिर्फ़ तेरी कल्पना का एक हिस्सा मात्र हूँ। तेरे अंतर्मन ने मुझे जैसा चाहा वैसा गढ़ लिया…फिर भला मैं तेरे इस सवाल का जवाब कैसे दूँ? तू बता तुझे क्या लगता है?”
“मुझे नहीं लगता कि आप सिर्फ़ मेरी कल्पना हो। ये आपका अस्तित्व है जो मुझ में बसता है…और मुझे लगता है कि जिस दिन भी मैं जीवन में कभी कुछ ग़लत करूँगा आप मुझसे हमेशा के लिए छिन जाएँगी। उस दिन मैं यहाँ आऊँगा तो यह स्थान ख़ाली होगा, यहाँ मेरी माँ नहीं होगी। तो जब तक यहाँ आने पर मुझे मेरी माँ मिल रही है, मतलब मैं सही कर रहा हूँ,”
“बस फिर…इतना सोच मत। अपना कर्म कर। जानता है वास्तव में एज़ अबव, सो बिलो के बीच क्या होता है? इसके बीच हम होते हैं आशू…जिसके अंदर अंधकार है उसे सिर्फ़ अंधकार दिखेगा, जिसमें प्रकाश है उसे इसके बीच प्रकाश मिलेगा,” माँ उसकी शर्ट के सामने के खुले बटन लगाते हुए बोलीं।
“अब चल उठ..तेरे जागने का समय हो गया है। जो शुरू किया है उसे ख़त्म कर,”
“कुछ देर रहने दो यहाँ अपने पास, फिर चला जाऊँगा,” निमित्त ज़िद करते हुए पैरों से लिपट गया और घुटनों कर सिर रख कर आँखें मूँद लीं।
माँ उसे प्यार से थपकाने लगीं।
“मम्मी..वो लोरी सुनाओ ना जो बचपन में हमेशा सुनाती थी,”
कुछ पल के लिए सागर की लहरें बिल्कुल शांत हो गयीं। वो पल थाम गया। सिर्फ़ माँ के गाने की आवाज़, और उनके पैरों से लिपट कर हल्के-हल्के सिसकते निमित की ध्वनि थी।
“यशोदा का नंदलाला, बृज का उजाला है, मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए..
रात ठंडी-ठंडी हवा, गा के सुलाए, भोर ये गुलाबी पलकें, खोल के जगाए…
ज़ु ज़ु ज़ू ज़ु ज़ू ज़ु ज़ु ज़ु ज़ू ज़ु”
कहानी जारी है
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